02.Mahabharata Volume 2 — पृष्ठ 981–990

महाभारत — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 981–990

पृष्ठ 981

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पञ्चचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः घटोत्कच और उसके साथियोंकी सहायतासे पाण्डवोंका गन्धमादन पर्वत एवं बदरिकाश्रममें प्रवेश तथा बदरीवृक्ष, नर- नारायणाश्रम और गंगाका वर्णन युधिष्ठिरउवाच

धर्मज्ञो बलवान् शूरः सत्यो राक्षसपुङ्गवः ।

भक्तोऽस्मानौरसः पुत्रो भीम गृह्णातु मा चिरम् ॥ १ ॥

तव भीम सुतेनाहमति भीमपराक्रम ।

अक्षतः सह पाञ्चाल्या गच्छेयं गन्धमादनम् ॥ २ ॥

युधिष्ठिर बोले – अत्यन्त भयानक पराक्रम दिखानेवाले भीम! तुम्हारा औरस पुत्र राक्षसश्रेष्ठ घटोत्कच धर्मज्ञ, बलवान्, शूरवीर, सत्यवादी तथा हमलोगोंका भक्त है । यह हमें शीघ्र उठा ले चले । जिससे भीमसेन! तुम्हारे पुत्र घटोत्कचद्वारा शरीरसे किसी प्रकारकी क्षति उठाये बिना ही मैं द्रौपदीसहित गन्धमादन पर्वतपर पहुँच जाऊँ ॥ १-२ ॥ वैशम्पायन उवाच

भ्रातुर्वचनमाज्ञाय भीमसेनो घटोत्कचम् ।

आदिदेश नरव्याघ्रस्तनयं शत्रुकर्शनम् ॥ ३ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं - राजन्! भाईकी इस आज्ञाको शिरोधार्य करके नरश्रेष्ठ भीमसेनने अपने पुत्र शत्रुसूदन घटोत्कचको इस प्रकार आज्ञा दी ॥ ३ ॥

भीमसेन उवाच

हैडिम्बेय परिश्रान्ता तव मातापराजित ।

त्वं च कामगमस्तात बलवान् वह तां खग ॥ ४ ॥

भीमसेन बोले — अपराजित और आकाशचारी हिडिम्बानन्दन! तुम्हारी माता द्रौपदी बहुत थक गयी है । तुम बलवान् एवं इच्छानुसार सर्वत्र जानेमें समर्थ हो; अतः इसे ( आकाशमार्गसे ) ले चलो ॥ ४ ॥

स्कन्धमारोप्य भद्रं ते मध्येऽस्माकं विहायसा ।

गच्छ नीचिकया गत्या यथा चैनां न पीडयेः ॥ ५ ॥

बेटा! तुम्हारा कल्याण हो । इसे कंधेपर बैठाकर हम लोगोंके बीच रहते हुए आकाशमार्गसे इस प्रकार धीरे- धीरे ले चलो, जिससे इसे तनिक भी कष्ट न हो ॥ ५ ॥

घटोत्कच उवाच

पृष्ठ 982

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धर्मराजं च धौम्यं च कृष्णां च यमजौ तथा ।

एकोऽप्यहमलं वोढुं किमुताद्य सहायवान् ॥ ६ ॥

अन्ये च शतशः शूरा विहङ्गाः कामरूपिणः ।

सर्वान् वो ब्राह्मणैः सार्धं वक्ष्यन्ति सहितानघ ॥ ७ ॥

घटोत्कच बोला — अनघ! मैं अकेला रहूँ तो भी धर्मराज युधिष्ठिर, पुरोहित धौम्य, माता द्रौपदी और चाचा नकुल सहदेवको भी वहन कर सकता हूँ; फिर आज तो मेरे और भी बहुत - से संगी -साथी मौजूद हैं । इस दशामें आप लोगोंको ले चलना कौन बड़ी बात है? मेरे सिवा दूसरे भी सैकड़ों शूरवीर, आकाशचारी और इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले राक्षस मेरे साथ हैं । वे ब्राह्मणोंसहित आप सब लोगोंको एक साथ वहन करेंगे ॥ ६-७ ॥

एवमुक्त्वा ततः कृष्णामुवाह स घटोत्कचः ।

पाण्डूनां मध्यगो वीरः पाण्डवानपि चापरे ॥ ८ ॥

ऐसा कहकर वीर घटोत्कच तो द्रौपदीको लेकर पाण्डवोंके बीचमें चलने लगा और दूसरे राक्षस पाण्डवोंको भी ( अपने - अपने कंधेपर बिठाकर ) ले चले ॥ ८ ॥

लोमशः सिद्धमार्गेण जगामानुपमद्युतिः ।

स्वेनैव स प्रभावेण द्वितीय इव भास्करः ॥ ९ ॥

पृष्ठ 983

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अनुपम तेजस्वी महर्षि लोमश अपने ही प्रभावसे दूसरे सूर्यकी भाँति सिद्धमार्ग अर्थात् आकाशमार्गसे चलने लगे ॥ ९ ॥

ब्राह्मणांश्चापि तान् सर्वान् समुपादाय राक्षसाः ।

नियोगाद् राक्षसेन्द्रस्य जग्मुर्भीमपराक्रमाः ॥ १० ॥

राक्षसराज घटोत्कचकी आज्ञासे अन्य सब ब्राह्मणोंको भी अपने- अपने कंधेपर चढ़ाकर वे भयंकर पराक्रमी राक्षस साथ - साथ चलने लगे ॥ १० ॥

एवं सुरमणीयानि वनान्युपवनानि च ।

आलोकयन्तस्ते जग्मुर्विशालां बदरीं प्रति ॥ ११ ॥

इस प्रकार अत्यन्त रमणीय वन और उपवनोंका अवलोकन करते हुए वे सब लोग विशाला बदरी ( बदरिकाश्रम तीर्थ ) की ओर प्रस्थित हुए ॥ ११ ॥

ते त्वाशुगतिभिर्वीरा राक्षसैस्तैर्महाजवैः ।

उह्यमाना ययुः शीघ्रं दीर्घमध्वानमल्पवत् ॥ १२ ॥

उन महावेगशाली और तीव्र गतिसे चलनेवाले राक्षसोंपर सवार हो वीर पाण्डवोंने उस विशाल मार्गको इतनी शीघ्रतासे तय कर लिया मानो वह बहुत छोटा हो ॥ १२ ॥

देशान् म्लेच्छजनाकीर्णान् नानारत्नाकरायुतान् ।

ददृशुर्गिरिपादांश्च नानाधातुसमाचितान् ॥ १३ ॥

विद्याधरसमाकीर्णान् युतान् वानरकिन्नरैः ।

तथा किंपुरुषैश्चैव गन्धर्वैश्च समन्ततः ॥ १४ ॥

उस यात्रामें उन्होंने म्लेच्छोंसे भरे हुए बहुत- से ऐसे देश देखे जो नाना प्रकारकी रत्नोंकी खानोंसे युक्त थे । वहाँ उन्हें नाना प्रकारके धातुओंसे व्याप्त कितने ही शाखापर्वत दृष्टिगोचर हुए । उन पर्वतीय शिखरोंपर बहुत - से विद्याधर, वानर, किन्नर, किम्पुरुष और गन्धर्व चारों ओर निवास करते थे ॥ १३-१४ ॥

मयूरैश्चमरैश्चैव वानरै रुरुभिस्तथा ।

वराहैर्गवयैश्चैव महिषैश्च समावृतान् ॥ १५ ॥

मोर, चमरी गाय, बंदर, रुरुमृग, सूअर, गवय* और भैंस आदि पशु वहाँ विचर रहे थे ॥ १५ ॥

नदीजालसमाकीर्णान् नानापक्षियुतान् बहून् ।

नानाविधमृगैर्जुष्टान् वानरैश्चोपशोभितान् ॥ १६ ॥

वहाँ सब ओर बहुत - सी नदियाँ बह रही थीं । अनेक प्रकारके असंख्य पक्षी विचर रहे थे । वह स्थान नाना प्रकारके मृगोंसे सेवित और वानरोंसे सुशोभित था ॥ १६ ॥

समदैश्चापि विहगैः पादपैरन्वितास्तथा ।

तेऽवतीर्य बहुन् देशानुत्तमर्च्छिसमन्वितान् ॥ १७ ॥

ददृशुर्विविधाश्चर्यं कैलासं पर्वतोत्तमम् ।

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तस्याभ्याशे तु ददृशुर्नरनारायणाश्रमम् ॥ १८ ॥

उपेतं पादपैर्दिव्यैः सदापुष्पफलोपगैः ।

ददृशुस्तां च बदरीं वृत्तस्कन्धां मनोरमाम् ॥ १ ९ ॥

स्निग्धामविरलच्छायां श्रिया परमया युताम् ।

पत्रैः स्निग्धैरविरलैरुपेतां मृदुभिः शुभाम् ॥ २० ॥

वह पर्वतीय प्रदेश मतवाले विहंगों और अगणित वृक्षोंसे युक्त था। पाण्डवोंने उत्तम समृद्धिसे सम्पन्न बहुत- से देशोंको लाँघकर भाँति- भाँतिके आश्चर्यजनक दृश्योंसे सुशोभित पर्वतश्रेष्ठ कैलासका दर्शन किया । उसीके निकट उन्हें भगवान् नर- नारायणका आश्रम दिखायी दिया, जो नित्य फल- फूल देनेवाले दिव्य वृक्षोंसे अलंकृत था । वहीं वह विशाल एवं मनोरम बदरी भी दिखायी दी, जिसका स्कन्ध ( तना ) गोल था । वह वृक्ष बहुत ही चिकना, घनी छायासे युक्त और उत्तम शोभासे सम्पन्न था । उस शुभ वृक्षके सघन कोमल पत्ते भी बहुत चिकने थे ॥ १७–२० ॥

विशालशाखां विस्तीर्णामतिद्युतिसमन्विताम् ।

फलैरुपचितैर्दिव्यैराचितां स्वादुभिर्भृशम् ॥ २१ ॥

मधुस्रवैः सदा दिव्यां महर्षिगणसेविताम् ।

मदप्रमुदितैर्नित्यं नानाद्विजगणैर्युताम् ॥ २२ ॥

उसकी डालियाँ बहुत बड़ी और बहुत दूरतक फैली हुई थीं । वह वृक्ष अत्यन्त कान्तिसे सम्पन्न था । उसमें अत्यन्त स्वादिष्ट दिव्य फल अधिक मात्रामें लगे हुए थे । उन फलोंसे मधुकी धारा बहती रहती थी । उस दिव्य वृक्षके नीचे महर्षियोंका समुदाय निवास करता था । वह वृक्ष सदा मदोन्मत्त एवं आनन्दविभोर पक्षियोंसे परिपूर्ण रहता था ॥ २१-२२ ॥

अदंशमशके देशे बहुमूलफलोदके ।

नीलशाद्वलसंच्छन्ने देवगन्धर्वसेविते ॥ २३ ॥

सुसमीकृतभूभागे स्वभावविहिते शुभे ।

जातां हिममृदुस्पर्शे देशेऽपहतकण्टके ॥ २४ ॥

उस प्रदेशमें डाँस और मच्छरोंका नाम नहीं था । फल - मूल और जलकी बहुतायत थी । वहाँकी भूमि हरी - हरी घाससे ढकी हुई थी । देवता और गन्धर्व वहाँ वास करते थे । उस प्रदेशका भूभाग स्वभावतः समतल और मंगलमय था । उस हिमाच्छादित भूमिका स्पर्श अत्यन्त मृदु था । उस देशमें काँटोंका कहीं नाम नहीं था । ऐसे पावन प्रदेशमें वह विशाल बदरी वृक्ष उत्पन्न हुआ था ॥ २३-२४ ॥

तामुपेत्य महात्मानः सह तैर्ब्राह्मणर्षभैः ।

अवतेरुस्ततः सर्वे राक्षसस्कन्धतः शनैः ॥ २५ ॥

उसके पास पहुँचकर ये सब महात्मा पाण्डव उन श्रेष्ठ ब्राह्मणोंके साथ राक्षसोंके कंधोंसे धीरे - धीरे उतरे ॥ २५ ॥

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ततस्तमाश्रमं रम्यं नरनारायणाश्रितम् ।

ददृशुः पाण्डवा राजन् सहिता द्विजपुङ्गवैः ॥ २६ ॥

राजन्! तदनन्तर ब्राह्मणोंसहित पाण्डवोंने एक साथ भगवान् नर-नारायणके उस रमणीय स्थानका दर्शन किया ॥ २६ ॥

तमसा रहितं पुण्यमनामृष्टं रवेः करैः ।

क्षुत्तृट्शीतोष्णदोषैश्च वर्जितं शोकनाशनम् ॥ २७ ॥

जो अन्धकार एवं तमोगुणसे रहित तथा पुण्यमय था । ( वृक्षोंकी सघनताके कारण) सूर्यकी किरणें उसका स्पर्श नहीं कर पाती थीं । वह आश्रम भूख, प्यास, सर्दी और गरमी आदि दोषोंसे रहित और सम्पूर्ण शोकोंका नाश करनेवाला था ॥ २७ ॥

महर्षिगणसम्बाधं ब्राह्मया लक्ष्म्या समन्वितम् ।

दुष्प्रवेशं महाराज नरैर्धर्मबहिष्कृतैः ॥ २८ ॥

महाराज! वह पावन तीर्थ महर्षियोंके समुदायसे भरा हुआ और ब्राह्मी श्रीसे सुशोभित था । धर्महीन मनुष्योंका वहाँ प्रवेश पाना अत्यन्त कठिन था ॥ २८ ॥

बलिहोमार्चितं दिव्यं सुसम्मृष्टानुलेपनम् ।

दिव्यपुष्पोपहारैश्च सर्वतोऽभिविराजितम् ॥ २ ९ ॥

वह दिव्य आश्रम देव- पूजा और होमसे अर्चित था । उसे झाड़ -बुहारकर अच्छी तरह लीपा गया था । दिव्य पुष्पोंके उपहार सब ओरसे उसकी शोभा बढ़ा रहे थे ॥ २ ९ ॥

विशालैरग्निशरणैः स्रुग्भाण्डैराचितं शुभैः ।

महद्भिस्तोयकलशैः कठिनैश्चोपशोभितम् ॥ ३० ॥

विशाल अग्निहोत्रगृहों और स्रुक्, स्रुवा आदि सुन्दर यज्ञपात्रोंसे व्याप्त वह पावन आश्रम जलसे भरे हुए बड़े - बड़े कलशों और बर्तनोंसे सुशोभित था ॥ ३० ॥

शरण्यं सर्वभूतानां ब्रह्मघोषनिनादितम् ।

दिव्यमाश्रयणीयं तमाश्रमं श्रमनाशनम् ॥ ३१ ॥

वह सब प्राणियोंके शरण लेनेयोग्य था । वहाँ वेदमन्त्रोंकी ध्वनि गूँजती रहती थी । वह दिव्य आश्रम सबके रहनेयोग्य और थकावटको दूर करनेवाला था ॥

श्रिया युतमनिर्देश्यं देवचर्योपशोभितम् ।

फलमूलाशनैर्दान्तैश्चारुकृष्णाजिनाम्बरैः ॥ ३२ ॥

सूर्यवैश्वानरसमैस्तपसा भावितात्मभिः ।

महर्षिभिर्मोक्षपरैर्यतिभिर्नियतेन्द्रियैः ॥ ३३ ॥

ब्रह्मभूतैर्महाभागैरुपेतं ब्रह्मवादिभिः ।

सोऽभ्यगच्छन्महातेजास्तानृषीन् प्रयतः शुचिः ॥ ३४ ॥

भ्रातृभिः सहितो धीमान् धर्मपुत्रो युधिष्ठिरः ।

दिव्यज्ञानोपपन्नास्ते दृष्ट्वा प्राप्तं युधिष्ठिरम् ॥ ३५ ॥

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अभ्यगच्छन्त सुप्रीताः सर्व एव महर्षयः ।

आशीर्वादान् प्रयुञ्जानाः स्वाध्यायनिरता भृशम् ॥ ३६ ॥

प्रीतास्ते तस्य सत्कारं विधिना पावकोपमाः ।

उपाजहुश्च सलिलं पुष्पमूलफलं शुचि ॥ ३७ ॥

वह शोभासम्पन्न आश्रम अवर्णनीय था । देवोचित कार्योंका अनुष्ठान उसकी शोभा बढ़ाता था । उस आश्रममें फल-मूल खाकर रहनेवाले, कृष्णमृगचर्मधारी, जितेन्द्रिय, अग्नि तथा सूर्यके समान तेजस्वी और तपःपूत अन्तःकरणवाले महर्षि, मोक्षपरायण, इन्द्रिय-संयमी संन्यासी तथा महान् सौभाग्यशाली ब्रह्मवादी ब्रह्मभूत महात्मा निवास करते थे । महातेजस्वी, बुद्धिमान् धर्मपुत्र युधिष्ठिर पवित्र और एकाग्रचित्त होकर भाइयोंके साथ उन आश्रमवासी महर्षियोंके पास गये । युधिष्ठिरको आश्रममें आया देख वे दिव्यज्ञानसम्पन्न सब महर्षि अत्यन्त प्रसन्न होकर उनसे मिले और उन्हें अनेक प्रकारके आशीर्वाद देने लगे । सदा वेदोंके स्वाध्यायमें तत्पर रहनेवाले उन अग्नितुल्य तेजस्वी महात्माओंने प्रसन्न होकर युधिष्ठिरका विधिपूर्वक सत्कार किया और उनके लिये पवित्र फल-मूल, पुष्प और जल आदि सामग्री प्रस्तुत की ॥ ३२–३७ ॥

स तैः प्रीत्याथ सत्कारमुपनीतं महर्षिभिः ।

प्रयतः प्रतिगृह्याथ धर्मराजो युधिष्ठिरः ॥ ३८ ॥

महर्षियोंद्वारा प्रेमपूर्वक प्रस्तुत किये हुए उस आतिथ्य सत्कारको शुद्ध हृदयसे ग्रहण करके धर्मराज युधिष्ठिर बड़े प्रसन्न हुए ॥ ३८ ॥

तं शक्रसदनप्रख्यं दिव्यगन्धं मनोरमम् ।

प्रीतः स्वर्गोपमं पुण्यं पाण्डवः सह कृष्णया ॥ ३ ९ ॥

विवेश शोभया युक्तं भ्रातृभिश्च सहानघ ।

ब्राह्मणैर्वेदवेदाङ्गपारगैश्च सहस्रशः ॥ ४० ॥

उन्होंने भाइयों तथा द्रौपदीके साथ इन्द्रभवनके समान मनोरम और दिव्य सुगन्धसे परिपूर्ण उस स्वर्ग - सदृश शोभाशाली पुण्यमय नर- नारायण आश्रममें प्रवेश किया । अनघ! उनके साथ ही वेद - वेदांगोंके पारंगत विद्वान् सहस्रों ब्राह्मण भी प्रविष्ट हुए ॥ ३ ९ -४० ॥

तत्रापश्यत धर्मात्मा देवदेवर्षिपूजितम् ।

नरनारायणस्थानं भागीरथ्योपशोभितम् ॥ ४१ ॥

धर्मात्मा युधिष्ठिरने वहाँ भगवान् नर- नारायणका स्थान देखा, जो देवताओं और देवर्षियोंसे पूजित तथा भागीरथी* गंगासे सुशोभित था ॥ ४१ ॥

पश्यन्तस्ते नरव्याघ्रा रेमिरे तत्र पाण्डवाः ।

मधुस्रवफलं दिव्यं ब्रह्मर्षिगणसेवितम् ॥ ४२ ॥

तदुपेत्य महात्मानस्तेऽवसन् ब्राह्मणैः सह ।

मुदा युक्ता महात्मानो रेमिरे तत्र ते तदा ॥ ४३ ॥

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नरश्रेष्ठ पाण्डव उस स्थानका दर्शन करते हुए वहाँ सब ओर सुखपूर्वक घूमने -फिरने लगे । ब्रह्मर्षियों- द्वारा सेवित जो अपने फलोंसे मधुकी धारा बहानेवाला दिव्य वृक्ष था, उसके निकट जाकर महात्मा पाण्डव ब्राह्मणोंके साथ वहाँ निवास करने लगे । उस समय वे सब महात्मा बड़ी प्रसन्नताके साथ वहाँ सुखपूर्वक रहने लगे ॥ ४२-४३ ॥

आलोकयन्तो मैनाकं नानाद्विजगणायुतम् ।

हिरण्यशिखरं चैव तच्च बिन्दुसरः शिवम् ॥ ४४ ॥

तस्मिन् विहरमाणाश्च पाण्डवाः सह कृष्णया ।

मनोज्ञे काननवरे सर्वर्तुकुसुमोज्ज्वले ॥ ४५ ॥

वहाँ सुवर्णमय शिखरोंसे सुशोभित और अनेक प्रकारके पक्षियोंसे युक्त मैनाक पर्वत था । वहीं शीतल जलसे सुशोभित बिन्दुसर नामक तालाब था । वह सब देखते हुए पाण्डव द्रौपदीके साथ उस मनोहर उत्तम वनमें विचरने लगे, जो सभी ऋतुओंके फूलोंसे सुशोभित हो रहा था ॥ ४४-४५ ॥

पादपैः पुष्पविकचैः फलभारावनामिभिः ।

शोभिते सर्वतो रम्यैः पुंस्कोकिलगणायुतैः ॥ ४६ ॥

उस वनमें सब ओर सुरम्य वृक्ष दिखायी देते थे, जो विकसित फूलोंसे युक्त थे । उनकी शाखाएँ फलोंके बोझसे झुकी हुई थीं । कोकिल पक्षियोंसे युक्त बहुसंख्यक वृक्षोंके कारण उस वनकी बड़ी शोभा होती थी ॥ ४६ ॥

स्निग्धपत्रैरविरलैः शीतच्छायैर्मनोरमैः ।

सरांसि च विचित्राणि प्रसन्नसलिलानि च ॥ ४७ ॥

उपर्युक्त वृक्षोंके पत्ते चिकने और सघन थे । उनकी छाया शीतल थी । वे मनको बड़े ही रमणीय लगते थे । उस वनमें कितने ही विचित्र सरोवर भी थे, जो स्वच्छ जलसे भरे हुए थे ॥ ४७ ॥

कमलैः सोत्पलैश्चैव भ्राजमानानि सर्वशः ।

पश्यन्तश्चारुरूपाणि रेमिरे तत्र पाण्डवाः ॥ ४८ ॥

खिले हुए उत्पल और कमल सब ओरसे उनकी शोभाका विस्तार करते थे । उन मनोहर सरोवरोंका दर्शन करते हुए पाण्डव वहाँ सानन्द विचरने लगे ॥ ४८ ॥

पुण्यगन्धःसुखस्पर्शो ववौ तत्र समीरणः ।

ह्लादयन् पाण्डवान् सर्वान् द्रौपद्या सहितान् प्रभो ॥ ४ ९ ॥

जनमेजय! गन्धमादन पर्वतपर पवित्र सुगन्धसे वासित सुखदायिनी वायु चल रही थी, जो द्रौपदीसहित पाण्डवोंको आनन्द -निमग्न किये देती थी ॥ ४ ९ ॥

भागीरथीं सुतीर्थं च शीतां विमलपङ्कजाम् ।

मणिप्रवालप्रस्तारां पादपैरुपशोभिताम् ॥ ५० ॥

दिव्यपुष्पसमाकीर्णां मनः प्रीतिविवर्धिनीम् ।

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वीक्षमाणा महात्मानो विशालां बदरीमनु ॥ ५१ ॥

तस्मिन् देवर्षिचरिते देशे परमदुर्गमे ।

भागीरथीपुण्यजले तर्पयांचक्रिरे तदा ॥ ५२ ॥

देवानृषींश्च कौन्तेयाः परमं शौचमास्थिताः ।

तत्र ते तर्पयन्तश्च जपन्तश्च कुरूद्वहाः ॥ ५३ ॥

ब्राह्मणैः सहिता वीरा ह्यवसन् पुरुषर्षभाः ।

कृष्णायास्तत्र पश्यन्तः क्रीडितान्यमरप्रभाः ।

विचित्राणि नरव्याघ्रा रेमिरे तत्र पाण्डवाः ॥ ५४ ॥

पूर्वोक्त विशाल बदरीवृक्षके समीप उत्तम तीर्थोंसे सुशोभित शीतल जलवाली भागीरथी गंगा बह रही थी, उसमें सुन्दर कमल खिले हुए थे । उसके घाट मणियों और मूँगोंसे आबद्ध थे । अनेक प्रकारके वृक्ष उसके तटप्रान्तकी शोभा बढ़ा रहे थे । वह दिव्य पुष्पोंसे आच्छादित हो हृदयके हर्षोल्लासकी वृद्धि कर रही थी । उसका दर्शन करके महात्मा पाण्डवोंने उस अत्यन्त दुर्गम देवर्षिसेवित प्रदेशमें भागीरथीके पवित्र जलमें स्थित हो परम पवित्रताके साथ देवताओं, ऋषियों तथा पितरोंका तर्पण किया । इस प्रकार प्रतिदिन तर्पण और जप आदि करते हुए वे पुरुषश्रेष्ठ कुरुकुल- शिरोमणि वीर पाण्डव वहाँ ब्राह्मणोंके साथ रहने लगे । देवताओंके समान कान्तिमान् नरश्रेष्ठ पाण्डव वहाँ द्रौपदीकी विचित्र क्रीड़ाएँ देखते हुए सुखपूर्वक रमण करने लगे ॥ ५०–५४ ॥ इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि लोमशतीर्थयात्रायां गन्धमादनप्रवेशे पञ्चचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १४५ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत तीर्थयात्रापर्वमें लोमशतीर्थयात्राके प्रसंगमें गन्धमादनप्रवेशविषयक एक सौ पैंतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १४५ ॥

गौके समान एक प्रकारका जंगली पशु, जिसके गलकंबल नहीं होता । * हिमालयपर गिरनेके बाद भागीरथी गंगा अनेक धाराओंमें विभक्त होकर बहने लगीं । उनकी सीधी धारा तो गंगोत्तरीसे देवप्रयाग होती हुई हरिद्वार आयी है और अन्य धाराएँ अन्य मार्गोंसे प्रवाहित होकर पुनः गंगामें ही मिल गयी हैं । उन्हींकी जो धारा कैलास और बदरिकाश्रमके मार्गसे बहती आयी है, उसका नाम अलकनन्दा है । वह देवप्रयागमें आकर सीधी धारामें मिल गयी है । इस प्रकार यद्यपि नर- नारायणका स्थान अलकनन्दाके ही तटपर है, तथापि वह मूलतः भागीरथीसे अभिन्न ही है; इसीलिये यहाँ मूलमें ' भागीरथी ' नामसे ही उसका उल्लेख किया गया है ।

पृष्ठ 989

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षट्चत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः भीमसेनका सौगन्धिक कमल लानेके लिये जाना और कदलीवनमें उनकी हनुमानजीसे भेंट वैशम्पायन उवाच

तत्र ते पुरुषव्याघ्राः परमं शौचमास्थिताः ।

षड्रात्रमवसन् वीरा धनंजयदिदृक्षवः ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! वे पुरुषसिंह वीर पाण्डव अर्जुनके दर्शनके लिये उत्सुक हो वहाँ परम पवित्रताके साथ छः रात रहे ॥ १ ॥

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Gminy द्रौपदीका भीमसेनको सौगन्धिक पुष्प भेंट करके वैसे ही और पुष्पलानेका आग्रह ततःपूर्वोत्तरे वायुः प्लवमानो यदृच्छया ।