03.Mahabharata Volume 3 — पृष्ठ 1141–1150

महाभारत — खण्ड ३ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1141–1150

पृष्ठ 1141

महाभारत — खण्ड ३, पृष्ठ 1141 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

सर्वं तद् भरतश्रेष्ठ यथावृत्तं स्वयंवरे ॥ ९ ० ॥ तब मैंने हाथ जोड़कर गंगादेवीको प्रणाम किया और स्वयंवरमें जैसी घटना घटित हुई थी, वह सब वृत्तान्त उनसे आद्योपान्त कह सुनाया ॥ ९ ० ॥

यथा च रामो राजेन्द्र मया पूर्वं प्रचोदितः ।

काशिराजसुतायाश्च यथा कर्म पुरातनम् ॥ ९ १ ॥

राजेन्द्र! मैंने परशुरामजी से पहले जो-जो बातें कही थीं तथा काशिराजकी कन्याकी जो पुरानी करतूतें थीं, उन सबको बता दिया ॥ ९ १ ॥

ततः सा राममभ्येत्य जननी मे महानदी ।

मदर्थं तमृषिं वीक्ष्य क्षमयामास भार्गवम् ॥ ९ २ ॥

तत्पश्चात् मेरी जन्मदायिनी माता गंगाने भृगुनन्दन परशुरामजीके पास जाकर मेरे लिये उनसे क्षमा माँगी ॥ भीष्मेण सह मा योत्सीः शिष्येणेति वचोऽब्रवीत् ।

स च तामाह याचन्तीं भीष्ममेव निवर्तय ।

न च मे कुरुते काममित्यहं तमुपागमम् ॥ ९ ३ ॥

साथ ही यह भी कहा कि भीष्म आपका शिष्य है; अतः उसके साथ आप युद्ध न कीजिये । तब याचना करनेवाली मेरी मातासे परशुरामजीने कहा- ' तुम पहले भीष्मको ही युद्धसे निवृत्त करो । वह मेरे इच्छानुसार कार्य नहीं कर रहा है; इसीलिये मैंने उसपर चढ़ाई की है ' ॥ ९ ३ ॥ वैशम्पायन उवाच

ततो गङ्गा सुतस्नेहाद् भीष्मं पुनरुपागमत् ।

न चास्याश्चाकरोद् वाक्यं क्रोधपर्याकुलेक्षणः ॥ ९ ४ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं -जनमेजय! तब गंगादेवी पुत्रस्नेहवश पुनः भीष्मके पास आयीं । उस समय भीष्मके नेत्रोंमें क्रोध व्याप्त हो रहा था; अतः उन्होंने भी माताका कहना नहीं माना ॥ ९ ४ ॥

अथादृश्यत धर्मात्मा भृगुश्रेष्ठो महातपाः ।

आह्वयामास च तदा युद्धाय द्विजसत्तमः ॥ ९ ५ ॥

इतने में ही भृगुकुलतिलक ब्राह्मणशिरोमणि महातपस्वी धर्मात्मा परशुरामजी दिखायी दिये । उन्होंने सामने आकर युद्धके लिये भीष्मको ललकारा ॥ ९ ५ ॥ इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि अम्बोपाख्यानपर्वणि परशुरामभीष्मयोः कुरुक्षेत्रावतरणे अष्टसप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १७८ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत अम्बोपाख्यानपर्वमें परशुराम और भीष्मका कुरुक्षेत्रमें युद्धके लिये अवतरणविषयक एक सौ अठहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १७८ ॥

पृष्ठ 1142

महाभारत — खण्ड ३, पृष्ठ 1142 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

इस पृष्ठ पर कोई पाठ नहीं मिला — ऊपर मूल चित्र देखें।

पृष्ठ 1143

महाभारत — खण्ड ३, पृष्ठ 1143 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

एकोनाशीत्यधिकशततमोऽध्यायः संकल्पनिर्मित रथपर आरूढ़ परशुरामजीके साथ भीष्मका युद्ध प्रारम्भ करना भीष्म उवाच

तमहं स्मयन्निव रणे प्रत्यभाषं व्यवस्थितम् ।

भूमिष्ठं नोत्सहे योद्धुं भवन्तं रथमास्थितः ॥ १ ॥

भीष्मजी कहते हैं -राजन्! तब मैं युद्धके लिये खड़े हुए परशुरामजी से मुसकराता हुआ- सा बोला — ‘ब्रह्मन्! मैं रथपर बैठा हूँ और आप भूमिपर खड़े हैं । ऐसी दशामें मैं आपके साथ युद्ध नहीं कर सकता ॥ १ ॥

आरोह स्यन्दनं वीर कवचं च महाभुज ।

बधान समरे राम यदि योद्धुं मयेच्छसि ॥ २ ॥

‘ महाबाहो! वीरवर राम! यदि आप समरभूमिमें मेरे साथ युद्ध करना चाहते हैं तो रथपर आरूढ़ होइये और कवच भी बाँध लीजिये ' ॥ २ ॥

ततो मामब्रवीद् रामः स्मयमानो रणाजिरे ।

रथो मे मेदिनी भीष्म वाहा वेदाः सदश्ववत् ॥ ३ ॥

सूतश्च मातरिश्वा वै कवचं वेदमातरः ।

सुसंवीतो रणे ताभिर्योत्स्येऽहं कुरुनन्दन ॥ ४ ॥

तब परशुरामजी समरांगणमें किंचित् मुसकराते हुए मुझसे बोले -' कुरुनन्दन भीष्म! मेरे लिये तो पृथ्वी ही रथ है, चारों वेद ही उत्तम अश्वोंके समान मेरे वाहन हैं, वायुदेव ही सारथि हैं और वेदमाताएँ ( गायत्री, सावित्री और सरस्वती ) ही कवच हैं । इन सबसे आवृत एवं सुरक्षित होकर मैं रणक्षेत्रमें युद्ध करूँगा ' ॥ ३-४ ॥

एवं ब्रुवाणो गान्धारे रामो मां सत्यविक्रमः ।

शरव्रातेन महता सर्वतः प्रत्यवारयत् ॥ ५ ॥

गान्धारीनन्दन! ऐसा कहते हुए सत्यपराक्रमी परशुरामजीने मुझे सब ओरसे अपने बाणोंके महान् समुदायद्वारा आवृत कर लिया ॥ ५ ॥

ततोऽपश्यं जामदग्न्यं रथमध्ये व्यवस्थितम् ।

सर्वायुधवरे श्रीमत्यद्भुतोपमदर्शने ॥ ६ ॥

उस समय मैंने देखा, जमदग्निनन्दन परशुराम सम्पूर्ण श्रेष्ठ आयुधोंसे सुशोभित, तेजस्वी एवं अद्भुत दिखायी देनेवाले रथमें बैठे हैं ॥ ६ ॥

मनसा विहिते पुण्ये विस्तीर्णे नगरोपमे ।

पृष्ठ 1144

महाभारत — खण्ड ३, पृष्ठ 1144 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

दिव्याश्वयुजि संनद्धे काञ्चनेन विभूषिते ॥ ७ ॥

उसका विस्तार एक नगरके समान था । उस पुण्यरथका निर्माण उन्होंने अपने मानसिक संकल्पसे किया था । उसमें दिव्य अश्व जुते हुए थे । वह स्वर्णभूषित रथ सब प्रकारसे सुसज्जित था ॥ ७ ॥

कवचेन महाबाहो सोमार्ककृतलक्ष्मणा ।

धनुर्धरो बद्धतूणो बद्धगोधाङ्गुलित्रवान् ॥ ८ ॥

महाबाहो! परशुरामजीने एक सुन्दर कवच धारण कर रखा था, जिसमें चन्द्रमा और सूर्यके चिह्न बने हुए थे । उन्होंने हाथमें धनुष लेकर पीठपर तरकस बाँध रखा था और अंगुलियोंकी रक्षाके लिये गोहके चर्मके बने हुए दस्ताने पहन रखे थे ॥ ८ ॥

सारथ्यं कृतवांस्तत्र युयुत्सोरकृतव्रणः ।

सखा वेदविदत्यन्तं दयितो भार्गवस्य ह ॥ ९ ॥

उस समय युद्धके इच्छुक परशुरामजीके प्रिय सखा वेदवेत्ता अकृतव्रणने उनके सारथिका कार्य सम्पन्न किया ॥ ९ ॥

आह्वयानः स मां युद्धे मनो हर्षयतीव मे ।

पुनः पुनरभिक्रोशन्नभियाहीति भार्गवः ॥ १० ॥

भृगुनन्दन राम ‘ आओ, आओ ' कहकर बार- बार मुझे पुकारते और युद्धके लिये मेरा आह्वान करते हुए मेरे मनको हर्ष और उत्साह- सा प्रदान कर रहे थे ॥ १० ॥

तमादित्यमिवोद्यन्तमनाधृष्यं महाबलम् ।

क्षत्रियान्तकरं राममेकमेकः समासदम् ॥ ११ ॥

उदयकालीन सूर्यके समान तेजस्वी, अजेय, महाबली और क्षत्रियविनाशक परशुराम अकेले ही युद्धके लिये खड़े थे। अतः मैं भी अकेला ही उनका सामना करनेके लिये गया ॥ ११ ॥

ततोऽहं बाणपातेषु त्रिषु वाहान् निगृह्य वै ।

अवतीर्य धनुर्न्यस्य पदातिर्ऋषिसत्तमम् ॥ १२ ॥

अभ्यागच्छं तदा राममर्चिष्यन् द्विजसत्तमम् ।

अभिवाद्य चैनं विधिवदब्रुवं वाक्यमुत्तमम् ॥ १३ ॥

जब वे तीन बार मेरे ऊपर बाणोंका प्रहार कर चुके, तब मैं घोड़ोंको रोककर और धनुष रखकर रथसे उतर गया और उन ब्राह्मणशिरोमणि मुनिप्रवर परशुरामजीका समादर करनेके लिये पैदल ही उनके पास गया । जाकर विधिपूर्वक उन्हें प्रणाम करनेके पश्चात् यह उत्तम वचन बोला— ॥ १२-१३ ॥

योत्स्ये त्वया रणे राम सदृशेनाधिकेन वा ।

गुरुणा धर्मशीलेन जयमाशास्व मे विभो ॥ १४ ॥

पृष्ठ 1145

महाभारत — खण्ड ३, पृष्ठ 1145 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

' भगवन् परशुराम! आप मेरे समान अथवा मुझसे भी अधिक शक्तिशाली हैं । मेरे धर्मात्मा गुरु हैं । मैं इस रणक्षेत्रमें आपके साथ युद्ध करूँगा; अतः आप मुझे विजयके लिये आशीर्वाद दें ' ॥ १४ ॥

राम उवाच

एवमेतत् कुरुश्रेष्ठ कर्तव्यं भूतिमिच्छता ।

धर्मो ह्येष महाबाहो विशिष्टैः सह युध्यताम् ॥ १५ ॥

परशुरामजी ने कहा - कुरुश्रेष्ठ! अपनी उन्नतिके चाहनेवाले प्रत्येक योद्धाको ऐसा ही करना चाहिये । महाबाहो! अपनेसे विशिष्ट गुरुजनोंके साथ युद्ध करनेवाले राजाओंका यही धर्म है ॥ १५ ॥

शपेयं त्वां न चेदेवमागच्छेथा विशाम्पते ।

युध्यस्व त्वं रणे यत्तो धैर्यमालम्ब्य कौरव ॥ १६ ॥

प्रजानाथ! यदि तुम इस प्रकार मेरे समीप नहीं आते तो मैं तुम्हें शाप दे देता ।

कुरुनन्दन! तुम धैर्य धारण करके इस रणक्षेत्रमें प्रयत्नपूर्वक युद्ध करो ॥ १६ ॥

न तु ते जयमाशासे त्वां विजेतुमहं स्थितः ।

गच्छ युध्यस्व धर्मेण प्रीतोऽस्मि चरितेन ते ॥ १७ ॥

मैं तो तुम्हें विजयसूचक आशीर्वाद नहीं दे सकता; क्योंकि इस समय मैं तुम्हें पराजित करनेके लिये खड़ा हूँ । जाओ, धर्मपूर्वक युद्ध करो । तुम्हारे इस शिष्टाचारसे मैं बहुत प्रसन्न हूँ ॥ १७ ॥

ततोऽहं तं नमस्कृत्य रथमारुह्य सत्वरः ।

प्राध्मापयं रणे शखं पुनर्हेमपरिष्कृतम् ॥ १८ ॥

तब मैं उन्हें नमस्कार करके शीघ्र ही रथपर जा बैठा और उस युद्धभूमिमें मैंने पुनः अपने सुवर्णजटित शंखको बजाया ॥ १८ ॥

ततो युद्धं समभवन्मम तस्य च भारत ।

दिवसान् सुबहून् राजन् परस्परजिगीषया ॥ १ ९ ॥

राजन्! भरतनन्दन! तदनन्तर एक- दूसरेको जीतनेकी इच्छासे मेरा तथा परशुरामजीका युद्ध बहुत दिनोंतक चलता रहा ॥ १ ९ ॥

स मे तस्मिन् रणे पूर्वं प्राहरत् कङ्कपत्रिभिः ।

षष्ट्या शतैश्च नवभिः शराणां नतपर्वणाम् ॥ २० ॥

उस रणभूमिमें उन्होंने ही पहले मेरे ऊपर गीधकी पाँखोंसे सुशोभित तथा मुड़े हुए पर्ववाले नौ सौ साठ बाणोंद्वारा प्रहार किया ॥ २० ॥

चत्वारस्तेन मे वाहाः सूतश्चैव विशाम्पते ।

प्रतिरुद्धास्तथैवाहं समरे दंशितः स्थितः ॥ २१ ॥

पृष्ठ 1146

महाभारत — खण्ड ३, पृष्ठ 1146 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

राजन्! उन्होंने मेरे चारों घोड़ों तथा सारथिको भी अवरुद्ध कर दिया तो भी मैं पूर्ववत् कवच धारण किये उस समरभूमिमें डटा रहा ॥ २१ ॥

नमस्कृत्य च देवेभ्यो ब्राह्मणेभ्यो विशेषतः ।

तमहं स्मयन्निव रणे प्रत्यभाषं व्यवस्थितम् ॥ २२ ॥

तत्पश्चात् देवताओं और विशेषतः ब्राह्मणोंको नमस्कार कर मैं रणभूमिमें खड़े हुए परशुरामजी से मुसकराता हुआ - सा बोला- ॥ २२ ॥

आचार्यता मानिता मे निर्मर्यादे ह्यपि त्वयि ।

भूयश्च शृणु मे ब्रह्मन् सम्पदं धर्मसंग्रहे ॥ २३ ॥

'ब्रह्मन्! यद्यपि आप अपनी मर्यादा छोड़े बैठे हैं तो भी मैंने सदा आपके आचार्यत्वका सम्मान किया है । धर्मसंग्रहके विषयमें मेरा जो दृढ़ विचार है, उसे आप पुनः सुन लीजिये ॥ २३ ॥

ये ते वेदाः शरीरस्था ब्राह्मण्यं यच्च तेते महत् ।

तपश्च ते महत् तप्तं न तेभ्यः प्रहराम्यहम् ॥ २४ ॥

‘ विप्रवर! आपके शरीरमें जो वेद हैं, जो आपका महान् ब्राह्मणत्व है तथा आपने जो बड़ी भारी तपस्या की है, उन सबके ऊपर मैं बाणोंका प्रहार नहीं करता हूँ ॥ २४ ॥

प्रहरे क्षत्रधर्मस्य यं राम त्वं समाश्रितः ।

ब्राह्मणः क्षत्रियत्वं हि याति शस्त्रसमुद्यमात् ॥ २५ ॥

‘ राम! आपने जिस क्षत्रियधर्मका आश्रय लिया है, मैं उसीपर प्रहार करूँगा; क्योंकि ब्राह्मण हथियार उठाते ही क्षत्रियभावको प्राप्त कर लेता है ॥ २५ ॥

पश्य मे धनुषो वीर्यं पश्य बाह्वोर्बलं मम ।

एष ते कार्मुकं वीर छिनद्मि निशितेषुणा ॥ २६ ॥

‘ अब आप मेरे धनुषकी शक्ति और मेरी भुजाओंका बल देखिये । वीर! मैं अपने बाणसे आपके धनुषको अभी काट देता हूँ ' ॥ २६ ॥

तस्याहं निशितं भल्लं चिक्षेप भरतर्षभ ।

तेनास्य धनुषः कोटिं छित्त्वा भूमावपातयम् ॥ २७ ॥

भरतश्रेष्ठ! ऐसा कहकर मैंने उनके ऊपर तेज धारवाले एक भल्ल नामक बाणका प्रहार किया और उसके द्वारा उनके धनुषकी कोटि ( अग्रभाग) - को काटकर पृथ्वीपर गिरा दिया ॥ २७ ॥

तथैव च पृषत्कानां शतानि नतपर्वणाम् ।

चिक्षेप कङ्कपत्राणां जामदग्न्यरथं प्रति ॥ २८ ॥

इसी प्रकार परशुरामजीके रथकी ओर मैंने गीधकी पाँख और झुकी हुई गाँठवाले सौ बाण चलाये ॥ २८ ॥

काये विषक्तास्तु तदा वायुना समुदीरिताः ।

पृष्ठ 1147

महाभारत — खण्ड ३, पृष्ठ 1147 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

चेलुः क्षरन्तो रुधिरं नागा इव च ते शराः ॥ २ ९ ॥ वे बाण वायुद्वारा उड़ाये हुए सर्पोंकी भाँति परशुरामजीके शरीरमें धँसकर खून बहाते हुए चल दिये ॥

क्षतजोक्षितसर्वाङ्गः क्षरन् स रुधिरं रणे ।

बभौ रामस्तदा राजन् मेरुर्धातुमिवोत्सृजन् ॥ ३० ॥

राजन्! उस समय उनके सारे अंग लहूलुहान हो गये । जैसे मेरु पर्वत वर्षाकालमें गेरु आदि धातुओंसे मिश्रित जलकी धार बहाता है, उसी प्रकार उस रणभूमिमें अपने अंगोंसे रक्तकी धारा बहाते हुए परशुरामजी शोभा पाने लगे ॥ ३० ॥

हेमन्तान्तेऽशोक इव रक्तस्तबकमण्डितः ।

बभौ रामस्तथा राजन् प्रफुल्ल इव किंशुकः ॥ ३१ ॥

राजन्! जैसे वसन्त-ऋतुमें लाल फूलोंके गुच्छोंसे अलंकृत अशोक और खिला हुआ पलाश सुशोभित होता है, परशुरामजीकी भी वैसी ही शोभा हुई ॥ ३१ ॥

ततोऽन्यद् धनुरादाय रामः क्रोधसमन्वितः ।

हेमपुङ्खान् सुनिशिताञ्शरांस्तान् हि ववर्ष सः ॥ ३२ ॥

तब क्रोधमें भरे हुए परशुरामजीने दूसरा धनुष लेकर सोनेकी पाँखोंसे सुशोभित अत्यन्त तीखे बाणोंकी वर्षा आरम्भ की ॥ ३२ ॥

ते समासाद्य मां रौद्रा बहुधा मर्मभेदिनः ।

अकम्पयन् महावेगाः सर्पानलविषोपमाः ॥ ३३ ॥

वे नाना प्रकारके भयंकर बाण मुझपर चोट करके मेरे मर्मस्थानोंका भेदन करने लगे । उनका वेग महान् था । वे सर्प, अग्नि और विषके समान जान पड़ते थे । उन्होंने मुझे कम्पित कर दिया ॥ ३३ ॥

तमहं समवष्टभ्य पुनरात्मानमाहवे ।

शतसंख्यैः शरैः क्रुद्धस्तदा राममवाकिरम् ॥ ३४ ॥

तब मैंने पुनः अपने - आपको स्थिर करके कुपित हो उस युद्धमें परशुरामजीपर सैकड़ों बाण बरसाये ॥

स तैरग्न्यर्कसंकाशैः शरैराशीविषोपमैः ।

शितैरभ्यर्दितो रामो मन्दचेता इवाभवत् ॥ ३५ ॥

वे बाण अग्नि, सूर्य तथा विषधर सर्पोंके समान भयंकर एवं तीक्ष्ण थे । उनसे पीड़ित होकर परशुरामजी अचेत- से हो गये ॥ ३५ ॥

ततोऽहं कृपयाऽऽविष्टो विष्टभ्यात्मानमात्मना ।

धिग्धिगित्यब्रुवं युद्धं क्षत्रधर्मं च भारत ॥ ३६ ॥

भारत! तब मैं दयासे द्रवित हो स्वयं ही अपने - आपमें धैर्य लाकर युद्ध और क्षत्रियधर्मको धिक्कार देने लगा ॥ ३६ ॥

पृष्ठ 1148

महाभारत — खण्ड ३, पृष्ठ 1148 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

असकृच्चाब्रुवं राजन् शोकवेगपरिप्लुतः ।

अहो बत कृतं पापं मेयदं क्षत्रधर्मणा ॥ ३७ ॥

गरुर्द्विजातिर्धर्मात्मा यदेवं पीडितः शरैः । राजन्! उस समय शोकके वेगसे व्याकुल हो मैं बार- बार इस प्रकार कहने लगा -'अहो! मुझ क्षत्रियने यह बड़ा भारी पाप कर डाला, जो कि धर्मात्मा एवं ब्राह्मण गुरुको इस प्रकार बाणोंसे पीड़ित किया' ॥ ३७३ ॥

ततो न प्राहरं भूयो जामदग्न्याय भारत ॥ ३८ ॥

अथावताप्य पृथिवीं पूषा दिवससंक्षये ।

जगामास्तं सहस्रांशुस्ततो युद्धमुपारमत् ॥ ३ ९ ॥

भारत! उसके बादसे मैंने परशुरामजीपर फिर प्रहार नहीं किया । इधर सहस्र किरणोंवाले भगवान् सूर्य इस पृथ्वीको तपाकर दिनका अन्त होनेपर अस्त हो गये; इसलिये वह युद्ध बंद हो गया ॥ ३८-३९ ॥ इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि अम्बोपाख्यानपर्वणि रामभीष्मयुद्धे एकोनाशीत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १७ ९ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत अम्बोपाख्यानपर्वमें परशुराम और भीष्मका युद्धविषयक एक सौ उन्यासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १७९ ॥

पृष्ठ 1149

महाभारत — खण्ड ३, पृष्ठ 1149 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

अशीत्यधिकशततमोऽध्यायः भीष्म और परशुरामका घोर युद्ध भीष्म उवाच

आत्मनस्तु ततः सूतो हयानां च विशाम्पते ।

मम चापनयामास शल्यान् कुशलसम्मतः ॥ १ ॥

भीष्मजी कहते हैं — राजन्! तदनन्तर अपने कार्यमें कुशल एवं सम्मानित सारथिने अपने घोड़ोंके तथा मेरे भी शरीरमें चुभे हुए बाणोंको निकाला ॥ १ ॥

स्नातापवृत्तैस्तुरगैर्लब्धतोयैरविह्वलैः ।

प्रभाते चोदिते सूर्ये ततो युद्धमवर्तत ॥ २ ॥

घोड़े टहलाये गये और लोट -पोट कर लेनेपर नहलाये गये; फिर उन्हें पानी पिलाया गया, इस प्रकार जब वे स्वस्थ और शान्त हुए, तब प्रातःकाल सूर्योदय होनेपर पुनः युद्ध आरम्भ हुआ ॥ २ ॥

दृष्ट्वा मां तूर्णमायान्तं दंशितं स्यन्दने स्थितम् ।

अकरोद् रथमत्यर्थं रामः सज्जं प्रतापवान् ॥ ३ ॥

मुझे रथपर बैठकर कवच धारण किये शीघ्रता -पूर्वक आते देख प्रतापी परशुरामजीने अपने रथको अत्यन्त सुसज्जित किया ॥ ३ ॥

ततोऽहं राममायान्तं दृष्ट्वा समरकाङ्क्षिणम् ।

धनुः श्रेष्ठं समुत्सृज्य सहसावतरं रथात् ॥ ४ ॥

तदनन्तर युद्धकी इच्छावाले परशुरामजीको आते देख मैं अपना श्रेष्ठ धनुष छोड़कर सहसा रथसे उतर पड़ा ॥ ४ ॥

अभिवाद्य तथैवाहं रथमारुह्य भारत ।

युयुत्सुर्जामदग्न्यस्य प्रमुखे वीतभीः स्थितः ॥ ५ ॥

भारत! पूर्ववत् गुरुको प्रणाम करके अपने रथपर आरूढ़ हो युद्धकी इच्छासे परशुरामजीके सामने मैं निर्भय होकर डट गया ॥ ५ ॥

ततोऽहं शरवर्षेण महता समवाकिरम् ।

स च मां शरवर्षेण वर्षन्तं समवाकिरत् ॥ ६ ॥

तदनन्तर मैंने उनपर बाणोंकी भारी वर्षा की । फिर उन्होंने भी बाणोंकी वर्षा करनेवाले मुझ भीष्मपर बहुत - से बाण बरसाये ॥ ६ ॥

संक्रुद्धो जामदग्न्यस्तु पुनरेव सुतेजितान् ।

सम्प्रैषीन्मे शरान् घोरान् दीप्तास्यानुरगानिव ॥ ७ ॥

पृष्ठ 1150

महाभारत — खण्ड ३, पृष्ठ 1150 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

तत्पश्चात् जमदग्निकुमारने पुनः अत्यन्त क्रुद्ध होकर मुझपर प्रज्वलित मुखवाले सर्पोंकी भाँति तेज किये हुए भयानक बाण चलाये ॥ ७ ॥

ततोऽहं निशितैर्भल्लैः शतशोऽथ सहस्रशः ।

अच्छिदं सहसा राजन्नन्तरिक्षे पुनः पुनः ॥ ८ ॥

राजन्! तब मैंने सहसा तीखी धारवाले भल्ल नामक बाणोंसे आकाशमें ही उन सबके

सैकड़ों और हजारों टुकड़े कर दिये । यह क्रिया बारंबार चलती रही ॥ ८ ॥

ततस्त्वस्त्राणि दिव्यानि जामदग्न्यः प्रतापवान् ।

मयि प्रयोजयामास तान्यहं प्रत्यषेधयम् ॥ ९ ॥

अस्त्रैरेव महाबाहो चिकीर्षन्नधिकां क्रियाम् । इसके पश्चात् प्रतापी परशुरामजीने मेरे ऊपर दिव्यास्त्रोंका प्रयोग आरम्भ किया; परंतु महाबाहो! मैंने उनसे भी अधिक पराक्रम प्रकट करनेकी इच्छा रखकर उन सब अस्त्रोंका दिव्यास्त्रोंद्वारा ही निवारण कर दिया ॥ ९ ३ ॥ ततो दिवि महान् नादः प्रादुरासीत् समन्ततः ॥ १० ॥

ततोऽहमस्त्रं वायव्यं जामदग्न्ये प्रयुक्तवान् ।

प्रत्याजघ्ने च तद् रामो गुह्यकास्त्रेण भारत ॥ ११ ॥

उस समय आकाशमें चारों ओर बड़ा कोलाहल होने लगा । इसी समय मैंने जमदग्निकुमारपर वायव्यास्त्रका प्रयोग किया । भारत! परशुरामजीने गुह्यकास्त्रद्वारा मेरे उस अस्त्रको शान्त कर दिया ॥ १०-११ ॥

ततोऽहमस्त्रमाग्नेयमनुमन्त्र्य प्रयुक्तवान् ।

वारुणेनैव तद् रामो वारयामास मे विभुः ॥ १२ ॥

तत्पश्चात् मैंने मन्त्रसे अभिमन्त्रित करके आग्नेयास्त्रका प्रयोग किया; किंतु भगवान् परशुरामने वारुणास्त्र चलाकर उसका निवारण कर दिया ॥ १२ ॥

एवमस्त्राणि दिव्यानि रामस्याहमवारयम् ।

रामश्च मम तेजस्वी दिव्यास्त्रविदरिंदमः ॥ १३ ॥

इस प्रकार मैं परशुरामजीके दिव्यास्त्रोंका निवारण करता और शत्रुओंका दमन करनेवाले दिव्यास्त्रवेत्ता तेजस्वी परशुराम भी मेरे अस्त्रोंका निवारण कर देते थे ॥ १३ ॥

ततो मां सव्यतो राजन् रामः कुर्वन् द्विजोत्तमः उरस्यविध्यत् संक्रुद्धो जामदग्न्यः प्रतापवान् ॥ १४ ॥

राजन्! तत्पश्चात् क्रोधमें भरे हुए प्रतापी विप्रवर परशुरामने मुझे बायें लेकर मेरे वक्षःस्थलको बाणद्वारा बींध दिया ॥ १४ ॥

ततोऽहं भरतश्रेष्ठ संन्यषीदं रथोत्तमे ।

ततो मां कश्मलाविष्टं सूतस्तूर्णमुदावहत् ॥ १५ ॥