02.Mahabharata Volume 2 — पृष्ठ 681–690
महाभारत — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 681–690
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तत्पश्चात् उन दिव्य और मानव महर्षियोंने उन सबके लिये स्वस्तिवाचन किया ॥ २४ ॥
लोमशस्योपसंगृह्य पादी द्वैपायनस्य च ।
नारदस्य च राजेन्द्र देवर्षेः पर्वतस्य च ॥ २५ ॥
धौम्येन सहिता वीरास्तथा तैर्वनवासिभिः ।
मार्गशीर्ष्यामतीतायां पुष्येण प्रययुस्ततः ॥ २६ ॥
राजेन्द्र! तदनन्तर महर्षि लोमश, द्वैपायन व्यास, देवर्षि नारद और पर्वतके चरणोंका स्पर्श करके वनवासी ब्राह्मणों, पुरोहित धौम्य और लोमश आदिके साथ वीर पाण्डव तीर्थयात्राके लिये निकले । मार्गशीर्षकी पूर्णिमा व्यतीत होनेपर जब पुष्य नक्षत्र आया तब उसी नक्षत्रमें उन्होंने यात्रा प्रारम्भ की ॥ २५-२६ ॥
कठिनानि समादाय चीराजिनजटाधराः ।
अभेद्यैः कवचैर्युक्तास्तीर्थान्यन्वचरंस्ततः ॥ २७ ॥
उन सबने शरीरपर फटे - पुराने वस्त्र या मृगचर्म धारण कर रखे थे । उनके मस्तकपर जटाएँ थीं । उनके अंग अभेद्य कवचोंसे ढके हुए थे । वे सूर्यप्रदत्त बटलोई आदि पात्र लेकर वहाँ तीर्थोंमें विचरण करने लगे ॥ २७ ॥
इन्द्रसेनादिभिर्भृत्यै रथैः परिचतुर्दशैः ।
महानसव्यापृतैश्च तथान्यैः परिचारकैः ॥ २८ ॥
उनके साथ इन्द्रसेन आदि चौदहसे अधिक सेवक रथ लिये पीछे- पीछे जा रहे थे ।
रसोईके काममें संलग्न रहनेवाले अन्यान्य सेवक भी उनके साथ थे ॥ २८ ॥
सायुधा बद्धनिस्त्रिंशास्तूणवन्तः समार्गणाः ।
प्राङ्मुखाः प्रययुर्वीराः पाण्डवा जनमेजय ॥ २ ९ ॥
जनमेजय! वीर पाण्डव आवश्यक अस्त्र- शस्त्र ले कमरमें तलवार बाँधकर पीठपर तरकस कसे हुए हाथोंमें बाण लिये पूर्वदिशाकी ओर मुँह करके वहाँसे प्रस्थित हुए ॥ २ ९ ॥ इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि लोमशतीर्थयात्रायां त्रिनवतितमोऽध्यायः ॥ ९ ३ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत तीर्थयात्रापर्वमें लोमशतीर्थयात्राविषयक तिरानबेवाँअध्याय पूरा हुआ ॥ ९३ ॥
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चतुर्नवतितमोऽध्यायः देवताओं और धर्मात्मा राजाओंका उदाहरण देकर महर्षि लोमशका युधिष्ठिरको अधर्मसे हानि बताना और तीर्थयात्राजनित पुण्यकी महिमाका वर्णन करते हुए आश्वासन देना युधिष्ठिर उवाच
न वै निर्गुणमात्मानं मन्ये देवर्षिसत्तम ।
तथास्मि दुःखसंतप्तो यथा नान्यो महीपतिः ॥ १ ॥
युधिष्ठिर बोले- देवर्षिप्रवर लोमश! मेरी समझसे मैं अपनेको सात्त्विक गुणोंसे हीन नहीं मानता तो भी दुःखोंसे इतना संतप्त होता रहता हूँ जितना दूसरा कोई राजा नहीं हुआ होगा ॥ १ ॥
परांश्च निर्गुणान् मन्ये न च धर्मगतानपि ।
ते च लोमश लोकेऽस्मिन्नृध्यन्ते केन हेतुना ॥ २ ॥
इसके सिवा, दुर्योधनादि शत्रुओंको सात्त्विक गुणोंसे रहित समझता हूँ । साथ ही यह भी जानता हूँ कि वे धर्म- परायण नहीं हैं तो भी वे इस लोकमें उत्तरोत्तर समृद्धिशाली होते जा रहे हैं, इसका क्या कारण है? ॥ २ ॥
लोमशउवाच
नात्र दुःखं त्वया राजन् कार्यं पार्थ कथंचन ।
यदधर्मेण वर्धेयुरधर्मरुचयो जनाः ॥ ३ ॥
लोमशजीने कहा — राजन्! कुन्तीनन्दन! अधर्ममें रुचि रखनेवाले लोग यदि उस अधर्मके द्वारा बढ़ रहे हों तो इसके लिये तुम्हें किसी प्रकार दुःख नहीं मानना चाहिये ॥ ३ ॥
वर्धत्यधर्मेण नरस्ततो भद्राणि पश्यति ।
ततः सपत्नाञ्जयति समूलस्तु विनश्यति ॥ ४ ॥
पहले अधर्मद्वारा मनुष्य बढ़ सकता है, फिर अपने मनोऽनुकूल सुख-सम्पत्तिरूप अभ्युदयको देख सकता है, तत्पश्चात् वह शत्रुओंपर विजय पा सकता है और अन्तमें जड़-मूलसहित नष्ट हो जाता है ॥ ४ ॥
मया हि दृष्टा दैतेया दानवाश्च महीपते ।
वर्धमाना ह्यधर्मेण क्षयं चोपगताः पुनः ॥ ५ ॥
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महीपाल! मैंने दैत्यों और दानवोंको अधर्मके द्वारा बढ़ते और पुनः नष्ट होते भी देखा है ॥ ५ ॥
पुरा देवयुगे चैव दृष्टं सर्वं मया विभो ।
अरोचयन् सुरा धर्मं धर्मं तत्यजिरेऽसुराः ॥ ६ ॥
प्रभो! पहले देवयुगमें ही मैंने यह सब अपनी आँखों देखा है । देवताओंने धर्मके प्रति अनुराग किया और असुरोंने उसका परित्याग कर दिया ॥ ६ ॥
तीर्थानि देवा विविशुर्नाविशन् भारतासुराः ।
तानधर्मकृतो दर्पः पूर्वमेव समाविशत् ॥ ७ ॥
भरतनन्दन! देवताओंने स्नानके लिये तीर्थोंमें प्रवेश किया, परंतु असुर उनमें नहीं गये । अधर्मजनित दर्प असुरोंमें पहलेसे ही समा गया था ॥ ७ ॥
दर्पान्मानः समभवन्मानात् क्रोधो व्यजायत ।
क्रोधादह्रीस्ततोऽलज्जा वृत्तं तेषां ततोऽनशत् ॥ ८ ॥
दर्पसे मान हुआ और मानसे क्रोध उत्पन्न हुआ । क्रोधसे निर्लज्जता आयी और निर्लज्जताने उनके सदाचारको नष्ट कर दिया ॥ ८ ॥
तानलज्जान् गतह्रीकान् हीनवृत्तान् वृथाव्रतान् ।
क्षमा लक्ष्मीः स्वधर्मश्च न चिरात् प्रजहुस्ततः ॥ ९ ॥
लक्ष्मीस्तु देवानगमदलक्ष्मीरसुरान् नृप ।
तानलक्ष्मीसमाविष्टान् दर्पोपहतचेतसः ॥ १० ॥
दैतेयान् दानवांश्चैव कलिरप्याविशत् ततः ।
तानलक्ष्मीसमाविष्टान् दानवान् कलिना हतान् ॥ ११ ॥
दर्पाभिभूतान् कौन्तेय क्रियाहीनानचेतसः ।
मानाभिभूतानचिराद् विनाशः समपद्यत ॥ १२ ॥
इस प्रकार लज्जा, संकोच और सदाचारसे हीन एवं निष्फल व्रतका आचरण करनेवाले उन असुरोंको क्षमा, लक्ष्मी और स्वधर्मने शीघ्र त्याग दिया । राजन्! लक्ष्मी देवताओंके पास चली गयी और अलक्ष्मी असुरोंके यहाँ । अलक्ष्मीके आवेशसे युक्त होनेपर उनका चित्त दर्प और अभिमानसे दूषित हो गया । उस दशामें उन दैत्यों और दानवोंमें कलिका भी प्रवेश हो गया । जब वे दानव अलक्ष्मीसे संयुक्त, कलिसे तिरस्कृत और अभिमानसे अभिभूत हो सत्कर्मोंसे शून्य, विवेकरहित और मानसे उन्मत्त हो गये, तब शीघ्र ही उनका विनाश हो गया ॥ ९ –१२ ॥
निर्यशस्कास्तथा दैत्याः कृत्स्नशो विलयं गताः ।
देवास्तु सागरांश्चैव सरितश्च सरांसि च ॥ १३ ॥
अभ्यगच्छन् धर्मशीलाः पुण्यान्यायतनानि च ।
तपोभिः क्रतुभिर्दानैराशीर्वादैश्च पाण्डव ॥ १४ ॥
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प्रजहुः सर्वपापानि श्रेयश्च प्रतिपेदिरे ।
एवमादानवन्तश्च निरादानाश्च सर्वशः ॥ १५ ॥
तीर्थान्यगच्छन् विबुधास्तेनापुर्भूतिमुत्तमाम् । ( यत्र धर्मेण वर्तन्ते राजानो राजसत्तम । सर्वान् सपत्नान् बाधन्ते राज्यं चैषां विवर्धते ॥ ) तथा त्वमपि राजेन्द्र स्नात्वा तीर्थेषु सानुजः ॥ १६ ॥
पुनर्वेत्स्यसि तां लक्ष्मीमेष पन्थाः सनातनः । यशोहीन दैत्य पूर्णतः विनष्ट हो गये, किंतु धर्मशील देवताओंने पवित्र समुद्रों, सरिताओं, सरोवरों और पुण्यप्रद आश्रमोंकी यात्रा की । पाण्डुनन्दन! वहाँ तपस्या, यज्ञ और दान आदि करके महात्माओंके आशीर्वादसे वे सब पापोंसे मुक्त हो कल्याणके भागी हुए । इस प्रकार उत्तम नियम ग्रहण करके किसीसे भी कोई प्रतिग्रह न लेकर देवताओंने तीर्थोंमें विचरण किया; इससे उन्हें उत्तम ऐश्वर्यकी प्राप्ति हुई । नृपश्रेष्ठ! जहाँ राजा धर्मके अनुसार बर्ताव करते हैं वहाँ वे सब शत्रुओंको नष्ट कर देते हैं और उनका राज्य भी बढ़ता रहता है । राजेन्द्र! इसलिये तुम भी भाइयोंसहित तीर्थोंमें स्नान करके खोयी हुई राजलक्ष्मी प्राप्त कर लोगे । यही सनातन मार्ग है ॥ १३–१६३ ॥ यथैव हि नृगो राजा शिबिरौशीनरो यथा ॥ १७ ॥
भगीरथो वसुमना गयः पूरुः पुरूरवाः ।
चरमाणास्तपो नित्यं स्पर्शनादम्भसश्च ते ॥ १८ ॥
तीर्थाभिगमनात् पूता दर्शनाच्च महात्मनाम् ।
अलभन्त यशः पुण्यं धनानि च विशाम्पते ॥ १ ९ ॥
तथा त्वमपि राजेन्द्र लब्धासि विपुलां श्रियम् । जैसे राजा नृग, उशीनरपुत्र शिबि, भगीरथ, वसुमना, गय, पूरु तथा पुरूरवा आदि नरेशोंने सदा तपस्यापूर्वक तीर्थयात्रा करके वहाँके जलके स्पर्श और महात्माओंके दर्शनसे पावन यश और प्रचुर धन प्राप्त किये थे; उसी प्रकार तुम भी तीर्थयात्राके पुण्यसे विपुल सम्पत्ति प्राप्त कर लोगे ॥ १७–१९ ३ ॥ यथा चेक्ष्वाकुरभवत् सपुत्रजनबान्धवः ॥ २० ॥
मुचुकुन्दोऽथ मान्धाता मरुत्तश्च महीपतिः ।
कीर्तिं पुण्यामविन्दन्त यथा देवास्तपोबलात् ॥ २१ ॥
देवर्षयश्च कार्त्स्न्येन तथा त्वमपि वेत्स्यसि ।
धार्तराष्ट्रास्त्वधर्मेण मोहेन च वशीकृताः ।
न चिराद् वै विनङ्क्ष्यन्ति दैत्या इव न संशयः ॥ २२ ॥
जैसे पुत्र, सेवक तथा बन्धु -बान्धवोंसहित राजा इक्ष्वाकु, मुचुकुन्द, मान्धाता तथा महाराज मरुत्तने पुण्यकीर्ति प्राप्त की थी, जैसे देवताओं और देवर्षियोंने तपोबलसे यश
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और ऐश्वर्य प्राप्त किया था; उसी प्रकार तुम भी पूर्णरूपसे यश और धन - सम्पत्ति प्राप्त करोगे । धृतराष्ट्रके पुत्र पाप और मोहके वशीभूत हैं; अतः वे दैत्योंकी भाँति शीघ्र नष्ट हो जायँगे; इसमें संशय नहीं है ॥ इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि लोमशतीर्थयात्रायां चतुर्नवतितमोऽध्यायः ॥ ९ ४ ॥ इसप्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत तीर्थयात्रापर्वमें लोमशतीर्थयात्राविषयक चौरानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ९४ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठका १ श्लोक मिलाकर कुल २३ श्लोक हैं )
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पञ्चनवतितमोऽध्यायः पाण्डवोंका नैमिषारण्य आदि तीर्थोंमें जाकर प्रयाग तथा गयातीर्थमें जाना और गय राजाके महान् यज्ञोंकी महिमा सुनना वैशम्पायन उवाच
ते तथा सहिता वीरा वसन्तस्तत्र तत्र ह ।
क्रमेण पृथिवीपाल नैमिषारण्यमागताः ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं - राजन्! इस प्रकार वे वीर पाण्डव विभिन्न स्थानोंमें निवास करते हुए क्रमशः नैमिषारण्यतीर्थमें आये ॥ १ ॥
ततस्तीर्थेषु पुण्येषु गोमत्याः पाण्डवा नृप ।
कृताभिषेकाः प्रददुर्गाश्च वित्तं च भारत ॥ २ ॥
भरतनन्दन! नरेश्वर! तदनन्तर गोमतीके पुण्य तीर्थोंमें स्नान करके पाण्डवोंने वहाँ गोदान और धनदान किया* ॥ २ ॥
तत्र देवान् पितॄन् विप्रांस्तर्पयित्वा पुनः पुनः ।
कन्यातीर्थेऽश्वतीर्थे च गवां तीर्थे च भारत ।
कालकोट्यां वृषप्रस्थे गिरावुष्य च पाण्डवाः ॥ ३ ॥
बाहुदायां महीपाल चक्रुः सर्वेऽभिषेचनम् ।
प्रयागे देवयजने देवानां पृथिवीपते ॥ ४ ॥
ऊषुराप्लुत्य गात्राणि तपश्चातस्थुरुत्तमम् ।
गङ्गायमुनयोश्चैव संगमे सत्यसंगराः ॥ ५ ॥
भारत! भूपाल! वहाँ देवताओं, पितरों तथा ब्राह्मणोंको बार-बार तृप्त करके कन्यातीर्थ, अश्वतीर्थ, गोतीर्थ, कालकोटि तथा वृषप्रस्थगिरिमें निवास करते हुए उन सब पाण्डवोंने बाहुदा नदीमें स्नान किया । पृथ्वीपते! तदनन्तर उन्होंने देवताओंकी यज्ञभूमि प्रयागमें पहुँचकर वहाँ गंगा- यमुनाके संगममें स्नान किया । सत्यप्रतिज्ञ पाण्डव वहाँ स्नान करके कुछ दिनोंतक उत्तम तपस्यामें लगे रहे ॥ ३–५ ॥
विपाप्मानो महात्मानो विप्रेभ्यः प्रददुर्वसु ।
तपस्विजनजुष्टां च ततो वेदीं प्रजापतेः ॥ ६ ॥
जग्मुः पाण्डुसुता राजन् ब्राह्मणैः सह भारत ।
तत्र ते न्यवसन् वीरास्तपश्चातस्थुरुत्तमम् ॥ ७ ॥
संतर्पयन्तः सततं वन्येन हविषा द्विजान् ।
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उन पापरहित महात्माओंने ( त्रिवेणीतटपर ) ब्राह्मणोंको धन दान किया । भरतनन्दन! तत्पश्चात् पाण्डव ब्राह्मणोंके साथ ब्रह्माजीकी वेदीपर गये, जो तपस्वीजनोंसे सेवित है । वहाँ उन वीरोंने उत्तम तपस्या करते हुए निवास किया । वे सदा कन्द- मूल- फल आदि वन्य हविष्यद्वारा ब्राह्मणोंको तृप्त करते रहते थे ॥ ६-७३ ॥ ततो महीधरं जग्मुर्धर्मज्ञेनाभिसंस्कृतम् ॥ ८ ॥
राजर्षिणा पुण्यकृता गयेनानुपमद्युते । अनुपम तेजस्वी जनमेजय! प्रयागसे चलकर पाण्डव पुण्यात्मा एवं धर्मज्ञ राजर्षि गयके द्वारा यज्ञ करके शुद्ध किये हुए उत्तम पर्वतसे उपलक्षित गयातीर्थमें गये ॥ ८३ ॥
नगो गयशिरो यत्र पुण्या चैव महानदी ॥ ९ ॥
वानीरमालिनी रम्या नदी पुलिनशोभिता । जहाँ गयशिर नामक पर्वत और बेंतकी पंक्तियोंसे घिरी हुई रमणीय महानदी है, जो अपने दोनों तटोंसे विशेष शोभा पाती है ॥ ९ ३ ॥ दिव्यं पवित्रकूटं च पवित्रं धरणीधरम् ॥ १० ॥
ऋषिजुष्टं सुपुण्यं तत् तीर्थं ब्रह्मसरोत्तमम् ।
अगस्त्यो भगवान् यत्र गतो वैवस्वतं प्रति ॥ ११ ॥
वहाँ महर्षियोंसे सेवित, पावन शिखरोंवाला, दिव्य एवं पवित्र दूसरा पर्वत भी है जो अत्यन्त पुण्यदायक तीर्थ है । वहीं उत्तम ब्रह्मसरोवर है जहाँ भगवान् अगस्त्यमुनि वैवस्वत यमसे मिलनेके लिये पधारे थे ॥ १०-११ ॥
उवास च स्वयं तत्र धर्मराजः सनातनः ।
सर्वासां सरितां चैव समुद्भेदो विशाम्पते ॥ १२ ॥
क्योंकि सनातन धर्मराज वहाँ स्वयं निवास करते हैं । राजन्! वहाँ सम्पूर्ण नदियोंका प्राकट्य हुआ है ॥
यत्र संनिहितो नित्यं महादेवः पिनाकधृक् ।
तत्र ते पाण्डवा वीराश्चातुर्मास्यैस्तदेजिरे ॥ १३ ॥
ऋषियज्ञेन महता यत्राक्षयवटो महान् । पिनाकपाणि भगवान् महादेव उस तीर्थमें नित्य निवास करते हैं । वहाँ वीर पाण्डवोंने उन दिनों चातुर्मास्यव्रत ग्रहण करके महान् ऋषियज्ञ अर्थात् वेदादि सत्शास्त्रोंके
स्वाध्यायद्वारा भगवान्की आराधना की । वहीं महान् अक्षयवट है ॥ १३३ ॥
अक्षये देवयजने अक्षयं यत्र वै फलम् ॥ १४ ॥
देवताओंकी वह यज्ञभूमि अक्षय है और वहाँ किये हुए प्रत्येक सत्कर्मका फल अक्षय होता है ॥ १४ ॥
ते तु तत्रोपवासांस्तु चक्रुर्निश्चितमानसाः ।
ब्राह्मणास्तत्र शतशः समाजग्मुस्तपोधनाः ॥ १५ ॥
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अविचल चित्तवाले पाण्डवोंने उस तीर्थमें कई उपवास किये । उस समय वहाँ सैकड़ों तपस्वी ब्राह्मण पधारे ॥ १५ ॥
चातुर्मास्येनायजन्त आर्षेण विधिना तदा ।
तत्र विद्यातपोवृद्धा ब्राह्मणा वेदपारगाः ।
कथां प्रचक्रिरे पुण्यां सदसिस्था महात्मनाम् ॥ १६ ॥
उन्होंने शास्त्रोक्त विधिपूर्वक चातुर्मास्य यज्ञ किया । वहाँ आये हुए ब्राह्मण विद्या और तपस्यामें बढ़े - चढ़े तथा वेदोंके पारंगत विद्वान् थे । उन्होंने परस्पर मिलकर सभामें बैठकर महात्मा पुरुषोंकी पवित्र कथाएँ कहीं ॥ १६ ॥
तत्र विद्याव्रतस्नातः कौमारं व्रतमास्थितः ।
शमठोऽकथयद् राजन्नामूर्तरयसं गयम् ॥ १७ ॥
उनमें शमठ नामक एक विद्वान् ब्राह्मण थे जो विद्याध्ययनका व्रत समाप्त करके स्नातक हो चुके थे । उन्होंने आजीवन ब्रह्मचर्यपालनका व्रत ले रखा था । राजन्! शमठने वहाँ अमूर्तरयाके पुत्र महाराज गयकी कथा इस प्रकार कही ॥ १७ ॥
शमठ उवाच
अमूर्तरयसः पुत्रो गयो राजर्षिसत्तमः ।
पुण्यानि यस्य कर्माणि तानि मे शृणु भारत ॥ १८ ॥
शमठ बोले- भरतनन्दन युधिष्ठिर! अमूर्तरयाके पुत्र गय राजर्षियोंमें श्रेष्ठ थे । उनके
कर्म बड़े ही पवित्र एवं पावन थे । मैं उनका वर्णन करता हूँ, सुनो — ॥
यस्य यज्ञो बभूवेह बह्वन्नो बहुदक्षिणः ।
यत्रान्नपर्वता राजन् शतशोऽथ सहस्रशः ॥ १ ९ ॥
घृतकुल्याश्च दध्नश्च नद्यो बहुशतास्तथा ।
व्यञ्जनानां प्रवाहाश्च महार्हाणां सहस्रशः ॥ २० ॥
राजन्! यहाँ राजा गयने बड़ा भारी यज्ञ किया था । उसमें बहुत अन्न खर्च हुआ था और असंख्य दक्षिणा बाँटी गयी थी । उस यज्ञमें अन्नके सैकड़ों और हजारों पर्वत लग गये थे । घीके कई सौ कुण्ड और दहीकी नदियाँ बहती थीं । सहस्रों प्रकारके उत्तमोत्तम व्यञ्जनोंकी बाढ़ - सी आ गयी थी ॥ १ ९ -२० ॥
अहन्यहनि चाप्येवं याचतां सम्प्रदीयते ।
अन्ये च ब्राह्मणा राजन् भुञ्जतेऽन्नं सुसंस्कृतम् ॥ २१ ॥
याचकोंको प्रतिदिन इसी प्रकार भोजन और दान दिया जाता था । राजन्! अन्यान्य ब्राह्मण भी वहाँ उत्तम रीतिसे तैयारकी हुई रसोई जीमते थे ॥ २१ ॥
तत्र वै दक्षिणाकाले ब्रह्मघोषो दिवं गतः ।
न च प्रज्ञायते किंचिद् ब्रह्मशब्देन भारत ॥ २२ ॥
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भरतनन्दन! उस यज्ञमें दक्षिणा देते समय जो वेदमन्त्रोंकी ध्वनि होती थी वह स्वर्गलोकतक गूँज उठती थी । उस वेदध्वनिके सामने दूसरा कोई शब्द नहीं सुनायी पड़ता था ॥ २२ ॥
पुण्येन चरता राजन् भूर्दिशः खं नभस्तथा ।
आपूर्णमासीच्छब्देन तदप्यासीन्महाद्भुतम् ॥ २३ ॥
यत्र स्म गाथा गायन्ति मनुष्या भरतर्षभ ।
अन्नपानैः शुभैस्तृप्ता देशे देशे सुवर्चसः ॥ २४ ॥
राजन्! वहाँ सब ओर फैले हुए पुण्यमय शब्दसे पृथ्वी, दिशाएँ, स्वर्ग और आकाश परिपूर्ण हो गये । यह बड़ी ही अद्भुत बात थी । भरतश्रेष्ठ! उस यज्ञमें सब मनुष्य यह गाथा गाते रहते थे कि ‘ इस यज्ञमें देश -देशके अत्यन्त तेजस्वी पुरुष उत्तम अन्नपानसे तृप्त हो रहे हैं ' ॥ २३-२४ ॥
गयस्य यज्ञे के त्वद्य प्राणिनो भोक्तुमीप्सवः ।
तत्र भोजनशिष्टस्य पर्वताः पञ्चविंशतिः ॥ २५ ॥
‘ गयके यज्ञमें लोग यही पूछते फिरते थे कि ' कौन - कौन ऐसे प्राणी रह गये हैं जो अभी भोजन करना चाहते हैं? ' वहाँ खानेसे बचे हुए अन्नके पचीस पर्वत शेष रह गये थे ॥ २५ ॥
न तत् पूर्वे जनाश्चक्रुर्न करिष्यन्ति चापरे ।
गयो यदकरोद् यज्ञे राजर्षिरमितद्युतिः ॥ २६ ॥
‘ अमिततेजस्वी राजर्षि गयने अपने यज्ञमें जो व्यय किया था, वह पहलेके राजाओंने भी नहीं किया था और भविष्यमें भी कोई दूसरे कर सकेंगे, ऐसा सम्भव नहीं है ॥
कथं तु देवा हविषा गयेन परितर्पिताः ।
पुनः शक्ष्यन्त्युपादातुमन्यैर्दत्तानि कानिचित् ॥ २७ ॥
‘ गयने सम्पूर्ण देवताओंको हविष्यसे भलीभाँति तृप्त कर दिया है, अब वे दूसरोंके दिये हुए हविष्यको कैसे ग्रहण कर सकेंगे? ॥ २७ ॥
सिकता वा यथा लोके यथा वा दिवि तारकाः ।
यथा वा वर्षतो धारा असंख्येयाः स्म केनचित् ।
तथा गणयितुं शक्या गययज्ञे न दक्षिणाः ॥ २८ ॥
‘ जैसे लोकमें बालूके कण, आकाशके तारे और बरसते हुए बादलोंकी जलधाराएँ किसीके द्वारा भी गिनी नहीं जा सकतीं, उसी प्रकार गयके यज्ञमें दी हुई दक्षिणाओंकी भी कोई गणना नहीं कर सकता था ॥ २८ ॥
एवंविधाः सुबहवस्तस्य यज्ञा महीपतेः ।
बभूवुरस्य सरसः समीपे कुरुनन्दन ॥ २ ९ ॥
कुरुनन्दन! महाराज गयके ऐसे ही बहुत- से यज्ञ इस ब्रह्मसरोवरके समीप सम्पन्न हुए हैं ॥ २ ९ ॥
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इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि लोमशतीर्थयात्रायां गययज्ञकथने पञ्चनवतितमोऽध्यायः ॥ ९ ५ ॥ इसप्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत तीर्थयात्रापर्वमें लोमश-तीर्थयात्राके प्रसंगमें ‘ गयके यज्ञका वर्णन ’-विषयक पंचानबेवाँ अध्याय पूराहुआ ॥ ९५ ॥
• यहाँ पाण्डवोंके द्वारा गोदान और धनदान करनेके विषयमें यह शंका होती है कि इनके पास ये सब कहाँसे आये पर ऐसी शंका नहीं करनी चाहिये; क्योंकि वनपर्वके बारहवें अध्यायमें आता है कि काम्यकवनमें पाण्डवोंसे मिलनेके लिये भगवान् श्रीकृष्ण एवं भोजवंशी, वृष्णिवंशी और अन्धककुलके राजागण तथा द्रुपद, धृष्टद्युम्न, धृष्टकेतु एवं केकय राजकुमार आये थे । उनका पाण्डवोंसे मिलकर अपने - अपने राज्यमें लौट जानेका भी वर्णन वनपर्वके बाईसवें अध्यायमें आया है । इससे अनुमान होता है कि इन राजाओंने पाण्डवोंको भेंटमें प्रचुर धन दिया होगा ।