02.Mahabharata Volume 2 — पृष्ठ 311–320
महाभारत — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 311–320
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न मे स्यादपराधोऽयं महादेवातिसाहसात् ।
कृतो मयायमज्ञानाद् विमर्दो यस्त्वया सह ।
शरणं प्रतिपन्नाय तत् क्षमस्वाद्य शंकर ॥ ८२ ॥
महादेव! अत्यन्त साहसवश मैंने जो आपके साथ यह युद्ध किया है, इसमें मेरा अपराध नहीं है । यह अनजानमें मुझसे बन गया है । शंकर! मैं अब आपकी शरणमें आया हूँ । आप मेरी उस धृष्टताको क्षमा करें ॥ वैशम्पायन उवाच
तमुवाच महातेजाः प्रहस्य वृषभध्वजः ।
प्रगृह्य रुचिरं बाहुं क्षान्तमित्येव फाल्गुनम् ॥ ८३ ॥
वैशम्पायनजीने कहा -जनमेजय! तब महातेजस्वी भगवान् वृषभध्वजने अर्जुनका सुन्दर हाथ पकड़कर उनसे हँसते हुए कहा-' मैंने तुम्हारा अपराध पहलेसे ही क्षमा कर दिया' ॥ ८३ ॥
परिष्वज्य च बाहुभ्यां प्रीतात्मा भगवान् हरः ।
पुनः पार्थं सान्त्वपूर्वमुवाच वृषभध्वजः ॥ ८४ ॥
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फिर उन्हें दोनों भुजाओंसे खींचकर हृदयसे लगाया और प्रसन्नचित्त हो वृषके चिह्नसे अंकितध्वजा धारण करनेवाले भगवान् रुद्रने पुनः कुन्तीकुमारको सान्त्वना देते हुए कहा ॥ ८४ ॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि कैरातपर्वणि महादेवस्तवे एकोनचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ३ ९ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत कैरातपर्वमें महादेवजीकी स्तुतिसे सम्बन्ध रखनेवाला उनतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३ ९ ॥
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चत्वारिंशोऽध्यायः भगवान् शंकरका अर्जुनको वरदान देकर अपने धामको प्रस्थान देवदेव उवाच
नरस्त्वं पूर्वदेहे वै नारायणसहायवान् ।
बदर्यां तप्तवानुग्रं तपो वर्षायुतान् बहून् ॥ १ ॥
देवदेव महादेवजी बोले- अर्जुन! तुम पूर्व- शरीरमें ' नर ' नामक सुप्रसिद्ध ऋषि थे । नारायण तुम्हारे सखा हैं । तुमने बदरिकाश्रममें अनेक सहस्र वर्षोंतक उग्र तपस्या की है ॥ १ ॥
त्वयि वा परमं तेजो विष्णौ वा पुरुषोत्तमे ।
युवाभ्यां पुरुषाग्रयाभ्यां तेजसा धार्यते जगत् ॥ २ ॥
तुममें अथवा पुरुषोत्तम भगवान् विष्णुमें उत्कृष्ट तेज है । तुम दोनों पुरुषरत्नोंने अपने तेजसे इस सम्पूर्ण जगत्को धारण कर रखा है ॥ २ ॥
शक्राभिषेके सुमहद्धनुर्जलदनिःस्वनम् ।
प्रगृह्य दानवाः शस्तास्त्वया कृष्णेन च प्रभो ॥ ३ ॥
प्रभो! तुमने और श्रीकृष्णने इन्द्रके अभिषेकके समय मेघके समान गम्भीर घोष करनेवाले महान् धनुषको हाथमें लेकर बहुत - से दानवोंका वध किया था ॥ ३ ॥
तदेतदेव गाण्डीवं तव पार्थ करोचितम् ।
मायामास्थाय यद् ग्रस्तं मया पुरुषसत्तम ॥ ४ ॥
पुरुषप्रवर पार्थ! तुम्हारे हाथमें रहनेयोग्य यही वह गाण्डीव धनुष है, जिसे मैंने मायाका आश्रय लेकर अपनेमें विलीन कर लिया था ॥ ४ ॥
तूणौ चाप्यक्षयौ भूयस्तव पार्थ यथोचितौ ।
भविष्यति शरीरं च नीरुजं कुरुनन्दन ॥ ५ ॥
कुरुनन्दन! और ये रहे तुम्हारे दोनों अक्षय तूणीर, जो सर्वथा तुम्हारे ही योग्य हैं । कुन्तीकुमार! तुम्हारे शरीरमें जो चोट पहुँची है, वह सब दूर होकर तुम नीरोग हो जाओगे ॥ ५ ॥
प्रीतिमानस्मि ते पार्थ भवान् सत्यपराक्रमः ।
गृहाण वरमस्मत्तः काङ्क्षितं पुरुषोत्तम ॥ ६ ॥
पार्थ! तुम्हारा पराक्रम यथार्थ है, इसलिये मैं तुमपर बहुत प्रसन्न हूँ । पुरुषोत्तम! तुम मुझसे मनोवांछित वर ग्रहण करो ॥ ६ ॥
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न त्वया पुरुषः कश्चित् पुमान् मर्त्येषु मानद ।
दिवि वा वर्तते क्षत्रं त्वत्प्रधानमरिंदम ॥ ७ ॥
मानद! मर्त्यलोक अथवा स्वर्गलोकमें भी कोई पुरुष तुम्हारे समान नहीं है । शत्रुदमन! क्षत्रिय -जातिमें तुम्हीं सबसे श्रेष्ठ हो ॥ ७ ॥
अर्जुनउवाच
भगवन् ददासि चेन्मह्यं कामं प्रीत्या वृषध्वज ।
कामये दिव्यमस्त्रं तद् घोरं पाशुपतं प्रभो ॥ ८ ॥
अर्जुन बोले — भगवन्! वृषध्वज! यदि आप प्रसन्नतापूर्वक मुझे इच्छानुसार वर देते हैं तो प्रभो! मैं उस भयंकर दिव्यास्त्र पाशुपतको प्राप्त करना चाहता हूँ ॥ ८ ॥
यत् तद् ब्रह्मशिरो नाम रौद्रं भीमपराक्रमम् ।
चुगान्ते दारुणे प्राप्ते कृत्स्नं संहरते जगत् ॥ ९ ॥
जिसका नाम ब्रह्मशिर है, आप भगवान् रुद्र ही जिसके देवता हैं, जो भयानक पराक्रम प्रकट करनेवाला तथा दारुण प्रलयकालमें सम्पूर्ण जगत्का संहारक है ॥ ९ ॥
कर्णभीष्मकृपद्रोणैर्भविता तु महाहवः ।
त्वत्प्रसादान्महादेव जयेयं तान् यथा युधि ॥ १० ॥
महादेव! कर्ण, भीष्म, कृप, द्रोणाचार्य आदिके साथ मेरा महान् युद्ध होनेवाला है, उस युद्धमें मैं आपकी कृपासे उन सबपर विजय पा सकूँ, इसीके लिये दिव्यास्त्र चाहता हूँ ॥ १० ॥
दहेयं येन संग्रामे दानवान् राक्षसांस्तथा ।
भूतानि च पिशाचांश्च गन्धर्वानथ पन्नगान् ॥ ११ ॥
यस्मिञ्छुलसहस्राणि गदाश्चोग्रप्रदर्शनाः ।
शराश्चाशीविषाकाराः सम्भवन्त्यनुमन्त्रिते ॥ १२ ॥
मुझे वह अस्त्र प्रदान कीजिये, जिससे संग्राममें दानवों, राक्षसों, भूतों, पिशाचों, गन्धर्वों तथा नागोंको भस्म कर सकूँ । जिस अस्त्रके अभिमन्त्रित करते ही सहस्रों शूल, देखनेमें भयंकर गदाएँ और विषैले सर्पोंके समान बाण प्रकट हों ॥ ११-१२ ॥
युध्येयं येन भीष्मेण द्रोणेन च कृपेण च ।
सूतपुत्रेण च रणे नित्यं कटुकभाषिणा ॥ १३ ॥
उस अस्त्रको पाकर मैं भीष्म, द्रोण, कृपाचार्य तथा सदा कटु भाषण करनेवाले सूतपुत्र कर्णके साथ भी युद्धमें लड़ सकूँ ॥ १३ ॥
एष मे प्रथमः कामो भगवन् भगनेत्रहन् ।
त्वत्प्रसादाद् विनिर्वृत्तः समर्थः स्यामहं यथा ॥ १४ ॥
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भगदेवताकी आँखें नष्ट करनेवाले भगवन्! आपके समक्ष यह मेरा सबसे पहला मनोरथ है, जो आपहीके कृपाप्रसादसे पूर्ण हो सकता है । आप ऐसा करें, जिससे मैं सर्वथा शत्रुओंको परास्त करनेमें समर्थ हो सकूँ ॥ १४ ॥
भव उवाच
ददामि तेऽस्त्रं दयितमहं पाशुपतं विभो ।
समर्थो धारणे मोक्षे संहारे चासि पाण्डव ॥ १५ ॥
महादेवजीने कहा - पराक्रमशाली पाण्डुकुमार! मैं अपना परम प्रिय पाशुपतास्त्र
तुम्हें प्रदान करता हूँ । तुम इसके धारण, प्रयोग और उपसंहारमें समर्थ हो ॥ १५ ॥
नैतद् वेद महेन्द्रोऽपि न यमो न च यक्षराट् ।
वरुणोऽप्यथवा वायुः कुतो वेत्स्यन्ति मानवाः ॥ १६ ॥
इसे देवराज इन्द्र, यम, यक्षराज कुबेर, वरुण अथवा वायुदेवता भी नहीं जानते । फिर साधारण मानव तो जान ही कैसे सकेंगे? ॥ १६ ॥
न त्वेतत् सहसा पार्थ मोक्तव्यं पुरुषे क्वचित् ।
जगद् विनाशयेत् सर्वमल्पतेजसि पातितम् ॥ १७ ॥
परंतु कुन्तीकुमार! तुम सहसा किसी पुरुषपर इसका प्रयोग न करना । यदि किसी अल्पशक्ति योद्धापर इसका प्रयोग किया गया तो यह सम्पूर्ण जगत्का नाश कर डालेगा ॥ १७ ॥
अवध्यो नाम नास्त्यत्र त्रैलोक्ये सचराचरे ।
मनसा चक्षुषा वाचा धनुषा च निपातयेत् ॥ १८ ॥
चराचर प्राणियोंसहित समस्त त्रिलोकीमें कोई ऐसा पुरुष नहीं है जो इस अस्त्रद्वारा मारा न जा सके । इसका प्रयोग करनेवाला पुरुष अपने मानसिक संकल्पसे, दृष्टिसे, वाणीसे तथा धनुष - बाणद्वारा भी शत्रुओंको नष्ट कर सकता है ॥ १८ ॥
वैशम्पायन उवाच
तच्छ्रुत्वा त्वरितः पार्थः शुचिर्भूत्वा समाहितः ।
उपसंगम्य विश्वेशमधीष्वेत्यथ सोऽब्रवीत् ॥ १ ९ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं -जनमेजय! यह सुनकर कुन्तीपुत्र अर्जुन तुरंत ही पवित्र एवं एकाग्रचित्त हो शिष्यभावसे भगवान् विश्वेश्वरकी शरण गये और बोले— ' भगवन्! मुझे इस पाशुपतास्त्रका उपदेश कीजिये ' ॥ १ ९ ॥
ततस्त्वध्यापयामास सरहस्यनिवर्तनम् ।
तदस्त्रं पाण्डवश्रेष्ठं मूर्तिमन्तमिवान्तकम् ॥ २० ॥
उपतस्थे च तत् पार्थं यथा त्र्यक्षमुमापतिम् ।
प्रतिजग्राह तच्चापि प्रीतिमानर्जुनस्तदा ॥ २१ ॥
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तब भगवान् शिवने रहस्य और उपसंहारसहित पाशुपतास्त्रका उन्हें उपदेश दिया । उस समय वह अस्त्र जैसे पहले त्रिनेत्रधारी उमापति शिवकी सेवामें उपस्थित हुआ था, उसी प्रकार मूर्तिमान् यमराजतुल्य पाण्डवश्रेष्ठ अर्जुनके पास आ गया । तब अर्जुनने बहुत प्रसन्न होकर उसे ग्रहण किया ॥ २०-२१ ॥
ततश्चचाल पृथिवी सपर्वतवनद्रुमा ।
ससागरवनोद्देशा सग्रामनगराकरा ॥ २२ ॥
अर्जुनके पाशुपतास्त्र ग्रहण करते ही पर्वत, वन, वृक्ष, समुद्र, वनस्थली, ग्राम, नगर तथा आकरों ( खानों ) सहित सारी पृथ्वी काँप उठी ॥ २२ ॥
शङ्खदुन्दुभिघोषाश्च भेरीणां च सहस्रशः ।
तस्मिन् मुहूर्ते सम्प्राप्ते निर्घातश्च महानभूत् ॥ २३ ॥
उस शुभ मुहूर्त्तके आते ही शंख और दुन्दुभियोंके शब्द होने लगे । सहस्रों भेरियाँ बज उठीं । आकाशमें वायुके टकरानेका महान् शब्द होने लगा ॥ २३ ॥
अथास्त्रं जाज्वलद् घोरं पाण्डवस्यामितौजसः ।
मूर्तिमद् वै स्थितं पार्श्वे ददृशुर्देवदानवाः ॥ २४ ॥
तदनन्तर वह भयंकर अस्त्र मूर्तिमान् हो अग्निके समान प्रज्वलित तेजस्वीरूपसे अमित पराक्रमी पाण्डुनन्दन अर्जुनके पार्श्वभागमें खड़ा हो गया । यह बात देवताओं और दानवोंने प्रत्यक्ष देखी ॥ २४ ॥
स्पृष्टस्य त्र्यम्बकेणाथ फाल्गुनस्यामितौजसः ।
यत् किंचिदशुभं देहे तत् सर्वं नाशमीयिवत् ॥ २५ ॥
भगवान् शंकरके स्पर्श करनेसे अमित तेजस्वी अर्जुनके शरीरमें जो कुछ भी अशुभ था, वह नष्ट हो गया ॥ २५ ॥
स्वर्गं गच्छेत्यनुज्ञातस्त्र्यम्बकेण तदार्जुनः ।
प्रणम्य शिरसा राजन् प्राञ्जलिर्देवमैक्षत ॥ २६ ॥
उस समय भगवान् त्रिलोचनने अर्जुनको यह आज्ञा दी कि ' तुम स्वर्गलोकको जाओ । ' राजन्! तब अर्जुनने भगवान्के चरणोंमें मस्तक रखकर प्रणाम किया और हाथ जोड़कर उनकी ओर देखने लगे ॥ २६ ॥
ततः प्रभुस्त्रिदिवनिवासिनां वशी महामतिर्गिरिश उमापतिः शिवः । धनुर्महद् दितिजपिशाचसूदनं ददौ भवः पुरुषवराय गाण्डिवम् ॥ २७ ॥
तत्पश्चात् देवताओंके स्वामी, जितेन्द्रिय एवं परम बुद्धिमान् कैलासवासी उमावल्लभ भगवान् शिवने पुरुषप्रवर अर्जुनको वह महान् गाण्डीवधनुष दे दिया, जो दैत्यों और पिशाचोंका संहार करनेवाला था ॥ २७ ॥
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ततः शुभं गिरिवरमीश्वरस्तदा सहोमया सिततटसानुकन्दरम् । विहाय तं पतगमहर्षिसेवितं जगाम खं पुरुषवरस्य पश्यतः ॥ २८ ॥
जिसके तट, शिखर और कन्दराएँ हिमाच्छादित होनेके कारणश्वेत दिखायी देती हैं, पक्षी और महर्षिगण सदा जिसका सेवन करते हैं, उस मंगलमय गिरिश्रेष्ठ इन्द्रकीलको छोड़कर भगवान् शंकर भगवती उमादेवीके साथ अर्जुनके देखते -देखते आकाशमार्गसे चले गये ॥ २८ ॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि कैरातपर्वणि शिवप्रस्थाने चत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४० ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत कैरातपर्वमें शिवप्रस्थानविषयक चालीसवाँ अध्याय पूराहुआ ॥ ४० ॥
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एकचत्वारिंशोऽध्यायः अर्जुनके पास दिक्पालोंका आगमन एवं उन्हें दिव्यास्त्र- प्रदान तथा इन्द्रका उन्हें स्वर्गमें चलनेका आदेश देना वैशम्पायन उवाच
तस्य सम्पश्यतस्त्वेव पिनाकी वृषभध्वजः ।
जगामादर्शनं भानुर्लोकस्येवास्तमीयिवान् ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं -जनमेजय! अर्जुनके देखते -देखते पिनाकधारी भगवान् वृषभध्वज अदृश्य हो गये, मानो भुवनभास्कर भगवान् सूर्य अस्त हो गये हों ॥ १ ॥
ततोऽर्जुनः परं चक्रे विस्मयं परवीरहा ।
मया साक्षान्महादेवो दृष्ट इत्येव भारत ॥ २ ॥
भारत! तदनन्तर शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले अर्जुनको यह सोचकर बड़ा आश्चर्य हुआ कि आज मुझे महादेवजीका प्रत्यक्ष दर्शन प्राप्त हुआ है ॥ २ ॥
धन्योऽस्म्यनुगृहीतोऽस्मि यन्मया त्र्यम्बको हरः ।
पिनाकी वरदो रूपी दृष्टः स्पृष्टश्च पाणिना ॥ ३ ॥
मैं धन्य हूँ! भगवान्का मुझपर बड़ा अनुग्रह है कि त्रिनेत्रधारी, सर्वपापहारी एवं अभीष्ट वर देनेवाले पिनाक- पाणि भगवान् शंकरने मूर्तिमान् होकर मुझे दर्शन दिया और अपने करकमलोंसे मेरे अंगोंका स्पर्श किया ॥ ३ ॥
कृतार्थं चावगच्छामि परमात्मानमाहवे ।
शत्रूंश्च विजितान् सर्वान् निर्वृत्तं च प्रयोजनम् ॥ ४ ॥
आज मैं अपने - आपको परम कृतार्थ मानता हूँ, साथ ही यह विश्वास करता हूँ कि महासमरमें अपने समस्त शत्रुओंपर विजय प्राप्त करूँगा। अब मेरा अभीष्ट प्रयोजन सिद्ध हो गया ॥ ४ ॥
इत्येवं चिन्तयानस्य पार्थस्यामिततेजसः ।
ततो वैदूर्यवर्णाभो भासयन् सर्वतो दिशः ।
यादोगणवृतः श्रीमानाजगाम जलेश्वरः ॥ ५ ॥
इस प्रकार चिन्तन करते हुए अमित तेजस्वी कुन्तीकुमार अर्जुनके पास जलके स्वामी श्रीमान् वरुणदेव जल - जन्तुओंसे घिरे हुए आ पहुँचे । उनकी अंगकान्ति वैदूर्यमणिके समान थी और वे सम्पूर्ण दिशाओंको प्रकाशित कर रहे थे ॥ ५ ॥
नागैर्नदैर्नदीभिश्च दैत्यैः साध्यैश्च दैवतैः ।
वरुणो यादसां भर्ता वशी तं देशमागमत् ॥ ६ ॥
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नागों, नद और नदियोंके देवताओं, दैत्यों तथा साध्यदेवताओंके साथ जल- जन्तुओंके स्वामी जितेन्द्रिय वरुणदेवने उस स्थानको अपने शुभागमनसे सुशोभित किया ॥ ६ ॥
अथ जाम्बूनदवपुर्विमानेन महार्चिषा ।
कुबेरः समनुप्राप्तो यक्षैरनुगतः प्रभुः ॥ ७ ॥
तदनन्तर स्वर्णके समान शरीरवाले भगवान् कुबेर महातेजस्वी विमानद्वारा वहाँ आये ।
उनके साथ बहुत - से यक्ष भी थे ॥ ७ ॥
विद्योतयन्निवाकाशमद्भूतोपमदर्शनः ।
धनानामीश्वरः श्रीमानर्जुनं द्रष्टुमागतः ॥ ८ ॥
वे अपने तेजसे आकाशमण्डलको प्रकाशित- से कर रहे थे । उनका दर्शनअद्भुत एवं अनुपम था । परम सुन्दर श्रीमान् धनाध्यक्ष कुबेर अर्जुनको देखनेके लिये वहाँ पधारे थे ॥ ८ ॥
तथा लोकान्तकृच्छ्रीमान् यमः साक्षात् प्रतापवान् ।
मर्त्यमूर्तिधरैः सार्धं पितृभिर्लोकभावनैः ॥ ९ ॥
इसी प्रकार समस्त जगत्का अन्त करनेवाले श्रीमान् प्रतापी यमराजने प्रत्यक्षरूपमें वहाँ दर्शन दिया । उनके साथ मानव - शरीरधारी विश्वभावन पितृगण भी थे ॥ ९ ॥
दण्डपाणिरचिन्त्यात्मा सर्वभूतविनाशकृत् ।
वैवस्वतो धर्मराजो विमानेनावभासयन् ॥ १० ॥
त्रीँल्लोकान् गुह्यकांश्चैव गन्धर्वांश्च सपन्नगान् ।
द्वितीय इव मार्तण्डो युगान्ते समुपस्थिते ॥ ११ ॥
उनके हाथमें दण्ड शोभा पा रहा था। सम्पूर्ण भूतोंका विनाश करनेवाले अचिन्त्यात्मा सूर्यपुत्र धर्मराज अपने ( तेजस्वी ) विमानसे तीनों लोकों, गुह्यकों, गन्धर्वों तथा नागोंको प्रकाशित कर रहे थे । प्रलयकाल उपस्थित होनेपर दिखायी देनेवाले द्वितीय सूर्यकी भाँति उनकी अद्भुत शोभा हो रही थी ॥ १०-११ ॥
ते भानुमन्ति चित्राणि शिखराणि महागिरेः ।
समास्थायार्जुनं तत्र ददृशुस्तपसान्वितम् ॥ १२ ॥
उन सब देवताओंने उस महापर्वतके विचित्र एवं तेजस्वी शिखरोंपर पहुँचकर वहाँ तपस्वी अर्जुनको देखा ॥
ततो मुहूर्ताद् भगवानैरावतशिरोगतः ।
आजगाम सहेन्द्राण्या शक्रः सुरगणैर्वृतः ॥ १३ ॥
तत्पश्चात् दो ही घड़ीके बाद भगवान् इन्द्र इन्द्राणीके साथ ऐरावतकी पीठपर बैठकर वहाँ आये । देवताओंके समुदायने उन्हें सब ओरसे घेर रखा था ॥
पाण्डुरेणातपत्रेण ध्रियमाणेन मूर्धनि ।
शुशुभे तारकाराजः सितमभ्रमिव स्थितः ॥ १४ ॥
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संस्तूयमानो गन्धर्वैर्ऋषिभिश्च तपोधनैः ।
शृङ्गं गिरेः समासाद्य तस्थौ सूर्य इवोदितः ॥ १५ ॥
उनके मस्तकपर श्वेत छत्र तना हुआ था, जिससे वे शुभ्र वर्णके मेघखण्डसे आच्छादित चन्द्रमाके समान सुशोभित हो रहे थे । बहुत - से तपस्वी ऋषि तथा गन्धर्वगण उनकी स्तुति करते थे । वे उस पर्वतके शिखरपर आकर ठहर गये, मानो वहाँ सूर्य प्रकट हो गये हों ॥ १४-१५ ॥
अथ मेघस्वनो धीमान् व्याजहार शुभां गिरम् ।
यमः परमधर्मज्ञो दक्षिणां दिशमास्थितः ॥ १६ ॥
तदनन्तर मेघके समान गम्भीर स्वरवाले परम धर्मज्ञ एवं बुद्धिमान् यमराज दक्षिण दिशामें स्थित हो यह शुभ वचन बोले- ॥ १६ ॥
अर्जुनार्जुन पश्यास्माँल्लोकपालान् समागतान् ।
दृष्टिं ते वितरामोऽद्य भवानर्हति दर्शनम् ॥ १७ ॥
पूर्वर्षिरमितात्मा त्वं नरो नाम महाबलः ।
नियोगाद् ब्रह्मणस्तात मर्त्यतां समुपागतः ॥ १८ ॥
अर्जुन! हम सब लोकपाल यहाँ आये हुए हैं । तुम हमें देखो । हम तुम्हें दिव्य दृष्टि देते
हैं । तुम हमारे दर्शनके अधिकारी हो । तुम महामना एवं महाबली पुरातन महर्षि नर हो ।
तात! ब्रह्माजीकी आज्ञासे तुमने मानव- शरीर ग्रहण किया है ॥ १७-१८ ॥
त्वया च वसुसम्भूतो महावीर्यः पितामहः ।
भीष्मः परमधर्मात्मा संसाध्यश्च रणेऽनघ ॥ १ ९ ॥
क्षत्रं चाग्निसमस्पर्शं भारद्वाजेन रक्षितम् ।
दानवाश्च महावीर्या ये मनुष्यत्वमागताः ॥ २० ॥
निवातकवचाश्चैव दानवाः कुरुनन्दन ।
पितुर्ममांशो देवस्य सर्वलोकप्रतापिनः ॥ २१ ॥
कर्णश्च सुमहावीर्यस्त्वया वध्यो धनंजय । ‘ अनघ! वसुओंके अंशसे उत्पन्न महापराक्रमी और परम धर्मात्मा पितामह भीष्मको तुम संग्राममें जीत लोगे । भरद्वाजपुत्र द्रोणाचार्यके द्वारा सुरक्षित क्षत्रिय- समुदाय भी, जिसका स्पर्श अग्निके समान भयंकर है, तुम्हारे द्वारा पराजित होगा । कुरुनन्दन! मानव-शरीरमें उत्पन्न हुए महाबली दानव तथा निवातकवच नामक दैत्य भी तुम्हारे हाथसे मारे जायँगे । धनंजय! सम्पूर्ण जगत्को उष्णता प्रदान करनेवाले मेरे पिता भगवान् सूर्यदेवके - अंशसे उत्पन्न महापराक्रमी कर्ण भी तुम्हारा वध्य होगा ॥ १ ९ – २१३ ॥ अंशाश्च क्षितिसम्प्राप्ता देवदानवरक्षसाम् ॥ २२ ॥
त्वया निपातिता युद्धे स्वकर्मफलनिर्जिताम् ।
गतिं प्राप्स्यन्ति कौन्तेय यथास्वमरिकर्षण ॥ २३ ॥