श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड २ — पृष्ठ 541–550
महाभारत — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 541–550
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तथा ब्रुवति वायौ तु पुष्पवृष्टिः पपात ह ।
देवदुन्दुभयो नेदुर्ववौ च पवनः शिवः ॥ ४० ॥
वायुदेवके ऐसा कहते समय आकाशसे फूलोंकी वर्षा हो रही थी, देवताओंकी दुन्दुभियाँ बज रही थीं और मंगलमय पवन चलने लगा ॥ ४० ॥
तदद्भुतमयं दृष्ट्वा नलो राजाथ भारत ।
दमयन्त्यां विशङ्कां तामुपाकर्षदरिंदमः ॥ ४१ ॥
युधिष्ठिर! यह अद्भुत दृश्य देखकर शत्रुसूदन राजा नलने दमयन्तीके विरुद्ध होनेवाली शंकाको त्याग दिया ॥ ४१ ॥
ततस्तद् वस्त्रमजरं प्रावृणोद् वसुधाधिपः ।
संस्मृत्य नागराजं तं ततो लेभे स्वकं वपुः ॥ ४२ ॥
तदनन्तर उन भूपालने नागराज कर्कोटकका स्मरण करके उसके दिये हुए अजीर्ण वस्त्रको ओढ़ लिया । उससे उन्हें अपने पूर्वस्वरूपकी प्राप्ति हो गयी ॥ ४२ ॥
स्वरूपिणं तु भर्तारं दृष्ट्वा भीमसुता तदा ।
प्राक्रोशदुच्चैरालिङ्गय पुण्यश्लोकमनिन्दिता ॥ ४३ ॥
अपने वास्तविक रूपमें प्रकट हुए अपने पतिदेव पुण्यश्लोक महाराज नलको देखकर सती साध्वी दमयन्ती उनके हृदयसे लगकर उच्च स्वरसे रोने लगी ॥ ४३ ॥
भैमीमपि नलो राजा भ्राजमानो यथा पुरा ।
सस्वजे स्वसुतौ चापि यथावत् प्रत्यनन्दत ॥ ४४ ॥
राजा नलका रूप पहलेकी ही भाँति ही प्रकाशित हो रहा था । उन्होंने भी दमयन्तीको छातीसे लगा लिया और अपने दोनों बालकोंको भी प्यार-दुलार करके प्रसन्न किया ॥ ४४ ॥
ततः स्वोरसि विन्यस्य वक्त्रं तस्य शुभानना ।
परीता तेन दुःखेन निःशश्वासायतेक्षणा ॥ ४५ ॥
तत्पश्चात् सुन्दर मुख और विशाल नेत्रोंवाली दमयन्ती नलके मुखको अपने वक्षःस्थलपर रखकर दुःखसे व्याकुल हो लंबी साँसे खींचने लगी ॥ ४५ ॥
तथैव मलदिग्धाङ्गीं परिष्वज्य शुचिस्मिताम् ।
सुचिरं पुरुषव्याघ्रस्तस्थौ शोकपरिप्लुतः ॥ ४६ ॥
इसी प्रकार पवित्र मुसकान तथा मैलसे भरे हुए अंगोंवाली दमयन्तीको हृदयसे लगाकर पुरुषसिंह नल बहुत देरतक शोकमग्न खड़े रहे ॥ ४६ ॥
ततः सर्वं यथावृत्तं दमयन्त्या नलस्य च ।
भीमायाकथयत् प्रीत्या वैदर्भ्या जननी नृप ॥ ४७ ॥
‘ राजन्! तदनन्तर ( दमयन्तीके द्वारा मालूम होनेपर ) दमयन्तीकी माताने अत्यन्त प्रसन्नतापूर्वक राजा भीमसे नल - दमयन्तीका सारा वृत्तान्त यथावत् कह सुनाया ' ॥ ४७ ॥
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ततोऽब्रवीन्महाराजः कृतशौचमहं नलम् ।
दमयन्त्या सहोपेतं कल्ये द्रष्टा सुखोषितम् ॥ ४८ ॥
तब महाराज भीमने कहा-' आज नलको सुखपूर्वक यहीं रहने दो । कल सबेरे स्नान आदिसे शुद्ध हुए दमयन्तीसहित नलसे मैं मिलूँगा' ॥ ४८ ॥
ततस्तौ सहितौ रात्रिं कथयन्तौ पुरातनम् ।
वने विचरितं सर्वमूषतुर्मुदितौ नृप ॥ ४ ९ ॥
राजन्! तत्पश्चात् वे दोनों दम्पति रातभर वनमें रहनेकी पुरानी घटनाओंको एक- दूसरेसे कहते हुए प्रसन्नतापूर्वक एक साथ रहे ॥ ४ ९ ॥
गृहे भीमस्य नृपतेः परस्परसुखैषिणौ ।
वसेतां हृष्टसंकल्पौ वैदर्भी च नलश्च ह ॥ ५० ॥
एक- दूसरेको सुख देनेकी इच्छा रखनेवाले दमयन्ती और नल राजा भीमके महलमें प्रसन्नचित्त होकर रहे ॥ ५० ॥
स चतुर्थे ततो वर्षे संगम्य सह भार्यया ।
सर्वकामैः सुसिद्धार्थो लब्धवान् परमां मुदम् ॥ ५१ ॥
चौथे वर्षमें अपनी प्यारी पत्नीसे मिलकर सम्पूर्ण कामनाओंसे सफलमनोरथ हो नल अत्यन्त आनन्दमें निमग्न हो गये ॥ ५१ ॥
दमयन्त्यपि भर्तारमासाद्याप्यायिता भृशम् ।
अर्धसंजातसस्येव तोयं प्राप्य वसुंधरा ॥ ५२ ॥
जैसे आधी जमी हुई खेतीसे भरी वसुधा वर्षाका जल पाकर उल्लसित हो उठती है, उसी प्रकार दमयन्ती भी अपने पतिको पाकर बहुत संतुष्ट हुई ॥ ५२ ॥
सैवं समेत्य व्यपनीय तन्द्रां शान्तज्वरा हर्षविवृद्धसत्त्वा । रराज भैमी समवाप्तकामा शीतांशुना रात्रिरिवोदितेन ॥ ५३ ॥
जैसे चन्द्रोदयसे रात्रिकी शोभा बढ़ जाती है, उसी प्रकार भीमकुमारी दमयन्ती पतिसे मिलकर आलस्यका त्याग करके निश्चिन्त और हर्षोल्लसित हृदयसे पूर्णकाम होकर अत्यन्त शोभा पाने लगी ॥ ५३ ॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि नलोपाख्यानपर्वणि नलदमयन्तीसमागमे षट्सप्ततितमोऽध्यायः ॥ ७६ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत नलोपाख्यानपर्वमें नलदमयन्तीसमागमविषयक छिहत्तरवाँ अध्याय पूराहुआ ॥ ७६ ॥
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सप्तसप्ततितमोऽध्यायः नलके प्रकट होनेपर विदर्भनगरमें महान् उत्सवका आयोजन, ऋतुपर्णके साथ नलका वार्तालाप और ऋतुपर्णका नलसे अश्वविद्या सीखकर अयोध्या जाना बृहदश्वउवाच
अथ तां व्युषितो रात्रिं नलो राजा स्वलंकृतः ।
वैदर्भ्या सहितः काले ददर्श वसुधाधिपम् ॥ १ ॥
बृहदश्व मुनि कहते हैं -युधिष्ठिर! तदनन्तर वह रात बीतनेपर राजा नल वस्त्राभूषणोंसे अलंकृत हो दमयन्तीके साथ यथासमय राजा भीमसे मिले ॥ १ ॥
ततोऽभिवादयामास प्रयतः श्वशुरं नलः ।
ततोऽनु दमयन्ती च ववन्दे पितरं शुभा ॥ २ ॥
स्नानादिसे पवित्र हुए राजा नलने विनीतभावसे श्वशुरको प्रणाम किया । तत्पश्चात् शुभलक्षणा दमयन्तीने भी पिताकी वन्दना की ॥ २ ॥
तं भीमः प्रतिजग्राह पुत्रवत् परया मुदा ।
यथार्हं पूजयित्वा च समाश्वासयत प्रभुः ॥ ३ ॥
नलेन सहितां तत्र दमयन्तीं पतिव्रताम् । राजा भीमने बड़ी प्रसन्नताके साथ नलको पुत्रकी भाँति अपनाया और नलसहित पतिव्रता दमयन्तीका यथायोग्य आदर- सत्कार करके उन्हें आश्वासन दिया ॥ ३३ ॥
तामर्हणां नलो राजा प्रतिगृह्य यथाविधि ॥ ४ ॥
परिचर्यां स्वकां तस्मै यथावत् प्रत्यवेदयत् ।
ततो बभूव नगरे सुमहान् हर्षजः स्वनः ॥ ५ ॥
जनस्य सम्प्रहृष्टस्य नलं दृष्ट्वा तथाऽऽगतम् । राजा नलने उस पूजाको विधिपूर्वक स्वीकार करके अपनी ओरसे भी श्वशुरका सेवा-सत्कार किया । तदनन्तर विदर्भनगरमें राजा नलको इस प्रकार आया देख हर्षोल्लासमें भरी हुई जनताका महान् आनन्दजनित कोलाहल होने लगा ॥ ४-५३ ॥ अशोभयच्च नगरं पताकाध्वजमालिनम् ॥ ६ ॥
सिक्ताः सुमृष्टपुष्पाढ्या राजमार्गाः स्वलंकृताः ।
द्वारि द्वारि च पौराणां पुष्पभङ्गः प्रकल्पितः ॥ ७ ॥
विदर्भनरेशने ध्वजा, पताकाओंकी पंक्तियोंसे कुण्डिनपुरको अद्भुत शोभासे सम्पन्न किया । सड़कोंको खूब झाड़- बुहारकर उनपर छिड़काव किया गया था । फूलोंसे उन्हें अच्छी
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तरह सजाया गया था । पुरवासियोंके द्वार-द्वारपर सुगंध फैलानेके लिये राशि राशि फूल बिखेरे गये थे ॥ ६-७ ॥
अर्चितानि च सर्वाणि देवतायतनानि च ।
ऋतुपर्णोऽपि शुश्राव बाहुकच्छद्मिनं नलम् ॥ ८ ॥
दमयन्त्या समायुक्तं जहृषे च नराधिपः । सम्पूर्ण देवमन्दिरोंकी सजावट और देवमूर्तियोंकी पूजा की गयी थी । राजा ऋतुपर्णने भी जब यह सुना कि बाहुकके वेषमें राजा नल ही थे और अब वे दमयन्तीसे मिले हैं, तब उन्हें बड़ा हर्ष हुआ ॥ ८३ ॥
तमानाय्य नलं राजा क्षमयामास पार्थिवम् ॥ ९ ॥
उन्होंने राजा नलको बुलवाकर उनसे क्षमा माँगी ॥ ९ ॥
स च तं क्षमयामास हेतुभिर्बुद्धिसम्मितः ।
स सत्कृतो महीपालो नैषधं विस्मिताननः ॥ १० ॥
उवाच वाक्यं तत्त्वज्ञो नैषधं वदतां वरः । बुद्धिमान् नलने भी अनेक युक्तियोंद्वारा उनसे क्षमा- याचना की। नलसे आदर- सत्कार पाकर वक्ताओंमें श्रेष्ठ एवं तत्त्वज्ञ राजा ऋतुपर्ण मुसकराते हुए मुखसे बोले– ॥ १०३ ॥
दिष्ट्या समेतो दारैः स्वैर्भवानित्यभ्यनन्दत ॥ ११ ॥
‘ निषधनरेश! यह बड़े सौभाग्यकी बात है कि आप अपनी बिछुड़ी हुई पत्नीसे मिले । ' ऐसा कहकर उन्होंने नलका अभिनन्दन किया ॥ ११ ॥
किंचित् तु नापराधं ते कृतवानस्मि नैषध ।
अज्ञातवासे वसतो मद्गृहे वसुधाधिप ॥ १२ ॥
( और पुनः कहा— ) ‘ नैषध! भूपालशिरोमणे! आप मेरे घरपर जब अज्ञातवासकी अवस्थामें रहते थे, उस समय मैंने आपका कोई अपराध तो नहीं किया है? ॥ १२ ॥
यदि वाबुद्धिपूर्वाणि यदि बुद्धयापि कानिचित् ।
मया कृतान्यकार्याणि तानि त्वं क्षन्तुमर्हसि ॥ १३ ॥
‘ उन दिनों यदि मैंने बिना जाने या जान- बूझकर आपके साथ अनुचित बर्ताव किये हों तो उन्हें आप क्षमा कर दें ' ॥ १३ ॥
नल उवाच
न मेऽपराधं कृतवांस्त्वं स्वल्पमपि पार्थिव ।
कृतेऽपि च न मे कोपः क्षन्तव्यं हि मया तव ॥ १४ ॥
नलने कहा — ‘ राजन्! आपने मेरा कभी थोड़ासा भी अपराध नहीं किया है और यदि किया भी हो तो उसके लिये मेरे हृदयमें क्रोध नहीं है । मुझे आपके प्रत्येक बर्तावको क्षमा ही करना चाहिये ' ॥ १४ ॥
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पूर्वं ह्यपि सखा मे s सि सम्बन्धी च जनाधिप ।
अत ऊर्ध्वं तु भूयस्त्वं प्रीतिमाहर्तुमर्हसि ॥ १५ ॥
जनेश्वर! आप पहले भी मेरे सखा और सम्बन्धी थे और इसके बाद भी आपको मुझपर अधिक- से - अधिक प्रेम रखना चाहिये ॥ १५ ॥
सर्वकामैः सुविहितैः सुखमस्म्युषितस्त्वयि ।
न तथा स्वगृहे राजन् यथा तव गृहे सदा ॥ १६ ॥
राजन्! मेरी समस्त कामनाएँ वहाँ अच्छी तरह पूर्ण की गयीं और इसके कारण मैं सदा आपके यहाँ सुखी रहा । महाराज! आपके भवनमें मुझे जैसा आराम मिला, वैसा अपने घरमें भी नहीं मिला ॥ १६ ॥
इदं चैव हयज्ञानं त्वदीयं मयि तिष्ठति ।
तदुपाकर्तुमिच्छामि मन्यसे यदि पार्थिव ।
एवमुक्त्वा ददौ विद्यामृतुपर्णाय नैषधः ॥ १७ ॥
आपका अश्वविज्ञान मेरे पास धरोहरके रूपमें पड़ा है । राजन्! यदि आप ठीक समझें तो मैं उसे आपको देनेकी इच्छा रखता हूँ। ऐसा कहकर निषधराज नलने ऋतुपर्णको अश्वविद्या प्रदान की ॥ १७ ॥
स च तां प्रतिजग्राह विधिदृष्टेन कर्मणा ।
गृहीत्वा चाश्वहृदयं राजन् भाङ्गासुरिर्नृपः ॥ १८ ॥
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निषधाधिपतेश्चापि दत्त्वाक्षहृदयं नृपः ।
सूतमन्यमुपादाय ययौ स्वपुरमेव ह ॥ १ ९ ॥
युधिष्ठिर! ऋतुपर्णने भी शास्त्रीय विधिके अनुसार उनसे अश्वविद्या ग्रहण की । अश्वोंका रहस्य ग्रहण करके और निषधनरेश नलको पुनः द्यूतविद्याका रहस्य समझाकर दूसरा सारथि साथ ले राजा ऋतुपर्ण अपने नगरको चले गये ॥ १८-१९ ॥
ऋतुपर्णे गते राजन् नलो राजा विशाम्पते ।
नगरे कुण्डिने कालं नातिदीर्घमिवावसत् ॥ २० ॥
राजन्! ऋतुपर्णके चले जानेपर राजा नल कुण्डिनपुरमें कुछ समयतक रहे । वह काल उन्हें थोड़े समयके समान ही प्रतीत हुआ ॥ २० ॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि नलोपाख्यानपर्वणि ऋतुपर्णस्वदेशगमने सप्तसप्ततितमोऽध्यायः ॥ ७७ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत नलोपाख्यानपर्वमेंऋतुपर्णका स्वदेशगमनविषयक सतहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ७७ ॥
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अष्टसप्ततितमोऽध्यायः राजा नलका पुष्करको जूएमें हराना और उसको राजधानीमें भेजकर अपने नगरमें प्रवेश करना बृहदश्व उवाच
स मासमुष्य कौन्तेय भीममामन्त्र्य नैषधः ।
पुरादल्पपरीवारो जगाम निषधान् प्रति ॥ १ ॥
बृहदश्व मुनि कहते हैं - युधिष्ठिर! निषध- नरेश एक मासतक कुण्डिनपुरमें रहकर राजा भीमकी आज्ञा ले थोड़े - से सेवकोंसहित वहाँसे निषधदेशकी ओर प्रस्थित हुए ॥ १ ॥
रथेनैकेन शुभ्रेण दन्तिभिः परिषोडशैः ।
पञ्चाशद्भिर्हयैश्चैव षट्शतैश्च पदातिभिः ॥ २ ॥
उनके साथ चारों ओरसे सोलह हाथियोंद्वारा घिरा हुआ एक सुन्दर रथ, पचास घोड़े और छः सौ पैदल सैनिक थे ॥ २ ॥
स कम्पयन्निव महीं त्वरमाणो महीपतिः ।
प्रविवेशाथ संरब्धस्तरसैव महामनाः ॥ ३ ॥
महामना राजा नलने इन सबके द्वारा पृथ्वीको कम्पित-सी करते हुए बड़ी उतावलीके साथ रोषावेशमें भरे वेगपूर्वक निषधदेशकी राजधानीमें प्रवेश किया ॥ ३ ॥
ततः पुष्करमासाद्य वीरसेनसुतो नलः ।
उवाच दीव्याव पुनर्बहुवित्तं मयार्जितम् ॥ ४ ॥
दमयन्ती च यच्चान्यन्मम किंचन विद्यते ।
एष वै मम संन्यासस्तव राज्यं तु पुष्कर ॥ ५ ॥
पुनः प्रवर्ततां द्यूतमिति मे निश्चिता मतिः ।
एकपाणेन भद्रं ते प्राणयोश्च पणावहे ॥ ६ ॥
तदनन्तर वीरसेनपुत्र नलने पुष्करके पास जाकर कहा - ' अब हम दोनों फिरसे जूआ खेलें । मैंने बहुत धन प्राप्त किया है । दमयन्ती तथा अन्य जो कुछ भी मेरे पास है, यह सब मेरी ओरसे दाँवपर लगाया जायगा और पुष्कर! तुम्हारी ओरसे सारा राज्य ही दाँवपर रखा जायगा । इस एक पणके साथ हम दोनोंमें फिर जूएका खेल प्रारम्भ हो, यह मेरा निश्चित विचार है । तुम्हारा भला हो, यदि ऐसा न कर सको तो हम दोनों अपने प्राणोंकी बाजी लगावें ॥ ४–६ ॥
जित्वा परस्वमाहृत्य राज्यं वा यदि वा वसु ।
प्रतिपाणः प्रदातव्यः परमो धर्म उच्यते ॥ ७ ॥
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' जूएके दाँवमें दूसरेका राज्य या धन जीतकर रख लिया जाय तो उसे यदि वह पुनः खेलना चाहे तो प्रतिपण ( बदलेका दाव) देना चाहिये, यह परम धर्म कहा गया है ॥ ७ ॥
न चेद् वाञ्छसि त्वं द्यूतं युद्धद्यूतं प्रवर्तताम् ।
द्वैरथेनास्तु वै शान्तिस्तव वा मम वा नृप ॥ ८ ॥
‘ यदि तुम पासोंसे जूआ खेलना न चाहो तो बाणोंद्वारा युद्धका जूआ प्रारम्भ होना चाहिये । राजन्! द्वैरथयुद्धके द्वारा तुम्हारी अथवा मेरी शान्ति हो जाय ॥ ८ ॥
वंशभोज्यमिदं राज्यमर्थितव्यं यथा तथा ।
येन केनाप्युपायेन वृद्धानामिति शासनम् ॥ ९ ॥
‘ यह राज्य हमारी वंशपरम्पराके उपभोगमें आनेवाला है । जिस किसी उपायसे भी जैसे - तैसे इसका उद्धार करना चाहिये; ऐसा वृद्ध पुरुषोंका उपदेश है ॥ ९ ॥
द्वयोरेकतरे बुद्धिः क्रियतामद्य पुष्कर ।
कैतवेनाक्षवत्यां तु युद्धे वा ना ताम्यतां धनुः ॥ १० ॥
‘ पुष्कर! आज तुम दोमेंसे एकमें मन लगाओ । छलपूर्वक जूआ खेलो अथवा युद्धके लिये धनुषपर प्रत्यञ्चा चढ़ाओ ' ॥ १० ॥
नैषधेनैवमुक्तस्तु पुष्करः प्रहसन्निव ।
ध्रुवमात्मजयं मत्वा प्रत्याह पृथिवीपतिम् ॥ ११ ॥
निषधराज नलके ऐसा कहनेपर पुष्करने अपनी विजयको अवश्यम्भावी मानकर हँसते हुए उनसे कहा- ॥ ११ ॥
दिष्ट्या त्वयार्जितं वित्तं प्रतिपाणाय नैषध ।
दिष्ट्या च दुष्कृतं कर्म दमयन्त्याः क्षयं गतम् ॥ १२ ॥
‘ नैषध! सौभाग्यकी बात है कि तुमने दाँवपर लगानेके लिये धनका उपार्जन कर लिया है । यह भी आनन्दकी बात है कि दमयन्तीके दुष्कर्मोंका क्षय हो गया ॥ १२ ॥
दिष्ट्या च ध्रियसे राजन् सदारोऽद्य महाभुज ।
धनेनानेन वै भैमी जितेन समलंकृता ॥ १३ ॥
मामुपस्थास्यति व्यक्तं दिवि शक्रमिवाप्सराः ।
नित्यशो हि स्मरामि त्वां प्रतीक्षेऽपि च नैषध ॥ १४ ॥
'महाबाहु नरेश! सौभाग्यसे तुम पत्नीसहित अभी जीवित हो । इसी धनको जीत लेनेपर दमयन्ती शृंगार करके निश्चय ही मेरी सेवामें उपस्थित होगी, ठीक उसी तरह, जैसे स्वर्गलोककी अप्सरा देवराज इन्द्रकी सेवामें जाती है । नैषध! मैं प्रतिदिन तुम्हारी याद करता हूँ और तुम्हारी राह भी देखा करता हूँ ॥ १३-१४ ॥
देवनेन मम प्रीतिर्न भवत्यसुहृद्गणैः ।
जित्वा त्वद्य वरारोहां दमयन्तीमनिन्दिताम् ॥ १५ ॥
कृतकृत्यो भविष्यामि सा हि मे नित्यशो हृदि ।
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' शत्रुओंके साथ जूआ खेलनेसे मुझे कभी तृप्ति ही नहीं होती । आज श्रेष्ठ अंगोंवाली अनिन्द्य सुन्दरी दमयन्तीको जीतकर मैं कृतार्थ हो जाऊँगा; क्योंकि वह सदा मेरे हृदयमन्दिरमें निवास करती है ' ॥ १५३ ॥
श्रुत्वा तु तस्य वा वाचो बह्वबद्धप्रलापिनः ॥ १६ ॥
इयेष स शिरश्छेत्तुं खड्गेन कुपितो नलः ।
स्मयंस्तु रोषताम्राक्षस्तमुवाच नलो नृपः ॥ १७ ॥
इस प्रकार बहुत - से असम्बद्ध प्रलाप करनेवाले पुष्करकी ये बातें सुनकर राजा नलको बड़ा क्रोध हुआ । उन्होंने तलवारसे उसका सिर काट लेनेकी इच्छा की । रोषसे उनकी आँखें लाल हो गयीं तो भी राजा नलने हँसते हुए उससे कहा- ॥ १६-१७ ॥
पणावः किं व्याहरसे जितो न व्याहरिष्यसि ।
ततः प्रावर्तत द्यूतं पुष्करस्य नलस्य च ॥ १८ ॥
एकपाणेन वीरेण नलेन स पराजितः ।
स रत्नकोशनिचयैः प्राणेन पणितोऽपि च ॥ १ ९ ॥
' अब हम दोनों जूआ प्रारम्भ करें, तुम अभी व्यर्थ बकवाद क्यों करते हो? हार जानेपर ऐसी बातें न कर सकोगे । ' तदनन्तर पुष्कर तथा राजा नलमें एक ही दाँव लगानेकी शर्त रखकर जूएका खेल प्रारम्भ हुआ । तब वीर नलने पुष्करको हरा दिया । पुष्करने रत्न, खजाना तथा प्राणोंतककी बाजी लगा दी थी ॥ १८-१९ ॥
जित्वा च पुष्करं राजा प्रहसन्निदमब्रवीत् ।
मम सर्वमिदं राज्यमव्यग्रं हतकण्टकम् ॥ २० ॥
वैदर्भी न त्वया शक्या राजापसद वीक्षितुम् ।
तस्यास्त्वं सपरीवारो मूढ दासत्वमागतः ॥ २१ ॥
पुष्करको परास्त करके राजा नलने हँसते हुए उससे कहा - ' नृपाधम! अब यह शान्त और अकण्टक सारा राज्य मेरे अधिकारमें आ गया। विदर्भकुमारी दमयन्तीकी ओर तू आँख उठाकर देख भी नहीं सकता । मूर्ख! आजसे तू परिवारसहित दमयन्तीका दास हो गया ॥ २०-२१ ॥
न त्वया तत् कृतं कर्म येनाहं विजितः पुरा ।
कलिना तत् कृतं कर्म त्वं च मूढ न बुध्यसे ॥ २२ ॥
‘ पहले तेरे द्वारा जो मैं पराजित हो गया था, उसमें तेरा कोई पुरुषार्थ नहीं था । मूढ़! वह सब कलियुगकी करतूत थी, जिसे तू नहीं जानता है ॥ २२ ॥
नाहं परकृतं दोषं त्वय्याधास्ये कथंचन ।
यथासुखं वै जीव त्वं प्राणानवसृजामि ते ॥ २३ ॥
' दूसरे ( कलियुग ) -के किये हुए अपराधको मैं किसी तरह तेरे मत्थे नहीं मढूँगा । तू
सुखपूर्वक जीवित रह । मैं तेरे प्राण तुझे वापस देता हूँ ॥ २३ ॥
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तथैव सर्वसम्भारं स्वमंशं वितरामि ते ।
तथैव च मम प्रीतिस्त्वयि वीर न संशयः ॥ २४ ॥
‘ तेरा सारा सामान और तेरे हिस्सेका धन भी तुझे लौटाये देता हूँ। वीर! तेरे ऊपर मेरा पूर्ववत् प्रेम बना रहेगा, इसमें संशय नहीं है ॥ २४ ॥
सौहार्दं चापि मे त्वत्तो न कदाचित् प्रहास्यति ।
पुष्कर त्वं हि मे भ्राता संजीव शरदः शतम् ॥ २५ ॥
‘ तेरे प्रति जो मेरा सौहार्द रहा है, वह कभी मेरे हृदयसे दूर नहीं होगा । पुष्कर! तू मेरा भाई है, जा, सौ वर्षोंतक जीवित रह' ॥ २५ ॥
एवं नलः सान्त्वयित्वा भ्रातरं सत्यविक्रमः ।
स्वपुरं प्रेषयामास परिष्वज्य पुनः पुनः ॥ २६ ॥
इस प्रकार सत्यपराक्रमी राजा नलने अपने भाई पुष्करको सान्त्वना दे बार- बार हृदयसे लगाकर उसकी राजधानीको भेज दिया ॥ २६ ॥
सान्त्वितो नैषधेनैवं पुष्करः प्रत्युवाच तम् ।
पुण्यश्लोकं तदा राजन्नभिवाद्य कृताञ्जलिः ॥ २७ ॥
कीर्तिरस्तु तवाक्षय्या जीव वर्षशतं सुखी ।
यो मे वितरसि प्राणानधिष्ठानं च पार्थिव ॥ २८ ॥
राजन्! निषधराजके इस प्रकार सान्त्वना देनेपर पुष्करने पुण्यश्लोक नलको हाथ जोड़कर प्रणाम किया और इस प्रकार कहा – ' पृथ्वीनाथ! आप जो मुझे प्राण और निवासस्थान भी वापस दे रहे हैं, इससे आपकी अक्षय कीर्ति बनी रहे । आप सौ वर्षोंतक जीयें और सुखी रहें ' ॥ २७-२८ ॥