श्रीगणेशाय नमः।

महाभारत — खण्ड २ — पृष्ठ 2191–2200

महाभारत — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 2191–2200

पृष्ठ 2191

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द्वादशोऽध्यायः नकुलका विराटके अश्वोंकी देखरेखमें नियुक्त होना वैशम्पायन उवाच अथापरोऽदृश्यत पाण्डवः प्रभु- र्विराटराजं तरसा समेयिवान् । तमापतन्तं ददृशे पृथग्जनो विमुक्तमभ्रादिव सूर्यमण्डलम् ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं - राजन्! तदनन्तर अन्य पाण्डुपुत्र शक्तिशाली नकुल बड़े वेगसे चलते हुए राजा विराटके यहाँ आये । उन्हें आते समय साधारण लोगोंने देखा; उस समय वे मेघमालाकी ओटसे निकले हुए सूर्यमण्डलके समान तेजस्वी जान पड़ते थे ॥ १ ॥

सवै हयानैक्षत तांस्ततस्ततः समीक्षमाणं स ददर्श मत्स्यराट् । ततोऽब्रवीत् ताननुगान् नरेश्वरः कुतोऽयमायाति नरोऽमरोपमः ॥ २ ॥

स्वयं हयानीक्षति मामकान् दृढं ध्रुवं हयज्ञो भविता विचक्षणः । प्रवेश्यतामेष समीपमाशु मे विभाति वीरो हि यथामरस्तथा ॥ ३ ॥

आते ही उन्होंने इधर- उधर घूमकर घोड़ोंको देखना प्रारम्भ किया । इस प्रकार उन अश्वोंका निरीक्षण करते समय उन्हें मत्स्यराज विराटने देखा । तब वे नरेश वहाँ बैठे हुए अनुचरोंसे बोले — ‘ पता तो लगाओ, यह देवोपम पुरुष कहाँसे आ रहा है? यह बिना कहे-सुने स्वयं मेरे घोड़ोंको बहुत ध्यानसे देख रहा है; अतः यह अवश्य घोड़ोंको पहचाननेवाला और अश्वविद्याका विद्वान् होगा। इसलिये इसे शीघ्र मेरे समीप ले आओ । यह वीर देवताओंकी भाँति सुशोभित हो रहा है ' ॥ २-३ ॥

पृष्ठ 2192

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अभ्येत्य राजानममित्रहाब्रवी- ज्जयोऽस्तु ते पार्थिव भद्रमस्तु वः । हयेषु युक्तो नृप सम्मतः सदा तवाश्वसूतो निपुणो भवाम्यहम् ॥ ४ ॥

तत्पश्चात् राजसेवकोंके साथ राजाके समीप आकर शत्रुहन्ता नकुलने कहा — ' राजन्! आपकी जय हो । आपका कल्याण हो । मैं घोड़ोंको शिक्षा देनेमें निपुण हूँ और अनेक राजाओंसे सम्मानित हूँ। मैं सदा आपके घोड़ोंका चतुर सारथि हो सकता हूँ' ॥ ४ ॥

विराट उवाच ददामि यानानि धनं निवेशनं ममाश्वसूतो भवितुं त्वमर्हसि । कुतोऽसि कस्यासि कथं त्वमागतः प्रब्रूहि शिल्पं तव विद्यते च यत् ॥ ५ ॥

विराटने कहा – भद्र पुरुष! मैं तुम्हें सवारी, धन और रहनेके लिये घर देता हूँ । तुम मेरे घोड़ोंको शिक्षा देनेवाले सारथि हो सकते हो, किंतु मैं पहले यह जानना चाहता हूँ कि तुम

पृष्ठ 2193

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कहाँसे आये हो? किसके पुत्र हो और किसलिये तुम्हारा यहाँ आगमन हुआ है? तुममें जो कला--कौशल हो, उसे भी बताओ ॥ ५ ॥

नकुलउवाच

पञ्चानां पाण्डुपुत्राणां ज्येष्ठो भ्राता युधिष्ठिरः ।

तेनाहमश्वेषु पुरा नियुक्तः शत्रुकर्शन ॥ ६ ॥

अश्वानां प्रकृतिं वेद्मि विनयं चापि सर्वशः ।

दुष्टानां प्रतिपत्तिं च कृत्स्नं चैव चिकित्सितम् ॥ ७ ॥

नकुल बोले- शत्रुदमन! सुनिये, पाँचों पाण्डवोंमें जो बड़े भ्राता युधिष्ठिर हैं, उन्होंने पहले मुझे घोड़ोंकी देखभालके कामपर लगा रखा था । मैं घोड़ोंकी जाति पहचानता हूँ एवं उन्हें सब प्रकारकी शिक्षा देनेकी कला भी जानता हूँ। दुष्ट घोड़ोंकी दुष्टता- निवारणका ढंग भी मुझे मालूम है तथा घोड़ोंकी चिकित्सा भी मैं पूर्णरूपसे जानता हूँ ॥ ६-७ ॥ न कातरं स्यान्मम जातु वाहनं न मेऽस्ति दुष्टा वडवा कुतो हयाः । जनस्तु मामाह स चापि पाण्डवो युधिष्ठिरो ग्रन्थिकमेव नामतः ॥ ८ ॥

मेरा सिखाया हुआ घोड़ा कभी कायर नहीं हो सकता । मेरी सिखायी हुई घोड़ीमें भी कोई ऐब नहीं आता, फिर घोड़े तो बिगड़ ही कैसे सकते हैं? मुझे साधारण लोग तथा पाण्डुनन्दन महाराज युधिष्ठिर भी ' ग्रन्थिक ' नामसे ही पुकारा करते थे ॥ ८ ॥

( मातलिरिव देवपतेर्दशरथनृपतेः सुमन्त्र इव यन्ता ।

सुमह इव जामदग्नेस्तथैव तव शिक्षयाम्यश्वान् ॥

युधिष्ठिरस्य राजेन्द्र नरराजस्य शासनात् । शतसाहस्रकोटीनामश्वानामस्मि रक्षिता ॥ ) जैसे देवराज इन्द्रके सारथि मातलि हैं, जैसे राजा दशरथके रथचालक सुमन्त्र हैं और जैसे जमदग्निनन्दन परशुरामके सूत सुमह हैं, उसी प्रकार मैं आपका सारथि होकर आपके घोड़ोंको शिक्षा दूँगा। राजेन्द्र! मैं महाराज युधिष्ठिरके आदेशसे उनके यहाँ लक्षकोटि अश्वोंका संरक्षक रहा हूँ। विराट उवाच यदस्ति किंचिन्मम वाजिवाहनं तदस्तु सर्वं त्वदधीनमद्य वै । ये चापि केचिन्मम वाजियोजका- स्त्वदाश्रयाः सारथयश्च सन्तु मे ॥ ९ ॥

पृष्ठ 2194

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विराटने कहा — ग्रन्थिक! मेरे पास जो भी घोड़े और अन्य वाहन हैं, वे सब आजसे ही तुम्हारे अधीन हो जायँ । इसके सिवा जो कोई भी मेरे घोड़ोंको जोतनेवाले सारथि हैं, वे सब तुम्हारे अधिकारमें इदं रहें ॥ ९ ॥

इदं तवेष्टं यदि वै सुरोपम ब्रवीहि यत् ते प्रसमीक्षितं वसु । ततेऽनुरूपं हयकर्म विद्यते प्रभासि राजेव हि सम्मतो मम ॥ १० ॥

युधिष्ठिरस्येव हि दर्शनेन मे समं तवेदं प्रियमत्र दर्शनम् । कथं तु भृत्यैः स विनाकृतो वने वसत्यनिन्द्यो रमते च पाण्डवः ॥ ११ ॥

देवोपम पुरुष! यदि यही कार्य तुम्हें प्रिय है, तो बताओ, इसके लिये वेतनरूपसे कितना धन लेनेका तुमने विचार किया है? यह घोड़ोंकी शिक्षाका कार्य तुम्हारे अनुरूप नहीं है । तुम तो राजाकी भाँति शोभा पा रहे हो और मुझे भी अत्यन्त प्रिय लगते हो । आज मुझे तुम्हारा जो यहाँ दर्शन हुआ है, यह राजा युधिष्ठिरके ही दर्शनके समान मुझे अत्यन्त प्रिय है । अहो! सर्वथा प्रशंसाके योग्य पाण्डुनन्दन महाराज युधिष्ठिर सेवकोंके बिना वनमें कैसे रहते होंगे और कैसे उनका मन वहाँ लगता होगा? ॥ १०-११ ॥ वैशम्पायन उवाच तथा स गन्धर्ववरोपमो युवा विराटराज्ञा मुदितेन पूजितः । न चैनमन्येऽपि विदुः कथंचन प्रियाभिरामं विचरन्तमन्तरा ॥ १२ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं - राजन्! इस प्रकार प्रसन्न हुए राजा विराटके द्वारा सम्मानित हो श्रेष्ठ गन्धर्वके सदृश शोभा पानेवाले युवावस्थासम्पन्न नकुल वहाँ रहने लगे । उनका स्वरूप बड़ा ही प्रिय और नयनाभिराम था । वे नगरके भीतर विचरते रहते थे, तो भी उन्हें राजा तथा अन्य मनुष्य किसी प्रकार पहचान न सके ॥ १२ ॥

एवं हि मत्स्ये न्यवसन्त पाण्डवा यथाप्रतिज्ञाभिरमोघदर्शनाः । अज्ञातचर्यां व्यचरन् समाहिताः समुद्रनेमीपतयोऽतिदुःखिताः ॥ १३ ॥

जिनका दर्शन अमोघ है, वे पाण्डवगण इस प्रकार अपनी प्रतिज्ञाके अनुसार मत्स्यदेशमें रहने और एकाग्रतापूर्वक अज्ञातवासका समय व्यतीत करने लगे । वे सागरसे

पृष्ठ 2195

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घिरी हुई सम्पूर्ण पृथ्वीके अधिपति होकर भी अत्यन्त कष्ट उठा रहे थे ॥ १३ ॥

इति श्रीमहाभारते विराटपर्वणि पाण्डवप्रवेशपर्वणि नकुलप्रवेशे द्वादशोऽध्यायः ॥ १२ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत विराटपर्वके अन्तर्गत पाण्डवप्रवेशपर्वमें नकुलप्रवेशसम्बन्धी बारहवाँअध्याय पूरा हुआ ॥ १२ ॥

(दाक्षिणात्य अधिक पाठके २ श्लोक मिलाकर कुल १५ श्लोक हैं । )

पृष्ठ 2196

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( समयपालनपर्व ) त्रयोदशोऽध्यायः भीमसेनके द्वारा जीमूत नामक विश्वविख्यात मल्लका वध जनमेजय उवाच

एवं ते मत्स्यनगरे प्रच्छन्नाः कुरुनन्दनाः ।

अत ऊर्ध्वं महावीर्याः किमकुर्वत वै द्विज ॥ १ ॥

जनमेजयने पूछा — ब्रह्मन्! इस प्रकार मत्स्यदेशकी राजधानीमें गुप्तरूपसे निवास करनेवाले महापराक्रमी पाण्डुपुत्रोंने इसके बाद क्या किया? ॥ १ ॥

वैशम्पायन उवाच

एवं मत्स्यस्य नगरे प्रच्छन्नाः कुरुनन्दनाः ।

आराधयन्तो राजानं यदकुर्वत तच्छृणु ॥ २ ॥

वैशम्पायनजीने कहा- राजन्! इस प्रकार मत्स्यदेशकी राजधानीमें गुप्तरूपसे निवास करनेवाले पाण्डवोंने राजा विराटकी सेवा करते हुए जो - जो कार्य किया, वह सुनो ॥ २ ॥

तृणबिन्दुप्रसादाच्च धर्मस्य च महात्मनः ।

अज्ञातवासमेवं तु विराटनगरेऽवसन् ॥ ३ ॥

युधिष्ठिरः सभास्तारो मत्स्यानामभवत् प्रियः ।

तथैव च विराटस्य सपुत्रस्य विशाम्पते ॥ ४ ॥

स ह्यक्षहृदयज्ञस्तान् क्रीडयामास पाण्डवः ।

अक्षवत्यां यथाकामं सूत्रबद्धानिव द्विजान् ॥ ५ ॥

राजर्षि तृणबिन्दु और महात्मा धर्मके प्रसादसे पाण्डवलोग इस प्रकार विराटके नगरमें अज्ञातवासके दिन पूरे करने लगे । महाराज युधिष्ठिर राजसभाके प्रमुख सदस्य और मत्स्यदेशकी प्रजाके अत्यन्त प्रिय थे । राजन्! इसी प्रकार पुत्रसहित राजा विराटका भी उनपर विशेष प्रेम था । वे पासोंका मर्म जानते थे । जैसे कोई सूतमें बाँधे हुए पक्षियोंको इच्छानुसार उड़ावे, उसी प्रकार वे

पृष्ठ 2197

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द्यूतशालामें पासोंको अपने इच्छानुसार फेंकते हुए राजा आदिको जूआ खेलाया करते थे ॥ ३–५ ॥

अज्ञातं च विराटस्य विजित्य वसु धर्मराट् ।

भ्रातृभ्यः पुरुषव्याघ्रो यथार्हं सम्प्रयच्छति ॥ ६ ॥

' पुरुषसिंह धर्मराज युधिष्ठिर जूएमें धन जीतकर अपने भाइयोंको यथायोग्य बाँट देते थे । ' इसका राजा विराटको भी पता नहीं लगता था ॥ ६ ॥

भीमसेनोऽपि मांसानि भक्ष्याणि विविधानि च ।

अतिसृष्टानि मत्स्येन विक्रीणीते युधिष्ठिरे ॥ ७ ॥

भीमसेन भी नाना प्रकारके भक्ष्य- भोज्य पदार्थ, जो मत्स्यनरेशद्वारा उन्हें पुरस्काररूपमें प्राप्त होते, बेच देते और उससे मिला हुआ धन युधिष्ठिरकी सेवामें अर्पित करते थे ॥ ७ ॥

वासांसि परिजीर्णानि लब्धान्यन्तःपुरेऽर्जुनः ।

विक्रीणानश्च सर्वेभ्यः पाण्डवेभ्यः प्रयच्छति ॥ ८ ॥

अर्जुनको अन्तःपुरमें जो पुराने उतारे हुए बहुमूल्य वस्त्र प्राप्त होते, उन्हें वे बेचते और बेचनेसे मिला हुआ मूल्य सब पाण्डवोंको देते थे ॥ ८ ॥

सहदेवोऽपि गोपानां वेषमास्थाय पाण्डवः ।

दधि क्षीरं घृतं चैव पाण्डवेभ्यः प्रयच्छति ॥ ९ ॥

पाण्डुनन्दन सहदेव भी ग्वालोंका वेश धारणकर पाण्डवोंको दही, दूध और घी दिया करते थे ॥ ९ ॥

नकुलोऽपि धनं लब्ध्वा कृते कर्मणि वाजिनाम् ।

तुष्टे तस्मिन् नरपतौ पाण्डवेभ्यः प्रयच्छति ॥ १० ॥

नकुल भी घोड़ोंके शिक्षणका कार्य करके महाराज विराटके संतुष्ट होनेपर उनसे पुरस्कारस्वरूप जो धन पाते, उसे सब पाण्डवोंको बाँट दिया करते थे ॥ १० ॥

कृष्णा तु सर्वान् भर्तृस्तान् निरीक्षन्ती तपस्विनी ।

यथा पुनरविज्ञाता तथा चरति भामिनी ॥ ११ ॥

तपस्विनी एवं सुन्दरी द्रौपदी भी उन सब पतियोंकी देखभाल करती हुई ऐसा बर्ताव करती, जिससे फिर कोई उसे पहचान न सके ॥ ११ ॥

एवं सम्पादयन्तस्ते तदान्योन्यं महारथाः ।

विराटनगरे चेरुः पुनर्गर्भधृता इव ॥ १२ ॥

इस प्रकार एक - दूसरेका सहयोग करते हुए वे महारथी पाण्डव विराटनगरमें बहुत छिपकर रहते थे; मानो पुनः माताके गर्भमें निवास कर रहे हों ॥ १२ ॥

साशङ्का धार्तराष्ट्रस्य भयात् पाण्डुसुतास्तदा ।

पृष्ठ 2198

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प्रेक्षमाणास्तदा कृष्णामूषुश्छन्ना नराधिप ॥ १३ ॥

राजन्! दुर्योधनद्वारा पहचान लिये जानेके भयसे पाण्डव सदा सशंक रहते थे; अतः वे उस समय द्रौपदीकी देखभाल करते हुए भी छिपकर ही वहाँ निवास करते थे ॥

अथ मासे चतुर्थे तु ब्रह्मणः सुमहोत्सवः ।

आसीत् समृद्धो मत्स्येषु पुरुषाणां सुसम्मतः ॥ १४ ॥

तत्र मल्लाः समापेतुर्दिग्भ्यो राजन् सहस्रशः ।

समाजे ब्रह्मणो राजन् यथा पशुपतेरिव ॥ १५ ॥

तदनन्तर चौथा महीना प्रारम्भ होनेपर मत्स्यदेशमें ब्रह्माजीकी पूजाका महान् उत्सव मनाया जाने लगा । इसमें बड़ा समारोह होता था । मत्स्यदेशके लोगोंको यह बहुत प्रिय था । जनमेजय! उस समय विराटनगरमें चारों दिशाओंसे हजारों कुश्ती लड़नेवाले मल्ल जुटने लगे । इसी अवसरपर ब्रह्माजी और भगवान् शंकरकी सभाके समान उस राजधानीमें लोगोंका जमाव होता था ॥ १४-१५ ॥

महाकाया महावीर्याः कालखञ्जा इवासुराः ।

वीर्योन्मत्ता बलोदग्रा राज्ञा समभिपूजिताः ॥ १६ ॥

वहाँ आये हुए विशालकाय और महान् बलशाली मल्ल कालखंज नामक असुरोंके समान जान पड़ते थे । वे सब अपनी शक्ति और पराक्रमके मदसे उन्मत्त थे एवं बलमें बहुत बड़े - चढ़े थे । राजा विराटने उन सबका खूब स्वागत-सत्कार किया ॥ १६ ॥

सिंहस्कन्धकटिग्रीवाः स्ववदाता मनस्विनः ।

असकृल्लब्धलक्षास्ते रङ्गे पार्थिवसंनिधौ ॥ १७ ॥

उनके कंधे, कमर और कण्ठ सिंहके समान थे । वे निर्मल यशसे सुशोभित और मनस्वी थे । उन्होंने अनेक बार राजाके समीप रंगभूमि ( अखाड़े ) में विजय पायी थी ॥ १७ ॥

तेषामेको महानासीत् सर्वमल्लानथाह्वयत् ।

आवल्गमानं तं रङ्गे नोपतिष्ठति कश्चन ॥ १८ ॥

उन सबमें एक बहुत बड़ा पहलवान था, जो दूसरे सब पहलवानोंको अपने साथ लड़नेके लिये ललकारता था । जब वह अखाड़ेमें उतरकर उलछने लगा, उस समय कोई भी उसके समीप खड़ा न हो सका ॥ १८ ॥

यदा सर्वे विमनसस्ते मल्ला हतचेतसः ।

अथ सूदेन तं मल्लं योधयामास मत्स्यराट् ॥ १ ९ ॥

पृष्ठ 2199

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जब वे सभी मल्ल उदासीन हो हिम्मत हार बैठे, तब मत्स्यनरेशने अपने रसोइयेसे उस पहलवानको लड़ानेका निश्चय किया ॥ १ ९ ॥

नोद्यमानस्तदा भीमो दुःखेनैवाकरोन्मतिम् ।

न हि शक्नोति विवृते प्रत्याख्यातुं नराधिपम् ॥ २० ॥

उस समय राजासे प्रेरित होनेपर भीमसेनने [ पहचाने जानेके भयसे] दुःखी होकर ही उससे लड़नेका विचार किया । वे राजाकी बातको प्रकटरूपमें टाल नहीं सकते थे ॥ २० ॥

ततः स पुरुषव्याघ्रः शार्दूलशिथिलश्चरन् ।

प्रविवेश महारङ्गं विराटमभिपूजयन् ॥ २१ ॥

तदनन्तर पुरुषसिंह भीमने सिंहके समान धीमी चालसे चलते हुए राजा विराटका मान रखनेके लिये उस विशाल रंगभूमिमें प्रवेश किया ॥ २१ ॥

बबन्ध कक्षां कौन्तेयस्ततः संहर्षयन् जनम् ।

ततस्तु वृत्रसंकाशं भीमो मल्लं समाह्वयत् ॥ २२ ॥

मूतं नाम तं तत्र मल्लं प्रख्यातविक्रमम् । फिर लोगोंमें हर्षका संचार करते हुए उन्होंने लँगोट बाँधा और उस प्रसिद्ध पराक्रमी जीमूत नामक मल्लको, जो वृत्रासुरके समान दिखायी देता था, युद्ध लिये ललकारा ॥ २२ ॥

तावुभौ सुमहोत्साहावुभौ भीमपराक्रमौ ॥ २३ ॥

मत्ताविव महाकायौ वारणौ षष्टिहायनौ । वे दोनों बड़े उत्साहमें भरे थे । दोनों ही प्रचण्ड पराक्रमी थे, ऐसा लगता था मानो साठ वर्षके दो मतवाले एवं विशालकाय गजराज एक- दूसरे से भिड़नेको उद्यत हों ॥ २३ ॥

ततस्तौ नरशार्दूलौ बाहुयुद्धं समीयतुः ॥ २४ ॥

वीरौ परमसंहृष्टावन्योन्यजयकाङ्क्षिणौ ।

आसीत् सुभीमः सम्पातो वज्रपर्वतयोरिव ॥ २५ ॥

अत्यन्त हर्षमें भरकर एक- दूसरेको जीत लेनेकी इच्छावाले वे दोनों नरश्रेष्ठ वीर बाहुयुद्ध करने लगे । उस समय उन दोनोंमें बड़ी भयंकर भिड़न्त हुई । उनके परस्परके आघातसे इस प्रकार चटचट शब्द होने लगा, मानो वज्र और पर्वत एक- दूसरेसे टकरा गये हों ॥

उभौ परमसंहृष्टी बलेनातिबलावुभौ ।

अन्योन्यस्यान्तरं प्रेप्सू परस्परजयैषिणौ ॥ २६ ॥

दोनों अत्यन्त प्रसन्न थे । बलकी दृष्टिसे दोनों ही अत्यन्त बलशाली थे और एक- दूसरेपर चोट करनेका अवसर देखते हुए विजयके अभिलाषी हो रहे

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थे ॥ २६ ॥

उभौ परमसंहृष्टौ मत्ताविव महागजौ ।

कृतप्रतिकृतैश्चित्रैर्बाहुभिश्च सुसङ्कटैः ।

संनिपातावधूतैश्च प्रमाथोन्मथनैस्तथा ॥ २७ ॥

दोनोंमें भरपूर हर्ष और उत्साह भरा था । दोनों ही मतवाले गजराजोंकी भाँति एक- दूसरेसे भिड़े हुए थे । जब एक- दूसरेका कोई अंग जोरसे दबाता, तब दूसरा फौरन उसका प्रतीकार करता— उस अंगको उसकी पकड़से छुड़ा लेता था । दोनों एक- दूसरेके हाथोंको मुट्ठीसे पकड़कर विवश कर देते और विचित्र ढंगसे परस्पर प्रहार करते थे । दोनों आपसमें गुँथ जाते और फिर धक्के देकर एक दूसरेको दूर हटा देते । कभी एक- दूसरेको पटककर जमीनपर रगड़ता, तो दूसरा नीचेसे ही कुलाँचकर ऊपरवालेको दूर फेंक देता या उसे लिये दिये खड़ा हो अपने शरीरसे दबाकर उसके अंगोंको भी मथ डालता था ॥ २७ ॥

क्षेपणैर्मुष्टिभिश्चैव २ वराहोद्धूतनिःस्वनैः ।

तलैर्वज्रनिपातैश्च प्रसृष्टाभिस्तथैव च ॥ २८ ॥

कभी दोनों दोनोंको बलपूर्वक पीछे हटाते और मुक्कोंसे एक- दूसरेकी छातीपर चोट करते थे । कभी एकको दूसरा अपने कंधेपर उठा लेता और उसका मुँह नीचे करके घुमाकर पटक देता था, जिससे ऐसा शब्द होता; मानो किसी शूकरने चोट की हो । कभी परस्पर तर्जनी और अँगूठेके मध्यभागको फैलाकर चाँटोंकी मार होती और कभी हाथकी अंगुलियोंको फैलाकर वे एक-दूसरेको थप्पड़ मारते थे ॥ २८ ॥

शलाकानखपातैश्च पादोद्धूतैश्च दारुणैः ।

जानुभिश्चाश्मनिर्घोषैः शिरोभिश्चावघट्टनैः ॥ २ ९ ॥

कभी वे रोषपूर्वक अंगुलियोंके नखोंसे एक- दूसरेको बकोटते । कभी पैरोंसे उलझाकर दोनों दोनोंको गिरा देते । कभी घुटने और सिरसे टक्कर मारते; जिससे पत्थर टकरानेके समान भयंकर शब्द होता था ॥ २ ९ ॥

तद् युद्धमभवद् घोरमशस्त्रं बाहुतेजसा ।

बलप्राणेन शूराणां समाजोत्सवसंनिधौ ॥ ३० ॥

अरज्यत जनः सर्वः सोत्क्रुष्टनिनदोत्थितः ।

बलिनोः संयुगे राजन् वृत्रवासवयोरिव ॥ ३१ ॥

प्रकर्षणाकर्षणयोरभ्याकर्षविकर्षणैः ।

आकर्षतुरथान्योन्यं जानुभिश्चापि जघ्नतुः ॥ ३२ ॥