03.Mahabharata Volume 3 — पृष्ठ 1051–1060

महाभारत — खण्ड ३ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1051–1060

पृष्ठ 1051

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‘ इसीलिये तू घमंडमें भरकर अपने ऊपर आये हुए वर्तमान संकटको नहीं देख पाता है, अतः मैं सबसे पहले तेरे सेनासमूहमें प्रवेश करके कुरुकुलके वृद्ध पुरुष भीष्मका ही तेरी आँखोंके सामने वध करूँगा ॥ १२ ॥

सूर्योदये युक्तसेनः प्रतीक्ष्य ध्वजी रथी रक्ष तं सत्यसंधम् । अहं हि वः पश्यतां द्वीपमेनं भीष्मं रथात् पातयिष्यामि बाणैः ॥ १३ ॥

‘ तू सूर्योदयके समय सेनाको सुसज्जित करके ध्वज और रथसे सम्पन्न हो सब ओर दृष्टि रखते हुए सत्यप्रतिज्ञ भीष्मकी रक्षा कर । मैं तेरे सैनिकोंके देखते - देखते तेरे लिये आश्रय बने हुए इन भीष्मजीको बाणोंद्वारा मारकर रथसे नीचे गिरा दूँगा ॥ १३ ॥

श्वोभूते कत्थनावाक्यं विज्ञास्यति सुयोधनः ।

आचितं शरजालेन मया दृष्ट्वा पितामहम् ॥ १४ ॥

' कल सबेरे पितामहको मेरे द्वारा चलाये हुए बाणोंके समूहसे व्याप्त देखकर दुर्योधनको अपनी बढ़ - बढ़कर कही हुई बातोंका परिणाम ज्ञात होगा ॥ १४ ॥

यदुक्तश्च सभामध्ये पुरुषो ह्रस्वदर्शनः ।

क्रुद्धेन भीमसेनेन भ्राता दुःशासनस्तव ॥ १५ ॥

अधर्मज्ञो नित्यवैरी पापबुद्धिर्नृशंसकृत् ।

सत्यां प्रतिज्ञामचिराद् द्रक्ष्यसे तां सुयोधन ॥ १६ ॥

' सुयोधन! क्रोधमें भरे हुए भीमसेनने उस क्षुद्र विचारवाले, अधर्मज्ञ, नित्य वैरी, पापबुद्धि और क्रूरकर्मा तेरे भाई दुःशासनके प्रति जो बात कही है, उस प्रतिज्ञाको तू शीघ्र ही सत्य हुई देखेगा ॥ १५-१६ ॥

अभिमानस्य दर्पस्य क्रोधपारुष्ययोस्तथा ।

नैष्ठुर्यस्यावलेपस्य आत्मसम्भावनस्य च ॥ १७ ॥

नृशंसतायास्तैक्ष्ण्यस्य धर्मविद्वेषणस्य च ।

अधर्मस्यातिवादस्य वृद्धातिक्रमणस्य च ॥ १८ ॥

दर्शनस्य च वक्रस्य कृत्स्नस्यापनयस्य च ।

द्रक्ष्यसि त्वं फलं तीव्रमचिरेण सुयोधन ॥ १ ९ ॥

' दुर्योधन! तू अभिमान, दर्प, क्रोध, कटुभाषण, निष्ठुरता, अहंकार, आत्मप्रशंसा, क्रूरता, तीक्ष्णता, धर्मविद्वेष, अधर्म, अतिवाद, वृद्ध पुरुषोंके अपमान तथा टेढ़ी आँखोंसे देखनेका और अपने समस्त अन्याय एवं अत्याचारोंका घोर फल शीघ्र ही देखेगा ॥ १७– १ ९ ॥

वासुदेवद्वितीये हि मयि क्रुद्धे नराधम ।

आशा ते जीविते मूढ राज्ये वा केन हेतुना ॥ २० ॥

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‘ मूढ़ नराधम! भगवान् श्रीकृष्णके साथ मेरे कुपित होनेपर तू किस कारणसे जीवन तथा राज्यकी आशा करता है? ॥ २० ॥

शान्ते भीष्मे तथा द्रोणे सूतपुत्रे च पातिते ।

निराशो जीविते राज्ये पुत्रेषु च भविष्यसि ॥ २१ ॥

' भीष्म, द्रोणाचार्य तथा सूतपुत्र कर्णके मारे जानेपर तू अपने जीवन, राज्य तथा पुत्रोंकी रक्षाकी ओरसे निराश हो जायगा ॥ २१ ॥

भ्रातॄणां निधनं श्रुत्वा पुत्राणां च सुयोधन ।

भीमसेनेन निहतो दुष्कृतानि स्मरिष्यसि ॥ २२ ॥

‘ सुयोधन! तू अपने भाइयों और पुत्रोंका मरण सुनकर और भीमसेनके हाथसे स्वयं भी मारा जाकर अपने पापोंको याद करेगा ॥ २२ ॥

द्वितीयां प्रतिज्ञां हि प्रतिजानामि कैतव ।

सत्यं ब्रवीम्यहं ह्येतत् सर्वं सत्यं भविष्यति ॥ २३ ॥

युधिष्ठिरोऽपि कैतव्यमुलूकमिदमब्रवीत् ।

उलूक मद्वचो ब्रूहि गत्वा तात सुयोधनम् ॥ २४ ॥

' शकुनिपुत्र! मैं दूसरी बार प्रतिज्ञा करना नहीं जानता । तुझसे सच्ची बात कहता हूँ । यह सब कुछ सत्य होकर रहेगा। ' तत्पश्चात् युधिष्ठिरने भी धूर्त जुआरीके पुत्र उलूकसे इस प्रकार कहा — ‘ वत्स उलूक! तू दुर्योधनके पास जाकर मेरी यह बात कहना ॥ २३-२४ ॥

स्वेन वृत्तेन मे वृत्तं नाधिगन्तुं त्वमर्हसि ।

उभयोरन्तरं वेद सूनृतानृतयोरपि ॥ २५ ॥

' सुयोधन! तुझे अपने आचरणके अनुसार ही मेरे आचरणको नहीं समझना चाहिये । मैं दोनोंके बर्तावका तथा सत्य और झूठका भी अन्तर समझता हूँ ॥ २५ ॥

न चाहं कामये पापमपि कीटपिपीलयोः ।

किं पुनर्ज्ञातिषु वधं कामयेयं कथंचन ॥ २६ ॥

‘ मैं तो कीड़ों और चींटियोंको भी कष्ट पहुँचाना नहीं चाहता; फिर अपने भाई -बन्धुओं अथवा कुटुम्बी - जनोंके वधकी कामना किसी प्रकार भी कैसे कर सकता हूँ? ॥ २६ ॥

एतदर्थं मया तात पञ्च ग्रामा वृताः पुरा ।

कथं तव सुदुर्बुद्धे न प्रेक्षे व्यसनं महत् ॥ २७ ॥

‘ तात! इसीलिये पहले मैंने केवल पाँच ही गाँव माँगे थे । दुर्बुद्धे! मेरे ऐसा करनेका यही उद्देश्य था कि किसी तरह तेरे ऊपर महान् संकट आया हुआ न देखूँ ॥ २७ ॥

स त्वं कामपरीतात्मा मूढभावाच्च कत्थसे ।

तथैव वासुदेवस्य न गृह्णासि हितं वचः ॥ २८ ॥

पृष्ठ 1053

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‘ परंतु तेरा मन लोभ और तृष्णामें डूबा हुआ है । तू मूर्खताके कारण अपनी झूठी प्रशंसा करता है और भगवान् श्रीकृष्णके हितकारक वचनको भी नहीं मान रहा है ॥ २८ ॥

किं चेदानीं बहूक्तेन युध्यस्व सह बान्धवैः । ‘ अब इस समय अधिक कहनेसे क्या लाभ? तू अपने भाई- बन्धुओंके साथ आकर युद्ध कर' ॥ २८ ॥

मम विप्रियकर्तारं कैतव्य ब्रूहि कौरवम् ॥ २ ९ ॥ श्रुतं वाक्यं गृहीतोऽर्थो मतं यत् ते तथास्तु तत् । ' उलूक! तू मेरा अप्रिय करनेवाले दुर्योधनसे कहना - ' तेरा संदेश सुना और उसका

अभिप्राय समझ लिया । तेरी जैसी इच्छा है, वैसा ही हो ' ॥ २ ९ ॥

भीमसेनस्तता वाक्यं भूय आह नृपात्मजम् ॥ ३० ॥

उलूक मद्वचो ब्रूहि दुर्मतिं पापपूरुषम् ।

शठं नैकृतिकं पापं दुराचारं सुयोधनम् ॥ ३१ ॥

तदनन्तर भीमसेनने पुनः राजकुमार उलूकसे यह बात कही – ' उलूक! तू दुर्बुद्धि, पापात्मा, शठ, कपटी, पापी तथा दुराचारी दुर्योधनसे मेरी यह बात भी कह देना ॥ ३०-३१ ॥

गृध्रोदरे वा वस्तव्यं पुरे वा नागसाह्वये ।

प्रतिज्ञातं मया तच्च सभामध्ये नराधम ॥ ३२ ॥

कर्ताहं तद् वचः सत्यं सत्येनैव शपामि ते । ' नराधम! तुझे या तो मरकर गीधके पेटमें निवास करना चाहिये या हस्तिनापुरमें जाकर छिप जाना चाहिये । मैंने सभामें जो प्रतिज्ञा की है, उसे अवश्य सत्य कर दिखाऊँगा । यह बात मैं सत्यकी ही शपथ खाकर तुझसे कहता हूँ ॥ ३२ ॥

दुःशासनस्य रुधिरं हत्वा पास्याम्यहं मृधे ॥ ३३ ॥

सक्थिनी तव भङ्क्त्वैव हत्वा हि तव सोदरान् ।

सर्वेषां धार्तराष्ट्राणामहं मृत्युः सुयोधन ॥ ३४ ॥

‘ मैं युद्धमें दुःशासनको मारकर उसका रक्त पीऊँगा और तेरे सारे भाइयोंको मारकर तेरी जाँघें भी तोड़कर ही रहूँगा। सुयोधन! मैं धृतराष्ट्रके सभी पुत्रोंकी मृत्यु हूँ ॥ ३३-३४ ॥

सर्वेषां राजपुत्राणामभिमन्युरसंशयम् ।

कर्मणा तोषयिष्यामि भूयश्चैव वचः शृणु ॥ ३५ ॥

‘ इसी प्रकार सारे राजकुमारोंकी मृत्युका कारण अभिमन्यु होगा, इसमें संशय नहीं है । मैं अपने पराक्रमद्वारा तुझे अवश्य संतुष्ट करूँगा । तू मेरी एक बात और सुन ले ॥ ३५ ॥

हत्वा सुयोधन त्वां वै सहितं सर्वसोदरैः ।

आक्रमिष्ये पदा मूर्ध्नि धर्मराजस्य पश्यतः ॥ ३६ ॥

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‘ सुयोधन! तुझे समस्त भाइयोंसहित मारकर धर्मराज युधिष्ठिरके देखते - देखते तेरे मस्तकको पैरसे कुचल दूँगा ' ॥ ३६ ॥

नकुलस्तु ततो वाक्यमिदमाह महीपते ।

उलूक ब्रूहि कौरव्यं धार्तराष्ट्रं सुयोधनम् ॥ ३७ ॥

श्रुतं ते गदतो वाक्यं सर्वमेव यथातथम् ।

तथा कर्तास्मि कौरव्य यथा त्वमनुशास्सि माम् ॥ ३८ ॥

जनमेजय! तत्पश्चात् नकुलने भी इस प्रकार कहा–' उलूक! तू कुरुकुलकलंक धृतराष्ट्रपुत्र दुर्योधन - से कहना, तेरी कही हुई सारी बातें मैंने यथार्थरूपसे सुन लीं। कौरव! तू मुझे जैसा उपदेश दे रहा है, उसके अनुसार ही मैं सब कुछ करूँगा ' ॥ ३७-३८ ॥

सहदेवोऽपि नृपते इदमाह वचोऽर्थवत् ।

सुयोधन मतिर्या ते वृथैषा ते भविष्यति ॥ ३ ९ ॥

शोचिष्यसे महाराज सपुत्रज्ञातिबान्धवः ।

इमं च क्लेशमस्माकं हृष्टो यत् त्वं विकत्थसे ॥ ४० ॥

राजन्! तदनन्तर सहदेवने भी यह सार्थक वचन कहा - ' महाराज दुर्योधन! आज जो तेरी बुद्धि है, वह व्यर्थ हो जायगी । इस समय हमारे इस महान् क्लेशका जो तू हर्षोत्फुल्ल होकर वर्णन कर रहा है, इसका फल यह होगा कि तू अपने पुत्र, कुटुम्बी तथा बन्धुजनोंसहित शोकमें डूब जायगा' ॥ ३ ९ -४० ॥ विराटद्रुपदौ वृद्धावुलूकमिदमूचतुः ।

दासभावं नियच्छेव साधोरिति मतिः सदा ।

तौ च दासावदासौ वा पौरुषं यस्य यादृशम् ॥ ४१ ॥

तदनन्तर बूढ़े राजा विराट और द्रुपदने उलूकसे इस प्रकार कहा — ‘ उलूक! तू दुर्योधनसे कहना, राजन्! हम दोनोंका विचार सदा यही रहता है कि हम साधु पुरुषोंके दास हो जायँ । वे दोनों हम विराट और द्रुपद दास हैं या अदास; इसका निर्णय युद्धमें जिसका जैसा पुरुषार्थ होगा, उसे देखकर किया जायगा' ॥ ४१ ॥

शिखण्डी तु ततो वाक्यमुलूकमिदमब्रवीत् ।

वक्तव्यो भवता राजा पापेष्वभिरतः सदा ॥ ४२ ॥

तत्पश्चात् शिखण्डीने उलूकसे इस प्रकार कहा – ' उलूक! सदा पापमें ही तत्पर रहनेवाले अपने राजाके पास जाकर तू इस प्रकार कहना- ॥ ४२ ॥

पश्य त्वं मां रणे राजन् कुर्वाणं कर्म दारुणम् ।

यस्य वीर्यं समासाद्य मन्यसे विजयं युधि ॥ ४३ ॥

तमहं पातयिष्यामि रथात् तव पितामहम् । ‘ राजन्! तुम संग्राममें मुझे भयानक कर्म करते हुए देखना । जिसके पराक्रमका भरोसा करके तुम युद्धमें अपनी विजय हुई मानते हो, तुम्हारे उस पितामहको मैं रथसे मार

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गिराऊँगा ॥ ४३ ॥

अहं भीष्मवधात् सृष्टो नूनं धात्रा महात्मना ॥ ४४ ॥

सोऽहं भीष्मं हनिष्यामि मिषतां सर्वधन्विनाम् । ' निश्चय ही महामना विधाताने भीष्मके वधके लिये ही मेरी सृष्टि की है । अतः मैं समस्त धनुर्धरोंके देखते - देखते भीष्मको मार डालूँगा' ॥ ४४ ॥

धृष्टद्युम्नोऽपि कैतव्यमुलूकमिदमब्रवीत् ॥ ४५ ॥

सुयोधनो मम वचो वक्तव्यो नृपतेः सुतः ।

अहं द्रोणं हनिष्यामि सगणं सहबान्धवम् ॥ ४६ ॥

इसके बाद धृष्टद्युम्नने भी कितवकुमार उलूकसे यह बात कही – ' उलूक! तू राजपुत्र दुर्योधनसे मेरी यह बात कह देना, मैं द्रोणाचार्यको उनके गणों और बन्धु - बान्धवोंसहित मार डालूँगा ॥ ४५-४६ ॥

अवश्यं च मया कार्यं पूर्वेषां चरितं महत् ।

कर्ता चाहं तथा कर्म यथा नान्यः करिष्यति ॥ ४७ ॥

'मुझे अपने पूर्वजोंके महान् चरित्रका अनुकरण अवश्य करना चाहिये । अतः मैं युद्धमें वह पराक्रम कर दिखाऊँगा, जैसा दूसरा कोई नहीं करेगा' ॥ ४७ ॥

तमब्रवीद् धर्मराजः कारुण्यार्थं वचो महत् ।

नाहं ज्ञातिवधं राजन् कामयेयं कथंचन ॥ ४८ ॥

तदनन्तर धर्मराज युधिष्ठिरने करुणावश फिर यह महत्त्वपूर्ण बात कही —‘राजन्! मैं किसी प्रकार भी अपने कुटुम्बियोंका वध नहीं कराना चाहता ॥ ४८ ॥

तवैव दोषाद् दुर्बुद्धे सर्वमेतत् त्वनावृतम् ।

स गच्छ मा चिरं तात उलूक यदि मन्यसे ॥ ४९ ॥

इह वा तिष्ठ भद्रं ते वयं हि तव बान्धवाः । 'किंतु दुर्बुद्धे! यह सब कुछ तेरे ही दोषसे प्राप्त हुआ है । तात उलूक! तेरी इच्छा हो, तो शीघ्र चला जा । अथवा तेरा कल्याण हो, तू यहीं रह; क्योंकि हम भी तेरे भाई- बन्धु ही हैं' ॥ ४ ९ ॥ उलूकस्तु तो राजन् धर्मपुत्रं युधिष्ठिरम् ॥ ५० ॥

आमन्त्र्य प्रययौ तत्र यत्र राजा सुयोधनः । जनमेजय! तदनन्तर उलूक धर्मपुत्र राजा युधिष्ठिरसे विदा ले जहाँ राजा दुर्योधन था, वहीं चला गया ॥ ५० ॥

उलूकस्तत आगम्य दुर्योधनममर्षणम् ॥ ५१ ॥

अर्जुनस्य समादेशं यथोक्तं सर्वमब्रवीत् ।

वासुदेवस्य भीमस्य धर्मराजस्य पौरुषम् ॥ ५२ ॥

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वहाँ आकर उलूकने अमर्षशील दुर्योधनको अर्जुनका सारा संदेश ज्यों - का -त्यों सुना दिया । इसी प्रकार उसने भगवान् श्रीकृष्ण, भीमसेन और धर्मराज युधिष्ठिरकी पुरुषार्थभरी बातोंका भी वर्णन किया ॥ ५१-५२ ॥ नकुलस्य विराटस्य द्रुपदस्य च भारत ।

सहदेवस्य च वचो धृष्टद्युम्नशिखण्डिनोः ।

केशवार्जुनयोर्वाक्यं यथोक्तं सर्वमब्रवीत् ॥ ५३ ॥

भारत! फिर उसने नकुल, सहदेव, विराट, द्रुपद, धृष्टद्युम्न, शिखण्डी, भगवान् श्रीकृष्ण तथा अर्जुनके भी सारे वचनोंको ज्यों - का- त्यों कह दिया ॥ ५३ ॥

कैतव्यस्य तु तद् वाक्यं निशम्य भरतर्षभः ।

दुःशासनं च कर्णं च शकुनिं चापि भारत ॥ ५४ ॥

भारत! उलूकका वह कथन सुनकर भरतश्रेष्ठ दुर्योधनने दुःशासन, कर्ण तथा शकुनिसे कहा— ॥ ५४ ॥

आज्ञापयत राज्ञश्च बलं मित्रबलं तथा ।

यथा प्रागुदयात् सर्वे युक्तास्तिष्ठन्त्वनीकिनः ॥ ५५ ॥

' बन्धुओ! राजाओं तथा मित्रोंकी सेनाओंको आज्ञा दे दो, जिससे समस्त सैनिक कल सूर्योदयसे पूर्व ही तैयार होकर युद्धके मैदानमें डट जायँ' ॥ ५५ ॥

ततः कर्णसमादिष्टा दूताः संत्वरिता रथैः ।

उष्ट्रवामीभिरप्यन्ये सदश्चैश्च महाजवैः ॥ ५६ ॥

तूर्णं परिययुः सेनां कृत्स्नां कर्णस्य शासनात् ।

आज्ञापयन्तो राज्ञश्च योगः प्रागुदयादिति ॥ ५७ ॥

तत्पश्चात् कर्णके भेजे हुए दूत बड़ी उतावलीके साथ रथों, ऊँट - ऊँटनियों तथा अत्यन्त वेगशाली अच्छे - अच्छे घोड़ोंपर सवार हो तीव्र गतिसे सम्पूर्ण सेनाओंमें गये और कर्णके आदेशके अनुसार सबको राजाकी यह आज्ञा सुनाने लगे कि कल सूर्योदयसे पहले ही युद्धके लिये तैयार हो जाना चाहिये ॥ ५६-५७ ॥ इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि उलूकदूतागमनपर्वणि उलूकापयाने त्रिषष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १६३ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत उलूकदूतागमनपर्वमें उलूकके लौट जानेसे सम्बन्ध रखनेवाला एक सौ तिरसठवाँ अध्याय पूराहुआ ॥ १६३ ॥

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चतुःषष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः पाण्डव सेनाका युद्धके मैदानमें जाना और धृष्टद्युम्नके द्वारा योद्धाओंकी अपने - अपने योग्य विपक्षियोंके साथ युद्ध करनेके लिये नियुक्ति संजय उवाच

उलूकस्य वचः श्रुत्वा कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः ।

सेनां निर्यापयामास धृष्टद्युम्नपुरोगमाम् ॥ १ ॥

संजय कहते हैं— राजन्! इधर उलूककी बातें सुनकर कुन्तीनन्दन युधिष्ठिरने भी धृष्टद्युम्नके नेतृत्वमें अपनी सेनाका युद्धके लिये प्रस्थान कराया ॥ १ ॥

पदातिनीं नागवतीं रथिनीमश्ववृन्दिनीम् ।

चतुर्विधबलां भीमामकम्पां पृथिवीमिव ॥ २ ॥

उसमें पैदल, हाथी, रथ और अश्वसमूह भी थे । इस प्रकार वह चतुरंगिणी सेना बड़ी भयंकर और पृथ्वीके समान अविचल थी ॥ २ ॥

भीमसेनादिभिर्गुप्तां सार्जुनैश्च महारथैः ।

धृष्टद्युम्नवशां दुर्गां सागरस्तिमितोपमाम् ॥ ३ ॥

अर्जुन और भीमसेन आदि महारथी उसकी रक्षा करते थे । वह दुर्गम सेना धृष्टद्युम्नके अधीन थी और प्रशान्त एवं स्थिर समुद्रके समान जान पड़ती थी ॥ ३ ॥

तस्यास्त्वग्रे महेष्वासः पाञ्चाल्यो युद्धदुर्मदः ।

द्रोणप्रेप्सुरनीकानि धृष्टद्युम्नो व्यकर्षत ॥ ४ ॥

उसके आगे - आगे रणदुर्मद पांचालराजकुमार महाधनुर्धर धृष्टद्युम्न चल रहे थे, जो सदा आचार्य द्रोणसे युद्ध करनेकी इच्छा रखते थे । वे सारी सेनाको अपने पीछे खींचे लिये जाते थे ॥ ४ ॥

यथाबलं यथोत्साहं रथिनः समुपादिशत् ।

अर्जुनं सूतपुत्राय भीमं दुर्योधनाय च ॥ ५ ॥

उन्होंने जिस वीरका जैसा बल और उत्साह था, उसका विचार करते हुए अपने रथियोंको योग्य प्रतिपक्षीके साथ युद्ध करनेका आदेश दिया । अर्जुनको सूतपुत्र कर्णका और भीमसेनको दुर्योधनका सामना करनेके लिये नियुक्त किया ॥ ५ ॥

धृष्टकेतुं च शल्याय गौतमायोत्तमौजसम् ।

अश्वत्थाम्ने च नकुलं शैब्यं च कृतवर्मणे ॥ ६ ॥

सैन्धवाय च वार्ष्णेयं युयुधानं समादिशत् ।

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शिखण्डिनं च भीष्माय प्रमुखे समकल्पयत् ॥ ७ ॥

धृष्टकेतुको शल्यसे, उत्तमौजाको कृपाचार्यसे, नकुलको अश्वत्थामासे, शैब्यको कृतवर्मासे, वृष्णिवंशी सात्यकिको सिन्धुराज जयद्रथसे और शिखण्डीको भीष्मसे मुख्यतः युद्ध करनेका आदेश दिया ॥ ६-७ ॥

सहदेवं शकुनये चेकितानं शलाय वै ।

द्रौपदेयांस्तथा पञ्च त्रिगर्तेभ्यः समादिशत् ॥ ८ ॥

सहदेवको शकुनिका, चेकितानको शलका और द्रौपदीके पाँचों पुत्रोंको त्रिगर्तोंका सामना करनेके लिये नियत कर दिया ॥ ८ ॥

वृषसेनाय सौभद्रं शेषाणां च महीक्षिताम् ।

स समर्थं हि तं मेने पार्थादभ्यधिकं रणे ॥ ९ ॥

कर्णपुत्र वृषसेन तथा शेष राजाओंके साथ युद्ध करने का काम सुभद्राकुमार अभिमन्युको सौंपा, क्योंकि वे उसे युद्धमें अर्जुनसे भी अधिक शक्तिशाली समझते थे ॥ ९ ॥

एवं विभज्य योधांस्तान् पृथक् च सह चैव ह ।

ज्वालावर्णो महेष्वासो द्रोणमंशमकल्पयत् ॥ १० ॥

धृष्टद्युम्नो महेष्वासः सेनापतिपतिस्ततः । इस प्रकार समस्त योद्धाओंका पृथक्- पृथक् और एक साथ विभाजन करके सेनापतियोंके प्रति प्रज्वलित अग्निके समान कान्तिमान् महाधनुर्धर धृष्टद्युम्नने द्रोणाचार्यको अपने हिस्सेमें रखा ॥ १० ॥

विधिवद् व्यूह्य मेधावी युद्धाय धृतमानसः ॥ ११ ॥

यथोद्दिष्टानि सैन्यानि पाण्डवानामयोजयत् ।

जयाय पाण्डुपुत्राणां यत्तस्तस्थौ रणाजिरे ॥ १२ ॥

उनके मनमें युद्धके लिये दृढ निश्चय था । मेधावी धृष्टद्युम्नने पाण्डवोंकी पूर्वोक्त सेनाओंकी विधिपूर्वक व्यूहरचना करके उन सबको युद्धके लिये नियुक्त किया । तत्पश्चात् वे पाण्डवोंकी विजयके लिये संनद्ध होकर समरांगणमें खड़े हुए ॥ ११-१२ ॥ इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि उलूकदूतागमनपर्वणि सेनापतिनियोगे चतुःषष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १६४ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत उलूकदूतागमनपर्वमें सेनापतिके द्वारा सैनिकोंकी युद्धमें नियुक्तिविषयक एक सौ चौंसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १६४ ॥

Fara

पृष्ठ 1059

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पाण्डवोंकी विशाल सेना

पृष्ठ 1060

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(रथातिरथसंख्यानपर्व) पञ्चषष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः दुर्योधनके पूछनेपर भीष्मका कौरवपक्षके रथियों और अतिरथियोंका परिचय देना धृतराष्ट्रउवाच

प्रतिज्ञाते फाल्गुनेन वधे भीष्मस्य संयुगे ।

किमकुर्वत मे मन्दाः पुत्रा दुर्योधनादयः ॥ १ ॥

धृतराष्ट्रने पूछा — संजय! जब अर्जुनने युद्धभूमिमें भीष्मका वध करनेकी प्रतिज्ञा कर ली, तब दुर्योधन आदि मेरे मूर्ख पुत्रोंने क्या किया? ॥ १ ॥

तमेव हि पश्यामि गाङ्गेयं पितरं रणे ।

वासुदेवसहायेन पार्थेन दृढधन्वना ॥ २ ॥

अर्जुन सुदृढ़ धनुष धारण करते हैं । इसके सिवा भगवान् श्रीकृष्ण उनके सहायक हैं; अतः मैं रणभूमिमें अपने पिता गंगानन्दन भीष्मको उनके द्वारा मारा गया ही मानता हूँ ॥ २ ॥

स चापरिमितप्रज्ञस्तच्छ्रुत्वा पार्थभाषितम् ।

किमुक्तवान् महेष्वासो भीष्मः प्रहरतां वरः ॥ ३ ॥

अर्जुनकी उस प्रतिज्ञाको सुनकर अमित बुद्धिमान् योद्धाओंमें श्रेष्ठ महाधनुर्धर भीष्मने क्या कहा? ॥ ३ ॥

सैनापत्यं च सम्प्राप्य कौरवाणां धुरन्धरः ।

किमचेष्टत गाङ्गेयो महाबुद्धिपराक्रमः ॥ ४ ॥

कौरवकुलका भार वहन करनेवाले परम बुद्धिमान् और पराक्रमी गंगापुत्र भीष्मने सेनापतिका पद प्राप्त करनेके पश्चात् युद्धके लिये कौन - सी चेष्टा की? ॥ ४ ॥

वैशम्पायन उवाच

ततस्तत् संजयस्तस्मै सर्वमेव न्यवेदयत् ।

यथोक्तं कुरुवृद्धेन भीष्मेणामिततेजसा । ५ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! तदनन्तर संजयने अमिततेजस्वी कुरुवृद्ध भीष्मने जैसा कहा था, वह सब कुछ राजा धृतराष्ट्रको बताया ॥ ५ ॥