श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड २ — पृष्ठ 1941–1950
महाभारत — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1941–1950
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फिर उस निशाचरने युद्धके लिये प्रस्थान करनेका निश्चय करके तलवार रख दी और आज्ञा दी - ' मेरा रथ तैयार किया जाय ' ॥ ३३ ॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि श्रीरामोपाख्यानपर्वणि इन्द्रजिद्वधे एकोननवत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २८ ९ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत रामोपाख्यानपर्वमें इन्द्रजित्- वधविषयक दो सौ नवासीवाँअध्याय पूरा हुआ ॥ २८९ ॥
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नवत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः राम और रावणका युद्ध तथा रावणका वध मार्कण्डेय उवाच
ततः क्रुद्धो दशग्रीवः प्रिये पुत्रे निपातिते ।
निर्ययौ रथमास्थाय हेमरत्नविभूषितम् ॥ १ ॥
स वृतो राक्षसैर्घोरैर्विविधायुधपाणिभिः ।
अभिदुद्राव रामं स योधयन् हरियूथपान् ॥ २ ॥
मार्कण्डेयजी कहते हैं - युधिष्ठिर! अपने प्रिय पुत्र इन्द्रजित्के मारे जानेपर दशमुख रावणका क्रोध बहुत बढ़ गया । वह सुवर्ण तथा रत्नोंसे विभूषित रथपर बैठकर लंकापुरीसे बाहर निकला । हाथोंमें अनेक प्रकारके अस्त्र - शस्त्र धारण करनेवाले भंयकर राक्षस उसे घेरकर चले । वह वानर-यूथपतियोंसे युद्ध करता हुआ श्रीरामचन्द्रजीकी ओर दौड़ा ॥ १-२ ॥
तमाद्रवन्तं संक्रुद्धं मैन्दनीलनलाङ्गदाः ।
हनूमाञ्जाम्बवांश्चैव ससैन्याः पर्यवारयन् ॥ ३ ॥
उसे क्रोधपूर्वक आक्रमण करते देख मैन्द, नील, नल, अंगद, हनुमान् और जाम्बवान्ने सेनासहित आगे बढ़कर उसे चारों ओरसे घेर लिया ॥ ३ ॥
ते दशग्रीवसैन्यं तदृक्षवानरपुङ्गवाः ।
द्रुमैर्विध्वंसयांचक्रुर्दशग्रीवस्य पश्यतः ॥ ४ ॥
उन रीछ और वानर- सेनापतियोंने दशाननके देखते - देखते वृक्षोंकी मारसे उसकी सेनाका संहार आरम्भ कर दिया ॥ ४ ॥
ततः स सैन्यमालोक्य वध्यमानमरातिभिः ।
मायावी चासृजन्मायां रावणो राक्षसाधिपः ॥ ५ ॥
अपनी सेनाको शत्रुओंद्वारा मारी जाती देख मायावी राक्षसराज रावणने माया प्रकट की ॥ ५ ॥
तस्य देहविनिष्क्रान्ताः शतशोऽथ सहस्रशः ।
राक्षसाः प्रत्यदृश्यन्त शरशक्त्यृष्टिपाणयः ॥ ६ ॥
उसके शरीरसे सैकड़ों और हजारों राक्षस प्रकट होकर हाथोंमें बाण, शक्ति तथा ऋष्टि आदि आयुध लिये दिखायी देने लगे ॥ ६ ॥
तान् रामो जघ्निवात् सर्वान् दिव्येनास्त्रेण राक्षसान् ।
अथ भूयोऽपि मायां स व्यदधाद् राक्षसाधिपः ॥ ७ ॥
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श्रीरामचन्द्रजीने अपने दिव्य अस्त्रके द्वारा उन सब राक्षसोंको नष्ट कर दिया । तब राक्षसराजने पुनः मायाकी सृष्टि की ॥ ७ ॥
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कृत्वा रामस्य रूपाणि लक्ष्मणस्य च भारत ।
अभिदुद्राव रामं च लक्ष्मणं च दशाननः ॥ ८ ॥
भारत! दशाननने श्रीराम और लक्ष्मणके ही बहुत- से रूप धारण करके श्रीराम और लक्ष्मणपर धावा किया ॥ ८ ॥
ततस्ते राममार्च्छन्तो लक्ष्मणं च क्षपाचराः ।
अभिपेतुस्तदा रामं प्रगृहीतशरासनाः ॥ ९ ॥
तदनन्तर वे राक्षस हाथोंमें धनुष- बाण लिये श्रीराम और लक्ष्मणको पीड़ा देते हुए उनपर टूट पड़े ॥ ९ ॥
तां दृष्ट्वा राक्षसेन्द्रस्य मायामिक्ष्वाकुनन्दनः ।
उवाच रामं सौमित्रिरसम्भ्रान्तो बृहद् वचः ॥ १० ॥
राक्षसराज रावणकी उस मायाको देखकर इक्ष्वाकुकुलका आनन्द बढ़ानेवाले सुमित्राकुमार लक्ष्मणको तनिक भी घबराहट नहीं हुई । उन्होंने श्रीरामसे यह महत्त्वपूर्ण बात कही— ॥ १० ॥
जहीमान् राक्षसान् पापानात्मनः प्रतिरूपकान् ।
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जघान रामस्तांश्चान्यानात्मनः प्रतिरूपकान् ॥ ११ ॥
‘ भगवन्! अपने ही समान आकारवाले इन पापी राक्षसोंको मार डालिये । ' तब श्रीरामने रावणकी मायासे निर्मित अपने ही समान रूप धारण करनेवाले उन सबको तथा अन्य राक्षसोंको भी मार डाला ॥ ११ ॥
ततो हर्यश्वयुक्तेन रथेनादित्यवर्चसा ।
उपतस्थे रणे रामं मातलिः शक्रसारथिः ॥ १२ ॥
इसी समय इन्द्रका सारथि मातलि हरे रंगके घोड़ोंसे जुते हुए सूर्यके समान तेजस्वी रथके साथ उस रणभूमिमें श्रीरामचन्द्रजीके समीप आ पहुँचा ॥ १२ ॥
मातलिरुवाच
अयं हर्यश्वयुक् जैत्रो मघोनः स्यन्दनोत्तमः ।
अनेन शक्रः काकुत्स्थ समरे दैत्यदानवान् ॥ १३ ॥
शतशः पुरुषव्याघ्र रथोदारेण जघ्निवान् ।
तदनेन नरव्याघ्र मया यत्तेन संयुगे ॥ १४ ॥
स्यन्दनेन जहि क्षिप्रं रावणं मा चिरं कृथाः । मातलि बोला – पुरुषसिंह श्रीराम! यह हरे रंगके घोड़ोंसे जुता हुआ विजयशाली उत्तम रथ देवराज इन्द्रका है । इस विशाल रथके द्वारा इन्द्रने सैकड़ों दैत्यों और दानवोंका समरांगणमें संहार किया है। नरश्रेष्ठ! मेरे द्वारा संचालित इस रथपर बैठकर आप युद्धमें रावणको शीघ्र मार डालिये, विलम्ब न कीजिये ॥ १३-१४३ ॥ इत्युक्तो राघवस्तथ्यं वचोऽशङ्कत मातलेः ॥ १५ ॥
मायैषा राक्षसस्येति तमुवाच विभीषणः ।
नेयं माया नरव्याघ्र रावणस्य दुरात्मनः ॥ १६ ॥
मातलिके ऐसा कहनेपर श्रीरामचन्द्रजीने उसकी बातपर इसलिये संदेह किया कि कहीं यह भी राक्षसकी माया ही न हो । तब विभीषणने उनसे कहा - ' पुरुषसिंह! यह दुरात्मा रावणकी माया नहीं है ॥ १५-१६ ॥
तदातिष्ठ रथं शीघ्रमिममैन्द्रं महाद्युते ।
ततः प्रहृष्टः काकुस्त्थस्तथेत्युक्त्वा विभीषणम् ॥ १७ ॥
रथेनाभिपपाताथ दशग्रीवं रुषान्वितः । ' महाद्युते! आप शीघ्र इन्द्रके इस रथपर आरूढ़ होइये । ' तब श्रीरामचन्द्रजीने प्रसन्नतापूर्वक विभीषणसे कहा- ' ठीक है । ' यों कहकर उन्होंने रथपर आरूढ़ हो बड़े रोषके साथ दशमुख रावणपर आक्रमण किया ॥ हाहाकृतानि भूतानि रावणे समभिद्रुते ॥ १८ ॥
सिंहनादाः सपटहा दिवि दिव्यास्तथानदन् ।
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दशकन्धरराजसून्वोस्तथा युद्धमभून्महत् ॥ १ ९ ॥ रावणपर श्रीरामकी चढ़ाई होते ही समस्त प्राणी हाहाकार कर उठे, देवलोकमें नगारे बज उठे और जोर- जोरसे सिंहनाद होने लगा । दशकन्धर रावण तथा राजकुमार श्रीराममें उस समय महान् युद्ध छिड़ गया ॥ १८-१९ ॥
अलब्धोपममन्यत्र तयोरेव तथाभवत् ।
स रामाय महाघोरं विससर्ज निशाचरः ॥ २० ॥
शूलमिन्द्राशनिप्रख्यं ब्रह्मदण्डमिवोद्यतम् ।
तच्छूलं सत्वरं रामश्चिच्छेद निशितैः शरैः ॥ २१ ॥
उस युद्धकी संसारमें अन्यत्र कहीं उपमा नहीं थी । उनका वह संग्राम उन्हींके संग्रामके समान था । निशाचर रावणने श्रीरामपर एक त्रिशूल चलाया, जो उठे हुए इन्द्रके वज्र तथा ब्रह्मदण्डके समान अत्यन्त भयंकर था; परंतु श्रीरामने तत्काल अपने तीखे बाणोंद्वारा उस त्रिशूलके टुकड़े -टुकड़े कर दिये ॥ २०-२१ ॥
तद् दृष्ट्वा दुष्करं कर्म रावणं भयमाविशत् ।
ततः क्रुद्धः ससर्जाशु दशग्रीवः शिताञ्छरान् ॥ २२ ॥
उनका वह दुष्कर कर्म देखकर दशानन रावणके मनमें भय समा गया । फिर कुपित होकर उसने तुरंत ही तीखे सायकोंकी वर्षा आरम्भ की ॥ २२ ॥
सहस्रायुतशो रामे शस्त्राणि विविधानि च ।
ततो भुशुण्डीः शूलानि मुसलानि परश्वधान् ॥ २३ ॥
शक्तीश्च विविधाकाराः शतघ्नीश्च शितान् क्षुरान् । उस समय श्रीरामचन्द्रजीके ऊपर भाँति- भाँतिके हजारों शस्त्र गिरने लगे तथा भुशुण्डी, शूल, मुसल, फरसे, नाना प्रकारकी शक्तियाँ, शतघ्नी और तीखी धारवाले बाणोंकी वृष्टि होने लगी ॥ २३ ॥
तां मायां विकृतां दृष्ट्वा दशग्रीवस्य रक्षसः ॥ २४ ॥
भयात् प्रदुद्रुवुः सर्वे वानराः सर्वतोदिशम् । राक्षस दशाननकी उस विकराल मायाको देखकर सब वानर भयके मारे चारों दिशाओंमें भाग चले ॥ २४ ॥
ततः सुपत्रं सुमुखं हेमपुङ्खं शरोत्तमम् ॥ २५ ॥
तूणादादाय काकुत्स्थो ब्रह्मास्त्रेण युयोज ह ।
तं बाणवर्यं रामेण ब्रह्मास्त्रेणानुमन्त्रितम् ॥ २६ ॥
जहृषुर्देवगन्धर्वा दृष्ट्वा शक्रपुरोगमाः ।
अल्पावशेषमायुश्च ततोऽमन्यन्त रक्षसः ॥ २७ ॥
ब्रह्मास्त्रोदीरणाच्छत्रोर्देवदानवकिन्नराः ।
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तब श्रीरामचन्द्रजीने सोनेके सुन्दर पंख तथा उत्तम अग्रभागवाले एक श्रेष्ठ बाणको तरकससे निकालकर उसे ब्रह्मास्त्रद्वारा अभिमन्त्रित किया । श्रीरामद्वारा ब्रह्मास्त्रसे अभिमन्त्रित किये हुए उस उत्तम बाणको देखकर इन्द्र आदि देवताओं तथा गन्धर्वोंके हर्षकी सीमा न रही । शत्रुके प्रति श्रीरामके मुखसे ब्रह्मास्त्रका प्रयोग होता देख देवता, दानव और किन्नर यह समझ गये कि अब इस राक्षसकी आयु बहुत थोड़ी रह गयी है ॥ २५—२७ ¾ ॥ ततः ससर्ज तं रामः शरमप्रतिमौजसम् ॥ २८ ॥
रावणान्तकरं घोरं ब्रह्मदण्डमिवोद्यतम् । तदनन्तर श्रीरामचन्द्रजीने उठे हुए ब्रह्मदण्डके समान भयंकर तथा अप्रतिम तेजस्वी उस रावणविनाशक बाणको छोड़ दिया ॥ २८३ ॥
मुक्तमात्रेण रामेण दूराकृष्टेन भारत ॥ २ ९ ॥
स तेन राक्षसश्रेष्ठः सरथः साश्वसारथिः ।
प्रजज्वाल महाज्वालेनाग्निनाभिपरिप्लुतः ॥ ३० ॥
युधिष्ठिर! श्रीरामद्वारा धनुषको दूरतक खींचकर छोड़े हुए उस बाणके लगते ही राक्षसराज रावण रथ, घोड़े और सारथिसहित इस प्रकार जलने लगा मानो भयंकर लपटोंवाली आगके लपेटमें आ गया हो ॥ २ ९ -३० ॥
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ततः प्रहृष्टास्त्रिदशाः सहगन्धर्वचारणाः ।
निहतं रावणं दृष्ट्वा रामेणाक्लिष्टकर्मणा ॥ ३१ ॥
इस प्रकार अनायास ही महान् कर्म करनेवाले श्रीरामचन्द्रजीके हाथोंसे रावणको मारा गया देख देवता, गन्धर्व तथा चारण बहुत प्रसन्न हुए ॥ ३१ ॥
तत्यजुस्तं महाभागं पञ्च भूतानि रावणम् ।
भ्रंशितः सर्वलोकेभ्यः स हि ब्रह्मास्त्रतेजसा ॥ ३२ ॥
तदनन्तर पाँचों भूतोंने उस महान् भाग्यशाली रावणको त्याग दिया । ब्रह्मास्त्रके तेजसे दग्ध होकर वह सम्पूर्ण लोकोंसे भ्रष्ट हो गया ॥ ३२ ॥
शरीरधातवो ह्यस्य मांसं रुधिरमेव च ।
शुर्ब्रह्मास्त्रनिर्दग्धा न च भस्माप्यदृश्यत ॥ ३३ ॥
उसके शरीरके धातु, मांस तथा रक्त भी ब्रह्मास्त्रसे दग्ध होकर नष्ट हो गये । उसकी राखतक नहीं दिखायी दी ॥ इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि रामोपाख्यानपर्वणि रावणवधे नवत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २ ९ ० ॥ इसप्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत रामोपाख्यानपर्वमें रावणवधविषयक दो सौ नब्बेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २९० ॥
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एकनवत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः श्रीरामका सीताके प्रति संदेह, देवताओंद्वारा सीताकी शुद्धिका समर्थन, श्रीरामका दल- बलसहित लंकासे प्रस्थान एवं किष्किन्धा होते हुए अयोध्यामें पहुँचकर भरतसे मिलना तथा राज्यपर अभिषिक्त होना मार्कण्डेय उवाच
स हत्वा रावणं क्षुद्रं राक्षसेन्द्रं सुरद्विषम् ।
बभूव हृष्टः ससुहृद् रामः सौमित्रिणा सह ॥ १ ॥
मार्कण्डेयजी कहते हैं - युधिष्ठिर! इस प्रकार नीच स्वभाववाले देवद्रोही राक्षसराज रावणका वध करके भगवान् श्रीराम अपने मित्रों तथा लक्ष्मणके साथ बड़े प्रसन्न हुए ॥ १ ॥
ततो हते दशग्रीवे देवाः सर्षिपुरोगमाः ।
आशीर्भिर्जययुक्ताभिरानर्चुस्तं महाभुजम् ॥ २ ॥
दशाननके मारे जानेपर देवता तथा महर्षिगण जययुक्त आशीर्वाद देते हुए उन महाबाहुकी पूजा एवं प्रशंसा करने लगे ॥ २ ॥
रामं कमलपत्राक्षं तुष्टुवुः सर्वदेवताः ।
गन्धर्वाः पुष्पवर्षैश्च वाग्भिश्च त्रिदशालयाः ॥ ३ ॥
स्वर्गवासी सम्पूर्ण देवताओं तथा गन्धर्वोंने फूलोंकी वर्षा करते हुए उत्तम वाणीद्वारा कमलनयन भगवान् श्रीरामका स्तवन किया ॥ ३ ॥
पूजयित्वा यथा रामं प्रतिजग्मुर्यथागतम् ।
तन्महोत्सवसंकाशमासीदाकाशमच्युत ॥ ४ ॥
श्रीरामकी भलीभाँति पूजा करके वे सब जैसे आये थे, उसी प्रकार लौट गये । युधिष्ठिर! उस समय आकाश महान् उत्सवसमारोहसे भरा - सा जान पड़ता था ॥ ४ ॥
ततो हत्वा दशग्रीवं लङ्कां रामो महायशाः ।
विभीषणाय प्रददौ प्रभुः परपुरञ्जयः ॥ ५ ॥
तत्पश्चात् शत्रुओंकी राजधानीपर विजय पानेवाले महायशस्वी भगवान् श्रीरामने दशानन रावणका वध करनेके अनन्तर लंकाका राज्य विभीषणको दे दिया ॥ ५ ॥
ततः सीतां पुरस्कृत्य विभीषणपुरस्कृताम् ।
अविन्ध्यो नाम सुप्रज्ञो वृद्धामात्यो विनिर्ययौ ॥ ६ ॥
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इसके बाद उत्तम बुद्धिसे युक्त बूढ़े मन्त्री अविन्ध्य विभीषणसहित भगवती सीताको आगे करके लंकापुरीसे बाहर निकले ॥ ६ ॥
उवाच च महात्मानं काकुत्स्थं दैन्यमास्थितः ।
प्रतीच्छ देवीं सद्वृत्तां महात्मञ्जानकीमिति ॥ ७ ॥
वे ककुत्स्थकुलभूषण महात्मा श्रीरामचन्द्रजीसे दीनतापूर्वक बोले - ‘ महात्मन्! सदाचारसे सुशोभित जनककिशोरी महारानी सीताको ग्रहण कीजिये ' ॥ ७ ॥
एतच्छ्रुत्वा वचस्तस्मादवतीर्य रथोत्तमात् ।
बाष्पेणापिहितां सीतां ददर्शेक्ष्वाकुनन्दनः ॥ ८ ॥
यह सुनकर इक्ष्वाकुनन्दन भगवान् श्रीरामने उस उत्तम रथसे उतरकर सीताको देखा ।
उनके मुखपर आँसुओंकी धारा बह रही थी ॥ ८ ॥
तां दृष्ट्वा चारुसर्वाङ्गीं यानस्थां शोककर्शिताम् ।
मलोपचितसर्वाङ्गीं जटिलां कृष्णवाससम् ॥ ९ ॥
शिबिकामें बैठी हुई सर्वांगसुन्दरी सीता शोकसे दुबली हो गयी थीं । उनके समस्त अंगोंमें मैल जम गयी थी, सिरके बाल आपसमें चिपककर जटाके रूपमें परिणत हो गये थे और उनका वस्त्र काला पड़ा गया था ॥ ९ ॥
उवाच रामो वैदेहीं परामर्शविशङ्कितः ।
गच्छ वैदेहि मुक्ता त्वं यत् कार्यं तन्मया कृतम् ॥ १० ॥
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श्रीरामचन्द्रजीके मनमें यह संदेह हुआ कि सम्भव है, सीता पर पुरुषके स्पर्शसे अपवित्र हो गयी हों; अतः उन्होंने विदेहनन्दिनी सीतासे स्पष्ट वचनोंद्वारा कहा ——विदेहकुमारी! मैंने तुम्हें रावणकी कैदसे छुड़ा दिया । अब तुम जाओ । मेरा जो कर्तव्य था, उसे मैंने पूरा कर दिया ॥ १० ॥
मामासाद्य पतिं भद्रे न त्वं राक्षसवेश्मनि ।
जरां व्रजेथा इति मे निहतोऽसौ निशाचरः ॥ ११ ॥
‘ भद्रे! मुझ - जैसे पतिको पाकर तुम्हें वृद्धावस्थातक किसी राक्षसके घरमें न रहना पड़े, यही सोचकर मैंने उस निशाचरका वध किया है ॥ ११ ॥
कथं ह्यस्मद्विधो जातु जानन् धर्मविनिश्चयम् ।
परहस्तगतां नारीं मुहूर्तमपि धारयेत् ॥ १२ ॥
‘ धर्मके सिद्धान्तको जाननेवाला मेरे जैसा कोई भी पुरुष दूसरेके हाथमें पड़ी हुई नारीको मुहूर्तभरके लिये भी कैसे ग्रहण कर सकता है? ॥ १२ ॥
सुवृत्तामसुवृत्तां वाप्यहं त्वामद्य मैथिलि ।
नोत्सहे परिभोगाय श्वावलीढं हविर्यथा ॥ १३ ॥
‘ मिथिलेशनन्दिनी! तुम्हारा आचार-विचार शुद्ध रह गया हो अथवा अशुद्ध, अब मैं तुम्हें अपने उपयोगमें नहीं ला सकता-ठीक उसी तरह, जैसे कुत्तेके चाटे हुए हविष्यको कोई भी ग्रहण नहीं करता' ॥ १३ ॥
ततः सा सहसा बाला तच्छ्रुत्वा दारुणं वचः ।
पपात देवी व्यथिता निकृत्ता कदली यथा ॥ १४ ॥
सहसा यह कठोर वचन सुनकर देवी सीता व्यथित हो कटे हुए केलेके वृक्षकी भाँति सहसा पृथ्वीपर गिर पड़ीं ॥ १४ ॥
योऽप्यस्या हर्षसम्भूतो मुखरागस्तदाभवत् ।
क्षणेन स पुनर्नष्टो निःश्वास इव दर्पणे ॥ १५ ॥
जैसे श्वास लेनेसे दर्पणमें पड़ा हुआ मुखका प्रतिबिम्ब मलिन हो जाता है, उसी प्रकार सीताके मुखपर उस समय जो हर्षजनित कान्ति छा रही थी, वह एक ही क्षणमें फिर विलीन हो गयी ॥ १५ ॥
ततस्ते हरयः सर्वे नच्छ्रुत्वा रामभाषितम् ।
गतासुकल्पा निश्चेष्टा बभूवुः सहलक्ष्मणाः ॥ १६ ॥
श्रीरामचन्द्रजीका यह कथन सुनकर समस्त वानर तथा लक्ष्मण सबके सब मरे हुएके समान निश्चेष्ट हो गये ॥ १६ ॥
ततो देवो विशुद्धात्मा विमानेन चतुर्मुखः ।
पद्मयोनिर्जगत्स्रष्टा दर्शयामास राघवम् ॥ १७ ॥