02.Mahabharata Volume 2 — पृष्ठ 2531–2540
महाभारत — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 2531–2540
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भीष्मस्य संज्ञां तु तथैव मन्ये
जानाति सोऽस्त्रप्रतिघातमेषः ।
एतस्य वाहान् कुरु सव्यतस्त्व- मेवं हि यातव्यममूढसंज्ञैः ॥ १४ ॥
‘ मैं समझता हूँ, पितामह भीष्मको होश बना हुआ है; क्योंकि वे इस सम्मोहन अस्त्रको निवारण करनेकी विधि जानते हैं । उनके घोड़ोंको बाँयीं ओर छोड़कर जाना; क्योंकि जिनकी चेतना लुप्त नहीं हुई है, ऐसे वीरोंके निकटसे जाना हो, तो इसी प्रकार जाना चाहिये ' ॥ १४ ॥
रश्मीन् समुत्सृज्य ततो महात्मा रथादवप्लुत्य विराटपुत्रः । वस्त्राण्युपादाय महारथानां तूर्णं पुनः स्वं रथमारुरोह ॥ १५ ॥
तब महामना विराटपुत्र घोड़ोंकी रास छोड़कर रथसे कूद पड़ा और उन महारथियोंके कपड़े लेकर फिर शीघ्र ही अपने रथपर चढ़ आया ॥ १५ ॥
ततोऽन्वशासच्चतुरः सदश्वान् पुत्रो विराटस्य हिरण्यकक्षान् । ते तद् व्यतीयुर्ध्वजिनामनीकं श्वेता वहन्तोऽर्जुनमाजिमध्यात् ॥ १६ ॥
तत्पश्चात् विराटकुमारने सोनेके साज- सामानसे सुशोभित उन चारों सुन्दर घोड़ोंको हाँक दिया । वे श्वेत घोड़े अर्जुनको रथमें लिये हुए रणभूमिके मध्यभागसे निकले और रथारोहियोंकी ध्वजायुक्त सेनाका घेरा पार करके बाहर पहुँच गये ॥ १६ ॥
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तथानुयान्तं पुरुषप्रवीरं भीष्मः शरैरभ्यहनत् तरस्वी । स चापि भीष्मस्य हयान् निहत्य विव्याध पार्थो दशभिः पृषत्कैः ॥ १७ ॥
मनुष्योंमें प्रधान वीर अर्जुनको इस प्रकार जाते देख वेगशाली भीष्मने बाण मारकर उन्हें घायल कर दिया । तब अर्जुनने भी भीष्मके घोड़ोंको मारकर दस बाणोंसे उन्हें भी घायल कर दिया ॥ १७ ॥
ततोऽर्जुनो भीष्ममपास्य युद्धे
विद्ध्वास्य यन्तारमरिष्टधन्वा ।
तस्थौ विमुक्तो रथवृन्दमध्या- मेघं विदार्येव सहस्ररश्मिः ॥ १८ ॥
दुर्भेद्य धनुषवाले अर्जुन भीष्मको युद्धभूमिमें छोड़कर और उनके सारथिको बाणोंसे बींधकर रथोंके घेरेसे बाहर जा खड़े हुए । उस समय वे बादलोंको छिन्न-भिन्न करके प्रकाशित होनेवाले सूर्यदेवकी भाँति शोभा पा रहे थे ॥ १८ ॥
लब्ध्वा हि संज्ञां तु कुरुप्रवीराः पार्थं निरीक्ष्याथ सुरेन्द्रकल्पम् । रणे विमुक्तं स्थितमेकमाजौ
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स धार्तराष्ट्रस्त्वरितं बभाषे ॥ १ ९ ॥ थोड़ी देर बाद होशमें आकर कौरववीरोंने देखा, देवराज इन्द्रके समान पराक्रमी कुन्तीपुत्र अर्जुन युद्धमें रथोंके घेरेसे बाहर हो अकेले खड़े हैं । उन्हें इस अवस्थामें देखकर धृतराष्ट्रपुत्र दुर्योधन तुरंत बोल उठा – ॥ १ ९ ॥ अयं कथं वै भवतो विमुक्त- स्तथा प्रमथ्नीत यथा न मुच्येत् । तमब्रवीच्छान्तनवः प्रहस्य क्व ते गता बुद्धिरभूत् क्व वीर्यम् ॥ २० ॥
शान्तिं परां प्राप्य यदा स्थितोऽभू- रुत्सृज्य बाणांश्च धनुर्विचित्रम् । ‘ पितामह! यह आपके हाथसे कैसे बच गया? आप इसे इस प्रकार मथ डालिये, जिससे यह छूटने न पावे । ' तब शान्तनुनन्दन भीष्मने हँसकर दुर्योधनसे कहा— ‘ राजन्! जब तू अपने विचित्र धनुष और बाणोंको त्यागकर यहाँ गहरी शान्तिमें डूबा हुआ अचेत पड़ा था, उस समय तेरी बुद्धि कहाँ गयी थी? और पराक्रम कहाँ था? ॥ २० ॥
न त्वेष बीभत्सुरलं नृशंसं कर्तुं न पापेऽस्य मनो विशिष्टम् ॥ २१ ॥
त्रैलोक्यहेतोर्न जहेत् स्वधर्मं सर्वे न तस्मान्निहता रणेऽस्मिन् । क्षिप्रं कुरून् याहि कुरुप्रवीर विजित्य गाश्च प्रतियातु पार्थः । मा ते स्वकोऽर्थो निपतेत मोहात् तत् संविधातव्यमरिष्टबन्धम् ॥ २२ ॥
' ये अर्जुन कभी निर्दयताका व्यवहार नहीं कर सकते । इनका मन कभी पापाचारमें प्रवृत्त नहीं होता । ये त्रिलोकीके राज्यके लिये भी अपना धर्म नहीं छोड़ सकते । यही कारण है कि इन्होंने इस युद्धमें हम सबके प्राण नहीं लिये । कुरुकुलके प्रमुख वीर! अब तू शीघ्र ही कुरुदेशको लौट चल । अर्जुन भी गायोंको जीतकर लौट जायँ । अब मोहवश तेरा अपना स्वार्थ भी नष्ट न हो जाय, इसका ध्यान रख । सबको वही काम करना चाहिये, जिससे अपना कल्याण हो ' ॥ २१-२२ ॥ वैशम्पायन उवाच दुर्योधनस्तस्य तु तन्निशम्य पितामहस्यात्महितं वचोऽथ । अतीतकामो युधि सोऽत्यमर्षी
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राजा विनिःश्वस्य बभूव तूष्णीम् ॥ २३ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! पितामहके ये अपने लिये हितकर वचन सुनकर राजा दुर्योधनके मनमें युद्धकी इच्छा नहीं रह गयी । वह भीतर ही भीतर अत्यन्त अमर्षका भार लिये लंबी साँसें भरता हुआ चुप हो गया ॥ २३ ॥
तद् भीष्मवाक्यं हितमीक्ष्य सर्वे
धनंजयाग्निं च विवर्धमानम् ।
निवर्तनायैव मनो निदध्यु- दुर्योधनं ते परिरक्षमाणाः ॥ २४ ॥
अन्य सब योद्धाओंको भी भीष्मजीका वह कथन हितकर जान पड़ा; क्योंकि युद्ध करनेसे तो धनंजयरूपी अग्नि उत्तरोत्तर बढ़कर प्रचण्ड रूप ही धारण करती जाती, यह सब सोचकर उन सबने दुर्योधनकी रक्षा करते हुए अपने देशको लौट जानेका ही निश्चय किया ॥ २४ ॥
तान् प्रस्थितान् प्रीतमनाः स पार्थो धनंजयः प्रेक्ष्य कुरुप्रवीरान् । अभाषमाणोऽनुनयं मुहूर्त वचोऽब्रवीत् सम्परिहृत्य भूयः ॥ २५ ॥
पितामहं शान्तनवं च वृद्धं द्रोणं गुरुं च प्रणिपत्य मूर्ध्ना । उन कौरववीरोंको वहाँसे प्रस्थान करते देख कुन्तीपुत्र धनंजय मन- ही- मन बड़े प्रसन्न हुए। वे दो घड़ीतक किसीसे अनुनय -विनयपूर्ण वचन न कहकर मौन रहे । फिर लौटकर उन्होंने वृद्ध पितामह भीष्म और गुरु द्रोणाचार्यके चरणोंमें मस्तक झुकाकर प्रणाम किया और कुछ बातचीत भी की ॥ २५ ॥
द्रौणिं कृपं चैव कुरूंश्च मान्या- ञ्छरैर्विचित्रैरभिवाद्य चैव ॥ २६ ॥
दुर्योधनस्योत्तमरत्नचित्रं चिच्छेद पार्थो मुकुटं शरेण । फिर अश्वत्थामा, कृपाचार्य तथा अन्य माननीय ( बाह्लीक, सोमदत्त आदि ) कौरवोंको बाणोंकी विचित्र रीतिसे नमस्कार करके पार्थने एक बाण मारकर दुर्योधनके उत्तम रत्नजटित विचित्र मुकुटको काट डाला ॥ २६३ ॥
आमन्त्र्य वीरांश्च तथैव मान्यान् गाण्डीवघोषेण विनाद्य लोकान् ॥ २७ ॥
स देवदत्तं सहसा विनाद्य विदार्य वीरो द्विषतां मनांसि ।
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इसी प्रकार अन्य माननीय वीरोंसे भी विदा ले गाण्डीवकी टंकारसे सम्पूर्ण जगत्को प्रतिध्वनित करके वीर अर्जुनने सहसा देवदत्त नामक शंख बजाया और शत्रुओंका दिल दहला दिया ॥ २७ ॥
ध्वजेन सर्वानभिभूय शत्रून् सहेममालेन विराजमानः ॥ २८ ॥
दृष्ट्वा प्रयातांस्तु कुरून् किरीटी हृष्टोऽब्रवीत् तत्र स मत्स्यपुत्रम् । आवर्तयाश्वान् पशवो जितास्ते याताः परे याहि पुरं प्रहृष्टः ॥ २ ९ ॥ इस प्रकार अपने रथकी सुवर्णमालामण्डित ध्वजासे सम्पूर्ण शत्रुओंका तिरस्कार करके अर्जुन विजयोल्लाससे विशेष शोभा पाने लगे । कौरव चले गये, यह देखकर किरीटधारी अर्जुनको बड़ा हर्ष हुआ । उन्होंने मत्स्यनरेशके पुत्र उत्तरसे वहाँ इस प्रकार कहा – ' राजकुमार! अब घोड़ोंको लौटाओ । तुम्हारी गौओंको जीत लिया गया और शत्रु भाग गये; इसलिये अब तुम आनन्दपूर्वक नगरकी ओर चलो ' ॥ २८-२९ ॥ देवास्तु दृष्ट्वा महदद्भुतं तद् युद्धं कुरूणां सह फाल्गुनेन । जग्मुर्यथास्वं भवनं प्रतीताः पार्थस्य कर्माणि विचिन्तयन्तः ॥ ३० ॥
अर्जुनके साथ होनेवाला कौरवोंका वह अत्यन्त अद्भुत युद्ध देखकर देवतालोग बड़े प्रसन्न हुए और अर्जुनके पराक्रमका स्मरण करते हुए अपने - अपने भवनको चले गये ॥ ३० ॥
इति श्रीमहाभारते विराटपर्वणि गोहरणपर्वणि समस्तकौरवपलायने षट्षष्टितमोऽध्यायः ॥ ६६ ॥
इसप्रकार श्रीमहाभारत विराटपर्वके अन्तर्गत गोहरणपर्वमें समस्त कौरवोंके पलायनसे सम्बन्ध रखनेवाला छाछठवाँअध्याय पूरा हुआ ॥ ६६ ॥
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सप्तषष्टितमोऽध्यायः विजयी अर्जुन और उत्तरका राजधानीकी ओर प्रस्थान वैशम्पायन उवाच
ततो विजित्य संग्रामे कुरून् स वृषभेक्षणः ।
समानयामास तदा विराटस्य धनं महत् ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं -जनमेजय! इस प्रकार बैल-सी विशाल आँखोंवाले अर्जुन उस समय युद्धमें कौरवोंको जीतकर विराटका वह महान् गोधन लौटा लाये ॥
गतेषु च प्रभग्नेषु धार्तराष्ट्रेषु सर्वतः ।
वनान्निष्क्रम्य गहनाद् बहवः कुरुसैनिकाः ॥ २ ॥
भयात् संत्रस्तमनसः समाजग्मुस्ततस्ततः ।
मुक्तकेशास्त्वदृश्यन्त स्थिताः प्राञ्जलयस्तदा ॥ ३ ॥
क्षुत्पिपासापरिश्रान्ता विदेशस्था विचेतसः । जब कौरव- दलके लोग चले गये या इधर-उधर सब दिशाओंमें भाग गये, उस समय बहुत - से कौरवसैनिक जो घने जंगलमें छिपे हुए थे, वहाँसे निकलकर डरते -डरते अर्जुनके पास आये । उनके मनमें भय समा गया था । वे भूखे- प्यासे और थके - माँदे थे । परदेशमें होनेके कारण उनके हृदयकी व्याकुलता और बढ़ गयी थी । वे उस समय केश खोले और हाथ जोड़े हुए खड़े दिखायी दिये ॥ २-३ ॥ ऊचुः प्रणम्य सम्भ्रान्ताः पार्थ किं करवाम ते ॥ ४ ॥
(प्राणानन्तर्मनोयातान् प्रयाचिष्यामहे वयम् ।
वयं चार्जुन ते दासा ह्यनुरक्ष्या ह्यनायकाः ॥
वे सब- के - सब अर्जुनको प्रणाम करके घबराये हुए बोले- ' कुन्तीनन्दन! हम आपकी क्या सेवा करें? अर्जुन! हम आपसे हृदयके भीतर छिपे हुए अपने प्राणोंकी रक्षाके लिये याचना करते हैं । हमलोग आपके दास और अनाथ हैं; अतः आपको सदा हमारी रक्षा करनी चाहिये ' ॥ ४ ॥
अर्जुन उवाच अनाथान् दुःखितान् दीनान् कृशान् वृद्धान् पराजितान् । न्यस्तशस्त्रान् निराशांश्च नाहं हन्मि कृताञ्जलीन् ॥ ) स्वस्ति व्रजत वो भद्रं न भेतव्यं कथंचन ।
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नाहमार्तान् जिघांसामि भृशमाश्वासयामि वः ॥ ५ ॥
अर्जुनने कहा — सैनिको! जो लोग अनाथ, दुःखी, दीन, दुर्बल, वृद्ध, पराजित, अस्त्र- शस्त्रोंको नीचे डाल देनेवाले, प्राणोंसे निराश एवं हाथ जोड़कर शरणागत होते हैं, उन सबको मैं नहीं मारता हूँ । तुम्हारा भला हो । तुम कुशलपूर्वक घर लौट जाओ । तुम्हें मेरी ओरसे किसी प्रकारका भय नहीं होना चाहिये । मैं संकटमें पड़े हुए मनुष्योंको नहीं मारना चाहता । इस बातके लिये मैं तुम्हें पूरा - पूरा विश्वास दिलाता हूँ ॥ ५ ॥
वैशम्पायन उवाच
तस्य तामभयां वाचं श्रुत्वा योधाः समागताः ।
आयुःकीर्तियशोदाभिस्तमाशीर्भिरनन्दयन् ॥ ६ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं-जनमेजय! अर्जुनकी वह अभयदानयुक्त वाणी सुनकर वहाँ आये हुए समस्त योद्धाओंने उन्हें आयु, कीर्ति तथा सुयश बढ़ानेवाले आशीर्वाद देते हुए उनका अभिनन्दन किया ॥ ६ ॥
ततोऽर्जुनं नागमिव प्रभिन्न- मुत्सृज्य शत्रून् विनिवर्तमानम् । विराटराष्ट्राभिमुखं प्रयान्तं नाशक्नुवंस्तं कुरवोऽभियातुम् ॥ ७ ॥
उस समय अर्जुन शत्रुओंको छोड़कर - उन्हें जीवनदान दे, मदकी धारा बहानेवाले हाथीकी भाँति मस्तीकी चालसे विराटनगरकी ओर लौटे जा रहे थे । कौरवोंको उनपर आक्रमण करनेका साहस नहीं हुआ ॥ ततः स तन्मेघमिवापतन्तं विद्राव्य पार्थः कुरुसैन्यवृन्दम् । मत्स्यस्य पुत्रं द्विषतां निहन्ता वचोऽब्रवीत् सम्परिरभ्य भूयः ॥ ८ ॥
कौरवोंकी सेना मेघोंकी घटा - सी उमड़ आयी थी; किंतु शत्रुहन्ता पार्थने उसे मार भगाया । इस प्रकार शत्रुसेनाको परास्त करके अर्जुनने उत्तरको पुनः हृदयसे लगाकर कहा - ॥ ८ ॥
पितुः सकाशे तव तात सर्वे वसन्ति पार्था विदितं तवैव । तान् मा प्रशंसेर्नगरं प्रविश्य भीतः प्रणश्येद्धि स मत्स्यराजः ॥ ९ ॥
‘ तात! तुम्हारे पिताके समीप समस्त पाण्डव निवास करते हैं, यह बात अबतक तुम्हींको विदित हुई है; अतः तुम नगरमें प्रवेश करके पाण्डवोंकी प्रशंसा न करना, नहीं तो
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मत्स्यराज डरकर प्राण त्याग देंगे ॥ ९ ॥
मया जिता सा ध्वजिनी कुरूणां मया च गावो विजिता द्विषद्भयः । पितुः सकाशं नगरं प्रविश्य त्वमात्मनः कर्म कृतं ब्रवीहि ॥ १० ॥
‘ राजधानीमें प्रवेश करके पिताके समीप जानेपर तुम यही कहना कि मैंने कौरवोंकी उस विशाल सेनापर विजय पायी है और मैंने ही शत्रुओंसे अपनी गौओंको जीता है । सारांश यह कि युद्धमें जो कुछ हुआ है, वह सब तुम अपना ही किया हुआ पराक्रम बताना ' ॥ १० ॥
उत्तर उवाच यत् ते कृतं कर्म न पारणीयं तत् ते कर्म कर्तुं मम नास्ति शक्तिः । न त्वां प्रवक्ष्यामि पितुः सकाशे यावन्न मां वक्ष्यसि सव्यसाचिन् ॥ ११ ॥
उत्तरने कहा — सव्यसाचिन्! आपने जो पराक्रम किया है, वह दूसरेके लिये असम्भव है । वैसा अद्भुत कर्म करनेकी मुझमें शक्ति नहीं है; तथापि जबतक आप मुझे आज्ञा न देंगे, तबतक पिताजीके निकट आपके विषयमें मैं कुछ भी नहीं कहूँगा ॥ ११ ॥
वैशम्पायन उवाच
स शत्रुसेनामवजित्य जिष्णु- राच्छिद्य सर्वं च धनं कुरुभ्यः ।
श्मशानमागत्य पुनः शमीं ता- मभ्येत्य तस्थौ शरविक्षताङ्गः ॥ १२ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! विजयशील अर्जुन पूर्वोक्तरूपसे शत्रुसेनाको परास्त करके कौरवोंके हाथसे सारा गोधन छीन लेनेके बाद पुनः श्मशानभूमिमें उसी शमीवृक्षके समीप आकर खड़े हुए । उस समय उनके सभी अंग बाणोंके आघातसे क्षत-विक्षत हो रहे थे ॥ ततः स वह्निप्रतिमो महाकपिः सहैव भूतैर्दिवमुत्पपात । तथैव माया विहिता बभूव ध्वजं च सैंहं युयुजे रथे पुनः ॥ १३ ॥
तदनन्तर वह अग्निके समान तेजस्वी महावानर ध्वजनिवासी भूतगणोंके साथ आकाशमें उड़ गया । उसी प्रकार ध्वजसहित वह दैवी माया भी विलीन हो गयी और
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अर्जुनके रथमें फिर वही सिंहध्वज लगा दिया गया ॥ १३ ॥
विधाय तच्चायुधमाजिवर्धनं कुरूत्तमानामिषुधीः शरांस्तथा । प्रायात् स मत्स्यो नगरं प्रहृष्टः किरीटिना सारथिना महात्मना ॥ १४ ॥
कुरुकुलशिरोमणि पाण्डवोंके युद्धक्षमतावर्धक आयुधों तरकसों और बाणोंको फिर पूर्ववत् शमीवृक्ष- पर रखकर मत्स्यकुमार उत्तर महात्मा अर्जुनको सारथि बना उनके साथ प्रसन्नतापूर्वक नगरको चला ॥ १४ ॥
पार्थस्तु कृत्वा परमार्यकर्म निहत्य शत्रून् द्विषतां निहन्ता । चकार वेणीं च तथैव भूयो जग्राह रश्मीन् पुनरुत्तरस्य । विवेश हृष्टो नगरं महामना बृहन्नलारूपमुपेत्य सारथिः ॥ १५ ॥
शत्रुहन्ता कुन्तीपुत्रने शत्रुओंको मारकर महान् वीरोचित पराक्रम करके पुनः पूर्ववत् सिरपर वेणी धारण कर ली और उत्तरके घोड़ोंकी रास सँभाली । इस प्रकार बृहन्नलाका रूप धारणकर महामना अर्जुनने सारथिके रूपमें प्रसन्नतापूर्वक राजधानी में प्रवेश किया ॥ वैशम्पायन उवाच
ततो निवृत्ताः कुरवः प्रभग्ना वशमास्थिताः ।
हस्तिनापुरमुद्दिश्य सर्वे दीना ययुस्तदा ॥ १६ ॥
पन्थानमुपसङ्गम्य फाल्गुनो वाक्यमब्रवीत् ॥ १७ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं - राजन्! तदनन्तर कौरव युद्धसे भागकर विवशतापूर्वक लौट गये । उन सबने दीनभावसे उस समय हस्तिनापुरकी ओर प्रस्थान किया । इधर अर्जुनने नगरके रास्तेमें आकर उत्तरसे कहा- ॥ १६-१७ ॥
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राजपुत्र प्रत्यवेक्ष समानीतानि सर्वशः ।
गोकुलानि महाबाहो वीर गोपालकैः सह ॥ १८ ॥
ततोऽपराह्णे यास्यामो विराटनगरं प्रति ।
आश्वास्य पाययित्वा च परिप्लाव्य च वाजिनः ॥ १ ९ ॥
' महाबाहु राजकुमार! देख लो, तुम्हारे सब गोधन ग्वालोंके साथ यहाँ आ गये हैं । वीर! अब हम- लोग घोड़ोंको पानी पिला और नहलाकर उनकी थकावट दूर हो जानेके बाद अपराह्णकालमें विराटनगर चलेंगे ॥ १८-१९ ॥
गच्छन्तु त्वरिताश्चेमे गोपालाः प्रेषितास्त्वया ।
नगरे प्रियमाख्यातुं घोषयन्तु च ते जयम् ॥ २० ॥
' तुम्हारे द्वारा भेजे हुए ये ग्वाले तुरंत नगरमें विजयका प्रिय संवाद सुनानेके लिये जायँ और यह घोषित कर दें कि राजकुमार उत्तरकी जीत हुई है ' ॥ २० ॥
वैशम्पायन उवाच अथोत्तरस्त्वरमाणः स दूता- नाज्ञापयद्वचनात् फाल्गुनस्य । आचक्षध्वं विजयं पार्थिवस्य भग्नाः परे विजिताश्चापि गावः ॥ २१ ॥