श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड २ — पृष्ठ 2341–2350
महाभारत — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 2341–2350
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सेनाकी धूलसे आच्छादित होकर उड़ते हुए पक्षी भी भूमिपर गिर जाते थे । दोनों ओरसे छूटे हुए बाणोंद्वारा ( आकाश खचाखच भर जानेके कारण) सूर्यदेवका दीखना बंद हो गया ॥ ७ ॥
खद्योतैरिव संयुक्तमन्तरिक्षं व्यराजत ।
रुक्मपृष्ठानि चापानि व्यतिषिक्तानि धन्विनाम् ॥ ८ ॥
पततां लोकवीराणां सव्यदक्षिणमस्यताम् ।
रथा रथैः समाजग्मुः पादातैश्च पदातयः ॥ ९ ॥
बाणोंके कारण अन्तरिक्ष मानो जुगनुओंसे भर गया हो, इस प्रकार चकमक हो रहा था। दाँयें - बाँयें बाण मारनेवाले वे विश्वविख्यात धनुर्धर वीर जब घायल होकर गिरते थे, उस समय उनके सुवर्णकी पीठवाले धनुष दूसरोंके हाथमें चले जाते थे । रथी रथियोंसे और पैदल पैदलोंसे भिड़े हुए थे ॥ ८ - ९ ॥
सादिनः सादिभिश्चैव गजैश्चापि महागजाः ।
असिभिः पट्टिशैः प्रासैः शक्तिभिस्तोमरैरपि ॥ १० ॥
संरब्धाः समरे राजन् निजघ्नुरितरेतरम् ।
निघ्नन्तः समरेऽन्योन्यं शूराः परिघबाहवः ॥ ११ ॥
न शेकुरभिसंरब्धाः शूरान् कर्तुं पराङ्मुखान् । घुड़सवार घुड़सवारोंसे और गजारोही गजारोहियोंसे लड़ रहे थे । राजन्! वे सब क्रोधमें भरकर उस युद्धमें एक- दूसरेपर तलवार, पट्टिश, प्रास, शक्ति और तोमर आदि अस्त्र- शस्त्रोंसे प्रहार कर रहे थे; किंतु परिघके समान प्रचण्ड भुजदण्डवाले वे शूरवीर परस्पर क्रोधपूर्वक प्रहार करनेपर भी सामना करनेवाले वीरोंको पीछे नहीं हटा पाते थे ॥ १०-११ ¾ ॥ कृत्तोत्तरोष्ठं सुनसं कृत्तकेशमलंकृतम् ॥ १२ ॥
अदृश्यत शिरश्छिन्नं रजोध्वस्तं सकुण्डलम् । बातकी बातमें, कुण्डलोंसहित कटे हुए कितने ही मस्तक धूलमें लोटने लगे । किसीकी नाक बड़ी सुन्दर थी, परन्तु ऊपरका ओठ कट गया था । कोई अलंकारोंसे अलंकृत था, किंतु उसका केशभाग कटकर उड़ गया था ॥ १२३ ॥
अदृश्यंस्तत्र गात्राणि शरैश्छिन्नानि भागशः ॥ १३ ॥
शालस्कन्धनिकाशानि क्षत्रियाणां महामृधे । उस महासंग्राममें बहुत- से क्षत्रिय वीरोंके शरीर, जो शालवृक्षकी शाखाओंके समान विशाल एवं हृष्ट - पुष्ट थे, छिन्न- भिन्न होकर टुकड़े -टुकड़े दिखायी देने लगे ॥ नागभोगनिकाशैश्च बाहुभिश्चन्दनोक्षितैः ॥ १४ ॥
आस्तीर्णा वसुधा भाति शिरोभिश्च सकुण्डलैः ।
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सर्पोंके शरीरकी भाँति सुशोभित चन्दनचर्चित भुजाओं तथा कुण्डलमण्डित मस्तकोंसे पटी हुई रणभूमि अपूर्व शोभा धारण कर रही थी ॥ १४३ ॥
रथिनां रथिभिश्चात्र सम्प्रहारोऽभ्यवर्तत ॥ १५ ॥
सादिभिः सादिनां चापि पदातीनां पदातिभिः ।
उपाशाम्यद् रजो भौमं रुधिरेण प्रसर्पता ॥ १६ ॥
वहाँ रथियोंका रथियोंसे, घुड़सवारोंका घुड़सवारोंसे और पैदल योद्धाओंका पैदलोंसे घमासान युद्ध होने लगा । सब ओर रक्तकी धारा बह चली और उसमें सनकर धरतीकी धूल शान्त हो गयी ॥ १५-१६ ॥ कश्मलं चाविशद् घोरं निर्मर्यादमवर्तत । युद्ध करनेवाले वीरोंको मूर्च्छा आने लगी । उनमें मर्यादाशून्य भयंकर युद्ध छिड़ गया ॥ १६३ ॥
( युधिष्ठिरोऽपि धर्मात्मा भ्रातृभिः सहितस्तदा ।
व्यूहं कृत्वा विराटस्य अन्वयुध्यत पाण्डवः ॥
आत्मानं श्येनवत् कृत्वा तुण्डमासीद् युधिष्ठिरः ।
पक्षौ यमौ च भवतः पुच्छमासीद् वृकोदरः ॥
सहस्रं न्यहनत् तत्र कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः ।
भीमसेनः सुसंक्रुद्धः सर्वशस्त्रभृतां वरः ॥
द्विसहस्रं रथान् वीरः परलोकं प्रवेशयत् । नकुलस्त्रिशतं जघ्ने सहदेवश्चतुःशतम् ॥ ) पाण्डुनन्दन धर्मात्मा युधिष्ठिरने भी भाइयों सहित व्यूह -रचना करके राजा विराटके लिये त्रिगर्तोंके साथ युद्ध आरम्भ किया । उन्होंने अपने - आपको श्येन ( बाज) पक्षीके रूपमें उपस्थित करके उसकी चोंचका स्थान ग्रहण किया । नकुल और सहदेव दोनों पंखोंके रूपमें हो गये । भीमसेन पूँछके स्थानमें हुए । कुन्तीपुत्र युधिष्ठिरने शत्रुओंके एक सहस्र सैनिकोंका संहार कर डाला । सम्पूर्ण शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ वीर भीमसेनने अत्यन्त कुपित हो दो हजार रथियोंको परलोक पहुँचा दिया । नकुलने तीन सौ और सहदेवने चार सौ सैनिकोंको मार डाला ।
उपाविशन् गरुत्मन्तः शरैर्गाढं प्रवेजिताः ।
अन्तरिक्षे गतिर्येषां दर्शनं चाप्यरुध्यत ॥ १७ ॥
आकाशचारी पक्षी भी बाणसमूहोंसे अत्यन्त उद्विग्न होकर इधर - उधर बैठ गये । उनका आकाशमें उड़ना और दूरतक देखना भी बंद हो गया ॥ १७ ॥
ते घ्नन्तः समरेऽन्योन्यं शूराः परिघबाहवः ।
न शेकुरभिसंरब्धाः शूरान् कर्तुं पराङ्मुखान् ॥ १८ ॥
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परिघकी - सी मोटी बाँहोंवाले शूरमा कुपित हो एक- दूसरेपर घातक प्रहार करते हुए भी सच्चे शूरवीरोंको युद्धसे विमुख नहीं कर पाते थे ॥ १८ ॥
शतानीकः शतं हत्वा विशालाक्षश्चतुःशतम् प्रविष्टौ महतीं सेनां त्रिगर्तानां महारथौ ॥ १ ९ ॥ इस प्रकार युद्ध करते - करते शतानीक सौ तथा विशालाक्ष ( मदिराक्ष ) चार सौ त्रिगर्त
योद्धाओंको मारकर उनकी भारी सेनामें घुस गये । वे दोनों महारथी थे ॥ १ ९ ॥
तौ प्रविष्टौ महासेनां बलवन्तौ मनस्विनौ ।
आर्च्छतां बहुसंरब्धौ केशाकेशि रथारथिः ॥ २० ॥
उस विशाल सेनामें घुसे हुए और अत्यन्त क्रुद्ध हुए उन बलवान् एवं मनस्वी वीरोंने उस सारी सेनाको मोहित कर दिया। वे दोनों उन त्रिगर्त सैनिकोंसे एक दूसरेके केश पकड़-पकड़कर तथा रथोंपर बैठे हुए रथियोंको गिरा गिराकर युद्ध करने लगे ॥ २० ॥
लक्षयित्वा त्रिगर्तानां तौ प्रविष्टौ रथव्रजम् ।
अग्रतः सूर्यदत्तश्च मदिराक्षश्च पृष्ठतः ॥ २१ ॥
फिर उन दोनोंने त्रिगर्तोंकी रथसेनाको लक्ष्य बनाकर उसमें प्रवेश किया । सूर्यदत्तने आगेकी ओरसे आक्रमण किया और मदिराक्षने पीछेकी ओरसे ॥ २१ ॥
विराटस्तत्र संग्रामे हत्वा पञ्चशतान् रथान् ।
हयानां च शतान्यष्टौ हत्वा पञ्च महारथान् ॥ २२ ॥
चरन् स विविधान् मार्गान् रथेन रथसत्तमः ।
त्रिगर्तानां सुशर्माणमार्च्छद् रुक्मरथं रणे ॥ २३ ॥
रथियोंमें श्रेष्ठ राजा विराटने रथके द्वारा विविध मार्गोंसे चलते — अनेक प्रकारके रणकौशल दिखाते हुए उस युद्धमें त्रिगर्तोंके पाँच सौ रथी, आठ सौ घुड़सवार तथा पाँच महारथियोंको मार गिरानेके पश्चात् स्वर्णभूषित रथपर बैठे हुए सुशर्मापर धावा किया ॥ २२-२३ ॥
तौ व्यवाहरतां तत्र महात्मानौ महाबलौ ।
अन्योन्यमभिगर्जन्तौ गोष्ठेषु वृषभाविव ॥ २४ ॥
वे दोनों महान् बलवान् और महामनस्वी वीर गर्जते हुए एक-दूसरेसे इस प्रकार जा भिड़े, मानो गोशालामें दो साँड़ लड़ रहे हों ॥ २४ ॥
ततो राजा त्रिगर्तानां सुशर्मा युद्धदुर्मदः ।
मत्स्यं समायाद् राजानं द्वैरथेन नरर्षभः ॥ २५ ॥
त्रिगर्तराज सुशर्मापर युद्धका घोर उन्माद छाया हुआ था। उस नरश्रेष्ठ वीरने राजा विराटका द्वैरथयुद्धके द्वारा सामना किया ॥ २५ ॥
ततो रथाभ्यां रथिनौ व्यतीयतुरमर्षणौ ।
शरान् व्यसृजतां शीघ्रं तोयधारा घना इव ॥ २६ ॥
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क्रोधमें भरे हुए वे दोनों रथी अपना-अपना रथ बढ़ाकर निकट आ गये और शीघ्रतापूर्वक एक दूसरेपर बाणोंकी झड़ी लगाने लगे, मानो दो मेघ जलकी धाराएँ बरसा रहे हों ॥ २६ ॥
अन्योन्यं चापि संरब्धौ विचेरतुरमर्षणौ ।
कृतास्त्रौ निशितैर्बाणैरसिशक्तिगदाभृतौ ॥ २७ ॥
दोनोंका एक दूसरेके प्रति क्रोध और अमर्ष बढ़ा हुआ था । दोनों ही अस्त्रविद्यामें निपुण थे और दोनोंने ही तलवार, शक्ति तथा गदा भी ले रखी थी । उस समय दोनों तीखे बाणोंसे परस्पर प्रहार करते हुए रणभूमिमें विचरने लगे ॥ २७ ॥
ततो राजा सुशर्माणं विव्याध दशभिः शरैः ।
पञ्चभिः पञ्चभिश्चास्य विव्याध चतुरो हयान् ॥ २८ ॥
इसी समय राजा विराटने सुशर्माको दस बाणोंसे बींध डाला और पाँच- पाँच बाणोंसे उसके चारों घोड़ोंको भी घायल कर दिया ॥ २८ ॥
तथैव मत्स्यराजानं सुशर्मा युद्धदुर्मदः ।
पञ्चाशता शितैर्बाणैर्विव्याध परमास्त्रवित् ॥ २ ९ ॥
इसी प्रकार महान् अस्त्रवेत्ता सुशर्माने भी रणोन्मत्त होकर पचास तीखे बाणोंसे मत्स्यराज विराटको बींध डाला ॥ २ ९ ॥
ततः सैन्यं महाराज मत्स्यराजसुशर्मणोः ।
नाभ्यजानात् तदान्योन्यं सैन्येन रजसाऽऽवृतम् ॥ ३० ॥
महाराज! तदनन्तर सैनिकोंके पैरोंसे इतनी धूल उड़ी कि मत्स्यनरेश तथा सुशर्मा दोनोंकी सेनाएँ उससे आच्छादित हो गयीं और एक- दूसरेके विषयमें यह भी न जान सकीं कि कौन कहाँ क्या कर रहा है? ॥ ३० ॥
इति श्रीमहाभारते विराटपर्वणि गोहरणपर्वणि दक्षिणगोग्रहे विराटसुशर्मयुद्धे द्वात्रिंशोऽध्यायः ॥ ३२ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत विराटपर्वके अन्तर्गत गोहरणपर्वमें दक्षिणदिशाकीगौओंके अपहरणके समय होनेवाले विराट और सुशर्माके युद्धके विषयमें बत्तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३२ ॥
( दाक्षिणात्य अधिक पाठके ४ श्लोक मिलाकर कुल ३४ श्लोक हैं । )
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त्रयस्त्रिंशोऽध्यायः सुशर्माका विराटको पकड़कर ले जाना, पाण्डवोंके प्रयत्नसे उनका छुटकारा, भीमद्वारा सुशर्माका निग्रह और युधिष्ठिरका अनुग्रह करके उसे छोड़ देना वैशम्पायन उवाच
तमसाभिप्लुते लोके रजसा चैव भारत ।
अतिष्ठन् वै मुहूर्तं तु व्यूढानीकाः प्रहारिणः ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं - भारत! उस समय [ सूर्यास्त हो चुका था एवं रात्रि आ गयी थी, अतः ] सब लोग धूलसे तो आवृत थे ही, अन्धकारसे भी आच्छादित हो गये; अतः प्रहार करनेवाले सैनिक सेनाका व्यूह बनाकर कुछ देरतक युद्ध बंद करके खड़े रहे ॥ १ ॥
ततोऽन्धकारं प्रणुदन्नुदतिष्ठत चन्द्रमाः ।
कुर्वाणो विमलां रात्रिं नन्दयन् क्षत्रियान् युधि ॥ २ ॥
इतनेमें ही अन्धकारका निवारण करते हुए चन्द्रदेवका उदय हुआ। उन्होंने उस रणक्षेत्रमें क्षत्रियोंको आनन्द प्रदान करते हुए उस रात्रिको निर्मल ( अन्धकार- शून्य) बना दिया ॥ २ ॥
ततः प्रकाशमासाद्य पुनर्युद्धमवर्तत ।
घोररूपं ततस्ते स्म नावैक्षन्त परस्परम् ॥ ३ ॥
अतः उजाला हो जानेसे पुनः घोर युद्ध प्रारम्भ हो गया । उस समय ( युद्धके आवेशमें) योद्धा एक दूसरेको देख नहीं रहे थे ॥ ३ ॥
ततः सुशर्मा त्रैगर्तः सह भ्रात्रा यवीयसा ।
अभ्यद्रवन्मत्स्यराजं रथव्रातेन सर्वशः ॥ ४ ॥
तदनन्तर त्रिगर्तराज सुशर्माने अपने छोटे भाईके साथ रथियोंका समूह लेकर चारों ओरसे मत्स्यराज विराटपर धावा बोल दिया ॥ ४ ॥
ततो रथाभ्यां प्रस्कन्द्य भ्रातरौ क्षत्रियर्षभौ ।
गदापाणी सुसंरब्धौ समभ्यद्रवतां रथान् ॥ ५ ॥
फिर वे क्षत्रियशिरोमणि दोनों बन्धु रथोंसे कूद पड़े और हाथमें गदा ले क्रोधमें भरकर शत्रुसेनाके रथोंकी ओर दौड़े ॥ ५ ॥
( मत्ताविव वृषावेतौ गजाविव मदोद्धतौ ।
सिंहाविव गजग्राही शक्रवृत्राविवोत्थितौ ॥
उभौ तुल्यबलोत्साहावुभौ तुल्यपराक्रमौ ।
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उभौ तुल्यास्त्रविदुषावुभौ युद्धविशारदौ ॥ ) वे दोनों मतवाले साँड़ों, मदोन्मत्त गजराजों, एक ही हाथीपर आक्रमण करनेवाले दो सिंहों तथा युद्धके लिये उद्यत वृत्रासुर एवं इन्द्रके समान जान पड़ते थे । दोनोंके बल और उत्साह समान थे । दोनों ही एक- जैसे पराक्रमी और एक- से ही अस्त्र- शस्त्रोंके ज्ञाता थे । युद्ध करनेकी कलामें वे दोनों ही वीर अत्यन्त निपुण थे । तथैव तेषां तु बलानि तानि क्रुद्धान्यथान्योन्यमभिद्रवन्ति । गदासिखड्गैश्च परश्वधैश्च प्रासैश्च तीक्ष्णाग्रसुपीतधारैः ॥ ६ ॥
इसी प्रकार उन सबकी वे सेनाएँ भी कुपित हो गदा, तलवार, खड्ग, फरसे और भलीभाँति तेज किये हुए तीखी धारवाले प्रासों ( भालों ) से प्रहार करती हुई एक- दूसरीपर टूट पड़ीं ॥ ६ ॥
बलं तु मत्स्यस्य बलेन राजा सर्वं त्रिगर्ताधिपतिः सुशर्मा । प्रमथ्य जित्वा च प्रसह्य मत्स्यं विराटमोजस्विनमभ्यधावत् ॥ ७ ॥
तौ निहत्य पृथग् धुर्यावुभौ तौ पार्ष्णिसारथी ।
विरथं मत्स्यराजानं जीवग्राहमगृह्णताम् ॥ ८ ॥
त्रिगर्तदेशके स्वामी राजा सुशर्माने अपनी सेनाके द्वारा मत्स्यराजकी सेनाको मथ डाला और बलपूर्वक उसे परास्त करके महापराक्रमी मत्स्यनरेश विराटपर चढ़ाई कर दी । उन दोनों भाइयोंने पृथक् - पृथक् विराटके दोनों घोड़ोंको मारकर उनके पार्श्वभागकी रक्षा करनेवाले सिपाहियों तथा सारथिको भी मार डाला और उन्हें रथहीन करके जीते - जी ही पकड़ लिया ॥ ७-८ ॥
तमुन्मथ्य सुशर्माथ युवतीमिव कामुकः ।
स्यन्दनं स्वं समारोप्य प्रययौ शीघ्रवाहनः ॥ ९ ॥
जैसे कामी पुरुष किसी युवतीको बलपूर्वक पकड़ ले, वैसे ही सुशर्माने राजा विराटको पीड़ित करके पकड़ लिया और उनको शीघ्रगामी वाहनोंसे युक्त अपने रथपर चढ़ाकर वह चल दिया ॥ ९ ॥
तस्मिन् गृहीते विरथे विराटे बलवत्तरे ।
प्राद्रवन्त भयान्मत्स्यास्त्रिगर्तैरर्दिता भृशम् ॥ १० ॥
अतिशय बलवान् राजा विराट जब रथहीन होकर पकड़ लिये गये, तब त्रिगर्तोंद्वारा अत्यन्त पीड़ित हुए मत्स्यदेशीय सैनिक भयभीत होकर भागने लगे ॥ १० ॥
तेषु संत्रस्यमानेषु कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः ।
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प्रत्यभाषन्महाबाहुं भीमसेनमरिंदमम् ॥ ११ ॥
उनके इस प्रकार अत्यन्त भयभीत होनेपर कुन्तीपुत्र युधिष्ठिरने शत्रुओंका दमन करनेवाले महाबाहु भीमसेनसे कहा- ॥ ११ ॥
मत्स्यराजः परामृष्टस्त्रिगर्तेन सुशर्मणा ।
तं मोचय महाबाहो न गच्छेद् द्विषतां वशम् ॥ १२ ॥
‘ महाबाहो! त्रिगर्तराज सुशर्माने मत्स्यराजको पकड़ लिया है । उन्हें शीघ्र छुड़ाओ; जिससे वे शत्रुओंके वशमें न पड़ जायँ ॥ १२ ॥
उषिताः स्म सुखं सर्वे सर्वकामैः सुपूजिताः ।
भीमसेन त्वया कार्या तस्य वासस्य निष्कृतिः ॥ १३ ॥
‘ हम सब लोग उनके यहाँ सुखपूर्वक रहे हैं और उन्होंने हमें सब प्रकारकी अभीष्ट वस्तुएँ देकर हमारा भलीभाँति सत्कार किया है । अतः भीमसेन! तुम्हें उनके घरमें रहनेके उपकारका बदला चुकाना चाहिये ' ॥ १३ ॥
भीमसेन उवाच
अहमेनं परित्रास्ये शासनात् तव पार्थिव ।
पश्य मे सुमहत् कर्म युध्यतः सह शत्रुभिः ॥ १४ ॥
भीमसेन बोले- महाराज! आपकी आज्ञासे मैं इन्हें सुशर्माके हाथोंसे छुड़ा लूँगा ।
आज आप शत्रुओंके साथ युद्ध करते समय मेरे महान् पराक्रमको देखें ॥ १४ ॥
स्वबाहुबलमाश्रित्य तिष्ठ त्वं भ्रातृभिः सह ।
एकान्तमाश्रितो राजन् पश्य मेऽद्य पराक्रमम् ॥ १५ ॥
मैं अपने बाहुबलका भरोसा करके लडूंगा । राजन्! आज आप भाइयोंसहित एकान्तमें खड़े होकर अब मेरा पराक्रम देखें ॥ १५ ॥
सुस्कन्धोऽयं महावृक्षो गदारूप इव स्थितः ।
अहमेनमपारुज्य द्रावयिष्यामि शात्रवान् ॥ १६ ॥
यह सामने जो महान् वृक्ष है, इसकी शाखाएँ बड़ी सुन्दर हैं । यह तो मानो गदाके ही रूपमें खड़ा है । अतः मैं इसीको उखाड़कर इसके द्वारा शत्रुदलको मार भगाऊँगा ॥ १६ ॥
वैशम्पायन उवाच
तं मत्तमिव मातङ्कं वीक्षमाणं वनस्पतिम् ।
अब्रवीद् भ्रातरं वीरं धर्मराजो युधिष्ठिरः ॥ १७ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं - राजन्! यह कहकर भीमसेन मदोन्मत्त गजराजकी भाँति
उस वृक्षकी ओर देखने लगे । तब धर्मराज युधिष्ठिरने अपने वीर भ्रातासे कहा— ॥ १७ ॥
मा भीम साहसं कार्षीस्तिष्ठत्वेष वनस्पतिः ।
मा त्वां वृक्षेण कर्माणि कुर्वाणमतिमानुषम् ॥ १८ ॥
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जनाः समवबुध्येरन् भीमोऽयमिति भारत ।
अन्यदेवायुधं किंचित् प्रतिपद्यस्व मानुषम् ॥ १ ९ ॥
‘ भीमसेन! ऐसा दुःसाहस न करो, इस वृक्षको खड़ा रहने दो । यदि तुम इस महावृक्षको उखाड़नेका अतिमानुष ( मानवोंके लिये असाध्य ) कर्म करोगे, तो सब लोग पहचान लेंगे कि यह तो भीम है । अतः भारत! तुम किसी दूसरे मानवोचित आयुधको ही ग्रहण करो ॥ १८-१९ ॥
चापं वा यदि वा शक्तिं निस्त्रिंशं वा परश्वधम् ।
यदेव मानुषं भीम भवेदन्यैरलक्षितम् ॥ २० ॥
तदेवायुधमादाय मोक्षयाशु महीपतिम् ।
यमौ च चक्ररक्षौ ते भवितारौ महाबलौ ॥ २१ ॥
सहिताः समरे तत्र मत्स्यराजं परीप्सत । ‘ धनुष, शक्ति, खड्ग अथवा कुठार, जो भी मनुष्योचित अस्त्र- शस्त्र तुम्हें ठीक लगे; जिससे तुम दूसरोंद्वारा पहचाने न जा सको, वही लेकर राजाको शीघ्र छुड़ाओ । ये महाबली नकुल और सहदेव तुम्हारे रथके पहियोंकी रक्षा करेंगे । तुम तीनों भाई युद्धमें एक साथ मिलकर महाराज विराटको छुड़ाओ' ॥ २०-२१३ ॥ वैशम्पायन उवाच एवमुक्तस्तु वेगेन भीमसेनो महाबलः ॥ २२ ॥
गृहीत्वा तु धनुः श्रेष्ठं जवेन सुमहाजवः ।
व्यमुञ्चच्छरवर्षाणि सतोय इव तोयदः ॥ २३ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं - राजन्! युधिष्ठिरके उक्त आदेश देनेपर महान् वेगशाली महाबली भीमसेनने शीघ्रतापूर्वक एक उत्तम धनुष हाथमें ले लिया । फिर तो जैसे मेघ जलकी धारा बरसाता हो, उसी प्रकार वे वेगपूर्वक बाणोंकी वर्षा करने लगे ॥ २२-२३ ॥
तं भीमो भीमकर्माणं सुशर्माणमथाद्रवत् ।
विराटं समवीक्ष्यैनं तिष्ठ तिष्ठेति चावदत् ॥ २४ ॥
तदनन्तर भीमसेन भयंकर कर्म करनेवाले सुशर्माकी ओर दौड़े और विराटकी ओर देखते हुए सुशर्मासे बोले – ' अरे! खड़ा रह, खड़ा रह ' ॥ २४ ॥
सुशर्मा चिन्तयामास कालान्तकयमोपमम् ।
तिष्ठ तिष्ठेति भाषन्तं पृष्ठतो रथपुङ्गवः ।
पश्यतां सुमहत् कर्म महद् युद्धमुपस्थितम् ॥ २५ ॥
रथियोंमें श्रेष्ठ सुशर्मा पीछेकी ओरसे आते और ' खड़ा रह, खड़ा रह ' कहते हुए काल, अन्तक एवं यमराजके समान भयंकर वीर पुरुषको देखकर चिन्तामें पड़ गया और अपने
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पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
साथियोंसे बोला — ‘ देखो, फिर बड़ा भारी युद्ध उपस्थित हुआ है । इसमें महान् पराक्रम दिखाओ ' ॥ २५ ॥
परावृत्तो धनुर्गृह्य सुशर्मा भ्रातृभिः सह ।
निमेषान्तरमात्रेण भीमसेनेन ते रथाः ॥ २६ ॥
रथानां च गजानां च वाजिनां च ससादिनाम् ।
सहस्रशतसङ्घाताः शूराणामुग्रधन्विनाम् ॥ २७ ॥
पातिता भीमसेनेन विराटस्य समीपतः ।
पत्तयो निहतास्तेषां गदां गृह्य महात्मना ॥ २८ ॥
ऐसा कहकर सुशर्मा भाइयोंसहित धनुष उठाये लौट पड़ा । इधर महात्मा भीमसेनने निमेषमात्रमें ही गदा लेकर शत्रुओंके भयंकर धनुष धारण करनेवाले रथी, हाथीसवार और घुड़सवार वीरोंके एक लाख सैनिकोंके समूहों को राजा विराटके समीप मार गिराया और बहुत - से पैदल सिपाहियोंका भी संहार कर डाला ॥ २६–२८ ॥ तद् दृष्ट्वा तादृशं युद्धं सुशर्मा युद्धदुर्मदः ।
चिन्तयामास मनसा किं शेषं हि बलस्य मे ।
अपरो दृश्यते सैन्ये पुरा मग्नो महाबले ॥ २ ९ ॥
ऐसा भयानक युद्ध देख रणोन्मत्त सुशर्मा मन- ही - मन सोचने लगा, 'जान पड़ता है, मेरी सेना बुरी तरह मारी जायगी; क्योंकि मेरा दूसरा भाई भी पहले से ही इस विशाल सैन्य-समुद्रमें डूबा हुआ दिखायी देता है ' ॥ २ ९ ॥
आकर्णपूर्णेन तदा धनुषा प्रत्यदृश्यत ।
सुशर्मा सायकांस्तीक्ष्णान् क्षिपते च पुनः पुनः ॥ ३० ॥
ततः समस्तास्ते सर्वे तुरगानभ्यचोदयन् ।
दिव्यमस्त्रं विकुर्वाणास्त्रिगर्तान् प्रत्यमर्षणाः ॥ ३१ ॥
ऐसा विचारकर वह कानतक खींचे हुए धनुषके द्वारा युद्धके लिये उद्यत दिखायी देने लगा । सुशर्मा बारंबार तीखे बाणोंकी झड़ी लगा रहा है, यह देख सम्पूर्ण मत्स्यदेशीय योद्धा त्रिगर्तोंके प्रति कुपित हो दिव्यास्त्र प्रकट करते हुए अपने रथोंके घोड़ोंको आगे बढ़ाने लगे ॥ ३०-३१ ॥
तान् निवृत्तरथान् दृष्ट्वा पाण्डवान् सा महाचमूः ।
वैराटिः परमक्रुद्धो युयुधे परमाद्भुतम् ॥ ३२ ॥
पाण्डवोंको त्रिगर्तोंकी ओर रथ लौटाते देख मत्स्यवीरोंकी वह विशालवाहिनी भी लौट पड़ी । विराटके पुत्र श्वेत अत्यन्त क्रोधमें भरकर बड़ा अद्भुत युद्ध करने लगे ॥ ३२ ॥
सहस्रमवधीत् तत्र कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः ।
भीमः सप्त सहस्राणि यमलोकमदर्शयत् ॥ ३३ ॥
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पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
कुन्तीपुत्र युधिष्ठिरने एक हजार त्रिगर्तोंको मार गिराया । भीमसेनने सात हजार योद्धाओंको यमलोकका दर्शन कराया ॥ ३३ ॥
नकुलश्चापि सप्तैव शतानि प्राहिणोच्छरैः ।
शतानि त्रीणि शूराणां सहदेवः प्रतापवान् ॥ ३४ ॥
युधिष्ठिरसमादिष्टो निजघ्ने पुरुषर्षभः । नकुलने अपने बाणोंसे सात सौ सैनिकोंको यमराजके घर भेज दिया तथा पुरुषोंमें श्रेष्ठ प्रतापी वीर सहदेवने युधिष्ठिरकी आज्ञासे तीन सौ शूरवीरोंका संहार कर डाला ॥ ३४३ ॥
ततोऽभ्यपतदत्युग्रः सुशर्माणमुदायुधः ॥ ३५ ॥
हत्वा तां महतीं सेनां त्रिगर्तानां महारथः । तदनन्तर महारथी सहदेव त्रिगर्तोंकी उस महासेनाका संहार करके अत्यन्त उग्र रूप धारण किये हाथमें धनुष ले सुशर्मापर चढ़ आये ॥ ३५३ ॥
ततो युधिष्ठिरो राजा त्वरमाणो महारथः ॥ ३६ ॥
अभिपत्य सुशर्माणं शरैरभ्याहनद् भृशम् । तत्पश्चात् महारथी राजा युधिष्ठिर भी बड़ी उतावलीके साथ सुशर्मापर धावा बोलकर उसे बाणोंद्वारा बारंबार बींधने लगे ॥ ३६ ॥
सुशर्मापि सुसंरब्धस्त्वरमाणो युधिष्ठिरम् ॥ ३७ ॥
अविध्यन्नवभिर्बाणैश्चतुर्भिश्चतुरो हयान् । तब सुशर्माने भी अत्यन्त कुपित हो बड़ी फुर्तीके साथ नौ बाणोंसे राजा युधिष्ठिरको और चार बाणोंसे उनके चारों घोड़ोंको बींध डाला ॥ ३७३३ ॥
ततो राजन्नाशुकारी कुन्तीपुत्रो वृकोदरः ॥ ३८ ॥
समासाद्य सुशर्माणमश्वानस्य व्यपोथयत् ।
पृष्ठगोपांश्च तस्याथ हत्वा परमसायकैः ॥ ३ ९ ॥
अथास्य सारथिं क्रुद्धो रथोपस्थादपातयत् । राजन्! फिर तो शीघ्रता करनेवाले कुन्तीपुत्र भीमने सुशर्माके पास पहुँचकर उत्तम बाणोंसे उसके घोड़ोंको मार डाला । साथ ही उसके पृष्ठरक्षकोंको भी मारकर कुपित हो उसके सारथिको भी रथसे नीचे गिरा दिया ॥ ३८-३९ ३ ॥ चक्ररक्षश्च शूरो वै मदिराक्षोऽतिविश्रुतः ॥ ४० ॥
समायाद् विरथं दृष्ट्वा त्रिगर्तं प्राहरत् तदा । सुशर्माको रथहीन हुआ देखकर राजा विराटके चक्ररक्षक सुप्रसिद्ध वीर मदिराक्ष भी वहाँ आ पहुँचे और त्रिगर्तनरेशपर बाणोंसे प्रहार करने लगे ॥ ४० ३ ॥ ततो विराटः प्रस्कन्द्य रथादथ सुशर्मणः ॥ ४१ ॥
गदां तस्य परामृश्य तमेवाभ्यद्रवद् बली ।