श्रीगणेशाय नमः।

महाभारत — खण्ड २ — पृष्ठ 991–1000

महाभारत — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 991–1000

पृष्ठ 991

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सहस्रपत्रमर्काभं दिव्यं पद्ममुपाहरत् ॥ २ ॥

तदनन्तर ईशानकोणकी ओरसे अकस्मात् वायु चली । उसने सूर्यके समान तेजस्वी एक दिव्य सहस्रदल कमल लाकर वहाँ डाल दिया ॥ २ ॥

तदवैक्षत पाञ्चाली दिव्यगन्धं मनोरमम् ।

अनिलेनाहृतं भूमौ पतितं जलजं शुचि ॥ ३ ॥

तच्छुभा शुभमासाद्य सौगन्धिकमनुत्तमम् ।

अतीव मुदिता राजन् भीमसेनमथाब्रवीत् ॥ ४ ॥

जनमेजय! वह कमल बड़ा मनोरम था, उससे दिव्य सुगन्ध फैल रही थी । शुभलक्षणा द्रौपदीने उसे देखा और वायुके द्वारा लाकर पृथ्वीपर डाले हुए उस पवित्र, शुभ एवं परम उत्तम सौगन्धिक कमलके पास पहुँचकर अत्यन्त प्रसन्न हो भीमसेनसे इस प्रकार कहा ॥ ३-४ ॥

पश्य दिव्यं सुरुचिरं भीम पुष्पमनुत्तमम् ।

गन्धसंस्थानसम्पन्नं मनसो मम नन्दनम् ॥ ५ ॥

इदं च धर्मराजाय प्रदास्यामि परंतप ।

हरेदं मम कामाय काम्यके पुनराश्रमे ॥ ६ ॥

' भीम! देखो तो, यह दिव्य पुष्प कितना अच्छा और कैसा सुन्दर है! मानो सुगन्ध ही इसका स्वरूप है । यह मेरे मनको आनन्द प्रदान कर रहा है । परंतप! मैं इसे धर्मराजको भेंट करूँगी । तुम मेरी इच्छाकी पूर्तिके लिये काम्यकवनके आश्रममें इसे ले चलो ' ॥ ५-६ ॥

यदि तेऽहं प्रिया पार्थ बहूनीमान्युपाहर ।

तान्यहं नेतुमिच्छामि काम्यकं पुनराश्रमम् ॥ ७ ॥

‘ कुन्तीनन्दन! यदि मेरे ऊपर तुम्हारा ( विशेष ) प्रेम है, तो मेरे लिये ऐसे ही बहुत - से फूल ले आओ । मैं इन्हें काम्यक वनमें अपने आश्रमपर ले चलना चाहती हूँ' ॥ ७ ॥

एवमुक्त्वा शुभापाङ्गी भीमसेनमनिन्दिता ।

जगाम पुष्पमादाय धर्मराजाय तत् तदा ॥ ८ ॥

उस समय मनोहर नेत्रप्रान्तवाली अनिन्द्य सुन्दरी ( सती - साध्वी ) द्रौपदी भीमसेनसे ऐसा कहकर और वह पुष्प लेकर धर्मराज युधिष्ठिरको देनेके लिये चली गयी ॥ ८ ॥

अभिप्रायं तु विज्ञाय महिष्याः पुरुषर्षभः ।

प्रियायाः प्रियकामः स प्रायाद् भीमो महाबलः ॥ ९ ॥

पुरुषशिरोमणि महाबली भीम अपनी प्यारी रानीके मनोभावको जानकर उसका प्रिय करनेकी इच्छासे वहाँसे चल दिये ॥ ९ ॥

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वातं तमेवाभिमुखो यतस्तत् पुष्पमागतम् ।

आजिहीर्षुर्जगामाशु स पुष्पाण्यपराण्यपि ॥ १० ॥

वे उसी तरहके और भी फूल ले आनेकी अभिलाषासे तुरंत पूर्वोक्त वायुकी ओर मुख करके उसी ईशान कोणमें आगे बढ़े, जिधरसे वह फूल आया था ॥ १० ॥

रुक्मपृष्ठं धनुर्गृह्य शरांश्चाशीविषोपमान् ।

मृगराडिव संक्रुद्धः प्रभिन्न इव कुञ्जरः ॥ ११ ॥

उन्होंने हाथमें वह अपना धनुष ले लिया जिसके पृष्ठभागमें सुवर्ण जड़ा हुआ था । साथ ही विषधर सर्पोंके समान भयंकर बाण भी तरकसमें रख लिये । फिर क्रोधमें भरे हुए सिंह तथा मदकी धारा बहानेवाले मतवाले गजराजकी भाँति निर्भय होकर आगे बढ़े ॥ ११ ॥

ददृशुः सर्वभूतानि महाबाणधनुर्धरम् ।

न ग्लानिर्न च वैक्लव्यं न भयं न च सम्भ्रमः ॥ १२ ॥

कदाचिज्जुषते पार्थमात्मजं मातरिश्वनः । महान् धनुष- बाण लेकर जाते हुए भीमसेनको उस समय सब प्राणियोंने देखा । उन वायुपुत्र कुन्ती- कुमारको कभी ग्लानि, विकलता, भय अथवा घबराहट नहीं होती थी ॥ १२ ३ ॥ द्रौपद्याः प्रियमन्विच्छन् स बाहुबलमाश्रितः ॥ १३ ॥

व्यपेतभयसम्मोहः शैलमभ्यपतद् बली ।

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स ते द्रुमलतागुल्मच्छन्नं नीलशिलातलम् ॥ १४ ॥

गिरिं चचारारिहरः किन्नराचरितं शुभम् ।

नानावर्णधरैश्चित्रं धातुद्रुममृगाण्डजैः ॥ १५ ॥

द्रौपदीका प्रिय करनेकी इच्छासे अपने बाहुबलका भरोसा करके भय और मोहसे रहित बलवान् भीमसेन सामनेके शैल- शिखरपर चढ़ गये । वह पर्वत वृक्षों, लताओं और झाड़ियोंसे आच्छादित था । उसकी शिलाएँ नीले रंगकी थीं । वहाँ किन्नरलोग भ्रमण करते थे । शत्रुसंहारी भीमसेन उस सुन्दर पर्वतपर विचरने लगे । बहुरंगे धातुओं, वृक्षों, मृगों और पक्षियोंसे उसकी विचित्र शोभा हो रही थी ॥ १३–१५ ॥

सर्वभूषणसम्पूर्णं भूमेर्भुजमिवोच्छ्रितम् ।

सर्वत्र रमणीयेषु गन्धमादनसानुषु ॥ १६ ॥

सक्तचक्षुरभिप्रायान् हृदयेनानुचिन्तयन् ।

पुंस्कोकिलनिनादेषु षट्पदाचरितेषु च ॥ १७ ॥

बद्धश्रोत्रमनश्चक्षुर्जगामामितविक्रमः । वह देखनेमें ऐसा जान पड़ता था मानो पृथिवीके समस्त आभूषणोंसे विभूषित ऊँचे उठी हुई भुजा हो । गन्धमादनके शिखर सब ओरसे रमणीय थे । वहाँ कोयल पक्षियोंकी शब्दध्वनि हो रही थी और झुंड के झुंड भौंरे मड़रा रहे थे । भीमसेन उन्हींमें आँखें गड़ाये मन- ही- मन अभिलषित कार्यका चिन्तन करते जाते थे । अमितपराक्रमी भीमके कान, नेत्र और मन उन्हीं शिखरोंमें अटके रहे अर्थात् उनके कान वहाँके विचित्र शब्दोंको सुननेमें लग गये; आँखें वहाँके अद्भुत दृश्योंको निहारने लगीं और मन वहाँकी अलौकिक विशेषताके विषयमें सोचने लगा और वे अपने गन्तव्य स्थानकी ओर अग्रसर होते चले गये ॥ १६-१७ ३ ॥ आजिघ्रन् स महातेजाः सर्वर्तुकुसुमोद्भवम् ॥ १८ ॥

गन्धमुद्धतमुद्दामो वने मत्त इव द्विपः ।

वीज्यमानः सुपुण्येन नानाकुसुमगन्धिना ॥ १ ९ ॥

पितुः संस्पर्शशीतेन गन्धमादनवायुना ।

ह्रियमाणश्रमः पित्रा सम्प्रहृष्टतनूरुहः ॥ २० ॥

वे महातेजस्वी कुन्तीकुमार सभी ऋतुओंके फूलोंके उत्कट सुगन्धका आस्वादन करते हुए वनमें उद्दामगतिसे विचरनेवाले मदोन्मत्त गजराजकी भाँति चले जा रहे थे । नाना प्रकारके कुसुमोंसे सुवासित गन्धमादनकी परम पवित्र वायु उन्हें पंखा झल रही थी । जैसे पिताको पुत्रका स्पर्श शीतल एवं सुखद जान पड़ता है, वैसा ही सुख भीमसेनको उस पर्वतीय वायुके स्पर्शसे मिल रहा था । उनके पिता पवनदेव उनकी सारी थकावट हर लेते थे । उस समय हर्षातिरेकसे भीमके शरीरमें रोमांच हो रहा था ॥ १८–२० ॥ स यक्षगन्धर्वसुरब्रह्मर्षिगणसेवितम् ।

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विलोकयामास तदा पुष्पहेतोररिंदमः ॥ २१ ॥

शत्रुदमन भीमसेनने उस समय ( पूर्वोक्त पुष्पकी प्राप्तिके लिये एक बार) यक्ष, गन्धर्व, देवता और ब्रह्मर्षियोंसे सेवित उस विशाल पर्वतपर ( सब ओर) दृष्टिपात किया ॥ २१ ॥

विषमच्छदैरचितैरनुलिप्त इवाङ्गुलैः ।

वलिभिर्धातुविच्छेदैः काञ्चनाञ्जनराजतैः ।

सपक्षमिव नृत्यन्तं पार्श्वलग्नैः पयोधरैः ॥ २२ ॥

उस समय अनेक धातुओंसे रँगे हुए सप्तपर्ण (छितवन) के पत्तोंद्वारा उनके ललाटमें विभिन्न धातुओंके काले, पीले और सफेद रंग लग गये थे, जिससे ऐसा जान पड़ता था मानो अँगुलियोंद्वारा त्रिपुण्ड्र चन्दन लगाया गया हो । उस पर्वत- शिखरके उभय पार्श्वमें लगे हुए मेघोंसे उसकी ऐसी शोभा हो रही थी मानो वह पुनः पंखधारी होकर नृत्य कर रहा है ॥ २२ ॥

मुक्ताहारैरिव चितं च्युतैः प्रस्रवणोदकैः ।

अभिरामदरीकुञ्जनिर्झरोदककन्दरम् ॥ २३ ॥

निरन्तर झरनेवाले झरनोंके जल उस पहाड़के कण्ठदेशमें अवलम्बित मोतियोंके हार- से प्रतीत हो रहे थे । उस पर्वतकी गुफा, कुंज, निर्झर, सलिल और कन्दराएँ सभी मनोहर थे ॥ २३ ॥

अप्सरोनूपुररवैः प्रनृत्तवरबर्हिणम् ।

दिग्वारणविषाणाग्रैर्धृष्टोपलशिलातलम् ॥ २४ ॥

वहाँ अप्सराओंके नूपुरोंकी मधुर ध्वनिके साथ सुन्दर मोर नाच रहे थे । उस पर्वतके एक- एक रत्न और शिलाखण्डपर दिग्गजोंके दाँतोंकी रगड़का चिह्न अंकित था ॥ २४ ॥

स्रस्तांशुकमिवाक्षोभ्यैर्निम्नगा निःसृतैर्जलैः ।

सशष्पकवलैः स्वस्थैरदूरपरिवर्तिभिः ॥ २५ ॥

भयानभिज्ञैर्हरिणैः कौतूहलनिरीक्षितः ।

चालयन्नुरुवेगेन लताजालान्यनेकशः ॥ २६ ॥

आक्रीडमानो हृष्टात्मा श्रीमान् वायुसुतो ययौ ।

प्रियामनोरथं कर्तुमुद्यतश्चारुलोचनः ॥ २७ ॥

निम्नगामिनी नदियोंसे निकला हुआ क्षोभरहित जल नीचेकी ओर इस प्रकार बह रहा था, मानो उस पर्वतका वस्त्र खिसककर गिरा जाता हो । भयसे अपरिचित और स्वस्थ हरिण मुँहमें हरे घासका कौर लिये पास ही खड़े होकर भीमसेनकी ओर कौतूहलभरी दृष्टिसे देख रहे थे । उस समय मनोहर नेत्रोंवाले शोभाशाली वायुपुत्र भीम अपने महान् वेगसे अनेक लतासमूहोंको विचलित करते हुए हर्षपूर्ण हृदयसे खेल-सा करते जा रहे थे । वे अपनी प्रिया द्रौपदीका प्रिय मनोरथ पूर्ण करनेको सर्वथा उद्यत थे ॥ २५—२७ ॥ प्रांशुः कनकवर्णाभः सिंहसंहननो युवा ।

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मत्तवारणविक्रान्तो मत्तवारणवेगवान् ॥ २८ ॥

उनकी कद बहुत ऊँची थी । शरीरका रंग स्वर्ण- सा दमक रहा था । उनके सम्पूर्ण अंग सिंहके समान सुदृढ़ थे । उन्होंने युवावस्थामें पदार्पण किया था । वे मतवाले हाथीके समान

मस्तानी चालसे चलते थे । उनका वेग मदोन्मत्त गजराजके समान था ॥ २८ ॥

मत्तवारणताम्राक्षो मत्तवारणवारणः ।

प्रियपार्श्वोपविष्टाभिर्व्यावृत्ताभिर्विचेष्टितैः ॥ २ ९ ॥

यक्षगन्धर्वयोषाभिरदृश्याभिर्निरीक्षितः नवावतारो रूपस्य विक्रीडन्निव पाण्डवः ॥ ३० ॥

चचार रमणीयेषु गन्धमादनसानुषु ।

संस्मरन् विविधान् क्लेशान् दुर्योधनकृतान् बहून् ॥ ३१ ॥

द्रौपद्या वनवासिन्याः प्रियं कर्तुं समुद्यतः ।

सोऽचिन्तयद् गते स्वर्गमर्जुने मयि चागते ॥ ३२ ॥

पुष्पहेतोः कथं त्वार्यः करिष्यति युधिष्ठिरः ।

स्नेहान्नरवरो नूनमविश्वासाद् बलस्य च ॥ ३३ ॥

नकुलं सहदेवं च न मोक्ष्यति युधिष्ठिरः ।

कथं तु कुसुमावाप्तिः स्याच्छीघ्रमिति चिन्तयन् ॥ ३४ ॥

प्रतस्थे नरशार्दूलः पक्षिराडिव वेगितः ।

सज्जमानमनोदृष्टिः फुल्लेषु गिरिसानुषु ॥ ३५ ॥

मतवाले हाथीके समान ही उनकी लाल-लाल आँखें थीं । वे समरभूमिमें मदोन्मत्त हाथियोंको भी पीछे हटानेमें समर्थ थे । अपने प्रियतमके पार्श्वभागमें बैठी हुई यक्ष और गन्धर्वोंकी युवतियाँ सब प्रकारकी चेष्टाओंसे निवृत्त हो स्वयं अलक्षित रहकर भीमसेनकी ओर देख रही थीं । वे उन्हें सौन्दर्यके नूतन अवतार से प्रतीत होते थे । इस प्रकार पाण्डुनन्दन भीम गन्धमादनके रमणीय शिखरोंपर खेल- सा करते हुए विचरने लगे । वे दुर्योधनद्वारा दिये गये नाना प्रकारके असंख्य क्लेशोंका स्मरण करते हुए वनवासिनी द्रौपदीका प्रिय करनेके लिये उद्यत हुए थे । उन्होंने मन- ही- मन सोचा- ' अर्जुन स्वर्गलोकमें चले गये हैं और मैं फूल लेनेके लिये इधर चला आया हूँ। ऐसी दशामें आर्य युधिष्ठिर कोई कार्य कैसे करेंगे? नरश्रेष्ठ महाराज युधिष्ठिर नकुल और सहदेवपर अत्यन्त स्नेह रखते हैं । उन दोनोंके बलपर उन्हें विश्वास नहीं है । अतः वे निश्चय ही उन्हें नहीं छोड़ेंगे, अर्थात् कहीं नहीं भेजेंगे । अब कैसे मुझे शीघ्र वह फूल प्राप्त हो जाय - यह चिन्ता करते हुए नरश्रेष्ठ भीम पक्षिराज गरुड़के समान वेगसे आगे बढ़े । उनके मन और नेत्र फूलोंसे भरे हुए पर्वतीय शिखरोंपर लगे हुए थे ॥ २ ९ –३५ ॥

द्रौपदीवाक्यपाथेयो भीमः शीघ्रतरं ययौ ।

कम्पयन् मेदिनीं पद्भयां निर्घात इव पर्वसु ॥ ३६ ॥

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त्रासयन् गजयूथानि वातरंहा वृकोदरः ।

सिंहव्याघ्रमृगांश्चैव मर्दयानो महाबलः ॥ ३७ ॥

उन्मूलयन् महावृक्षान् पोथयंस्तरसा बली ।

लतावल्लीश्च वेगेन विकर्षन् पाण्डुनन्दनः ।

उपर्युपरि शैलाग्रमारुरुक्षुरिव द्विपः ॥ ३८ ॥

द्रौपदीका अनुरोधपूर्ण वचन ही उनका पाथेय ( मार्गका कलेवा) था, वे उसीको लेकर शीघ्रतापूर्वक चले जा रहे थे । वायुके समान वेगशाली वृकोदर पर्वकालमें होनेवाले उत्पात ( भूकम्प और बिजली गिरने ) के समान अपने पैरोंकी धमकसे पृथ्वीको कम्पित और हाथियोंके समूहोंको आतंकित करते हुए चलने लगे । वे महाबली कुन्तीकुमार सिंहों, व्याघ्रों और मृगोंको कुचलते तथा अपने वेगसे बड़े - बड़े वृक्षोंको जड़ से उखाड़ते और विनाश करते हुए आगे बढ़ने लगे । पाण्डुनन्दन भीम अपने वेगसे लताओं और बल्लरियोंको खींचे लिये जाते थे । वे ऊपर-ऊपर जाते हुए ऐसे प्रतीत होते थे, मानो कोई गजराज पर्वतकी सबसे ऊँची चोटीपर चढ़ना चाहता हो ॥ ३६-३८ ॥

विनर्दमानोऽतिभृशं सविद्युदिव तोयदः ।

तेन शब्देन महता भीमस्य प्रतिबोधिताः ॥ ३ ९ ॥

गुहां संतत्यजुर्व्याघ्रा निलिल्युर्वनवासिनः ।

समुत्पेतुः खगास्त्रस्ता मृगयूथानि दुद्रुवुः ॥ ४० ॥

वे बिजलियोंसे सुशोभित मेघकी भाँति बड़े जोरसे गर्जना करने लगे । भीमसेनकी उस भयंकर गर्जनासे जगे हुए व्याप्त अपनी गुफा छोड़कर भाग गये, वनवासी प्राणी वनमें ही छिप गये, डरे हुए पक्षी आकाशमें उड़ गये और मृगोंके झुंड दूरतक भागते चले गये ॥ ३ ९ -४० ॥

ऋक्षाश्चोत्ससृजुर्वृक्षांस्तत्यजुर्हरयो गुहाम् ।

व्यजृम्भन्त महासिंहा महिषाश्चावलोकयन् ॥ ४१ ॥

रीछोंने वृक्षोंका आश्रय छोड़ दिया, सिंहोंने गुफाएँ त्याग दीं, बड़े - बड़े सिंह जँभाई लेने लगे और जंगली भैंसे दूरसे ही उनकी ओर देखने लगे ॥ ४१ ॥

तेन वित्रासिता नागाः करेणुपरिवारिताः ।

तद् वनं स परित्यज्य जग्मुरन्यन्महावनम् ॥ ४२ ॥

भीमसेनकी उस गर्जनासे डरे हुए हाथी उस वनको छोड़कर हथिनियोंसे घिरे हुए दूसरे विशाल वनमें चले गये ॥ ४२ ॥

वराहमृगसंघाश्च महिषाश्च वनेचराः ।

व्याघ्रगोमायुसंघाश्च प्रणेदुर्गवयैः सह ॥ ४३ ॥

रथाङ्गसाह्वदात्यूहा हंसकारण्डवप्लवाः ।

शुकाः पुंस्कोकिलाः क्रौञ्चा विसंज्ञा भेजिरे दिशः ॥ ४४ ॥

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सूअर, मृगसमूह, जंगली भैंसे, बाघों तथा गीदड़ोंके समुदाय और गवय — ये सब - के-सब एक साथ चीत्कार करने लगे। चक्रवाक, चातक, हंस, कारण्डव, प्लव, शुक, कोकिल और क्रौंच आदि पक्षियोंने अचेत होकर भिन्न- भिन्न दिशाओंकी शरण ली ॥ ४३-४४ ॥

तथान्ये दर्पिता नागाः करेणुशरपीडिताः ।

सिंहव्याघ्राश्च संक्रुद्धा भीमसेनमथाद्रवन् ॥ ४५ ॥

शकृन्मूत्रं च मुञ्चाना भयविभ्रान्तमानसाः ।

व्यादितास्या महारौद्रा व्यनदन् भीषणान् रवान् ॥ ४६ ॥

तथा हथिनियोंके कटाक्ष- बाणसे पीड़ित हुए दूसरे बलोन्मत्त गजराज, सिंह और व्याघ्र क्रोधमें भरकर भीमसेनपर टूट पड़े । वे मल- मूत्र छोड़ते हुए मन - ही-मन भयसे घबरा रहे थे और मुँह बाये हुए अत्यन्त भयानक रूपसे भैरव - गर्जना कर रहे थे ॥ ४५-४६ ॥

ततो वायुसुतः क्रोधात् स्वबाहुबलमाश्रितः ।

गजेनान्यान् गजाञ्छ्रीमान् सिंहं सिंहेन वा विभुः ॥ ४७ ॥

तलप्रहारैरन्यांश्च व्यहनत् पाण्डवो बली ।

ते वध्यमाना भीमेन सिंहव्याघ्रतरक्षवः ॥ ४८ ॥

भयाद् विससृजुर्भीमं शकृन्मूत्रं च सुस्रुवुः ।

प्रविवेश ततः क्षिप्रं तानपास्य महाबलः ॥ ४ ९ ॥

वनं पाण्डुसुतः श्रीमाञ्छब्देनापूरयन् दिशः । तब अपने बाहु- बलका भरोसा रखनेवाले श्रीमान् वायुपुत्र भीमने कुपित हो एक हाथीसे दूसरे हाथियोंको और एक सिंहसे दूसरे सिंहोंको मार भगाया तथा उन महाबली पाण्डुकुमारने कितनोंको तमाचोंके प्रहारसे मार डाला । भीमसेनकी मार खाकर सिंह, व्याघ्र और चीते ( बघेरे ) भयसे उन्हें छोड़कर भाग चले तथा घबराकर मल-मूत्र करने लगे । तदनन्तर महान् शक्तिशाली पाण्डुनन्दन भीमसेनने शीघ्र उन सबको छोड़कर अपनी गर्जनासे सम्पूर्ण दिशाओंको गुँजाते हुए एक वनमें प्रवेश किया ॥ ४७–४९ ३ ॥ अथापश्यन्महाबाहुर्गन्धमादनसानुषु ॥ ५० ॥

सुरम्यं कदलीषण्डं बहुयोजनविस्तृतम् ।

तमभ्यगच्छद् वेगेन क्षोभयिष्यन् महाबलः ॥ ५१ ॥

महागज इवास्रावी प्रभञ्जन् विविधान् द्रुमान् ।

उत्पाट्य कदलीस्तम्भान् बहुतालसमुच्छ्रयान् ॥ ५२ ॥

चिक्षेप तरसा भीमः समन्ताद् बलिनां वरः ।

विनदन् सुमहातेजा नृसिंह इव दर्पितः ॥ ५३ ॥

ततः सत्त्वान्युपाक्रामद् बहूनि सुमहान्ति च ।

रुरुवानरसिंहांश्च महिषांश्च जलाशयान् ॥ ५४ ॥

तेन शब्देन चैवाथ भीमसेनरवेण च ।

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वनान्तरगताश्चापि वित्रेसुर्मृगपक्षिणः ॥ ५५ ॥

इसी समय गन्धमादनके शिखरोंपर महाबाहु भीमने एक परम सुन्दर केलेका बगीचा देखा, जो कई योजन दूरतक फैला हुआ था । मदकी धारा बहानेवाले महाबली गजराजकी भाँति उस कदलीवनमें हलचल मचाते और भाँति- भाँतिके वृक्षोंको तोड़ते हुए वे बड़े वेगसे वहाँ गये । वहाँके केलेके वृक्ष खम्भोंके समान मोटे थे । उनकी ऊँचाई कई ताड़ोंके बराबर थी । बलवानोंमें श्रेष्ठ भीमने बड़े वेगसे उन्हें उखाड़ -उखाड़कर सब ओर फेंकना आरम्भ किया । वे महान् तेजस्वी तो थे ही, अपने बल और पराक्रमपर गर्व भी रखते थे; अतः भगवान् नृसिंहकी भाँति विकट गर्जना करने लगे । तत्पश्चात् और भी बहुत- से बड़े - बड़े जन्तुओंपर आक्रमण किया । रुरु, वानर, सिंह, भैंसे तथा जल- जन्तुओंपर भी धावा किया । उन पशु - पक्षियोंके एवं भीमसेनके उस भयंकर शब्दसे दूसरे वनमें रहनेवाले मृग और पक्षी भी थर्रा उठे ॥ ५०–५५ ॥

तं शब्दं सहसा श्रुत्वा मृगपक्षिसमीरितम् ।

जलार्द्रपक्षा विहगाः समुत्पेतुः सहस्रशः ॥ ५६ ॥

मृगों और पक्षियोंके उस भयसूचक शब्दको सहसा सुनकर सहस्रों पक्षी आकाशमें उड़ने लगे । उन सबकी पाँखें जलसे भीगी हुई थीं ॥ ५६ ॥

तानौदकान् पक्षिगणान् निरीक्ष्य भरतर्षभः ।

तानेवानुसरन् रम्यं ददर्श सुमहत् सरः ॥ ५७ ॥

भरतश्रेष्ठ भीमने यह देखकर कि ये तो जलके पक्षी हैं, उन्हींके पीछे चलने लगे और आगे जानेपर एक अत्यन्त रमणीय विशाल सरोवर देखा ॥ ५७ ॥

काञ्चनैः कदलीषण्डैर्मन्दमारुतकम्पितैः ।

वीज्यमानमिवाक्षोभ्यं तीरात् तीरविसर्पिभिः ॥ ५८ ॥

उस सरोवरके एक तीरसे लेकर दूसरे तीरतक फैले हुए सुवर्णमय केलेके वृक्ष मन्द वायुसे विकम्पित होकर मानो उस अगाध जलाशयको पंखा झल रहे थे ॥ ५८ ॥

तत् सरोऽथावतीर्याशु प्रभूतनलिनोत्पलम् ।

महागज इवोद्दामश्चिक्रीड बलवद् बली ॥ ५ ९ ॥

उसमें प्रचुर कमल और उत्पल खिले हुए थे । बन्धनरहित महान् गजके समान बलवानोंमें श्रेष्ठ भीमसेन सहसा उस सरोवरमें उतरकर जल -क्रीड़ा करने लगे ॥ ५ ९ ॥

विक्रीड्य तस्मिन् सुचिरमुत्ततारामितद्युतिः ।

ततोऽध्यगन्तुं वेगेन तद् वनं बहुपादपम् ॥ ६० ॥

दीर्घ कालतक उस सरोवरमें क्रीड़ा करनेके पश्चात् अमित तेजस्वी भीम जलसे बाहर निकले और असंख्य वृक्षोंसे सुशोभित उस कदलीवनमें वेगपूर्वक जानेको उद्यत हुए ॥ ६० ॥

दध्मौ च शङ्खं स्वनवत् सर्वप्राणेन पाण्डवः ।

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आस्फोटयच्च बलवान् भीमः संनादयन् दिशः ॥ ६१ ॥

तस्य शङ्खस्य शब्देन भीमसेनरवेण च ।

बाहुशब्देन चोग्रेण नदन्तीव गिरेर्गुहाः ॥ ६२ ॥

उस समय बलवान् पाण्डुनन्दन भीमने अपनी सारी शक्ति लगाकर बड़े जोरसे शंख बजाया और सम्पूर्ण दिशाओंको प्रतिध्वनित करते हुए ताल ठोंका । उस शंखकी ध्वनि, भीमसेनकी गर्जना और उनके ताल ठोंकनेके भयंकर शब्दसे मानो पर्वतोंकी कन्दराएँ गूँज उठीं ॥ ६१-६२ ॥

तं वज्रनिष्पेषसममास्फोटितमहारवम् ।

श्रुत्वा शैलगुहासुप्तैः सिंहैर्मुक्तो महास्वनः ॥ ६३ ॥

पर्वतोंपर वज्रपात होनेके कारण उस ताल ठोंकनेके भयानक शब्दको सुनकर गुफाओंमें सोये हुए सिंहोंने भी जोर - जोरसे दहाड़ना आरम्भ किया ॥ ६३ ॥

सिंहनादभयत्रस्तैः कुञ्जरैरपि भारत ।

मुक्तो विरावः सुमहान् पर्वतो येन पूरितः ॥ ६४ ॥

भारत! उन सिंहोंका दहाड़ना सुनकर भयसे डरे हुए हाथी भी चीत्कार करने लगे, जिससे वह विशाल पर्वत शब्दायमान हो उठा ॥ ६४ ॥

तं तु नादं ततः श्रुत्वा मुक्तं वारणपुङ्गवैः ।

भ्रातरं भीमसेनं तु विज्ञाय हनुमान् कपिः ॥ ६५ ॥

बड़े - बड़े गजराजोंका वह चीत्कार सुनकर कपिप्रवर हनुमानजी, जो उस समय कदलीवनमें ही रहते थे, यह समझ गये कि मेरे भाई भीमसेन इधर आये हैं ॥ ६५ ॥

दिवंगमं रुरोधाथ मार्गं भीमस्य कारणात् ।

न हि पथामा वै गच्छेदिति विचार्य सः ॥ ६६ ॥

आस्त एकायने मार्गे कदलीषण्डमण्डिते ।

भ्रातुर्भीमस्य रक्षार्थं तं मार्गमवरुध्य वै ॥ ६७ ॥

तब उन्होंने भीमसेनके हितके लिये स्वर्गकी ओर जानेवाला मार्ग रोक दिया । हनुमान्जीने यह सोचकर कि भीमसेन इसी मार्गसे स्वर्गलोककी ओर न चले जायँ, एक मनुष्यके आने -जाने योग्य उस संकुचित मार्गपर बैठ गये । वह मार्ग केलेके वृक्षोंसे घिरा होनेके कारण बड़ी शोभा पा रहा था । उन्होंने अपने भाई भीमकी रक्षाके लिये ही यह राह रोकी थी ॥ ६६-६७ ॥ मात्र प्राप्स्यति शापं वा धर्षणां वेति पाण्डवः कदलीषण्डमध्यस्थो ह्येवं संचिन्त्य वानरः ॥ ६८ ॥

प्राजृम्भत महाकायो हनूमान् नाम वानरः ।

कदलीषण्डमध्यस्थो निद्रावशगतस्तदा ॥ ६ ९ ॥

जृम्भमाणः सुविपुलं शक्रध्वजमिवोच्छ्रितम् ।

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महाभारत — खण्ड २, पृष्ठ 1000 का मूल पृष्ठ
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आस्फोटयच्च लाङ्गूलमिन्द्राशनिसमस्वनम् ॥ ७० ॥

कदलीवनमें आय हुए पाण्डुनन्दन भीमसेनको इस मार्गपर आनेके कारण किसीसे शाप या तिरस्कार न प्राप्त हो जाय, यह विचारकर ही कपिप्रवर हनुमान्जी उस वनके भीतर स्वर्गका रास्ता रोककर सो गये । उस समय उन्होंने अपने शरीरको बड़ा कर लिया था । निद्राके वशीभूत होकर जब वे जँभाई लेते और इन्द्रकी ध्वजाके समान ऊँचे तथा विशाल लंगूरको फटकारते, उस समय वज्रकी गड़गड़ाहटके समान आवाज होती थी ॥ ६८–७० ॥

तस्य लाङ्गूलनिनदं पर्वतः सुगुहामुखैः ।

उद्गारमिव गौर्नर्दन्नुत्ससर्ज समन्ततः ॥ ७१ ॥

वह पर्वत उनकी पूँछकी फटकारके उस महान् शब्दको सुन्दर कन्दरारूपी मुखोंद्वारा सब ओर प्रतिध्वनिके रूपमें दुहराता था, मानो कोई साँड़ जोर-जोरसे गर्जना कर रहा हो ॥ ७१ ॥

लाङ्गूलास्फोटशब्दाच्च चलितः स महागिरिः ।

विघूर्णमानशिखरः समन्तात् पर्यशीर्यत ॥ ७२ ॥

स लाङ्गूलरवस्तस्य मत्तवारणनिःस्वनम् ।

अन्तर्धाय विचित्रेषु चचार गिरिसानुषु ॥ ७३ ॥

पूँछके फटकारनेकी आवाजसे वह महान् पर्वत हिल उठा । उसके शिखर झूमते - से जान पड़े और वह सब ओरसे टूट- फूटकर बिखरने लगा । वह शब्द मतवाले हाथीके चिग्घाड़नेकी आवाजको भी दबाकर विचित्र पर्वत-शिखरोंपर चारों ओर फैल गया ॥ ७२-७३ ॥

स भीमसेनस्तच्छ्रुत्वा सम्प्रहृष्टतनूरुहः ।

शब्दप्रभवमन्विच्छंश्चचार कदलीवनम् ॥ ७४ ॥

उसे सुनकर भीमसेनके रोंगटे खड़े हो गये और उसके कारणको ढूँढ़नेके लिये वे उस केलेके बगीचेमें घूमने लगे ॥ ७४ ॥

कदलीवनमध्यस्थमथ पीने शिलातले ।

ददर्श सुमहाबाहुर्वानराधिपतिं तदा ॥ ७५ ॥

उस समय विशाल भुजाओंवाले भीमसेनने कदलीवनके भीतर ही एक मोटे शिलाखण्डपर लेटे हुए वानरराज हनुमान्जीको देखा ॥ ७५ ॥

विद्युत्सम्पातदुष्प्रेक्षं विद्युत्सम्पातपिङ्गलम् ।

विद्युत्सम्पातनिनदं विद्युत्सम्पातचञ्चलम् ॥ ७६ ॥

विद्युत्पातके समान चकाचौंध पैदा करनेके कारण उनकी ओर देखना अत्यन्त कठिन हो रहा था। उनकी अंगकान्ति गिरती हुई बिजलीके समान पिंगल-वर्णकी थी । उनका