02.Mahabharata Volume 2 — पृष्ठ 531–540
महाभारत — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 531–540
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दमयन्तीके ऐसा कहनेपर केशिनी पुनः वहाँ गयी और अश्वविद्याविशारद बाहुकके लक्षणोंका अवलोकन करके वह फिर लौट आयी ॥ ६३ ॥
सा तत् सर्वं यथावृत्तं दमयन्त्यै न्यवेदयत् ।
निमित्तं यत् तया दृष्टं बाहुके दैवमानुषम् ॥ ७ ॥
उसने बाहुकमें जो दिव्य अथवा मानवोचित विशेषताएँ देखीं, उनका यथावत् समाचार पूर्णरूपसे दमयन्तीको बताया ॥ ७ ॥
केशिन्युवाच
दृढं शुच्युपचारोऽसौ न मया मानुषः क्वचित् ।
दृष्टपूर्वः श्रुतो वापि दमयन्ति तथाविधः ॥ ८ ॥
केशिनीने कहा — दमयन्ती! उसका प्रत्येक व्यवहार अत्यन्त पवित्र है । ऐसा मनुष्य तो मैंने कहीं भी पहले न तो देखा है और न सुना ही है ॥ ८ ॥
ह्रस्वमासाद्य संचारं नासौ विनमते क्वचित् ।
तं तु दृष्ट्वा यथाऽसंगमुत्सर्पति यथासुखम् ॥ ९ ॥
किसी छोटे - से -छोटे दरवाजेपर जाकर भी वह झुकता नहीं है । उसे देखकर बड़ी आसानीके साथ दरवाजा ही इस प्रकार ऊँचा हो जाता है कि जिससे मस्तकका उससे स्पर्श न हो ॥ ९ ॥
संकटेऽप्यस्य सुमहान् विवरो जायतेऽधिकः ।
ऋतुपर्णस्य चार्थाय भोजनीयमनेकशः ॥ १० ॥
प्रेषितं तत्र राज्ञा तु मांसं चैव प्रभूतवत् ।
तस्य प्रक्षालनार्थाय कुम्भास्तत्रोपकल्पिताः ॥ ११ ॥
संकुचित स्थानमें भी उसके लिये बहुत बड़ा अवकाश बन जाता है । राजा भीमने ऋतुपर्णके लिये अनेक प्रकारके भोज्य पदार्थ भेजे थे । उसमें प्रचुर मात्रामें केला आदि फलोंका गूदा भी था, उसको धोनेके लिये वहाँ खाली घड़े रख दिये थे ॥ १०-११ ॥
ते तेनावेक्षिताः कुम्भाः पूर्णा एवाभवंस्ततः ।
ततः प्रक्षालनं कृत्वा समधिश्रित्य बाहुकः ॥ १२ ॥
तृणमुष्टिं समादाय सवितुस्तं समादधत् ।
अथ प्रज्वलितस्तत्र सहसा हव्यवाहनः ॥ १३ ॥
परंतु बाहुकके देखते ही वे सारे घड़े पानीसे भर गये । उससे खाद्य पदार्थोंको धोकर बाहुकने चूल्हेपर चढ़ा दिया । फिर एक मुट्ठी तिनका लेकर सूर्यकी किरणोंसे ही उसे उद्दीप्त किया । फिर तो देखते - ही - देखते सहसा उसमें आग प्रज्वलित हो गयी ॥ १२-१३ ॥
तदद्भुततमं दृष्ट्वा विस्मिताहमिहागता ।
अन्यच्च तस्मिन् सुमहदाश्चर्यं लक्षितं मया ॥ १४ ॥
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यह अद्भुत बात देखकर मैं आश्चर्यचकित होकर यहाँ आयी हूँ । बाहुकमें एक और भी बड़े आश्चर्यकी बात देखी है ॥ १४ ॥
यदग्निमपि संस्पृश्य नैवासौ दह्यते शुभे ।
छन्देन चोदकं तस्य वहत्यावर्जितं द्रुतम् ॥ १५ ॥
शुभे! वह अग्निका स्पर्श करके भी जलता नहीं है । पात्रमें रखा हुआ थोड़ा- सा जल भी उसकी इच्छाके अनुसार तुरंत ही प्रवाहित हो जाता है ॥ १५ ॥
अतीव चान्यत् सुमहदाश्चर्यं दृष्टवत्यहम् ।
यत् स पुष्पाण्युपादाय हस्ताभ्यां ममृदे शनैः ॥ १६ ॥
मृद्यमानानि पाणिभ्यां तेन पुष्पाणि नान्यथा ।
भूय एव सुगन्धीनि हृषितानि भवन्ति हि ।
एतान्यद्भुतलिङ्गानि दृष्ट्वाहं द्रुतमागता ॥ १७ ॥
एक और भी अत्यन्त आश्चर्यजनक बात मुझे उसमें दिखायी दी है । वह फूल लेकर उन्हें हाथोंसे धीरे - धीरे मसलता था । हाथोंसे मसलनेपर भी वे फूल विकृत नहीं होते थे अपितु और भी सुगन्धित और विकसित हो जाते थे । ये अद्भुत लक्षण देखकर मैं शीघ्रतापूर्वक यहाँ आयी हूँ ॥ १६-१७ ॥ बृहदश्वउवाच
दमयन्ती तु तच्छ्रुत्वा पुण्यश्लोकस्य चेष्टितम् ।
अमन्यत नलं प्राप्तं कर्मचेष्टाभिसूचितम् ॥ १८ ॥
बृहदश्व मुनि कहते हैं - युधिष्ठिर! दमयन्तीने पुण्यश्लोक महाराज नलकी - सी बाहुककी सारी चेष्टाओंको सुनकर मन-ही-मन यह निश्चय कर लिया कि महाराज नल ही आये हैं । अपने कार्यों और चेष्टाओंद्वारा वे पहचान लिये गये हैं ॥ १८ ॥
सा शङ्कमाना भर्तारं बाहुकं पुनरिङ्गितैः ।
केशिनीं श्लक्ष्णया वाचा रुदती पुनरब्रवीत् ॥ १ ९ ॥
पुनर्गच्छ प्रमत्तस्य बाहुकस्योपसंस्कृतम् ।
महानसाद् द्रुतं मांसमानयस्वेह भाविनि ॥ २० ॥
सा गत्वा बाहुकस्याग्रे तन्मांसमपकृष्य च ।
अत्युष्णमेव त्वरिता तत्क्षणात् प्रियकारिणी ॥ २१ ॥
चेष्टाओंद्वारा उसके मनमें यह प्रबल आशंका जम गयी कि बाहुक मेरे पति ही हैं । फिर तो वह रोने लगी और मधुर वाणीमें केशिनीसे बोली- ' सखि! एक बार फिर जाओ और जब बाहुक असावधान हो तो उसके द्वारा विशेषविधिसे उबालकर तैयार किया गया फलोंका गूदा रसोई घरमेंसे शीघ्र उठा लाओ । ' केशिनी दमयन्तीकी प्रियकारिणी सखी थी ।
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वह तुरंत गयी और जब बाहुकका ध्यान दूसरी ओर गया तब उसके उबाले हुए गरम - गरम फलोंके गूदेमेंसे थोड़ा -सा निकालकर तत्काल ले आयी ॥ १ ९ –२१ ॥
दमयन्त्यै ततः प्रादात् केशिनी कुरुनन्दन ।
सो चिता नलसिद्धस्य मांसस्य बहुशः पुरा ॥ २२ ॥
कुरुनन्दन! केशिनीने वह फलोंका गूदा दमयन्तीको दे दिया । उसे पहले अनेक बार नलके द्वारा उबाले हुए फलोंके गूदेके स्वादका अनुभव था ॥ २२ ॥
प्राश्य मत्वा नलं सूंत प्राक्रोशद् भृशदुःखिता ।
वैक्लव्यं परमं गत्वा प्रक्षाल्य च मुखं ततः ॥ २३ ॥
मिथुनं प्रेषयामास केशिन्या सह भारत ।
इन्द्रसेनां सह भ्रात्रा समभिज्ञाय बाहुकः ॥ २४ ॥
अभिद्रुत्य ततो राजा परिष्वज्याङ्कमानयत् ।
बाहुकस्तु समासाद्य सुतौ सुरसुतोपमौ ॥ २५ ॥
भृशं दुःखपरीतात्मा सुस्वरं प्ररुरोद ह ।
नैषधो दर्शयित्वा तु विकारमसकृत् तदा ।
उत्सृज्य सहसो पुत्रौ केशिनीमिदमब्रवीत् ॥ २६ ॥
उसे खाकर वह पूर्णरूपसे इस निश्चयपर पहुँच गयी कि बाहुक सारथि वास्तवमें राजा नल हैं । फिर तो वह अत्यन्त दुखी होकर विलाप करने लगी । उस समय उसकी व्याकुलता बहुत बढ़ गयी । भारत! फिर उसने मुँह धोकर केशिनीके साथ अपने बच्चोंको बाहुकके पास भेजा । बाहुकरूपी राजा नलने इन्द्रसेना और उसके भाई इन्द्रसेनको पहचान लिया और दौड़कर दोनों बच्चोंको छातीसे लगाकर गोदमें ले लिया । देवकुमारोंके समान उन दोनों सुन्दर बालकोंको पाकर निषधराज नल अत्यन्त दुःखमग्न हो जोर- जोरसे रोने लगे । उन्होंने बार-बार अपने मनोविकार दिखाये और सहसा दोनों बच्चोंको छोड़कर केशिनीसे इस प्रकार कहा— ॥ २३–२६ ॥
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DAA
इदं च सदृशं भद्रे मिथुनं मम पुत्रयोः ।
अतो दृष्ट्वैव सहसा बाष्पमुत्सृष्टवानहम् ॥ २७ ॥
' भद्रे! ये दोनों बालक मेरे पुत्र और पुत्रीके समान हैं, इसीलिये इन्हें देखकर सहसा मेरे नेत्रोंसे आँसू बहने लगे ॥ २७ ॥
बहुशः सम्पतन्तीं त्वां जनः संकेतदोषतः ।
वयं च देशातिथयो गच्छ भद्रे यथासुखम् ॥ २८ ॥
' भद्रे! तुम बार-बार आती-जाती हो, लोग किसी दोषकी आशंका कर लेंगे और हमलोग इस देशके अतिथि हैं; अतः तुम सुखपूर्वक महलमें चली जाओ ' ॥ २८ ॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि नलोपाख्यानपर्वणि कन्यापुत्रदर्शने पञ्चसप्ततितमोऽध्यायः ॥ ७५ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत नलोपाख्यानपर्वमें नलका अपनी पुत्री और पुत्रके देखनेसे सम्बन्ध रखनेवाला पचहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ७५ ॥
* ‘ मांस' शब्दका अर्थ ‘ संस्कृत - शब्दार्थ- कौस्तुभ ' में फलका गूदा किया गया है ।
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षट्सप्ततितमोऽध्यायः दमयन्ती और बाहुककी बातचीत, नलका प्राकट्य और नल -दमयन्ती -मिलन बृहदश्व उवाच
सर्वं विकारं दृष्ट्वा तु पुण्यश्लोकस्य धीमतः ।
आगत्य केशिनी सर्वं दमयन्त्यै न्यवेदयत् ॥ १ ॥
बृहदश्व मुनि कहते हैं - युधिष्ठिर! परम बुद्धिमान् पुण्यश्लोक राजा नलके सम्पूर्ण विकारोंको देखकर केशिनीने दमयन्तीको आकर बताया ॥ १ ॥
दमयन्ती ततो भूयः प्रेषयामास केशिनीम् ।
मानुः सकाशं दुःखार्ता नलदर्शनकाङ्क्षया ॥ २ ॥
अब दमयन्ती नलके दर्शनकी अभिलाषासे दुःखातुर हो गयी । उसने केशिनीको पुनः अपनी माँके पास भेजा ॥ २ ॥
परीक्षितो मे बहुशो बाहुको नलशङ्कया ।
रूपे मे संशयस्त्वेकः स्वयमिच्छामि वेदितुम् ॥ ३ ॥
( और यह कहलाया — ) ' माँ! मेरे मनमें बाहुकके ही नलके होनेका संदेह था, जिसकी मैंने बार- बार परीक्षा करा ली है और सब लक्षण तो मिल गये हैं । केवल नलके रूपमें संदेह रह गया है । इस संदेहका निवारण करनेके लिये मैं स्वयं पता लगाना चाहती हूँ ॥ ३ ॥
स वा प्रवेश्यतां मातर्मां वानुज्ञातुमर्हसि ।
विदितं वाथवा ज्ञातं पितुर्मे संविधीयताम् ॥ ४ ॥
‘ माताजी! या तो बाहुकको महलमें बुलाओ या मुझे ही बाहुकके निकट जानेकी आज्ञा दो । तुम अपनी रुचिके अनुसार पिताजीसे सूचित करके अथवा उन्हें इसकी सूचना दिये बिना इसकी व्यवस्था कर सकती हो ' ॥ ४ ॥
एवमुक्ता तु वैदर्भ्या सा देवी भीममब्रवीत् ।
दुहितुस्तमभिप्रायमन्वजानात् स पार्थिवः ॥ ५ ॥
दमयन्तीके ऐसा कहनेपर महारानीने विदर्भनरेश भीमसे अपनी पुत्रीका यह अभिप्राय बताया । सब बातें सुनकर महाराजने आज्ञा दे दी ॥ ५ ॥
सा वै पित्राभ्यनुज्ञाता मात्रा च भरतर्षभ ।
नलं प्रवेशयामास यत्र तस्याः प्रतिश्रयः ॥ ६ ॥
तां स्म दृष्ट्वैव सहसा दमयन्तीं नलो नृपः ।
आविष्टः शोकदुःखाभ्यां बभूवाश्रुपरिप्लुतः ॥ ७ ॥
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भरतकुलभूषण! पिता और माताकी आज्ञा ले दमयन्तीने नलको राजभवनके भीतर जहाँ वह स्वयं रहती थी, बुलवाया। दमयन्तीको सहसा सामने उपस्थित देख राजा नल शोक और दुःखसे व्याप्त हो नेत्रोंसे आँसू बहाने लगे ॥ ६-७ ॥
तं तु दृष्ट्वा तथायुक्तं दमयन्ती नलं तदा ।
तीव्रशोकसमाविष्टा बभूव वरवर्णिनी ॥ ८ ॥
उस समय नलको उस अवस्थामें देखकर सुन्दरी दमयन्ती भी तीव्र शोकसे व्याकुल हो गयी ॥ ८ ॥
ततः काषायवसना जटिला मलपङ्किनी ।
दमयन्ती महाराज बाहुकं वाक्यमब्रवीत् ॥ ९ ॥
महाराज! तदनन्तर मलिन वस्त्र पहने, जटा धारण किये, मैल और पंकसे मलिन दमयन्तीने बाहुकसे पूछा— ॥ ९ ॥
पूर्वं दृष्टस्त्वया कश्चिद् धर्मज्ञो नाम बाहुक ।
सुप्तामुत्सृज्य विपिने गतो यः पुरुषः स्त्रियम् ॥ १० ॥
'बाहुक! तुमने पहले किसी ऐसे धर्मज्ञ पुरुषको देखा है, जो अपनी सोयी हुई पत्नीको वनमें अकेली छोड़कर चले गये थे ॥ १० ॥
अनागसं प्रियां भार्यां विजने श्रममोहिताम् ।
अपहाय तु को गच्छेत् पुण्यश्लोकमृते नलम् ॥ ११ ॥
‘ पुण्यश्लोक महाराज नलके सिवा दूसरा कौन होगा, जो एकान्तमें थकावटके कारण अचेत सोयी हुई अपनी निर्दोष प्रियतमा पत्नीको छोड़कर जा सकता हो ॥ ११ ॥
किमु तस्य मया बाल्यादपराद्धं महीपतेः ।
यो मामुत्सृज्य विपिने गतवान् निद्रयार्दिताम् ॥ १२ ॥
‘ न जाने उन महाराजका मैंने बचपनसे ही क्या अपराध किया था, जो नींदकी मारी हुई मुझ असहाय अबलाको जंगलमें छोड़कर चल दिये ॥ १२ ॥
साक्षाद् देवानपाहाय वृतो यः स पुरा मया ।
अनुव्रतां साभिकामां पुत्रिणीं त्यक्तवान् कथम् ॥ १३ ॥
‘ पहले स्वयंवरके समय साक्षात् देवताओंको छोड़कर मैंने उनका वरण किया था । मैं उनकी अनुगत भक्त, निरन्तर उन्हें चाहनेवाली और पुत्रवती हूँ, तो भी उन्होंने कैसे मुझे त्याग दिया? ॥ १३ ॥
अग्नौ पाणिं गृहीत्वा तु देवानामग्रतस्तथा ।
भविष्यामीति सत्यं तु प्रतिश्रुत्य क्व तद् गतम् ॥ १४ ॥
‘ अग्निके समीप और देवताओंके समक्ष मेरा हाथ पकड़कर और ' मैं तेरा ही अनुगत होकर रहूँगा ' ऐसी प्रतिज्ञा करके जिन्होंने मुझे अपनाया था, उनका वह सत्य कहाँ चला गया? ' ॥ १४ ॥
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दमयन्त्या ब्रुवन्त्यास्तु सर्वमेतदरिंदम ।
शोकजं वारि नेत्राभ्यामसुखं प्रास्रवद् बहु ॥ १५ ॥
शत्रुदमन युधिष्ठिर! दमयन्ती जब ये सब बातें कह रही थी, उस समय नलके नेत्रोंसे शोकजनित दुःखपूर्ण आँसुओंकी अजस्र धारा बहती जा रही थी ॥ १५ ॥
अतीव कृष्णसाराभ्यां रक्तान्ताभ्यां जलं तु तत् ।
परिस्रवन् नलो दृष्ट्वा शोकार्तामिदमब्रवीत् ॥ १६ ॥
उनकी आँखोंकी पुतलियाँ काली थीं और नेत्रके किनारे कुछ- कुछ लाल थे । उनसे निरन्तर अश्रुधारा बहाते हुए नलने दमयन्तीको शोकसे आतुर देख इस प्रकार कहा ॥ १६ ॥
मम राज्यं प्रणष्टं यन्नाहं तत् कृतवान् स्वयम् ।
कलिना तत् कृतं भीरु यच्च त्वामहमत्यजम् ॥ १७ ॥
‘ भीरु! मेरा जो राज्य नष्ट हो गया और मैंने जो तुम्हें त्याग दिया, वह सब कलियुगकी करतूत थी । मैंने स्वयं कुछ नहीं किया था ॥ १७ ॥
यत् त्वया धर्मकृच्छ्रे तु शापेनाभिहतः पुरा ।
वनस्थया दुःखितया शोचन्त्या मां दिवानिशम् ॥ १८ ॥
स मच्छरीरे त्वच्छापाद् दह्यमानोऽवसत् कलिः ।
त्वच्छापदग्धः सततं सोऽग्नावग्निरिवाहितः ॥ १ ९ ॥
' पहले जब तुम वनमें दुखी होकर दिन- रात मेरे लिये शोक करती थी और उस समय धर्मसंकटमें पड़नेपर तुमने जिसे शाप दे दिया था, वही कलियुग मेरे शरीरमें तुम्हारी शापग्निसे दग्ध होता हुआ निवास करता था, जैसे आगमें रखी हुई आग हो; उसी प्रकार वह कलि तुम्हारे शापसे दग्ध हो सदा मेरे भीतर रहता था ॥ १८-१९ ॥
मम च व्यवसायेन तपसा चैव निर्जितः ।
दुःखस्यान्तेन चानेन भवितव्यं हि नौ शुभे ॥ २० ॥
' शुभे! मेरे व्यवसाय ( उद्योग) तथा तपस्यासे कलियुग परास्त हो चुका है । अतः अब हमारे दुःखोंका अन्त हो जाना चाहिये ॥ २० ॥
विमुच्य मां गतः पापस्ततोऽहमिह चागतः ।
त्वदर्थं विपुलश्रोणि न हि मेऽन्यत् प्रयोजनम् ॥ २१ ॥
‘ सुन्दरी! पापी कलियुग मुझे छोड़कर चला गया, इसीसे मैं तुम्हारी प्राप्तिका उद्देश्य लेकर यहाँ आया हूँ । इसके सिवा, मेरे आगमनका दूसरा कोई प्रयोजन नहीं है ॥ २१ ॥
कथं नु नारी भर्तारमनुरक्तमनुव्रतम् ।
उत्सृज्य वरयेदन्यं यथा त्वं भीरु कर्हिचित् ॥ २२ ॥
‘ भीरु! कोई भी स्त्री कभी अपने अनुरक्त एवं भक्त पतिको त्यागकर दूसरे पुरुषका वरण कैसे कर सकती है? जैसा कि तुम करने जा रही हो ॥ २२ ॥
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दूताश्चरन्ति पृथिवीं कृत्स्नां नृपतिशासनात् ।
भैमी किल स्म भर्तारं द्वितीयं वरयिष्यति ॥ २३ ॥
‘ विदर्भनरेशकी आज्ञासे सारी पृथ्वीपर दूत विचरते हैं और यह घोषणा कर रहे हैं कि दमयन्ती द्वितीय पतिका वरण करेगी ॥ २३ ॥
स्वैरवृत्ता यथाकाममनुरूपमिवात्मनः ।
श्रुत्वैव चैवं त्वरितो भाङ्गासुरिरुपस्थितः ॥ २४ ॥
‘ दमयन्ती स्वेच्छाचारिणी है और अपनी रुचिके अनुसार किसी अनुरूप पतिका वरण कर सकती है ', यह सुनकर ही राजा ऋतुपर्ण बड़ी उतावलीके साथ यहाँ उपस्थित हुए हैं ' ॥ २४ ॥
दमयन्ती तु तच्छ्रुत्वा नलस्य परिदेवितम् ।
प्राञ्जलिर्वेपमाना च भीता वचनमब्रवीत् ॥ २५ ॥
दमयन्ती नलका यह विलाप सुनकर काँप उठी और भयभीत हो हाथ जोड़कर यह वचन बोली ॥ २५ ॥
दमयन्त्युवाच
न मामर्हसि कल्याण दोषेण परिशङ्कितुम् ।
मया हि देवानुत्सृज्य वृतस्त्वं निषधाधिप ॥ २६ ॥
दमयन्तीने कहा— कल्याणमय निषधनरेश! आपको मुझपर दोषारोपण करते हुए मेरे चरित्रपर संदेह नहीं करना चाहिये । ( आपके प्रति अनन्य प्रेमके कारण ही ) मैंने देवताओंको छोड़कर आपका वरण किया है ॥ २६ ॥
तवाभिगमनार्थं तु सर्वतो ब्राह्मणा गताः ।
वाक्यानि मम गाथाभिर्गायमाना दिशो दश ॥ २७ ॥
आपका पता लगानेके लिये ही चारों ओर ब्राह्मणलोग भेजे गये और वे मेरी कही हुई बातोंको सब दिशाओंमें गाथाके रूपमें गाते फिरे ॥ २७ ॥
ततस्त्वां ब्राह्मणो विद्वान् पर्णादो नाम पार्थिव ।
अभ्यगच्छत् कोसलायामृतुपर्णनिवेशने ॥ २८ ॥
राजन्! इसी योजनाके अनुसार पर्णाद नामक विद्वान् ब्राह्मण अयोध्यापुरीमें ऋतुपर्णके राजभवनमें गये थे ||
तेन वाक्ये कृते सम्यक् प्रतिवाक्ये तथाऽऽहृते ।
उपायोऽयं मया दृष्टो नैषधानयने तव ॥ २९ ॥
उन्होंने वहाँ मेरी बात उपस्थित की और वहाँसे आपके द्वारा प्राप्त हुआ ठीक -ठीक उत्तर वे ले आये । निषधराज! इसके बाद आपको यहाँ बुलानेके लिये मुझे यह उपाय सूझा
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(कि एक ही दिनके बाद होनेवाले स्वयंवरका समाचार देकर ऋतुपर्णको बुलाया जाय ) ॥ २ ९ ॥
त्वामृते न हि लोकेऽन्य एकाह्ना पृथिवीपते ।
समर्थो योजनशतं गन्तुमश्वैर्नराधिप ॥ ३० ॥
नरेश्वर! पृथ्वीनाथ! मैं यह अच्छी तरह जानती हूँ कि इस जगत्में आपके सिवा दूसरा कोई ऐसा पुरुष नहीं है, जो एक ही दिनमें घोड़े जुते हुए रथकी सवारीसे सौ योजन दूरतक जानेमें समर्थ हो ॥ ३० ॥
स्पृशेयं तेन सत्येन पादावेतौ महीपते ।
यथा नासत्कृतं किंचिन्मनसापि चराम्यहम् ॥ ३१ ॥
महीपते! मैं मनसे भी कभी कोई असदाचरण नहीं करती हूँ और इसी सत्यकी शपथ खाकर आपके इन दोनों चरणोंका स्पर्श करती हूँ ॥ ३१ ॥
अयं चरति लोकेऽस्मिन् भूतसाक्षी सदागतिः ।
एष मे मुञ्चतु प्राणान् यदि पापं चराम्यहम् ॥ ३२ ॥
ये सदा गतिशील वायुदेवता इस जगत् में निरन्तर विचरते रहते हैं, अतः ये सम्पूर्ण भूतोंके साक्षी हैं । यदि मैंने पाप किया है तो ये मेरे प्राणोंका हरण कर लें ॥ ३२ ॥
यथा चरति तिग्मांशुः परेण भुवनं सदा ।
स मुञ्चतु मम प्राणान् यदि पापं चराम्यहम् ॥ ३३ ॥
प्रचण्ड किरणोंवाले सूर्यदेव समस्त भुवनोंके ऊपर विचरते हैं, ( अतः वे भी सबके शुभाशुभ कर्म देखते रहते हैं । ) यदि मैंने पाप किया है तो ये मेरे प्राणोंका हरण कर लें ॥ ३३ ॥
चन्द्रमाः सर्वभूतानामन्तश्चरति साक्षिवत् ।
स मुञ्चतु मम प्राणान् यदि पापं चराम्यहम् ॥ ३४ ॥
चित्तके अभिमानी देवता चन्द्रमा समस्त प्राणियोंके अन्तःकरणमें साक्षीरूपसे विचरते हैं । यदि मैंने पाप किया है तो वे मेरे प्राणोंका हरण कर लें ॥ ३४ ॥
एते देवास्त्रयः कृत्स्नं त्रैलोक्यं धारयन्ति वै ।
विब्रुवन्तु यथा सत्यमेतद् देवास्त्यजन्तु माम् ॥ ३५ ॥
ये पूर्वोक्त तीन देवता सम्पूर्ण त्रिलोकीको धारण करते हैं। मेरे कथनमें कितनी सचाई है, इसे देवतालोग स्वयं स्पष्ट करें । यदि मैं झूठ बोलती हूँ तो देवता मेरा त्याग कर दें ॥ ३५ ॥
एवमुक्तस्तथा वायुरन्तरिक्षादभाषत ।
नैषा कृतवती पापं नल सत्यं ब्रवीमि ते ॥ ३६ ॥
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दमयन्तीके ऐसा कहनेपर अन्तरिक्षलोकसे वायु-देवताने कहा - ' नल! मैं तुमसे सत्य कहता हूँ, इस दमयन्तीने कभी कोई पाप नहीं किया है ॥ ३६ ॥
राजञ्छीलनिधिः स्फीतो दमयन्त्या सुरक्षितः ।
साक्षिणो रक्षिणश्चास्या वयं त्रीन् परिवत्सरान् ॥ ३७ ॥
‘ राजन्! दमयन्तीने अपने शीलकी उज्ज्वल निधिको सदा सुरक्षित रखा है । हमलोग तीन वर्षोंतक निरन्तर इसके रक्षक और साक्षी रहे हैं ॥ ३७ ॥
उपायो विहितश्चायं त्वदर्थमतुलोऽनया ।
न ह्येकाह्ना शतं गन्ता त्वामृतेऽन्यः पुमानिह ॥ ३८ ॥
' तुम्हारी प्राप्तिके लिये दमयन्तीने यह अनुपम उपाय ढूँढ़ निकाला था; क्योंकि इस जगत्में तुम्हारे सिवा दूसरा कोई पुरुष नहीं है, जो एक दिनमें सौ योजन ( रथद्वारा ) जा सके ॥ ३८ ॥
उपपन्ना त्वया भैमी त्वं च भैम्या महीपते ।
नात्र शङ्का त्वया कार्या संगच्छ सह भार्यया ॥ ३ ९ ॥
‘ राजन्! भीमकुमारी दमयन्ती तुम्हारे योग्य है और तुम दमयन्तीके योग्य हो । तुम्हें इसके चरित्रके विषयमें कोई शंका नहीं करनी चाहिये । तुम अपनी पत्नीसे निःशंक होकर मिलो' ॥ ३ ९ ॥