03.Mahabharata Volume 3 — पृष्ठ 1001–1010

महाभारत — खण्ड ३ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1001–1010

पृष्ठ 1001

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युधिष्ठिरेण सहित उपाविशदरिंदमः ।

पृष्ठ 1002

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पाण्डवोंके डेरेमें बलरामजी

पृष्ठ 1003

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श्रीकृष्ण आदि सब लोगोंने उन्हें प्रणाम किया । तत्पश्चात् बूढ़े राजा विराट और द्रुपदको प्रणाम करके शत्रुदमन बलराम युधिष्ठिरके साथ बैठे ॥ २३३ ॥

ततस्तेषूपविष्टेषु पार्थिवेषु समन्ततः ।

वासुदेवमभिप्रेक्ष्य रौहिणेयोऽभ्यभाषत ॥ २४ ॥

फिर उन सब राजाओंके चारों ओर बैठ जानेपर रोहिणीनन्दन बलरामने भगवान् श्रीकृष्णकी ओर देखते हुए कहा – ॥ २४ ॥

भवितायं महारौद्रो दारुणः पुरुषक्षयः ।

दिष्टमेतद् ध्रुवं मन्ये न शक्यमतिवर्तितुम् ॥ २५ ॥

'जान पड़ता है यह महाभयंकर और दारुण नरसंहार होगा ही । प्रारब्धके इस

विधानको मैं अटल मानता हूँ। अब इसे हटाया नहीं जा सकता ॥ २५ ॥

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तस्माद् युद्धात् समुत्तीर्णानपि वः ससुहृज्जनान् ।

अरोगानक्षतैर्देहैर्द्रष्टास्मीति मतिर्मम ॥ २६ ॥

‘ इस युद्धसे पार हुए आप सब सुहृदोंको मैं अक्षत शरीरसे युक्त और नीरोग देखूँगा ।

ऐसा मेरा विश्वास है ॥ २६ ॥

पृष्ठ 1004

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समेतं पार्थिवं क्षत्रं कालपक्वमसंशयम् ।

विमर्दश्च महान् भावी मांसशोणितकर्दमः ॥ २७ ॥

‘ इसमें संदेह नहीं कि यहाँ जो- जो क्षत्रिय नरेश एकत्र हुए हैं, उन सबको कालने अपना ग्रास बनानेके लिये पका दिया है । महान् जनसंहार होनेवाला है । इसमें रक्त और मांसकी कीच जम जायगी ॥ २७ ॥

उक्तो मया वासुदेवः पुनः पुनरुपह्वरे ।

सम्बन्धिषु समां वृत्तिं वर्तस्व मधुसूदन ॥ २८ ॥

पाण्डवा हि यथास्माकं तथा दुर्योधनो नृपः ।

तस्यापि क्रियतां साह्यं स पर्येति पुनः पुनः ॥ २ ९ ॥

' मैंने एकान्तमें श्रीकृष्णसे बार-बार कहा था कि मधुसूदन! अपने सभी सम्बन्धियोंके प्रति एक- सा बर्ताव करो; क्योंकि हमारे लिये जैसे पाण्डव हैं, वैसा ही राजा दुर्योधन है । उसकी भी सहायता करो । वह बार- बार अपने यहाँ चक्कर लगाता है ॥ २८-२९ ॥

तच्च मे नाकरोद् वाक्यं त्वदर्थे मधुसूदनः ।

निर्विष्टः सर्वभावेन धनंजयमवेक्ष्य ह ॥ ३० ॥

' परंतु युधिष्ठिर! तुम्हारे लिये ही मधुसूदन श्रीकृष्णने मेरी उस बातको नहीं माना है । ये अर्जुनको देखकर सब प्रकारसे उसीपर निछावर हो रहे हैं ॥ ३० ॥

ध्रुवो जयः पाण्डवानामिति मे निश्चिता मतिः ।

तथा ह्यभिनिवेशोऽयं वासुदेवस्य भारत ॥ ३१ ॥

' मेरा निश्चित विश्वास है कि इस युद्धमें पाण्डवोंकी अवश्य विजय होगी । भारत! श्रीकृष्णका भी ऐसा दृढ़ संकल्प है ॥ ३१ ॥

न चाहमुत्सहे कृष्णमृते लोकमुदीक्षितुम् ।

ततोऽहमनुवर्तामि केशवस्य चिकीर्षितम् ॥ ३२ ॥

' मैं तो श्रीकृष्णके बिना इस सम्पूर्ण जगत्की ओर आँख उठाकर देख भी नहीं सकता; अतः ये केशव जो कुछ करना चाहते हैं, मैं उसीका अनुसरण करता हूँ ॥ ३२ ॥

उभौ शिष्यौ हि मे वीरौ गदायुद्धविशारदौ ।

तुल्यस्नेहोऽस्म्यतो भीमे तथा दुर्योधने नृपे ॥ ३३ ॥

‘ भीमसेन और दुर्योधन ये दोनों ही वीर मेरे शिष्य एवं गदायुद्धमें कुशल हैं; अतः मैं इन दोनोंपर एक- सा स्नेह रखता हूँ ॥ ३३ ॥

तस्माद् यास्यामि तीर्थानि सरस्वत्या निषेवितुम् ।

न हि शक्ष्यामि कौरव्यान् नश्यमानानुपेक्षितुम् ॥ ३४ ॥

‘ इसलिये मैं सरस्वती नदीके तटवर्ती तीर्थोंका सेवन करनेके लिये जाऊँगा; क्योंकि मैं नष्ट होते हुए कुरुवंशियोंको उस अवस्थामें देखकर उनकी उपेक्षा नहीं कर सकूँगा? ' ॥ ३४ ॥

पृष्ठ 1005

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एवमुक्त्वा महाबाहुरनुज्ञातश्च पाण्डवैः ।

तीर्थयात्रां ययौ रामो निर्वर्त्य मधुसूदनम् ॥ ३५ ॥

ऐसा कहकर महाबाहु बलरामजी पाण्डवोंसे विदा ले मधुसूदन श्रीकृष्णको संतुष्ट करके तीर्थयात्राके लिये चले गये ॥ ३५ ॥

इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि सैन्यनिर्याणपर्वणि बलरामतीर्थयात्रागमने सप्तपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १५७ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत सैन्यनिर्याणपर्वमें बलरामजीके तीर्थयात्राके लिये जानेसे सम्बन्ध रखनेवाला एक सौ सत्तावनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १५७ ॥

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पृष्ठ 1006

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अष्टपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः रुक्मीका सहायता देनेके लिये आना; परंतु पाण्डव और कौरव दोनों पक्षोंके द्वारा कोरा उत्तर पाकर लौट जाना वैशम्पायन उवाच

एतस्मिन्नेव काले तु भीष्मकस्य महात्मनः ।

हिरण्यरोम्णो नृपतेः साक्षादिन्द्रसखस्य वै ॥ १ ॥

आकूतीनामधिपतिर्भोजस्यातियशस्विनः ।

दाक्षिणात्यपतेः पुत्रो दिक्षु रुक्मीति विश्रुतः ॥ २ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं -जनमेजय! इसी समय अति यशस्वी दाक्षिणात्य देशके अधिपति भोजवंशी तथा इन्द्रके सखा हिरण्यरोमा नामवाले संकल्पोंके स्वामी महामना भीष्मकका सगा पुत्र, सम्पूर्ण दिशाओंमें विख्यात रुक्मी, पाण्डवोंके पास आया ॥ १-२ ॥

यः किंपुरुषसिंहस्य गन्धमादनवासिनः ।

कृत्स्नं शिष्यो धनुर्वेदं चतुष्पादमवाप्तवान् ॥ ३ ॥

जिसने गन्धमादननिवासी किंपुरुषप्रवर द्रुमका शिष्य होकर चारों पादोंसे युक्त सम्पूर्ण धनुर्वेदकी शिक्षा प्राप्त की थी ॥ ३ ॥

यो माहेन्द्रं धनुर्लेभे तुल्यं गाण्डीवतेजसा ।

शार्ङ्गण च महाबाहुः सम्मितं दिव्यलक्षणम् ॥ ४ ॥

जिस महाबाहुने गाण्डीवधनुषके तेजके समान ही तेजस्वी विजय नामक धनुष इन्द्रदेवतासे प्राप्त किया था। वह दिव्य लक्षणोंसे सम्पन्न धनुष शार्ङ्गधनुषकी समानता करता था ॥ ४ ॥

त्रीण्येवैतनि दिव्यानि धनूंषि दिवि चारिणाम् ।

वारुणं गाण्डिवं तत्र माहेन्द्रं विजयं धनुः ।

शार्ङ्गं तु वैष्णवं प्राहुर्दिव्यं तेजोमयं धनुः ॥ ५ ॥

द्युलोकमें विचरनेवाले देवताओंके ये तीन ही धनुष दिव्य माने गये हैं । उनमेंसे गाण्डीव धनुष वरुणका, विजय देवराज इन्द्रका तथा शार्ङ्ग नामक दिव्य तेजस्वी धनुष भगवान् विष्णुका बताया गया है ॥ ५ ॥

धारयामास तत् कृष्णः परसेनाभयावहम् ।

गाण्डीवं पावकाल्लेभे खाण्डवे पाकशासनिः ॥ ६ ॥

शत्रुसेनाको भयभीत करनेवाले उस शार्ङ्ग- धनुषको भगवान् श्रीकृष्णने धारण किया और खाण्डव- दाहके समय इन्द्रकुमार अर्जुनने साक्षात् अग्निदेवसे गाण्डीवधनुष प्राप्त

पृष्ठ 1007

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किया था ॥ ६ । |

द्रुमाद् रुक्मी महातेजा विजयं प्रत्यपद्यत ।

संछिद्य मौरवान् पाशान् निहत्य मुरमोजसा ॥ ७ ॥

निर्जित्य नरकं भौममाहृत्य मणिकुण्डले ।

षोडश स्त्रीसहस्राणि रत्नानि विविधानि च ॥ ८ ॥

प्रतिपेदे हृषीकेशः शार्ङ्गं च धनुरुत्तमम् । महातेजस्वी रुक्मीने द्रुमसे विजय नामक धनुष पाया था । भगवान् श्रीकृष्णने अपने तेज और बलसे मुर दैत्यके पाशोंका उच्छेद करके भूमिपुत्र नरकासुरको जीतकर जब उसके यहाँसे अदितिके मणिमय कुण्डल वापस ले लिये और सोलह हजार स्त्रियों तथा नाना प्रकारके रत्नोंको अपने अधिकारमें कर लिया, उसी समय उन्हें शार्ङ्ग नामक उत्तम धनुष भी प्राप्त हुआ था ॥ ७-८३ ॥ रुक्मी तु विजयं लब्ध्वा धनुर्मेघनिभस्वनम् ॥ ९ ॥

विभीषयन्निव जगत् पाण्डवानभ्यवर्तत । रुक्मी मेघकी गर्जनाके समान भयानक टंकार करनेवाले विजय नामक धनुषको पाकर सम्पूर्ण जगत्को भयभीत - सा करता हुआ पाण्डवोंके यहाँ आया ॥ ९ ३ ॥ नामृष्यत पुरा योऽसौ स्वबाहुबलगर्वितः ॥ १० ॥

रुक्मिण्या हरणं वीरो वासुदेवेन धीमता । यह वही वीर रुक्मी था, जो अपने बाहुबलके घमंडमें आकर पहले परम बुद्धिमान् भगवान् श्रीकृष्णके द्वारा किये गये रुक्मिणीके अपहरणको नहीं सह सका था ॥ १०३ ॥

कृत्वा प्रतिज्ञां नाहत्वा निवर्तिष्ये जनार्दनम् ॥ ११ ॥

ततोऽन्वधावद् वार्ष्णेयं सर्वशस्त्रभृतां वरः । वह सम्पूर्ण शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ था। उसने यह प्रतिज्ञा करके कि मैं वृष्णिवंशी श्रीकृष्णको मारे बिना अपने नगरको नहीं लौटूंगा, उनका पीछा किया था ॥ ११३ ॥

सेनया चतुरङ्गिण्या महत्या दूरपातया ॥ १२ ॥

विचित्रायुधवर्मिण्या गङ्गयेव प्रवृद्धया । उस समय उसके साथ विचित्र आयुधों और कवचोंसे सुशोभित, दूरतकके लक्ष्यको मार गिरानेमें समर्थ तथा बढ़ी हुई गंगाके समान विशाल चतुरंगिणी सेना थी ॥ १२३ ॥

स समासाद्य वार्ष्णेयं योगानामीश्वरं प्रभुम् ॥ १३ ॥

व्यंसितो व्रीडितो राजन् नाजगाम स कुण्डिनम् । राजन्! योगेश्वर भगवान् श्रीकृष्णके पास पहुँचकर उनसे पराजित होनेके कारण लज्जित हो वह पुनः कुण्डिनपुरको नहीं लौटा ॥ १३३ ॥

यत्रैव कृष्णेन रणे निर्जितः परवीरहा ॥ १४ ॥

तत्र भोजकटं नाम कृतं नगरमुत्तमम् ।

पृष्ठ 1008

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भगवान् श्रीकृष्णने जहाँ युद्धमें शत्रुवीरोंका हनन करनेवाले रुक्मीको हराया था, वहीं रुक्मीने भोजकट नामक उत्तम नगर बसाया ॥ १४३ ॥

सैन्येन महा तेन प्रभूतगजवाजिना ॥ १५ ॥

पुरं तद्भुवि विख्यातं नाम्ना भोजकटं नृप । राजन्! प्रचुर हाथी- घोड़ोंवाली विशाल सेनासे सम्पन्न वह भोजकट नामक नगर सम्पूर्ण भूमण्डलमें विख्यात है ॥ १५३ ॥

स भोजराजः सैन्येन महता परिवारितः ॥ १६ ॥

अक्षौहिण्या महावीर्यः पाण्डवान् क्षिप्रमागमत् । महापराक्रमी भोजराज रुक्मी एक अक्षौहिणी विशाल सेनासे घिरा हुआ शीघ्रतापूर्वक पाण्डवोंके पास आया ॥ १६३ ॥

ततः स कवच धन्वी तली खड्गी शरासनी ॥ १७ ॥

ध्वजेनादित्यवर्णेन प्रविवेश महाचमूम् । उसने कवच, धनुष, दस्ताने, खड्ग और तरकस धारण किये सूर्यके समान तेजस्वी ध्वजके साथ पाण्डवोंकी विशाल सेनामें प्रवेश किया ॥ १७३ ॥

विदितः पाण्डवेयानां वासुदेवप्रियेप्सया ॥ १८ ॥

युधिष्ठिरस्तु तं राजा प्रत्युद्गम्याभ्यपूजयत् । वह वसुदेवनन्दन भगवान् श्रीकृष्णका प्रिय करनेकी इच्छासे आया था । पाण्डवोंको उसके आगमनकी सूचना दी गयी, तब राजा युधिष्ठिरने आगे बढ़कर उसकी अगवानी की और उसका यथायोग्य आदर- सत्कार किया ॥ १८३ ॥

स पूजितः पाण्डुपुत्रैर्यथान्यायं सुसंस्तुतः ॥ १ ९ ॥ प्रतिगृह्य तु तान् सर्वान् विश्रान्तः सहसैनिकः ।

पाण्डवोंने रुक्मीका विधिपूर्वक आदर- सत्कार करके उसकी भूरि- भूरि प्रशंसा की ।

रुक्मीने भी उन सबको प्रेमपूर्वक अपनाकर सैनिकोंसहित विश्राम किया ॥ १ ९ ॥

उवाच मध्ये वीराणां कुन्तीपुत्रं धनंजयम् ॥ २० ॥

सहायोऽस्मि स्थितो युद्धे यदि भीतोऽसि पाण्डव ।

करिष्यामि रणे साह्यमसह्यं तव शत्रुभिः ॥ २१ ॥

तदनन्तर वीरोंके बीचमें बैठकर उसने कुन्तीकुमार अर्जुनसे कहा - ' पाण्डुनन्दन! यदि तुम डरे हुए हो तो मैं युद्धमें तुम्हारी सहायताके लिये आ पहुँचा हूँ । मैं इस महायुद्धमें तुम्हारी वह सहायता करूँगा, जो तुम्हारे शत्रुओंके लिये असह्य हो उठेगी ॥ २०-२१ ॥

न हि मे विक्रमे तुल्यः पुमानस्तीह कश्चन ।

हनिष्यामि रणे भागं यन्मे दास्यसि पाण्डव ॥ २२ ॥

' इस जगत्में मेरे समान पराक्रमी दूसरा कोई पुरुष नहीं है । पाण्डुकुमार! तुम शत्रुओंका जो भाग मुझे सौंप दोगे, मैं समरभूमिमें उसका संहार कर डालूँगा ॥ २२ ॥

पृष्ठ 1009

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अपि द्रोणकृपौ वीरौ भीष्मकर्णावथो पुनः ।

अथवा सर्व एवैते तिष्ठन्तु वसुधाधिपाः ॥ २३ ॥

निहत्य समरे शत्रूंस्तव दास्यामि मेदिनीम् । ‘ मेरे हिस्सेमें द्रोणाचार्य, कृपाचार्य तथा वीरवर भीष्म एवं कर्ण ही क्यों न हों, किसीको जीवित नहीं छोडूंगा अथवा यहाँ पधारे हुए ये सब राजा चुपचाप खड़े रहें । मैं अकेला ही समरभूमिमें तुम्हारे सारे शत्रुओंका वध करके तुम्हें पृथ्वीका राज्य अर्पित कर दूँगा ' ॥ २३ ॥ इत्युक्तो धमराजस्य केशवस्य च संनिधौ ॥ २४ ॥

शृण्वतां पार्थिवेन्द्राणामन्येषां चैव सर्वशः ।

वासुदेवमभिप्रेक्ष्य धर्मराजं च पाण्डवम् ॥ २५ ॥

उवाच धीमान् कौन्तेयः प्रहस्य सखिपूर्वकम् । धर्मराज युधिष्ठिर तथा भगवान् श्रीकृष्णके समीप अन्य सब राजाओंके सुनते हुए रुक्मीके ऐसा कहनेपर परमबुद्धिमान् कुन्तीपुत्र अर्जुनने वसुदेवनन्दन श्रीकृष्ण और धर्मराज युधिष्ठिरकी ओर देखते हुए मित्रभावसे हँसकर कहा- ॥ २४-२५३ ॥ कौरवाणां कुले जातः पाण्डोः पुत्रो विशेषतः ॥ २६ ॥

द्रोणं व्यपदिशञ्शिष्यो वासुदेवसहायवान् ।

भीतोऽस्मीति कथं ब्रूयां दधानो गाण्डिवं धनुः ॥ २७ ॥

' वीर! मैं कौरवोंके कुलमें उत्पन्न हुआ हूँ। विशेषतः महाराज पाण्डुका पुत्र हूँ। आचार्य द्रोणको अपना गुरु कहता हूँ और स्वयं उनका शिष्य कहलाता हूँ । इसके सिवा साक्षात्

भगवान् श्रीकृष्ण हमारे सहायक हैं और मैं अपने हाथमें गाण्डीव धनुष धारण करता हूँ ।

ऐसी स्थितिमें मैं अपने - आपको डरा हुआ कैसे कह सकता हूँ? ॥ २६-२७ ॥

युध्यमानस्य मे वीर गन्धर्वैः सुमहाबलैः ।

सहायो घोषयात्रायां कस्तदाऽऽसीत् सखा मम ॥ २८ ॥

‘ वीरवर! कौरवोंकी घोषयात्राके समय जब मैंने महाबली गन्धर्वोंके साथ युद्ध किया था, उस समय कौन - सा मित्र मेरी सहायताके लिये आया था? ॥ २८ ॥

तथा प्रतिभये तस्मिन् देवदानवसंकुले ।

खाण्डवे युध्यमानस्य कः सहायस्तदाभवत् ॥ २ ९ ॥

‘ खाण्डववनमें देवताओं और दानवोंसे परिपूर्ण भयंकर युद्धमें जब मैं अपने प्रतिपक्षियोंके साथ युद्ध कर रहा था, उस समय मेरा कौन सहायक था? ॥ २ ९ ॥

निवातकवचैर्युद्धे कालकेयैश्च दानवैः ।

तत्र मेमे युध्यमानस्य कः सहायस्तदाभवत् ॥ ३० ॥

‘ जब निवातकवच तथा कालकेय नामक दानवोंके साथ छिड़े हुए युद्धमें मैं अकेला ही लड़ रहा था, उस समय मेरी सहायताके लिये कौन आया था? ॥ ३० ॥

पृष्ठ 1010

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तथा विराटनगरे कुरुभिः सह संगरे ।

युध्यतो बहुभिस्तत्र कः सहायोऽभवन्मम ॥ ३१ ॥

‘ इसी प्रकार विराटनगरमें जब कौरवोंके साथ होनेवाले संग्राममें मैं अकेला ही बहुत - से वीरोंके साथ युद्ध कर रहा था, उस समय मेरा सहायक कौन था? ॥ ३१ ॥

उपजीव्य रणे रुद्रं शक्रं वैश्रवणं यमम् ।

वरुणं पावकं चैव कृपं द्रोणं च माधवम् ॥ ३२ ॥

धारयन् गाण्डिवं दिव्यं धनुस्तेजोमयं दृढम् ।

अक्षय्यशरसंयुक्तो दिव्यास्त्रपरिबृंहितः ॥ ३३ ॥

कथमस्मद्विधो ब्रूयाद् भीतोऽस्मीति यशोहरम् ।

वचनं नरशार्दूल वज्रायुधमपि स्वयम् ॥ ३४ ॥

‘ मैंने युद्धमें सफलताके लिये रुद्र, इन्द्र, यम, कुबेर, वरुण, अग्नि, कृपाचार्य, द्रोणाचार्य तथा भगवान् श्रीकृष्णकी आराधना की है । मैं तेजस्वी, दृढ़ एवं दिव्य गाण्डीव धनुष धारण करता हूँ । मेरे पास अक्षय बाणोंसे भरे हुए तरकस मौजूद हैं और दिव्यास्त्रोंके ज्ञानसे मेरी शक्ति बढ़ी हुई है । नरश्रेष्ठ! फिर मेरे जैसा पुरुष साक्षात् वज्रधारी इन्द्रके सामने भी ‘ मैं डरा हुआ हूँ' यह सुयशका नाश करनेवाला वचन कैसे कह सकता है? ॥ ३२–३४ ॥

नास्मिभीतो महाबाहो सहायार्थश्च नास्ति मे ।

यथाकामं यथायोगं गच्छ वान्यत्र तिष्ठ वा ॥ ३५ ॥

‘ महाबाहो! मैं डरा हुआ नहीं हूँ तथा मुझे सहायककी भी आवश्यकता नहीं है । आप अपनी इच्छाके अनुसार जैसा उचित समझें अन्यत्र चले जाइये या यहीं रहिये ' ॥ ३५ ॥

वैशम्पायन उवाच ( तच्छ्रुत्वा वचनं तस्य विजयस्य हि धीमतः । )

विनिवर्त्य ततो रुक्मी सेनां सागरसंनिभाम् ।

दुर्योधनमुपागच्छत् तथैव भरतर्षभ ॥ ३६ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं - भरतश्रेष्ठ! उन परम बुद्धिमान् अर्जुनका यह वचन सुनकर रुक्मी अपनी समुद्र- सदृश विशाल सेनाको लौटाकर उसी प्रकार दुर्योधनके पास गया ॥ ३६ ॥

तथैव चाभिगम्यैनमुवाच वसुधाधिपः ।

प्रत्याख्यातश्च तेनापि स तदा शूरमानिना ॥ ३७ ॥

दुर्योधनसे मिलकर राजा रुक्मीने उससे भी वैसी ही बातें कहीं । तब अपनेको शूरवीर माननेवाले दुर्योधनने भी उसकी सहायता लेनेसे इन्कार कर दिया ॥ ३७ ॥

द्वावेव तु महाराज तस्माद् युद्धादपेयतुः ।

रौहिणेयश्च वार्ष्णेयो रुक्मी च वसुधाधिपः ॥ ३८ ॥