श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड २ — पृष्ठ 2351–2360
महाभारत — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 2351–2360
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स चचार गदापाणिर्वृद्धोऽपि तरुणो यथा ॥ ४२ ॥
इसी बीचमें बलवान् राजा विराट सुशर्माके रथसे कूद पड़े और उसकी गदा लेकर उसीकी ओर दौड़े । उस समय हाथमें गदा लिये राजा विराट बूढ़े होनेपर भी तरुणके समान रणभूमिमें विचर रहे थे ॥ ४१-४२ ॥
पलायमानं त्रैगर्तं दृष्ट्वा भीमोऽभ्याभाषत ।
राजपुत्र निवर्तस्व न ते युक्तं पलायनम् ॥ ४३ ॥
इसी बीचमें मौका पाकर त्रिगर्तराज भागने लगा । उसे पलायन करते देख भीमसेन बोले — ‘ राजकुमार! लौट आओ । तुम्हारा युद्धसे पीठ दिखाकर भागना उचित नहीं है ॥ ४३ ॥
अनेन वीर्येण कथं गास्त्वं प्रार्थयसे बलात् ।
कथं चानुचरांस्त्यक्त्वा शत्रुमध्ये विषीदसि ॥ ४४ ॥
‘ इसी पराक्रमके भरोसे तुम विराटकी गौओंको बलपूर्वक कैसे ले जाना चाहते थे? अपने सेवकोंको शत्रुओंके बीचमें छोड़कर क्यों भागते और विषाद करते हो? ' ॥ ४४ ॥
इत्युक्तः स तु पार्थेन सुशर्मा रथयूथपः ।
तिष्ठ तिष्ठेति भीमं स सहसाऽभ्यद्रवद् बली ॥ ४५ ॥
भीमस्तु भीमसंकाशो रथात् प्रस्कन्द्य पाण्डवः ।
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प्राद्रवत् तूर्णमव्यग्रो जीवितेप्सुः सुशर्मणः ॥ ४६ ॥
भीमसेनके ऐसा कहनेपर रथियोंके यूथका अधिपति बलवान् सुशर्मा ' खड़ा रह, खड़ा रह ', ऐसा कहते हुए सहसा भीमसेनपर टूट पड़ा । परंतु पाण्डुनन्दन भीम तो भीम- जैसे ही थे; वे तनिक भी व्यग्र नहीं हुए; अपितु रथसे कूदकर सुशर्माके प्राण लेनेके लिये बड़े वेगसे उसकी ओर दौड़े ॥ ४५-४६ ॥
तं भीमसेनो धावन्तमभ्यधावत वीर्यवान् ।
त्रिगर्तराजमादातुं सिंहः क्षुद्रमृगं यथा ॥ ४७ ॥
तब सुशर्मा फिर भाग चला और पराक्रमी भीमसेन त्रिगर्तराजको पकड़नेके लिये उसी प्रकार उसका पीछा करने लगे, जैसे सिंह छोटे मृगोंको पकड़नेके लिये जाता है ॥ ४७ ॥
अभिद्रुत्य सुशर्माणं केशपक्षे परामृशत् ।
समुद्यम्य तु रोषात् तं निष्पिपेष महीतले ॥ ४८ ॥
सुशर्माके पास पहुँचकर भीमने उसके केश पकड़ लिये और क्रोधपूर्वक उसे उठाकर
पृथ्वीपर दे मारा । तत्पश्चात् उसे वहीं रगड़ने लगे ॥ ४८ ॥
पदा मूर्ध्नि महाबाहुः प्राहरद् विलपिष्यतः ।
तस्य जानुं ददौ भीमो जघ्ने चैनमरत्निना ।
स मोहमगमद् राजा प्रहारवरपीडितः ॥ ४ ९ ॥
इससे सुशर्मा विलाप करने लगा । उस समय भीमने उसके मस्तकपर लात मारी और उसके पेटको घुटनोंसे दबाकर ऐसा घूँसा मारा कि उसके भारी आघातसे पीड़ित होकर राजा सुशर्मा मूर्च्छित हो गया ॥ ४ ९ ॥
तस्मिन् गृहीते विरथे त्रिगर्तानां महारथे ।
अभज्यत बलं सर्वं त्रैगर्तं तद् भयातुरम् ॥ ५० ॥
त्रिगर्तोंका महारथी वीर सुशर्मा जब रथहीन होकर कैद कर लिया गया, तब वह सारी त्रिगर्तसेना भयसे व्याकुल हो तितर-बितर हो गयी ॥ ५० ॥
निवर्त्य गास्ततः सर्वाः पाण्डुपुत्रा महारथाः ।
अवजित्य सुशर्माणं धनं चादाय सर्वशः ॥ ५१ ॥
तदनन्तर पाण्डुके महारथी पुत्र सुशर्माको परास्त करनेके पश्चात् सब गौओंको लौटाकर और लूटका सारा धन वापस लेकर चले ॥ ५१ ॥
स्वबाहुबलसम्पन्ना ह्रीनिषेवा यतव्रताः ।
विराटस्य महात्मानः परिक्लेशविनाशनाः ॥ ५२ ॥
वे सभी अपने बाहुबलसे सम्पन्न, लज्जाशील, संयमपूर्वक व्रतपालनमें तत्पर, महात्मा तथा विराटका सारा क्लेश दूर करनेवाले थे ॥ ५२ ॥
स्थिताः समक्षं ते सर्वे त्वथ भीमोऽभ्यभाषत ॥ ५३ ॥
नायं पापसमाचारो मत्तो जीवितुमर्हति ।
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किं तु शक्यं मया कर्तुं यद् राजा सततं घृणी ॥ ५४ ॥
जब वे सब राजाके सामने आकर खड़े हुए, तब भीमसेन बोले- ' यह पापाचारी सुशर्मा मेरे हाथसे छूटकर जीवित रहनेयोग्य तो नहीं है; परंतु मैं कर ही क्या सकता हूँ? हमारे महाराज सदाके दयालु हैं ' ॥ ५३-५४ ॥
गले गृहीत्वा राजानमानीय विवशं वशम् ।
तत एनं विचेष्टन्तं बद्ध्वा पार्थो वृकोदरः ॥ ५५ ॥
रथमारोपयामास विसंज्ञं पांसुगुण्ठितम् । इसके बाद भीम राजा सुशर्माका गला पकड़कर ले आये । उस समय वह लाचार होकर उनके वशमें पड़ा था और छूटनेके लिये छटपटा रहा था । कुन्तीपुत्र भीमने सुशर्माको रस्सियोंसे बाँधकर रथपर रख दिया । उसके सारे अंग धूलमें सने थे और चेतना लुप्त - सी हो रही थी ॥ ५५ ॥
अभ्येत्य रणमध्यस्थमभ्यगच्छद् युधिष्ठिरम् ॥ ५६ ॥
दर्शयामास भीमस्तु सुशर्माणं नराधिपम् । इसके बाद भीमने रणभूमिमें स्थित राजा युधिष्ठिरके पास जाकर उन्हें राजा सुशर्माको दिखलाया ॥ ५६३ ॥
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प्रोवाच पुरुषव्याघ्रो भीममाहवशोभिनम् ॥ ५७ ॥
तं राजा प्राहसद् दृष्ट्वा मुच्यतां वै नराधमः ।
एवमुक्तोऽब्रवीद् भीमः सुशर्माणं महाबलम् ॥ ५८ ॥
भीम युद्धमें अत्यन्त सुशोभित होते थे । पुरुष श्रेष्ठ राजा युधिष्ठिर सुशर्माको उस दशामें देखकर हँसे और भीमसेनसे बोले – ' इस नराधमको छोड़ दो । ' उनके ऐसा कहनेपर भीम महाबली सुशर्मासे बोले ॥ ५७-५८ ॥ भीमउवाच
जीवितुं चेच्छसे मूढ हेतुं मे गदतः शृणु ।
दासोऽस्मीति त्वया वाच्यं संसत्सु च सभासु च ॥ ५ ९ ॥
भीमसेनने कहा – मूर्ख! यदि तू जीवित रहना चाहता है, तो उसका उपाय बताता हूँ; मेरी बात सुन । तुझे संसदों और सभाओंमें जाकर सदा यही कहना होगा कि ' मैं राजा विराटका दास हूँ ' ॥ ५ ९ ॥
एवं ते जीवितं दद्यामेष युद्धजितो विधिः ।
तमुवाच ततो ज्येष्ठो भ्राता सप्रणयं वचः ॥ ६० ॥
ऐसा स्वीकार हो तो तुझे जीवन- दान दूँगा । युद्धमें जीतनेवाले पुरुषोंका यही नियम है । तब बड़े भ्राता युधिष्ठिरने भीमसे प्रेमपूर्वक कहा ॥ ६० ॥
युधिष्ठिरउवाच मुञ्च मुञ्चाधमाचारं प्रमाणं यदि ते वयम् ।
दासभावं गतो ह्येष विराटस्य महीपतेः ।
अदासो गच्छ मुक्तोऽसि मैवं कार्षीः कदाचन ॥ ६१ ॥
तब युधिष्ठिर बोले — भैया! यदि तुम मेरी बात मानते हो, तो इस पापाचारीको ‘ छोड़ दो, छोड़ दो ’ । यह महाराज विराटका दास तो हो ही चुका है । ( इसके बाद वे सुशर्मासे बोले
— ) ‘ तुम दास नहीं रहे, जाओ, छोड़ दिये गये । फिर कभी ' ऐसा काम न करना' ॥ ६१ ॥
इति श्रीमहाभारते विराटपर्वणि गोहरणपर्वणि दक्षिणगोग्रहे त्रयस्त्रिंशोऽध्यायः ॥ ३३
|| इस प्रकार श्रीमहाभारत विराटपर्वके अन्तर्गत गोहरणपर्वमेंदक्षिणदिशाकी गौओंका अपहरण करते समय सुशर्माके निग्रहसे सम्बन्ध रखनेवाला तैंतीसवाँअध्याय पूरा हुआ ॥ ३३ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके २ श्लोक मिलाकर कुल ६३ श्लोक हैं । )
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चतुस्त्रिंशोऽध्यायः राजा विराटद्वारा पाण्डवोंका सम्मान, युधिष्ठिरद्वारा राजाका अभिनन्दन तथा विराटनगरमें राजाकी विजयघोषणा वैशम्पायन उवाच
एवमुक्ते तु सव्रीडः सुशर्माऽऽसीदधोमुखः ।
स मुक्तोऽभ्येत्य राजानमभिवाद्य प्रतस्थिवान् ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं -जनमेजय! युधिष्ठिरके ऐसा कहनेपर सुशर्माने लज्जित होकर अपना मुँह नीचे कर लिया और बन्धनसे मुक्त हो राजा विराटके पास जा उन्हें प्रणाम करके अपने देशको प्रस्थान किया ॥ १ ॥
विसृज्य तु सुशर्माणं पाण्डवास्ते हतद्विषः ।
स्वबाहुबलसम्पन्ना ह्रीनिषेवा यतव्रताः ॥ २ ॥
संग्रामशिरसो मध्ये तां रात्रिं सुखिनोऽवसन् । इस प्रकार सुशर्माको मुक्त करके शत्रुओंका संहार करनेवाले, अपने बाहुबलसे सम्पन्न, लज्जाशील और संयमपूर्वक व्रतपालनमें तत्पर रहनेवाले वे पाण्डव उस युद्धके मुहानेपर ही रातभर सुखसे रहे ॥ २३ ॥
ततो विराटः कौन्तेयानतिमानुषविक्रमान् ।
अर्चयामास वित्तेन मानेन च महारथान् ॥ ३ ॥
तदनन्तर राजा विराटने अतिमानुष ( मानवीय शक्तिसे परे ) पराक्रम करनेवाले महारथी कुन्तीपुत्रोंका धन और मानदानद्वारा सत्कार किया ॥ ३ ॥
विराट उवाच
यथैव मम रत्नानि युष्माकं तानि वै तथा ।
कार्यं कुरुत वै सर्वे यथाकामं यथासुखम् ॥ ४ ॥
ददाम्यलंकृताः कन्या वसूनि विविधानि च ।
मनसश्चाप्यभिप्रेतं युद्धे शत्रुनिबर्हणाः ॥ ५ ॥
- विराटने कहा – युद्धमें शत्रुओंका संहार करनेवाले वीरो! ये रत्न और धन जैसे मेरे हैं, वैसे ही तुमलोगोंके भी । तुम सब लोग यहाँ सुखपूर्वक रहो और जिस कार्यमें तुमलोगोंकी रुचि हो, वही करो । मैं तुम सबको वस्त्राभूषणोंसे विभूषित कन्याएँ, नाना प्रकारके रत्न, धन तथा और भी मनोवांछित पदार्थ देता हूँ ॥ ४-५ ॥ युष्माकं विक्रमादद्य मुक्तोऽहं स्वस्तिमानिह ।
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तस्माद् भवन्तो मत्स्यानामीश्वराः सर्व एव हि ॥ ६ ॥
आज मैं तुमलोगोंके ही पराक्रमसे यहाँ शत्रुके पंजेसे कुशलपूर्वक छूटकर आया हूँ।
अतः तुमलोग मत्स्यदेशके स्वामी ही हो ॥ ६ ॥
वैशम्पायन उवाच
तथेतिवादिनं मत्स्यं कौरवेयाः पृथक् पृथक् ।
ऊचुः प्राञ्जलयः सर्वे युधिष्ठिरपुरोगमाः ॥ ७ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं - इस प्रकार कहनेवाले मत्स्यराजसे युधिष्ठिर आदि सभी कुरुवंशी पृथक् - पृथक् हाथ जोड़कर बोले— ॥ ७ ॥
प्रतिनन्दाम ते वाक्यं सर्वं चैव विशाम्पते ।
एतेनैव प्रतीताः स्म यत् त्वं मुक्तोऽद्य शत्रुभिः ॥ ८ ॥
‘ महाराज! आपका कहना ठीक है । हम आपके सम्पूर्ण वचनोंका अभिनन्दन करते हैं, किंतु हमलोग इतनेसे ही संतुष्ट हैं कि आप आज शत्रुओंसे मुक्त हो गये ' ॥ ८ ॥
ततोऽब्रवीत् प्रीतमना मत्स्यराजो युधिष्ठिरम् ।
पुनरेव महाबाहुर्विराटो राजसत्तमः ॥ ९ ॥
एहि त्वामभिषेक्ष्यामि मत्स्यराजस्तु नो भवान् ॥ १० ॥
तब राजाओंमें श्रेष्ठ मत्स्यनरेश महाबाहु विराटने मन - ही - मन अत्यन्त प्रसन्न होकर पुनः युधिष्ठिरसे कहा – ' कंकजी! आइये, मैं आपका अभिषेक करूँगा । आप ही हमारे मत्स्यदेशके राजा बनें ॥ ९ -१० ॥
मनसश्चाप्यभिप्रेतं यथेष्टं भुवि दुर्लभम् ।
तत् तेऽहं सम्प्रदास्यामि सर्वमर्हति नो भवान् ॥ ११ ॥
'इस पृथ्वीपर दुर्लभ जो और भी प्रिय तथा मनोवांछित पदार्थ होगा, वह भी मैं आपको दूँगा । आप तो हमारा सब कुछ पानेके अधिकारी हैं ॥ ११ ॥
रत्नानि गाः सुवर्णं च मणिमुक्तमथापि च ।
वैयाघ्रपद्य विप्रेन्द्र सर्वथैव नमोऽस्तु ते ॥ १२ ॥
‘ व्याघ्रपदगोत्रमें उत्पन्न विप्रवर! मेरे रत्न, गौएँ, सुवर्ण, मणि तथा मोती भी आपके अर्पण हैं । आपको हमारा सब प्रकारसे नमस्कार है ॥ १२ ॥
त्वत्कृते ह्यद्य पश्यामि राज्यं संतानमेव च ।
यतश्च जातसंरम्भो न च शत्रुवशं गतः ॥ १३ ॥
' आपके कारण ही आज मैं अपने राज्य और संतानका मुख देख पाऊँगा; क्योंकि पकड़े जानेपर मैं भयभीत हो गया था, किंतु आपके पराक्रमसे शत्रुके अधीन नहीं रहा' ॥ १३ ॥
ततो युधिष्ठिरो मत्स्यं पुनरेवाभ्यभाषत ।
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प्रतिनन्दामि ते वाक्यं मनोज्ञं मत्स्य भाषसे ॥ १४ ॥
आनृशंस्यपरो नित्यं सुसुखी सततं भव । यह सुनकर राजा युधिष्ठिरने मत्स्यराजसे पुनः कहा- ' राजन्! आप बड़ी मनोहर बात कह रहे हैं । मैं आपके इस वचनका अभिनन्दन करता हूँ आप निरन्तर दयाभाव रखते हुए सर्वदा परम सुखी हों ॥ १४३ ॥
(वैशम्पायनउवाच पुनरेव विराटश्च राजा कङ्कमभाषत ।
अहो सदस्य कर्माणि बल्लवस्य द्विजोत्तम ।
सोऽहं सूदेन संग्रामे बल्लवेनाभिरक्षितः ॥
त्वत्कृते सर्वमेवैतदुपपन्नं ममानघ ।
वरं वृणीष्य भद्रं ते ब्रूहि किं करवाणि ते ॥
ददामि ते महाप्रीत्या रत्नान्युच्चावचानि च ।
शयनासनयानानि कन्याश्च समलंकृताः ॥
हस्त्यश्वरथसङ्घाश्च राष्ट्राणि विविधानि च ।
एतानि च मम प्रीत्या प्रतिगृह्णीष्व सुव्रत ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! कंकनामधारी युधिष्ठिरके यों कहनेपर राजा विराट पुनः उनसे इस प्रकार बोले — ' द्विजश्रेष्ठ! बल्लव नामक रसोइयेका कर्म भी अद्भुत है । इस युद्धमें बल्लवने ही मेरी रक्षा की है । निष्पाप विप्रवर! आपके ही करनेसे यह सब कुछ सम्भव हुआ है । आपका कल्याण हो । आप मुझसे वर माँगिये और बताइये, मैं आपकी क्या सेवा करूँ? मैं बड़ी प्रसन्नताके साथ आपको नाना प्रकारके उत्तमोत्तम रत्न, शय्या, आसन, वाहन, वस्त्राभूषणोंसे विभूषित सुन्दरी कन्याएँ, हाथी, घोड़े और रथोंके समूह तथा भाँति - भाँतिके जनपद भेंट करता हूँ। सुव्रत! आप मेरी प्रसन्नताके लिये इन सब वस्तुओंको ग्रहण करें । तं तथावादिनं तत्र कौरव्यः प्रत्यभाषत ।
एकैव तु मम प्रीतिर्यत् त्वं मुक्तोऽसि शत्रुभिः ।
प्रतीतश्च पुरं तुष्टः प्रवेक्ष्यसि तदानघ ॥
दारैः पुत्रैश्च संश्लिष्य सा हि प्रीतिर्ममातुला । ) तब वहाँ ऐसी बातें कहनेवाले राजा विराटको कुरुकुलनन्दन युधिष्ठिरने इस प्रकार उत्तर दिया — ‘ महाराज! आप शत्रुओंके हाथसे छूट गये, यही मेरे लिये बड़ी प्रसन्नताकी बात है । अनघ! आप निर्भय होकर संतोषपूर्वक अपने नगरमें प्रवेश करेंगे और अपने स्त्री-पुत्रोंसे मिलकर सुखी होंगे; यही मेरे लिये अनुपम प्रसन्नताकी बात होगी । गच्छन्तु दूतास्त्वरितं नगरं तव पार्थिव ॥ १५ ॥
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सुहृदां प्रियमाख्यातुं घोषयन्तु च ते जयम् ।
ततस्तद्वचनान्मत्स्यो दूतान् राजा समादिशत् ॥ १६ ॥
‘ महाराज! अब आपके नगरमें सुहृदोंसे यह प्रिय समाचार बतानेके लिये तुरंत ही दूतोंको जाना चाहिये । वे दूत वहाँ आपकी विजय घोषित करें। ' तब उनके कथनानुसार राजा विराटने दूतोंको आदेश दिया- ॥ १५-१६ ॥
आचक्षध्वं पुरं गत्वा संग्रामविजयं मम ।
कुमार्यः समलंकृत्य पर्यागच्छन्तु मे पुरात् ॥ १७ ॥
‘ दूतो! तुमलोग नगरमें जाकर सूचना दो कि युद्धमें मेरी विजय हुई है । कुमारी कन्याएँ शृंगार करके स्वागतके लिये नगरसे बाहर आ जायँ ॥ १७ ॥
वादित्राणि च सर्वाणि गणिकाश्च स्वलंकृताः ।
एतां चाज्ञां ततः श्रुत्वा राज्ञा मत्स्येन नोदिताः ।
तामाज्ञां शिरसा कृत्वा प्रस्थिता हृष्टमानसाः ॥ १८ ॥
‘ सब प्रकारके बाजे बजाये जायँ और वेश्याएँ भी सज- धजकर तैयार रहें । ' मत्स्यराजकी इस आज्ञाको सुनकर उसे शिरोधार्य करके दूत प्रसन्नचित्त होकर चले ॥ १८ ॥
ते गत्वा तत्र तां रात्रिमथ सूर्योदयं प्रति ।
विराटस्य पुराभ्याशे दूता जयमघोषयन् ॥ १ ९ ॥
रातमें ही वहाँसे प्रस्थान करके सूर्योदय होते- होते दूत विराटकी राजधानीमें जा पहुँचे और वहाँ उन्होंने सब ओर मत्स्यराजकी विजय घोषित कर दी ॥ १ ९ ॥ इति श्रीमहाभारते विराटपर्वणि गोहरणपर्वणि दक्षिणगोग्रहे विराटजयघोषे चतुस्त्रिंशोऽध्यायः ॥ ३४ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत विराटपर्वके अन्तर्गत गोहरणपर्वमेंदक्षिण दिशाकी ओरसे गौओंके अपहरणके प्रसंगमें विराटके जयघोषसम्बन्धी चौंतीसवाँ अध्याय पूराहुआ ॥ ३४ ॥
( दाक्षिणात्य अधिक पाठके ६३ श्लोक मिलाकर कुल २५३ श्लोक हैं। )
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पञ्चत्रिंशोऽध्यायः कौरवोंद्वारा उत्तर दिशाकी ओरसे आकर विराटकी गौओंका अपहरण और गोपाध्यक्षका उत्तरकुमारको युद्धके लिये उत्साह दिलाना वैशम्पायन उवाच
याते त्रिगर्तान् मत्स्ये तु पशूंस्तान् वै परीप्सति ।
दुर्योधनः सहामात्यो विराटमुपयादथ ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं -जनमेजय! जिस समय अपने पशुओंको छुड़ा लानेकी इच्छासे राजा विराट त्रिगर्तोंसे युद्ध करनेके लिये गये, उसी समय दुर्योधनने अपने मन्त्रियोंके साथ विराटदेशपर चढ़ाई की ॥ १ ॥
भीष्मो द्रोणश्च कर्णश्च कृपश्च परमास्त्रवित् ।
द्रौणिश्च सौबलश्चैव तथा दुःशासनः प्रभो ॥ २ ॥
विविंशतिर्विकर्णश्च चित्रसेनश्च वीर्यवान् ।
दुर्मुखो दुःशलश्चैव ये चैवान्ये महारथाः ॥ ३ ॥
राजन्! भीष्म, द्रोण, कर्ण, अस्त्रविद्याके श्रेष्ठ विद्वान् कृपाचार्य, अश्वत्थामा, शकुनि, दुःशासन, विविंशति, विकर्ण, पराक्रमी चित्रसेन, दुर्मुख, दुःशल तथा अन्य महारथी भी दुर्योधनके साथ थे ॥ २-३ ॥
एते मत्स्यानुपागम्य विराटस्य महीपतेः ।
घोषान् विद्राव्य तरसा गोधनं जहुरोजसा ॥ ४ ॥
इन सबने राजा विराटके मत्स्यदेशमें आकर उनके गोष्ठोंमें भगदड़ मचा दी और बड़े वेगसे बलपूर्वक गोधनका अपहरण करना आरम्भ किया ॥ ४ ॥
षष्टिं गवां सहस्राणि कुरवः कालयन्ति च ।
महता रथवंशेन परिवार्य समन्ततः ॥ ५ ॥
वे कौरव वीर राजा विराटकी साठ हजार गौओंको विशाल रथसमूहोंद्वारा चारों ओरसे घेरकर हाँक ले चले ॥ ५ ॥
गोपालानां तु घोषस्य हन्यतां तैर्महारथैः ।
आरावः सुमहानासीत् सम्प्रहारे भयंकरे ॥ ६ ॥
उस समय वहाँ भयंकर मारपीट हुई । उन महारथियोंद्वारा मारे जाते हुए गोष्ठके ग्वालोंका जोर- जोरसे होनेवाला आर्तनाद बहुत दूरतक सुनायी देता था ॥ ६ ॥
गोपाध्यक्षो भयत्रस्तो रथमास्थाय सत्वरः ।
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जगाम नगरायैव परिक्रोशंस्तदाऽऽर्तवत् ॥ ७ ॥
तब उन गौओंका रक्षक भयभीत हो तुरंत ही रथपर बैठकर आर्तकी भाँति विलाप करता हुआ राजधानीकी ओर चल दिया ॥ ७ ॥
स प्रविश्य पुरं राज्ञो नृपवेश्माभ्ययात् ततः ।
अवतीर्य रथात् तूर्णमाख्यातुं प्रविवेश ह ॥ ८ ॥
राजा विराटके नगरमें पहुँचकर वह राजभवनके समीप गया और रथसे उतरकर तुरंत यह समाचार सूचित करनेके लिये महलके भीतर चला गया ॥ ८ ॥
दृष्ट्वा भूमिजयं नाम पुत्रं मत्स्यस्य मानिनम् ।
तस्मै तत् सर्वमाचष्ट राष्ट्रस्य पशुकर्षणम् ॥ ९ ॥
षष्टिं गवां सहस्राणि कुरवः कालयन्ति ते ।
तद् विजेतुं समुत्तिष्ठ गोधनं राष्ट्रमवर्धन ॥ १० ॥
वहाँ मत्स्यराजके मानी पुत्र भूमिंजय ( उत्तर) से मिलकर उस गोपने उनसे राज्यके पशुओंके अपहरणका सब समाचार बताते हुए कहा- ' राजकुमार! आप इस राष्ट्रकी वृद्धि करनेवाले हैं । आज कौरव आपकी साठ हजार गौओंको हाँक ले जा रहे हैं । उनके हाथसे उस गोधनको जीत लानेके लिये उठ खड़े होइये ॥ ९ -१० ॥
राजपुत्र हितप्रेप्सुः क्षिप्रं निर्याहि च स्वयम् ।
त्वां हि मत्स्यो महीपालः शून्यपालमिहाकरोत् ॥ ११ ॥
' राजपुत्र! आप इस राज्यके हितैषी हैं, अतः स्वयं ही युद्धके लिये तैयार होकर निकलिये । मत्स्यनरेशने अपनी अनुपस्थितिमें आपको ही यहाँका रक्षक नियुक्त किया है ॥ ११ ॥