श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड २ — पृष्ठ 471–480
महाभारत — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 471–480
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पुरवासियोंने उसे उन्मत्ताकी भाँति जाते देखा । चेदिनरेशकी राजधानीमें उसे प्रवेश करते देख उस समय बहुत से ग्रामीण बालक कौतूहलवश उसके साथ हो लिये थे । उनसे घिरी हुई दमयन्ती राजमहलके समीप गयी ॥ ४७-४८ ॥
तां प्रासादगतापश्यद् राजमाता जनैर्वृताम् ।
धात्रीमुवाच गच्छेनामानयेह ममान्तिकम् ॥ ४ ९ ॥
उस समय राजमाताने उसे महलपरसे देखा । वह जनसाधारणसे घिरी हुई थी ।
राजमाताने धायसे कहा – ' जाओ, इस युवतीको मेरे पास ले आओ ॥ ४ ९ ॥
जनेन क्लिश्यते बाला दुःखिता शरणार्थिनी ।
तादृग् रूपं च पश्यामि विद्योतयति मे गृहम् ॥ ५० ॥
‘ इसे लोग तंग कर रहे हैं । यह दुःखिनी युवती कोई आश्रय चाहती है । मुझे इसका रूप ऐसा दिखायी देता है, जो मेरे घरको प्रकाशित कर देगा ॥ ५० ॥
उन्मत्तवेषा कल्याणी श्रीरिवायतलोचना ।
सा जनं वारयित्वा तं प्रासादतलमुत्तमम् ॥ ५१ ॥
आरोप्य विस्मिता राजन् दमयन्तीमपृच्छत ।
एवमप्यसुखाविष्टा बिभर्षि परमं वपुः ॥ ५२ ॥
‘ इसका वेष तो उन्मत्तके समान है, परंतु यह विशाल नेत्रोंवाली युवती कल्याणमयी लक्ष्मीके समान जान पड़ती है । ' धाय उन सब लोगोंको हटाकर उसे उत्तम राजमहलकी अट्टालिकापर चढ़ा ले आयी । राजन्! तत्पश्चात् विस्मित होकर राजमाताने दमयन्तीसे पूछा -'अहो! तुम इस प्रकार दुःखसे दबी होनेपर भी इतना सुन्दर रूप कैसे धारण करती हो? ॥ ५१-५२ ॥
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भासि विद्युदिवाभ्रेषु शंस मे कासि कस्य वा ।
न हि ते मानुषं रूपं भूषणैरपि वर्जितम् ॥ ५३ ॥
असहाया नरेभ्यश्च नोद्विजस्यमरप्रभे । ‘ मेघमालामें प्रकाशित होनेवाली बिजलीकी भाँति तुम इस दुःखमें भी कैसी तेजस्विनी दिखायी देती हो । मुझसे बताओ, तुम कौन हो? किसकी स्त्री हो? यद्यपि तुम्हारे शरीरपर कोई आभूषण नहीं है तो भी तुम्हारा यह रूप मानव जगत्का नहीं जान पड़ता । देवताकी-सी दिव्य कान्ति धारण करनेवाली वत्से! तुम असहाय अवस्थामें होकर भी लोगोंसे डरती क्यों नहीं हो? ' ॥ तच्छ्रुत्वा वचनं तस्या भैमी वचनमब्रवीत् ॥ ५४ ॥
उसकी वह बात सुनकर भीमकुमारीने कहा- ॥ ५४ ॥
मानुषीं मां विजानीहि भर्तारं समनुव्रताम् ।
सैरन्ध्रीजातिसम्पन्नां भुजिष्यां कामवासिनीम् ॥ ५५ ॥
' माताजी! आप मुझे मानव- कन्या ही समझिये । मैं अपने पतिके चरणोंमें अनुराग रखनेवाली एक नारी हूँ । मेरी अन्तःपुरमें काम करनेवाली सैरन्ध्री जाति है । मैं सेविका हूँ और जहाँ इच्छा होती है, वहीं रहती हूँ ॥
फलमूलाशनामेकां यत्रसायंप्रतिश्रयाम् ।
असंख्येयगुणो भर्ता मां च नित्यमनुव्रतः ॥ ५६ ॥
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‘ मैं अकेली हूँ, फल - मूल खाकर जीवन निर्वाह करती हूँ और जहाँ साँझ होती है, वहीं टिक जाती हूँ । मेरे स्वामीमें असंख्य गुण हैं, उनका मेरे प्रति सदा अत्यन्त अनुराग है ॥ ५६ ॥
भक्ताहमपि तं वीरं छायेवानुगता पथि ।
तस्य दैवात् प्रसङ्गोऽभूदतिमात्रं सुदेवने ॥ ५७ ॥
‘ जैसे छाया राह चलनेवाले पथिकके पीछे - पीछे चलती है, उसी प्रकार मैं भी अपने वीर पतिदेवमें भक्तिभाव रखकर सदा उन्हींका अनुसरण करती हूँ । दुर्भाग्यवश एक दिन मेरे पतिदेव जूआ खेलनेमें अत्यन्त आसक्त हो गये ॥ ५७ ॥
द्यूते स निर्जितश्चैव वनमेक उपेयिवान् ।
तमेकवसनं वीरमुन्मत्तमिव विह्वलम् ॥ ५८ ॥
आश्वासयन्ती भर्तारमहमप्यगमं वनम् ।
स कदाचिद् वने वीरः कस्मिंश्चित् कारणान्तरे ॥ ५ ९ ॥
‘ और उसीमें अपना सब कुछ हारकर वे अकेले ही वनकी ओर चल दिये । एक वस्त्र धारण किये उन्मत्त और विह्वल हुए अपने वीर स्वामीको सान्त्वना देती हुई मैं भी उनके साथ वनमें चली आयी । एक दिनकी बात है, मेरे वीर स्वामी किसी कारणवश वनमें गये ॥ ५८-५९ ॥
क्षुत्परीतस्तु विमनास्तदप्येकं व्यसर्जयत् ।
तमेकवसना नग्नमुन्मत्तवदचेतसम् ॥ ६० ॥
अनुव्रजन्ती बहुला न स्वपामि निशास्तदा ।
ततो बहुतिथे काले सुप्तामुत्सृज्य मां क्वचित् ॥ ६१ ॥
वाससोऽर्धं परिच्छिद्य त्यक्तवान् मामनागसम् ।
तं मार्गमाणा भर्तारं दह्यमाना दिवानिशम् ॥ ६२ ॥
‘ उस समय वे भूखसे पीड़ित और अनमने हो रहे थे । अतः उन्होंने अपने उस एक वस्त्रको भी कहीं वनमें ही छोड़ दिया । मेरे शरीरपर भी एक ही वस्त्र था । वे नग्न, उन्मत्त-जैसे और अचेत हो रहे थे । उसी दशामें सदा उनका अनुसरण करती हुई अनेक रात्रियोंतक कभी सो न सकी । तदनन्तर बहुत समयके पश्चात् एक दिन जब मैं सो गयी थी, उन्होंने मेरी आधी साड़ी फाड़ ली और मुझ निरपराधिनी पत्नीको वहीं छोड़कर वे कहीं चल दिये । मैं दिन - रात वियोगाग्निमें जलती हुई निरन्तर उन्हीं पतिदेवको ढूँढ़ती फिरती हूँ ॥ ६०– ६२ ॥
साहं कमलगर्भाभमपश्यन्ती हृदि प्रियम् ।
न विन्दाम्यमरप्रख्यं प्रियं प्राणेश्वरं प्रभुम् ॥ ६३ ॥
‘ मेरे प्रियतमकी कान्ति कमलके भीतरी भागके समान है । वे देवताओंके समान तेजस्वी, मेरे प्राणोंके स्वामी और शक्तिशाली हैं । बहुत खोजनेपर भी मैं अपने प्रियको न तो
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देख सकी हूँ और न उनका पता ही पा रही हूँ' ॥ ६३ ॥
तामश्रुपरिपूर्णाक्षीं विलपन्तीं तथा बहु ।
राजमाताब्रवीदार्ता भैमीमार्तस्वरां स्वयम् ॥ ६४ ॥
वसस्व मयि कल्याणि प्रीतिर्मे परमा त्वयि ।
मृगयिष्यन्ति ते भद्रे भर्तारं पुरुषा मम ॥ ६५ ॥
भीमकुमारी दमयन्तीके नेत्रोंमें आँसू भरे हुए थे एवं वह आर्तस्वरसे बहुत विलाप कर रही थी । राजमाता स्वयं भी उसके दुःखसे दुःखी हो बोली- ' कल्याणि! तुम मेरे पास रहो ।
तुमपर मेरा बहुत प्रेम है । भद्रे! मेरे सेवक तुम्हारे पतिकी खोज करेंगे ॥ ६४-६५ ॥
अपि वा स्वयमागच्छेत् परिधावन्नितस्ततः ।
इहैव वसती भद्रे भर्तारमुपलप्स्यसे ॥ ६६ ॥
‘ अथवा यह भी सम्भव है, वे इधर- उधर भटकते हुए स्वयं ही इधर आ निकलें । भद्रे! तुम यहीं रहकर अपने पतिको प्राप्त कर लोगी' ॥ ६६ ॥
राजमातुर्वचः श्रुत्वा दमयन्ती वचोऽब्रवीत् ।
समयेनोत्सहे वस्तुं त्वयि वीरप्रजायिनि ॥ ६७ ॥
राजमाताकी यह बात सुनकर दमयन्तीने कहा - ' वीरमातः! मैं एक नियमके साथ आपके यहाँ रह सकती हूँ ॥ ६७ ॥
उच्छिष्टं नैव भुञ्जीयां न कुर्यां पादधावनम् ।
न चाहं पुरुषानन्यान् प्रभाषेयं कथंचन ॥ ६८ ॥
' मैं किसीका जूठा नहीं खाऊँगी, किसीके पैर नहीं धोऊँगी और किसी भी दूसरे पुरुषसे किसी तरह भी वार्तालाप नहीं करूँगी ॥ ६८ ॥
प्रार्थयेद् यदि मां कश्चिद् दण्ड्यस्ते स पुमान् भवेत् ।
वध्यश्च तेऽसकृन्मन्द इति मे व्रतमाहितम् ॥ ६ ९ ॥
‘ यदि कोई पुरुष मुझे प्राप्त करना चाहे तो वह आपके द्वारा दण्डनीय हो और बार - बार ऐसे अपराध करनेवाले मूढको आप प्राणदण्ड भी दें, यही मेरा निश्चित व्रत है ॥ ६ ९ ॥
भर्तुरन्वेषणार्थं तु पश्येयं ब्राह्मणानहम् ।
यद्येवमिह वत्स्यामि त्वत्सकाशे न संशयः ॥ ७० ॥
‘ मैं अपने पतिकी खोजके लिये केवल ब्राह्मणोंसे मिल सकती हूँ। यदि यहाँ ऐसी
व्यवस्था हो सके तो निश्चय ही आपके निकट निवास करूँगी । इसमें संशय नहीं है ॥
अतोऽन्यथा न मे वासो वर्तते हृदये क्वचित् ।
तां प्रहृष्टेन मनसा राजमातेदमब्रवीत् ॥ ७१ ॥
‘ यदि इसके विपरीत कोई बात हो तो कहीं भी रहनेका मेरे मनमें संकल्प नहीं हो सकता । ' यह सुनकर राजमाता प्रसन्नचित्त होकर उससे बोली- ॥ ७१ ॥
सर्वमेतत् करिष्यामि दिष्ट्या ते व्रतमीदृशम् ।
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एवमुक्त्वा ततो भैमीं राजमाता विशाम्पते ॥ ७२ ॥
उवाचेदं दुहितरं सुनन्दां नाम भारत ।
सैरन्ध्रीमभिजानीष्व सुनन्दे देवरूपिणीम् ॥ ७३ ॥
' बेटी! मैं यह सब करूँगी । सौभाग्यकी बात है कि तुम्हारा व्रत ऐसा उत्तम है । ' राजा युधिष्ठिर! दमयन्तीसे ऐसा कहकर राजमाता अपनी पुत्री सुनन्दासे बोली — ‘ सुनन्दे! इस सैरन्ध्रीको तुम देवीस्वरूपा समझो ॥ ७२-७३ ॥
वयसा तुल्यतां प्राप्ता सखी तव भवत्वियम् ।
एतया सह मोदस्व निरुद्विग्नमनाः सदा ॥ ७४ ॥
‘ यह अवस्थामें तुम्हारे समान है, अतः तुम्हारी सखी होकर रहे । तुम इसके साथ सदा प्रसन्नचित्त एवं आनन्दमग्न रहो ' ॥ ७४ ॥
ततः परमसंहृष्टा सुनन्दा गृहमागमत् ।
दमयन्तीमुपादाय सखीभिः परिवारिता ॥ ७५ ॥
तब सखियोंसे घिरी हुई सुनन्दा अत्यन्त हर्षोल्लासमें भरकर दमयन्तीको साथ ले अपने भवनमें आयी ॥ ७५ ॥
स तत्र पूज्यमाना वै दमयन्ती व्यनन्दत ।
सर्वकामैः सुविहितैर्निरुद्वेगावसत् तदा ॥ ७६ ॥
सुनन्दा दमयन्तीके इच्छानुसार सब प्रकारकी व्यवस्था करके उसे बड़े आदर- सत्कारके साथ रखने लगी । इससे दमयन्तीको बड़ी प्रसन्नता हुई और वह वहाँ उद्वेगरहित हो रहने लगी ॥ ७६ ॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि नलोपाख्यानपर्वणि दमयन्तीचेदिराजगृहवासे पञ्चषष्टितमोऽध्यायः ॥ ६५ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत नलोपाख्यानपर्वमें दमयन्तीका चेदिराजके भवनमें निवासविषयक पैंसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ६५ ॥
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षट्षष्टितमोऽध्यायः राजा नलके द्वारा दावानलसे कर्कोटक नागकी रक्षा तथा नागद्वारा नलको आश्वासन बृहदश्वउवाच
उत्सृज्य दमयन्तीं तु नलो राजा विशाम्पते ।
ददर्श दावं दह्यन्तं महान्तं गहने वने ॥ १ ॥
बृहदश्व मुनि कहते हैं- युधिष्ठिर! दमयन्तीको छोड़कर जब राजा नल आगे बढ़ गये, तब एक गहन वनमें उन्होंने महान् दावानल प्रज्वलित होते देखा ॥ १ ॥
तत्र शुश्राव शब्दं वै मध्ये भूतस्य कस्यचित् ।
अभिधाव नलेत्युच्चैः पुण्यश्लोकेति चासकृत् ॥ २ ॥
मा भैरिति नलश्चोक्त्वा मध्यमग्नेः प्रविश्य तम् ।
ददर्श नागराजानं शयानं कुण्डलीकृतम् ॥ ३ ॥
उसीके बीचमें उन्हें किसी प्राणीका यह शब्द सुनायी पड़ा- ' पुण्यश्लोक महाराज नल! दौड़िये, मुझे बचाइये । ' उच्च स्वरसे बार- बार दुहरायी गयी इस वाणीको सुनकर राजा नलने कहा — ‘ डरो मत ' । इतना कहकर वे आगके भीतर घुस गये । वहाँ उन्होंने देखा, एक नागराज कुण्डलाकार पड़ा हुआ सो रहा है ॥ २-३ ॥
स नागः प्राञ्जलिर्भूत्वा वेपमानो नलं तदा ।
उवाच मां विद्धि राजन् नागं कर्कोटकं नृप ॥ ४ ॥
मया प्रलब्धो ब्रह्मर्षिर्नारदः सुमहातपाः ।
तेन मन्युपरीतेन शप्तोऽस्मि मनुजाधिप ॥ ५ ॥
तिष्ठ त्वं स्थावर इव यावदेव नलः क्वचित् ।
इतो नेता हि तत्र त्वं शापान्मोक्ष्यसि मत्कृतात् ॥ ६ ॥
उस नागने हाथ जोड़कर काँपते हुए नलसे उस समय इस प्रकार कहा – ' राजन्! मुझे कर्कोटक नाग समझिये । नरेश्वर! एक दिन मेरे द्वारा महातपस्वी ब्रह्मर्षि नारद ठगे गये, अतः मनुजेश्वर! उन्होंने क्रोधसे आविष्ट होकर मुझे शाप दे दिया — ' तुम स्थावर वृक्षकी भाँति एक जगह पड़े रहो, जब कभी राजा नल आकर तुम्हें यहाँसे अन्यत्र ले जायँगे, तभी तुम मेरे शापसे छुटकारा पा सकोगे ' ॥
तस्य शापान्न शक्तोऽस्मि पदाद् विचलितुं पदम् ।
उपदेक्ष्यामि ते श्रेयस्त्रातुमर्हति मां भवान् ॥ ७ ॥
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‘ राजन्! नारदजीके उस शापसे मैं एक पग भी चल नहीं सकता; आप मुझे बचाइये, मैं आपको कल्याणकारी उपदेश दूँगा ॥ ७ ॥
सखा च ते भविष्यामि मत्समो नास्ति पन्नगः ।
लघुश्च ते भविष्यामि शीघ्रमादाय गच्छ माम् ॥ ८ ॥
' साथ ही मैं आपका मित्र हो जाऊँगा । सर्पोंमें मेरे जैसा प्रभावशाली दूसरा कोई नहीं
है । मैं आपके लिये हलका हो जाऊँगा । आप शीघ्र मुझे लेकर यहाँसे चल दीजिये ' ॥ ८ ॥
एवमुक्त्वा स नागेन्द्रो बभूवाङ्गुष्ठमात्रकः ।
तं गृहीत्वा नलः प्रायाद् देशं दावविवर्जितम् ॥ ९ ॥
इतना कहकर नागराज कर्कोटक अँगूठेके बराबर हो गया । उसे लेकर राजा नल वनके उस प्रदेशकी ओर चले गये, जहाँ दावानल नहीं था ॥ ९ ॥
आकाशदेशमासाद्य विमुक्तं कृष्णवर्त्मना ।
उत्स्रष्टुकामं तं नागः पुनः कर्कोटकोऽब्रवीत् ॥ १० ॥
अग्निके प्रभावसे रहित आकाश- देशमें पहुँचनेपर जब नलने उस नागको छोड़नेका विचार किया, उस समय कर्कोटकने फिर कहा— ॥ १० ॥
पदानि गणयन् गच्छ स्वानि नैषध कानिचित् ।
तत्र तेऽहं महाबाहो श्रेयो धास्यामि यत् परम् ॥ ११ ॥
‘ नैषध! आप अपने कुछ पग गिनते हुए चलिये । महाबाहो! ऐसा करनेपर मैं आपके लिये परम कल्याणका साधन करूँगा' ॥ ११ ॥
ततः संख्यातुमारब्धमदशद् दशमे पदे ।
तस्य दष्टस्य तद् रूपं क्षिप्रमन्तरधीयत ॥ १२ ॥
तब राजा नलने अपने पग गिनने आरम्भ किये । पग गिनते - गिनते जब राजा नलने ‘ दश' कहा, तब नागने उन्हें डँस लिया । उसके डँसते ही उनका पहला रूप तत्काल अन्तर्हित ( होकर श्यामवर्ण) हो गया ॥ १२ ॥
स दृष्ट्वा विस्मितस्तस्थावात्मानं विकृतं नलः ।
स्वरूपधारिणं नागं ददर्श स महीपतिः ॥ १३ ॥
अपने रूपको इस प्रकार विकृत ( गौरवर्णसे श्यामवर्ण) हुआ देख राजा नलको बड़ा विस्मय हुआ । उन्होंने अपने पूर्वस्वरूपको धारण करके खड़े हुए कर्कोटक नागको देखा ॥ १३ ॥
ततः कर्कोटको नागः सान्त्वयन् नलमब्रवीत् ।
मया तेऽन्तर्हितं रूपं न त्वां विद्युर्जना इति ॥ १४ ॥
तब कर्कोटक नागने राजा नलको सान्त्वना देते हुए कहा – ' राजन्! मैंने आपके पहले रूपको इसलिये अदृश्य कर दिया है कि लोग आपको पहचान न सकें ॥ १४ ॥
यत्कृते चासि निकृतो दुःखेन महता नल ।
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विषेण स मदीयेन त्वयि दुःखं निवत्स्यति ॥ १५ ॥
‘ महाराज नल! जिस कलियुगके कपटसे आपको महान् दुःखका सामना करना पड़ा है, वह मेरे विषसे दग्ध होकर आपके भीतर बड़े कष्टसे निवास करेगा ॥ १५ ॥
विषेण संवृतैर्गात्रैर्यावत् त्वां न विमोक्ष्यति ।
तावत् त्वयि महाराज दुःखं वै स निवत्स्यति ॥ १६ ॥
' कलियुगके सारे अंग मेरे विषसे व्याप्त हो जायँगे । महाराज! वह जबतक आपको छोड़ नहीं देगा, तबतक आपके भीतर बड़े दुःखसे निवास करेगा ॥ १६ ॥
अनागा येन निकृतस्त्वमनर्हो जनाधिप ।
क्रोधादसूययित्वा तं रक्षा मे भवतः कृता ॥ १७ ॥
‘नरेश्वर! आप छल - कपटद्वारा सताये जानेयोग्य नहीं थे, तो भी जिसने बिना किसी अपराधके आपके साथ कपटका व्यवहार किया है, उसीके प्रति क्रोधसे दोषदृष्टि रखकर मैंने आपकी रक्षा की है ॥ १७ ॥
न ते भयं नरव्याघ्र दंष्ट्रिभ्यः शत्रुतोऽपि वा ।
ब्रह्मविद्भयश्च भविता मत्प्रसादान्नराधिप ॥ १८ ॥
‘ नरव्याघ्र महाराज! मेरे प्रसादसे आपको दाढ़ोंवाले जन्तुओं और शत्रुओंसे तथा वेदवेत्ताओंके शाप आदिसे भी कभी भय नहीं होगा ॥ १८ ॥
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राजन् विषनिमित्ता च न ते पीडा भविष्यति ।
संग्रामेषु च राजेन्द्र शश्वज्जयमवाप्स्यसि ॥ १ ९ ॥
‘ राजन्! आपको विषजनित पीड़ा कभी नहीं होगी । राजेन्द्र! आप युद्धमें भी सदा विजय प्राप्त करेंगे ॥ १ ९ ॥
गच्छ राजन्नितः सूतो बाहुकोऽहमिति ब्रुवन् ।
समीपमृतुपर्णस्य स हि चैवाक्षनैपुणः ॥ २० ॥
‘ राजन्! अब आप यहाँसे अपनेको बाहुक नामक सूत बताते हुए राजा ऋतुपर्णके समीप जाइये । वे द्यूतविद्यामें बड़े निपुण हैं ॥ २० ॥
अयोध्यां नगरीं रम्यामद्य वै निषधेश्वर ।
स तेऽक्षहृदयं दाता राजाश्वहृदयेन वै ॥ २१ ॥
इक्ष्वाकुकुलजः श्रीमान् मित्रं चैव भविष्यति ।
भविष्यसि यदाक्षज्ञः श्रेयसा योक्ष्यसे तदा ॥ २२ ॥
‘निषधेश्वर! आप आज ही रमणीय अयोध्यापुरीको चले जाइये । इक्ष्वाकुकुलमें उत्पन्न श्रीमान् राजा ऋतुपर्ण आपसे अश्वविद्याका रहस्य सीखकर बदले में आपको द्यूतक्रीड़ाका रहस्य बतलायेंगे और आपके मित्र भी हो जायँगे । जब आप द्यूतविद्याके ज्ञाता होंगे, तब पुनः कल्याणभागी हो जायँगे ॥ २१-२२ ॥
सममेष्यसि दारैस्त्वं मा स्म शोके मनः कृथाः ।
राज्येन तनयाभ्यां च सत्यमेतद् ब्रवीमि ते ॥ २३ ॥
' मैं सच कहता हूँ, आप एक ही साथ अपनी पत्नी, दोनों संतानों तथा राज्यको प्राप्त कर लेंगे; अतः अपने मनमें चिन्ता न कीजिये ॥ २३ ॥
स्वं रूपं च यदा द्रष्टुमिच्छेथास्त्वं नराधिप ।
संस्मर्तव्यस्तदा तेऽहं वासश्चेदं निवासयेः ॥ २४ ॥
‘ नरेश्वर! जब आप अपने ( पहलेवाले ) रूपको देखना चाहें, उस समय मेरा स्मरण करें और इस कपड़ेको ओढ़ लें ॥ २४ ॥
अनेन वाससाच्छन्नः स्वं रूपं प्रतिपत्स्यसे ।
इत्युक्त्वा प्रददौ तस्मै दिव्यं वासोयुगं तदा ॥ २५ ॥
‘ इस वस्त्रसे आच्छादित होते ही आप अपना पहला रूप प्राप्त कर लेंगे । ' ऐसा कहकर नागने उन्हें दो दिव्य वस्त्र प्रदान किये ॥ २५ ॥
एवं नलं च संदिश्य वासो दत्त्वा च कौरव ।
नागराजस्ततो राजंस्तत्रैवान्तरधीयत ॥ २६ ॥
कुरुनन्दन युधिष्ठिर! इस प्रकार राजा नलको संदेश और वस्त्र देकर नागराज कर्कोटक वहीं अन्तर्धान हो गया ॥
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इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि नलोपाख्यानपर्वणि नलकर्कोटकसंवादे षट्षष्टितमोऽध्यायः ॥ ६६ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत नलोपाख्यानपर्वमें नलकर्कोटकसंवादविषयक छाछठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ६६ ॥