02.Mahabharata Volume 2 — पृष्ठ 261–270

महाभारत — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 261–270

पृष्ठ 261

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‘ आत्मबल ही धनका मूल है, इसके विपरीत जो कुछ है, वह मिथ्या है; क्योंकि हेमन्त-ऋतुमें वृक्षोंकी छायाके समान वह आत्माकी दुर्बलता किसी भी कामकी नहीं है ॥ ६४ ॥

अर्थत्यागोऽपि कार्यः स्वादर्थं श्रेयांसमिच्छता ।

बीजौपम्येन कौन्तेय मा ते भूदत्र संशयः ॥ ६५ ॥

‘ कुन्तीकुमार! जैसे किसान अधिक अन्नराशि उपजानेकी लालसासे धान्य आदिके अल्प बीजोंका भूमिमें परित्याग कर देता है, उसी प्रकार श्रेष्ठ अर्थ पानेकी इच्छासे अल्प अर्थका त्याग किया जा सकता है । आपको इस विषयमें संशय नहीं करना चाहिये ॥ ६५ ॥

अर्थेन तु समो नार्थो यत्र लभ्येत नोदयः ।

न तत्र विपणः कार्यः खरकण्डूयनं हि तत् ॥ ६६ ॥

‘ जहाँ अर्थका उपयोग करनेपर उससे अधिक या समान अर्थकी प्राप्ति न हो वहाँ उस अर्थको नहीं लगाना चाहिये, क्योंकि वह ( परस्पर ) गधोंके शरीरको खुजलानेके समान व्यर्थ है ॥ ६६ ॥

एवमेव मनुष्येन्द्र धर्मं त्यक्त्वाल्पकं नरः ।

बृहन्तं धर्ममाप्नोति स बुद्ध इति निश्चितम् ॥ ६७ ॥

' नरेश्वर! इसी प्रकार जो मनुष्य अल्प धर्मका परित्याग करके महान् धर्मकी प्राप्ति करता है, वह निश्चय ही बुद्धिमान् है ॥ ६७ ॥

अमित्रं मित्रसम्पन्नं मित्रैर्भिन्दन्ति पण्डिताः ।

भिन्नैर्मित्रैः परित्यक्तं दुर्बलं कुर्वते वशम् ॥ ६८ ॥

‘ मित्रोंसे सम्पन्न शत्रुको विद्वान् पुरुष अपने मित्रोंद्वारा भेदनीतिसे उसमें और उसके मित्रोंमें फूट डाल देते हैं, फिर भेदभाव होनेपर मित्र जब उसको त्याग देते हैं, तब वे उस दुर्बल शत्रुको अपने वशमें कर लेते हैं ॥ ६८ ॥

सत्त्वेन कुरुते युद्धं राजन् सुबलवानपि ।

नोद्यमेन न होत्राभिः सर्वाः स्वीकुरुते प्रजाः ॥ ६ ९ ॥

' राजन्! अत्यन्त बलवान् पुरुष भी आत्मबलसे ही युद्ध करता है, वह किसी अन्य प्रयत्नसे या प्रशंसाद्वारा सब प्रजाको अपने वशमें नहीं करता ॥ ६ ९ ॥

सर्वथा संहतैरेव दुर्बलैर्बलवानपि ।

अमित्रः शक्यते हन्तुं मधुहा भ्रमरैरिव ॥ ७० ॥

‘ जैसे मधुमक्खियाँ संगठित होकर मधु निकालने - वालेको मार डालती हैं, उसी प्रकार सर्वथा संगठित रहनेवाले दुर्बल मनुष्योंद्वारा बलवान् शत्रु भी मारा जा सकता है ॥ ७० ॥

यथा राजन् प्रजाः सर्वाः सूर्यः पाति गभस्तिभिः ।

अत्ति चैव तथैव त्वं सदृशः सवितुर्भव ॥ ७१ ॥

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राजन्! जैसे भगवान् सूर्य पृथ्वीके रसको ग्रहण करते और अपनी किरणोंद्वारा वर्षा करके उन सबकी रक्षा करते हैं, उसी प्रकार आप भी प्रजाओंसे कर लेकर उनकी रक्षा करते हुए सूर्यके ही समान हो जाइये ॥ ७१ ॥

एतच्चापि तपो राजन् पुराणमिति नः श्रुतम् ।

विधिना पालनं भूमेर्यत् कृतं नः पितामहैः ॥ ७२ ॥

' राजेन्द्र! हमारे बाप-दादोंने जो किया है, वह धर्मपूर्वक पृथ्वीका पालन भी प्राचीनकालसे चला आनेवाला तप ही है; ऐसा हमने सुना है ॥ ७२ ॥

न तथा तपसा राजँल्लोकान् प्राप्नोति क्षत्रियः ।

यथा सृष्टेन युद्धेन विजयेनेतरेण वा ॥ ७३ ॥

‘ धर्मराज! क्षत्रिय तपस्याके द्वारा वैसे पुण्य- लोकोंको नहीं प्राप्त होता, जिन्हें वह अपने लिये विहित युद्धके द्वारा विजय अथवा मृत्युको अंगीकार करनेसे प्राप्त करता है ॥ ७३ ॥

अपेयात् किल भाः सूर्याल्लक्ष्मीश्चन्द्रमसस्तथा ।

इति लोको व्यवसितो दृष्ट्वेमां भवतो व्यथाम् ॥ ७४ ॥

‘ आपपर जो यह संकट आया है, इस असम्भव- सी घटनाको देखकर लोग यह निश्चयपूर्वक मानने लगे हैं कि सूर्यसे उसकी प्रभा और चन्द्रमासे उसकी चाँदनी भी दूर हो सकती है ॥ ७४ ॥

भवतश्च प्रशंसाभिर्निन्दाभिरितरस्य च ।

कथायुक्ताः परिषदः पृथग् राजन् समागताः ॥ ७५ ॥

‘ राजन्! साधारण लोग भिन्न- भिन्न सभाओंमें सम्मिलित होकर अथवा अलग- अलग समूह- के - समूह इकट्ठे होकर आपकी प्रशंसा और दुर्योधनकी निन्दासे ही सम्बन्ध रखनेवाली बातें करते हैं ॥ ७५ ॥

इदमभ्यधिकं राजन् ब्राह्मणाः कुरवश्च ते ।

समेताः कथयन्तीह मुदिताः सत्यसंधताम् ॥ ७६ ॥

‘ महाराज! इसके सिवा, यह भी सुननेमें आया है कि ब्राह्मण और कुरुवंशी एकत्र होकर बड़ी प्रसन्नताके साथ आपकी सत्यप्रतिज्ञताका वर्णन करते हैं ॥ ७६ ॥

यन्न मोहान्न कार्पण्यान्न लोभान्न भयादपि ।

अनृतं किंचिदुक्तं ते न कामान्नार्थकारणात् ॥ ७७ ॥

' उनका कहना है कि आपने कभी न तो मोहसे, न दीनतासे, न लोभसे, न भयसे, न कामनासे और न धनके ही कारणसे किंचिन्मात्र भी असत्य भाषण किया है ॥ ७७ ॥

यदेनः कुरुते किंचिद् राजा भूमिमवाप्नुवन् ।

सर्वं तन्नुदते पश्चाद् यज्ञैर्विपुलदक्षिणैः ॥ ७८ ॥

‘ राजा पृथ्वीको अपने अधिकारमें करते समय युद्धजनित हिंसा आदिके द्वारा जो कुछ पाप करता है, वह सब राज्यप्राप्तिके पश्चात् भारी दक्षिणावाले यज्ञोंद्वारा नष्ट कर देता

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है ॥ ७८ ॥

ब्राह्मणेभ्यो ददद् ग्रामान् गाश्च राजन् सहस्रशः ।

मुच्यते सर्वपापेभ्यस्तमोभ्य इव चन्द्रमाः ॥ ७९ ॥

‘ जनेश्वर! ब्राह्मणोंको बहुत - से गाँव और सहस्रों गौएँ दानमें देकर राजा अपने समस्त पापोंसे उसी प्रकार मुक्त हो जाता है, जैसे चन्द्रमा अन्धकारसे ॥ ७ ९ ॥

पौरजानपदाः सर्वे प्रायशः कुरुनन्दन ।

सवृद्धबालसहिताः शंसन्ति त्वां युधिष्ठिर ॥ ८० ॥

‘ कुरुनन्दन युधिष्ठिर! प्रायः नगर और जनपदमें निवास करनेवाले आबालवृद्ध सब लोग आपकी प्रशंसा करते हैं ॥ ८० ॥

श्वदृतौ क्षीरमासक्तं ब्रह्म वा वृषले यथा ।

सत्यं स्तेने बलं नार्यां राज्यं दुर्योधने तथा ॥ ८१ ॥

' कुत्तेके चमड़ेकी कुप्पीमें रखा हुआ दूध, शूद्रमें स्थित वेद, चोरमें सत्य और नारीमें स्थित बल जैसे अनुचित है, उसी प्रकार दुर्योधनमें स्थित राजत्व भी संगत नहीं है ॥ ८१ ॥

इति लोके निर्वचनं पुरश्चरति भारत ।

अपि चैताः स्त्रियो बालाः स्वाध्यायमधिकुर्वते ॥ ८२ ॥

‘ भारत! लोकमें यह उपर्युक्त सत्य प्रवाद पहले से चला आ रहा है । स्त्रियाँ और बच्चेतक इसे नित्य किये जानेवाले पाठकी तरह दुहराते रहते हैं ॥ ८२ ॥

इमामवस्थां च गते सहास्माभिररिंदम ।

हन्त नष्टाः स्म सर्वे वै भवतोपद्रवे सति ॥ ८३ ॥

‘ शत्रुदमन! बड़े दुःखकी बात है कि हमारे साथ ही आज आप इस दुरवस्थामें पहुँच गये हैं और आपहीके कारण ऐसा उपद्रव आया कि हम सब लोग नष्ट हो गये ॥ ८३ ॥

स भवान् रथमास्थाय सर्वोपकरणान्वितम् ।

त्वरमाणोऽभिनिर्यातु विप्रेभ्योऽर्थविभावकः ॥ ८४ ॥

‘ महाराज! आप विजयमें प्राप्त हुए धनका ब्राह्मणोंको दान करनेके लिये अस्त्र- शस्त्र आदि सभी आवश्यक सामग्रियोंसे सुसज्जित रथपर बैठकर शीघ्र यहाँसे युद्धके लिये निकलिये ॥ ८४ ॥

वाचयित्वा द्विजश्रेष्ठानद्यैव गजसाह्वयम् ।

अस्त्रविद्भिः परिवृतो भ्रातृभिर्दृढधन्विभिः ॥ ८५ ॥

आशीविषसमैर्वीरैर्मरुद्भिरिव वृत्रहा ।

अमित्रांस्तेजसा मृद्नन्नसुरानिव वृत्रहा ।

श्रियमादत्स्व कौन्तेय धार्तराष्ट्रान् महाबल ॥ ८६ ॥

‘ जैसे सर्पोंके समान भयंकर शूरवीर देवताओंसे घिरे हुए वृत्रनाशक इन्द्र असुरोंपर आक्रमण करते हैं, उसी प्रकार अस्त्र - विद्याके ज्ञाता और सुदृढ़ धनुष धारण करनेवाले हम

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सब भाइयोंसे घिरे हुए आप श्रेष्ठ ब्राह्मणोंसे स्वस्तिवाचन कराकर आज ही हस्तिनापुरपर चढ़ाई कीजिये । महाबली कुन्तीकुमार! जैसे इन्द्र अपने तेजसे दैत्योंको मिट्टीमें मिला देते हैं, उसी प्रकार आप अपने प्रभावसे शत्रुओंको मिट्टीमें मिलाकर धृतराष्ट्रपुत्र दुर्योधनसे अपनी राजलक्ष्मीको ले लीजिये ॥ ८५-८६ ॥

न हि गाण्डीवमुक्तानां शराणां गार्ध्रवाससाम् ।

स्पर्शमाशीविषाभानां मर्त्यः कश्चन संसहेत् ॥ ८७ ॥

' मनुष्योंमें कोई ऐसा नहीं है, जो गाण्डीव धनुषसे छूटे हुए विषैले सर्पोंके समान भयंकर गृध्रपंखयुक्त बाणोंका स्पर्श सह सके ॥ ८७ ॥

न स वीरो न मातङ्गो न च सोऽश्वोऽस्ति भारत ।

यः सहेत गदावेगं मम क्रुद्धस्य संयुगे ॥ ८८ ॥

‘ भारत! इसी प्रकार जगत्में ऐसा कोई अश्व या गजराज या कोई वीर पुरुष भी नहीं है, जो रणभूमिमें क्रोधपूर्वक विचरनेवाले मुझ भीमसेनकी गदाका वेग सह सके ॥ ८८ ॥

सृञ्जयैः सह कैकेयैर्वृष्णीनां वृषभेण च ।

कथंस्विद् युधि कौन्तेय न राज्यं प्राप्नुयामहे ॥ ८ ९ ॥

‘ कुन्तीनन्दन! सृजय और कैकयवंशी वीरों तथा वृष्णिवंशावतंस भगवान् श्रीकृष्णके साथ होकर हम संग्राममें अपना राज्य कैसे नहीं प्राप्त कर लेंगे? ॥ ८९ ॥

शत्रुहस्तगतां राजन् कथंस्विन्नाहरेर्महीम् ।

इह यत्नमुपाहृत्य बलेन महतान्वितः ॥ ९ ० ॥

‘ राजन्! आप विशाल सेनासे सम्पन्न हो यहाँ प्रयत्नपूर्वक युद्ध ठानकर शत्रुओंके हाथमें गयी हुई पृथ्वीको उनसे छीन क्यों नहीं लेते? ' ॥ ९० ॥

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि अर्जुनाभिगमनपर्वणि भीमवाक्ये त्रयस्त्रिंशोऽध्यायः ॥ ३३ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत अर्जुनाभिगमनपर्वमें भीमवाक्यविषयक तैंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३३ ॥

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चतुस्त्रिंशोऽध्यायः धर्म और नीतिकी बात कहते हुए युधिष्ठिरकी अपनी प्रतिज्ञाके पालनरूप धर्मपर ही डटे रहने की घोषणा वैशम्पायन उवाच स एवमुक्तस्तु महानुभावः सत्यव्रतो भीमसेनेन राजा । अजातशत्रुस्तदनन्तरं वै धैर्यान्वितो वाक्यमिदं बभाषे ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! भीमसेन जब इस प्रकार अपनी बात पूरी कर चुके, तब महानुभाव, सत्यप्रतिज्ञ एवं अजातशत्रु राजा युधिष्ठिरने धैर्यपूर्वक उनसे यह बात कही— ॥ १ ॥

युधिष्ठिर उवाच असंशयं भारत सत्यमेतद् यन्मां तुदन् वाक्यशल्यैः क्षिणोषि । न त्वां विगर्हे प्रतिकूलमेव ममानयाद्धि व्यसनं व आगात् ॥ २ ॥

युधिष्ठिर बोले- भरतकुलनन्दन! तुम मुझे पीड़ा देते हुए अपने वाग्बाणोंद्वारा मेरे हृदयको जो विदीर्ण कर रहे हो, यह निःसंदेह ठीक ही है । मेरे प्रतिकूल होनेपर भी इन बातोंके लिये मैं तुम्हारी निन्दा नहीं करता; क्योंकि मेरे ही अन्यायसे तुमलोगोंपर यह विपत्ति आयी है ॥ २ ॥

अहं ह्यक्षानन्वपद्यं जिहीर्षन् राज्यं सराष्ट्रं धृतराष्ट्रस्य पुत्रात् । तन्मां शठः कितवः प्रत्यदेवीत् सुयोधनार्थं सुबलस्य पुत्रः ॥ ३ ॥

उन दिनों धृतराष्ट्रपुत्र दुर्योधनके हाथसे उसके राष्ट्र तथा राजपदका अपहरण करनेकी इच्छा रखकर ही मैं द्यूतक्रीड़ामें प्रवृत्त हुआ था; किंतु उस समय धूर्त जुआरी सुबलपुत्र शकुनि दुर्योधनके लिये उसकी ओरसे मेरे विपक्षमें आकर जुआ खेलने लगा ॥ ३ ॥

महामायः शकुनिः पर्वतीयः सभामध्ये प्रवपन्नक्षपूगान् । अमायिनं मायया प्रत्यजैषीत्

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ततोऽपश्यं वृजिनं भीमसेन ॥ ४ ॥

भीमसेन! पर्वतीय प्रदेशका निवासी शकुनि बड़ा मायावी है । उसने द्यूतसभामें पासे फेंककर अपनी मायाद्वारा मुझे जीत लिया; क्योंकि मैं माया नहीं जानता था; इसीलिये मुझे यह संकट देखना पड़ा है ॥ ४ ॥

अक्षांश्च दृष्ट्वा शकुनेर्यथावत् कामानुकूलानयुजो युजश्च । शक्यो नियन्तुमभविष्यदात्मा मन्युस्तु हन्यात् पुरुषस्य धैर्यम् ॥ ५ ॥

शकुनिके सम और विषम सभी पासोंको उसकी इच्छाके अनुसार ही ठीक- ठीक पड़ते देखकर यदि अपने मनको जूएकी ओरसे रोका जा सकता तो यह अनर्थ न होता, परंतु क्रोधावेश मनुष्यके धैर्यको नष्ट कर देता है ( इसीलिये मैं जूएसे अलग न हो सका ) ॥ ५ ॥

यन्तुं नात्मा शक्यते पौरुषेण मानेन वीर्येण च तात नद्धः । न ते वाचो भीमसेनाभ्यसूये मन्ये तथा तद् भवितव्यमासीत् ॥ ६ ॥

तात भीमसेन! किसी विषयमें आसक्त हुए चित्तको पुरुषार्थ, अभिमान अथवा पराक्रमसे नहीं रोका जा सकता ( अर्थात्र उसे रोकना बहुत ही कठिन है ), अतः मैं तुम्हारी

बातोंके लिये बुरा नहीं मानता । मैं समझता हूँ, वैसी ही भवितव्यता थी ॥ ६ ॥

स नो राजा धृतराष्ट्रस्य पुत्रो न्यपातयद् व्यसने राज्यमिच्छन् । दास्यं च नोऽगमयद् भीमसेन यत्राभवच्छरणं द्रौपदी नः ॥ ७ ॥

भीमसेन! धृतराष्ट्रके पुत्र राजा दुर्योधनने राज्य पानेकी इच्छासे हमलोगोंको विपत्तिमें डाल दिया । हमें दासतक बना लिया था, किंतु उस समय द्रौपदी हमलोगोंकी रक्षक हुई ॥ ७ ॥

त्वं चापि तद् वेत्थ धनंजयश्च पुनर्धूतायागतानां सभां नः । यन्माऽब्रवीद् धृतराष्ट्रस्य पुत्र एकग्लहार्थं भरतानां समक्षम् ॥ ८ ॥

तुम और अर्जुन दोनों इस बातको जानते हो कि जब हम पुनः द्यूतके लिये बुलाये जानेपर उस सभामें आये तो उस समय समस्त भरतवंशियोंके समक्ष धृतराष्ट्रपुत्र दुर्योधनने मुझसे एक ही दाँव लगानेके लिये इस प्रकार कहा— ॥ ८ ॥

वने समा द्वादश राजपुत्र

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यथाकामं विदितमजातशत्रो । अथापरं चाविदितं चरेथाः सर्वैः सह भ्रातृभिश्छद्मगूढः ॥ ९ ॥

‘ राजकुमार अजातशत्रो! ( यदि आप हार जायँ तो) आपको बारह वर्षोंतक इच्छानुसार सबकी जानकारीमें और पुनः एक वर्षतक गुप्त वेषमें छिपे रहकर अपने भाइयोंके साथ वनमें निवास करना पड़ेगा ॥ ९ ॥

त्वां चेच्छ्रुत्वा तात तथा चरन्त- मवभोत्स्यन्ते भरतानां चराश्च । अन्यांश्चरेथास्तावतोऽब्दांस्तथा त्वं निश्चित्य तत् प्रतिजानीहि पार्थ ॥ १० ॥

‘ कुन्तीकुमार! यदि भरतवंशियोंके गुप्तचर आपके गुप्त निवासका समाचार सुनकर पता लगाने लगें और उन्हें यह मालूम हो जाय कि आपलोग अमुक जगह अमुक रूपमें रह रहे हैं, तब आपको पुनः उतने ( बारह ) ही वर्षोंतक वनमें रहना पड़ेगा । इस बातको निश्चय करके इसके विषयमें प्रतिज्ञा कीजिये ॥ १० ॥

चरेश्चेन्नोऽविदितः कालमेतं युक्तो राजन् मोहयित्वा मदीयान् । ब्रवीमि सत्यं कुरुसंसदीह तवैव ता भारत पञ्च नद्यः ॥ ११ ॥

‘ भरतवंशी नरेश! यदि आप सावधान रहकर इतने समयतक मेरे गुप्तचरोंको मोहित करके अज्ञात- भावसे ही विचरते रहें तो मैं यहाँ कौरवोंकी सभामें यह सत्य प्रतिज्ञा करता हूँ कि उस सारे पंचनदप्रदेशपर फिर तुम्हारा ही अधिकार होगा ॥ ११ ॥

वयं चैतद् भारत सर्व एव त्वया जिताः कालमपास्य भोगान् । वसेम इत्याह पुरा स राजा मध्ये कुरूणां स मयोक्तस्तथेति ॥ १२ ॥

‘ भारत! यदि आपने ही हम सब लोगोंको जीत लिया तो हम भी उतने ही समयतक सारे भोगोंका परित्याग करके उसी प्रकार वास करेंगे । ' राजा दुर्योधनने जब समस्त कौरवोंके बीच इस प्रकार कहा, तब मैंने भी ' तथास्तु ' कहकर उसकी बात मान ली ॥ १२ ॥

तत्र द्यूतमभवन्नो जघन्यं तस्मिञ्जिताः प्रव्रजिताश्च सर्वे । इत्थं तु देशाननुसंचरामो वनानि कृच्छ्राणि च कृच्छ्ररूपाः ॥ १३ ॥

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फिर वहाँ हमलोगोंका अन्तिम बार निन्दनीय जूआ हुआ । उसमें हम सब लोग हार गये और घर छोड़कर वनमें निकल आये । इस प्रकार हम कष्टप्रद वेष धारण करके कष्टदायक वनों और विभिन्न प्रदेशोंमें घूम रहे हैं ॥ १३ ॥

सुयोधनश्चापि न शान्तिमिच्छन् भूयः स मन्योर्वशमन्वगच्छत् । उद्योजयामास कुरूंश्च सर्वान् ये चास्य केचिद् वशमन्वगच्छन् ॥ १४ ॥

उधर दुर्योधन भी शान्तिकी इच्छा न रखकर और भी क्रोधके वशीभूत हो गया है । उसने हमें तो कष्टमें डाल दिया और दूसरे समस्त कौरवोंको जो उसके वशमें होकर उसीका अनुसरण करते रहे हैं, (देशशासक और दुर्गरक्षक आदि) ऊँचे पदोंपर प्रतिष्ठित कर दिया है ॥ १४ ॥

तं संधिमास्थाय सतां सकाशे को नाम जह्यादिह राज्यहेतोः । आर्यस्य मन्ये मरणाद् गरीयो यद्धर्ममुत्क्रम्य महीं प्रशासेत् ॥ १५ ॥

कौरव - सभामें साधु पुरुषोंके समीप वैसी सन्धिका आश्रय लेकर यानी प्रतिज्ञा करके अब यहाँ राज्यके लिये उसे कौन तोड़े? धर्मका उल्लंघन करके पृथ्वीका शासन करना तो किसी श्रेष्ठ पुरुषके लिये मृत्युसे भी बढ़कर दुःखदायक है - ऐसा मेरा मत है ॥ १५ ॥

तदैव चेद् वीर कर्माकरिष्यो यदा द्यूते परिघं पर्यमृक्षः । बाहू दिधक्षन् वारितः फाल्गुनेन किं दुष्कृतं भीम तदाभविष्यत् ॥ १६ ॥

प्रागेव चैवं समयक्रियायाः किं नाब्रवीः पौरुषमाविदानः । प्राप्तं तु कालं त्वभिपद्य पश्चात् किं मामिदानीमतिवेलमात्थ ॥ १७ ॥

वीर भीमसेन! द्यूतके समय जब तुमने मेरी दोनों बाँहोंको जला देनेकी इच्छा प्रकट की और अर्जुनने तुम्हें रोका, उस समय तुम शत्रुओंपर आघात करनेके लिये अपनी गदापर हाथ फेरने लगे थे । यदि उसी समय तुमने शत्रुओंपर आघात कर दिया होता तो कितना अनर्थ हो जाता । तुम अपना पुरुषार्थ तो जानते ही थे । जब मैं पूर्वोक्त प्रकारकी प्रतिज्ञा करने लगा उससे पहले ही तुमने ऐसी बात क्यों नहीं कही? जब प्रतिज्ञाके अनुसार वनवासका समय स्वीकार कर लिया, तब पीछे चलकर इस समय क्यों मुझसे अत्यन्त कठोर बातें कहते हो? ॥ १६-१७ ॥

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भूयोऽपि दुःखं मम भीमसेन दूये विषस्येव रसं हि पीत्वा । यद् याज्ञसेनीं परिक्लिश्यमानां संदृश्य तत् क्षान्तमिति स्म भीम ॥ १८ ॥

भीमसेन! मुझे इस बातका भी बड़ा दुःख है कि द्रौपदीको शत्रुओं द्वारा क्लेश दिया जा रहा था और हमने अपनी आँखों देखकर भी उसे चुपचाप सह लिया । जैसे कोई विष घोलकर पी ले और उसकी पीड़ासे कराहने लगे, वैसी ही वेदना इस समय मुझे हो रही है ॥ १८ ॥

न त्वद्य शक्यं भरतप्रवीर कृत्वा यदुक्तं कुरुवीरमध्ये । कालं प्रतीक्षस्व सुखोदयस्य पक्तिं फलानामिव बीजवापः ॥ १ ९ ॥ भरतवंशके प्रमुख वीर! कौरव वीरोंके बीच मैंने जो प्रतिज्ञा की है, उसे स्वीकार कर लेनेके बाद अब इस समय आक्रमण नहीं किया जा सकता । जैसे बीज बोनेवाला किसान अपनी खेतीके फलोंके पकनेकी बाट जोहता रहता है, उसी प्रकार तुम भी उस समयकी प्रतीक्षा करो, जो हमारे लिये सुखकी प्राप्ति करानेवाला है ॥ १ ९ ॥ यदा हि पूर्वं निकृतो निकृन्तेद् वैरं सपुष्पं सफलं विदित्वा । महागुणं हरति हि पौरुषेण तदा वीरो जीवति जीवलोके ॥ २० ॥

जब पहले शत्रुके द्वारा धोखा खाया हुआ वीर पुरुष उसे फूलता- फलता जानकर अपने पुरुषार्थके द्वारा उसका मूलोच्छेद कर डालता है, तभी उस शत्रुके महान् गुणोंका अपहरण कर लेता है और इस जगत् में सुखपूर्वक जीवित रहता है ॥ २० ॥

श्रियं च लोके लभते समग्रां मन्ये चास्मै शत्रवः संनमन्ते । मित्राणि चैनमचिराद् भजन्ते देवा इवेन्द्रमुपजीवन्ति चैनम् ॥ २१ ॥

वह वीर पुरुष लोकमें सम्पूर्ण लक्ष्मीको प्राप्त कर लेता है । मैं यह भी मानता हूँ कि सभी शत्रु उसके सामने नतमस्तक हो जाते हैं । फिर थोड़े ही दिनोंमें उसके बहुत- से मित्र बन जाते हैं और जैसे देवता इन्द्रके सहारे जीवन धारण करते हैं, उसी प्रकार वे मित्रगण उस वीरकी छत्रछायामें रहकर जीवन निर्वाह करते हैं ॥ २१ ॥

मम प्रतिज्ञां च निबोध सत्यां वृणे धर्मममृताज्जीविताच्च ।

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राज्यं च पुत्राश्च यशो धनं च सर्वं न सत्यस्य कलामुपैति ॥ २२ ॥

किंतु भीमसेन! मेरी यह सच्ची प्रतिज्ञा सुनो । मैं जीवन और अमरत्वकी अपेक्षा भी धर्मको ही बढ़कर समझता हूँ। राज्य, पुत्र, यश और धन – ये सब- के - सब सत्यधर्मकी सोलहवीं कलाको भी नहीं पा सकते ॥ २२ ॥

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि अर्जुनाभिगमनपर्वणि युधिष्ठिरवाक्ये चतुस्त्रिंशोऽध्यायः ॥ ३४ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत अर्जुनाभिगमनपर्वमें युधिष्ठिरवाक्यविषयक चौंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३४ ॥