02.Mahabharata Volume 2 — पृष्ठ 481–490

महाभारत — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 481–490

पृष्ठ 481

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सप्तषष्टितमोऽध्यायः राजा नलका ऋतुपर्णके यहाँ अश्वाध्यक्षके पदपर नियुक्त होना और वहाँ दमयन्तीके लिये निरन्तर चिन्तित रहना तथा उनकी जीवलसे बातचीत बृहदश्वउवाच

तस्मिन्नन्तर्हिते नागे प्रययौ नैषधो नलः ।

ऋतुपर्णस्य नगरं प्राविशद् दशमेऽहनि ॥ १ ॥

बृहदश्व मुनि कहते हैं - कर्कोटक नागके अन्तर्धान हो जानेपर निषधनरेश नलने दसवें दिन राजा ऋतुपर्णके नगरमें प्रवेश किया ॥ १ ॥

स राजानमुपातिष्ठद् बाहुकोऽहमिति ब्रुवन् ।

अश्वानां वाहने युक्तः पृथिव्यां नास्ति मत्समः ॥ २ ॥

वे बाहुक नामसे अपना परिचय देते हुए राजा ऋतुपर्णके यहाँ उपस्थित हुए और बोले ——घोड़ोंको हाँकनेकी कलामें इस पृथ्वीपर मेरे समान दूसरा कोई नहीं है ॥ २ ॥

अर्थकृच्छ्रेषु चैवाहं प्रष्टव्यो नैपुणेषु च ।

अन्नसंस्कारमपि च जानाम्यन्यैर्विशेषतः ॥ ३ ॥

‘ मैं इन दिनों अर्थसंकटमें हूँ । आपको किसी भी कलाकी निपुणताके विषयमें सलाह लेनी हो तो मुझसे पूछ सकते हैं । अन्न - संस्कार ( भाँति- भाँतिकी रसोई बनानेका कार्य) भी मैं दूसरोंकी अपेक्षा विशेष जानता हूँ ॥ ३ ॥

यानि शिल्पानि लोकेऽस्मिन् यच्चैवान्यत् सुदुष्करम् ।

सर्वं यतिष्ये तत् कर्तुमृतुपर्ण भरस्व माम् ॥ ४ ॥

पृष्ठ 482

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‘ इस जगत्में जितनी भी शिल्पकलाएँ हैं तथा दूसरे भी जो अत्यन्त कठिन कार्य हैं, मैं उन सबको अच्छी तरह करनेका प्रयत्न कर सकता हूँ । महाराज ऋतुपर्ण! आप मेरा भरण-पोषण कीजिये ' ॥ ४ ॥

ऋतुपर्णउवाच

वस बाहुक भद्रं ते सर्वमेतत् करिष्यसि ।

शीघ्रयाने सदा बुद्धिर्धियते मे विशेषतः ॥ ५ ॥

ऋतुपर्णने कहा- बाहुक! तुम्हारा भला हो । तुम मेरे यहाँ निवास करो । ये सब कार्य तुम्हें करने होंगे । मेरे मनमें सदा यही विचार विशेषतः रहता है कि मैं शीघ्रतापूर्वक कहीं भी पहुँच सकूँ ॥ ५ ॥

सत्वमातिष्ठ योगं तं येन शीघ्रा हया मम ।

भवेयुरश्वाध्यक्षोऽसि वेतनं ते शतं शतम् ॥ ६ ॥

अतः तुम ऐसा उपाय करो, जिससे मेरे घोड़े शीघ्रगामी हो जायँ । आजसे तुम हमारे अश्वाध्यक्ष हो । दस हजार मुद्राएँ तुम्हारा वार्षिक वेतन है ॥ ६ ॥

त्वामुपस्थास्यतश्चैव नित्यं वार्ष्णेयजीवली ।

एताभ्यां रंस्यसे सार्धं वस वै मयि बाहुक ॥ ७ ॥

पृष्ठ 483

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वार्ष्णेय और जीवल— ये दोनों सारथि तुम्हारी सेवामें रहेंगे । बाहुक! इन दोनोंके साथ

तुम बड़े सुखसे रहोगे । तुम मेरे यहाँ रहो ॥ ७ ॥

बृहदश्वउवाच

एवमुक्तो नलस्तेन न्यवसत् तत्र पूजितः ।

ऋतुपर्णस्य नगरे सहवार्ष्णेयजीवलः ॥ ८ ॥

बृहदश्व मुनि कहते हैं - राजन्! राजाके ऐसा कहनेपर नल वार्ष्णेय और जीवलके साथ सम्मानपूर्वक ऋतुपर्णके नगरमें निवास करने लगे ॥ ८ ॥

स वै तत्रावसद् राजा वैदर्भीमनुचिन्तयन् ।

सायं सायं सदा चेमं श्लोकमेकं जगाद ह ॥ ९ ॥

वे दमयन्तीका निरन्तर चिन्तन करते हुए वहाँ रहने लगे । वे प्रतिदिन सायंकाल इस एक

श्लोकको पढ़ा करते थे— ॥ ९ ॥

क्व नु सा क्षुत्पिपासार्ता श्रान्ता शेते तपस्विनी ।

स्मरन्ती तस्य मन्दस्य कं वा साद्योपतिष्ठति ॥ १० ॥

‘ भूख - प्याससे पीड़ित और थकी- माँदी वह तपस्विनी उस मन्दबुद्धि पुरुषका स्मरण करती हुई कहाँ सोती होगी तथा अब वह किसके समीप रहती होगी? ' ॥ १० ॥

एवं ब्रुवन्तं राजानं निशायां जीवलोऽब्रवीत् ।

कामेनां शोचसे नित्यं श्रोतुमिच्छामि बाहुक ॥ ११ ॥

एक दिन रात्रिके समय जब राजा इस प्रकार बोल रहे थे ' जीवलने पूछा — बाहुक! तुम प्रतिदिन किस स्त्रीके लिये शोक करते हो, मैं सुनना चाहता हूँ ॥ ११ ॥

आयुष्मन् कस्य वा नारी यामेवमनुशोचसि ।

तमुवाच नलो राजा मन्दप्रज्ञस्य कस्यचित् ॥ १२ ॥

आसीद् बहुमता नारी तस्यादृढतरं वचः ।

सवै केनचिदर्थेन तया मन्दो व्ययुज्यत ॥ १३ ॥

‘ आयुष्मन्! वह किसकी पत्नी है, जिसके लिये तुम इस प्रकार निरन्तर शोकमग्न रहते हो । ' तब राजा नलने उससे कहा – ' किसी अल्पबुद्धि पुरुषके एक स्त्री थी, जो उसके अत्यन्त आदरकी पात्र थी । किंतु उस पुरुषकी बात अत्यन्त दृढ़ नहीं थी । वह अपनी प्रतिज्ञासे फिसल गया । किसी विशेष प्रयोजनसे विवश होकर वह भाग्यहीन पुरुष अपनी पत्नीसे बिछुड़ गया ॥ १२-१३ ॥

विप्रयुक्तः स मन्दात्मा भ्रमत्यसुखपीडितः ।

दह्यमानः स शोकेन दिवारात्रमतन्द्रितः ॥ १४ ॥

‘ पत्नीसे विलग होकर वह मन्दबुद्धि मानव दिन- रात शोकाग्निसे दग्ध एवं दुःखसे पीड़ित होकर आलस्यसे रहित हो इधर- उधर भटकता रहता है ॥ १४ ॥

पृष्ठ 484

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निशाकाले स्मरंस्तस्याः श्लोकमेकं स्म गायति ।

स विभ्रमन् महीं सर्वां क्वचिदासाद्य किंचन ॥ १५ ॥

वसत्यनर्हस्तद् दुःखं भूय एवानुसंस्मरन् । ‘ रातमें उसीका स्मरण करके वह एक श्लोकको गाया करता है । सारी पृथ्वीका चक्कर लगाकर वह कभी किसी स्थानमें पहुँचा और वहीं निरन्तर उस प्रियतमाका स्मरण करके दुःख भोगता रहता है । यद्यपि वह उस दुःखको भोगनेके योग्य है नहीं ॥ १५३ ॥

सा तु तं पुरुषं नारी कृच्छ्रेऽप्यनुगता वने ॥ १६ ॥

त्यक्ता तेनाल्पपुण्येन दुष्करं यदि जीवति ।

एका बालानभिज्ञा च मार्गाणामतथोचिता ॥ १७ ॥

‘ वह नारी इतनी पतिव्रता थी कि संकटकालमें भी उस पुरुषके पीछे -पीछे वनमें चली गयी; किंतु उस अल्प पुण्यवाले पुरुषने उसे वनमें ही त्याग दिया। अब तो यदि वह जीवित होगी तो बड़े कष्टसे उसके दिन बीतते होंगे । वह स्त्री अकेली थी । उसे मार्गका ज्ञान नहीं था । जिस संकटमें वह पड़ी थी, उसके योग्य वह कदापि नहीं थी ॥ १६-१७ ॥

क्षुत्पिपासापरीताङ्गी दुष्करं यदि जीवति ।

श्वापदाचरिते नित्यं वने महति दारुणे ॥ १८ ॥

त्यक्ता तेनाल्पभाग्येन मन्दप्रज्ञेन मारिष ।

इत्येवं नैषधो राजा दमयन्तीमनुस्मरन् ॥

अज्ञातवासं न्यवसद् राज्ञस्तस्य निवेशने ॥ १ ९ ॥

‘ भूख और प्याससे उसके अंग व्याप्त हो रहे थे । उस दशामें परित्यक्त होकर वह यदि जीवित भी हो तो भी उसका जीवित रहना बहुत कठिन है । आर्य जीवल! अत्यन्त भयंकर विशाल वनमें जहाँ नित्य निरन्तर हिंसक जन्तु विचरते रहते हैं, उस मन्दबुद्धि एवं मन्दभाग्य पुरुषने उसका त्याग कर दिया था । ' इस प्रकार निषधनरेश राजा नल दमयन्तीका निरन्तर स्मरण करते हुए राजा ऋतुपर्णके यहाँ अज्ञातवास कर रहे थे ॥ १८-१९ ॥ इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि नलोपाख्यानपर्वणि नलविलापे सप्तषष्टितमोऽध्यायः ॥ ६७ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत नलोपाख्यानपर्वमें नलविलापविषयक सड़सठवाँ अध्याय पूराहुआ ॥ ६७ ॥

पृष्ठ 485

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अष्टषष्टितमोऽध्यायः विदर्भराजका नल - दमयन्तीकी खोजके लिये ब्राह्मणोंको भेजना, सुदेव ब्राह्मणका चेदिराजके भवनमें जाकर मन- ही- मन दमयन्तीके गुणोंका चिन्तन और उससे भेंट करना बृहदश्वउवाच

हृतराज्ये नले भीमः सभार्ये च वनं गते ।

द्विजान् प्रस्थापयामास नलदर्शनकाङ्क्षया ॥१ ॥

बृहदश्व मुनि कहते हैं - राजन्! राज्यका अपहरण हो जानेपर जब राजा नल पत्नीसहित वनमें चले गये, तब विदर्भनरेश भीमने नलका पता लगानेके लिये बहुत - से ब्राह्मणोंको इधर- उधर भेजा ॥ १ ॥

संदिदेश च तान् भीमो वसु दत्त्वा च पुष्कलम् ।

मृगयध्वं नलं चैव दमयन्तीं च मे सुताम् ॥ २ ॥

राजा भीमने प्रचुर धन देकर ब्राह्मणोंको यह संदेश दिया- ' आपलोग राजा नल और मेरी पुत्री दमयन्तीकी खोज करें ॥ २ ॥

अस्मिन् कर्मणि सम्पन्ने विज्ञाते निषधाधिपे ।

गवां सहस्रं दास्यामि यो वस्तावानयिष्यति ॥ ३ ॥

'निषधनरेश नलका पता लग जानेपर जब यह कार्य सम्पन्न हो जायगा, तब मैं आपलोगोंमेंसे जो भी नल- दमयन्तीको यहाँ ले आयेगा, उसे एक हजार गौएँ दूँगा ॥ ३ ॥

अग्रहारांश्च दास्यामि ग्रामं नगरसम्मितम् ।

न चेच्छक्याविहानेतुं दमयन्ती नलोऽपि वा ॥ ४ ॥

ज्ञातमात्रेऽपि दास्यामि गवां दशशतं धनम् । ‘ साथ ही जीविकाके लिये अग्रहार ( करमुक्त भूमि) दूँगा और ऐसा गाँव दे दूँगा, जो आयमें नगरके समान होगा । यदि नल-दमयन्तीमेंसे किसी एकको या दोनोंको ही यहाँ ले आना सम्भव न हो सके तो केवल उनका पता लग जानेपर भी मैं एक हजार गोधन दान करूँगा' ॥ ४३ ॥

इत्युक्तास्ते ययुर्हृष्टा ब्राह्मणाः सर्वतो दिशम् ॥५ ॥

पुरराष्ट्राणि चिन्वन्तो नैषधं सह भार्यया ।

नैव क्वापि प्रपश्यन्ति नलं वा भीमपुत्रिकाम् ॥ ६ ॥

ततश्चेदिपुरीं रम्यां सुदेवो नाम वै द्विजः ।

विचिन्वानोऽथ वैदर्भीमपश्यद् राजवेश्मनि ॥ ७ ॥

पृष्ठ 486

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राजाके ऐसा कहनेपर वे सब ब्राह्मण बड़े प्रसन्न होकर सब दिशाओंमें चले गये और नगर तथा राष्ट्रोंमें पत्नीसहित निषधनरेश नलका अनुसंधान करने लगे; परंतु कहीं भी वे नल अथवा भीमकुमारी दमयन्तीको नहीं देख पाते थे । तदनन्तर सुदेव नामक ब्राह्मणने पता लगाते हुए रमणीय चेदिनगरीमें जाकर वहाँ राजमहलमें विदर्भकुमारी दमयन्तीको देखा ॥ ५–७ ॥

पुण्याहवाचने राज्ञः सुनन्दासहितां स्थिताम् ।

मन्दं प्रख्यायमानेन रूपेणाप्रतिमेन ताम् ॥ ८ ॥

निबद्धां धूमजालेन प्रभामिव विभावसोः ।

तां समीक्ष्य विशालाक्षीमधिकं मलिनां कृशाम् ।

तर्कयामास भैमीति कारणैरुपपादयन् ॥ ९ ॥

वह राजाके पुण्याहवाचनके समय सुनन्दाके साथ खड़ी थी । उसका अनुपम रूप ( मैलसे आवृत होनेके कारण ) मन्द मन्द प्रकाशित हो रहा था, मानो अग्निकी प्रभा धूमसमूहसे आवृत हो रही हो । विशाल नेत्रोंवाली उस राजकुमारीको अधिक मलिन और दुर्बल देख उपर्युक्त कारणोंसे उसकी पहचान करते हुए सुदेवने निश्चय किया कि यह भीमकुमारी दमयन्ती ही है ॥ ८ - ९ ॥ सुदेव उवाच

यथेयं मे पुरा दृष्टा तथारूपेयमङ्गना ।

कृतार्थोऽस्म्यद्य दृष्ट्वेमां लोककान्तामिव श्रियम् ॥ १० ॥

सुदेव मन - ही - मन बोले- मैंने पहले जिस रूपमें इस कल्याणमयी राजकन्याको देखा है, वैसी ही यह आज भी है । लोककमनीय लक्ष्मीकी भाँति इस भीमकुमारीको देखकर आज मैं कृतार्थ हो गया हूँ ॥ १० ॥

पूर्णचन्द्रनिभां श्यामां चारुवृत्तपयोधराम् ।

कुर्वन्तीं प्रभया देवीं सर्वा वितिमिरा दिशः ॥ ११ ॥

यह श्यामा युवती पूर्ण चन्द्रमाके समान कान्तिमती है। इसके स्तन बड़े मनोहर हैं । यह देवी अपनी प्रभासे सम्पूर्ण दिशाओंको आलोकित कर रही है ॥ ११ ॥

चारुपद्मविशालाक्षीं मन्मथस्य रतीमिव ।

इष्टों समस्तलोकस्य पूर्णचन्द्रप्रभामिव ॥ १२ ॥

उसके बड़े -बड़े नेत्र मनोहर कमलोंकी शोभाको लज्जित कर रहे हैं । यह कामदेवकी रति- सी जान पड़ती है । पूर्णिमाके चन्द्रमाकी चाँदनीके समान यह सब लोगोंके लिये प्रिय है ॥ १२ ॥

विदर्भसरसस्तस्माद् दैवदोषादिवोद्धताम् ।

मलपङ्कानुलिप्ताङ्गीं मृणालीमिव चोद्धृताम् ॥ १३ ॥

पृष्ठ 487

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पौर्णमासीमिव निशां राहुग्रस्तनिशाकराम् ।

पतिशोकाकुलां दीनां शुष्कस्रोतां नदीमिव ॥ १४ ॥

विदर्भरूपी सरोवरसे यह कमलिनी मानो प्रारब्धके दोषसे निकाल ली गयी है । इसके मलिन अंग कीचड़ लिपटी हुई नलिनीके समान प्रतीत होते हैं । यह उस पूर्णिमाकी रजनीके समान जान पड़ती है, जिसके चन्द्रमापर मानो राहुने ग्रहण लगा रखा हो । पति - शोकसे व्याकुल और दीन होनेके कारण यह सूखे जल- प्रवाहवाली सरिताके समान प्रतीत होती है ॥ १३-१४ ॥

विध्वस्तपर्णकमलां वित्रासितविहंगमाम् ।

हस्तिहस्तपरामृष्टां व्याकुलामिव पद्मिनीम् ॥ १५ ॥

इसकी दशा उस पुष्करिणीके समान दिखायी देती है, जिसे हाथियोंने अपने शुण्डदण्डसे मथ डाला हो तथा जो नष्ट हुए पत्तोंवाले कमलसे युक्त हो एवं जिसके भीतर निवास करनेवाले पक्षी अत्यन्त भयभीत हो रहे हों । यह दुःखसे अत्यन्त व्याकुल- सी प्रतीत हो रही है ॥ १५ ॥

सुकुमारीं सुजाताङ्गीं रत्नगर्भगृहोचिताम् ।

दह्यमानामिवार्केण मृणालीमिव चोद्धृताम् ॥ १६ ॥

मनोहर अंगोंवाली यह सुकुमारी राजकन्या उन महलोंमें रहनेयोग्य है, जिनका भीतरी भाग रत्नोंका बना हुआ है । (इस समय दुःखने इसे ऐसा दुर्बल कर दिया है कि ) यह सरोवरसे निकाली और सूर्यकी किरणोंसे जलायी हुई कमलिनीके समान प्रतीत हो रही है ॥ १६ ॥

रूपौदार्यगुणोपेतां मण्डनार्हाममण्डिताम् ।

चन्द्रलेखामिव नवां व्योम्नि नीलाभ्रसंवृताम् ॥ १७ ॥

यह रूप और उदारता आदि गुणोंसे सम्पन्न है । शृंगार धारण करनेके योग्य होनेपर भी यह शृंगारशून्य है, मानो आकाशमें मेघोंकी काली घटासे आवृत नूतन चन्द्रकला हो ॥ १७ ॥

कामभोगैः प्रियैर्हीनां हीनां बन्धुजनेन च ।

देहं संधारयन्तीं हि भर्तृदर्शनकाङ्क्षया ॥ १८ ॥

यह राजकन्या प्रिय कामभोगोंसे वंचित है । अपने बन्धुजनोंसे बिछुड़ी हुई है और पतिके दर्शनकी इच्छासे अपने ( दीन - दुर्बल) शरीरको धारण कर रही है ॥ १८ ॥

भर्ता नाम परं नार्या भूषणं भूषणैर्विना ।

एषा हि रहिता तेन शोभमाना न शोभते ॥ १ ९ ॥

वास्तवमें पति ही नारीका सबसे श्रेष्ठ आभूषण है । उसके होनेसे वह बिना आभूषणोंके सुशोभित होती है; परंतु यह पतिरूप आभूषणसे रहित होनेके कारण शोभामयी होकर भी सुशोभित नहीं हो रही है ॥ १ ९ ॥

पृष्ठ 488

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दुष्करं कुरुतेऽत्यन्तं हीनो यदनया नलः ।

धारयत्यात्मनो देहं न शोकेनापि सीदति ॥ २० ॥

इससे विलग होकर राजा नल यदि अपने शरीरको धारण करते हैं और शोकसे शिथिल नहीं हो रहे हैं तो यह समझना चाहिये कि वे अत्यन्त दुष्कर कर्म कर रहे हैं ॥ २० ॥

इमामसितकेशान्तां शतपत्रायतेक्षणाम् ।

सुखार्हां दुःखितां दृष्ट्वा ममापि व्यथते मनः ॥ २१ ॥

काले - काले केशों और कमलके समान विशाल नेत्रोंसे सुशोभित इस राजकन्याको, जो सदा सुख भोगनेके ही योग्य है, दुःखित देखकर मेरे मनमें भी बड़ी व्यथा हो रही है ॥ २१ ॥

कदा नु खलु दुःखस्य पारं यास्यति वै शुभा ।

भर्तुः समागमात् साध्वी रोहिणी शशिनो यथा ॥ २२ ॥

जैसे रोहिणी चन्द्रमाके संयोगसे सुखी होती है, उसी प्रकार यह शुभलक्षणा साध्वी राजकुमारी अपने पतिके समागमसे ( संतुष्ट हो) कब इस दुःखके समुद्रसे पार हो सकेगी ॥ २२ ॥

अस्या नूनं पुनर्लाभान्नैषधः प्रीतिमेष्यति ।

राजा राज्यपरिभ्रष्टः पुनर्लब्ध्वा च मेदिनीम् ॥ २३ ॥

जैसे कोई राजा एक बार अपने राज्यसे च्युत होकर फिर उसी राज्यभूमिको प्राप्त कर लेनेपर अत्यन्त आनन्दका अनुभव करता है, उसी प्रकार पुनः इसके मिल जानेपर निषधनरेश नलको निश्चय ही बड़ी प्रसन्नता होगी ॥ २३ ॥

तुल्यशीलवयोयुक्तां तुल्याभिजनसंवृताम् ।

नैषधोऽर्हति वैदर्भी तं चेयमसितेक्षणा ॥ २४ ॥

विदर्भकुमारी दमयन्ती राजा नलके समान शील और अवस्थासे युक्त है, उन्हींके तुल्य उत्तम कुलसे सुशोभित है। निषधनरेश नल विदर्भकुमारीके योग्य हैं और यह कजरारे नेत्रोंवाली वैदर्भी नलके योग्य है ॥ २४ ॥

युक्तं तस्याप्रमेयस्य वीर्यसत्त्ववतो मया ।

समाश्वासयितुं भार्यां पतिदर्शनलालसाम् ॥ २५ ॥

राजा नलका पराक्रम और धैर्य असीम है । उनकी यह पत्नी पतिदर्शनके लिये लालायित और उत्कण्ठित है, अतः मुझे इससे मिलकर इसे आश्वासन देना चाहिये ॥ २५ ॥

अहमाश्वासयाम्येनां पूर्णचन्द्रनिभाननाम् ।

अदृष्टपूर्वां दुःखस्य दुःखार्तां ध्यानतत्पराम् ॥ २६ ॥

इस पूर्णचन्द्रमुखी राजकुमारीने पहले कभी दुःखको नहीं देखा था । इस समय दुःखसे आतुर हो पतिके ध्यानमें परायण है, अतः मैं इसे आश्वासन देनेका विचार कर रहा

पृष्ठ 489

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हूँ॥ २६ ॥

बृहदश्वउवाच

एवं विमृश्य विविधैः कारणैर्लक्षणैश्च ताम् ।

उपागम्य ततो भैमीं सुदेवो ब्राह्मणोऽब्रवीत् ॥ २७ ॥

अहं सुदेवो वैदर्भि भ्रातुस्ते दयितः सखा ।

भीमस्य वचनाद् राज्ञस्त्वामन्वेष्टुमिहागतः ॥ २८ ॥

बृहदश्व मुनि कहते हैं - युधिष्ठिर! इस प्रकार भाँति- भाँतिके कारणों और लक्षणोंसे दमयन्तीको पहचानकर और अपने कर्तव्यके विषयमें विचार करके सुदेव ब्राह्मण उसके समीप गये और इस प्रकार बोले— ' विदर्भराजकुमारी! मैं तुम्हारे भाईका प्रिय सखा सुदेव हूँ। महाराज भीमकी आज्ञासे तुम्हारी खोज करनेके लिये यहाँ आया हूँ ॥ २७-२८ ॥

कुशली ते पिता राज्ञि जननी भ्रातरश्च ते ।

आयुष्मन्तौ कुशलिनौ तत्रस्थौ दारकौ च तौ ॥ २ ९ ॥

‘ निषधदेशकी महारानी! तुम्हारे पिता, माता और भाई सब सकुशल हैं और कुण्डिनपुरमें जो तुम्हारे बालक हैं, वे भी कुशलसे हैं ॥ २ ९ ॥

त्वत्कृते बन्धुवर्गाश्च गतसत्त्वा इवासते ।

अन्वेष्टारो ब्राह्मणाश्च भ्रमन्ति शतशो महीम् ॥ ३० ॥

पृष्ठ 490

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‘ तुम्हारे बन्धु - बान्धव तुम्हारी ही चिन्तासे मृतक- तुल्य हो रहे हैं । ( तुम्हारी खोज करनेके लिये ) सैकड़ों ब्राह्मण इस पृथ्वीपर घूम रहे हैं ' ॥ ३० ॥

बृहदश्वउवाच

अभिज्ञाय सुदेवं तं दमयन्ती युधिष्ठिर ।

पर्यपृच्छत तान् सर्वान् क्रमेण सुहृदः स्वकान् ॥ ३१ ॥

बृहदश्व मुनि कहते हैं - युधिष्ठिर! सुदेवको पहचानकर दमयन्तीने क्रमशः अपने सभी सगे - सम्बन्धियोंका कुशल समाचार पूछा ॥ ३१ ॥

रुरोद च भृशं राजन् वैदर्भी शोककर्शिता ।

दृष्ट्वा सुदेवं सहसा भ्रातुरिष्टं द्विजोत्तमम् ॥ ३२ ॥

रुदतीं तामथो दृष्ट्वा सुनन्दा शोककर्शिता ।

सुदेवेन सहैकान्ते कथयन्तीं च भारत ॥ ३३ ॥

राजन्! अपने भाईके प्रिय मित्र द्विजश्रेष्ठ सुदेवको सहसा आया देख दमयन्ती शोकसे व्याकुल हो फूट - फूटकर रोने लगी । भारत! तदनन्तर उसे सुदेवके साथ एकान्तमें बात करती तथा रोती देख सुनन्दा शोकसे व्याकुल हो उठी ॥ ३२-३३ ॥

जनित्र्यै कथयामास सैरन्ध्री रोदितीति च ।

ब्राह्मणेन सहागम्य तां वेद यदि मन्यसे ॥ ३४ ॥

उसने अपनी मातासे जाकर कहा- ' माँ! सैरन्ध्री एक ब्राह्मणसे मिलकर बहुत रो रही है । यदि तुम ठीक समझो तो इसका कारण जाननेकी चेष्टा करो ' ॥ ३४ ॥

अथ चेदिपतेर्माता राज्ञश्चान्तःपुरात् तदा ।

जगाम यत्र सा बाला ब्राह्मणेन सहाभवत् ॥ ३५ ॥

तदनन्तर चेदिराजकी माता उस समय अन्तःपुरसे निकलकर उसी स्थानपर गयीं, जहाँ राजकन्या दमयन्ती ब्राह्मणके साथ खड़ी थी ॥ ३५ ॥