02.Mahabharata Volume 2 — पृष्ठ 2411–2420
महाभारत — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 2411–2420
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सहायो घोषयात्रायां कस्तदाऽऽसीत् सखा मम ॥ ३६ ॥
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Gmmiy अर्जुनका शङ्खनाद तथा प्रतिभये तस्मिन् देवदानवसंकुले I
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खाण्डवे युध्यमानस्य कस्तदाऽऽसीत् सखा मम ॥ ३७ ॥
यह सुनकर अर्जुन खिलखिलाकर हँस पड़े और बोले— ' वीर! डरो मत! कौरवोंकी घोषयात्राके समय जब मैंने महाबली गन्धर्वोंके साथ युद्ध किया था, उस समय मेरा सखा या सहायक कौन था? जब देवताओं और दानवोंसे भरे हुए उस अत्यन्त भयंकर खाण्डववनमें मैं युद्ध कर रहा था, उस समय मेरा साथी कौन था? ॥ ३५–३७ ॥
निवातकवचैः सार्धं पौलोमैश्च महाबलैः ।
युध्यतो देवराजार्थे कः सहायस्तदाभवत् ॥ ३८ ॥
देवराज इन्द्रके लिये महाबली निवातकवच और पौलोम दैत्योंके साथ युद्ध करते समय मेरा कौन सहायक था? ॥ ३८ ॥
स्वयंवरेतु पाञ्चाल्या राजभिः सह संयुगे ।
युध्यतो बहुभिस्तात कः सहायस्तदाभवत् ॥ ३ ९ ॥
तात! द्रौपदीके स्वयंवरमें जब मुझे अनेक राजाओंके साथ युद्ध करना पड़ा था, उस समय किसने मेरी सहायता की थी? ॥ ३ ९ ॥
उपजीव्य गुरुं द्रोणं शक्रं वैश्रवणं यमम् ।
वरुणं पावकं चैव कृपं कृष्णं च माधवम् ॥ ४० ॥
पिनाकपाणिनं चैव कथमेतान् न योधये ।
रथं वाहय मे शीघ्रं व्येतु ते मानसो ज्वरः ॥ ४१ ॥
मैं गुरुवर द्रोणाचार्य, इन्द्र, कुबेर, यमराज, वरुण, अग्निदेव, कृपाचार्य, लक्ष्मीपति श्रीकृष्ण तथा पिनाकपाणि भगवान् शंकर – इन सबका आश्रय पा चुका हूँ; फिर भला, इन महारथियोंसे युद्ध क्यों नहीं कर सकूँगा? शीघ्र मेरा रथ हाँको; तुम्हारी मानसिक चिन्ता दूर हो जानी चाहिये ॥ इति श्रीमहाभारते विराटपर्वणि गोहरणपर्वणि उत्तरगोग्रहे उत्तरार्जुनयोर्वाक्यं नाम पञ्चचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४५ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत विराटपर्वके अन्तर्गत गोहरणपर्वमें उत्तरगोग्रहके अवसरपर विराटकुमार उत्तर और अर्जुनकी बातचीतविषयक पैंतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ४५ ॥
( दाक्षिणात्य अधिक पाठके ६ श्लोक मिलाकर कुल ४७ श्लोक हैं । )
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षट्चत्वारिंशोऽध्यायः उत्तरके रथपर अर्जुनको ध्वजकी प्राप्ति, अर्जुनका शंखनाद और द्रोणाचार्यका कौरवोंसे उत्पात - सूचक अपशकुनोंका वर्णन वैशम्पायन उवाच
उत्तरं सारथिं कृत्वा शमीं कृत्वा प्रदक्षिणम् ।
आयुधं सर्वमादाय प्रययौ पाण्डवर्षभः ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं -जनमेजय! उत्तरको सारथि बना शमी वृक्षकी परिक्रमा करके अपने सम्पूर्ण अस्त्र - शस्त्र लेकर पाण्डवश्रेष्ठ अर्जुन युद्धके लिये चले ॥ १ ॥
ध्वजं सिंहं रथात् तस्मादपनीय महारथः ।
प्रणिधाय शमीमूले प्रायादुत्तरसारथिः ॥ २ ॥
उन महारथी पार्थने उस रथपरसे सिंहचिह्नयुक्त ध्वजाको हटाकर शमीवृक्षके नीचे रख दिया और सारथि उत्तरके साथ प्रस्थान किया ॥ २ ॥
दैवीं मायां रथे युक्तां विहितां विश्वकर्मणा ।
काञ्चनं सिंहलाङ्गूलं ध्वजं वानरलक्षणम् ॥ ३ ॥
मनसा चिन्तयामास प्रसादं पावकस्य च ।
स च तच्चिन्तितं ज्ञात्वा ध्वजे भूतान्यदेशयत् ॥ ४ ॥
उस समय उन्होंने मन-ही- मन अग्निदेवके प्रसादस्वरूप प्राप्त हुए अपने सुवर्णमय ध्वजका चिन्तन किया, जिसपर मूर्तिमान् वानर उपलक्षित होता है और जिसकी लंबी पूँछ सिंहके समान है। वह ध्वज क्या था, विश्वकर्माकी बनायी हुई दैवी माया थी, जो रथमें संयुक्त हो जाती थी । अग्निदेवने अर्जुनका मनोभाव जानकर उस ध्वजपर स्थित रहनेके लिये भूतोंको आदेश दिया ॥
सपताकं विचित्राङ्गं सोपासङ्गं महाबलम् ।
खात् पपात रथे तूर्णं दिव्यरूपं मनोरमम् ॥ ५ ॥
तत्पश्चात् पताका तथा विचित्र अंग और उपांगोंसहित वह अतिशय शक्तिशाली दिव्यरूप मनोरम ध्वज तुरंत ही आकाशसे अर्जुनके रथपर आ गिरा ॥ ५ ॥
रथं तमागतं दृष्ट्वा दक्षिणं प्राकरोत् तदा ।
रथमास्थाय बीभत्सुः कौन्तेयः श्वेतवाहनः ॥ ६ ॥
बद्धगोधाङ्गुलित्राणः प्रगृहीतशरासनः ।
ततः प्रायादुदीचीं च कपिप्रवरकेतनः ॥ ७ ॥
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इस प्रकार उस ध्वजको रथपर आया हुआ देख श्वेत घोड़ोंवाले कुन्तीनन्दन अर्जुनने उस रथकी परिक्रमा की तथा उसके ऊपर बैठकर अपनी अंगुलियोंमें गोहके चमड़ेके बने हुए दस्ताने धारण किये । फिर कपिश्रेष्ठ हनुमान्जीसे उपलक्षित ध्वजाको फहराते हुए गाण्डीव धनुषके साथ उत्तर दिशाकी ओर प्रस्थान किया ॥ ६-७ ॥
स्वनवन्तं महाशङ्खं बलवानरिमर्दनः ।
प्राधमद् बलमास्थाय द्विषतां लोमहर्षणम् ॥ ८ ॥
उस समय शत्रुमर्दन महाबली अर्जुनने घोर शब्द करनेवाले अपने महान् शंखको खूब जोर लगाकर बजाया । जिसकी आवाज सुनकर शत्रुओंके रोंगटे खड़े हो गये ॥ ८ ॥
( शशाङ्करूपं बीभत्सुः प्राध्यापयदरिंदमः ।
शङ्खशब्दोऽस्य सोऽत्यर्थं श्रूयते कालमेघवत् ॥
तस्य शंखस्य शब्देन धनुषो निस्वनेन च ।
वानरस्य च नादेन रथनेमिस्वनेन च ॥
जङ्गमस्य भयं घोरमकरोत् पाकशासनिः । ) शत्रुदमन अर्जुनने जो महान् शंख फूँका था, वह चन्द्रमाके समान परम उज्ज्वल जान पड़ता था । उस शंखका जोर- जोरसे होनेवाला शब्द वर्षाकालके मेघकी गर्जनाके समान सुनायी देता था । शंखकी ध्वनि, धनुषकी टंकार, वानरकी गर्जना तथा रथके पहियोंकी घर्घराहटसे इन्द्रपुत्र अर्जुनने समस्त जंगम प्राणियोंके मनमें घोर भयका संचार कर दिया ।
ततस्ते जवना धुर्या जानुभ्यामगमन्महीम् ।
उत्तरश्चापि संत्रस्तो रथोपस्थ उपाविशत् ॥ ९ ॥
उस शंखध्वनिसे घबराकर रथके वेगशाली घोड़ोंने भी धरतीपर घुटने टेक दिये और उत्तर भी अत्यन्त भयभीत हो रथके ऊपरी भागमें जहाँ रथीका स्थान है, आ बैठा ॥ ९ ॥
संस्थाप्य चाश्वान् कौन्तेयः समुद्यम्य च रश्मिभिः ।
उत्तरं च परिष्वज्य समाश्वासयदर्जुनः ॥ १० ॥
तब कुन्तीनन्दन अर्जुनने स्वयं रास खींचकर घोड़ोंको खड़ा किया और उत्तरको हृदयसे लगाकर धीरज बँधाया ॥ १० ॥
अर्जुन उवाच
मा भैस्त्वं राजपुत्राग्रय क्षत्रियोऽसि परंतप ।
कथं तु पुरुषव्याघ्र शत्रुमध्ये विषीदसि ॥ ११ ॥
अर्जुनने कहा- शत्रुओंको संताप देनेवाले राजकुमारशिरोमणे! डरो मत, तुम क्षत्रिय हो । पुरुषसिंह! शत्रुओंके बीचमें आकर घबराते कैसे हो? ॥ ११ ॥
श्रुतास्ते शङ्खशब्दाश्च भेरीशब्दाश्च पुष्कलाः ।
कुञ्जराणां च नदतां व्यूढानीकेषु तिष्ठताम् ॥ १२ ॥
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तुमने बहुत बार शंख- ध्वनि सुनी होगी । रण- भेरियोंके भयंकर शब्द भी बहुत बार तुम्हारे कानोंमें पड़े होंगे और व्यूहबद्ध सेनाओंमें खड़े हुए चिग्घाड़नेवाले गजराजोंके शब्द भी तुमने सुने ही होंगे ॥ १२ ॥
स त्वं कथमिहानेन शङ्खशब्देन भीषितः ।
विवर्णरूपो वित्रस्तः पुरुषः प्राकृतो यथा ॥ १३ ॥
फिर यहाँ इस शंखनादसे तुम भयभीत कैसे हो गये? साधारण मनुष्योंके समान अधिक डर जानेके कारण तुम्हारे शरीरका रंग फीका कैसे पड़ गया? ॥ १३ ॥
उत्तर उवाच
श्रुता मे शङ्खशब्दाश्च भेरीशब्दाश्च पुष्कलाः ।
कुञ्जराणां निनदतां व्यूढानीकेषु तिष्ठताम् ॥ १४ ॥
उत्तरने कहा – वीरवर! इसमें संदेह नहीं कि मैंने बहुत बार शंखध्वनि सुनी है । रणभेरियोंके भयंकर शब्द भी बहुत बार मेरे कानोंमें पड़े हैं और व्यूहबद्ध सेनाओंमें खड़े हुए चिग्घाड़नेवाले गजराजोंके शब्द भी मैंने सुने हैं ॥ १४ ॥
नैवंविधः शङ्खशब्दः पुरा जातु मया श्रुतः ।
ध्वजस्य चापि रूपं मे दृष्टपूर्वं न हीदृशम् ॥ १५ ॥
परंतु आजके पहले कभी ऐसा भयंकर शंखनाद मेरे सुननेमें नहीं आया था और ध्वजका भी ऐसा रूप मैंने कभी नहीं देखा था ॥ १५ ॥
धनुषश्चैव निर्घोषः श्रुतपूर्वो न मे क्वचित् ।
अस्य शङ्खस्य शब्देन धनुषो निःस्वनेन च ॥ १६ ॥
अमानुषाणां शब्देन भूतानां ध्वजवासिनाम् ।
रथस्य च निनादेन मनो मुह्यति मे भृशम् ॥ १७ ॥
धनुषकी ऐसी टंकार भी पहले कभी मैंने नहीं सुनी थी । इस शंखके भयानक शब्दसे, धनुषकी अनुपम टंकारसे, ध्वजामें निवास करनेवाले मानवेतर प्राणियोंके घोर शब्दसे तथा रथकी भारी घर्घराहटसे भी डरकर मेरा हृदय बहुत व्याकुल हो उठा है ॥ १६-१७ ॥
व्याकुलाश्च दिशः सर्वा हृदयं व्यथतीव मे ।
ध्वजेन पिहिताः सर्वा दिशो न प्रतिभान्ति मे ॥ १८ ॥
सम्पूर्ण दिशाओंमें घबराहट छा गयी है तथा मेरे हृदयमें बड़ी व्यथा हो रही है, इस ध्वजने तो समस्त दिशाओंको ढँक लिया है । अतः मुझे किसी दिशाकी प्रतीति नहीं हो रही है ॥ १८ ॥
गाण्डीवस्य च शब्देन कर्णो मे बधिरीकृतौ ।
स मुहूर्तं प्रयातं तु पार्थो वैराटिमब्रवीत् ॥ १ ९ ॥
गाण्डीव धनुषकी टंकारसे तो मेरे दोनों कान बहरे हो गये हैं ।
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इस प्रकार दो घड़ीतक आगे बढ़नेपर अर्जुनने विराटकुमार उत्तरसे कहा— ॥ १९ ॥
अर्जुन उवाच
एकान्तं रथमास्थाय पद्भयां त्वमवपीडयन् ।
दृढं च रश्मीन् संयच्छ शङ्खं ध्मास्याम्यहं पुनः ॥ २० ॥
अर्जुन बोले- राजकुमार! अब तुम रथपर अच्छी तरह जमकर बैठ जाओ और अपनी टाँगोंसे बैठनेके स्थानको जकड़ लो । साथ ही घोड़ोंकी रासको दृढ़तापूर्वक पकड़े रहो । मैं फिर शंख बजाऊँगा ॥ २० ॥
वैशम्पायन उवाच ततः शङ्खमुपाध्मासीद् दारयन्निव पर्वतान् ।
गुहा गिरीणां च तदा दिशः शैलांस्तथैव च ।
उत्तरश्चापि संलीनो रथोपस्थ उपाविशत् ॥ २१ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं -जनमेजय! तब अर्जुनने इतने जोरसे शंख बजाया मानो वे पर्वतों, पर्वतीय गुफाओं, सम्पूर्ण दिशाओं और बड़ी - बड़ी चट्टानोंको भी विदीर्ण कर डालेंगे । उत्तर इस बार भी रथके भीतरी भागमें छिपकर बैठ गया ॥ २१ ॥
तस्य शङ्खस्य शब्देन रथनेमिस्वनेन च ।
गाण्डीवस्य च घोषेण पृथिवी समकम्पत ॥ २२ ॥
उस शंखके शब्दसे, रथनेमियोंकी घर्घराहटसे तथा गाण्डीव धनुषकी टंकारसे धरती काँप उठी ॥ २२ ॥
तं समाश्वासयामास पुनरेव धनंजयः ॥ २३ ॥
तदनन्तर अर्जुनने उत्तरको पुनः धीरज बँधाया ॥ २३ ॥
द्रोणउवाच
यथा रथस्य निर्घोषो यथा मेघ उदीर्यते ।
कम्पते च यथा भूमिर्नैषोऽन्यः सव्यसाचिनः ॥ २४ ॥
( यह शंख- ध्वनि सुनकर कौरवसेनामें ) द्रोणाचार्यने कहा – जैसी यह रथकी घर्घराहट सुनायी दे रही है, जिस तरह उससे मेघगर्जनाका - सा शब्द हो रहा है और उसीके कारण जिस प्रकार यह पृथ्वी काँपने लगी है, इनसे यह सूचित होता है कि यह आनेवाला योद्धा अर्जुनके सिवा दूसरा कोई नहीं है ॥ २४ ॥
शस्त्राणि न प्रकाशन्ते प्रहृष्यन्ति वाजिनः ।
अग्नयश्च न भासन्ते समिद्धास्तन्न शोभनम् ॥ २५ ॥
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अब हमारे शस्त्र चमक नहीं रहे हैं, घोड़े प्रसन्न नहीं जान पड़ते और अग्निहोत्रकी
अग्नियाँ भी प्रज्वलित एवं उद्दीप्त नहीं हो रही हैं । यह सब अशुभकी सूचना है ॥
प्रत्यादित्यं च नः सर्वे मृगा घोरप्रवादिनः ।
ध्वजेषु च निलीयन्ते वायसास्तन्न शोभनम् ॥ २६ ॥
हमारे सभी पशु सूर्यकी ओर दृष्टि करके भयंकर क्रन्दन करते हैं और रथोंकी
ध्वजाओंमें कौए छिप रहे हैं । यह भी शुभसूचक नहीं है ॥ २६ ॥
शकुनाश्चापसव्या नो वेदयन्ति महद् भयम् ॥ २७ ॥
गोमायुरेष सेनायां रुदन् मध्येन धावति ।
अनाहतश्च निष्क्रान्तो महद् वेदयते भयम् ॥ २८ ॥
ये पक्षी भी हमारे वामभागमें उड़कर महान् भयकी सूचना दे रहे हैं और यह गीदड़ बिना किसी आघातके हमारी सेनाके बीचसे निकलकर रोता हुआ भाग रहा है, यह भी महान् भयका विज्ञापन कर रहा है ॥ २७-२८ ॥
भवतां रोमकूपाणि प्रहृष्टान्युपलक्षये ।
ध्रुवं विनाशो युद्धेन क्षत्रियाणां प्रदृश्यते ॥ २९ ॥
कौरवो! मैं देखता हूँ, तुम्हारे रोंगटे खड़े हो गये हैं; अतः निश्चय ही, इस युद्धके द्वारा क्षत्रियोंका विनाश निकट दिखायी देता है ॥ २ ९ ॥ ज्योतींषि न प्रकाशन्ते दारुणा मृगपक्षिणः ।
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उत्पाता विविधा घोरा दृश्यन्ते क्षत्रनाशनाः ॥ ३० ॥
सूर्य आदिका प्रकाश मंद पड़ गया है । भयंकर मृग और पक्षी सामने आ रहे हैं और क्षत्रियोंके संहारकी सूचना देनेवाले अनेक प्रकारके घोर उत्पात दिखायी देते हैं ॥ ३० ॥
विशेषत इहास्माकं निमित्तानि विनाशने ।
उल्काभिश्च प्रदीप्ताभिर्बाध्यते पृतना तव ।
वाहनान्यप्रहृष्टानि रुदन्तीव विशाम्पते ॥ ३१ ॥
राजा दुर्योधन! विशेषतः यहीं हमारे लिये विनाश-सूचक अपशकुन हो रहे हैं । तुम्हारी सेनाके ऊपर जलती हुई उल्काएँ गिर-गिरकर उसे पीड़ा देती हैं । तुम्हारे वाहन ( हाथी - घोड़े ) अप्रसन्न तथा रोते - से दीखते हैं ॥ ३१ ॥
उपासते च सैन्यानि गृध्रास्तव समन्ततः ।
तप्स्यसे वाहिनीं दृष्ट्वा पार्थबाणप्रपीडिताम् ।
पराभूता च वः सेना न कश्चिद् योद्धुमिच्छति ॥ ३२ ॥
सेनाके चारों ओर गीध बैठ रहे हैं, इससे जान पड़ता है; तुम अपनी सेनाको अर्जुनके बाणोंसे पीड़ित होती देख मनमें संताप करोगे । तुम्हारी सेना अभीसे तिरस्कृत - सी हो रही है, कोई भी सैनिक युद्ध करना नहीं चाहता है ॥ ३२ ॥
विवर्णमुखभूयिष्ठाः सर्वे योधा विचेतसः ।
गाः सम्प्रस्थाप्य तिष्ठामो व्यूढानीका प्रहारिणः ॥ ३३ ॥
समस्त सैनिकोंके मुखपर भारी उदासी छा गयी है । सब अचेत – हतोत्साह हो रहे हैं । अतः हम गौओंको हस्तिनापुरकी ओर भेजकर सेनाकी व्यूहरचना करके शत्रुपर प्रहार करनेके लिये उद्यत हो जायँ ॥ ३३ ॥
इति श्रीमहाभारते विराटपर्वणि गोहरणपर्वणि उत्तरगोग्रहे औत्पातिको नाम षट्चत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४६ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत विराटपर्वके अन्तर्गत गोहरणपर्वमें उत्तरगोग्रहके अवसरपर उत्पातसूचक अपशकुनसम्बन्धीछियालीसवाँअध्याय पूरा हुआ ॥ ४६ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके २ श्लोक मिलाकर कुल ३५३ श्लोक हैं । )
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सप्तचत्वारिंशोऽध्यायः दुर्योधनके द्वारा युद्धका निश्चय तथा कर्णकी उक्ति वैशम्पायन उवाच
अथ दुर्योधनो राजा समरे भीष्ममब्रवीत् ।
द्रोणं च रथशार्दूलं कृपं च सुमहारथम् ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! तदनन्तर राजा दुर्योधनने समरभूमिमें भीष्म, रथियोंमें श्रेष्ठ द्रोण और महारथी कृपाचार्यसे कहा— ॥ १ ॥
उक्तोऽयमर्थ आचार्यौ मया कर्णेन चासकृत् ।
पुनरेव प्रवक्ष्यामि न हि तृप्यामि तं ब्रुवन् ॥ २ ॥
‘ आचार्यो! मैंने और कर्णने यह बात आपलोगोंसे कई बार कही है और फिर उसीको दुहराता हूँ; क्योंकि उसे बार- बार कहकर भी मुझे तृप्ति नहीं होती ॥ २ ॥
पराभूतैर्हि वस्तव्यं तैश्च द्वादश वत्सरान् ।
वने जनपदे ज्ञातैरेष एव पणो हि नः ॥ ३ ॥
'जूआ खेलते समय हमलोगोंकी यही शर्त थी कि हममेंसे जो हारेंगे, उन्हें बारह वर्षोंतक किसी वनमें प्रकटरूपसे और एक वर्षतक किसी नगरमें अज्ञात- भावसे निवास करना पड़ेगा ॥ ३ ॥
तेषां न तावन्निर्वृत्तं वर्तते तु त्रयोदशम् ।
अज्ञातवासो बीभत्सुरथास्माभिः समागतः ॥ ४ ॥
अभी पाण्डवोंका तेरहवाँ वर्ष पूरा नहीं हुआ है, तो भी अज्ञातवासमें रहनेवाला अर्जुन आज प्रकटरूपसे हमारे साथ युद्ध करने आ रहा है ॥ ४ ॥
अनिवृत्ते तु निर्वासे यदि बीभत्सुरागतः ।
पुनर्द्वादश वर्षाणि वने वत्स्यन्ति पाण्डवाः ॥ ५ ॥
‘ यदि अज्ञातवास पूर्ण होनेके पहले ही अर्जुन आ गया है, तो पाण्डव फिर बारह वर्षों तक वनमें निवास करेंगे ॥
लोभाद् वा ते न जानीयुरस्मान् वा मोह आविशत् ।
हीनातिरिक्तमेतेषां भीष्मो वेदितुमर्हति ॥ ६ ॥
‘ वे राज्यके लोभसे अपनी प्रतिज्ञाको स्मरण नहीं रख सके हैं या हमलोगोंमें ही मोह ( प्रमाद ) आ गया है । इनके तेरहवें वर्षमें अभी कुछ कमी है या अधिक दिन बीत गये हैं; यह भीष्मजी जान सकते हैं ॥ ६ ॥
अर्थानां च पुनर्द्वैधे नित्यं भवति संशयः ।
अन्यथा चिन्तितो ह्यर्थः पुनर्भवति सोऽन्यथा ॥ ७ ॥