श्रीगणेशाय नमः।

महाभारत — खण्ड २ — पृष्ठ 761–770

महाभारत — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 761–770

पृष्ठ 761

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इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि लोमशतीर्थयात्रायामगस्त्यमाहात्म्यकथने सप्ताधिकशततमोऽध्यायः ॥ १०७ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत तीर्थयात्रापर्वमें लोमशतीर्थयात्राके प्रसंगमें अगस्त्यमाहात्म्यवर्णनविषयक एक सौ सातवाँअध्याय पूरा हुआ ॥ १०७ ॥

(दाक्षिणात्य अधिक पाठके ३ श्लोक मिलाकर कुल ७३३ श्लोक हैं )

पृष्ठ 762

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अष्टाधिकशततमोऽध्यायः भगीरथका हिमालयपर तपस्याद्वारा गंगा और महादेवजीको प्रसन्न करके उनसे वर प्राप्त करना लोमशउवाच

स तु राजा महेष्वासश्चक्रवर्ती महारथः ।

बभूव सर्वलोकस्य मनोनयननन्दनः ॥ १ ॥

लोमशजी कहते हैं — राजन्! महान् धनुर्धर महारथी राजा भगीरथ चक्रवर्ती नरेश थे ।

वे सब लोगोंके मन और नेत्रोंको आनन्द प्रदान करनेवाले थे ॥ १ ॥

स सुश्राव महाबाहुः कपिलेन महात्मना ।

पितॄणां निधनं घोरमप्राप्तिं त्रिदिवस्य च ॥ २ ॥

स राज्यं सचिवे न्यस्य हृदयेन विदूयता ।

जगाम हिमवत्पार्श्वं तपस्तप्तुं नरेश्वर ॥ ३ ॥

नरेश्वर! उन महाबाहुने जब यह सुना कि महात्मा कपिलद्वारा हमारे ( साठ हजार) पितरोंकी भयंकर मृत्यु हुई है और वे स्वर्गप्राप्तिसे वंचित रह गये हैं तब उन्होंने व्यथित हृदयसे अपना राज्य मन्त्रीको सौंप दिया और स्वयं हिमालयके शिखरपर तपस्या करनेके लिये प्रस्थान किया ॥ २-३ ॥

आरिराधयिषुर्गङ्गां तपसा दग्धकिल्बिषः ।

सोऽपश्यत नरश्रेष्ठ हिमवन्तं नगोत्तमम् ॥। ४ ॥

शृङ्गैर्बहुविधाकारैर्धातुमद्भिरलंकृतम् ।

पवनालम्बिभिर्मेघैः परिषिक्तं समन्ततः ॥ ५ ॥

नरेश्वर! तपस्यासे सारा पाप नष्ट करके वे गंगाजीकी आराधना करना चाहते थे । उन्होंने देखा कि गिरिराज हिमालय विविध धातुओंसे विभूषित नाना प्रकारके शिखरोंसे अलंकृत है । वायुके आधारपर उड़नेवाले मेघ चारों ओरसे उसका अभिषेक कर रहे हैं ॥ ४-५ ॥

नदीकुञ्जनितम्बैश्च प्रासादैरुपशोभितम् ।

गुहाकन्दरसंलीनसिंहव्याघ्रनिषेवितम् ॥ ६ ॥

अनेकानेक नदियों, निकुञ्जों, घाटियों और प्रासादों ( मन्दिरों ) -से इसकी बड़ी शोभा हो रही है । गुफाओं और कन्दराओंमें छिपे हुए सिंह तथा व्याघ्रोंसे यह पर्वत सदा सेवित होता है ॥ ६ ॥

शकुनैश्च विचित्राङ्गैः कूजद्भिर्विविधा गिरः ।

पृष्ठ 763

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भृङ्गराजैस्तथा हंसैर्दात्यूहैर्जलकुक्कुटैः ॥ ७ ॥

मयूरैः शतपत्रैश्च जीवं जीवककोकिलैः ।

चकोरैरसितापाङ्गैस्तथा पुत्रप्रियैरपि ॥ ८ ॥

भाँति - भाँतिके कलरव करते हुए विचित्र अंगोंवाले पक्षी, भृंगराज, हंस, चातक, जलमुर्ग, मोर, शतपत्र नामक पक्षी, चक्रवाक, कोकिल, चकोर, असितापांग और पुत्रप्रिय आदि इस पर्वतकी शोभा बढ़ाते हैं ॥ ७-८ ॥

जलस्थानेषु रम्येषु पद्मिनीभिश्च संकुलम् ।

सारसानां च मधुरैर्व्याहृतैः समलंकृतम् ॥ ९ ॥

किन्नरैरप्सरोभिश्च निषेवितशिलातलम् ।

दिग्वारणविषाणाग्रैः समन्ताद् धृष्टपादपम् ॥ १० ॥

विद्याधरानुचरितं नानारत्नसमाकुलम् ।

विषोल्बणभुजंगश्च दीप्तजिह्वैर्निषेवितम् ॥ ११ ॥

क्वचित् कनकसंकाशं क्वचिद् रजतसंनिभम् ।

क्वचिदञ्जनपुञ्जाभं हिमवन्तमुपागमत् ॥ १२ ॥

स तु तत्र नरश्रेष्ठस्तपो घोरं समाश्रितः ।

फलमूलाम्बुसम्भक्षः सहस्रपरिवत्सरान् ॥ १३ ॥

संवत्सरसहस्रे तु गते दिव्ये महानदी ।

दर्शयामास तं गङ्गा तदा मूर्तिमती स्वयम् ॥ १४ ॥

वहाँके रमणीय जलाशयोंमें पद्मसमूह भरे हुए हैं। सारसोंके मधुर कलरव उस पर्वतीय प्रदेशको सुशोभित कर रहे हैं । हिमालयकी शिलाओंपर किन्नर और अप्सराएँ बैठी हैं । वहाँके वृक्षोंपर चारों ओरसे दिग्गजोंके दाँतोंकी रगड़ दिखायी देती है । हिमालयके इन शिखरोंपर विद्याधरगण विचर रहे हैं । नाना प्रकारके रत्न सब ओर व्याप्त हैं । प्रज्वलित जिह्वावाले भयंकर विषधर सर्प इस गिरिप्रदेशका सेवन करते हैं । यह शैलराज कहीं तो सुवर्णके समान उद्भासित होता है, कहीं चाँदीके समान चमकता है और कहीं कज्जलराशिके समान काला दिखायी देता है । नरश्रेष्ठ भगीरथ उस हिमवान् पर्वतपर गये और घोर तपस्यामें लग गये । उन्होंने सहस्र वर्षोंतक फल, मूल और जलका आहार किया । एक हजार दिव्य वर्ष बीत जानेपर महानदी गंगाने स्वयं साकार होकर उन्हें प्रत्यक्ष दर्शन दिया ॥ ९ –१४ ॥ गङ्गोवाच

किमिच्छसि महाराज मत्तः किं च ददानि ते ।

तद् ब्रवीहि नरश्रेष्ठ करिष्यामि वचस्तव ॥ १५ ॥

पृष्ठ 764

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गंगाजीने कहा – महाराज! तुम मुझसे क्या चाहते हो, मैं तुम्हें क्या दूँ? नरश्रेष्ठ! बताओ, मैं तुम्हारी याचना पूर्ण करूँगी ॥ १५ ॥

एवमुक्तः प्रत्युवाच राजा हैमवतीं तदा । ( नदीं भगीरथो राजन् प्रणिपत्य कृताञ्जलिः । ) पितामहा मे वरदे कपिलेन महानदि ॥ १६ ॥

अन्वेषमाणास्तुरगं नीता वैवस्वतक्षयम् ।

षष्टिस्तानि सहस्राणि सागराणां महात्मनाम् ॥ १७ ॥

कपिलं देवमासाद्य क्षणेन निधनं गताः ।

तेषामेवं विनष्टानां स्वर्गे वासो न विद्यते ॥ १८ ॥

यावत् तानि शरीराणि त्वं जलैर्नाभिषिञ्चसि ।

तावत् तेषां गतिर्नास्ति सागराणां महानदि ॥ १ ९ ॥

स्वर्गं नय महाभागे मत्पितॄन् सगरात्मजान् ।

तेषामर्थेन याचामि त्वामहं वै महानदि ॥ २० ॥

राजन्! उनके ऐसा कहनेपर राजा भगीरथने हिमालयनन्दिनी गंगाको हाथ जोड़कर प्रणाम किया और इस प्रकार कहा- ' वरदायिनी महानदी! मेरे पितामह यज्ञसम्बन्धी अश्वका पता लगाते हुए कपिलके कोपसे यमलोकको जा पहुँचे हैं । वे सब महात्मा सगरके पुत्र थे और उनकी संख्या साठ हजार थी । भगवान् कपिलके निकट जाकर वे सब - के - सब क्षणभरमें भस्म हो गये । इस प्रकार दुर्मृत्युसे मरनेके कारण उन्हें स्वर्गमें निवास नहीं प्राप्त हुआ है । महानदी! जबतक तुम अपने जलसे उनके भस्म हुए शरीरोंको सींच न दोगी तबतक उन सगरपुत्रोंकी सद्गति नहीं हो सकती । महाभागे! मेरे पितामह सगरकुमारोंको स्वर्गमें पहुँचा दो । महानदी! मैं उन्हींके उद्धारके लिये तुमसे याचना करता हूँ' ॥ १६— २० ॥

पृष्ठ 765

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लोमशउवाच

एतच्छ्रुत्वा वचो राज्ञो गङ्गा लोकनमस्कृता ।

भगीरथमिदं वाक्यं सुप्रीता समभाषत ॥ २१ ॥

लोमशजी कहते हैं - राजन्! राजा भगीरथकी यह बात सुनकर विश्ववन्दिता गंगा अत्यन्त प्रसन्न हुईं और उनसे इस प्रकार बोलीं— ॥ २१ ॥

करिष्यामि महाराज वचस्ते नात्र संशयः ।

वेगं तु मम दुर्धार्यं पतन्त्या गगनाद् भुवम् ॥ २२ ॥

‘ महाराज! मैं तुम्हारी बात मानूँगी, इसमें संशय नहीं है; परंतु आकाशसे पृथ्वीपर गिरते समय मेरे वेगको रोकना बहुत कठिन है ॥ २२ ॥

न शक्तस्त्रिषु लोकेषु कश्चिद् धारयितुं नृप ।

अन्यत्र विबुधश्रेष्ठान्नीलकण्ठान्महेश्वरात् ॥ २३ ॥

' राजन्! देवश्रेष्ठ महेश्वर नीलकण्ठको छोड़कर तीनों लोकोंमें कोई भी मेरा वेग धारण नहीं कर सकता ॥ २३ ॥

तं तोषय महाबाहो तपसा वरदं हरम् ।

स तु मां प्रच्युतां देवः शिरसा धारयिष्यति ॥ २४ ॥

पृष्ठ 766

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‘ महाबाहो! तुम तपस्याद्वारा उन्हीं वरदायक भगवान् शिवको संतुष्ट करो । स्वर्गसे गिरते समय वे ही मुझे अपने मस्तकपर धारण करेंगे ॥ २४ ॥

स करिष्यति ते कामं पितॄणां हितकाम्यया । ( तपसाऽऽराधितः शम्भुर्भगवाँल्लोकभावनः । ) ‘ विश्वभावन भगवान् शंकर तपस्याद्वारा आराधना करनेपर तुम्हारे पितरोंके हितकी इच्छासे अवश्य तुम्हारा मनोरथ पूर्ण करेंगे ' ॥ २४ ॥

एतच्छ्रुत्वा ततो राजन् महाराजो भगीरथः ॥ २५ ॥

कैलासं पर्वतं गत्वा तोषयामास शंकरम् ।

तपस्तीव्रमुपागम्य कालयोगेन केनचित् ॥ २६ ॥

राजन्! यह सुनकर महाराज भगीरथ कैलासपर्वतपर गये और वहाँ उन्होंने तीव्र तपस्या करके कुछ समयके बाद भगवान् शंकरको प्रसन्न किया ॥ २५-२६ ॥

अगृह्णाच्च वरं तस्माद् गङ्गाया धारणे नृप ।

स्वर्गे वासं समुद्दिश्य पितॄणां स नरोत्तमः ॥ २७ ॥

नरेश्वर! तत्पश्चात् गंगाजीकी प्रेरणाके अनुसार नरश्रेष्ठ भगीरथने अपने पितरोंको स्वर्गलोककी प्राप्ति करानेके उद्देश्यसे महादेवजीसे गंगाजीके वेगको धारण करनेके लिये वरकी याचना की ॥ २७ ॥

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि लोमशतीर्थयात्रायामगस्त्योपाख्याने अष्टाधिकशततमोऽध्यायः ॥ १०८ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत तीर्थयात्रापर्वमें लोमशतीर्थयात्राके प्रसंगमें अगस्त्योपाख्यानविषयक एक सौ आठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १०८ ॥

( दाक्षिणात्य अधिक पाठका १ श्लोक मिलाकर कुल २८ श्लोक हैं )

पृष्ठ 767

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नवाधिकशततमोऽध्यायः पृथ्वीपर गंगाजीके उतरने और समुद्रको जलसे भरनेका विवरण तथा सगरपुत्रोंका उद्धार लोमशउवाच

भगीरथवचः श्रुत्वा प्रियार्थं च दिवौकसाम् ।

एवमस्त्विति राजानं भगवान् प्रत्यभाषत ॥ १ ॥

धारयिष्ये महाभाग गगनात् प्रच्युतां शिवाम् ।

दिव्यां देवनदीं पुण्यां त्वत्कृते नृपसत्तम ॥ २ ॥

लोमशजी कहते हैं— राजन्! राजा भगीरथकी बात सुनकर देवताओंका प्रिय करनेके लिये भगवान् शिवने कहा– ' एवमस्तु ' महाभाग! मैं तुम्हारे लिये आकाशसे गिरती हुई कल्याणमयी पुण्यस्वरूपा दिव्य देवनदी गंगाको अवश्य धारण करूँगा ' ॥ १-२ ॥

एवमुक्त्वा महाबाहो हिमवन्तमुपागमत् ।

वृतः पारिषदैर्घोरैर्नानाप्रहरणोद्यतैः ॥ ३ ॥

महाबाहो! ऐसा कहकर भगवान् शिव भाँति - भाँतिके अस्त्र- शस्त्रोंसे सुसज्जित अपने भयंकर पार्षदोंसे घिरे हुए हिमालयपर आये ॥ ३ ॥

तत्र स्थित्वा नरश्रेष्ठं भगीरथमुवाच ह ।

प्रयाचस्व महाबाहो शैलराजसुतां नदीम् ॥ ४ ॥

( पितॄणां पावनार्थं ते तामहं मनुजाधिप । ) पतमानां सरिच्छ्रेष्ठां धारयिष्ये त्रिविष्टपात् । वहाँ ठहरकर उन्होंने नरश्रेष्ठ भगीरथसे कहा– ' महाबाहो! गिरिराजनन्दिनी महानदी गंगासे भूतलपर उतरनेके लिये प्रार्थना करो । नरेश्वर! मैं तुम्हारे पितरोंको पवित्र करनेके लिये स्वर्गसे उतरती हुई सरिताओंमें श्रेष्ठ गङ्गाको सिरपर धारण करूँगा' ॥ ४३ ॥

एतच्छ्रुत्वा वचो राजा शर्वेण समुदाहृतम् ॥ ५ ॥

प्रयतः प्रणतो भूत्वा गङ्गां समनुचिन्तयत् ।

ततः पुण्यजला रम्या राज्ञा समनुचिन्तिता ॥ ६ ॥

ईशानं च स्थितं दृष्ट्वा गगनात् सहसा च्युता ।

तां प्रच्युतामथो दृष्ट्वा देवाः सार्धं महर्षिभिः ॥ ७ ॥

गन्धर्वोरगयक्षाश्च समाजग्मुर्दिदृक्षवः ।

ततः पपात गगनाद् गङ्गा हिमवतः सुता ॥ ८ ॥

पृष्ठ 768

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भगवान् शंकरकी कही हुई यह बात सुनकर राजा भगीरथने एकाग्रचित्त हो प्रणाम करके गंगाजीका चिन्तन किया । राजाके चिन्तन करनेपर भगवान् शंकरको खड़ा हुआ देख पुण्यसलिला रमणीय नदी गंगा सहसा आकाशसे नीचे गिरीं । उन्हें गिरती देख दर्शनके लिये उत्सुक हो महर्षियोंसहित देवता, गन्धर्व, नाग और यक्ष वहाँ आ गये । तदनन्तर हिमालयनन्दिनी गंगा आकाशसे वहाँ आ गिरीं ॥ ५–८ ॥

समुद्धृतमहावर्ता मीनग्राहसमाकुला ।

तां दधार हरो राजन् गङ्गां गगनमेखलाम् ॥ ९ ॥

ललाटदेशे पतितां मालां मुक्तामयीमिव । उस समय उनके जलमें बड़ी- बड़ी भँवरें और तरंगे उठ रही थीं । मत्स्य और ग्राह भरे हुए थे । राजन्! आकाशकी मेखलारूप गंगाको भगवान् शिवने अपने ललाटदेशमें पड़ी हुई मोतियोंकी मालाकी भाँति धारण कर लिया ॥ ९ ३ ॥ सा बभूव विसर्पन्ती त्रिधा राजन् समुद्रगा ॥ १० ॥

फेनपुञ्जाकुलजला हंसानामिव पङ्क्तयः ।

क्वचिदाभोगकुटिला प्रस्खलन्ती क्वचित् क्वचित् ॥ ११ ॥

सा फेनपटसंवीता मत्तेव प्रमदाव्रजत् ।

क्वचित् सा तोयनिनदैर्नदन्ती नादमुत्तमम् ॥ १२ ॥

एवंप्रकारान् सुबहून् कुर्वती गगनाच्च्युता ।

पृथिवीतलमासाद्य भगीरथमथाब्रवीत् ॥ १३ ॥

महाराज! नीचे गिरती हुई फेनपुञ्जसे व्याप्त हुए जलवाली समुद्रगामिनी गंगा तीन धाराओंमें बँटकर हंसोंकी पंक्तियोंके समान सुशोभित होने लगी । वह मतवाली स्त्रीकी भाँति इस प्रकार आयी कि कहीं तो सर्प- शरीरकी भाँति कुटिल गतिसे बहती थी और कहीं - कहीं ऊँचेसे नीचे गिरकर चट्टानोंसे टकराती जाती थी एवं श्वेत वस्त्रोंके समान प्रतीत होनेवाले फेनपुंज उसे आच्छादित किये हुए थे । कहीं - कहीं वह जलके कल- कल नादसे उत्तम संगीत -सा गा रही थी । इस प्रकार अनेक रूप धारण करनेवाली गंगा आकाशसे गिरी और भूतलपर पहुँचकर राजा भगीरथसे बोली- ॥ १०–१३ ॥

दर्शयस्व महाराज मार्गं केन व्रजाम्यहम् ।

त्वदर्थमवतीर्णास्मि पृथिवीं पृथिवीपते ॥ १४ ॥

‘ महाराज! रास्ता दिखाओ मैं किस मार्गसे चलूँ? पृथ्वीपते! तुम्हारे लिये ही मैं इस भूतलपर उतरी हूँ ' ॥ १४ ॥

एतच्छ्रुत्वा वचो राजा प्रातिष्ठत भगीरथः ।

यत्र तानि शरीराणि सागराणां महात्मनाम् ॥ १५ ॥

प्लावनार्थं नरश्रेष्ठ पुण्येन सलिलेन च ।

पृष्ठ 769

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यह सुनकर राजा भगीरथ जहाँ महात्मा सगरपुत्रोंके शरीर पड़े थे, वहाँ गंगाजीके पावन जलसे उन शरीरोंको प्लावित करनेके लिये उस स्थानसे प्रस्थित हुए ॥ १५३ ॥

गङ्गाया धारणं कृत्वा हरो लोकनमस्कृतः ॥ १६ ॥

कैलासं पर्वतश्रेष्ठं जगाम त्रिदशैः सह ।

समासाद्य समुद्रं च गङ्गया सहितो नृपः ॥ १७ ॥

पूरयामास वेगेन समुद्रं वरुणालयम् ।

दुहितृत्वे च नृपतिर्गङ्गां समनुकल्पयत् ॥ १८ ॥

विश्ववन्दित भगवान् शंकर गंगाजीको सिरपर धारण करके देवताओंके साथ पर्वतश्रेष्ठ कैलासको चले गये । राजा भगीरथने गंगाजीके साथ समुद्रतटपर जाकर वरुणालय समुद्रको बड़े वेगसे भर दिया और गंगाजीको अपनी पुत्री बना लिया ॥ १६ – १८ ॥

पितॄणां चोदकं तत्र ददौ पूर्णमनोरथः ।

एतत् ते सर्वमाख्यातं गङ्गा त्रिपथगा यथा ॥ १ ९ ॥

तत्पश्चात् वहाँ उन्होंने पितरोंके लिये जलदान किया और पितरोंका उद्धार होनेसे वे सफल मनोरथ हो गये । युधिष्ठिर! जिस प्रकार गंगा त्रिपथगा (स्वर्ग, पाताल और पृथ्वीपर गमन करनेवाली) हुई, वह सब प्रसंग मैंने तुम्हें सुना दिया ॥ १ ९ ॥ पूरणार्थं समुद्रस्य पृथिवीमवतारिता । ( कालेयाश्च यथा राजंस्त्रिदशैर्विनिपातिताः ) समुद्रश्च यथा पीतः कारणार्थं महात्मना ॥ २० ॥

वातापिश्च यथा नीतः क्षयं स ब्रह्महा प्रभो ।

अगस्त्येन महाराज यन्मां त्वं परिपृच्छसि ॥ २१ ॥

महाराज! समुद्रको भरनेके लिये ही गंगा पृथ्वीपर उतारी गयी थी । राजन्! देवताओंने कालेय नामक दैत्योंको जिस प्रकार मार गिराया और कारणवश महात्मा अगस्त्यने जिस प्रकार समुद्र पी लिया तथा उन्होंने ब्राह्मणोंकी हत्या करनेवाले वातापि नामक दैत्यको जिस प्रकार नष्ट किया, वह सब प्रसंग, जिसके विषयमें तुमने पूछा था, मैंने बता दिया ॥ २०-२१ ॥ इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि लोमशतीर्थयात्रायामगस्त्यमाहात्म्यकथने नवाधिकशततमोऽध्यायः ॥ १० ९ ॥ इस प्रकारश्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत तीर्थयात्रापर्वमें लोमशतीर्थयात्राके प्रसंगमें अगस्त्यमाहात्म्यकथनविषयक एक सौ नवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १०९ ॥

(दाक्षिणात्य अधिक पाठका १ श्लोक मिलाकर कुल २२ श्लोक हैं )

पृष्ठ 770

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दशाधिकशततमोऽध्यायः नन्दा तथा कौशिकीका माहात्म्य, ऋष्यश्रृंग मुनिका उपाख्यान और उनको अपने राज्यमें लानेके लिये राजा लोमपादका प्रयत्न वैशम्पायन उवाच

ततः प्रयातः कौन्तेयः क्रमेण भरतर्षभ ।

नन्दामपरनन्दां च नद्यौ पापभयापहे ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं - भरतश्रेष्ठ! तदनन्तर कुन्तीनन्दन युधिष्ठिर क्रमशः आगे बढ़ने लगे । उन्होंने पाप और भयका निवारण करनेवाली नन्दा और अपरनन्दा — इन दो नदियोंकी यात्रा की ॥ १ ॥

पर्वतं स समासाद्य हेमकूटमनामयम् ।

अचिन्त्यानद्भुतान् भावान् ददर्श सुबहून् नृपः ॥ २ ॥

तत्पश्चात् रोग- शोकसे रहित हेमकूट पर्वतपर पहुँचकर राजा युधिष्ठिरने वहाँ बहुत -सी अचिन्त्य एवं अद्भुत बातें देखीं ॥ २ ॥

वाताबद्धा भवन्मेघा उपलाश्च सहस्रशः ।

नाशक्नुवंस्तमारोढुं विषण्णमनसो जनाः ॥ ३ ॥

वहाँ वायुका सहारा लिये बिना ही बादल उत्पन्न हो जाते और अपने - आप हजारों पत्थर ( ओले ) पड़ने लगते थे । जिनके मनमें खेद भरा होता था ऐसे मनुष्य उस पर्वतपर चढ़ नहीं सकते थे ॥ ३ ॥

वायुर्नित्यं ववौ तत्र नित्यं देवश्च वर्षति ।

स्वाध्यायघोषश्च तथा श्रूयते न च दृश्यते ॥ ४ ॥

सायं प्रातश्च भगवान् दृश्यते हव्यवाहनः ।

मक्षिकाश्चादशंस्तत्र तपसः प्रतिघातिकाः ॥ ५ ॥

निर्वेदो जायते तत्र गृहाणि स्मरते जनः ।

एवं बहुविधान् भावानद्भुतान् वीक्ष्य पाण्डवः ।

लोमशं पुनरेवाथ पर्यपृच्छत् तदद्भुतम् ॥ ६ ॥

वहाँ प्रतिदिन हवा चलती और रोज - रोज मेघ वर्षा करता था । वेदोंके स्वाध्यायकी ध्वनि तो सुनायी पड़ती; परंतु स्वाध्याय करनेवालेका दर्शन नहीं होता था । सायंकाल और प्रातःकाल भगवान् अग्निदेव प्रज्वलित दिखायी देते थे । तपस्यामें विघ्न डालनेवाली मक्खियाँ वहाँ लोगोंको डंक मारती रहती थीं, अतः वहाँ विरक्ति होती और लोग घरोंकी