02.Mahabharata Volume 2 — पृष्ठ 271–280

महाभारत — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 271–280

पृष्ठ 271

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पञ्चत्रिंशोऽध्यायः दुःखित भीमसेनका युधिष्ठिरको युद्धके लिये उत्साहित करना भीमसेन उवाच

संधिं कृत्वैव कालेन ह्यन्तकेन पतत्त्रिणा ।

अनन्तेनाप्रमेयेण स्रोतसा सर्वहारिणा ॥ १ ॥

प्रत्यक्षं मन्यसे कालं मर्त्यः सन् कालबन्धनः ।

फेनधर्मा महाराज फलधर्मा तथैव च ॥ २ ॥

भीमसेन बोले- महाराज! आप फेनके समान नश्वर, फलके समान पतनशील तथा कालके बन्धनमें बँधे हुए मरणधर्मा मनुष्य हैं तो भी आपने सबका अन्त और संहार करनेवाले, बाणके समान वेगवान्, अनन्त, अप्रमेय एवं जलस्रोतके समान प्रवाहशील लंबे कालको बीचमें देकर दुर्योधनके साथ सन्धि करके उस कालको अपनी आँखोंके सामने आया हुआ मानते हैं ॥ १-२ ॥

निमेषादपि कौन्तेय यस्यायुरपचीयते ।

सूच्येवाञ्जनचूर्णस्य किमिति प्रतिपालयेत् ॥ ३ ॥

किंतु कुन्तीकुमार! सलाईसे थोड़ा - थोड़ा करके उठाये जानेवाले अंजनचूर्ण ( सुरमे ) -की भाँति एक- एक निमेषमें जिसकी आयु क्षीण हो रही है, वह क्षणभंगुर मानव समयकी प्रतीक्षा क्या कर सकता है? ॥ ३ ॥

यो नूनममितायुः स्वादथवापि प्रमाणवित् ।

स कालं वै प्रतीक्षेत सर्वप्रत्यक्षदर्शिवान् ॥ ४ ॥

अवश्य ही जिसकी आयुकी कोई माप नहीं है अथवा जो आयुकी निश्चित संख्याको जानता है तथा जिसने सब कुछ प्रत्यक्ष देख लिया है । वही समयकी प्रतीक्षा कर सकता है ॥ ४ ॥

प्रतीक्ष्यमाणः कालो नः समा राजंस्त्रयोदश ।

आयुषोऽपचयं कृत्वा मरणायोपनेष्यति ॥ ५ ॥

राजन्! तेरह वर्षोंतक हमें जिसकी प्रतीक्षा करनी है, वह काल हमारी आयुको क्षीण करके हम सबको मृत्युके निकट पहुँचा देगा ॥ ५ ॥

शरीरिणां हि मरणं शरीरे नित्यमाश्रितम् ।

प्रागेव मरणात् तस्माद् राज्यायैव घटामहे ॥ ६ ॥

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देहधारीकी मृत्यु सदा उसके शरीरमें ही निवास करती है, अतः मृत्युके पहले ही हमें राज्य - प्राप्तिके लिये चेष्टा करनी चाहिये ॥ ६ ॥

यो न याति प्रसंख्यानमस्पष्टो भूमिवर्धनः ।

अयातयित्वा वैराणि सोऽवसीदति गौरिव ॥ ७ ॥

जिसका प्रभाव छिपा हुआ है, वह भूमिके लिये भाररूप ही है, क्योंकि वह जनसाधारणमें ख्याति नहीं प्राप्त कर सकता । वह वैरका प्रतिशोध न लेनेके कारण बैलकी भाँति दुःख उठाता रहता है ॥ ७ ॥

यो न यातयते वैरमल्पसत्त्वोद्यमः पुमान् ।

अफलं जन्म तस्याहं मन्ये दुर्जातजायिनः ॥ ८ ॥

जिसका बल और उद्यम बहुत कम है, जो वैरका बदला नहीं ले सकता, उस पुरुषका

जन्म अत्यन्त घृणित है । मैं तो उसके जन्मको निष्फल मानता हूँ ॥ ८ ॥

हैरण्यौ भवतो बाहू श्रुतिर्भवति पार्थिवी ।

हत्वा द्विषन्तं संग्रामे भुङ्क्ष्व बाहुजितं वसु ॥ ९ ॥

महाराज! आपकी दोनों भुजाएँ सुवर्णकी अधिकारिणी हैं । आपकी कीर्ति राजा पृथुके समान है । आप युद्धमें शत्रुका संहार करके अपने बाहुबलसे उपार्जित धनका उपभोग कीजिये ॥ ९ ॥

हत्वा वै पुरुषो राजन् निकर्तारमरिंदम ।

अह्नाय नरकं गच्छेत् स्वर्गेणास्य स सम्मितः ॥ १० ॥

शत्रुदमन नरेश! यदि मनुष्य अपनेको धोखा देनेवाले शत्रुका वध करके तुरंत ही नरकमें पड़ जाय तो उसके लिये वह नरक भी स्वर्गके तुल्य है ॥ १० ॥

अमर्षजो हि संतापः पावकाद् दीप्तिमत्तरः ।

येनाहमभिसंतप्तो न नक्तं न दिवा शये ॥ ११ ॥

अमर्षसे जो संताप होता है, वह आगसे भी बढ़कर जलानेवाला है । जिससे संतप्त होकर मुझे न तो रातमें नींद आती है और न दिनमें ॥ ११ ॥

अयं च पार्थो बीभत्सुर्वरिष्ठो ज्याविकर्षणे आस्ते परमसंतप्तो नूनं सिंह इवाशये ॥ १२ ॥

ये हमारे भाई अर्जुन धनुषकी प्रत्यंचा खींचनेमें सबसे श्रेष्ठ हैं; परंतु ये भी निश्चय ही अपनी गुफामें दुःखी होकर बैठे हुए सिंहकी भाँति सदा अत्यन्त संतप्त होते रहते हैं ॥ १२ ॥

योऽयमेकोऽभिमनुते सर्वान् लोके धनुर्भृतः ।

सोऽयमात्मजमूष्माणं महाहस्तीव यच्छति ॥ १३ ॥

जो अकेले ही संसारके समस्त धनुर्धर वीरोंका सामना कर सकते हैं, वे ही अर्जुन महान् गजराजकी भाँति अपने मानसिक क्रोधजनित संतापको किसी प्रकार रोक रहे

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हैं ॥ १३ ॥

नकुलः सहदेवश्च वृद्धा माता च वीरसूः ।

तवैव प्रियमिच्छन्त आसते जडमूकवत् ॥ १४ ॥

नकुल, सहदेव तथा वीरपुत्रोंको जन्म देनेवाली हमारी बूढ़ी माता कुन्ती – ये सब - के-सब आपका प्रिय करनेकी इच्छा रखकर ही मूर्खों और गूँगोंकी भाँति चुप रहते हैं ॥ १४ ॥

सर्वे ते प्रियमिच्छन्ति बान्धवाः सह सृञ्जयैः ।

अहमेकश्च संतप्तो माता च प्रतिविन्ध्यतः ॥ १५ ॥

आपके सभी बन्धु - बान्धव और सृजयवंशी योद्धा भी आपका प्रिय करना चाहते हैं । केवल हम दो व्यक्तियोंको ही विशेष कष्ट है । एक तो मैं संतप्त होता हूँ और दूसरी प्रतिविन्ध्यकी माता द्रौपदी ॥ १५ ॥

प्रियमेव तु सर्वेषां यद् ब्रवीम्युत किंचन ।

सर्वे हि व्यसनं प्राप्ताः सर्वे युद्धाभिनन्दिनः ॥ १६ ॥

मैं जो कुछ कहता हूँ, वह सबको प्रिय है । हम सब लोग संकटमें पड़े हैं और सभी युद्धका अभिनन्दन करते हैं ॥ १६ ॥

नातः पापीयसी काचिदापद् राजन् भविष्यति ।

यन्नो नीचैरल्पबलै राज्यमाच्छिद्य भुज्यते ॥ १७ ॥

राजन्! इससे बढ़कर अत्यन्त दुःखदायिनी विपत्ति और क्या होगी कि नीच और दुर्बल शत्रु हम बलवानोंका राज्य छीनकर उसका उपभोग कर रहे हैं ॥ १७ ॥

शीलदोषाद् घृणाविष्ट आनृशंस्यात् परंतप ।

क्लेशांस्तितिक्षसे राजन् नान्यः कश्चिचत् प्रशंसति ॥ १८ ॥

परंतप युधिष्ठिर! आप शील-स्वभावके दोष और कोमलतासे एवं दयाभावसे युक्त होनेके कारण इतने क्लेश सह रहे हैं, परंतु महाराज! इसके लिये आपकी कोई प्रशंसा नहीं करता है ॥ १८ ॥

श्रोत्रियस्येव ते राजन् मन्दकस्याविपश्चितः ।

अनुवाकहता बुद्धिर्नैषा तत्त्वार्थदर्शिनी ॥ १ ९ ॥

राजन्! आपकी बुद्धि अर्थज्ञानसे रहित वेदोंके अक्षरमात्रको रटनेवाले मन्दबुद्धि श्रोत्रियकी तरह केवल गुरुकी वाणीका अनुसरण करनेके कारण नष्ट हो गयी है । यह तात्त्विक अर्थको समझने या समझानेवाली नहीं है ॥ १ ९ ॥

घृणी ब्राह्मणरूपोऽसि कथं क्षत्रेऽभ्यजायथाः ।

अस्यां हि योनौ जायन्ते प्रायशः क्रूरबुद्धयः ॥ २० ॥

आप दयालु ब्राह्मणरूप हैं । पता नहीं, क्षत्रियकुलमें कैसे आपका जन्म हो गया; क्योंकि क्षत्रिय योनिमें तो प्रायः क्रूर बुद्धिके ही पुरुष उत्पन्न होते हैं ॥ २० ॥

अश्रौषीस्त्वं राजधर्मान् यथा वै मनुरब्रवीत् ।

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क्रूरान् निकृतिसम्पन्नान् विहितानशमात्मकान् ॥ २१ ॥

धार्तराष्ट्रान् महाराज क्षमसे किं दुरात्मनः ।

कर्तव्ये पुरुषव्याघ्र किमास्से पीठसर्पवत् ॥ २२ ॥

बुद्धया वीर्येण संयुक्तः श्रुतेनाभिजनेन च । महाराज! आपने राजधर्मका वर्णन तो सुना ही होगा, जैसा मनुजीने कहा है । फिर क्रूर, मायावी, हमारे हितके विपरीत आचरण करनेवाले तथा अशान्तचित्तवाले दुरात्मा धृतराष्ट्रपुत्रोंका अपराध आप क्यों क्षमा करते हैं? पुरुषसिंह! आप बुद्धि, पराक्रम, शास्त्रज्ञान तथा उत्तम कुलसे सम्पन्न होकर भी जहाँ कुछ काम करना है, वहाँ अजगरकी भाँति चुपचाप क्यों बैठे हैं? ॥ २१-२२ ॥ तृणानां मुष्टिनैकेन हिमवन्तं च पर्वतम् ॥ २३ ॥

छन्नमिच्छसि कौन्तेय योऽस्मात् संवर्तुमिच्छसि । कुन्तीनन्दन! आप अज्ञातवासके समय जो हम लोगोंको छिपाकर रखना चाहते हैं, इससे जान पड़ता है कि आप एक मुट्ठी तिनकेसे हिमालय पर्वतको ढक देना चाहते हैं ॥ २३३ ॥

अज्ञातचर्या गूढेन पृथिव्यां विश्रुतेन च ॥ २४ ॥

दिवीव पार्थ सूर्येण न शक्याचरितुं त्वया । पार्थ! आप इस भूमण्डलमें विख्यात हैं, जैसे सूर्य आकाशमें छिपकर नहीं रह सकते, उसी प्रकार आप भी कहीं छिपे रहकर अज्ञातवासका नियम नहीं पूरा कर सकते ॥ २४३ || बृहच्छाल इवानूपे शाखापुष्पपलाशवान् ॥ २५ ॥

हस्ती श्वेत इवाज्ञातः कथं जिष्णुश्चरिष्यति । जहाँ जलकी अधिकता हो, ऐसे प्रदेशमें शाखा, पुष्प और पत्तोंसे सुशोभित विशाल शालवृक्षके समान अथवा श्वेत गजराज ऐरावतके सदृश ये अर्जुन कहीं भी अज्ञात कैसे रह सकेंगे? ॥ २५ ॥

इमौ च सिंहसंकाशौ भ्रातरौ सहितौ शिशू ॥ २६ ॥

नकुलः सहदेवश्च कथं पार्थ चरिष्यतः । कुन्तीकुमार! ये दोनों भाई बालक नकुल सहदेव सिंहके समान पराक्रमी हैं । ये दोनों कैसे छिपकर विचर सकेंगे? ॥ २६३ ॥

पुण्यकीर्ती राजपुत्री द्रौपदी वीरसूरियम् ॥ २७ ॥

विश्रुता कथमज्ञाता कृष्णा पार्थ चरिष्यति । पार्थ! यह वीरजननी पवित्रकीर्ति राजकुमारी द्रौपदी सारे संसारमें विख्यात है । भला, यह अज्ञातवासके नियम कैसे निभा सकेगी ॥ २७ ॥

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मां चापि राजञ्जानन्ति ह्याकुमारमिमाः प्रजाः ॥ २८ ॥

नाज्ञातचर्यां पश्यामि मेरोरिव निगूहनम् । महाराज! मुझे भी प्रजावर्गके बच्चेतक पहचानते हैं, जैसे मेरुपर्वतको छिपाना असम्भव है, उसी प्रकार मुझे अपनी अज्ञातचर्या भी सम्भव नहीं दिखायी देती ॥ २८३ ॥

तथैव बहवोऽस्माभी राष्ट्रेभ्यो विप्रवासिताः ॥ २९ ॥

राजानो राजपुत्राश्च धृतराष्ट्रमनुव्रताः ।

न हि तेऽप्युपशाम्यन्ति निकृता वा निराकृताः ॥ ३० ॥

राजन्! इसके सिवा एक बात और है, हमलोगोंने भी बहुत- से राजाओं तथा राजकुमारोंको उनके राज्यसे निकाल दिया है । वे सब आकर राजा धृतराष्ट्रसे मिल गये होंगे, हमने जिनको राज्यसे वंचित किया अथवा निकाला है, वे कदापि हमारे प्रति शान्तभाव नहीं धारण कर सकते ॥ २ ९ -३० ॥ अवश्यं तैर्निकर्तव्यमस्माकं तत्प्रियैषिभिः ।

तेऽप्यस्मासु प्रयुञ्जीरन् प्रच्छन्नान् सुबहूंश्चरान् ।

आचक्षीरंश्च नो ज्ञात्वा ततः स्यात् सुमहत् भयम् ॥ ३१ ॥

अवश्य ही दुर्योधनका प्रिय करनेकी इच्छा रखकर वे राजालोग भी हमलोगोंको धोखा देना उचित समझकर हमलोगोंकी खोज करनेके लिये बहुत से छिपे हुए गुप्तचर नियुक्त करेंगे और पता लग जानेपर निश्चय ही दुर्योधनको सूचित कर देंगे । उस दशामें हमलोगोंपर बड़ा भारी भय उपस्थित हो जायगा ॥ ३१ ॥

अस्माभिरुषिताः सम्यग्वने मासास्त्रयोदश ।

परिमाणेन तान् पश्य तावतः परिवत्सरान् ॥ ३२ ॥

हमने अबतक वनमें ठीक-ठीक तेरह महीने व्यतीत कर लिये हैं, आप इन्हींको परिमाणमें तेरह वर्ष समझ लीजिये ॥ ३२ ॥

अस्ति मासः प्रतिनिधिर्यथा प्राहुर्मनीषिणः ।

पूतिकामिव सोमस्य तथेदं क्रियतामिति ॥ ३३ ॥

मनीषी पुरुषोंका कहना है कि मास संवत्सरका प्रतिनिधि है । जैसे पूतिका सोमलताके स्थानपर यज्ञमें काम देती है, उसी प्रकार आप इन तेरह मासोंको ही तेरह वर्षोंका प्रतिनिधि स्वीकार कर लीजिये ॥ ३३ ॥

अथवानडुहे राजन् साधवे साधुवाहिने ।

सौहित्यदानादेतस्मादेनसः प्रतिमुच्यते ॥ ३४ ॥

राजन्! अथवा अच्छी तरह बोझ ढोनेवाले उत्तम बैलको भरपेट भोजन दे देनेपर इस पापसे आपको छुटकारा मिल सकता है ॥ ३४ ॥

तस्माच्छत्रुवधे राजन् क्रियतां निश्चयस्त्वया ।

क्षत्रियस्य हि सर्वस्य नान्यो धर्मोऽस्ति संयुगात् ॥ ३५ ॥

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अतः महाराज! आप शत्रुओंका वध करनेका निश्चय कीजिये; क्योंकि समस्त क्षत्रियोंके लिये युद्धसे बढ़कर दूसरा कोई धर्म नहीं है ॥ ३५ ॥

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि अर्जुनाभिगमनपर्वणि भीमवाक्ये पञ्चत्रिंशोऽध्यायः ॥ ३५ ॥ इसप्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत अर्जुनाभिगमनपर्वमें भीमवाक्यविषयक पैंतीसवाँअध्याय पूरा हुआ ॥ ३५ ॥

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षट्त्रिंशोऽध्यायः युधिष्ठिरका भीमसेनको समझाना, व्यासजीका आगमन और युधिष्ठिरको प्रतिस्मृतिविद्याप्रदान तथा पाण्डवोंका पुनः काम्यकवनगमन वैशम्पायन उवाच

भीमसेनवचः श्रुत्वा कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः ।

निःश्वस्य पुरुषव्याघ्रः सम्प्रदध्यौ परंतपः ॥ १ ॥

श्रुता मे राजधर्माश्च वर्णानां च विनिश्चयाः ।

आयत्यां च तदात्वे च यः पश्यति स पश्यति ॥ २ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं -जनमेजय! भीमसेन की बात सुनकर शत्रुओंको संताप देनेवाले पुरुषसिंह कुन्तीपुत्र युधिष्ठिर लम्बी साँस लेकर मन-ही- मन विचार करने लगे - ' मैंने राजाओंके धर्म एवं वर्णोंके सुनिश्चित सिद्धान्त भी सुने हैं, परंतु जो भविष्य और वर्तमान दोनोंपर दृष्टि रखता है, वही यथार्थदर्शी है ॥ १-२ ॥

धर्मस्य जानमानोऽहं गतिमग्रयां सुदुर्विदाम् ।

कथं बलात् करिष्यामि मेरोरिव विमर्दनम् ॥ ३ ॥

‘ धर्मकी श्रेष्ठ गति अत्यन्त दुर्बोध है, उसे जानता हुआ भी मैं कैसे बलपूर्वक मेरु पर्वतके समान महान् उस धर्मका मर्दन करूँगा' ॥ ३ ॥

स मुहूर्तमिव ध्यात्वा विनिश्चित्येतिकृत्यताम् ।

भीमसेनमिदं वाक्यमपदान्तरमब्रवीत् ॥ ४ ॥

इस प्रकार दो घड़ीतक विचार करनेके पश्चात् अपनेको क्या करना है, इसका निश्चय करके युधिष्ठिरने भीमसेनसे अविलम्ब यह बात कही ॥ ४ ॥

युधिष्ठिर उवाच

एवमेतन्महाबाहो यथा वदसि भारत ।

इदमन्यत् समादत्स्व वाच्यं मे वाक्यकोविद ॥ ५ ॥

युधिष्ठिर बोले- महाबाहु भरतकुलतिलक वाक्यविशारद भीम! तुम जैसा कह रहे हो, वह ठीक है, तथापि मेरी यह दूसरी बात भी मानो ॥ ५ ॥

महापापानि कर्माणि यानि केवलसाहसात् ।

आरभ्यन्ते भीमसेन व्यथन्ते तानि भारत ॥ ६ ॥

भरतनन्दन भीमसेन! जो महान् पापमय कर्म केवल साहसके भरोसे आरम्भ किये जाते हैं, वे सभी कष्टदायक होते हैं ॥ ६ ॥

पृष्ठ 278

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सुमन्त्रिते सुविक्रान्ते सुकृते सुविचारिते ।

सिध्यन्त्यर्था महाबाहो दैवं चात्र प्रदक्षिणम् ॥ ७ ॥

महाबाहो! अच्छी तरहसे सलाह और विचार करके पूरा पराक्रम प्रकट करते हुए सुन्दररूपसे जो कार्य किये जाते हैं, वे सफल होते हैं और उसमें दैव भी अनुकूल हो जाता है ॥ ७ ॥

यत् तु केवलचापल्याद् बलदर्पोत्थितः स्वयम् ।

आरब्धव्यमिदं कार्यं मन्यसे शृणु तत्र मे ॥ ८ ॥

तुम स्वयं बलके घमण्डसे उन्मत्त हो जो केवल चपलतावश स्वयं इस युद्धरूपी कार्यको अभी आरम्भ करनेके योग्य मान रहे हो, उसके विषयमें मेरी बात सुनो ॥ ८ ॥

भूरिश्रवाः शलश्चैव जलसंधश्च वीर्यवान् ।

भीष्मो द्रोणश्च कर्णश्च द्रोणपुत्रश्च वीर्यवान् ॥ ९ ॥

धार्तराष्ट्रा दुराधर्षा दुर्योधनपुरोगमाः ।

सर्व एव कृतास्त्राश्च सततं चाततायिनः ॥ १० ॥

राजानः पार्थिवाश्चैव येऽस्माभिरुपतापिताः ।

संश्रिताः कौरवं पक्षं जातस्नेहाश्च तं प्रति ॥ ११ ॥

भूरिश्रवा, शल, पराक्रमी जलसंध, भीष्म, द्रोण, कर्ण, बलवान् अश्वत्थामा तथा सदाके आततायी दुर्योधन आदि दुर्धर्ष धृतराष्ट्रपुत्र- ये सभी अस्त्र - विद्याके ज्ञाता हैं एवं हमने जिन राजाओं तथा भूमिपालोंको युद्धमें कष्ट पहुँचाया है, वे सभी कौरवपक्षमें मिल गये हैं और उधर ही उनका स्नेह हो गया है ॥ ९ –११ ॥

दुर्योधनहिते युक्ता न तथास्मासु भारत ।

पूर्णकोशा बलोपेताः प्रयतिष्यन्ति संगरे ॥ १२ ॥

भारत! वे दुर्योधनके हितमें ही संलग्न होंगे; हमलोगोंके प्रति उनका वैसा सद्भाव नहीं हो सकता । उनका खजाना भरा- पूरा है और वे सैनिक शक्तिसे भी सम्पन्न हैं, अतः वे युद्ध छिड़नेपर हमारे विरुद्ध ही प्रयत्न करेंगे ॥ १२ ॥

सर्वे कौरवसैन्यस्य सपुत्रामात्यसैनिकाः ।

संविभक्ता हि मात्राभिर्भोगैरपि च सर्वशः ॥ १३ ॥

मन्त्रियों और पुत्रोंके सहित कौरवसेनाके सभी सैनिकोंको दुर्योधनकी ओरसे पूरे वेतन और सब प्रकारकी उपभोग-सामग्रीका वितरण किया गया है ॥ १३ ॥

दुर्योधनेन ते वीरा मानिताश्च विशेषतः ।

प्राणांस्त्यक्ष्यन्ति संग्रामे इति मे निश्चिता मतिः ॥ १४ ॥

इतना ही नहीं, दुर्योधनने उन वीरोंका विशेष आदर- सत्कार भी किया है । अतः मेरा यह विश्वास है कि वे उसके लिये संग्राममें ( हँसते - हँसते ) प्राण दे देंगे ॥ १४ ॥

समा यद्यपि भीष्मस्य वृत्तिरस्मासु तेषु च ।

पृष्ठ 279

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द्रोणस्य च महाबाहो कृपस्य च महात्मनः ॥ १५ ॥

अवश्यं राजपिण्डस्तैर्निर्वेश्य इति मे मतिः ।

तस्मात् त्यक्ष्यन्ति संग्रामे प्राणानपि सुदुस्त्यजान् ॥ १६ ॥

महाबाहो! यद्यपि पितामह भीष्म, आचार्य द्रोण तथा महामना कृपाचार्यका आन्तरिक स्नेह धृतराष्ट्रके पुत्रों तथा हमलोगोंपर एक-सा ही है, तथापि वे राजा दुर्योधनका दिया हुआ अन्न खाते हैं, अतः उसका ऋण अवश्य चुकायेंगे, ऐसा मुझे प्रतीत होता है । युद्ध छिड़नेपर वे भी दुर्योधनके पक्षसे ही लड़कर अपने दुस्त्यज प्राणोंका भी परित्याग कर देंगे ॥ १५-१६ ॥

सर्वे दिव्यास्त्रविद्वांसः सर्वे धर्मपरायणाः ।

अजेयाश्चेति मे बुद्धिरपि देवैः सवासवैः ॥ १७ ॥

वे सब - के - सब दिव्यास्त्रोंके ज्ञाता और धर्मपरायण हैं । मेरी बुद्धिमें तो यहाँतक आता है कि इन्द्र आदि सम्पूर्ण देवता भी उन्हें परास्त नहीं कर सकते ॥ १७ ॥

अमर्षी नित्यसंरब्धस्तत्र कर्णो महारथः ।

सर्वास्त्रविदनाधृष्यो ह्यभेद्यकवचावृतः ॥ १८ ॥

उस पक्षमें महारथी कर्ण भी है, जो हमारे प्रति सदा अमर्ष और क्रोधसे भरा रहता है ।

वह सब अस्त्रोंका ज्ञाता, अजेय तथा अभेद्य कवचसे सुरक्षित है ॥ १८ ॥

अनिर्जित्य रणे सर्वानेतान् पुरुषसत्तमान् ।

अशक्यो ह्यसहायेन हन्तुं दुर्योधनस्त्वया ॥ १ ९ ॥

इन समस्त वीर पुरुषोंको युद्धमें परास्त किये बिना तुम अकेले दुर्योधनको नहीं मार सकते ॥ १ ९ ॥

न निद्रामधिगच्छामि चिन्तयानो वृकोदर ।

अतिसर्वान् धनुर्ग्राहान् सूतपुत्रस्य लाघवम् ॥ २० ॥

वृकोदर! सूतपुत्र कर्णके हाथोंकी फुर्ती समस्त धनुर्धरोंसे बढ़ - चढ़कर है। उसका स्मरण करके मुझे अच्छी तरह नींद नहीं आती है ॥ २० ॥

वैशम्पायन उवाच

एतद् वचनमाज्ञाय भीमसेनोऽत्यमर्षणः ।

बभूव विमनास्त्रस्तो न चैवोवाच किंचन ॥ २१ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! युधिष्ठिरका यह वचन सुनकर अत्यन्त क्रोधी

भीमसेन उदास और शंकायुक्त हो गये । फिर उनके मुँहसे कोई बात नहीं निकली ॥ २१ ॥

तयोः संवदतोरेवं तदा पाण्डवयोर्द्वयोः ।

आजगाम महायोगी व्यासः सत्यवतीसुतः ॥ २२ ॥

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दोनों पाण्डवोंमें इस प्रकार बातचीत हो ही रही थी कि महायोगी सत्यवतीनन्दन व्यास वहाँ आ पहुँचे ॥ २२ ॥

सोऽभिगम्य यथान्यायं पाण्डवैः प्रतिपूजितः ।

युधिष्ठिरमिदं वाक्यमुवाच वदतां वरः ॥ २३ ॥

पाण्डवोंने उठकर उनकी अगवानी की और यथायोग्य पूजन किया । तत्पश्चात् वक्ताओंमें श्रेष्ठ व्यासजी युधिष्ठिरसे इस प्रकार बोले— ॥ २३ ॥

व्यास उवाच

युधिष्ठिर महाबाहो वेद्मि ते हृदयस्थितम् ।

मनीषया ततः क्षिप्रमागतोऽस्मि नरर्षभ ॥ २४ ॥

व्यासजीने कहा— नरश्रेष्ठ महाबाहु युधिष्ठिर! मैं ध्यानके द्वारा तुम्हारे मनका भाव जान चुका हूँ । इसलिये शीघ्रतापूर्वक यहाँ आया हूँ ॥ २४ ॥

भीष्माद् द्रोणात् कृपात् कर्णाद् द्रोणपुत्राच्च भारत ।

दुर्योधनानृपसुतात् तथा दुःशासनादपि ॥ २५ ॥

यत् ते भयममित्रघ्न हृदि सम्परिवर्तते ।

तत् तेऽहं नाशयिष्यामि विधिदृष्टेन कर्मणा ॥ २६ ॥

शत्रुहन्ता भारत! भीष्म, द्रोण, कृपाचार्य, कर्ण, अश्वत्थामा, धृतराष्ट्रपुत्र दुर्योधन और दुःशासनसे भी जो तुम्हारे मनमें भय समा गया है, उसे मैं शास्त्रीय उपायसे नष्ट कर दूँगा ॥ २५-२६ ॥

तच्छ्रुत्वा धृतिमास्थाय कर्मणा प्रतिपादय ।

प्रतिपाद्य तु राजेन्द्र ततः क्षिप्रं ज्वरं जहि ॥ २७ ॥

राजेन्द्र! उस उपायको सुनकर धैर्यपूर्वक प्रयत्नद्वारा उसका अनुष्ठान करो । उसका अनुष्ठान करके शीघ्र ही अपनी मानसिक चिन्ताका परित्याग कर दो ॥ २७ ॥

तत एकान्तमुन्नीय पाराशर्यो युधिष्ठिरम् ।

अब्रवीदुपपन्नार्थमिदं वाक्यविशारदः ॥ २८ ॥

तदनन्तर प्रवचनकुशल पराशरनन्दन व्यासजी युधिष्ठिरको एकान्तमें ले गये और उनसे यह युक्तियुक्त वचन बोले – ॥ २८ ॥

श्रेयसस्ते परः कालः प्राप्तो भरतसत्तम ।

येनाभिभविता शत्रून् रणे पार्थो धनुर्धरः ॥ २ ९ ॥

‘ भरतश्रेष्ठ! तुम्हारे कल्याणका सर्वश्रेष्ठ समय आया है, जिससे धनुर्धर अर्जुन युद्धमें शत्रुओंको पराजित कर देंगे ॥ २ ९ ॥

गृहाणेमां मया प्रोक्तां सिद्धिं मूर्तिमतीमिव ।

विद्यां प्रतिस्मृतिं नाम प्रपन्नाय ब्रवीमि ते ॥ ३० ॥