02.Mahabharata Volume 2 — पृष्ठ 2181–2190
महाभारत — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 2181–2190
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दशमोऽध्यायः सहदेवका राजा विराटके साथ वार्तालाप और गौओंकी देखभालके लिये उनकी नियुक्ति वैशम्पायन उवाच
सहदेवोऽपि गोपानां कृत्वा वेषमनुत्तमम् ।
भाषां चैषां समास्थाय विराटमुपयादथ ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! तदनन्तर सहदेव भी ग्वालोंका परम उत्तम वेष बनाकर उन्हींकी भाषामें बोलते हुए राजा विराटके यहाँ गये ॥ १ ॥
गोष्ठमासाद्य तिष्ठन्तं भवनस्य समीपतः ।
राजाथ दृष्ट्वा पुरुषान् प्राहिणोज्जातविस्मयः ॥ २ ॥
राजभवनके पास ही गोशाला थी; वहाँ पहुँचकर वे खड़े हो गये । राजा उन्हें दूरसे ही देखकर आश्चर्यमें पड़ गये और उनके पास कुछ लोगोंको भेजा ॥ २ ॥
तमायान्तमभिप्रेक्ष्य भ्राजमानं नरर्षभम् ।
समुपस्थाय वै राजा पप्रच्छ कुरुनन्दनम् ॥ ३ ॥
[ अपने सेवकोंके बुलानेपर उनके साथ] दिव्य कान्तिसे सुशोभित नरश्रेष्ठ सहदेवको राजसभाकी ओर आते देख राजा विराट स्वयं उठकर उनके पास चले गये और कुरुकुलको आनन्द देनेवाले सहदेवसे पूछने लगे— ॥ ३ ॥
कस्य वा त्वं कुतो वा त्वं किं वा त्वं तु चिकीर्षसि ।
न हि मे दृष्टपूर्वस्त्वं तत्त्वं ब्रूहि नरर्षभ ॥ ४ ॥
'पुरुषप्रवर! तुम किसके पुत्र हो, कहाँसे आये हो और क्या करना चाहते हो? मैंने आजसे पहले तुम्हें कभी नहीं देखा है; अतः अपना ठीक- ठीक परिचय दो ' ॥ ४ ॥
सम्प्राप्य राजानममित्रतापनं ततोऽब्रवीन्मेघमहौघनिःस्वनः । वैश्योऽस्मि नाम्नाहमरिष्टनेमि- र्गोसंख्य आसं कुरुपुङ्गवानाम् ॥ ५ ॥
वस्तुं त्वयीच्छामि विशां वरिष्ठ तान् राजसिंहान् न हि वेद्मि पार्थान् । न शक्यते जीवितुमप्यकर्मणा न च त्वदन्यो मम रोचते नृपः ॥ ६ ॥
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शत्रुओंको संताप देनेवाले राजा विराटके निकट पहुँचकर सहदेव मेघोंकी घनघोर घटाके समान गम्भीर स्वरमें बोले - ' महाराज! मैं वैश्य हूँ। मेरा नाम अरिष्टनेमि है । नृपश्रेष्ठ! मैं कुरुवंशशिरोमणि पाण्डवोंके यहाँ गौओंकी गणना तथा देखभाल करता रहा हूँ । अब आपके यहाँ रहना चाहता हूँ; क्योंकि राजाओंमें सिंहके समान पाण्डव कहाँ हैं? यह मैं नहीं जानता । बिना काम किये जीविका चल नहीं सकती और आपके सिवा दूसरा कोई राजा मुझे पसंद नहीं है ' ॥ ५-६ ॥ विराट उवाच त्वं ब्राह्मणो यदि वा क्षत्रियोऽसि समुद्रनेमीश्वररूपवानसि । आचक्ष्व मे तत्त्वममित्रकर्शन न वैश्यकर्म त्वयि विद्यते क्षमम् ॥ ७ ॥
विराटने कहा— शत्रुतापन! मुझे तो ऐसा लगता है कि तुम ब्राह्मण अथवा क्षत्रिय हो । समुद्रसे घिरी हुई समूची पृथ्वीके सम्राट्की भाँति तुम्हारा भव्य रूप है; अतः मुझे अपना ठीक- ठीक परिचय दो । यह वैश्य कर्म ( गोपालन) तुम्हारे योग्य नहीं है ॥ ७ ॥
कस्यासि राज्ञो विषयादिहागतः किं वापि शिल्पं तव विद्यते कृतम् ।
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कथं त्वमस्मासु निवत्स्यसे सदा वदस्व किं चापि तवेह वेतनम् ॥ ८ ॥
तुम किस राजाके राज्यसे यहाँ आये हो? और तुमने किस कलाकी शिक्षा प्राप्त की है? बोलो, हमारे यहाँ कैसे सदा रह सकोगे? और यहाँ तुम्हारा वेतन क्या होगा? ॥ ८ ॥
सहदेव उवाच
पञ्चानां पाण्डुपुत्राणां ज्येष्ठो भ्राता युधिष्ठिरः ।
तस्याष्टशतसाहस्रा गवां वर्गाः शतं शतम् ॥ ९ ॥
सहदेव बोले — राजन्! पाँचों पाण्डवोंमें सबसे बड़े भाई युधिष्ठिर हैं । उनके पास एक प्रकारकी गौओंके आठ लाख झुंड थे और प्रत्येक झुंडमें सौ - सौ गायें थीं ॥ ९ ॥
अपरे शतसाहस्रा द्विस्तावन्तस्तथा परे ।
तेषां गोसंख्य आसं वै तन्तिपालेति मां विदुः ॥ १० ॥
भूतं भव्यं भविष्यं च यच्च संख्यागतं गवाम् ।
न मेऽस्त्यविदितं किंचित् समन्ताद् दशयोजनम् ॥ ११ ॥
इनके सिवा, दूसरे प्रकारकी गौओंके एक लाख झुंड तथा तीसरे प्रकारकी गौओंके उनसे दुगुने अर्थात् दो लाख झुंड थे । ( प्रत्येक झुंडमें सौ- सौ गायें थीं । ) पाण्डवोंकी उन गौओंका मैं गणक और निरीक्षक था । वे लोग मुझे ' तन्तिपाल ' कहा करते थे । चारों ओर दस योजनकी दूरीमें जितनी गौएँ हों; उनकी भूत, वर्तमान और भविष्यमें जितनी संख्या थी, है और होगी, उन सबको मैं जानता हूँ । गौओंके सम्बन्धमें तीनों कालमें होनेवाली कोई ऐसी बात नहीं है, जो मुझे ज्ञात न हो ॥
गुणाः सुविदिता ह्यासन् मम तस्य महात्मनः ।
असकृत् स मया तुष्टः कुरुराजो युधिष्ठिरः ॥ १२ ॥
क्षिप्रं च गावो बहुला भवन्ति
न तासु रोगो भवतीह कश्चन ।
तैस्तैरुपायैर्विदितं ममैत- देतानि शिल्पानि मयि स्थितानि ॥ १३ ॥
ऋषभांश्चापि जानामि राजन् पूजितलक्षणान् ।
येषां मूत्रमुपाघ्राय अपि वन्ध्या प्रसूयते ॥ १४ ॥
महात्मा राजा युधिष्ठिरको मेरे ये गुण भलीभाँति विदित थे । वे कुरुराज युधिष्ठिर सदा मेरे ऊपर संतुष्ट रहते थे । किन -किन उपायोंसे गौओंकी संख्या शीघ्र बढ़ जाती है और उनमें कोई रोग नहीं पैदा होता, यह सब मुझे ज्ञात है । महाराज! ये ही कलाएँ मुझमें विद्यमान हैं । इनके सिवा मैं उन उत्तम लक्षणोंवाले बैलोंको भी जानता हूँ, जिनके मूत्रको सूँघ लेनेमात्रसे वन्ध्या स्त्री भी गर्भधारण एवं संतान उत्पन्न करनेयोग्य हो जाती है ॥ १२–१४ ॥
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विराट उवाच शतं सहस्राणि समाहितानि सवर्णवर्णस्य विमिश्रितान् गुणैः । पशून् सपालान् भवते ददाम्यहं त्वदाश्रया मे पशवो भवन्त्विह ॥ १५ ॥
विराटने कहा — तन्तिपाल! मेरे यहाँ एक लाख पशु संगृहीत हैं । उनमेंसे कुछ तो एक ही रंगके हैं और कुछ मिश्रित रंगके । वे सब विभिन्न गुणोंसे संयुक्त हैं । मैं उन पशुओं और पशुपालोंको आजसे तुम्हारे हाथमें सौंपता हूँ। मेरे पशु अबसे तुम्हारे ही अधीन रहेंगे ॥ १५ ॥
वैशाम्पायन उवाच तथा स राज्ञोऽविदितो विशाम्पते- रुवास तत्रैव सुखं नरोत्तमः । न चैनमन्येऽपि विदुः कथंचन प्रादाच्च तस्मै भरणं यथेप्सितम् ॥ १६ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं -इस प्रकार प्रजापालक राजा विराटसे अपरिचित रहकर नरश्रेष्ठ सहदेव वहीं गोशालामें रहने लगे । दूसरे लोग भी उन्हें किसी तरह पहचान न सके । राजाने उनके लिये उनकी इच्छाके अनुसार भरण- पोषणकी व्यवस्था कर दी ॥ १६ ॥
इति श्रीमहाभारते विराटपर्वणि पाण्डवप्रवेशपर्वणि सहदेवप्रवेशे दशमोऽध्यायः ॥ १० ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत विराटपर्वके अन्तर्गत पाण्डवप्रवेशपर्वमें सहदेवप्रवेशविषयक दसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १० ॥
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एकादशोऽध्यायः अर्जुनका राजा विराटसे मिलना और राजाके द्वारा कन्याओंको नृत्य आदिकी शिक्षा देनेके लिये उनको नियुक्त करना वैशम्पायन उवाच अथापरोऽदृश्यत रूपसम्पदा स्त्रीणामलङ्कारधरो बृहत्पुमान् । प्राकारवप्रे प्रतिमुच्य कुण्डले दीर्घे च कम्बूपर हाटके शुभे ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं -जनमेजय! तदनन्तर नगरकी चहारदीवारीके पीछे जो मिट्टीका ऊँचा टीला था, उसके समीप रूप- सम्पदासे सुशोभित एक दूसरा पुरुष दिखायी दिया । उसका डील - डौल ऊँचा था । उसने स्त्रियोंके लिये उचित आभूषण पहन रखे थे तथा कानोंमें बड़े -बड़े कुण्डल और हाथोंमें शंखकी चूड़ियाँ पहनकर उनके ऊपर सोनेके सुन्दर कंगन धारण कर लिये थे ॥ १ ॥
बाहू च दीर्घान् प्रविकीर्य मूर्धजान् महाभुजो वारणतुल्यविक्रमः । गतेन भूमिं प्रतिकम्पयंस्तदा विराटमासाद्य सभासमीपतः ॥ २ ॥
अपने बड़े -बड़े केशोंकी लटोंको खोलकर हाथोंतक फैलाये वह महाबाहु पुरुष उस समय हाथीके समान मस्तानी चालसे चलता और पग- पगपर मानो पृथ्वीको कँपाता हुआ राजसभाके समीप राजा विराटके पास आकर खड़ा हुआ ॥ २ ॥
तं प्रेक्ष्य राजोपगतं सभातले व्याजात् प्रतिच्छन्नमरिप्रमाथिनम् । विराजमानं परमेण वर्चसा सुतं महेन्द्रस्य गजेन्द्रविक्रमम् ॥ ३ ॥
सर्वानपृच्छच्च सभानुचारिणः कुतोऽयमायाति पुरा न मे श्रुतः । न चैनमूचुर्विदितं तदा नराः सविस्मयं वाक्यमिदं नृपोऽब्रवीत् ॥ ४ ॥
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छद्मवेशसे अपने स्वरूपको छिपाकर सभाभवनमें आया हुआ वह शत्रुविजयी वीर पुरुष अपने उत्कृष्ट तेजसे प्रकाशित हो रहा था। गजराजके समान बल - विक्रमवाले उस महेन्द्रपुत्र अर्जुनको देखकर राजाने समस्त सभासदोंसे पूछा- ' यह कहाँसे आया है? आजसे पहले मैंने कभी इसके विषयमें नहीं सुना है । ' राजाके पूछनेपर उन मनुष्योंमेंसे किसीने उस पुरुषको अपना परिचित नहीं बताया । तब राजाने आश्चर्ययुक्त होकर यह बात कहीं— ॥ ३-४ ॥ सत्त्वोपपन्नः पुरुषोऽमरोपमः श्यामो युवा वारणयूथपोपमः । आमुच्य कम्बूपरि हाटके शुभे विमुच्य वेणीमपिनह्य कुण्डले ॥ ५ ॥
स्रग्वी सुकेशः परिधाय चान्यथा शुशोभ धन्वी कवची शरी यथा । आरुह्य यानं परिधावतां भवान् सुतैः समो मे भव वा मया समः ॥ ६ ॥
‘ तात! तुम शक्ति और धैर्यसे सम्पन्न देवोपम पुरुष हो । तुम्हारी अंगकान्ति श्याम है । तुम तरुण हो और हाथियोंके यूथके अधिपति महान् गजराजके समान शोभा पा रहे हो । तुमने हाथोंमें शंखकी चूड़ियाँ पहनकर उनके ऊपर सोनेके सुन्दर कंगन डाल लिये हैं, वेणी खोलकर केशोंकी लटें छितरा ली हैं तथा कानोंमें कुण्डल धारणकर गलेमें गजरा डाल रखा है । तुम्हारे केश बहुत ही सुन्दर हैं । तुम नारीजनोचित वेश- भूषा धारण करके भी उसके विपरीत धनुष - बाण और कवच धारण करनेवाले वीरके समान शोभा पा रहे हो । तुम रथ आदि वाहनोंपर बैठकर इच्छानुसार भ्रमण करो और मेरे पुत्रोंके अथवा मेरे ही समान होकर रहो ॥ ५-६ ॥ वृद्धो ह्यहं वै परिहारकामः सर्वान् मत्स्यांस्तरसा पालयस्व । नैवंविधाः क्लीबरूपा भवन्ति कथंचनेति प्रतिभाति मे मनः ॥ ७ ॥
‘ मैं बूढ़ा हो गया हूँ; अब राजकाज छोड़ना चाहता हूँ; अतः तुम सम्पूर्ण मत्स्यदेशका शीघ्र ही पालन करो । तुम्हारे-जैसे स्वरूपवाले किसी तरह नपुंसक नहीं हो सकते । मेरे मनको ऐसा ही प्रतीत होता है ' ॥ ७ ॥
(अर्जुन उवाच वेणीं प्रकुर्यां रुचिरे च कुण्डले तथा स्रजः प्रावरणानि संहरे ।
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स्नानं चरेयं विमृजे च दर्पणं विशेषकेष्वेव च कौशलं मम ॥ क्लीबेषु बालेषु जनेषु नर्तने शिक्षाप्रदानेषु च योग्यता मम । करोमि वेणीषु च पुष्पपूरणं न मे स्त्रियः कर्मणि कौशलाधिकाः ॥ अर्जुन बोले- मैं वेणी -रचना अच्छी कर सकता हूँ, मनोहर कुण्डल बनाना जानता हूँ, फूलोंके हार तथा ओढ़नेकी चादरें सुन्दर ढंगसे बनाता हूँ, स्नान करा सकता हूँ, दर्पणकी सफाई करता हूँ और चन्दन आदिसे अनेक प्रकारकी रेखाएँ बनाकर शृंगार करनेकी क्रियामें मुझे विशेष कुशलता प्राप्त है । नपुंसकों, बालकों एवं साधारण लोगोंमें नाचने तथा संगीत एवं नृत्यकी शिक्षा देनेमें मेरी अच्छी योग्यता है । स्त्रियोंकी वेणीमें फूल गूँथनेका कार्य भी मैं अच्छे ढंगसे सम्पन्न करता हूँ। इन सब कार्योंमें स्त्रियाँ भी मुझसे अधिक कुशल नहीं हैं । तमब्रवीत् प्रांशुमुदीक्ष्य विस्मितो विराटराजोपसृतं महायशाः ॥ निकट आनेपर उसका कद बहुत ऊँचा देखकर महायशस्वी राजा विराट अत्यन्त विस्मित होकर बोले ।
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विराट उवाच नार्हस्तु वेषोऽयमनूर्जितस्ते
नापुंस्त्वमर्हो नरदेवसिंह ।
तवैष वेशोऽशुभवेषभूषणै- र्विभूषितो भूतपतेरिव प्रभो ॥
विभाति भानोरिव रश्मिमालिनो घनावरुद्धे गगने घनैरिव । धनुर्हि मन्ये तव शोभयेद् भुजौ तथा हि पीनावतिमात्रमायतौ ॥ ) विराटने कहा — नरदेवसिंह! ओज और बलसे रहित नपुंसकका -सा यह वेष तुम्हारे योग्य नहीं है । तुम क्लीब होनेके योग्य नहीं हो । प्रभो! तुम्हारा यह वेष भगवान् भूतनाथकी भाँति अशुभ वेष - भूषासे विभूषित है । जैसे बादलोंकी घटासे आच्छादित आकाशमें भी अंशुमाली सूर्यका मण्डल सुशोभित होता है, उसी प्रकार इस क्लीबवेषमें भी तुम पौरुषसे प्रकाशित हो रहे हो । मेरा ऐसा विश्वास है कि तुम्हारी इन मोटी और अत्यन्त विशाल भुजाओंको धनुष ही सुशोभित कर सकता है । अर्जुन उवाच गायामि नृत्याम्यथ वादयामि भद्रोऽस्मि नृत्ये कुशलोऽस्मि गीते । त्वमुत्तरायै प्रदिशस्व मां स्वयं भवामि देव्या नरदेव नर्तकः ॥ ८ ॥
अर्जुनने कहा— नरदेव! मैं गाता, नाचता और बाजे बजाता हूँ । नृत्यकलामें निपुण और संगीत - कलामें भी कुशल हूँ । आप उत्तराको शिक्षा देनेके लिये मुझे रख लें । मैं स्वयं राजकुमारी उत्तराको नृत्य सिखलाऊँगा ॥ ८ ॥
इदं तु रूपं मम येन किं तव प्रकीर्तयित्वा भृशशोकवर्धनम् । बृहन्नलां मां नरदेव विद्धि सुतं सुतां वा पितृमातृवर्जिताम् ॥ ९ ॥
मेरा ऐसा रूप जिस कारणसे हुआ है, उसे आपके सामने कहने से क्या लाभ है? वह अधिक शोक बढ़ानेवाली बात है । राजन्! आप मुझे बृहन्नला समझें और पिता- मातासे रहित पुत्र या पुत्री मान लें ॥ ९ ॥
विराट उवाच ददामि ते हन्त वरं बृहन्नले
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सुतां च मे नर्तय याश्च तादृशीः । इदं तु ते कर्म समं न मे मतं समुद्रनेमिं पृथिवीं त्वमर्हसि ॥ १० ॥
विराट बोले — बृहन्नले! मैं तुम्हें अभीष्ट वर देता हूँ। तुम मेरी पुत्रीको तथा उसके समान अवस्थावाली अन्य राजकुमारियोंको नृत्यकला सिखलाओ । परंतु मुझे यह कर्म तुम्हारे योग्य नहीं जान पड़ता । तुम तो समुद्रसे घिरी हुई सम्पूर्ण पृथ्वीके शासक होने योग्य हो ॥ १० ॥
वैशम्पायन उवाच बृहन्नलां तामभिवीक्ष्य मत्स्यराट् कलासु नृत्येषु तथैव वादिते । सम्मन्त्र्य राजा विविधैः स्वमन्त्रिभिः परीक्ष्य चैनं प्रमदाभिराशु वै ॥ ११ ॥
अपुंस्त्वमप्यस्य निशम्य च स्थिरं ततः कुमारीपुरमुत्ससर्ज तम् । वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! तदनन्तर मत्स्यनरेशने बृहन्नलाकी गीत, नृत्य और बाजे बजानेकी कलाओंमें परीक्षा करके अपने अनेक मन्त्रियोंसे यह सलाह ली कि इसे अन्तःपुरमें रखना चाहिये या नहीं । फिर तरुणी स्त्रियोंद्वारा शीघ्र ही उनके नपुंसकत्वकी जाँच करायी । जब सब तरहसे उनका नपुंसक होना ठीक प्रमाणित हो गया, तब यह सुन-समझकर उन्होंने बृहन्नलाको कन्याके अन्तःपुरमें जानेकी आज्ञा दी ॥ ११३ ॥
स शिक्षयामास च गीतवादितं सुतां विराटस्य धनंजयः प्रभुः ॥ १२ ॥
सखीश्च तस्याः परिचारिकास्तथा प्रियश्च तासां स बभूव पाण्डवः ॥ १३ ॥
तथा स सत्रेण धनंजयो वसन् प्रियाणि कुर्वन् सह ताभिरात्मवान् । तथा च तं तत्र न जज्ञिरे जना बहिश्चरा वाप्यथ चान्तरेचराः ॥ १४ ॥
शक्तिशाली अर्जुन विराटकन्या उत्तरा, उसकी सखियों तथा सेविकाओंको भी गीत, वाद्य एवं नृत्यकलाकी शिक्षा देने लगे । इससे वे उन सबके प्रिय हो गये । छद्मवेशमें कन्याओंके साथ रहते हुए भी अर्जुन अपने मनको सदा पूर्णरूपसे वशमें रखते और उन सबको प्रिय लगनेवाले कार्य करते थे । इस रूपमें वहाँ रहते हुए अर्जुनको बाहर अथवा अन्तःपुरके कोई भी मनुष्य पहचान न सके ॥ १२–१४ ॥
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इति श्रीमहाभारते विराटपर्वणि पाण्डवप्रवेशपर्वणि अर्जुनप्रवेशो नाम एकादशोऽध्यायः ॥ ११ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत विराटपर्वके अन्तर्गत पाण्डवप्रवेशपर्वमें अर्जुनप्रवेशनामक ग्यारहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ११ ॥
( दाक्षिणात्य अधिक पाठके ४३ श्लोक मिलाकर कुल १८३ श्लोक हैं। )