02.Mahabharata Volume 2 — पृष्ठ 1951–1960
महाभारत — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1951–1960
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इसी समय विशुद्ध अन्तःकरणवाले कमलयोनि जगत्स्रष्टा चतुर्मुख ब्रह्माजीने विमानद्वारा वहाँ आकर श्रीरामचन्द्रजीको दर्शन दिया ॥ १७ ॥
शक्रश्चाग्निश्च वायुश्च यमो वरुण एव च ।
यक्षाधिपश्च भगवांस्तथा सप्तर्षयोऽमलाः ॥ १८ ॥
साथ ही इन्द्र, अग्नि, वायु, यम, वरुण, यक्षराज भगवान् कुबेर तथा निर्मल चित्तवाले सप्तर्षिगण भी वहाँ आ गये ॥ १८ ॥
राजा दशरथश्चैव दिव्यभास्वरमूर्तिमान् ।
विमानेन महार्हेण हंसयुक्तेन भास्वता ॥ १ ९ ॥
इनके सिवा हंसोंसे युता एक बहुमूल्य तेजस्वी विमानद्वारा दिव्य प्रकाशमय स्वरूप धारण किये स्वयं राजा दशरथ भी वहाँ पधारे ॥ १ ९ ॥
ततोऽन्तरिक्षं तत् सर्वं देवगन्धर्वसंकुलम् ।
शुशुभे तारकाचित्रं शरदीव नभस्तलम् ॥ २० ॥
उस समय देवताओं और गन्धर्वोंसे भरा हुआ वह सम्पूर्ण अन्तरिक्ष इस प्रकार शोभा पाने लगा, मानो असंख्य तारागणोंसे चित्रित शरद्ऋतुका आकाश हो ॥ २० ॥
तत उत्थाय वैदेही तेषां मध्ये यशस्विनी ।
उवाच वाक्यं कल्याणी रामं पृथुलवक्षसम् ॥ २१ ॥
तब उन सबके बीचमें खड़ी होकर कल्याणमयी यशस्विनी सीताने चौड़ी छातीवाले भगवान् श्रीरामसे इस प्रकार कहा— ॥ २१ ॥
राजपुत्र न ते दोषं करोमि विदिता हि ते ।
गतिः स्त्रीणां नराणां च शृणु चेदं वचो मम ॥ २२ ॥
‘ राजपुत्र! मैं आपको दोष नहीं देती, क्योंकि आप स्त्रियों और पुरुषोंकी कैसी गति है,
यह अच्छी तरह जानते हैं । केवल मेरी यह बात सुन लीजिये ॥ २२ ॥
अन्तश्चरति भूतानां मातरिश्वा सदागतिः ।
स मे विमुञ्चतु प्राणान् यदि पापं चराम्यहम् ॥ २३ ॥
‘निरन्तर संचरण करनेवाले वायुदेव समस्त प्राणियोंके भीतर विचरते हैं । यदि मैंने कोई पापाचार किया हो तो वे वायुदेवता मेरे प्राणोंका परित्याग कर दें ॥ २३ ॥
अग्निरापस्तथाऽऽकाशं पृथिवी वायुरेव च ।
विमुञ्चन्तु मम प्राणान् यदि पापं चराम्यहम् ॥ २४ ॥
‘ यदि मैं पापका आचरण करती होऊँ तो अग्नि, जल, आकाश, पृथ्वी और वायु — ये सब मिलकर मुझसे मेरे प्राणोंका वियोग करा दें ॥ २४ ॥
यथाहं त्वदृते वीर नान्यं स्वप्नेऽप्यचिन्तयम् ।
तथा मे देवनिर्दिष्टस्त्वमेव हि पतिर्भव ॥ २५ ॥
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‘ वीर! यदि मैंने आपके सिवा दूसरे किसी पुरुषका स्वप्नमें भी चिन्तन न किया हो तो देवताओंके दिये हुए एकमात्र आप ही मेरे पति हों' ॥ २५ ॥
ततोऽन्तरिक्षे वागासीत् सुभगा लोकसाक्षिणी ।
पुण्या संहर्षणी तेषां वानराणां महात्मनाम् ॥ २६ ॥
तदनन्तर आकाशमें सब लोगोंको साक्षी देती हुई एक सुन्दर वाणी उच्चरित हुई, जो परम पवित्र होनेके साथ ही उन महामना वानरोंको भी हर्ष प्रदान करनेवाली थी ॥ २६ ॥
वायुरुवाच
भो भो राघव सत्यं वै वायुरस्मि सदागतिः ।
अपापा मैथिली राजन् संगच्छ सह भार्यया ॥ २७ ॥
( उस आकाशवाणीके रूपमें) वायुदेवता बोले - रघुनन्दन! मैं सदा विचरण करनेवाला वायुदेवता हूँ । सीताने जो कुछ कहा है, वह सत्य है । राजन्! मिथिलेशकुमारी सर्वथा पापशून्य हैं । आप अपनी इस पत्नीसे निःसंकोच होकर मिलिये ॥ २७ ॥
अग्निरुवाच
अहमन्तःशरीरस्थो भूतानां रघुनन्दन ।
सुसूक्ष्ममपि काकुत्स्थ मैथिली नापराध्यति ॥ २८ ॥
अग्निदेवने कहा — रघुनन्दन! मैं समस्त प्राणियोंके शरीरमें रहनेवाला अग्नि हूँ । मुझे मालूम है कि मिथिलेशकुमारीके द्वारा कभी सूक्ष्मसे भी सूक्ष्म अपराध नहीं हुआ है ॥ २८ ॥
वरुणउवाच
रसा वै मत्प्रसूता हि भूतदेहेषु राघव ।
अहं वै त्वां प्रब्रवीमि मैथिली प्रतिगृह्यताम् ॥ २ ९ ॥
वरुणदेवने कहा — श्रीराम! समस्त प्राणियोंके शरीरमें जो जलतत्त्व है, वह मुझसे ही उत्पन्न हुआ है । अतः मैं तुमसे कहता हूँ, मिथिलेशकुमारी निष्पाप है, इसे ग्रहण करो ॥ २ ९ ॥ ब्रह्मोवाच
पुत्र नैतदिहाश्चर्यं त्वयि राजर्षिधर्मणि ।
साधो सद्वृत्त काकुत्स्थ शृणु चेदं वचो मम ॥ ३० ॥
तत्पश्चात् ब्रह्माजी बोले- वत्स! तुम राजर्षियोंके धर्मपर चलनेवाले हो; अतः तुममें ऐसा सद्विचार होना आश्चर्यकी बात नहीं है । साधु सदाचारी श्रीराम! तुम मेरी यह बात सुनो ॥ ३० ॥
शत्रुरेष त्वया वीर देवगन्धर्वभोगिनाम् ।
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यक्षाणां दानवानां च महर्षीणां च पातितः ॥ ३१ ॥
वीरवर! यह रावण देवता, गन्धर्व, नाग, यक्ष, दानव तथा महर्षियोंका भी शत्रु था । इसे तुमने मार गिराया है ॥ ३१ ॥
अवध्यः सर्वभूतानां मत्प्रसादात् पुराभवत् ।
कस्माच्चित् कारणात् पापः कञ्चित् कालमुपेक्षितः ॥ ३२ ॥
पूर्वकालमें मेरे ही प्रसादसे यह समस्त प्राणियोंके लिये अवध्य हो गया था । किसी कारणवश ही कुछ कालतक इस पापीकी उपेक्षा की गयी थी ॥ ३२ ॥
वधार्थमात्मनस्तेन हृता सीता दुरात्मना ।
नलकूबरशापेन रक्षा चास्याः कृता मया ॥ ३३ ॥
दुरात्मा रावणने अपने वधके लिये ही सीताका अपहरण किया था । नलकूबरके शापद्वारा मैंने सीताकी रक्षाका प्रबन्ध कर दिया था ॥ ३३ ॥
यदि ह्यकामां सेवेत स्त्रियमन्यामपि ध्रुवम् ।
शतधास्य फलेन्मूर्धा इत्युक्तः सोऽभवत् पुरा ॥ ३४ ॥
पूर्वकालमें रावणको यह शाप दिया गया था कि यदि यह उसे न चाहनेवाली किसी परायी स्त्रीका बलपूर्वक सेवन करेगा तो इसके मस्तकके सैकड़ों टुकड़े हो जायँगे ॥ ३४ ॥
नात्र शङ्का त्वया कार्या प्रतीच्छेमां महाद्युते ।
कृतं त्वया महत् कार्यं देवानाममरप्रभ ॥ ३५ ॥
अतः महातेजस्वी श्रीराम! तुम्हें सीताके विषयमें कोई शंका नहीं करनी चाहिये । इसे ग्रहण करो । देवताओंके समान तेजस्वी वीर! तुमने रावणको मारकर देवताओंका महान् कार्य सिद्ध किया है ॥ ३५ ॥
दशरथ उवाच
प्रीतोऽस्मि वत्स भद्रं ते पिता दशरथोऽस्मि ते ।
अनुजानामि राज्यं च प्रशाधि पुरुषोत्तम ॥ ३६ ॥
दशरथजी बोले — वत्स! मैं तुम्हारा पिता दशरथ हूँ, तुमपर बहुत प्रसन्न हूँ, तुम्हारा कल्याण हो । पुरुषोत्तम! मैं तुम्हें आज्ञा देता हूँ कि अब तुम अयोध्याका राज्य करो ॥ ३६ ॥
राम उवाच
अभिवादये त्वां राजेन्द्र यदि त्वं जनको मम ।
गमिष्यामि पुरीं रम्यामयोध्यां शासनात् तव ॥ ३७ ॥
श्रीरामचन्द्रजीने कहा- राजेन्द्र! यदि आप मेरे पिता हैं तो मैं आपको प्रणाम करता हूँ । आपकी आज्ञासे अब मैं रमणीय अयोध्यापुरीको लौट जाऊँगा ॥ ३७ ॥
मार्कण्डेय उवाच
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तमुवाच पिता भूयः प्रहृष्टो भरतर्षभ ।
गच्छायोध्यां प्रशाधीति रामं रक्तान्तलोचनम् ॥ ३८ ॥
सम्पूर्णानीह वर्षाणि चतुर्दश महाद्युते । मार्कण्डेयजी कहते हैं - भरतश्रेष्ठ युधिष्ठिर! तदनन्तर पिता दशरथने अत्यन्त प्रसन्न होकर कुछ - कुछ लाल नेत्रोंवाले श्रीरामचन्द्रजीसे पुनः कहा- ' महाद्युते! तुम्हारे वनवासके चौदह वर्ष पूरे हो गये हैं । अब तुम अयोध्या जाओ और वहाँका शासन अपने हाथमें लो' ॥ ३८३ ॥
ततो देवान् नमस्कृत्य सुहृद्भिरभिनन्दितः ॥ ३ ९ ॥ महेन्द्र इव पौलोम्या भार्यया स समेयिवान् । तत्पश्चात् श्रीरामचन्द्रजीने देवताओंको नमस्कार किया और सुहृदोंसे अभिनन्दित हो अपनी पत्नी सीतासे मिले, मानो इन्द्रका शचीसे मिलन हुआ हो ॥ ३ ९ ३ ॥ ततो वरं ददौ तस्मै ह्यविन्ध्याय परंतपः ॥ ४० ॥
त्रिजटां चार्थमानाभ्यां योजयामास राक्षसीम् । इसके बाद परंतप श्रीरामने अविन्ध्यको अभीष्ट वरदान दिया तथा त्रिजटा राक्षसीको धन और सम्मानसे संतुष्ट किया ॥ ४० ॥
तमुवाच ततो ब्रह्मा देवैः शक्रपुरोगमैः ॥ ४१ ॥
कौसल्यामातरिष्टांस्ते वरानद्य ददानि कान् । यह सब हो जानेपर इन्द्र आदि देवताओंसहित ब्रह्माने भगवान् रामसे कहा —'कौसल्यानन्दन! कहो, आज मैं तुम्हें कौन- कौनसे अभीष्ट वर प्रदान करूँ'? ॥ वव्रे रामः स्थितिं धर्मे शत्रुभिश्चापराजयम् ॥ ४२ ॥
राक्षसैर्निहतानां च वानराणां समुद्भवम् । तब श्रीरामचन्द्रजीने उनसे ये वर माँगे- ' मेरी धर्ममें सदा स्थिति रहे, शत्रुओंसे कभी पराजय न हो तथा राक्षसोंके द्वारा मारे गये वानर पुनः जीवित हो जायँ' ॥ ४२ ॥
ततस्ते ब्रह्मणा प्रोक्ते तथेति वचने तदा ॥ ४३ ॥
समुत्तस्थुर्महाराज वानरा लब्धचेतसः । यह सुनकर ब्रह्माजीने कहा- ' ऐसा ही हो । ' महाराज! उनके इतना कहते ही सभी वानर चेतना प्राप्त करके जी उठे ॥ ४३३ ॥
सीता चापि महाभागा वरं हनुमते ददौ ॥ ४४ ॥
रामकीर्त्या समं पुत्र जीवितं ते भविष्यति । महासौभाग्यवती सीताने भी हनुमानजीको यह वर दिया-' पुत्र! जबतक इस धरातलपर भगवान् श्रीरामकी कीर्ति बनी रहेगी, तबतक तुम्हारा जीवन स्थिर रहेगा ॥ ४४ ||
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दिव्यास्त्वामुपभोगाश्च मत्प्रसादकृताः सदा ॥ ४५ ॥
उपस्थास्यन्ति हनुमन्निति स्म हरिलोचन । ‘ पिंगलनयन हनुमान्! मेरी कृपासे तुम्हें सदा ही दिव्य भोग प्राप्त होते रहेंगे ' ॥ ४५३ || ततस्ते प्रेक्षमाणानां तेषामक्लिष्टकर्मणाम् ॥ ४६ ॥
अन्तर्धानं ययुर्देवाः सर्वे शक्रपुरोगमाः । तदनन्तर अनायास ही महान् पराक्रम करनेवाले वानरोंके देखते - देखते वहाँ इन्द्र आदि सब देवता अन्तर्धान हो गये ॥ ४६३ ॥
दृष्ट्वा रामं तु जानक्या संगतं शक्रसारथिः ॥ ४७ ॥
उवाच परमप्रीतः सुहृन्मध्य इदं वचः ।
देवगन्धर्वयक्षाणां मानुषासुरभोगिनाम् ॥ ४८ ॥
अपनीतं त्वया दुःखमिदं सत्यपराक्रम । श्रीरामचन्द्रजीको जनकनन्दिनी सीताके साथ विराजमान देख इन्द्रसारथि मातलिको बड़ी प्रसन्नता हुई । उसने सब सुहृदोंके बीचमें इस प्रकार कहा -' सत्यपराक्रमी श्रीराम! आपने देवता, गन्धर्व, यक्ष, मनुष्य, असुर और नाग- इन सबका दुःख दूर कर दिया है ॥ ४७-४८३ ॥ सदेवासुरगन्धर्वा यक्षराक्षसपन्नगाः ॥ ४ ९ ॥ कथयिष्यन्ति लोकास्त्वां यावद् भूमिर्धरिष्यति । ‘ जबतक यह पृथ्वी रहेगी, तबतक देवता, असुर, गन्धर्व, यक्ष, राक्षस तथा नागोंसहित सम्पूर्ण जगत्के लोग आपकी कीर्तिकथाका गान करेंगे ' ॥ ४ ९ ३ ॥ इत्येवमुक्त्वानुज्ञाप्य रामं शस्त्रभृतां बरम् ॥ ५० ॥
सम्पूज्यापाक्रमत् तेन रथेनादित्यवर्चसा । ऐसा कहकर शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ श्रीरामचन्द्रजीकी आज्ञा ले उनकी पूजा करके सूर्यके समान तेजस्वी उसी रथके द्वारा मातलि स्वर्गलोकको चला गया ॥ ५०३ ॥
ततः सीतां पुरस्कृत्य रामः सौमित्रिणा सह ॥ ५१ ॥
सुग्रीवप्रमुखैश्चैव सहितः सर्ववानरैः ।
विधाय रक्षां लङ्कायां विभीषणपुरस्कृतः ॥ ५२ ॥
संततार पुनस्तेन सेतुना मकरालयम् ।
पुष्पकेण विमानेन खेचरेण विराजता ॥ ५३ ॥
कामगेन यथामुख्यैरमात्यैः संवृतो वशी ।
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तदनन्तर जितेन्द्रिय भगवान् श्रीरामने लंकापुरीकी सुरक्षाका प्रबन्ध करके लक्ष्मण, सुग्रीव आदि सभी श्रेष्ठ वानरों, विभीषण तथा प्रधान-प्रधान सचिवोंके साथ सीताको आगे करके इच्छानुसार चलनेवाले, आकाशचारी, शोभाशाली पुष्पकविमानपर आरूढ़ हो उसीके द्वारा पूर्वोक्त सेतुमार्गसे ऊपर- ही- ऊपर पुनः मकरालय समुद्रको पार किया ॥ ५१–५३३ || ततस्तीरे समुद्रस्य यत्र शिश्ये स पार्थिवः ॥ ५४ ॥
तत्रैवोवास धर्मात्मा सहितः सर्ववानरैः । समुद्रके इस पार आकर धर्मात्मा श्रीरामने पहले जहाँ शयन किया था, उसी स्थानपर सम्पूर्ण वानरोंके साथ विश्राम किया ॥ ५४३ ॥
अथैनान् राघवः काले समानीयाभिपूज्य च ॥ ५५ ॥
विसर्जयामास तदा रत्नैः संतोष्य सर्वशः । फिर श्रीरघुनाथजीने यथासमय सबको अपने पास बुलाकर सबका यथायोग्य आदर-सत्कार किया तथा रत्नोंकी भेंटसे संतुष्ट करके सभी वानरों और रीछोंको बिदा किया ॥ ५५ ॥
गतेषु वानरेन्द्रेषु गोपुच्छर्क्षेषु तेषु च ॥ ५६ ॥
सुग्रीवसहितो रामः किष्किन्धां पुनरागमत् ।
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जब वे रीछ, श्रेष्ठ वानर और लंगूर चले गये, तब सुग्रीवसहित श्रीरामने पुनः किष्किन्धापुरीको प्रस्थान किया ॥ ५६ ॥
विभीषणेनानुगतः सुग्रीवसहितस्तदा ॥ ५७ ॥
पुष्पकेण विमानेन वैदेह्या दर्शयन् वनम् ।
किष्किन्धां तु समासाद्य रामः प्रहरतां वरः ॥ ५८ ॥
अङ्गदं कृतकर्माणं यौवराज्येऽभ्यषेचयत् । विभीषण और सुग्रीवके साथ पुष्पक विमानद्वारा विदेहकुमारी सीताको वनकी शोभा दिखाते हुए योद्धाओंमें श्रेष्ठ श्रीरामचन्द्रजीने किष्किन्धामें पहुँचकर अंगदको, जिन्होंने लंकाके युद्धमें महान् पराक्रम दिखाया था, युवराजके पदपर अभिषिक्त किया ॥ ५७-५८३ || ततस्तैरेव सहितो रामः सौमित्रिणा सह ॥ ५ ९ ॥ यथागतेन मार्गेण प्रययौ स्वपुरं प्रति । इसके बाद लक्ष्मण तथा सुग्रीव आदिके साथ श्रीरामचन्द्रजी जिस मार्गसे आये थे, उसीके द्वारा अपनी राजधानी अयोध्याकी ओर प्रस्थित हुए ॥ ५ ९ ॥ अयोध्यां स समासाद्य पुरीं राष्ट्रपतिस्ततः ॥ ६० ॥
भरताय हनूमन्तं दूतं प्रास्थापयत् तदा । तत्पश्चात् अयोध्यापुरीके निकट पहुँचकर राष्ट्रपति श्रीरामने हनुमानजीको दूत बनाकर भरतके पास भेजा ॥ लक्षयित्वेङ्गितं सर्वं प्रियं तस्मै निवेद्य वै ॥ ६१ ॥
वायुपुत्रे पुनः प्राप्ते नन्दिग्राममुपागमत् । जब वायुपुत्र हनुमानजी भरतजीकी सारी चेष्टाओंको लक्ष्य करके उन्हें श्रीरामचन्द्रजीके पुनरागमनका प्रिय समाचार सुनाकर लौट आये, तब श्रीरामचन्द्रजी नन्दिग्राममें आये ॥ ६१३ ॥
स तत्र मलदिग्धाङ्गं भरतं चीरवाससम् ॥ ६२ ॥
अग्रतः पादुके कृत्वा ददर्शासीनमासने । वहाँ आकर श्रीरामने देखा, भरत चीरवस्त्र पहने हुए हैं, उनका शरीर मैलसे भरा हुआ है और वे मेरी चरणपादुकाएँ आगे रखकर कुशासनपर बैठे हैं ॥ ६२३ ॥
संगतो भरतेनाथ शत्रुघ्नेन च वीर्यवान् ॥ ६३ ॥
राघवः सहसौमित्रिर्मुमुदे भरतर्षभ । युधिष्ठिर! लक्ष्मणसहित पराक्रमी श्रीरामचन्द्रजी भरत और शत्रुघ्नसे मिलकर बहुत प्रसन्न हुए ॥ ६३ ॥
ततो भरतशत्रुघ्नौ समेतौ गुरुणा तदा ॥ ६४ ॥
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वैदेह्या दर्शनेनोभौ प्रहर्षं समवापतुः । भरत और शत्रुघ्नको भी उस समय बड़े भाईसे मिलकर तथा विदेहकुमारी सीताका दर्शन करके महान् हर्ष प्राप्त हुआ ॥ ६४ ॥
तस्मै तद् भरतो राज्यमागतायातिसत्कृतम् ।
न्यासं निर्यातयामास युक्तः परमया मुदा ॥ ६५ ॥
फिर भरतजीने बड़ी प्रसन्नताके साथ अयोध्या पधारे हुए भगवान् श्रीरामको अपने पास धरोहरके रूपमें रखा हुआ ( अयोध्याका) राज्य अत्यन्त सत्कारपूर्वक लौटा दिया ॥ ६५ ॥
ततस्तं वैष्णवे शूंर नक्षत्रेऽभिमतेऽहनि ।
वसिष्ठो वामदेवश्च सहितावभ्यषिञ्चताम् ॥ ६६ ॥
तत्पश्चात् विष्णुदेवतासम्बन्धी श्रवण नक्षत्रका पुण्य दिवस आनेपर वसिष्ठ और वामदेव दोनों ऋषियोंने मिलकर शूरशिरोमणि भगवान् रामका राज्याभिषेक किया ॥ ६६ ॥
सोऽभिषिक्तः कपिश्रेष्ठं सुग्रीवं ससुहृज्जनम् ।
विभीषणं च पौलस्त्यमन्वजानाद् गृहान् प्रति ॥ ६७ ॥
राज्याभिषेकका कार्य सम्पन्न हो जानेपर श्रीरामचन्द्रजीने सुहृदोंसहित सुग्रीवको तथा पुलस्त्यकुलनन्दन विभीषणको अपने - अपने घर लौटनेकी आज्ञा दी ॥ ६७ ॥
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अभ्यर्च्य विविधैर्भोगैः प्रीतियुक्तौ मुदा युतौ ।
समाधायेतिकर्तव्यं दुःखेन विससर्ज ह ॥ ६८ ॥
श्रीरामने भाँति- भाँतिके भोग अर्पित करके उन दोनोंका सत्कार किया । इससे वे बड़े प्रसन्न और आनन्दमग्न हो गये । तदनन्तर उन दोनोंको कर्तव्यकी शिक्षा देकर रघुनाथजीने उन्हें बड़े दुःखसे विदा किया ॥ ६८ ॥
पुष्पकं च विमानं तत् पूजयित्वा स राघवः ।
प्रादाद् वैश्रवणायैव प्रीत्या स रघुनन्दनः ॥ ६ ९ ॥
इसके बाद उस पुष्पकविमानकी पूजा करके रघुनन्दन श्रीरामने उसे कुबेरको ही प्रेमपूर्वक लौटा दिया ॥ ६ ९ ॥
ततो देवर्षिसहितः सरितं गोमतीमनु ।
दशाश्वमेधानाजह्ने जारूथ्यान् स निरर्गलान् ॥ ७० ॥
तदनन्तर देवर्षियोंसहित गोमती नदीके तटपर जाकर श्रीरघुनाथजीने दस अश्वमेध यज्ञ किये, जो स्तुतिके योग्य थे और जिनमें अन्न आदिकी इच्छासे आनेवाले याचकोंके लिये कभी द्वार बंद नहीं होता था ॥ ७० ॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि रामोपाख्यानपर्वणि श्रीरामाभिषेके एकनवत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २ ९ १ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत रामोपाख्यानपर्वमें श्रीरामाभिषेकविषयक दो सौइक्यानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २ ९१ ॥
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द्विनवत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः मार्कण्डेयजीके द्वारा राजा युधिष्ठिरको आश्वासन मार्कण्डेय उवाच
एवमेतन्महाबाहो रामेणामिततेजसा ।
प्राप्तं व्यसनमत्युग्रं वनवासकृतं पुरा ॥ १ ॥
मार्कण्डेयजी कहते हैं - महाबाहु युधिष्ठिर! इस प्रकार प्राचीन कालमें अमिततेजस्वी श्रीरामने वनवासजनित अत्यन्त भयंकर कष्ट भोगा था ॥ १ ॥
मा शुचः पुरुषव्याघ्र क्षत्रियोऽसि परंतप ।
बाहुवीर्याश्रिते मार्गे वर्तसे दीप्तनिर्णये ॥ २ ॥
शत्रुओंको संताप देनेवाले पुरुषसिंह! तुम क्षत्रिय हो, शोक न करो । तुम तो उस मार्गपर चल रहे हो, जहाँ केवल अपने बाहुबलका भरोसा किया जाता है तथा जहाँ अभीष्ट फलकी प्राप्ति प्रत्यक्ष एवं असंदिग्ध है ॥ २ ॥
न हि ते वृजिनं किंचिद् वर्तते परमण्वपि ।
अस्मिन् मार्गे निषीदेयुः सेन्द्रा अपि सुरसुराः ॥ ३ ॥
श्रीरामके कष्टके सामने तुम्हारा कष्ट अणुमात्र भी नहीं है । इन्द्रसहित देवता तथा असुर भी इस क्षत्रियधर्मके मार्गपर चले हैं ॥ ३ ॥
संहत्य निहतो वृत्रो मरुद्भिर्वज्रपाणिना ।
नमुचिश्चैव दुर्धर्षो दीर्घजिह्वा च राक्षसी ॥ ४ ॥
वज्रपाणि इन्द्रने मरुद्गणोंके साथ मिलकर वृत्रासुर, दुर्धर्ष वीर नमुचि तथा दीर्घजिह्वा राक्षसीका वध किया था ॥ ४ ॥
सहायवति सर्वार्थाः संतिष्ठन्तीह सर्वशः ।
किं नु तस्याजितं संख्ये यस्य भ्राता धनंजयः ॥ ५ ॥
जो सहायकोंसे सम्पन्न है, उसके सभी मनोरथ इस जगत् में सब प्रकारसे सिद्ध होते हैं ।
फिर जिसे धनंजय - जैसा भाई मिला हो, वह युद्धमें किसे परास्त नहीं कर सकता ॥ ५ ॥
अयं च बलिनां श्रेष्ठो भीमो भीमपराक्रमः ।
युवानौ च महेष्वासौ वीरौ माद्रवतीसुतौ ॥ ६ ॥
ये भयंकर पराक्रमी भीमसेन बलवानोंमें श्रेष्ठ हैं । माद्रीनन्दन वीर नकुल- सहदेव भी महान् धनुर्धर तथा नवयुवक हैं ॥ ६ ॥
एभिः सहायैः कस्मात् त्वं विषीदसि परंतप ।
य इमे वज्रिणः सेनां जयेयुः समरुद्गणाम् ॥ ७ ॥