श्रीगणेशाय नमः।

महाभारत — खण्ड ३ — पृष्ठ 1041–1050

महाभारत — खण्ड ३ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1041–1050

पृष्ठ 1041

महाभारत — खण्ड ३, पृष्ठ 1041 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

पुनरेव महाप्राज्ञं युधिष्ठिरमुदैक्षत ॥ ७ ॥

नृपश्रेष्ठ! ऐसा कहकर महाबाहु केशवने पुनः परम बुद्धिमान् राजा युधिष्ठिरकी ओर देखा ॥ ७ ॥

सृञ्जयानां च सर्वेषां कृष्णस्य च यशस्विनः ।

द्रुपदस्य सपुत्रस्य विराटस्य च संनिधौ ॥ ८ ॥

भूमिपानां च सर्वेषां मध्ये वाक्यं जगाद ह ।

उलूकोऽप्यर्जुनं भूयो यथोक्तं वाक्यमब्रवीत् ॥ ९ ॥

आशीविषमिव क्रुद्धं तुदन् वाक्यशलाकया ।

कृष्णादींश्चैव तान् सर्वान् यथोक्तं वाक्यमब्रवीत् ॥ १० ॥

फिर उलूकने भी समस्त सृजयवंशी क्षत्रियसमुदाय, यशस्वी श्रीकृष्ण तथा पुत्रोंसहित द्रुपद और विराटके समीप सम्पूर्ण राजाओंकी मण्डलीमें शेष बातें कहीं । उसने विषधर सर्पके सदृश कुपित हुए अर्जुनको पुनः अपने वाग्बाणोंसे पीड़ा देते हुए दुर्योधनकी कही हुई सब बातें कह सुनायीं । साथ ही श्रीकृष्ण आदि अन्य सब लोगोंसे कहनेके लिये भी उसने जो - जो संदेश दिये थे, उन्हें भी उन सबको यथावत्रूपसे सुना दिया ॥ ८–१० ॥

उलूकस्य तु तद् वाक्यं पापं दारुणमीरितम् ।

श्रुत्वा विचुक्षुभे पार्थो ललाटं चाप्यमार्जयत् ॥ ११ ॥

उलूकके कहे हुए उस पापपूर्ण दारुण वचनको सुनकर कुन्तीपुत्र अर्जुनको बड़ा क्षोभ हुआ । उन्होंने हाथसे ललाटका पसीना पोंछा ॥ ११ ॥

तदवस्थं तदा दृष्ट्वा पार्थं सा समितिर्नृप ।

नामृष्यन्त महाराज पाण्डवानां महारथाः ॥ १२ ॥

नरेश्वर! अर्जुनको उस अवस्थामें देखकर राजाओंकी वह समिति तथा पाण्डव महारथी सहन न कर सके ॥

अधिक्षेपेण कृष्णस्य पार्थस्य च महात्मनः ।

श्रुत्वा ते पुरुषव्याघ्राः क्रोधाज्जज्वलुरच्युताः ॥ १३ ॥

राजन्! महात्मा अर्जुन तथा श्रीकृष्णके प्रति आक्षेपपूर्ण वचन सुनकर वे पुरुषसिंह शूरवीर क्रोधसे जल उठे ॥ १३ ॥

धृष्टद्युम्नः शिखण्डी च सात्यकिश्च महारथः ।

केकया भ्रातरः पञ्च राक्षसश्च घटोत्कचः ॥ १४ ॥

द्रौपदेयाभिमन्युश्च धृष्टकेतुश्च पार्थिवः ।

भीमसेनश्च विक्रान्तो यमजौ च महारथौ ॥ १५ ॥

उत्पेतुरासनात् सर्वे क्रोधसंरक्तलोचनाः ।

बाहून् प्रगृह्य रुचिरान् रक्तचन्दनरूषितान् ।

अङ्गदैः पारिहार्यैश्च केयूरैश्च विभूषितान् ॥ १६ ॥

पृष्ठ 1042

महाभारत — खण्ड ३, पृष्ठ 1042 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

दन्तान् दन्तेषु निष्पिष्य सृक्किणी परिलेलिहन् । धृष्टद्युम्न, शिखण्डी, महारथी सात्यकि, पाँच भाई केकयराजकुमार, राक्षस घटोत्कच, द्रौपदीके पाँचों पुत्र, अभिमन्यु, राजा धृष्टकेतु, पराक्रमी भीमसेन तथा महारथी नकुल-सहदेव—ये सब-ब- के - सब क्रोधसे लाल आँखें किये अपने आसनोंसे उछलकर खड़े हो गये और अंगद, पारिहार्य ( मोतियोंके गुच्छों) तथा केयूरोंसे विभूषित एवं लाल चन्दनसे चर्चित अपनी सुन्दर भुजाओंको थामकर दाँतोंपर दाँत रगड़ते हुए ओठोंके दोनों कोने चाटने लगे ॥ १४–१६३ ॥ तेषामाकारभावज्ञः कुन्तीपुत्रो वृकोदरः ॥ १७ ॥

उदतिष्ठत् स वेगेन क्रोधेन प्रज्वलन्निव ।

उद्वृत्य सहसा नेत्रे दन्तान् कटकटाय्य च ॥ १८ ॥

हस्तं हस्तेन निष्पिष्य उलूकं वाक्यमब्रवीत् । उनकी आकृति और भावको जानकर कुन्तीपुत्र वृकोदर बड़े वेगसे उठे और क्रोधसे जलते हुएके समान सहसा आँखें फाड़ - फाड़कर देखते, दाँत कट- कटाते और हाथ - से - हाथ रगड़ते हुए उलूकसे इस प्रकार बोले - ॥ १७-१८३ ॥ अशक्तानामिवास्माकं प्रोत्साहननिमित्तकम् ॥ १ ९ ॥ श्रुतं ते वचनं मूर्ख यत् त्वां दुर्योधनोऽब्रवीत् । ‘ ओ मूर्ख! दुर्योधनने तुझसे जो कुछ कहा है, वह तेरा वचन हमने सुन लिया । मानो हम असमर्थ हों और तू हमें प्रोत्साहन देनेके निमित्त यह सब कुछ कह रहा हो ॥ १ ९ ३ ॥ तन्मे कथयते मन्द शृणु वाक्यं दुरासदम् ॥ २० ॥

सर्वक्षत्रस्य मध्ये तं यद् वक्ष्यसि सुयोधनम् ।

शृण्वतः सूतपुत्रस्य पितुश्च त्वं दुरात्मनः ॥ २१ ॥

' मूर्ख उलूक! अब तू मेरी कही हुई दुःसह बातें सुन और समस्त राजाओंकी मण्डलीमें सूतपुत्र कर्ण और अपने दुरात्मा पिता शकुनिके सामने दुर्योधनको सुना देना ॥ २०-२१ ॥

अस्माभिः प्रीतिकामैस्तु भ्रातुर्ज्येष्ठस्य नित्यशः ।

मर्षितं ते दुराचार तत् त्वं न बहु मन्यसे ॥ २२ ॥

‘ दुराचारी दुर्योधन! हमलोगोंने सदा अपने बड़े भाईको प्रसन्न रखनेकी इच्छासे तेरे बहुत- से अत्याचारोंको चुपचाप सह लिया है; परंतु तू इन बातोंको अधिक महत्त्व नहीं दे रहा है ॥ २२ ॥

प्रेषितश्चहृषीकेशः शमाकाङ्क्षी कुरून् प्रति ।

कुलस्य हितकामेन धर्मराजेन धीमता ॥ २३ ॥

‘ बुद्धिमान् धर्मराजने कौरवकुलके हितकी इच्छासे शान्ति चाहनेवाले भगवान् श्रीकृष्णको कौरवोंके पास भेजा था ॥ २३ ॥

पृष्ठ 1043

महाभारत — खण्ड ३, पृष्ठ 1043 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

त्वं कालचोदितो नूनं गन्तुकामो यमक्षयम् ।

गच्छस्वाहवमस्माभिस्तच्च श्वो भविता ध्रुवम् ॥ २४ ॥

' परंतु तू निश्चय ही कालसे प्रेरित हो यमलोकमें जाना चाहता है ( इसीलिये संधिकी बात नहीं मान सका ) । अच्छा, हमारे साथ युद्धमें चल । कल निश्चय ही युद्ध होगा ॥ २४ ॥

मयापि च प्रतिज्ञातो वधः सभ्रातृकस्य ते ।

स तथा भविता पाप नात्र कार्या विचारणा ॥ २५ ॥

' पापात्मन्! मैंने भी जो तेरे और तेरे भाइयोंके वधकी प्रतिज्ञा की है, वह उसी रूपमें पूर्ण होगी । इस विषयमें तुझे कोई अन्यथा विचार नहीं करना चाहिये ॥ २५ ॥

वेलामतिक्रमेत् सद्यः सागरो वरुणालयः ।

पर्वताश्च विशीर्येयुर्मयोक्तं न मृषा भवेत् ॥ २६ ॥

'वरुणालय समुद्र शीघ्र ही अपनी सीमाका उल्लंघन कर जाय और पर्वत जीर्ण- शीर्ण होकर बिखर जायँ, परंतु मेरी कही हुई बात झूठी नहीं हो सकती ॥ २६ ॥

सहायस्ते यदि यमः कुबेरो रुद्र एव वा ।

यथाप्रतिज्ञं दुर्बुद्धे प्रकरिष्यन्ति पाण्डवाः ।

दुःशासनस्य रुधिरं पाता चास्मि यथेप्सितम् ॥ २७ ॥

‘ दुर्बुद्धे! तेरी सहायताके लिये यमराज, कुबेर अथवा भगवान् रुद्र ही क्यों न आ जायँ, पाण्डव अपनी प्रतिज्ञाके अनुसार सब कार्य अवश्य करेंगे । मैं अपनी इच्छाके अनुसार दुःशासनका रक्त अवश्य पीऊँगा ॥ २७ ॥

यश्चेह प्रतिसंरब्धः क्षत्रियो माभियास्यति ।

अपि भीष्मं पुरस्कृत्य तं नेष्यामि यमक्षयम् ॥ २८ ॥

‘ उस समय साक्षात् भीष्मको भी आगे करके जो कोई भी क्षत्रिय क्रोधपूर्वक मेरे ऊपर धावा करेगा, उसे उसी क्षण यमलोक पहुँचा दूँगा ॥ २८ ॥

यच्चैतदुक्तं वचनं मया क्षत्रस्य संसदि ।

यथैतद् भविता सत्यं तथैवात्मानमालभे ॥ २ ९ ॥

' मैंने क्षत्रियोंकी सभामें यह बात कही है, जो अवश्य सत्य होगी । यह मैं अपनी सौगन्ध खाकर कहता हूँ' ॥ २ ९ ॥

भीमसेनवचः श्रुत्वा सहदेवोऽप्यमर्षणः ।

क्रोधसंरक्तनयनस्ततो वाक्यमुवाच ह ॥ ३० ॥

भीमसेनका वचन सुनकर सहदेवका भी अमर्ष जाग उठा । तब उन्होंने भी क्रोधसे आँखें लाल करके यह बात कही- ॥ ३० ॥

शौटीरशूरसदृशमनीकजनसंसदि ।

शृणु पाप वचो मह्यं यद्वाच्यो हि पिता त्वया ॥ ३१ ॥

पृष्ठ 1044

महाभारत — खण्ड ३, पृष्ठ 1044 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

‘ ओ पापी! मैं इन वीर सैनिकोंकी सभामें गर्वीले शूरवीरके योग्य वचन बोल रहा हूँ । तू इसे सुन ले और अपने पिताके पास जाकर सुना दे ॥ ३१ ॥

नास्माकं भविता भेदः कदाचित् कुरुभिः सह ।

धृतराष्ट्रस्य सम्बन्धो यदि न स्यात् त्वया सह ॥ ३२ ॥

‘यदि धृतराष्ट्रका तेरे साथ सम्बन्ध न होता, तो कभी कौरवोंके साथ हमलोगोंकी फूट नहीं होती ॥ ३२ ॥

त्वं तु लोकविनाशाय धृतराष्ट्रकुलस्य च ।

उत्पन्नो वैरपुरुषः स्वकुलघ्नश्च पापकृत् ॥ ३३ ॥

'तू सम्पूर्ण जगत् तथा धृतराष्ट्रकुलके विनाशके लिये पापाचारी मूर्तिमान् वैरपुरुष

होकर उत्पन्न हुआ है । तू अपने कुलका भी नाश करनेवाला है ॥ ३३ ॥

जन्मप्रभृति चास्माकं पिता ते पापपूरुषः ।

अहितानि नृशंसानि नित्यशः कर्तुमिच्छति ॥ ३४ ॥

‘ उलूक! तेरा पापात्मा पिता जन्मसे ही हम— लोगोंके प्रति प्रतिदिन क्रूरतापूर्ण अहितकर बर्ताव करना चाहता है ॥ ३४ ॥

तस्य वैरानुषङ्गस्य गन्तास्म्यन्तं सुदुर्गमम् ।

अहमादौ निहत्य त्वां शकुनेः सम्प्रपश्यतः ॥ ३५ ॥

ततोऽस्मि शकुनिं हन्तामिषतां सर्वधन्विनाम् । ' इसलिये मैं शकुनिके देखते - देखते सबसे पहले तेरा वध करके सम्पूर्ण धनुर्धरोंके सामने शकुनिको भी मार डालूँगा और इस प्रकार अत्यन्त दुर्गम शत्रुतासे पार हो जाऊँगा' ॥ ३५ ॥

भीमस्य वचनं श्रुत्वा सहदेवस्य चोभयोः ॥ ३६ ॥

उवाच फाल्गुनो वाक्यं भीमसेनं स्मयन्निव ।

भीमसेन न ते सन्ति येषां वैरं त्वया सह ॥ ३७ ॥

मन्दा गृहेषु सुखिनो मृत्युपाशवशं गताः । भीमसेन और सहदेव दोनोंके वचन सुनकर अर्जुनने भीमसेनसे मुसकराते हुए कहा ——आर्य भीम! जिनका आपके साथ वैर ठन गया है, वे घरमें बैठकर सुखका अनुभव करनेवाले मूर्ख कौरव कालके पाशमें बँध गये हैं ( अर्थात् उनका जीवन नहींके बराबर है ) ॥ ३६-३७ ॥ उलूकश्च न ते वाच्यः परुषं पुरुषोत्तम ॥ ३८ ॥

दूताः किमपराध्यन्ते यथोक्तस्यानुभाषिणः । ‘ पुरुषोत्तम! आपको इस उलूकसे कोई कठोर बात नहीं कहनी चाहिये । बेचारे दूतोंका क्या अपराध है? वे तो कही हुई बातका अनुवादमात्र करनेवाले हैं ' ॥ ३८ ॥

एवमुक्त्वा महाबाहुर्भीमं भीमपराक्रमम् ॥ ३ ९ ॥

पृष्ठ 1045

महाभारत — खण्ड ३, पृष्ठ 1045 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

धृष्टद्युम्नमुखान् वीरान् सुहृदः समभाषत । भयंकर पराक्रमी भीमसेनसे ऐसा कहकर महाबाहु अर्जुनने धृष्टद्युम्न आदि वीर सुहृदोंसे कहा— ॥ ३ ९ ॥ श्रुतं वस्तस्पापस्य धार्तराष्ट्रस्य भाषितम् ॥ ४० ॥

कुत्सनं वासुदेवस्य मम चैव विशेषतः ।

श्रुत्वा भवन्तः संरब्धा अस्माकं हितकाम्यया ॥ ४१ ॥

‘ बन्धुओ! आपलोगोंने उस पापी दुर्योधनकी बात सुनी है न? इसमें उसके द्वारा विशेषतः मेरी और भगवान् श्रीकृष्णकी निन्दा की गयी है । आपलोग हमारे हितकी कामना रखते हैं, इसलिये इस निन्दाको सुनकर कुपित हो उठे हैं ॥ ४०-४१ ॥

प्रभावाद् वासुदेवस्य भवतां च प्रयत्नतः ।

समग्रं पार्थिवं क्षत्रं सर्वं न गणयाम्यहम् ॥ ४२ ॥

‘ परंतु भगवान् वासुदेवके प्रभाव और आपलोगोंके प्रयत्नसे मैं इस समस्त भूमण्डलके सम्पूर्ण क्षत्रियोंको भी कुछ नहीं गिनता हूँ ॥ ४२ ॥

भवद्भिः समनुज्ञातो वाक्यमस्य यदुत्तरम् ।

उलूके प्रापयिष्यामि यद् वक्ष्यति सुयोधनम् ॥ ४३ ॥

‘ यदि आपलोगोंकी आज्ञा हो तो मैं इस बातका उत्तर उलूकको दे दूँ, जिसे यह दुर्योधनको सुना देगा ॥ ४३ ॥

श्वोभूते कत्थितस्यास्य प्रतिवाक्यं चमूमुखे ।

गाण्डीवेनाभिधास्यामि क्लीबा हि वचनोत्तराः ॥ ४४ ॥

‘ अथवा आपकी सम्मति हो, तो कल सबेरे सेनाके मुहानेपर उसकी इन शेखीभरी बातोंका ठीक - ठीक उत्तर गाण्डीव धनुषद्वारा दे दूँगा; क्योंकि केवल बातोंमें उत्तर देनेवाले तो नपुंसक होते हैं ' ॥ ४४ ॥

ततस्ते पार्थिवाः सर्वे प्रशशंसुर्धनंजयम् ।

तेन वाक्योपचारेण विस्मिता राजसत्तमाः ॥ ४५ ॥

अर्जुनकी इस प्रवचन - शैलीसे सभी श्रेष्ठ भूपाल आश्चर्यचकित हो उठे और वे सब - के-सब उनकी भूरि- भूरि प्रशंसा करने लगे ॥ ४५ ॥

अनुनीय च तान् सर्वान् यथामान्यं यथावयः ।

धर्मराजस्तदा वाक्यं तत्प्राप्यं प्रत्यभाषत ॥ ४६ ॥

तदनन्तर धर्मराजने उन समस्त राजाओंको उनकी अवस्था और प्रतिष्ठाके अनुसार अनुनय-विनय करके शान्त किया और दुर्योधनको देनेयोग्य जो संदेश था, उसे इस प्रकार कहा— ॥ ४६ ॥

आत्मानमवमन्वानो न हि स्यात् पार्थिवोत्तमः ।

तत्रोत्तरं प्रवक्ष्यामि तव शुश्रूषणे रतः ॥ ४७ ॥

पृष्ठ 1046

महाभारत — खण्ड ३, पृष्ठ 1046 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

' उलूक! कोई भी श्रेष्ठ राजा शान्त रहकर अपनी अवज्ञा सहन नहीं कर सकता । मैंने तुम्हारी बात ध्यान देकर सुनी है । अब मैं तुम्हें उत्तर देता हूँ, उसे सुनो ' ॥ ४७ ॥

उलूकं भरतश्रेष्ठ सामपूर्वमथोर्जितम् ।

दुर्योधनस्य तद् वाक्यं निशम्य भरतर्षभः ॥ ४८ ॥

अतिलोहितनेत्राभ्यामाशीविष इव श्वसन् ।

स्मयमान इव क्रोधात् सृक्किणी परिसंलिहन् ॥ ४९ ॥

जनार्दनमभिप्रेक्ष्य भ्रातंश्चैवेदमब्रवीत् ।

अभ्यभाषत कैतव्यं प्रगृह्य विपुलं भुजम् ॥ ५० ॥

भरतश्रेष्ठ जनमेजय! इस प्रकार युधिष्ठिरने उलूकसे पहले मधुर वचन बोलकर फिर ओजस्वी शब्दोंमें उत्तर दिया । ( उलूकके मुखसे ) पहले दुर्योधनके पूर्वोक्त संदेशको सुनकर भरतकुलभूषण युधिष्ठिर रोषसे अत्यन्त लाल हुए नेत्रोंद्वारा देखते हुए विषधर सर्पके समान उच्छ्वास लेने लगे । फिर ओठोंके दोनों कोनोंको चाटते हुए वे श्रीकृष्ण तथा भाइयोंकी ओर देखकर बोलनेको प्रस्तुत हुए। वे अपनी विशाल भुजा ऊपर उठा धूर्त जुआरी शकुनिके पुत्र उलूकसे मुसकराते हुए - से बोले— ॥ ४८–५० ॥

उलूक गच्छ कैतव्य ब्रूहि तात सुयोधनम् ।

कृतघ्नं वैरपुरुषं दुर्मतिं कुलपांसनम् ॥ ५१ ॥

' जुआरी शकुनिके पुत्र तात उलूक! तुम जाओ और वैरके मूर्तिमान् स्वरूप उस कृतघ्न, दुर्बुद्धि एवं कुलांगार दुर्योधनसे इस प्रकार कह दो – ॥ ५१ ॥

पाण्डवेषु सदा पाप नित्यं जिह्मं प्रवर्तसे ।

स्ववीर्याद्यः पराक्रम्य पाप आह्वयते परान् ।

अभीतः पूरयन् वाक्यमेष वै क्षत्रियः पुमान् ॥ ५२ ॥

‘ पापी दुर्योधन! तू पाण्डवोंके साथ सदा कुटिल बर्ताव करता आ रहा है । पापात्मन्! जो किसीसे भयभीत न होकर अपने वचनोंका पालन करता है और अपने ही बाहुबलसे पराक्रम प्रकट करके शत्रुओंको युद्धके लिये बुलाता है, वही पुरुष क्षत्रिय है ॥ ५२ ॥

स पापः क्षत्रियो भूत्वा अस्मानाहूय संयुगे ।

मान्यामान्यान् पुरस्कृत्य युद्धं मा गाः कुलाधम ॥ ५३ ॥

' कुलाधम! तू पापी है! देख, क्षत्रिय होकर और हमलोगोंको युद्धके लिये बुलाकर ऐसे लोगोंको आगे करके रणभूमिमें न आना, जो हमारे माननीय वृद्ध गुरुजन और स्नेहास्पद बालक हों ॥ ५३ ॥

आत्मवीर्यं समाश्रित्य भृत्यवीर्यं च कौरव ।

आह्वयस्व रणे पार्थान् सर्वथा क्षत्रियो भव ॥ ५४ ॥

‘ कुरुनन्दन! तू अपने तथा भरणीय सेवकवर्गके बल और पराक्रमका आश्रय लेकर ही कुन्तीके पुत्रोंका युद्धके लिये आह्वान कर । सब प्रकारसे क्षत्रियत्वका परिचय दे ॥ ५४ ॥

पृष्ठ 1047

महाभारत — खण्ड ३, पृष्ठ 1047 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

परवीर्यं समाश्रित्य यः समाह्वयते परान् ।

अशक्तः स्वयमादातुमेतदेव नपुंसकम् ॥ ५५ ॥

‘जो स्वयं सामना करनेमें असमर्थ होनेके कारण दूसरोंके पराक्रमका भरोसा करके शत्रुओंको युद्धके लिये ललकारता है, उसका यह कार्य उसकी नपुंसकताका ही सूचक है ॥ ५५ ॥

स त्वं परेषां वीर्येण आत्मानं बहु मन्यसे ।

कथमेवमशक्तस्त्वमस्मान् समभिगर्जसि II ५६ ॥

' तू तो दूसरोंके ही बलसे अपने- आपको बहुत अधिक शक्तिशाली मानता है; परंतु ऐसा असमर्थ होकर तू हमारे सामने गर्जना कैसे कर रहा है? ' ॥ ५६ ॥

श्रीकृष्ण उवाच

मद्वचश्चापि भूयस्ते वक्तव्यः स सुयोधनः ।

श्व इदानीं प्रपद्येथाः पुरुषो भव दुर्मते ॥ ५७ ॥

तत्पश्चात् भगवान् श्रीकृष्णने कहा - उलूक! इसके बाद तू दुर्योधनसे मेरी यह बात भी कह देना— ' दुर्मते! अब कल ही तू रणभूमिमें आ जा और अपने पुरुषत्वका परिचय दे ॥ ५७ ॥

मन्यसे यच्च मूढ त्वं न योत्स्यति जनार्दनः ।

सारथ्येन वृतःपार्थैरिति त्वं न बिभेषि च ॥ ५८ ॥

‘मूढ़! तू जो यह समझता है कि कुन्तीके पुत्रोंने श्रीकृष्णसे सारथि बननेका अनुरोध किया है, अतः वे युद्ध नहीं करेंगे । सम्भवतः इसीलिये तू मुझसे डर नहीं रहा है ॥ ५८ ॥

जघन्यकालमप्येतन्न भवेत् सर्वपार्थिवान् ।

निर्दहेयमहं क्रोधात् तृणानीव हुताशनः ॥ ५ ९ ॥

‘ परंतु याद रख, मैं चाहूँ, तो इन सम्पूर्ण नरेशोंको अपनी क्रोधाग्निसे उसी प्रकार भस्म कर सकता हूँ, जैसे आग घास- फूसको जला डालती है । किंतु युद्धके अन्ततक मुझे ऐसा करनेका अवसर न मिले, यही मेरी इच्छा है ॥

युधिष्ठिरनियोगात् तु फाल्गुनस्य महात्मनः ।

करिष्ये युध्यमानस्य सारथ्यं विजितात्मनः ॥ ६० ॥

' राजा युधिष्ठिरके अनुरोधसे मैं जितेन्द्रिय महात्मा अर्जुनके युद्ध करते समय उनके सारथिका काम अवश्य करूँगा ॥ ६० ॥

यद्युत्पतसि लोकांस्त्रीन् यद्याविशसि भूतलम् ।

तत्र तत्रार्जुनरथं प्रभाते द्रक्ष्यसे पुनः ॥ ६१ ॥

‘ अब तू यदि तीनों लोकोंसे ऊपर उड़ जाय अथवा धरतीमें समा जाय, तो भी ( तू जहाँ-जहाँ जायगा ), वहाँ - वहाँ कल प्रातःकाल अर्जुनका रथ पहुँचा हुआ देखेगा ॥ ६१ ॥

पृष्ठ 1048

महाभारत — खण्ड ३, पृष्ठ 1048 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

यच्चापि भीमसेनस्य मन्यसे मोघभाषितम् ।

दुःशासनस्य रुधिरं पीतमद्यावधारय ॥ ६२ ॥

' इसके सिवा, तू जो भीमसेनकी कही हुई बातोंको व्यर्थ मानने लगा है, यह ठीक नहीं है । तू आज ही निश्चितरूपसे समझ ले कि भीमसेनने दुःशासनका रक्त पी लिया ॥ ६२ ॥

न त्वां समीक्षते पार्थो नापि राजा युधिष्ठिरः ।

न भीमसेनो न यमौ प्रतिकूलप्रभाषिणम् ॥ ६३ ॥

‘ तू पाण्डवोंके विपरीत कटुभाषण करता जा रहा है, परंतु अर्जुन, राजा युधिष्ठिर, भीमसेन तथा नकुल- सहदेव तुझे कुछ भी नहीं समझते हैं ' ॥ ६३ ॥

इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि उलूकदूताभिगमनपर्वणि कृष्णादिवाक्ये द्विषष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १६२ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत उलूकदूताभिगमनपर्वमें श्रीकृष्ण आदिके वचनविषयक एक सौ बासठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १६२ ॥

पृष्ठ 1049

महाभारत — खण्ड ३, पृष्ठ 1049 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

त्रिषष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः पाँचों पाण्डवों, विराट, द्रुपद, शिखण्डी और धृष्टद्युम्नका संदेश लेकर उलूकका लौटना और उलूककी बात सुनकर दुर्योधनका सेनाको युद्धके लिये तैयार होनेका आदेश देना संजय उवाच

दुर्योधनस्य तद् वाक्यं निशम्य भरतर्षभ ।

नेत्राभ्यामतिताम्राभ्यां कैतव्यं समुदैक्षत ॥ १ ॥

स केशवमभिप्रेक्ष्य गुडाकेशो महायशाः ।

अभ्यभाषत कैतव्यं प्रगृह्य विपुलं भुजम् ॥ २ ॥

संजय कहते हैं- भरतश्रेष्ठ! दुर्योधनके पूर्वोक्त वचनको सुनकर महायशस्वी अर्जुनने क्रोधसे लाल आँखें करके शकुनिकुमार उलूककी ओर देखा । तत्पश्चात् अपनी विशाल भुजाको ऊपर उठाकर श्रीकृष्णकी ओर देखते हुए उन्होंने कहा- ॥ १-२ ॥

स्ववीर्यं यः समाश्रित्य समाह्वयति वै परान् ।

अभीतो युध्यते शत्रून् स वै पुरुष उच्यते ॥ ३ ॥

‘ जो अपने ही बल - पराक्रमका भरोसा करके शत्रुओंको ललकारता है और उनके साथ निर्भय होकर युद्ध करता है, वही पुरुष कहलाता है ॥ ३ ॥

परवीर्यं समाश्रित्य यः समाह्वयते परान् ।

क्षत्रबन्धुरशक्तत्वाल्लोके स पुरुषाधमः ॥। ४ ॥

' जो दूसरेके बल- पराक्रमका आश्रय ले शत्रुओंको युद्धके लिये बुलाता है, वह क्षत्रबन्धु असमर्थ होनेके कारण लोकमें पुरुषाधम कहा गया है ॥ ४ ॥

सत्वं परेषां वीर्येण मन्यसे वीर्यमात्मनः ।

स्वयं कापुरुषो मूढ परांश्च क्षेप्तुमिच्छसि ॥ ५ ॥

‘ मूढ़! तू दूसरोंके पराक्रमसे ही अपनेको बल- पराक्रमसे सम्पन्न मानता है और स्वयं कायर होकर दूसरोंपर आक्षेप करना चाहता है ॥ ५ ॥

यस्त्वं वृद्धं सर्वराज्ञां हितबुद्धिं जितेन्द्रियम् ।

मरणाय महाप्रज्ञं दीक्षयित्वा विकत्थसे ॥ ६ ॥

‘ जो समस्त राजाओंमें वृद्ध, सबके प्रति हितबुद्धि रखनेवाले, जितेन्द्रिय तथा महाज्ञानी हैं, उन्हीं पितामहको तू मरणके लिये रणकी दीक्षा दिलाकर अपनी बहादुरीकी बातें करता ॥ ६ ॥

भावस्ते विदितोऽस्माभिर्दुर्बुद्धे कुलपांसन ।

पृष्ठ 1050

महाभारत — खण्ड ३, पृष्ठ 1050 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

न हनिष्यन्ति गाङ्गेयं पाण्डवा घृणयेति हि ॥ ७ ॥

' खोटी बुद्धिवाले कुलांगार! तेरा मनोभाव हमने समझ लिया है । तू जानता है कि पाण्डवलोग दयावश गंगानन्दन भीष्मका वध नहीं करेंगे ॥ ७ ॥

यस्य वीर्यं समाश्रित्य धार्तराष्ट्र विकत्थसे ।

हन्तास्मि प्रथमं भीष्मं मिषतां सर्वधन्विनाम् ॥ ८ ॥

' धृतराष्ट्रपुत्र! तू जिनके पराक्रमका आश्रय लेकर बड़ी- बड़ी बातें बनाता है, उन पितामह भीष्मको ही मैं सबसे पहले तेरे समस्त धनुर्धरोंके देखते-देखते मार डालूँगा ॥ ८ ॥

कैतव्य गत्वा भरतान् समेत्य सुयोधनं धार्तराष्ट्रं वदस्व । तथेत्युवाचार्जुनः सव्यसाची निशाव्यपाये भविता विमर्दः ॥ ९ ॥

‘ उलूक! तू भरतवंशियोंके यहाँ जाकर धृतराष्ट्रपुत्र दुर्योधनसे कह दे कि सव्यसाची अर्जुनने ‘ बहुत अच्छा ’ कहकर तेरी चुनौती स्वीकार कर ली है । आजकी रात बीतते ही युद्ध आरम्भ हो जायगा ॥ ९ ॥

यद् वाब्रवीद् वाक्यमदीनसत्त्वो मध्येकुरून् हर्षयन् सत्यसंधः । अहं हन्ता सृञ्जयानामनीकं शाल्वेयकांश्चेति ममैष भारः ॥ १० ॥

हन्यामहं द्रोणमतेऽपि लोकं

न ते भयं विद्यते पाण्डवेभ्यः ।

ततो हि ते लब्धतमं च राज्य- मापद्गताः पाण्डवाश्चेति भावः ॥ ११ ॥

‘ सत्यप्रतिज्ञ और महान् शक्तिशाली भीष्मजीने कौरवसैनिकोंके बीचमें उनका हर्ष बढ़ाते हुए जो यह कहा था कि मैं सृजय वीरोंकी सेनाका तथा शाल्वदेशके सैनिकोंका भी संहार कर डालूँगा । इन सबके मारनेका भार मेरे ही ऊपर है । दुर्योधन! मैं द्रोणाचार्यके बिना भी सम्पूर्ण जगत्का संहार कर सकता हूँ; अतः तुम्हें पाण्डवोंसे कोई भय नहीं है । भीष्मके इस वचनसे ही तूने अपने मनमें यह धारणा बना ली है कि राज्य मुझे ही प्राप्त होगा और पाण्डव भारी विपत्तिमें पड़ जायँगे ॥ सदर्पपूर्णो न समीक्षसे त्व- मनर्थमात्मन्यपि वर्तमानम् । तस्मादहं ते प्रथमं समूहे हन्ता समक्षं कुरुवृद्धमेव ॥ १२ ॥