03.Mahabharata Volume 3 — पृष्ठ 991–1000

महाभारत — खण्ड ३ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 991–1000

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पृथगक्षौहिणीनां च प्रणेतॄन् नरसत्तमान् ।

विधिवत् पूर्वमानीय पार्थिवानभ्यषेचयत् ॥ ३१ ॥

कृपं द्रोणं च शल्यं च सैन्धवं च जयद्रथम् ।

सुदक्षिणं च काम्बोजं कृतवर्माणमेव च ॥ ३२ ॥

द्रोणपुत्रं च कर्णं च भूरिश्रवसमेव च ।

शकुनिं सौबलं चैव बाह्लीकं च महाबलम् ॥ ३३ ॥

कृपाचार्य, द्रोणाचार्य और अश्वत्थामा– इन श्रेष्ठ पुरुषोंको एवं मद्रराज शल्य, सिंधुराज जयद्रथ, कम्बोज- राज सुदक्षिण, कृतवर्मा, कर्ण, भूरिश्रवा, सुबलपुत्र शकुनि तथा महाबली बाह्लीक— इन राजाओंको पहले अपने सामने बुलाकर उन सबको पृथक् - पृथक् एक- एक अक्षौहिणी सेनाका नायक निश्चित करके विधि- पूर्वक उनका अभिषेक किया ॥ ३१– ३३ ॥

दिवसे दिवसे तेषां प्रतिवेलं च भारत ।

चक्रे स विविधाः पूजाः प्रत्यक्षं च पुनः पुनः ॥ ३४ ॥

भारत! दुर्योधन प्रतिदिन और प्रत्येक वेलामें उन सेनापतियोंका बारंबार विविध प्रकारसे प्रत्यक्ष पूजन करता था ॥ ३४ ॥

तथा विनियताः सर्वे ये च तेषां पदानुगाः ।

बभूवुः सैनिका राज्ञां प्रियं राज्ञश्चिकीर्षवः ॥ ३५ ॥

उनके जो अनुयायी थे, उनको भी उसी प्रकार यथायोग्य स्थानोंपर नियुक्त कर दिया गया । वे राजाओंके सैनिक राजा दुर्योधनका प्रिय करनेकी इच्छा रखकर अपने - अपने कार्यमें तत्पर हो गये ॥ ३५ ॥

इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि सैन्यनिर्याणपर्वणि दुर्योधनसैन्यविभागे पञ्चपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १५५ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत सैन्यनिर्याणपर्वमें दुर्योधनकी सेनाका विभागविषयक एक सौ पचपनवाँ अध्याय पूराहुआ ॥ १५५ ॥

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षट्पञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः दुर्योधनके द्वारा भीष्मजीका प्रधान सेनापतिके पदपर अभिषेक और कुरुक्षेत्रमें पहुँचकर शिविर- निर्माण वैशम्पायन उवाच

ततः शान्तनवं भीष्मं प्राञ्जलिर्धृतराष्ट्रजः ।

सह सर्वैर्महीपालैरिदं वचनमब्रवीत् ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं -जनमेजय! तदनन्तर धृतराष्ट्रपुत्र दुर्योधन समस्त राजाओंके साथ शान्तनु - नन्दन भीष्मके पास जा हाथ जोड़कर इस प्रकार बोला- ॥ १ ॥

ऋते सेनाप्रणेतारं पृतना सुमहत्यपि ।

दीर्यते युद्धमासाद्य पिपीलिकपुटं यथा ॥ २ ॥

‘ पितामह! कितनी ही बड़ी सेना क्यों न हो? किसी योग्य सेनापतिके बिना युद्धमें जाकर चींटियोंकी पंक्तिके समान छिन्न - भिन्न हो जाती है ॥ २ ॥

न हि जातु द्वयोर्बुद्धिः समा भवति कर्हिचित् ।

शौर्यं च बलनेतॄणां स्पर्धते च परस्परम् ॥ ३ ॥

'दो पुरुषोंकी बुद्धि कभी समान नहीं होती । यदि दोनों ओर योग्य सेनापति हों तो उनका शौर्य एक- दूसरेकी होड़में बढ़ता है ॥ ३ ॥

श्रूयते च महाप्राज्ञ हैहयानमितौजसः ।

अभ्ययुर्ब्राह्मणाः सर्वे समुच्छ्रितकुशध्वजाः ॥ ४ ॥

' महामते! सुना जाता है कि समस्त ब्राह्मणोंने अपनी कुशमयी ध्वजा फहराते हुए पहले कभी अमिततेजस्वी हैहयवंशके क्षत्रियोंपर आक्रमण किया था ॥ ४ ॥

तानभ्ययुस्तदा वैश्याः शूद्राश्चैव पितामह ।

एकतस्तु त्रयो वर्णा एकतः क्षत्रियर्षभाः ॥ ५ ॥

‘ पितामह! उस समय ब्राह्मणोंके साथ वैश्यों और शूद्रोंने भी उनपर धावा किया था ।

एक ओर तीनों वर्णके लोग थे और दूसरी ओर चुने हुए श्रेष्ठ क्षत्रिय ॥ ५ ॥

ततो युद्धेष्वभज्यन्त त्रयो वर्णाः पुनः पुनः ।

क्षत्रियाश्च जयन्त्येव बहुलं चैकतो बलम् ॥ ६ ॥

' तदनन्तर जब युद्ध आरम्भ हुआ, तब तीनों वर्णोंके लोग बारंबार पीठ दिखाकर भागने लगे । यद्यपि इनकी सेना अधिक थी तो भी क्षत्रियोंने एकमत होकर उनपर विजय पायी ॥ ६ ॥

ततस्ते क्षत्रियानेव पप्रच्छुर्द्विजसत्तमाः ।

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तेभ्यः शशंसुर्धर्मज्ञा याथातथ्यं पितामह ॥ ७ ॥

‘पितामह! तब उन श्रेष्ठ ब्राह्मणोंने क्षत्रियोंसे ही पूछा- हमारी पराजयका क्या कारण है? उस समय धर्मज्ञ क्षत्रियोंने उनसे यथार्थ कारण बता दिया ॥ ७ ॥

वयमेकस्य शृण्वाना महाबुद्धिमतो रणे ।

भवन्तस्तु पृथक् सर्वे स्वबुद्धिवशवर्तिनः ॥ ८ ॥

' वे बोले – हमलोग एक परम बुद्धिमान् पुरुषको सेनापति बनाकर युद्धमें उसीका आदेश सुनते और मानते हैं । परंतु आप सब लोग पृथक् - पृथक् अपनी ही बुद्धिके अधीन हो मनमाना बर्ताव करते हैं ॥ ८ ॥

ततस्ते ब्राह्मणाश्चक्रुरेकं सेनापतिं द्विजम् ।

नये सुकुशलं शूरमजयन् क्षत्रियांस्ततः ॥ ९ ॥

‘यह सुनकर उन ब्राह्मणोंने एक शूरवीर एवं नीति -निपुण ब्राह्मणको सेनापति बनाया और क्षत्रियों पर विजय प्राप्त की ॥ ९ ॥

एवं ये कुशलं शूरं हितेप्सितमकल्मषम् ।

सेनापतिं प्रकुर्वन्ति ते जयन्ति रणे रिपून् ॥ १० ॥

‘ इस प्रकार जो लोग किसी हितैषी, पापरहित तथा युद्ध-कुशल शूरवीरको सेनापति बना लेते हैं, वे संग्राममें शत्रुओंपर अवश्य विजय पाते हैं ॥ १० ॥

भवानुशनसा तुल्यो हितैषी च सदा मम ।

असंहार्यः स्थितो धर्मे स नः सेनापतिर्भव ॥ ११ ॥

‘ आप सदा मेरा हित चाहनेवाले तथा नीतिमें शुक्राचार्यके समान हैं । आपको आपकी इच्छाके बिना कोई मार नहीं सकता । आप सदा धर्ममें ही स्थित रहते हैं, अतः हमारे प्रधान सेनापति हो जाइये ॥ ११ ॥

रश्मिवतामिवादित्यो वीरुधामिव चन्द्रमाः ।

कुबेर इव यक्षाणां देवानामिव वासवः ॥ १२ ॥

पर्वतानां यथा मेरुः सुपर्णः पक्षिणां यथा ।

कुमार इव देवानां वसूनामिव हव्यवाट् ॥ १३ ॥

‘ जैसे किरणोंवाले तेजस्वी पदार्थोंके सूर्य, वृक्ष और ओषधियोंके चन्द्रमा, यक्षोंके कुबेर, देवताओंके इन्द्र, पर्वतोंके मेरु, पक्षियोंके गरुड़, समस्त देवयोनियोंके कार्तिकेय और वसुओंके अग्निदेव अधिपति एवं संरक्षक हैं ( उसी प्रकार आप हमारी समस्त सेनाओंके अधिनायक और संरक्षक हों) ॥ १२-१३ ॥

भवता हि वंय गुप्ताः शक्रेणेव दिवौकसः ।

अनाधृष्या भविष्यामस्त्रिदशानामपि ध्रुवम् ॥ १४ ॥

' इन्द्रके द्वारा सुरक्षित देवताओंकी भाँति आपके संरक्षणमें रहकर हमलोग निश्चय ही देवगणोंके लिये भी अजेय हो जायँगे ॥ १४ ॥

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प्रयातु नो भवानग्रे देवानामिव पावकिः ।

वयं त्वामनुयास्यामः सौरभेया इवर्षभम् ॥ १५ ॥

‘ जैसे कार्तिकेय देवताओंके आगे -आगे चलते हैं, वैसे ही आप हमारे अगुआ हों । जैसे बछड़े साँड़के पीछे चलते हैं, उसी प्रकार हम आपका अनुसरण करेंगे' ॥ १५ ॥

भीष्मउवाच

एवमेतन्महाबाहो यथा वदसि भारत ।

यथैव हि भवन्तो मे तथैव मम पाण्डवाः ॥ १६ ॥

भीष्मने कहा - भारत! तुम जैसा कहते हो वह ठीक है, पर मेरे लिये जैसे तुम हो, वैसे ही पाण्डव हैं ॥ १६ ॥

अपि चैव मया श्रेयो वाच्यं तेषां नराधिप ।

संयोद्धव्यं तवार्थाय यथा मे समयः कृतः ॥ १७ ॥

नरेश्वर! मैं पाण्डवोंको उनके पूछनेपर अवश्य ही हितकी बात बताऊँगा और तुम्हारे

लिये युद्ध करूँगा । ऐसी ही मैंने प्रतिज्ञा की है ॥ १७ ॥

न तु पश्यामि योद्धारमात्मनः सदृशं भुवि ।

ऋते तस्मान्नरव्याघ्रात् कुन्तीपुत्राद् धनंजयात् ॥ १८ ॥

मैं इस भूतलपर नरश्रेष्ठ कुन्तीपुत्र अर्जुनके सिवा दूसरे किसी योद्धाको अपने समान नहीं देखता हूँ ॥ १८ ॥

स हि वेद महाबुद्धिर्दिव्यान्यस्त्राण्यनेकशः ।

न तु मां विवृतो युद्धे जातु युध्येत पाण्डवः ॥ १ ९ ॥

महाबुद्धिमान् पाण्डुकुमार अर्जुन अनेक दिव्यास्त्रोंका ज्ञान रखते हैं; परंतु वे मेरे सामने आकर प्रकट रूपमें कभी युद्ध नहीं कर सकते ॥ १ ९ ॥

अहं चैव क्षणेनैव निर्मनुष्यमिदं जगत् ।

कुर्यां शस्त्रबलेनैव ससुरासुरराक्षसम् ॥ २० ॥

अर्जुनकी ही भाँति मैं भी यदि चाहूँ तो अपने शस्त्रोंके बलसे देवता, मनुष्य, असुर तथा राक्षसोंसहित इस सम्पूर्ण जगत्को क्षणभरमें निर्जीव बना दूँ ॥ २० ॥

न त्वेवोत्सादनीया मे पाण्डोः पुत्रा जनाधिप ।

तस्माद् योधान् हनिष्यामि प्रयोगेणायुतं सदा ॥ २१ ॥

एवमेषां करिष्यामि निधनं कुरुनन्दन ।

न चेत् ते मां हनिष्यन्ति पूर्वमेव समागमे ॥ २२ ॥

परंतु जनेश्वर! मैं पाण्डुके पुत्रोंकी किसी तरह हत्या नहीं करूँगा । कुरुनन्दन! यदि पाण्डव इस युद्धमें मुझे पहले ही नहीं मार डालेंगे तो मैं अपने अस्त्रोंके प्रयोगद्वारा प्रतिदिन

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उनके पक्षके दस हजार योद्धाओंका वध करता रहूँगा, मैं इस प्रकार इनकी सेनाका संहार करूँगा ॥ २१-२२ ॥

सेनापतिस्त्वहं राजन् समये नापरेण ते ।

भविष्यामि यथाकामं तन्मे श्रोतुमिहार्हसि ॥ २३ ॥

राजन्! मैं अपनी इच्छाके अनुसार एक शर्तपर तुम्हारा सेनापति होऊँगा । उसके बदले

दूसरी शर्त नहीं मानूँगा । उस शर्तको तुम मुझसे यहाँ सुन लो ॥ २३ ॥

कर्णो वा युध्यतां पूर्वमहं वा पृथिवीपते ।

स्पर्धते हि सदात्यर्थं सूतपुत्रो मया रणे ॥ २४ ॥

पृथ्वीपते! या तो पहले कर्ण ही युद्ध कर ले या मैं ही युद्ध करूँ; क्योंकि यह सूतपुत्र सदा युद्धमें मुझसे अत्यन्त स्पर्धा रखता है ॥ २४ ॥

कर्णउवाच

नाहं जीवति गाङ्गेये राजन् योत्स्ये कथंचन ।

हते भीष्मे तु योत्स्यामि सह गाण्डीवधन्वना ॥ २५ ॥

कर्ण बोला — राजन्! मैं गंगानन्दन भीष्मके जीते - जी किसी प्रकार युद्ध नहीं करूँगा । इनके मारे जानेपर ही गाण्डीवधारी अर्जुनके साथ लडूंगा ॥ २५ ॥

वैशम्पायन उवाच

ततः सेनापतिं चक्रे विधिवद् भूरिदक्षिणम् ।

धृतराष्ट्रात्मजो भीष्मं सोऽभिषिक्तो व्यरोचत ॥ २६ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं -जनमेजय! तदनन्तर धृतराष्ट्रपुत्र दुर्योधनने प्रचुर दक्षिणा देनेवाले भीष्मजीका प्रधान सेनापतिके पदपर विधिपूर्वक अभिषेक किया । अभिषेक हो जानेपर उनकी बड़ी शोभा हुई ॥ २६ ॥

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ततो भेरीश्च शङ्खांश्च शतशोऽथ सहस्रशः ।

वादयामासुरव्यग्रा वादका राजशासनात् ॥ २७ ॥

तदनन्तर बाजा बजानेवालोंने राजाकी आज्ञासे निर्भय होकर सैकड़ों और हजारों भेरियों तथा शंखोंको बजाया ॥ २७ ॥

सिंहनादाश्च विविधा वाहनानां च निःस्वनाः ।

प्रादुरासन्ननभ्रे च वर्षं रुधिरकर्दमम् ॥ २८ ॥

उस समय वीरोंके सिंहनाद तथा वाहनोंके नाना प्रकारके शब्द सब ओर गूँज उठे ।

बिना बादलके ही आकाशसे रक्तकी वर्षा होने लगी, जिसकी कीच जम गयी ॥ २८ ॥

निर्घाताः पृथिवीकम्पा गजबृंहितनिःस्वनाः ।

आसंश्च सर्वयोधानां पातयन्तो मनांस्युत ॥ २ ९ ॥

हाथियोंके चिग्घाड़नेके साथ ही बिजलीकी गड़गड़ाहटके समान भयंकर शब्द होने लगे । धरती डोलने लगी । इन सब उत्पातोंने प्रकट होकर समस्त योद्धाओंके मानसिक उत्साहको दबा दिया ॥ २ ९ ॥

वाचश्चाप्यशरीरिण्यो दिवश्चोल्काः प्रपेदिरे ।

शिवाश्च भयवेदिन्यो नेदुर्दीप्ततरा भृशम् ॥ ३० ॥

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अशुभ आकाशवाणी सुनायी देने लगी, आकाशसे उल्काएँ गिरने लगीं, भयकी सूचना देनेवाली सियारिनियाँ जोर- जोरसे अमंगलजनक शब्द करने लगीं ॥ ३०

सैनापत्ये यदा राजा गाङ्गेयमभिषिक्तवान् ।

तदैतान्युग्ररूपाणि बभूवुः शतशो नृप ॥ ३१ ॥

नरेश्वर! राजा दुर्योधनने जब गंगानन्दन भीष्मको सेनापतिके पदपर अभिषिक्त किया, उसी समय ये सैकड़ों भयानक उत्पात प्रकट हुए ॥ ३१ ॥

ततः सेनापतिं कृत्वा भीष्मं परबलार्दनम् ।

वाचयित्वा द्विजश्रेष्ठान् गोभिर्निष्कैश्च भूरिशः ॥ ३२ ॥

वर्धमानो जयाशीर्भिर्निर्ययौ सैनिकैर्वृतः ।

आपगेयं पुरस्कृत्य भ्रातृभिः सहितस्तदा ॥ ३३ ॥

स्कन्धावारेण महता कुरुक्षेत्रं जगाम ह ॥ ३४ ॥

इस प्रकार शत्रुसेनाको पीड़ित करनेवाले भीष्मको सेनापति बनाकर दुर्योधनने श्रेष्ठ ब्राह्मणोंसे स्वस्तिवाचन कराया और उन्हें गौओं तथा सुवर्णमुद्राओंकी भूरि- भूरि दक्षिणाएँ दीं । उस समय ब्राह्मणोंने विजयसूचक आशीर्वादोंद्वारा राजाका अभ्युदय मनाया और वह सैनिकोंसे घिरकर भीष्मजीको आगे करके भाइयोंके साथ हस्तिनापुरसे बाहर निकला तथा विशाल तम्बू- शामियानोंके साथ कुरुक्षेत्रको गया ॥ ३२–३४ ॥

परिक्रम्य कुरुक्षेत्रं कर्णेन सह कौरवः ।

शिबिरं मापयामास समे देशे जनाधिप ॥ ३५ ॥

जनमेजय! कर्णके साथ कुरुक्षेत्रमें जाकर दुर्योधनने एक समतल प्रदेशमें शिविरके लिये भूमिको नपवाया ॥ ३५ ॥

मधुरानूषरे देशे प्रभूतयवसेन्धने ।

यथैव हास्तिनपुरं तद्वच्छिबिरमाबभौ ॥ ३६ ॥

ऊसररहित मनोहर प्रदेशमें जहाँ घास और ईंधनकी बहुतायत थी, दुर्योधनकी सेनाका शिविर हस्तिनापुरकी भाँति सुशोभित होने लगा ॥ ३६ ॥

इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि सैन्यनिर्याणपर्वणि भीष्मसैनापत्ये षट्पञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १५६ ॥

इसप्रकार श्रीमहाभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत सैन्यनिर्याणपर्वमें भीष्मका सेनापतित्वविषयक एक सौ छप्पनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १५६ ॥

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सप्तपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः युधिष्ठिरके द्वारा अपने सेनापतियोंका अभिषेक, यदुवंशियोंसहित बलरामजीका आगमन तथा पाण्डवोंसे विदा लेकर उनका तीर्थयात्राके लिये प्रस्थान जनमेजय उवाच

आपगेयं महात्मानं भीष्मं शस्त्रभृतां वरम् ।

पितामहं भारतानां ध्वजं सर्वमहीक्षिताम् ॥ १ ॥

बृहस्पतिसमं बुद्धया क्षमया पृथिवीसमम् ।

समुद्रमिव गाम्भीर्य हिमवन्तमिव स्थिरम् ॥ २ ॥

प्रजापतिमिवौदार्ये तेजसा भास्करोपमम् ।

महेन्द्रमिव शत्रूणां ध्वंसनं शरवृष्टिभिः ॥ ३ ॥

रणयज्ञे प्रवितते सुभीमे लोमहर्षणे ।

दीक्षितं चिररात्राय श्रुत्वा तत्र युधिष्ठिरः ॥ ४ ॥

किमब्रवीन्महाबाहुः सर्वशस्त्रभूतां वरः ।

भीमसेनार्जुनौ वापि कृष्णो वा प्रत्यभाषत ॥ ५ ॥

जनमेजयने पूछा— भगवन्! भरतवंशियोंके पितामह गंगानन्दन महात्मा भीष्म सम्पूर्ण शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ थे । समस्त राजाओंमें ध्वजके समान उनका बहुत ऊँचा स्थान था । वे बुद्धिमें बृहस्पति, क्षमामें पृथ्वी, गम्भीरतामें समुद्र, स्थिरतामें हिमवान्, उदारतामें प्रजापति और तेजमें भगवान् सूर्यके समान थे । वे अपने बाणोंकी वर्षाद्वारा देवराज इन्द्रके समान शत्रुओंका विध्वंस करनेवाले थे । उस समय जो अत्यन्त भयंकर तथा रोमांचकारी रणयज्ञ आरम्भ हुआ था, उसमें उन्होंने जब दीर्घकालके लिये दीक्षा ले ली, तब इस समाचारको सुननेके पश्चात् सम्पूर्ण शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ महाबाहु युधिष्ठिरने क्या कहा? भीमसेन तथा अर्जुनने भी उसके बारेमें क्या कहा? अथवा भगवान् श्रीकृष्णने अपना मत किस प्रकार व्यक्त किया? ॥ १–५ ॥ वैशम्पायन उवाच

आपद्धर्मार्थकुशलो महाबुद्धिर्युधिष्ठिरः ।

सर्वान् भ्रातॄन् समानीय वासुदेवं च शाश्वतम् ॥ ६ ॥

उवाच वदतां श्रेष्ठः सान्त्वपूर्वमिदं वचः । वैशम्पायनजीने कहा- राजन्! आपद्धर्मके विषयमें कुशल वक्ताओंमें श्रेष्ठ, परम बुद्धिमान् युधिष्ठिरने उस समय सम्पूर्ण भाइयों तथा सनातन भगवान् वासुदेवको बुलाकर

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सान्त्वनापूर्वक इस प्रकार कहा- ॥ ६३ ॥

पर्याक्रामत सैन्यानि यत्तास्तिष्ठत दंशिताः ॥ ७ ॥

पितामहेन वो युद्धं पूर्वमेव भविष्यति ।

तस्मात् सप्तसु सेनासु प्रणेतॄन् मम पश्यत ॥ ८ ॥

' तुम सब लोग सब ओर घूम- फिरकर अपनी सेनाओंका निरीक्षण करो और कवच

आदिसे सुसज्जित होकर खड़े हो जाओ । सबसे पहले पितामह भीष्मसे तुम्हारा युद्ध होगा ।

इसलिये अपनी सात अक्षौहिणी सेनाओंके सेनापतियोंकी देखभाल कर लो ' ॥ ७-८ ॥

कृष्णउवाच

यथार्हति भवान् वक्तुमस्मिन् काले ह्युपस्थिते ।

तथेदमर्थवद् वाक्यमुक्तं ते भरतर्षभ ॥ ९ ॥

भगवान् श्रीकृष्ण बोले- भरतकुलभूषण! ऐसा अवसर उपस्थित होनेपर आपको जैसी बात कहनी चाहिये, वैसी ही यह अर्थयुक्त बात आपने कही है ॥ ९ ॥

रोचते मे महाबाहो क्रियतां यदनन्तरम् ।

नायकास्तव सेनायां क्रियन्तामिह सप्त वै ॥ १० ॥

महाबाहो! मुझे आपकी बात ठीक लगती है; अतः इस समय जो आवश्यक कर्तव्य है, उसका पालन कीजिये । अपनी सेनाके सात सेनापतियोंको यहाँ निश्चित कर लीजिये ॥ १० ॥

वैशम्पायन उवाच

ततो द्रुपदमानाय्य विराटं शिनिपुङ्गवम् ।

धृष्टद्युम्नं च पाञ्चाल्यं धृष्टकेतुं च पार्थिव ॥ ११ ॥

शिखण्डिनं च पाञ्चाल्यं सहदेवं च मागधम् ।

एतान् सप्त महाभागान् वीरान् युद्धाभिकाङ्क्षिणः ॥ १२ ॥

सेनाप्रणेतॄन् विधिवदभ्यषिञ्चद् युधिष्ठिरः ।

सर्वसेनापतिं चात्र धृष्टद्युम्नं चकार ह ॥ १३ ॥

द्रोणान्तहेतोरुत्पन्नो य इद्धाज्जातवेदसः । वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! तदनन्तर राजा द्रुपद, विराट, सात्यकि, पांचालराजकुमार धृष्टद्युम्न, धृष्टकेतु, पांचालवीर शिखण्डी और मगधराज सहदेव – इन सात युद्धाभिलाषी महाभाग वीरोंको युधिष्ठिरने विधिपूर्वक सेनापतिके पदपर अभिषिक्त कर दिया और धृष्टद्युम्नको सम्पूर्ण सेनाओंका प्रधान सेनापति बना दिया, जो द्रोणाचार्यका अन्त करनेके लिये प्रज्वलित अग्निसे उत्पन्न हुए थे ॥ ११ – १३३ ॥ सर्वेषामेव तेषां तु समस्तानां महात्मनाम् ॥ १४ ॥

सेनापतिपतिं चक्रे गुडाकेशं धनंजयम् ।

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तदनन्तर उन्होंने निद्राविजयी वीर धनंजयको उन समस्त महामना वीर सेनापतियोंका भी अधिपति बना दिया ॥ १४३ ॥

अर्जुनस्यापि नेता च संयन्ता चैव वाजिनाम् ॥ १५ ॥

संकर्षणानुजः श्रीमान् महाबुद्धिर्जनार्दनः । अर्जुनके भी नेता और उनके घोड़ोंके भी नियन्ता हुए बलरामजीके छोटे भाई परम बुद्धिमान् श्रीमान् भगवान् श्रीकृष्ण ॥ १५३ ॥

तद् दृष्ट्वोपस्थितं युद्धं समासन्नं महात्ययम् ॥ १६ ॥

प्राविशद् भवनं राजन् पाण्डवानां हलायुधः ।

सहाक्रूरप्रभृतिभिर्गदसाम्बोद्धवादिभिः ॥ १७ ॥

रौक्मिणेयाहुकसुतैश्चारुदेष्णपुरोगमैः ।

वृष्णिमुख्यैरधिगतैर्व्याघ्रैरिव बलोत्कटैः ॥ १८ ॥

अभिगुप्तो महाबाहुर्मरुद्भिरिव वासवः ।

नीलकौशेयवसनः कैलासशिखरोपमः ॥ १ ९ ॥

सिंहखेलगतिः श्रीमान् मदरक्तान्तलोचनः । राजन्! तदनन्तर उस महान् संहारकारी युद्धको अत्यन्त संनिकट और प्रायः उपस्थित हुआ देख नीले रंगका रेशमी वस्त्र पहने कैलासशिखरके समान गौर- वर्णवाले हलधारी महाबाहु श्रीमान् बलरामजीने पाण्डवोंके शिविरमें सिंहके समान लीलापूर्वक गतिसे प्रवेश किया । उनके नेत्रोंके कोने मदसे अरुण हो रहे थे । उनके साथ अक्रूर आदि यदुवंशी तथा गद, साम्ब, उद्धव, प्रद्युम्न, चारुदेष्ण तथा आहुकपुत्र आदि प्रमुख वृष्णिवंशी भी जो सिंह और व्याघ्रोंके समान अत्यन्त उत्कट बल- शाली थे, उन सबसे सुरक्षित बलरामजी वैसे ही सुशोभित हुए, मानो मरुद्गणोंके साथ महेन्द्र शोभा पा रहे हों ॥ तं दृष्ट्वा धर्मराजश्च केशवश्च महाद्युतिः ॥ २० ॥

उदतिष्ठत् ततः पार्थो भीमकर्मा वृकोदरः ।

गाण्डीवधन्वा ये चान्ये राजानस्तत्र केचन ॥ २१ ॥

उन्हें देखते ही धर्मराज युधिष्ठिर, महातेजस्वी श्रीकृष्ण, भयंकर कर्म करनेवाले कुन्तीपुत्र भीमसेन तथा अन्य जो कोई भी राजा वहाँ विद्यमान थे, वे सब - के - सब उठकर खड़े हो गये ॥ २०-२१ ॥

पूजयांचक्रिरे ते वै समायान्तं हलायुधम् ।

ततस्तं पाण्डवो राजा करे पस्पर्श पाणिना ॥ २२ ॥

हलायुध बलरामजीको आया देख सबने उनका समादर किया । तदनन्तर पाण्डुनन्दन राजा युधिष्ठिरने अपने हाथसे उनके हाथका स्पर्श किया ॥ २२ ॥

वासुदेवपुरोगास्तं सर्व एवाभ्यवादयन् ।

विराटद्रुपदौ वृद्धावभिवाद्य हलायुधः ॥ २३ ॥