02.Mahabharata Volume 2 — पृष्ठ 751–760
महाभारत — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 751–760
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वध्यमानास्ततो लोकाः सागरैर्मन्दबुद्धिभिः ।
ब्रह्माणं शरणं जग्मुः सहिताः सर्वदैवतैः ॥ ७ ॥
मन्दबुद्धि सगरपुत्रोंद्वारा सताये हुए सब लोग सम्पूर्ण देवताओंके साथ ब्रह्माजीकी शरणमें गये ॥ ७ ॥
तानुवाच महाभागः सर्वलोकपितामहः ।
गच्छध्वं त्रिदशाः सर्वे लोकैः सार्धं यथागतम् ॥ ८ ॥
उस समय सर्वलोकपितामह महाभाग ब्रह्माने उनसे कहा – 'देवताओ! तुम सभी इन सब लोगोंके साथ जैसे आये हो, वैसे लौट जाओ ॥ ८ ॥
नातिदीर्घेण कालेन सागराणां क्षयो महान् ।
भविष्यति महाघोरः स्वकृतैः कर्मभिः सुराः ॥ ९ ॥
‘ अब थोड़े ही दिनोंमें अपने ही किये हुए अपराधोंद्वारा इन सगरपुत्रोंका अत्यन्त घोर और महान् संहार होगा ' ॥ ९ ॥
एवमुक्तास्तु ते देवा लोकाश्च मनुजेश्वर ।
पितामहमनुज्ञाप्य विप्रजग्मुर्यथागतम् ॥ १० ॥
नरेश्वर! उनके ऐसा कहनेपर सब देवता तथा अन्य लोग ब्रह्माजीकी आज्ञा ले जैसे आये थे वैसे लौट गये ॥ १० ॥
ततः काले बहुतिथे व्यतीते भरतर्षभ ।
दीक्षितः सगरो राजा हयमेधेन वीर्यवान् ॥ ११ ॥
भरतश्रेष्ठ! तदनन्तर बहुत समय बीत जानेपर पराक्रमी राजा सगरने अश्वमेधयज्ञकी दीक्षा ली ॥ ११ ॥
तस्याश्वो व्यचरद् भूमिं पुत्रैः स परिरक्षितः । ( सर्वैरेव महोत्साहैः स्वच्छन्दप्रचरो नृप । ) समुद्रं स समासाद्य निस्तोयं भीमदर्शनम् ॥ १२ ॥
रक्ष्यमाणः प्रयत्नेन तत्रैवान्तरधीयत ।
ततस्ते सागरास्तात हृतं मत्वा हयोत्तमम् ॥ १३ ॥
आगम्य पितुराचख्युरदृश्यं तुरगं हृतम् ।
तेनोक्ता दिक्षु सर्वासु सर्वे मार्गत वाजिनम् ॥ १४ ॥
( ससमुद्रवनद्वीपां विचरन्तो वसुन्धराम् । ) राजन्! उनका यज्ञिय अश्व उनके अत्यन्त उत्साही सभी पुत्रोंद्वारा सुरक्षित हो स्वच्छन्दगतिसे पृथ्वीपर विचरने लगा । जब वह अश्व भयंकर दिखायी देनेवाले जलशून्य समुद्रके तटपर आया, तब प्रयत्नपूर्वक रक्षित होनेपर भी वहाँ सहसा अदृश्य हो गया । तात! तब उस उत्तम अश्वको अपहृत जानकर सगरपुत्रोंने पिताके पास आकर कहा — ‘ हमारे यज्ञिय अश्वको किसीने चुरा लिया, अब वह दिखायी नहीं देता । ' यह सुनकर राजा सगरने
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कहा— ' तुम सब लोग समुद्र, वन और द्वीपोंसहित सारी पृथ्वीपर विचरते हुए सम्पूर्ण दिशाओंमें जाकर उस अश्वका पता लगाओ ' ॥ १२–१४ ॥
ततस्ते पितुराज्ञाय दिक्षु सर्वासु तं हयम् ।
अमार्गन्त महाराज सर्वं च पृथिवीतलम् ॥ १५ ॥
ततस्ते सागराः सर्वे समुपेत्य परस्परम् ।
नाध्यगच्छन्त तुरगमश्वहर्तारमेव च ॥ १६ ॥
महाराज! तदनन्तर वे पिताकी आज्ञा ले इस सम्पूर्ण भूतलमें सभी दिशाओंमें अश्वकी खोज करने लगे । खोजते खोजते सभी सगरपुत्र एक- दूसरेसे मिले, परंतु वे अश्व तथा अश्वहर्ताका पता न लगा सके ॥ १५-१६ ॥
आगम्य पितरं चोचुस्ततः प्राञ्जलयोऽग्रतः ।
ससमुद्रवनद्वीपा सनदीनदकन्दरा ॥ १७ ॥
सपर्वतवनोद्देशा निखिलेन मही नृप ।
अस्माभिर्विचिता राजञ्छासनात् तव पार्थिव ॥ १८ ॥
न चाश्वमधिगच्छामो नाश्वहर्तारमेव च ।
श्रुत्वा तु वचनं तेषां स राजा क्रोधमूर्च्छितः ॥ १ ९ ॥
उवाच वचनं सर्वांस्तदा दैववशान्नृप ।
अनागमाय गच्छध्वं भूयो मार्गत वाजिनम् ॥ २० ॥
यज्ञियं तं विना ह्यश्वं नागन्तव्यं हि पुत्रकाः ।
प्रतिगृह्य तु संदेशं पितुस्ते सगरात्मजाः ॥ २१ ॥
भूय एव महीं कृत्स्नां विचेतुमुपचक्रमुः ।
अथापश्यन्त ते वीराः पृथिवीमवदारिताम् ॥ २२ ॥
तब वे पिताके पास आकर उनके आगे हाथ जोड़कर बोले — ' महाराज! हमने आपकी आज्ञासे समुद्र, वन, द्वीप, नदी, नद, कन्दरा, पर्वत और वन्य प्रदेशोंसहित सारी पृथ्वी खोज डाली, परंतु हमें न तो अश्व मिला न उसका चुरानेवाला ही। ' युधिष्ठिर! उनकी यह बात सुनकर राजा सगर क्रोधसे मूर्च्छित हो उठे और उस समय दैववश उन सबसे इस प्रकार बोले — ‘ जाओ, लौटकर न आना । पुनः घोड़ेका पता लगाओ । पुत्रो! उस यज्ञके अश्वको लिये बिना वापस न आना । ' पिताका वह संदेश शिरोधार्य करके सगरपुत्रोंने फिर सारी पृथ्वीपर अश्वको ढूँढ़ना आरम्भ किया । तदनन्तर उन वीरोंने एक स्थानपर पृथ्वीमें दरार पड़ी हुई देखी ॥ १७–२२ ॥
समासाद्य बिलं तच्चाप्यखनन् सगरात्मजाः ।
कुद्दालैर्हेषुकैश्चैव समुद्रं यत्नमास्थिताः ॥ २३ ॥
उस बिलके पास पहुँचकर सगरपुत्रोंने कुदालों और फावड़ोंसे समुद्रको प्रयत्नपूर्वक खोदना आरम्भ किया ॥
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स खन्यमानः सहितैः सागरैर्वरुणालयः ।
अगच्छत् परमामार्तिं दीर्यमाणः समन्ततः ॥ २४ ॥
असुरोरगरक्षांसि सत्त्वानि विविधानि च ।
आर्तनादमकुर्वन्त वध्यमानानि सागरैः ॥ २५ ॥
एक साथ लगे हुए सगरकुमारोंके खोदनेपर सब ओरसे विदीर्ण होनेवाले समुद्रको बड़ी पीड़ाका अनुभव होता था । सगरपुत्रोंके हाथों मारे जाते हुए असुर, नाग, राक्षस और नाना प्रकारके जन्तु बड़े जोरसे आर्तनाद करते थे ॥ २४-२५ ॥
छिन्नशीर्षा विदेहाश्च भिन्नत्वगस्थिसंधयः ।
प्राणिनः समदृश्यन्त शतशोऽथ सहस्रशः ॥ २६ ॥
सैकड़ों और हजारों ऐसे प्राणी दिखायी देने लगे जिनके मस्तक कट गये थे, शरीर छिन्न- भिन्न हो गये थे, चमड़े छिल गये थे तथा हड्डियोंके जोड़ टूट गये थे ॥ २६ ॥
एवं हि खनतां तेषां समुद्रं वरुणालयम् ।
व्यतीतः सुमहान् कालो न चाश्वः समदृश्यत ॥ २७ ॥
इस प्रकार वरुणके निवासभूत समुद्रकी खुदाई करते - करते उनका बहुत समय बीत गया, परंतु वह अश्व कहीं दिखायी नहीं दिया ॥ २७ ॥
ततः पूर्वोत्तरे देशे समुद्रस्य महीपते ।
विदार्य पातालमथ संक्रुद्धाः सगरात्मजाः ॥ २८ ॥
अपश्यन्त हयं तत्र विचरन्तं महीतले ।
कपिलं च महात्मानं तेजोराशिमनुत्तमम् ।
तेजसा दीप्यमानं तु ज्वालाभिरिव पावकम् ॥ २ ९ ॥
राजन्! तदनन्तर क्रोधमें भरे हुए सगरपुत्रोंने समुद्रके पूर्वोत्तर प्रदेशमें पाताल फोड़कर प्रवेश किया और वहाँ उस यज्ञिय अश्वको पृथ्वीपर विचरते देखा । वहीं तेजकी परम उत्तम राशि महात्मा कपिल बैठे थे, जो अपने दिव्य तेजसे उसी प्रकार उद्भासित हो रहे थे, जैसे लपटोंसे अग्नि ॥ २८-२९ ॥
ते तं दृष्ट्वा हयं राजन् सम्प्रहृष्टतनूरुहाः ।
अनादृत्य महात्मानं कपिलं कालचोदिताः ॥ ३० ॥
संक्रुद्धाः सम्प्रधावन्त अश्वग्रहणकाङ्क्षिणः ।
ततः क्रुद्धो महाराज कपिलो मुनिसत्तमः ॥ ३१ ॥
राजन्! उस अश्वको देखकर उनके शरीरमें हर्षजनित रोमाञ्च हो आया । वे कालसे प्रेरित हो क्रोधमें भरकर महात्मा कपिलका अनादर करके उस अश्वको पकड़नेके, लिये दौड़े । महाराज! तब मुनिश्रेष्ठ कपिल कुपित हो उठे ॥ ३०-३१ ॥
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महर्षि कपिलकी क्रोधाग्निमें सगरपुत्रोंका भस्म होना Gione महर्षि अगस्त्यका समुद्रपान
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वासुदेवेति यं प्राहुः कपिलं मुनिपुङ्गवम् ।
स चक्षुर्विकृतं कृत्वा तेजस्तेषु समुत्सृजन् ॥ ३२ ॥
ददाह सुमहातेजा मन्दबुद्धीन् स सागरान् । मुनिप्रवर कपिल वे ही भगवान् विष्णु हैं जिन्हें वासुदेव कहते हैं । उन महातेजस्वीने विकराल आँखें करके अपना तेज उनपर छोड़ दिया और मन्दबुद्धि सगरपुत्रोंको जला दिया ॥ ३२ ॥
तान् दृष्ट्वा भस्मसाद् भूतान् नारदः सुमहातपाः ॥ ३३ ॥
सगरान्तिकमागच्छत् तच्च तस्मै न्यवेदयत् ।
स तच्छ्रुत्वा वचो घोरं राजा मुनिमुखोद्गतम् ॥ ३४ ॥
मुहूर्तं विमना भूत्वा स्थाणोर्वाक्यमचिन्तयत् । ( स पुत्रनिधनोद्भूतदुःखेन समभिप्लुतः । आत्मानमात्मनाऽऽश्वास्य हयमेवान्वचिन्तयत् ॥ ) अंशुमन्तं समाहूय असमञ्जः सुतं तदा ॥ ३५ ॥
पौत्रं भरतशार्दूल इदं वचनमब्रवीत् ।
षष्टिस्तानि सहस्राणि पुत्रणाममितौजसाम् ॥ ३६ ॥
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कापिलं तेज आसाद्य मत्कृते निधनं गताः ।
तव चापि पिता तात परित्यक्तो मयानघ ।
धर्मं संरक्षमाणेन पौरणां हितमिच्छता ॥ ३७ ॥
उन्हें भस्म हुआ देख महातपस्वी नारदजी राजा सगरके समीप आये और उनसे सब समाचार निवेदित किया । मुनिके मुखसे निकले हुए इस घोर वचनको सुनकर राजा सगर दो घड़ीतक अनमने हो महादेवजीके कथनपर विचार करते रहे । पुत्रकी मृत्युजनित वेदनासे अत्यन्त दुखी हो स्वयं ही अपने- आपको सान्त्वना दे उन्होंने अश्वको ही ढूँढ़नेका विचार किया । भरतश्रेष्ठ! तदनन्तर असमञ्जसके पुत्र अपने पौत्र अंशुमान्को बुलाकर यह बात कही — ‘ तात! मेरे अमिततेजस्वी साठ हजार पुत्र मेरे ही लिये महर्षि कपिलकी क्रोधाग्निमें पड़कर नष्ट हो गये । अनघ! पुरवासियोंके हितकी रक्षा रखकर धर्मकी रक्षा करते हुए मैंने तुम्हारे पिताको भी त्याग दिया है ' ॥ ३३–३७ ॥ युधिष्ठिर उवाच
किमर्थं राजशार्दूलः सगरः पुत्रमात्मजम् ।
त्यक्तवान् दुस्त्यजं वीरं तन्मे ब्रूहि तपोधन ॥ ३८ ॥
युधिष्ठिरने पूछा— तपोधन! नृपश्रेष्ठ सगरने किसलिये अपने दुस्त्यज वीर पुत्रका त्याग किया था, यह मुझे बताइये ॥ ३८ ॥
लोमश उवाच
असमञ्जा इति ख्यातः सगरस्य सुतो ह्यभूत् ।
यं शैब्या जनयामास पौराणां स हि दारकान् ॥ ३ ९ ॥
( क्रीडतः सहसाऽऽसाद्य तत्र तत्र महीपते । )
गलेषु क्रोशतो गृह्य नद्यां चिक्षेप दुर्बलान् ।
ततः पौराः समाजग्मुर्भयशोकपरिप्लुताः ॥ ४० ॥
सगरं चाभ्यभाषन्त सर्वे प्राञ्जलयः स्थिताः ।
त्वं नस्त्राता महाराज परचक्रादिभिर्भयात् ॥ ४१ ॥
लोमशजीने कहा- राजन्! सगरका वह पुत्र जिसे रानी शैब्याने उत्पन्न किया था, असमञ्जसके नामसे विख्यात हुआ । वह जहाँ- तहाँ खेल-कूदमें लगे हुए पुरवासियोंके दुर्बल बालकोंके समीप सहसा पहुँच जाता और चीखते-चिल्लाते रहनेपर भी उनका गला पकड़कर उन्हें नदीमें फेंक देता था। तब समस्त पुरवासी भय और शोकमें मग्न हो राजा सगरके पास आये और हाथ जोड़े खड़े हो इस प्रकार कहने लगे — ‘ महाराज! आप शत्रुसेना आदिके भयसे हमारी रक्षा करनेवाले हैं ॥ ३ ९ —४१ ॥
असमञ्जोभयाद् घोरात् ततो नस्त्रातुमर्हसि ।
पौराणां वचनं श्रुत्वा घोरं नृपतिसत्तमः ॥ ४२ ॥
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मुहुर्त विमना भूत्वा सचिवानिदमब्रवीत् ।
असमञ्जाः पुरादद्य सुतो मे विप्रवास्यताम् ॥ ४३ ॥
‘ अतः असमंजसके घोर भयसे आप हमारी रक्षा करें! ' पुरवासियोंका यह भयंकर वचन सुनकर नृपश्रेष्ठ सगर दो घड़ीतक अनमने होकर बैठे रहे । फिर मन्त्रियोंसे इस प्रकार बोले- ' आज मेरे पुत्र असमंजसको मेरे घरसे बाहर निकाल दो ' ॥ ४२-४३ ॥
यदि वो मत्प्रियं कार्यमेतच्छीघ्रं विधीयताम् ।
एवमुक्ता नरेन्द्रेण सचिवास्ते नराधिप ॥ ४४ ॥
यथोक्तं त्वरिताश्चक्रुर्यथाऽऽज्ञापितवान् नृपः ।
एतत् ते सर्वमाख्यातं यथा पुत्रो महात्मना ॥ ४५ ॥
पौराणां हितकामेन सगरेण विवासितः ।
अंशुमांस्तु महेष्वासो यदुक्तः सगरेण हि ।
तत् ते सर्वं प्रवक्ष्यामि कीर्त्यमानं निबोध मे ॥ ४६ ॥
‘ यदि तुम्हें मेरा प्रिय कार्य करना है तो मेरी इस आज्ञाका शीघ्र पालन होना चाहिये । ’ राजन्! महाराज सगरके ऐसा कहनेपर मन्त्रियोंने शीघ्र वैसा ही किया, जैसा उनका आदेश था । युधिष्ठिर! पुरवासियोंके हित चाहनेवाले महात्मा सगरने जिस प्रकार अपने पुत्रको निर्वासित किया था, वह सब प्रसंग मैंने तुमसे कह सुनाया । अब महाधनुर्धर अंशुमान्से राजा सगरने जो कुछ कहा, वह सब तुम्हें बता रहा हूँ, मेरे मुखसे सुनो ॥ ४४–४६ ॥ सगर उवाच
पितुश्च तेऽहं त्यागेन पुत्राणां निधनेन च ।
अलाभेन तथाश्वस्य परितप्यामि पुत्रक ॥ ४७ ॥
सगर बोले- बेटा! तुम्हारे पिताको त्याग देनेसे, अन्य पुत्रोंकी मृत्यु हो जानेसे तथा यज्ञसम्बन्धी अश्वके न मिलनेसे मैं सर्वथा संतप्त हो रहा हूँ ॥ ४७ ॥
तस्माद् दुःखाभिसंतप्तं यज्ञविघ्नाच्च मोहितम् ।
हयस्यानयनात् पौत्र नरकान्मां समुद्धर ॥ ४८ ॥
अतः पौत्र! यज्ञमें विघ्न पड़ जानेसे मैं मोहित और दुःखसे संतप्त हूँ । तुम अश्वको ले आकर नरकसे मेरा उद्धार करो ॥ ४८ ॥
अंशुमानेवमुक्तस्तु सगरेण महात्मना ।
जगाम दुःखात् तं देशं यत्र वै दारिता मही ॥ ४ ९ ॥
महात्मा सगरके ऐसा कहनेपर अंशुमान् बड़े दुःखसे उस स्थानपर गये जहाँ पृथ्वी विदीर्ण की गयी थी ॥ ४ ९ ॥
स तु तेनैव मार्गेण समुद्रं प्रविवेश ह ।
अपश्यच्च महात्मानं कपिलं तुरगं च तम् ॥ ५० ॥
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उन्होंने उसी मार्गसे समुद्रमें प्रवेश किया और महात्मा कपिल तथा यज्ञिय अश्वको देखा ॥ ५० ॥
स दृष्ट्वा तेजसो राशिं पुराणमृषिसत्तमम् ।
प्रणम्य शिरसा भूमौ कार्यमस्मै न्यवेदयत् ॥ ५१ ॥
तेजोराशि मुनिप्रवर पुराणपुरुष कपिलजीका दर्शन करके अंशुमान्ने धरतीपर माथा टेककर प्रणाम किया और उनसे अपना कार्य बताया ॥ ५१ ॥
T
ततः प्रीतो महाराज कपिलोंऽशुमतोऽभवत् ।
उवाच चैनं धर्मात्मा वरदोऽस्मीति भारत ॥ ५२ ॥
भरतवंशी महाराज! इससे धर्मात्मा कपिलजी अंशुमान्पर प्रसन्न हो गये और बोले –'मैं तुम्हें वर देनेको उद्यत हूँ' ॥ ५२ ॥
स वव्रे तुरगं तत्र प्रथमं यज्ञकारणात् ।
द्वितीयं वरकं वव्रे पितॄणां पावनेच्छया ॥ ५३ ॥
अंशुमान्ने पहले तो यज्ञकार्यकी सिद्धिके लिये वहाँ उस अश्वके लिये प्रार्थना की और दूसरा वर अपने पितरोंको पवित्र करनेकी इच्छासे माँगा ॥ ५३ ॥
तमुवाच महातेजाः कपिलो मुनिपुङ्गवः ।
ददानि तव भद्रं ते यद् यत् प्रार्थयसेऽनघ ॥ ५४ ॥
त्वयि क्षमा च धर्मश्च सत्यं चापि प्रतिष्ठितम् ।
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त्वया कृतार्थः सगरः पुत्रवांश्च त्वया पिता ॥ ५५ ॥
तब मुनिश्रेष्ठ महातेजस्वी कपिलने अंशुमान्से कहा- ' अनघ! तुम्हारा कल्याण हो । तुम जो कुछ माँगते हो वह सब तुम्हें दूँगा । तुममें क्षमा, धर्म और सत्य सब कुछ प्रतिष्ठित है । तुम- जैसे पौत्रको पाकर राजा सगर कृतार्थ हैं और तुम्हारे पिता तुम्हींसे वस्तुतः पुत्रवान् हैं ॥ ५४-५५ ॥ तव चैव प्रभावेण स्वर्गं यास्यन्ति सागराः । ( शलभत्वं गता ह्येते मम क्रोधहुताशने । ) पौत्रश्च ते त्रिपथगां त्रिदिवादानयिष्यति ॥ ५६ ॥
पावनार्थं सागराणां तोषयित्वा महेश्वरम् ।
हयं नयस्व भद्रं ते यज्ञियं नरपुङ्गव ॥ ५७ ॥
' तुम्हारे ही प्रभावसे सगरके सारे पुत्र जो मेरी क्रोधाग्निमें शलभकी भाँति भस्म हो गये हैं, स्वर्गलोकमें चले जायँगे । तुम्हारा पौत्र भगवान् शंकरको संतुष्ट करके सगरपुत्रोंको पवित्र करनेके लिये स्वर्गलोकसे यहाँ गंगाजीको ले आयेगा । नरश्रेष्ठ! तुम्हारा भला हो । तुम इस यज्ञिय अश्वको ले जाओ ॥ ५६-५७ ॥
यज्ञः समाप्यतां तात सगरस्य महात्मनः ।
अंशुमानेवमुक्तस्तु कपिलेन महात्मना ॥ ५८ ॥
आजगाम हयं गृह्य यज्ञवाटं महात्मनः ।
सोऽभिवाद्य ततः पादौ सगरस्य महात्मनः ॥ ५ ९ ॥
मूर्ध्नि तेनाप्युपाघ्रातस्तस्मै सर्वं न्यवेदयत् ।
यथा दृष्टं श्रुतं चापि सागराणां क्षयं तथा ॥ ६० ॥
तं चास्मै हयमाचष्ट यज्ञवाटमुपागतम् ।
तच्छ्रुत्वा सगरो राजा पुत्रजं दुःखमत्यजत् ॥ ६१ ॥
‘ तात! महात्मा सगरका यज्ञ पूर्ण करो । ' महात्मा कपिलके ऐसा कहनेपर अंशुमान् उस अश्वको लेकर महामना सगरके यज्ञमण्डपमें आये और उनके चरणोंमें प्रणाम करके उनसे सब समाचार निवेदन किया । सगरने भी स्नेहसे अंशुमान्का मस्तक सूँघा । अंशुमान्ने सगर-पुत्रोंका विनाश जैसा देखा और सुना था, वह सब बताया, साथ ही यह भी कहा कि ‘ यज्ञिय अश्व यज्ञमण्डपमें आ गया है। ' यह सुनकर राजा सगरने पुत्रोंके मरनेका दुःख त्याग दिया ॥ ५८–६१ ॥
अंशुमन्तं च सम्पूज्य समापयत तं क्रतुम् ।
समाप्तयज्ञः सगरो देवैः सर्वैः सभाजितः ॥ ६२ ॥
और अंशुमान्की प्रशंसा करते हुए अपने उस यज्ञको पूर्ण किया । यज्ञ पूर्ण हो जानेपर सब देवताओंने सगरका बड़ा सत्कार किया ॥ ६२ ॥
पुत्रत्वे कल्पयामास समुद्रं वरुणालयम् ।
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प्रशास्य सुचिरं कालं राज्यं राजीवलोचनः ॥ ६३ ॥
पौत्रे भारं समावेश्य जगाम त्रिदिवं तदा ।
अंशुमानपि धर्मात्मा महीं सागरमेखलाम् ॥ ६४ ॥
प्रशशास महाराज यथैवास्य पितामहः ।
तस्य पुत्रः समभवद् दिलीपो नाम धर्मवित् ॥ ६५ ॥
कमलके समान नेत्रोंवाले सगरने वरुणालय समुद्रको अपना पुत्र माना और दीर्घकालतक राज्यशासन करके अन्तमें अपने पौत्र अंशुमान्पर राज्यका सारा भार रखकर वे स्वर्गलोकको चले गये । महाराज! धर्मात्मा अंशुमान् भी अपने पितामहसगरके समान ही समुद्रसे घिरी हुई इस वसुधाका पालन करते रहे । उनके एक पुत्र हुआ जिसका नाम दिलीप था । वह भी धर्मका ज्ञाता था ॥ ६३–६५ ॥
तस्मै राज्यं समाधाय अंशुमानपि संस्थितः ।
दिलीपस्तु ततः श्रुत्वा पितॄणां निधनं महत् ॥ ६६ ॥
पर्यतप्यत दुःखेन तेषां गतिमचिन्तयत् ।
गङ्गावतरणे यत्नं सुमहच्चाकरोन्नृपः ॥ ६७ ॥
दिलीपको राज्य देकर अंशुमान् भी परलोक- वासी हुए । दिलीपने जब अपने पितरोंके महान् संहारका समाचार सुना, तब वे दुःखसे संतप्त हो उठे और उनकी सद्गतिका उपाय सोचने लगे । राजा दिलीपने गंगाजीको इस भूतलपर उतारनेके लिये महान् प्रयत्न किया ॥ ६६-६७ ||
न चावतारयामास चेष्टमानो यथाबलम् ।
तस्य पुत्रः समभवच्छ्रीमान् धर्मपरायणः ॥ ६८ ॥
भगीरथ इति ख्यातः सत्यवागनसूयकः ।
अभिषिच्य तु तं राज्ये दिलीपो वनमाश्रितः ॥ ६ ९ ॥
( भगीरथं महात्मानं सत्यधर्मपरायणम् । ) यथाशक्ति चेष्टा करनेपर भी वे गंगाको पृथ्वीपर उतार न सके। दिलीपके भगीरथ नामसे विख्यात एक पुत्र हुआ जो परम कान्तिमान्, धर्मपरायण, सत्यवादी और अदोषदर्शी था । सत्यधर्मपरायण महात्मा भगीरथका राज्याभिषेक करके दिलीप वनमें चले गये ॥ ६८-६९ ॥
तपःसिद्धिसमायोगात् स राजा भरतर्षभ ।
वनाज्जगाम त्रिदिवं कालयोगेन भारत ॥ ७० ॥
भरतश्रेष्ठ! राजा दिलीप तपस्याजनक सिद्धिसे संयुक्त हो अन्तकाल आनेपर वनसे स्वर्गलोकको चले गये ॥ ७० ॥