02.Mahabharata Volume 2 — पृष्ठ 301–310
महाभारत — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 301–310
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‘ वीर! तुम हमारे लिये वनके निकट आनेके कारण भय न करो । हम तो वनवासी हैं, अतः हमारे लिये इस भूमिपर विचरना सदा उचित ही है ॥ २३ ॥
त्वया तु दुष्करः कस्मादिह वासः प्ररोचितः ।
वयं तु बहुसत्त्वेऽस्मिन् निवसामस्तपोधन ॥ २४ ॥
'किंतु तुमने यहाँका दुष्कर निवास कैसे पसंद किया? तपोधन! हम तो अनेक प्रकारके जीव -जन्तुओंसे भरे हुए इस वनमें सदा ही रहते हैं ॥ २४ ॥
भवांस्तु कृष्णवर्त्माभः सुकुमारः सुखोचितः ।
कथं शून्यमिमं देशमेकाकी विचरिष्यति ॥ २५ ॥
' तुम्हारे अंगोंकी प्रभा प्रज्वलित अग्निके समान जान पड़ती है । तुम सुकुमार हो और सुख भोगनेके योग्य प्रतीत होते हो। इस निर्जन प्रदेशमें किसलिये अकेले विचर रहे हो? ' ॥ २५ ॥
अर्जुन उवाच
गाण्डीवमाश्रयं कृत्वा नाराचांश्चाग्निसंनिभान् ।
निवसामि महारण्ये द्वितीय इव पावकिः ॥ २६ ॥
अर्जुनने कहा- मैं गाण्डीव धनुष और अग्निके समान तेजस्वी बाणोंका आश्रय लेकर इस महान् वनमें द्वितीय कार्तिकेयकी भाँति ( निर्भय ) निवास करता हूँ ॥ २६ ॥
एष चापि मया जन्तुर्मृगरूपं समाश्रितः ।
राक्षसो निहतो घोरो हन्तुं मामिह चागतः ॥ २७ ॥
यह प्राणी हिंसक पशुका रूप धारण करके मुझे ही मारनेके लिये यहाँ आया था, अतः इस भयंकर राक्षसको मैंने मार गिराया है ॥ २७ ॥
किरात उवाच
मयैष धन्वनिर्मुक्तैस्ताडितः पूर्वमेव हि ।
बाणैरभिहतः शेते नीतश्च यमसादनम् ॥ २८ ॥
किरातरूपधारी शिव बोले- मैंने अपने धनुषद्वारा छोड़े हुए बाणोंसे पहले ही इसे घायल कर दिया था । मेरे ही बाणोंकी चोट खाकर यह सदाके लिये सो रहा है और यमलोकमें पहुँच गया ॥ २८ ॥
ममैष लक्ष्यभूतो हि मम पूर्वपरिग्रहः ।
ममैव च प्रहारेण जीविताद् व्यपरोपितः ॥ २९ ॥
मैंने ही पहले इसे अपने बाणोंका निशाना बनाया, अतः तुमसे पहले इसपर मेरा अधिकार स्थापित हो चुका था । मेरे ही तीव्र प्रहारसे इस दानवको अपने प्राणोंसे हाथ धोना पड़ा है ॥ २ ९ ॥ दोषान् स्वान् नार्हसेऽन्यस्मै वक्तुं स्वबलदर्पितः ।
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अवलिप्तोऽसि मन्दात्मन् न मे जीवन् विमोक्ष्यसे ॥ ३० ॥
मन्दबुद्धे! तुम अपने बलके घमंडमें आकर अपने दोष दूसरेपर नहीं मढ़ सकते । तुम्हें अपनी शक्तिपर बड़ा गर्व है; अतः अब तुम मेरे हाथसे जीवित नहीं बच सकते ॥ ३० ॥
स्थिरो भवस्व मोक्ष्यामि सायकानशनीनिव ।
घटस्व परया शक्त्या मुञ्च त्वमपि सायकान् ॥ ३१ ॥
धैर्यपूर्वक सामने खड़े रहो, मैं वज्रके समान भयानक बाण छोडूंगा । तुम भी अपनी
पूरी शक्ति लगाकर मुझे जीतनेका प्रयास करो । मेरे ऊपर अपने बाण छोड़ो ॥ ३१ ॥
तस्य तद् वचनं श्रुत्वा किरातस्यार्जुनस्तदा ।
रोषमाहारयामास ताडयामास चेषुभिः ॥ ३२ ॥
किरातकी वह बात सुनकर उस समय अर्जुनको बड़ा क्रोध हुआ । उन्होंने बाणोंसे उसपर प्रहार आरम्भ किया ॥ ३२ ॥
ततो हृष्टेन मनसा प्रतिजग्राह सायकान् ।
भूयो भूय इति प्राह मन्दमन्देत्युवाच ह ॥ ३३ ॥
प्रहरस्व शरानेतान् नाराचान् मर्मभेदिनः । तब किरातने प्रसन्नचित्तसे अर्जुनके छोड़े हुए सभी बाणोंको पकड़ लिया और कहा -'ओ मूर्ख! और बाण मार और बाण मार, इन मर्मभेदी नाराचोंका प्रहार कर' ॥ ३३३ ॥
इत्युक्तो बाणवर्षं स मुमोच सहसार्जुनः ॥ ३४ ॥
उसके ऐसा कहनेपर अर्जुनने सहसा बाणोंकी झड़ी लगा दी ॥ ३४ ॥
ततस्तौ तत्र संरब्धौ राजमानौ मुहुर्मुहुः ।
शरैराशीविषाकारैस्ततक्षाते परस्परम् ॥ ३५ ॥
तदनन्तर वे दोनों क्रोधमें भरकर बारंबार सर्पाकार बाणोंद्वारा एक- दूसरेको घायल करने लगे । उस समय उन दोनोंकी बड़ी शोभा होने लगी ॥ ३५ ॥
ततोऽर्जुनः शरवर्षं किराते समवासृजत् ।
तत् प्रसन्नेन मनसा प्रतिजग्राह शङ्करः ॥ ३६ ॥
तत्पश्चात् अर्जुनने किरातपर बाणोंकी वर्षा प्रारम्भ की; परंतु भगवान् शंकरने प्रसन्नचित्तसे उन सब बाणोंको ग्रहण कर लिया ॥ ३६ ॥
मुहूर्तं शरवर्षं तत् प्रतिगृह्य पिनाकधृक् ।
अक्षतेन शरीरेण तस्थौ गिरिरिवाचलः ॥ ३७ ॥
पिनाकधारी शिव दो ही घड़ीमें सारी बाण- वर्षाको अपनेमें लीन करके पर्वतकी भाँति अविचल भावसे खड़े रहे । उनके शरीरपर तनिक भी चोट या क्षति नहीं पहुँची थी ॥ ३७ ॥
स दृष्ट्वा बाणवर्षं तु मोघीभूतं धनंजयः ।
परमं विस्मयं चक्रे साधु साध्विति चाब्रवीत् ॥ ३८ ॥
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अपनी की हुई सारी बाण- वर्षा व्यर्थ हुई देख धनंजयको बड़ा आश्चर्य हुआ । वे किरातको साधुवाद देने लगे और बोले— ॥। ३८ ॥
अहोऽयं सुकुमाराङ्गो हिमवच्छिखराश्रयः ।
गाण्डीवमुक्तान् नाराचान् प्रतिगृह्णात्यविह्वलः ॥ ३ ९
‘ अहो! हिमालयके शिखरपर निवास करनेवाले इस किरातके अंग तो बड़े सुकुमार हैं, तो भी यह गाण्डीव धनुषसे छूटे हुए बाणोंको ग्रहण कर लेता है और तनिक भी व्याकुल नहीं होता ॥ ३ ९ ॥
कोऽयं देवो भवेत् साक्षाद् रुद्रो यक्षः सुरोऽसुरः ।
विद्यते हि गिरिश्रेष्ठे त्रिदशानां समागमः ॥ ४० ॥
‘ यह कौन है? साक्षात् भगवान् रुद्रदेव, यक्ष, देवता अथवा असुर तो नहीं है । इस श्रेष्ठ पर्वतपर देवताओंका आना- जाना होता रहता है ॥ ४० ॥
न हि मद्बाणजालानामुत्सृष्टानां सहस्रशः ।
शक्तोऽन्यः सहितुं वेगमृते देवं पिनाकिनम् ॥ ४१ ॥
‘ मैंने सहस्रों बार जिन बाण- समूहोंकी वृष्टि की है, उनका वेग पिनाकधारी भगवान् शंकरके सिवा दूसरा कोई नहीं सह सकता ॥ ४१ ॥
देवो वा यदि वा यक्षो रुद्रादन्यो व्यवस्थितः ।
अहमेनं शरैस्तीक्ष्णैर्नयामि यमसादनम् ॥ ४२ ॥
' यदि यह रुद्रदेवसे भिन्न व्यक्ति है तो यह देवता हो या यक्ष- मैं इसे तीखे बाणोंसे मारकर अभी यमलोक भेजता हूँ' ॥ ४२ ॥
ततो हृष्टमना जिष्णुर्नाराचान् मर्मभेदिनः ।
व्यसृजच्छतधा राजन् मयूखानिव भास्करः ॥ ४३ ॥
राजन्! यह सोचकर प्रसन्नचित्त अर्जुनने सहस्रों किरणोंको फैलानेवाले भगवान् भास्करकी भाँति सैकड़ों मर्मभेदी नाराचोंका प्रहार किया ॥ ४३ ॥
तान् प्रसन्नेन मनसा भगवाँल्लोकभावनः ।
शूलपाणिः प्रत्यगृह्णाच्छिलावर्षमिवाचलः ॥ ४४ ॥
परंतु त्रिशूलधारी भूतभावन भगवान् भवने हर्षभरे हृदयसे उन सब नाराचोंको उसी प्रकार आत्मसात् कर लिया, जैसे पर्वत पत्थरोंकी वर्षाको ॥ ४४ ॥
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अर्जुनकी तपस्या अर्जुनका किरातवेषधारी भगवान् शिवपर बाण चलाना
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क्षणेन क्षीणबाणोऽथ संवृत्तः फाल्गुनस्तदा ।
भीश्चैनमाविशत् तीव्रा तं दृष्ट्वा शरसंक्षयम् ॥ ४५ ॥
उस समय एक ही क्षणमें अर्जुनके सारे बाण समाप्त हो चले । उन बाणोंका इस प्रकार विनाश देखकर उनके मनमें बड़ा भय समा गया ॥ ४५ ॥
चिन्तयामास जिष्णुस्तु भगवन्तं हुताशनम् ।
पुरस्तादक्षयौ दत्तौ तूणौ येनास्य खाण्डवे ॥ ४६ ॥
विजयी अर्जुनने उस समय भगवान् अग्निदेवका चिन्तन किया, जिन्होंने खाण्डववनमें प्रत्यक्ष दर्शन देकर उन्हें दो अक्षय तूणीर प्रदान किये थे ॥ ४६ ॥
किं नु मोक्ष्यामि धनुषा यन्मे बाणाः क्षयं गताः ।
अयं च पुरुषः कोऽपि बाणान् ग्रसति सर्वशः ॥ ४७ ॥
हत्वा चैनं धनुष्कोट्या शूलाग्रेणेव कुञ्जरम् ।
नयामि दण्डधारस्य यमस्य सदनं प्रति ॥ ४८ ॥
वे मन- ही - मन सोचने लगे, ' मेरे सारे बाण नष्ट हो गये, अब मैं धनुषसे क्या चलाऊँगा । यह कोई अद्भुत पुरुष है, जो मेरे सारे बाणोंको खाये जा रहा है। अच्छा, अब मैं शूलके अग्रभागसे घायल किये जानेवाले हाथीकी भाँति इसे धनुषकी कोटि ( नोक ) -से मारकर दण्डधारी यमराजके लोकमें पहुँचा देता हूँ' ॥ ४७-४८ ॥
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प्रगृह्याथ धनुष्कोट्या ज्यापाशेनावकृष्य च ।
मुष्टिभिश्चापि हतवान् वज्रकल्पैर्महाद्युतिः ॥ ४ ९ ॥
ऐसा विचारकर महातेजस्वी अर्जुनने किरातको अपने धनुषकी कोटिसे पकड़कर उसकी प्रत्यंचामें उसके शरीरको फँसाकर खींचा और वज्रके समान दुःसह मुष्टिप्रहारसे पीड़ित करना प्रारम्भ किया ॥ ४ ९ ॥
सम्प्रयुद्धो धनुष्कोट्या कौन्तेयः परवीरहा ।
तदप्यस्य धनुर्दिव्यं जग्राह गिरिगोचरः ॥ ५० ॥
शत्रु - वीरोंका संहार करनेवाले कुन्तीकुमार अर्जुनने जब धनुषकी कोटिसे प्रहार किया, तब उस पर्वतीय किरातने अर्जुनके उस दिव्य धनुषको भी अपनेमें लीन कर लिया ॥ ५० ॥
ततोऽर्जुनो ग्रस्तधनुः खड्गपाणिरतिष्ठत ।
युद्धस्यान्तमभीप्सन् वै वेगेनाभिजगाम तम् ॥ ५१ ॥
तदनन्तर धनुषके ग्रस्त हो जानेपर अर्जुन हाथमें तलवार लेकर खड़े हो गये और युद्धका अन्त कर देनेकी इच्छासे वेगपूर्वक उसपर आक्रमण किया ॥ ५१ ॥
तस्य मूर्ध्नि शितं खड्गमसक्तं पर्वतेष्वपि ।
मुमोच भुजवीर्येण विक्रम्य कुरुनन्दनः ॥ ५२ ॥
उनकी वह तलवार पर्वतोंपर भी कुण्ठित नहीं होती थी। कुरुनन्दन अर्जुनने अपने भुजाओंकी पूरी शक्ति लगाकर किरातके मस्तकपर उस तीक्ष्ण धारवाली तलवारसे वार किया ॥ ५२ ॥
तस्य मूर्धानमासाद्य पफालासिवरो हि सः ।
ततो वृक्षैः शिलाभिश्च योधयामास फाल्गुनः ॥ ५३ ॥
परंतु उसके मस्तकसे टकराते ही वह उत्तम तलवार टूक- टूक हो गयी । तब अर्जुनने वृक्षों और शिलाओंसे युद्ध करना आरम्भ किया ॥ ५३ ॥
तदा वृक्षान् महाकायः प्रत्यगृह्णादथो शिलाः ।
किरातरूपी भगवांस्ततः पार्थो महाबलः ॥ ५४ ॥
मुष्टिभिर्वज्रसंकाशैर्धूममुत्पादयन् मुखे ।
प्रजहार दुराधर्षे किरातसमरूपिणि ॥ ५५ ॥
तब विशालकाय किरातरूपी भगवान् शंकरने उन वृक्षों और शिलाओंको भी ग्रहण कर लिया। यह देखकर महाबली कुन्तीकुमार अपने वज्रतुल्य मुक्कोंसे दुर्धर्ष किरात सदृश रूपवाले भगवान् शिवपर प्रहार करने लगे । उस समय क्रोधके आवेशसे अर्जुनके मुखसे धूम प्रकट हो रहा था ॥ ५४-५५ ॥
ततः शक्राशनिसमैर्मुष्टिभिर्भृशदारुणैः ।
किरातरूपी भगवानर्दयामास फाल्गुनम् ॥ ५६ ॥
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तदनन्तर किरातरूपी भगवान् शिव भी अत्यन्त दारुण और इन्द्रके वज्रके समान दुःसह मुक्कोंसे मारकर अर्जुनको पीड़ा देने लगे ॥ ५६ ॥
ततश्चटचटाशब्दः सुघोरः समपद्यत ।
पाण्डवस्य च मुष्टीनां किरातस्य च युध्यतः ॥ ५७ ॥
फिर तो घमासान युद्धमें लगे हुए पाण्डुनन्दन अर्जुन तथा किरातरूपी शिवके मुक्कोंका एक- दूसरेके शरीरपर प्रहार होनेसे बड़ा भयंकर ' चट- चट' शब्द होने लगा ॥ ५७ ॥
सुमुहूर्तं तु तद् युद्धमभवल्लोमहर्षणम् ।
भुजप्रहारसंयुक्तं वृत्रवासवयोरिव ॥ ५८ ॥
वृत्रासुर और इन्द्रके समान उन दोनोंका वह रोमांचकारी बाहुयुद्ध दो घड़ीतक चलता रहा ॥ ५८ ॥
जघानाथ ततो जिष्णुः किरातमुरसा बली ।
पाण्डवं च विचेष्टं तं किरातोऽप्यहनद् बली ॥ ५ ९ ॥
तत्पश्चात् बलवान् वीर अर्जुनने अपनी छाती से किरातको बड़े जोरसे मारा, तब महाबली किरातने भी विपरीत चेष्टा करनेवाले पाण्डुनन्दन अर्जुनपर आघात किया ॥ ५ ९ ॥
तयोर्भुजविनिष्पेषात् संघर्षेणोरसोस्तथा ।
समजायत गात्रेषु पावकोऽङ्गारधूमवान् ॥ ६० ॥
उन दोनोंकी भुजाओंके टकराने और वक्षःस्थलोंके संघर्षसे उनके अंगोंमें धूम और चिनगारियोंके साथ आग प्रकट हो जाती थी ॥ ६० ॥
तत एनं महादेवः पीड्य गात्रैः सुपीडितम् ।
तेजसा व्यक्रमद् रोषाच्चेतस्तस्य विमोहयन् ॥ ६१ ॥
तदनन्तर! महादेवजीने अपने अंगोंसे दबाकर अर्जुनको अच्छी तरह पीड़ा दी और उनके चित्तको मूर्च्छित - सा करते हुए उन्होंने तेज तथा रोषसे उनके ऊपर अपना पराक्रम प्रकट किया ॥ ६१ ॥
ततोऽभिपीडितैर्गात्रैः पिण्डीकृत इवाबभौ ।
फाल्गुनो गात्रसंरुद्धो देवदेवेन भारत ॥ ६२ ॥
भारत! तदनन्तर देवाधिदेव महादेवजीके अंगोंसे अवरुद्ध हो अर्जुन अपने पीड़ित अवयवोंके साथ मिट्टीके लोंदे - से दिखायी देने लगे ॥ ६२ ॥
निरुच्छ्वासोऽभवच्चैव संनिरुद्धो महात्मना ।
पपात भूम्यां निश्चेष्टो गतसत्त्व इवाभवत् ॥ ६३ ॥
महात्मा भगवान् शंकरके द्वारा भलीभाँति नियन्त्रित हो जानेके कारण अर्जुनकी श्वासक्रिया बंद हो गयी । वे निष्प्राणकी भाँति चेष्टाहीन होकर पृथ्वीपर गिर पड़े ॥ ६३ ॥
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स मुहूर्तं तथा भूत्वा सचेताः पुनरुत्थितः ।
रुधिरेणाप्लुताङ्गस्तु पाण्डवो भृशदुःखितः ॥ ६४ ॥
दो घड़ीतक उसी अवस्थामें पड़े रहनेके पश्चात् जब अर्जुनको चेत हुआ, तब वे उठकर खड़े हो गये । उस समय उनका सारा शरीर खूनसे लथपथ हो रहा था और वे बहुत दुःखी हो गये थे ॥ ६४ ॥
शरण्यं शरणं गत्वा भगवन्तं पिनाकिनम् ।
मृण्मयं स्थण्डिलं कृत्वा माल्येनापूजयद् भवम् ॥ ६५ ॥
तब वे शरणागतवत्सल पिनाकधारी भगवान् शिवकी शरणमें गये और मिट्टीकी वेदी बनाकर उसीपर पार्थिव शिवकी स्थापना करके पुष्पमालाके द्वारा उनका पूजन किया ॥ ६५ ॥
तच्च माल्यं तदा पार्थः किरातशिरसि स्थितम् ।
अपश्यत् पाण्डवश्रेष्ठो हर्षेण प्रकृतिं गतः ॥ ६६ ॥
कुन्तीकुमारने जो माला पार्थिव शिवपर चढ़ायी थी, वह उन्हें किरातके मस्तकपर पड़ी दिखायी दी । यह देखकर पाण्डवश्रेष्ठ अर्जुन हर्षसे उल्लसित हो अपने आपेमें आ गये ॥ ६६ ॥
पपात पादयोस्तस्य ततः प्रीतोऽभवद् भवः ।
उवाच चैनं वचसा मेघगम्भीरगीर्हरः ।
जातविस्मयमालोक्य तपःक्षीणाङ्गसंहतिम् ॥ ६७ ॥
और किरातरूपी भगवान् शंकरके चरणोंमें गिर पड़े । उस समय तपस्याके कारण उनके समस्त अवयव क्षीण हो रहे थे और वे महान् आश्चर्यमें पड़ गये थे, उन्हें इस अवस्थामें देखकर सर्वपापहारी भगवान् भव उनपर बहुत प्रसन्न हुए और मेघके समान गम्भीर वाणीमें बोले ॥ ६७ ॥
भव उवाच
भो भोः फाल्गुन तुष्टोऽस्मि कर्मणाप्रतिमेन ते ।
शौर्येणानेन धृत्या च क्षत्रियो नास्ति ते समः ॥ ६८ ॥
भगवान् शिवने कहा-फाल्गुन! मैं तुम्हारे इस अनुपम पराक्रम, शौर्य और धैर्यसे बहुत संतुष्ट हूँ । तुम्हारे समान दूसरा कोई क्षत्रिय नहीं है ॥ ६८ ॥
समं तेजश्च वीर्यं च ममाद्य तव चानघ ।
प्रीतस्तेऽहं महाबाहो पश्य मां भरतर्षभ ॥ ६ ९ ॥
अनघ! तुम्हारा तेज और पराक्रम आज मेरे समान सिद्ध हुआ है। महाबाहु भरतश्रेष्ठ!
मैं तुमपर बहुत प्रसन्न हूँ । मेरी ओर देखो ॥ ६ ९ ॥
ददामि ते विशालाक्ष चक्षुः पूर्वऋषिर्भवान् ।
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विजेष्यसि रणे शत्रूनपि सर्वान् दिवौकसः ॥ ७० ॥
विशाललोचन! मैं तुम्हें दिव्य दृष्टि देता हूँ। तुम पहलेके ' नर' नामक ऋषि हो । तुम युद्धमें अपने शत्रुओंपर, वे चाहे सम्पूर्ण देवता ही क्यों न हों, विजय पाओगे ॥ ७० ॥
प्रीत्या च तेऽहं दास्यामि यदस्त्रमनिवारितम् ।
त्वं हि शक्तो मदीयं तदस्त्रं धारयितुं क्षणात् ॥ ७१ ॥
मैं तुम्हारे प्रेमवश तुम्हें अपना पाशुपतास्त्र दूँगा, जिसकी गतिको कोई रोक नहीं सकता । तुम क्षणभरमें मेरे उस अस्त्रको धारण करनेमें समर्थ हो जाओगे ॥ ७१ ॥
वैशम्पायन उवाच
ततो देवं महादेवं गिरिशं शूलपाणिनम् ।
ददर्श फाल्गुनस्तत्र सह देव्या महाद्युतिम् ॥ ७२ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं –जनमेजय! तदनन्तर अर्जुनने शूलपाणि महातेजस्वी महादेवजीका देवी पार्वती सहित दर्शन किया ॥ ७२ ॥
स जानुभ्यां महीं गत्वा शिरसा प्रणिपत्य च ।
प्रसादयामास हरं पार्थः परपुरंजयः ॥ ७३ ॥
शत्रुओंकी राजधानीपर विजय पानेवाले कुन्तीकुमारने उनके आगे पृथ्वीपर घुटने टेक दिये और सिरसे प्रणाम करके शिवजीको प्रसन्न किया ॥ ७३ ॥
अर्जुनउवाच
कपर्दिन् सर्वदेवेश भगनेत्रनिपातन ।
देवदेव महादेव नीलग्रीव जटाधर ॥ ७४ ॥
अर्जुन बोले- जटाजूटधारी सर्वदेवेश्वर देवदेव महादेव! आप भगदेवताके नेत्रोंका विनाश करनेवाले हैं । आपकी ग्रीवामें नील चिह्न शोभा पा रहा है । आप अपने मस्तकपर सुन्दर जटा धारण करते हैं ॥ ७४ ॥
कारणानां च परमं जाने त्वां त्र्यम्बकं विभुम् ।
देवानां च गतिं देव त्वत्प्रसूतमिदं जगत् ॥ ७५ ॥
प्रभो! मैं आपको समस्त कारणोंमें सर्वश्रेष्ठ कारण मानता हूँ। आप त्रिनेत्रधारी तथा सर्वव्यापी हैं । सम्पूर्ण देवताओंके आश्रय हैं । देव! यह सम्पूर्ण जगत् आपसे ही उत्पन्न हुआ है ॥ ७५ ॥
अजेयस्त्वं त्रिभिर्लोकैः सदेवासुरमानुषैः ।
शिवाय विष्णुरूपाय विष्णवे शिवरूपिणे ॥ ७६ ॥
देवता, असुर और मनुष्योंसहित तीनों लोक भी आपको पराजित नहीं कर सकते ।
आप ही विष्णुरूप शिव तथा शिवस्वरूप विष्णु हैं, आपको नमस्कार है ॥ ७६ ॥
दक्षयज्ञविनाशाय हरिरुद्राय वै नमः ।
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ललाटाक्षाय शर्वाय मीढुषे शूलपाणये ॥ ७७ ॥
दक्षयज्ञका विनाश करनेवाले हरिहररूप आप भगवान्को नमस्कार है । आपके ललाटमें तृतीय नेत्र शोभा पाता है । आप जगत्का संहारक होनेके कारण शर्व कहलाते हैं ।
भक्तोंकी अभीष्ट कामनाओंकी वर्षा करनेके कारण आपका नाम मीढ्वान् ( वर्षणशील) है ।
अपने हाथमें त्रिशूल धारण करनेवाले आपको नमस्कार है ॥ ७७ ॥
पिनाकगोप्त्रे सूर्याय मंगल्याय च वेधसे ।
प्रसादये त्वां भगवन् सर्वभूतमहेश्वर ॥ ७८ ॥
पिनाकरक्षक, सूर्यस्वरूप, मंगलकारक और सृष्टिकर्ता आप परमेश्वरको नमस्कार है ।
भगवन्! सर्वभूत- महेश्वर! मैं आपको प्रसन्न करना चाहता हूँ ॥ ७८ ॥
गणेशं जगतः शम्भुं लोककारणकारणम् ।
प्रधानपुरुषातीतं परं सूक्ष्मतरं हरम् ॥ ७ ९ ॥
आप भूतगणोंके स्वामी, सम्पूर्ण जगत्का कल्याण करनेवाले तथा जगत्के कारणके भी कारण हैं । प्रकृति और पुरुष दोनोंसे परे अत्यन्त सूक्ष्मस्वरूप तथा भक्तोंके पापोंको हरनेवाले हैं ॥ ७ ९ ॥
व्यतिक्रमं मे भगवन् क्षन्तुमर्हसि शंकर ।
भगवन् दर्शनाकाङ्क्षी प्राप्तोऽस्मीमं महागिरिम् ॥ ८० ॥
कल्याणकारी भगवन्! मेरा अपराध क्षमा कीजिये । भगवन्! मैं आपहीके दर्शनकी इच्छा लेकर इस महान् पर्वतपर आया हूँ ॥ ८० ॥
दयितं तव देवेश तापसालयमुत्तमम् ।
प्रसादये त्वां भगवन् सर्वलोकनमस्कृतम् ॥ ८१ ॥
देवेश्वर! यह शैल - शिखर तपस्वियोंका उत्तम आश्रय तथा आपका प्रिय निवासस्थान है । प्रभो! सम्पूर्ण जगत् आपके चरणोंमें वन्दना करता है । मैं आपसे यह प्रार्थना करता हूँ कि आप मुझपर प्रसन्न हों ॥ ८१ ॥