02.Mahabharata Volume 2 — पृष्ठ 2521–2530
महाभारत — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 2521–2530
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जनमेजय! चित्रसेनके ऐसा कहनेपर देवराज इन्द्रने दिव्य पुष्पोंकी वर्षा करके अर्जुन और भीष्मके इस अद्भुत संग्रामके प्रति आदर प्रकट किया ॥ ४४ ॥
ततः शान्तनवो भीष्मो वामं पार्श्वमताडयत् ।
पश्यतः प्रतिसंधाय विध्यतः सव्यसाचिनः ॥ ४५ ॥
तदनन्तर शान्तनुनन्दन भीष्मने ( कौरवसेनाको) घायल करनेवाले सव्यसाची अर्जुनके देखते -देखते बाणसंधान करके उनका बायाँ पार्श्व बींध डाला ॥ ४५ ॥
ततः प्रहस्य बीभत्सुः पृथुधारेण कार्मुकम् ।
चिच्छेद गार्ध्रपत्रेण भीष्मस्यादित्यतेजसः ॥ ४६ ॥
तब अर्जुनने भी हँसकर मोटी धार एवं गीधकी पाँखवाले बाणसे सूर्यके समान तेजस्वी भीष्मका धनुष फिर काट दिया ॥ ४६ ॥
अथैनं दशभिर्बाणैः प्रत्यविध्यत् स्तनान्तरे ।
यतमानं पराक्रान्तं कुन्तीपुत्रो धनंजयः ॥ ४७ ॥
तत्पश्चात् कुन्तीपुत्र धनंजयने विजयके लिये प्रयत्नशील पराक्रमी भीष्मकी छातीमें दस बाण मारकर गहरी चोट पहुँचायी ॥ ४७ ॥
स पीडितो महाबाहुर्गृहीत्वा रथकूबरम् ।
गाङ्गेयो युद्धदुर्धर्षस्तस्थौ दीर्घमिवान्तरम् ॥ ४८ ॥
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उससे पीड़ित हो रणदुर्धर्ष वीर महाबाहु भीष्म रथका कूबर पकड़कर बहुत देरतक निश्चेष्ट बैठे रह गये ॥
तं विसंज्ञमपोवाह संयन्ता रथवाजिनाम् ।
उपदेशमनुस्मृत्य रक्षमाणो महारथम् ॥ ४ ९ ॥
वे बेहोश थे । ‘ ऐसी दशामें सारथिको रथीकी रक्षा करनी चाहिये ' इस उपदेशका स्मरण करके महारथी भीष्मकी प्राणरक्षाके उद्देश्यसे उनके रथ और घोड़ोंको काबूमें रखनेवाला सारथि उन्हें संग्रामभूमिसे दूर हटा ले गया ॥ ४ ९ ॥ इति श्रीमहाभारते विराटपर्वणि गोहरणपर्वणि भीष्मापयाने चतुःषष्टितमोऽध्यायः ॥ ६४ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत विराटपर्वके अन्तर्गत गोहरणपर्वमें भीष्मके रणभूमिसे हटाये जानेसे सम्बन्ध रखनेवाला चौंसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ६४ ॥
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पञ्चषष्टितमोऽध्यायः अर्जुन और दुर्योधनका युद्ध, विकर्ण आदि योद्धाओंसहित दुर्योधनका युद्धके मैदानसे भागना वैशम्पायन उवाच भीष्मे तु संग्रामशिरो विहाय पलायमाने धृतराष्ट्रपुत्रः । उत्सृज्य केतुं विनदन् महात्मा धनुर्विगृह्यार्जुनमाससाद ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! जब भीष्मजी युद्धका मुहाना छोड़कर दूर हट गये, तब धृतराष्ट्र- पुत्र महामना दुर्योधन अपने रथकी पताका फहराकर हाथमें धनुष ले सिंहनाद करता हुआ अर्जुनपर चढ़ आया ॥ १ ॥
स भीमधन्वानमुदग्रवीर्यं धनंजयं शत्रुगणे चरन्तम् । आकर्णपूर्णायतचोदितेन विव्याध भल्लेन ललाटमध्ये ॥ २ ॥
उस समय भयंकर धनुष धारण करनेवाले प्रचण्ड पराक्रमी धनंजय शत्रुसेनामें विचर रहे थे । दुर्योधनने धनुषको कानतक खींचकर छोड़े हुए भल्ल नामक बाणसे उनके ललाटमें गहरी चोट पहुँचायी ॥ २ ॥
स तेन बाणेन समर्पितेन जाम्बूनदाग्रेण सुसंहितेन । रराज राजन् महनीयकर्मा यथैकपर्वा रुचिरैकशृङ्गः ॥ ३ ॥
वह बाण अर्जुनके ललाटमें धँस गया । राजन्! प्रशंसनीय पराक्रमवाले अर्जुन सुनहरी धारवाले उस धँसे हुए बाणके द्वारा उसी प्रकार सुशोभित हुए, जैसे एक सुन्दर शिखरवाला पर्वत अपने ऊपर उगे हुए एक ही बाँसके पेड़से शोभा पा रहा हो ॥ ३ ॥
अथास्य बाणेन विदारितस्य प्रादुर्बभूवासृगजस्रमुष्णम् । स तस्य जाम्बूनदपुङ्खचित्रो भित्त्वा ललाटं सुविराजते स्म ॥ ४ ॥
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दुर्योधनके उस बाणसे अर्जुनका ललाट विदीर्ण हो गया और उससे गरम- गरम रक्तकी अविच्छिन्न धारा बहने लगी । जाम्बूनद सुवर्णकी पाँखवाला वह विचित्र बाण पार्थका ललाट छेदकर बड़ी शोभा पा रहा था ॥ ४ ॥
दुर्योधनश्चापि तमुग्रतेजाः पार्थश्च दुर्योधनमेकवीरः । अन्योन्यमाजी पुरुषप्रवीरौ समौ समाजग्मतुराजमीढौ ॥ ५ ॥
तदनन्तर उग्रतेजस्वी अद्वितीय वीर अर्जुनने दुर्योधनपर और दुर्योधनने अर्जुनपर आक्रमण किया । अजमीढवंशके वे दोनों प्रमुख वीर पुरुष एक समान पराक्रमी थे । उन्होंने संग्राममें एक- दूसरेपर बड़े वेगसे धावा किया ॥ ५ ॥
ततः प्रभिन्नेन महागजेन महीधराभेन पुनर्विकर्णः । रथैश्चतुर्भिर्गजपादरक्षैः कुन्तीसुतं जिष्णुमथाभ्यधावत् ॥ ६ ॥
उसी समय एक पर्वताकार विशाल गजराजपर, जिसके मस्तकसे मद टपक रहा था, चढ़कर विकर्ण पुनः विजयशाली कुन्तीनन्दन अर्जुनपर चढ़ आया । उसके साथ चार रथारोही योद्धा भी थे, जो हाथीके चारों पैरोंकी रक्षा करते थे ॥ ६ ॥
तमापतन्तं त्वरितं गजेन्द्रं धनंजयः कुम्भविभागमध्ये । आकर्णपूर्णेन महायसेन बाणेन विव्याध महाजवेन ॥ ७ ॥
गजराजको तीव्र गतिसे अपनी ओर आते देख धनंजयने धनुषको कानतक खींचकर चलाये हुए लोहेके अत्यन्त वेगशाली बाणद्वारा उसके कुम्भस्थलको बींध डाला ॥ ७ ॥
पार्थेन सृष्टः स तु गार्ध्रपत्र आपुङ्खदेशात् प्रविवेश नागम् । विदार्य शैलप्रवरं प्रकाशं यथाशनिः पर्वतमिन्द्रसृष्टः ॥ ८ ॥
पार्थका छोड़ा हुआ वह गीध पक्षीके परोंवाला बाण उस हाथीके मस्तकमें पंखसहित घुस गया; मानो इन्द्रका चलाया हुआ वज्र किसी प्रकाशपूर्ण गिरिराजको विदीर्ण करके उसके भीतर समा गया हो ॥ ८ ॥
शरप्रतप्तः स तु नागराजः प्रवेपिताङ्गो व्यथितान्तरात्मा । संसीदमानो निपपात मह्यां
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वज्राहतं शृङ्गमिवाचलस्य ॥ ९ ॥
वह गजराज अर्जुनके बाणसे संतप्त हो उठा। उसकी अन्तरात्मा व्यथित हो गयी और सारा शरीर काँपने लगा। जैसे वज्रका मारा हुआ पर्वतशिखर ढह जाता है, उसी प्रकार वह नागराज शिथिल होकर पृथ्वीपर गिर पड़ा ॥ ९ ॥
निपातिते दन्तिवरे पृथिव्यां त्रासाद् विकर्णः सहसावतीर्य । तूर्णं पदान्यष्टशतानि गत्वा विविंशतेः स्यन्दनमारुरोह ॥ १० ॥
उस विशाल हाथीके धराशायी हो जानेपर विकर्ण बहुत डर गया और सहसा कूदकर शीघ्रतापूर्वक भाग गया और आठ सौ पग चलकर विविंशतिके रथपर चढ़ गया ॥ १० ॥
निहत्य नागं तु शरेण तेन वज्रोपमेनाद्रिवराम्बुदाभम् । तथाविधेनैव शरेण पार्थो दुर्योधनं वक्षसि निर्बिभेद ॥ ११ ॥
उस वज्रसदृश बाणद्वारा पर्वत तथा मेघोंकी घटाके समान प्रतीत होनेवाले गजराजको मारकर पार्थने वैसे ही दूसरे बाणसे दुर्योधनकी छाती छेद डाली ॥ ११ ॥
ततो गजे राजनि चैव भिन्ने
भग्ने विकर्णे च सपादरक्षे ।
गाण्डीवमुक्तैर्विशिखैः प्रणुन्ना- स्ते योधमुख्याः सहसापजग्मुः ॥ १२ ॥
इस प्रकार गजराज और कुरुराज दोनोंके घायल होने तथा गजराजके पादरक्षकोंसहित विकर्णके भाग जानेपर गाण्डीव धनुषसे छूटे हुए सायकोंकी मार खाकर पीड़ित हुए समस्त मुख्य - मुख्य योद्धा सहसा मैदान छोड़कर भाग गये ॥ १२ ॥
दृष्ट्वैव पार्थेन हतं च नागं योधांश्च सर्वान् द्रवतो निशम्य । रथं समावृत्य कुरुप्रवीरो रणात् प्रदुद्राव यतो न पार्थः ॥ १३ ॥
अर्जुनके हाथसे गजराज मारा गया और सम्पूर्ण योद्धा भी रणभूमि छोड़कर भाग रहे हैं, यह देखकर कुरुवंशका प्रमुख वीर दुर्योधन भी, जिस ओर अर्जुन नहीं थे, उसी दिशामें रथ घुमाकर भागा ॥ १३ ॥
तं भीमरूपं त्वरितं द्रवन्तं दुर्योधनं शत्रुसहोऽभिषङ्गात् । प्रास्फोटयद् योद्धुमनाः किरीटी
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बाणेन विद्धं रुधिरं वमन्तम् ॥ १४ ॥
उस समय दुर्योधनका रूप भयंकर हो रहा था । वह हार खाकर बाणसे घायल हो रक्त वमन करता हुआ भागा जा रहा था । यह देखकर शत्रुका वेग सहन करनेवाले किरीटधारी अर्जुनने ताल ठोंकी और मनमें युद्धके लिये उत्साह रखते हुए वे शत्रुको ललकारने लगे ॥ १४ ॥
अर्जुनउवाच विहाय कीर्ति विपुलं यशश्च युद्धात् परावृत्य पलायसे किम् । न तेऽद्य तूर्याणि समाहतानि तथैव राज्यादवरोपितस्य ॥ १५ ॥
युधिष्ठिरस्यास्मि निदेशकारी पार्थस्तृतीयो युधि संस्थितीऽस्मि । तदर्थमावृत्य मुखं प्रयच्छ नरेन्द्रवृत्तं स्मर धार्तराष्ट्र ॥ १६ ॥
अर्जुन बोले - धृतराष्ट्रके पुत्र! तू युद्धसे पीठ दिखाकर क्यों भागा जा रहा है? अरे! ऐसा करके तू अपनी कीर्ति और विशाल यशसे हाथ धो बैठा है । आज तेरे विजयके बाजे पहले - जैसे नहीं बज रहे हैं । तूने जिन्हें राज्यसे उतार दिया है, उन्हीं महाराज युधिष्ठिरका आज्ञाकारी मैं तीसरा पाण्डव युद्धके लिये खड़ा हूँ। अतः तू मेरा सामना करनेके लिये लौटकर अपना मुँह तो दिखा । राजाका आचार- व्यवहार कैसा होना चाहिये, इसकी याद तो कर ले ॥ १५-१६ ॥ मोघं तवेदं भुवि नामधेयं दुर्योधनेतीह कृतं पुरस्तात् । न ही दुर्योधनता तवास्ति पलायमानस्य रणं विहाय ॥ १७ ॥
व्यर्थ ही इस पृथ्वीपर तेरा नाम दुर्योधन रखा गया । तू तो युद्ध छोड़कर भागा जा रहा है; अतः यहाँ तुझमें दुर्योधन नामके अनुरूप कोई गुण नहीं है ॥ १७ ॥
न ते पुरस्तादथ पृष्ठतो वा पश्यामि दुर्योधन रक्षितारम् । अपेहि युद्धात् पुरुषप्रवीर प्राणान् प्रियान् पाण्डवतोऽद्य रक्ष ॥ १८ ॥
दुर्योधन! अच्छा, तेरे आगे या पीछे कोई रक्षक नहीं दिखायी देता। अतः वीर पुरुष! तू युद्धसे भाग जा और पाण्डुपुत्र अर्जुनके हाथसे आज अपने प्यारे प्राणोंकी रक्षा कर
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ले ॥ १८ ॥
इति श्रीमहाभारते विराटपर्वणि गोहरणपर्वणि दुर्योधनापयाने पञ्चषष्टितमोऽध्यायः ॥ ६५ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत विराटपर्वके अन्तर्गत गोहरणपर्वमें दुर्योधनका युद्धसे पलायनविषयक पैंसठवाँअध्याय पूरा हुआ ॥ ६५ ॥
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षट्षष्टितमोऽध्यायः अर्जुनके द्वारा समस्त कौरवदलकी पराजय तथा कौरवोंका स्वदेशको प्रस्थान वैशम्पायन उवाच आहूयमानश्च स तेन संख्ये महात्मना वै धृतराष्ट्रपुत्रः । निवर्तितस्तस्य गिराङ्कुशेन महागजो मत्त इवाङ्कुशेन ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! महात्मा अर्जुनने जब इस प्रकार युद्धके लिये ललकारा, तब धृतराष्ट्रपुत्र दुर्योधन अंकुशकी चोट खाये हुए मतवाले गजराजकी भाँति उनके कटुवचनरूपी अंकुशसे पीड़ित हो पुनः लौट पड़ा ॥ १ ॥
सोऽमृष्यमाणो वचसाभिमृष्टो महारथेनातिरथस्तरस्वी । पर्याववर्ताथ रथेन वीरो भोगी यथा पादतलाभिमृष्टः ॥ २ ॥
महारथी कुन्तीकुमारने अपने वचनोंद्वारा उसका तिरस्कार किया था; अतः वह वेगशाली अतिरथी वीर इस अपमानको न सह सका, अतएव जैसे पैरोंसे कुचला हुआ सर्प बदला लेनेके लिये लौट पड़ता है, उसी प्रकार दुर्योधन अपने रथके साथ लौट आया ॥ २ ॥
तं प्रेक्ष्य कर्णः परिवर्तमानं निवर्त्य संस्तभ्य च विद्धगात्रम् । दुर्योधनस्योत्तरतोऽभ्यगच्छत् पार्थं नृवीरो युधि हेममाली ॥ ३ ॥
उसको लौटते देख कर्ण भी अपने घायल शरीरको किसी प्रकार सँभालकर लौट पड़ा और दुर्योधनके उत्तर ( वाम ) -भागमें रहकर युद्धभूमिमें पार्थका सामना करनेके लिये चला । नरवीर कर्ण सोनेकी मालासे अलंकृत था ॥ ३ ॥
भीष्मस्ततः शान्तनवो विवृत्य हिरण्यकक्षस्त्वरयाभिषङ्गी । दुर्योधनं पश्चिमतोऽभ्यरक्षत् पार्थान्महाबाहुरधिज्यधन्वा ॥ ४ ॥
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तदनन्तर सुनहरे रंगकी चादर ओढ़े शान्तनुनन्दन भीष्म भी बड़े वेगसे रथ घुमाकर वहाँ आ पहुँचे । वे शत्रुको पराजित करनेमें समर्थ थे । महाबाहु भीष्म धनुषकी प्रत्यंचा चढ़ाकर पश्चिम या पीछेकी ओरसे पार्थके आक्रमणोंसे दुर्योधनकी रक्षा करने लगे ॥ ४ ॥
द्रोणः कृपश्चैव विविंशतिश्च दुःशासनश्चैव विवृत्य शीघ्रम् । सर्वे पुरस्ताद् विततोरुचापा दुर्योधनार्थं त्वरिताऽभ्युपेयुः ॥ ५ ॥
तत्पश्चात् द्रोण, कृपाचार्य, विविंशति और दुःशासन भी शीघ्र ही घूमकर आ गये । वे सब अपने विशाल धनुषको ताने हुए पूर्व या सामनेकी ओरसे दुर्योधनकी रक्षाके लिये बड़ी उतावलीके साथ आये थे ॥ ५ ॥
स तान्यनीकानि निवर्तमाना- न्यालोक्य पूर्णांघनिभानि पार्थः । हंसो यथा मेघमिवापतन्तं धनंजयः प्रत्यतपत् तरस्वी ॥ ६ ॥
जैसे सूर्य घिरती हुई मेघोंकी घटाको अपनी किरणोंसे तपाता है, उसी प्रकार वेगशाली कुन्तीपुत्र धनंजयने भारी जलप्रवाहके समान लौटती हुई उन कौरवसेनाओंको देखकर उन्हें संताप देना आरम्भ किया ॥ ६ ॥
ते सर्वतः सम्परिवार्य पार्थ-
मस्त्राणि दिव्यानि समाददानाः ।
ववर्षुरभ्येत्य शरैः समन्ता- न्मेघा यथा भूधरमम्बुवर्गैः ॥ ७ ॥
दिव्य अस्त्र धारण किये हुए उन योद्धाओंने अर्जुनको चारों ओरसे घेर लिया और जैसे बादल पहाड़के ऊपर सब ओरसे पानी बरसाते हैं, उसी प्रकार वे निकट आकर उनपर बाणोंकी वर्षा करने लगे ॥ ७ ॥
ततोऽस्त्रमस्त्रेण निवार्य तेषां गाण्डीवधन्वा कुरुपुङ्गवानाम् । सम्मोहनं शत्रुसहोऽन्यदस्त्रं प्रादुश्चकारैन्द्रिरपारणीयम् ॥ ८ ॥
तब शत्रुओंका वेग सहन करनेवाले इन्द्रपुत्र गाण्डीवधारी अर्जुनने अपने अस्त्रसे कौरवदलके उन श्रेष्ठ वीरोंके अस्त्रोंका निवारण करके सम्मोहन नामक दूसरा अस्त्र प्रकट किया, जिसका निवारण करना किसीके लिये भी असम्भव था ॥ ८ ॥
ततो दिशश्चानुदिशो विवृत्य शरैः सुधारैर्निशितैः सुपत्रैः ।
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गाण्डीवघोषेण मनांसि तेषां महाबलः प्रव्यथयाञ्चकार ॥ ९ ॥
फिर तो उन महाबलीने सुन्दर पंख और पैनी धारवाले बाणोंद्वारा सम्पूर्ण दिशाओं और दिक्कोणोंको आच्छादित करके गाण्डीव धनुषकी ( भयंकर ) टंकारसे कौरवयोद्धाओंके हृदयमें बड़ी व्यथा उत्पन्न कर दी ॥ ९ ॥
ततः पुनर्भीमरवं प्रगृह्य दोर्भ्यां महाशङ्खमुदारघोषम् । व्यनादयत् स प्रदिशो दिशः खं भुवं च पार्थो द्विषतां निहन्ता ॥ १० ॥
तत्पश्चात् शत्रुहन्ता कुन्तीकुमारने भयंकर शब्द करनेवाले अपने महाशंखको, जिसकी आवाज बहुत दूरतक सुनायी पड़ती थी, दोनों हाथोंसे थामकर बजाया । उसकी ध्वनि सम्पूर्ण दिशाओं - विदिशाओं, आकाश तथा पृथ्वीमें सब ओर गूँज उठी ॥ १० ॥
ते शङ्खनादेन कुरुप्रवीराः सम्मोहिताः पार्थसमीरितेन । उत्सृज्य चापानि दुरासदानि सर्वे तदा शान्तिपरा बभूवुः ॥ ११ ॥
अर्जुनके बजाये हुए उस शंखकी आवाजसे वे समस्त कौरव वीर मोहित ( मूर्च्छित) हो गये और अपने दुर्लभ धनुषोंको त्यागकर सब- के - सब गहरी शान्ति ( बेहोशी ) -में डूब गये ॥ ११ ॥
तथा विसंज्ञेषु च तेषु पार्थः
स्मृत्वा च वाक्यानि तथोत्तरायाः ।
निर्याहि मध्यादिति मत्स्यपुत्र- मुवाच यावत् कुरवो विसंज्ञाः ॥ १२ ॥
आचार्यशारद्वतयोः सुशुक्ले कर्णस्य पीतं रुचिरं च वस्त्रम् । द्रौणेश्च राज्ञश्च तथैव नीले वस्त्रे समादत्स्व नरप्रवीर ॥ १३ ॥
उन कौरव महारथियोंके अचेत हो जानेपर अर्जुनको उत्तराकी कही हुई बातें स्मरण हो आयीं और उन्होंने मत्स्यनरेशके पुत्र उत्तरसे कहा – ' नरवीर! ये कौरव अभी बेहोश पड़े हुए हैं । ये जबतक होशमें आवें, उसके पहले ही सेनाके बीचसे निकल जाओ । आचार्य द्रोण और कृपाचार्यके शरीरपर जो श्वेत वस्त्र सुशोभित हैं, कर्णके अंगोंपर जो सुन्दर पीले रंगका वस्त्र है, अश्वत्थामा तथा राजा दुर्योधनके शरीरपर जो नीले रंगके कपड़े हैं, उन सबको उतार लो ॥ १२-१३ ॥