श्रीगणेशाय नमः।

महाभारत — खण्ड ३ — पृष्ठ 1151–1160

महाभारत — खण्ड ३ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1151–1160

पृष्ठ 1151

महाभारत — खण्ड ३, पृष्ठ 1151 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

भरतश्रेष्ठ! उससे घायल होकर मैं उस श्रेष्ठ रथपर बैठ गया, उस समय मुझे मूर्च्छित अवस्थामें देखकर सारथि शीघ्र ही अन्यत्र हटा ले गया ॥ १५ ॥

ग्लायन्तं भरतश्रेष्ठ रामबाणप्रपीडितम् ।

ततो मामपयातं वै भृशं विद्धमचेतसम् ॥ १६ ॥

रामस्यानुचरा हृष्टाः सर्वे दृष्ट्वा विचुक्रुशुः ।

अकृतव्रणप्रभृतयः काशिकन्या च भारत ॥ १७ ॥

भरतश्रेष्ठ! परशुरामजीके बाणसे अत्यन्त पीड़ित होनेके कारण मुझे बड़ी व्याकुलता हो रही थी । मैं अत्यन्त घायल और अचेत होकर रणभूमिसे दूर हट गया था । भारत! इस अवस्थामें मुझे देखकर परशुरामजीके अकृतव्रण आदि सेवक तथा काशिराजकी कन्या अम्बा ये सब - के - सब अत्यन्त प्रसन्न हो कोलाहल करने लगे ॥ १६-१७ ॥

ततस्तु लब्धसंज्ञोऽहं ज्ञात्वा सूतमथाब्रुवम् ।

याहि सूत यतो रामः सज्जोऽहं गतवेदनः ॥ १८ ॥

इतनेहीमें मुझे चेत हो गया और सब कुछ जानकर मैंने सारथिसे कहा – ' सूत! जहाँ परशुरामजी हैं, वहीं चलो। मेरी पीड़ा दूर हो गयी है और अब मैं युद्धके लिये सुसज्जित हूँ' ॥ १८ ॥

ततो मामवहत् सूतो हयैः परमशोभितैः ।

नृत्यद्भिरिव कौरव्य मारुतप्रतिमैर्गतौ ॥ १ ९ ॥

कुरुनन्दन! तब सारथिने अत्यन्त शोभाशाली अश्वोंद्वारा, जो वायुके समान वेगसे चलनेके कारण नृत्य करते से जान पड़ते थे, मुझे युद्धभूमिमें पहुँचाया ॥ १ ९ ॥

ततोऽहं राममासाद्य बाणवर्षैश्च कौरव ।

अवाकिरं सुसंरब्धः संरब्धं च जिगीषया ॥ २० ॥

कौरव! तब मैंने क्रोधमें भरे हुए परशुरामजीके पास पहुँचकर उन्हें जीतनेकी इच्छासे स्वयं भी कुपित होकर उनके ऊपर बाणोंकी वर्षा प्रारम्भ कर दी ॥ २० ॥

तानापतत एवासौ रामो बाणानजिह्मगान् ।

बाणैरेवाच्छिनत् तूर्णमेकैकं त्रिभिराहवे ॥ २१ ॥

किंतु परशुरामजीने सीधे लक्ष्यकी ओर जानेवाले उन बाणोंके आते ही एक- एकको तीन - तीन बाणोंसे तुरंत काट दिया ॥ २१ ॥

ततस्ते सूदिताः सर्वे मम बाणाः सुसंशिताः ।

रामबाणैर्द्विधा छिन्नाः शतशोऽथ सहस्रशः ॥ २२ ॥

इस प्रकार मेरे चलाये हुए वे सब सैकड़ों और हजारों तीखे बाण परशुरामजीके सायकोंसे कटकर दो - दो टूक हो नष्ट हो गये ॥ २२ ॥

ततः पुनः शरं दीप्तं सुप्रभं कालसम्मितम् ।

असृजं जामदग्न्याय रामायाहं जिघांसया ॥ २३ ॥

पृष्ठ 1152

महाभारत — खण्ड ३, पृष्ठ 1152 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

तब मैंने पुनः जमदग्निनन्दन परशुरामकी ओर उन्हें मार डालनेकी इच्छासे एक कालाग्निके समान प्रज्वलित तथा तेजस्वी बाण छोड़ा ॥ २३ ॥

तेन त्वभिहतो गाढं बाणवेगवशं गतः ।

मुमोह समरे रामो भूमौ च निपपात ह ॥ २४ ॥

उसकी गहरी चोट खाकर परशुरामजी उस बाणके वेगके अधीन हो समरभूमिमें मूर्च्छित हो गये और धरतीपर गिर पड़े ॥ २४ ॥

ततो हाहाकृतं सर्वं रामे भूतलमाश्रिते ।

जगद् भारत संविग्नं यथार्कपतने भवेत् ॥ २५ ॥

परशुरामके पृथ्वीपर गिरते ही मानो आकाशसे सूर्य टूटकर गिरे हों, ऐसा समझकर सारा जगत् भयभीत हो हाहाकार करने लगा ॥ २५ ॥

तत एनं समुद्विग्नाः सर्व एवाभिदुद्रुवुः ।

तपोधनास्ते सहसा काश्या च कुरुनन्दन ॥ २६ ॥

तत एनं परिष्वज्य शनैराश्वासयंस्तदा ।

पाणिभिर्जलशीतैश्च जयाशीर्भिश्च कौरव ॥ २७ ॥

कुरुनन्दन! उस समय वे तपोधन और काशिराजकी कन्या सब - के - सब अत्यन्त उद्विग्न हो सहसा उनके पास दौड़े गये और उन्हें हृदयसे लगा हाथ फेरकर तथा शीतल जल छिड़ककर विजयसूचक आशीर्वाद देते हुए सान्त्वना देने लगे ॥ २६-२७ ॥

ततः स विह्वलं वाक्यं राम उत्थाय चाब्रवीत् ।

तिष्ठ भीष्म हतोऽसीति बाणं संधाय कार्मुके ॥ २८ ॥

तदनन्तर कुछ स्वस्थ होनेपर परशुरामजी उठ गये और धनुषपर बाण चढ़ाकर विह्वल स्वरमें बोले — ‘ भीष्म! खड़े रहो, अब तुम मारे गये ' ॥ २८ ॥

स मुक्तो न्यपतत् तूर्णं सव्ये पार्श्वे महाहवे ।

येनाहं भृशमुद्विग्नो व्याघूर्णित इव द्रुमः ॥ २ ९ ॥

उस महान् युद्धमें उनके धनुषसे छूटा हुआ वह बाण तुरंत मेरी बायीं पसलीपर पड़ा, जिससे मैं अत्यन्त उद्विग्न होकर वृक्षकी भाँति झूमने लगा ॥ २ ९ ॥

हत्वा हयांस्ततो रामः शीघ्रास्त्रेण महाहवे ।

अवाकिरन्मां विस्रब्धो बाणैस्तैर्लोमवाहिभिः ॥ ३० ॥

फिर तो परशुरामजी उस महासमरमें शीघ्र छोड़े हुए अस्त्रद्वारा मेरे घोड़ोंको मारकर निर्भय हो मेरे ऊपर पाँखसे उड़नेवाले बाणोंसे वर्षा करने लगे ॥ ३० ॥

ततोऽहमपि शीघ्रास्त्रं समरप्रतिवारणम् ।

अवासृजं महाबाहो तेऽन्तराधिष्ठिताः शतः ॥ ३१ ॥

रामस्य मम चैवाशु व्योमावृत्य समन्ततः ।

पृष्ठ 1153

महाभारत — खण्ड ३, पृष्ठ 1153 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

महाबाहो! तत्पश्चात् मैंने भी शीघ्रतापूर्वक ऐसे अस्त्रोंका प्रयोग आरम्भ किया, जो युद्धभूमिमें विपक्षीकी गतिको रोक देनेवाले थे । मेरे तथा परशुरामजीके बाण आकाशमें सब ओर फैलकर मध्यभागमें ही ठहर गये ॥ ३१३ ॥

न स्म सूर्यः प्रतपति शरजालसमावृतः ॥ ३२ ॥

मातरिश्वा ततस्तस्मिन् मेघरुद्ध इवाभवत् । उस समय बाणोंके समूहसे आच्छादित होनेके कारण सूर्य नहीं तपता था और वायुकी गति इस प्रकार कुण्ठित हो गयी थी, मानो मेघोंसे अवरुद्ध हो गयी हो ॥ ३२३ ॥

ततो वायोः प्रकम्पाच्च सूर्यस्य च गभस्तिभिः ॥ ३३ ॥

अभिघातप्रभावाच्च पावकः समजायत ।

उस समय वायुके कम्पन और सूर्यकी किरणोंसे समस्त बाण परस्पर टकराने लगे ।

उनकी रगड़से वहाँ आग प्रकट हो गयी ॥ ३३३ ॥

ते शराः स्वसमुत्थेन प्रदीप्ताश्चित्रभानुना ॥ ३४ ॥

भूमौ सर्वे तदा राजन् भस्मभूताः प्रपेदिरे । राजन्! वे सभी बाण अपने ही संघर्षसे उत्पन्न हुई अग्निसे जलकर भस्म हो गये और भूमिपर गिर पड़े ॥ ३४ ॥

तदा शतसहस्राणि प्रयुतान्यर्बुदानि च ॥ ३५ ॥

अयुतान्यथ खर्वाणि निखर्वाणि च कौरव ।

रामः शराणां संक्रुद्धो मयि तूर्णं न्यपातयत् ॥ ३६ ॥

कौरवनरेश! उस समय परशुरामजीने अत्यन्त क्रुद्ध होकर मेरे ऊपर तुरंत ही दस हजार, लाख, दस लाख, अर्बुद, खर्ब और निखर्ब बाणोंका प्रहार किया ॥

ततोऽहं तानपि रणे शरैराशीविषोपमैः ।

छिद्य भूमौ नृपते पातयेयं नगानिव ॥ ३७ ॥

नरेश्वर! तब मैंने रणभूमिमें विषधर सर्पके समान भयंकर सायकोंद्वारा उन सब बाणोंको वृक्षोंकी भाँति भूमिपर काट गिराया ॥ ३७ ॥

एवं तदभवद्युद्धं तदा भरतसत्तम ।

संध्याकाले व्यतीते तु व्यपायात् स च मे गुरुः ॥ ३८ ॥

भरतभूषण! इस प्रकार वह युद्ध चलता रहा । संध्याकाल बीतनेपर मेरे गुरु रणभूमिसे हट गये ॥ ३८ ॥

इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि अम्बोपाख्यानपर्वणि राम भीष्मयुद्धे अशीत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १८० ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत अम्बोपाख्यानपर्वमें परशुराम- भीष्मयुद्धविषयक एक सौ असीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १८० ॥

पृष्ठ 1154

महाभारत — खण्ड ३, पृष्ठ 1154 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

इस पृष्ठ पर कोई पाठ नहीं मिला — ऊपर मूल चित्र देखें।

पृष्ठ 1155

महाभारत — खण्ड ३, पृष्ठ 1155 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

एकाशीत्यधिकशततमोऽध्यायः भीष्म और परशुरामका युद्ध भीष्म उवाच

समागतस्य रामेण पुनरेवातिदारुणम् ।

अन्येद्युस्तुमुलं युद्धं तदा भरतसत्तम ॥ १ ॥

भीष्मजी कहते हैं- भरतश्रेष्ठ! दूसरे दिन परशुरामजीके साथ भेंट होनेपर पुनः अत्यन्त भयंकर युद्ध प्रारम्भ हुआ ॥ १ ॥

ततो दिव्यास्त्रविच्छूरो दिव्यान्यस्त्राण्यनेकशः ।

अयोजयत् स धर्मात्मा दिवसे दिवसे विभुः ॥ २ ॥

फिर तो दिव्यास्त्रोंके ज्ञाता, शूरवीर एवं धर्मात्मा भगवान् परशुरामजी प्रतिदिन अनेक प्रकारके अलौकिक अस्त्रोंका प्रयोग करने लगे ॥ २ ॥

तान्यहं तत्प्रतीघातैरस्त्रैरस्त्राणि भारत ।

व्यधमं तुमुले युद्धे प्राणांस्त्यक्त्वा सुदुस्त्यजान् ॥ ३ ॥

भारत! उस तुमुल युद्धमें अपने दुस्त्यज प्राणोंकी परवा न करके मैंने उनके सभी अस्त्रोंका विघातक अस्त्रोंद्वारा संहार कर डाला ॥ ३ ॥

अस्त्रैरस्त्रेषु बहुधा हतेष्वेव च भारत ।

अक्रुध्यत महातेजास्त्यक्तप्राणः स संयुगे ॥ ४ ॥

भरतनन्दन! इस प्रकार बार-बार मेरे अस्त्रोंद्वारा अपने अस्त्रोंके विनष्ट होनेपर महातेजस्वी परशुरामजी उस युद्धमें प्राणोंका मोह छोड़कर अत्यन्त कुपित हो उठे ॥ ४ ॥

ततः शक्तिं प्राहिणोद् घोररूपा- मस्त्रे रुद्धे जामदग्न्यो महात्मा । कालोत्सृष्टां प्रज्वलितामिवोल्कां संदीप्ताग्रां तेजसा व्याप्य लोकम् ॥ ५ ॥

इस प्रकार अपने अस्त्रोंका अवरोध होनेपर जमदग्निनन्दन महात्मा परशुरामने कालकी छोड़ी हुई प्रज्वलित उल्काके समान एक भयंकर शक्ति छोड़ी, जिसका अग्रभाग उद्दीप्त हो रहा था । वह शक्ति अपने तेजसे सम्पूर्ण लोकको व्याप्त किये हुए थी ॥ ५ ॥

ततोऽहं तामिषुभिर्दीप्यमानां समायान्तीमन्तकालार्कदीप्ताम् । छित्त्वा त्रिधा पातयामास भूमौ ततो ववौ पवनः पुण्यगन्धिः ॥ ६ ॥

पृष्ठ 1156

महाभारत — खण्ड ३, पृष्ठ 1156 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

तब मैंने प्रलयकालके सूर्यकी भाँति प्रज्वलित होनेवाली उस देदीप्यमान शक्तिको

अपनी ओर आती देख अनेक बाणोंद्वारा उसके तीन टुकड़े करके उसे भूमिपर गिरा दिया ।

फिर तो पवित्र सुगन्धसे युक्त मन्द मन्द वायु चलने लगी ॥ ६ ॥

तस्यां छिन्नायां क्रोधदीप्तोऽथ रामः शक्तीर्घोराः प्राहिणोद् द्वादशान्याः । तासां रूपं भारत नोत शक्यं तेजस्वित्वाल्लाघवाच्चैव वक्तुम् ॥ ७ ॥

उस शक्तिके कट जानेपर परशुरामजी क्रोधसे जल उठे तथा उन्होंने दूसरी -दूसरी भयंकर बारह शक्तियाँ और छोड़ीं । भारत! वे इतनी तेजस्विनी तथा शीघ्रगामिनी थीं कि उनके स्वरूपका वर्णन करना असम्भव है ॥ ७ ॥

किं त्वेवाहं विह्वलः सम्प्रदृश्य दिग्भ्यः सर्वास्ता महोल्का इवाग्नेः । नानारूपास्तेजसोग्रेण दीप्ता यथाऽऽदित्या द्वादश लोकसंक्षये ॥ ८ ॥

प्रलयकालके बारह सूर्योंके समान भयंकर तेजसे प्रज्वलित अनेक रूपवाली तथा अग्निकी प्रचण्ड ज्वालाओंके समान धधकती हुई उन शक्तियोंको सब ओरसे आती देख मैं अत्यन्त विह्वल हो गया ॥ ८ ॥

ततो जालं बाणमयं विवृत्तं संदृश्य भित्त्वा शरजालेन राजन् । द्वादशेषून् प्राहिणवं रणेऽहं ततः शक्तीरप्यधमं घोररूपाः ॥ ९ ॥

राजन्! तत्पश्चात् वहाँ फैले हुए बाणमय जालको देखकर मैंने अपने बाणसमूहोंसे उसे छिन्न - भिन्न कर डाला और उस रणभूमिमें बारह सायकोंका प्रयोग किया, जिनसे उन भयंकर शक्तियों को भी व्यर्थ कर दिया ॥ ततो राजञ्जामदग्न्यो महात्मा शक्तीर्घोरा व्याक्षिपद्धेमदण्डाः । विचित्रिताः काञ्चनपट्टनद्धा यथा महोल्का ज्वलितास्तथा ताः ॥ १० ॥

राजन्! तत्पश्चात् महात्मा जमदग्निनन्दम परशुरामने स्वर्णमय दण्डसे विभूषित और भी बहुत - सी भयानक शक्तियाँ चलायीं, जो विचित्र दिखायी देती थीं, उनके ऊपर सोनेके पत्र जड़े हुए थे और वे जलती हुई बड़ी - बड़ी उल्काओंके समान प्रतीत होती थीं ॥ १० ॥

ताश्चाप्युग्राश्चर्मणा वारयित्वा खड्गेनाजौ पातयित्वा नरेन्द्र ।

पृष्ठ 1157

महाभारत — खण्ड ३, पृष्ठ 1157 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

बाणैर्दिव्यैर्जामदग्न्यस्य संख्ये दिव्यानश्वानभ्यवर्षं ससूतान् ॥ ११ ॥

नरेन्द्र! उन भयंकर शक्तियोंको भी मैंने ढालसे रोककर तलवारसे रणभूमिमें काट गिराया । तत्पश्चात् परशुरामजीके दिव्य घोड़ों तथा सारथिपर मैंने दिव्य बाणोंकी वर्षा आरम्भ कर दी ॥ ११ ॥

निर्मुक्तानां पन्नगानां सरूपा दृष्ट्वा शक्तीर्हेमचित्रा निकृत्ताः । प्रादुश्चक्रे दिव्यमस्त्रं महात्मा क्रोधाविष्टो हैहयेशप्रमाथी ॥ १२ ॥

केंचुलिसे छूटकर निकले हुए सर्पोंके समान आकृतिवाली उन सुवर्णजटित विचित्र शक्तियोंको कटी हुई देख हैहयराजका विनाश करनेवाले महात्मा परशुरामजीने कुपित होकर पुनः अपना दिव्य अस्त्र प्रकट किया ॥ ततः श्रेण्यः शलभानामिवोग्राः समापेतुर्विशिखानां प्रदीप्ताः । समाचिनोच्चापि भृशं शरीरं हयान् सूतं सरथं चैव मह्यम् ॥ १३ ॥

फिर तो टिड्डियोंकी पंक्तियोंके समान प्रज्वलित एवं भयंकर बाणोंके समूह प्रकट होने लगे । इस प्रकार उन्होंने मेरे शरीर, रथ, सारथि और घोड़ोंको सर्वथा आच्छादित कर दिया ॥ १३ ॥

रथः शरैर्मे निचितः सर्वतोऽभूत् तथा वाहाः सारथिश्चैव राजन् । युगं रथेषां च तथैव चक्रे तथैवाक्षः शरकृत्तोऽथ भग्नः ॥ १४ ॥

राजन्! मेरा रथ चारों ओरसे उनके बाणोंद्वारा व्याप्त हो रहा था । घोड़ों और सारथिकी भी यही दशा थी । युग तथा ईषादण्डको भी उन्होंने उसी प्रकार बाणविद्ध कर रखा था और रथका धुरा उनके बाणोंसे कटकर टूक - टूक हो गया था ॥ १४ ॥

ततस्तस्मिन् बाणवर्षे व्यतीते

शरौघेण प्रत्यवर्षं गुरुं तम् ।

स विक्षतो मार्गणैर्ब्रह्मराशि- हादसक्तं मुमुचे भूरि रक्तम् ॥ १५ ॥

जब उनकी बाण - वर्षा समाप्त हुई, तब मैंने भी बदलेमें गुरुदेवपर बाणसमूहोंकी बौछार आरम्भ कर दी । वे ब्रह्मराशि महात्मा मेरे बाणोंसे क्षत- विक्षत होकर अपने शरीरसे अधिकाधिक रक्तकी धारा बहाने लगे ॥ १५ ॥

पृष्ठ 1158

महाभारत — खण्ड ३, पृष्ठ 1158 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

यथा रामो बाणजालाभितप्त- स्तथैवाहं सुभृशं गाढविद्धः । ततो युद्धं व्यरमच्चापराह्णे भानावस्तं प्रति याते महीध्रम् ॥ १६ ॥

जिस प्रकार परशुरामजी मेरे सायकसमूहों से संतप्त थे, उसी प्रकार मैं भी उनके बाणोंसे अत्यन्त घायल हो रहा था । तदनन्तर सायंकालमें जब सूर्यदेव अस्ताचलको चले गये, तब युद्ध बंद हो गया ॥ १६ ॥

इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि अम्बोपाख्यानपर्वणि एकाशीत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १८१ ॥

इसप्रकार श्रीमहाभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत अम्बोपाख्यानपर्वमें एक सौ इक्यासीवाँ अध्याय पूराहुआ ॥ १८१ ॥

पृष्ठ 1159

महाभारत — खण्ड ३, पृष्ठ 1159 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

द्वयशीत्यधिकशततमोऽध्यायः भीष्म और परशुरामका युद्ध भीष्म उवाच

ततः प्रभाते राजेन्द्र सूर्ये विमलतां गते ।

भार्गवस्य मया सार्धं पुनर्युद्धमवर्तत ॥ १ ॥

भीष्मजी कहते हैं - राजेन्द्र! तदनन्तर प्रातःकाल जब सूर्यदेव उदित होकर प्रकाशमें आ गये, उस समय मेरे साथ परशुरामजीका युद्ध पुनः प्रारम्भ हुआ ॥ १ ॥

ततोऽभ्रान्ते रथे तिष्ठन् रामः प्रहरतां वरः ।

ववर्ष शरजालानि मयि मेघ इवाचले ॥ २ ॥

तत्पश्चात् योद्धाओंमें श्रेष्ठ परशुरामजी स्थिर रथपर खड़े हो जैसे मेघ पर्वतपर जलकी बौछार करता है, उसी प्रकार मेरे ऊपर बाणसमूहोंकी वर्षा करने लगे ॥ २ ॥

ततः सूतो मम सुहृच्छरवर्षेण ताडितः ।

अपयातो रथोपस्थान्मनो मम विषादयन् ॥ ३ ॥

उस समय मेरा प्रिय सुहृद् सारथि बाणवर्षासे पीड़ित हो मेरे मनको विषादमें डालता हुआ रथकी बैठकसे नीचे गिर गया ॥ ३ ॥

ततः सूतो ममात्यर्थं कश्मलं प्राविशन्महत् ।

पृथिव्यां च शराघातान्निपपात मुमोह च ॥ ४ ॥

मेरे सारथिको अत्यन्त मोह छा गया था। वह बाणोंके आघातसे पृथ्वीपर गिरा और अचेत हो गया ॥

ततः सूतोऽजहात् प्राणान् रामबाणप्रपीडितः ।

मुहूर्तादिव राजेन्द्र मां च भीराविशत् तदा ॥ ५ ॥

राजेन्द्र! परशुरामजीके बाणोंसे अत्यन्त पीड़ित होनेके कारण दो ही घड़ीमें सूतने प्राण त्याग दिये । उस समय मेरे मनमें बड़ा भय समा गया ॥ ५ ॥

ततः सूते हते तस्मिन् क्षिपतस्तस्य मे शरान् ।

प्रमत्तमनसो रामः प्राहिणोन्मृत्युसम्मितम् ॥ ६ ॥

उस सारथिके मारे जानेपर मैं असावधान मनसे परशुरामजीके बाणोंको काट रहा था! इतनेहीमें परशुरामजीने मुझपर मृत्युके समान भयंकर बाण छोड़ा ॥ ६ ॥

ततः सूतव्यसनिनं विप्लुतं मां स भार्गवः ।

शरेणाभ्यहनद् गाढं विकृष्य बलवद्धनुः ॥ ७ ॥

उस समय मैं सारथिकी मृत्युके कारण व्याकुल था तो भी भृगुनन्दन परशुरामने अपने सुदृढ़ धनुषको जोर- जोर से खींचकर मुझपर बाणसे गहरा आघात किया ॥ ७ ॥

पृष्ठ 1160

महाभारत — खण्ड ३, पृष्ठ 1160 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

स मे भुजान्तरे राजन् निपत्य रुधिराशनः ।

मयैव सह राजेन्द्र जगाम वसुधातलम् ॥ ८ ॥

राजेन्द्र! वह रक्त पीनेवाला बाण मेरी दोनों भुजाओंके बीच (वक्षःस्थलमें ) चोट पहुँचाकर मुझे साथ लिये दिये पृथ्वीपर जा गिरा ॥ ८ ॥

मत्वा तु निहतं रामस्ततो मां भरतर्षभ ।

मेघवद् विननादोच्चैर्जहृषे च पुनः पुनः ॥ ९ ॥

भरतश्रेष्ठ! उस समय मुझे मारा गया जानकर परशुरामजी मेघके समान गम्भीर स्वरसे गर्जना करने लगे । उनके शरीरमें बार - बार हर्षजनित रोमांच होने लगा ॥ ९ ॥

तथा तु पतिते राजन् मयि रामो मुदा युतः ।

उदक्रोशन्महानादं सह तैरनुयायिभिः ॥ १० ॥

राजन्! इस प्रकार मेरे धराशायी होनेपर परशुरामजीको बड़ी प्रसन्नता हुई । उन्होंने अपने अनुयायियोंके साथ महान् कोलाहल मचाया ॥ १० ॥

मम तत्राभवन् ये तु कुरवः पार्श्वतः स्थिताः ।

आगता अपि युद्धं तज्जनास्तत्र दिदृक्षवः ।

आर्तिं परमिकां जग्मुस्ते तदा पतिते मयि ॥ ११ ॥

वहाँ मेरे पार्श्वभागमें जो कुरुवंशी क्षत्रियगण खड़े थे तथा जो लोग वहाँ युद्ध देखनेकी इच्छासे आये थे, उन सबको मेरे गिर जानेपर बड़ा दुःख हुआ ॥ ११ ॥

ततोऽपश्यं पतितो राजसिंहं द्विजानष्टौ सूर्यहुताशनाभान् । ते मां समन्तात् परिवार्य तस्थुः स्वबाहुभिः परिधार्याजिमध्ये ॥ १२ ॥

राजसिंह! वहाँ गिरते समय मैंने देखा कि सूर्य और अग्निके समान तेजस्वी आठ ब्राह्मण आये और संग्रामभूमिमें मुझे सब ओरसे घेरकर अपनी भुजाओंपर ही मेरे शरीरको धारण करके खड़े हो गये ॥ १२ ॥

रक्ष्यमाणश्च तैर्विप्रैर्नाहं भूमिमुपास्पृशम् ।

अन्तरिक्षे धृतो ह्यस्मि तैर्विप्रैर्बान्धवैरिव ॥ १३ ॥

उन ब्राह्मणोंसे सुरक्षित होनेके कारण मुझे धरतीका स्पर्श नहीं करना पड़ा । मेरे सगे भाई- बन्धुओंकी भाँति उन ब्राह्मणोंने मुझे आकाशमें ही रोक लिया था ॥ १३ ॥

श्वसन्निवान्तरिक्षे च जलबिन्दुभिरुक्षितः ।

ततस्ते ब्राह्मणा राजन्नब्रुवन् परिगृह्य माम् ॥ १४ ॥

राजन्! आकाशमें मैं साँस लेता- सा ठहर गया था । उस समय ब्राह्मणोंने मुझपर

जलकी बूँदें छिड़क दीं । फिर वे मुझे पकड़कर बोले ॥ १४ ॥

मा भैरिति समं सर्वे स्वस्ति तेऽस्त्विति चासकृत् ।