श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड ३ — पृष्ठ 1151–1160
महाभारत — खण्ड ३ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1151–1160
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भरतश्रेष्ठ! उससे घायल होकर मैं उस श्रेष्ठ रथपर बैठ गया, उस समय मुझे मूर्च्छित अवस्थामें देखकर सारथि शीघ्र ही अन्यत्र हटा ले गया ॥ १५ ॥
ग्लायन्तं भरतश्रेष्ठ रामबाणप्रपीडितम् ।
ततो मामपयातं वै भृशं विद्धमचेतसम् ॥ १६ ॥
रामस्यानुचरा हृष्टाः सर्वे दृष्ट्वा विचुक्रुशुः ।
अकृतव्रणप्रभृतयः काशिकन्या च भारत ॥ १७ ॥
भरतश्रेष्ठ! परशुरामजीके बाणसे अत्यन्त पीड़ित होनेके कारण मुझे बड़ी व्याकुलता हो रही थी । मैं अत्यन्त घायल और अचेत होकर रणभूमिसे दूर हट गया था । भारत! इस अवस्थामें मुझे देखकर परशुरामजीके अकृतव्रण आदि सेवक तथा काशिराजकी कन्या अम्बा ये सब - के - सब अत्यन्त प्रसन्न हो कोलाहल करने लगे ॥ १६-१७ ॥
ततस्तु लब्धसंज्ञोऽहं ज्ञात्वा सूतमथाब्रुवम् ।
याहि सूत यतो रामः सज्जोऽहं गतवेदनः ॥ १८ ॥
इतनेहीमें मुझे चेत हो गया और सब कुछ जानकर मैंने सारथिसे कहा – ' सूत! जहाँ परशुरामजी हैं, वहीं चलो। मेरी पीड़ा दूर हो गयी है और अब मैं युद्धके लिये सुसज्जित हूँ' ॥ १८ ॥
ततो मामवहत् सूतो हयैः परमशोभितैः ।
नृत्यद्भिरिव कौरव्य मारुतप्रतिमैर्गतौ ॥ १ ९ ॥
कुरुनन्दन! तब सारथिने अत्यन्त शोभाशाली अश्वोंद्वारा, जो वायुके समान वेगसे चलनेके कारण नृत्य करते से जान पड़ते थे, मुझे युद्धभूमिमें पहुँचाया ॥ १ ९ ॥
ततोऽहं राममासाद्य बाणवर्षैश्च कौरव ।
अवाकिरं सुसंरब्धः संरब्धं च जिगीषया ॥ २० ॥
कौरव! तब मैंने क्रोधमें भरे हुए परशुरामजीके पास पहुँचकर उन्हें जीतनेकी इच्छासे स्वयं भी कुपित होकर उनके ऊपर बाणोंकी वर्षा प्रारम्भ कर दी ॥ २० ॥
तानापतत एवासौ रामो बाणानजिह्मगान् ।
बाणैरेवाच्छिनत् तूर्णमेकैकं त्रिभिराहवे ॥ २१ ॥
किंतु परशुरामजीने सीधे लक्ष्यकी ओर जानेवाले उन बाणोंके आते ही एक- एकको तीन - तीन बाणोंसे तुरंत काट दिया ॥ २१ ॥
ततस्ते सूदिताः सर्वे मम बाणाः सुसंशिताः ।
रामबाणैर्द्विधा छिन्नाः शतशोऽथ सहस्रशः ॥ २२ ॥
इस प्रकार मेरे चलाये हुए वे सब सैकड़ों और हजारों तीखे बाण परशुरामजीके सायकोंसे कटकर दो - दो टूक हो नष्ट हो गये ॥ २२ ॥
ततः पुनः शरं दीप्तं सुप्रभं कालसम्मितम् ।
असृजं जामदग्न्याय रामायाहं जिघांसया ॥ २३ ॥
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तब मैंने पुनः जमदग्निनन्दन परशुरामकी ओर उन्हें मार डालनेकी इच्छासे एक कालाग्निके समान प्रज्वलित तथा तेजस्वी बाण छोड़ा ॥ २३ ॥
तेन त्वभिहतो गाढं बाणवेगवशं गतः ।
मुमोह समरे रामो भूमौ च निपपात ह ॥ २४ ॥
उसकी गहरी चोट खाकर परशुरामजी उस बाणके वेगके अधीन हो समरभूमिमें मूर्च्छित हो गये और धरतीपर गिर पड़े ॥ २४ ॥
ततो हाहाकृतं सर्वं रामे भूतलमाश्रिते ।
जगद् भारत संविग्नं यथार्कपतने भवेत् ॥ २५ ॥
परशुरामके पृथ्वीपर गिरते ही मानो आकाशसे सूर्य टूटकर गिरे हों, ऐसा समझकर सारा जगत् भयभीत हो हाहाकार करने लगा ॥ २५ ॥
तत एनं समुद्विग्नाः सर्व एवाभिदुद्रुवुः ।
तपोधनास्ते सहसा काश्या च कुरुनन्दन ॥ २६ ॥
तत एनं परिष्वज्य शनैराश्वासयंस्तदा ।
पाणिभिर्जलशीतैश्च जयाशीर्भिश्च कौरव ॥ २७ ॥
कुरुनन्दन! उस समय वे तपोधन और काशिराजकी कन्या सब - के - सब अत्यन्त उद्विग्न हो सहसा उनके पास दौड़े गये और उन्हें हृदयसे लगा हाथ फेरकर तथा शीतल जल छिड़ककर विजयसूचक आशीर्वाद देते हुए सान्त्वना देने लगे ॥ २६-२७ ॥
ततः स विह्वलं वाक्यं राम उत्थाय चाब्रवीत् ।
तिष्ठ भीष्म हतोऽसीति बाणं संधाय कार्मुके ॥ २८ ॥
तदनन्तर कुछ स्वस्थ होनेपर परशुरामजी उठ गये और धनुषपर बाण चढ़ाकर विह्वल स्वरमें बोले — ‘ भीष्म! खड़े रहो, अब तुम मारे गये ' ॥ २८ ॥
स मुक्तो न्यपतत् तूर्णं सव्ये पार्श्वे महाहवे ।
येनाहं भृशमुद्विग्नो व्याघूर्णित इव द्रुमः ॥ २ ९ ॥
उस महान् युद्धमें उनके धनुषसे छूटा हुआ वह बाण तुरंत मेरी बायीं पसलीपर पड़ा, जिससे मैं अत्यन्त उद्विग्न होकर वृक्षकी भाँति झूमने लगा ॥ २ ९ ॥
हत्वा हयांस्ततो रामः शीघ्रास्त्रेण महाहवे ।
अवाकिरन्मां विस्रब्धो बाणैस्तैर्लोमवाहिभिः ॥ ३० ॥
फिर तो परशुरामजी उस महासमरमें शीघ्र छोड़े हुए अस्त्रद्वारा मेरे घोड़ोंको मारकर निर्भय हो मेरे ऊपर पाँखसे उड़नेवाले बाणोंसे वर्षा करने लगे ॥ ३० ॥
ततोऽहमपि शीघ्रास्त्रं समरप्रतिवारणम् ।
अवासृजं महाबाहो तेऽन्तराधिष्ठिताः शतः ॥ ३१ ॥
रामस्य मम चैवाशु व्योमावृत्य समन्ततः ।
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महाबाहो! तत्पश्चात् मैंने भी शीघ्रतापूर्वक ऐसे अस्त्रोंका प्रयोग आरम्भ किया, जो युद्धभूमिमें विपक्षीकी गतिको रोक देनेवाले थे । मेरे तथा परशुरामजीके बाण आकाशमें सब ओर फैलकर मध्यभागमें ही ठहर गये ॥ ३१३ ॥
न स्म सूर्यः प्रतपति शरजालसमावृतः ॥ ३२ ॥
मातरिश्वा ततस्तस्मिन् मेघरुद्ध इवाभवत् । उस समय बाणोंके समूहसे आच्छादित होनेके कारण सूर्य नहीं तपता था और वायुकी गति इस प्रकार कुण्ठित हो गयी थी, मानो मेघोंसे अवरुद्ध हो गयी हो ॥ ३२३ ॥
ततो वायोः प्रकम्पाच्च सूर्यस्य च गभस्तिभिः ॥ ३३ ॥
अभिघातप्रभावाच्च पावकः समजायत ।
उस समय वायुके कम्पन और सूर्यकी किरणोंसे समस्त बाण परस्पर टकराने लगे ।
उनकी रगड़से वहाँ आग प्रकट हो गयी ॥ ३३३ ॥
ते शराः स्वसमुत्थेन प्रदीप्ताश्चित्रभानुना ॥ ३४ ॥
भूमौ सर्वे तदा राजन् भस्मभूताः प्रपेदिरे । राजन्! वे सभी बाण अपने ही संघर्षसे उत्पन्न हुई अग्निसे जलकर भस्म हो गये और भूमिपर गिर पड़े ॥ ३४ ॥
तदा शतसहस्राणि प्रयुतान्यर्बुदानि च ॥ ३५ ॥
अयुतान्यथ खर्वाणि निखर्वाणि च कौरव ।
रामः शराणां संक्रुद्धो मयि तूर्णं न्यपातयत् ॥ ३६ ॥
कौरवनरेश! उस समय परशुरामजीने अत्यन्त क्रुद्ध होकर मेरे ऊपर तुरंत ही दस हजार, लाख, दस लाख, अर्बुद, खर्ब और निखर्ब बाणोंका प्रहार किया ॥
ततोऽहं तानपि रणे शरैराशीविषोपमैः ।
छिद्य भूमौ नृपते पातयेयं नगानिव ॥ ३७ ॥
नरेश्वर! तब मैंने रणभूमिमें विषधर सर्पके समान भयंकर सायकोंद्वारा उन सब बाणोंको वृक्षोंकी भाँति भूमिपर काट गिराया ॥ ३७ ॥
एवं तदभवद्युद्धं तदा भरतसत्तम ।
संध्याकाले व्यतीते तु व्यपायात् स च मे गुरुः ॥ ३८ ॥
भरतभूषण! इस प्रकार वह युद्ध चलता रहा । संध्याकाल बीतनेपर मेरे गुरु रणभूमिसे हट गये ॥ ३८ ॥
इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि अम्बोपाख्यानपर्वणि राम भीष्मयुद्धे अशीत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १८० ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत अम्बोपाख्यानपर्वमें परशुराम- भीष्मयुद्धविषयक एक सौ असीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १८० ॥
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एकाशीत्यधिकशततमोऽध्यायः भीष्म और परशुरामका युद्ध भीष्म उवाच
समागतस्य रामेण पुनरेवातिदारुणम् ।
अन्येद्युस्तुमुलं युद्धं तदा भरतसत्तम ॥ १ ॥
भीष्मजी कहते हैं- भरतश्रेष्ठ! दूसरे दिन परशुरामजीके साथ भेंट होनेपर पुनः अत्यन्त भयंकर युद्ध प्रारम्भ हुआ ॥ १ ॥
ततो दिव्यास्त्रविच्छूरो दिव्यान्यस्त्राण्यनेकशः ।
अयोजयत् स धर्मात्मा दिवसे दिवसे विभुः ॥ २ ॥
फिर तो दिव्यास्त्रोंके ज्ञाता, शूरवीर एवं धर्मात्मा भगवान् परशुरामजी प्रतिदिन अनेक प्रकारके अलौकिक अस्त्रोंका प्रयोग करने लगे ॥ २ ॥
तान्यहं तत्प्रतीघातैरस्त्रैरस्त्राणि भारत ।
व्यधमं तुमुले युद्धे प्राणांस्त्यक्त्वा सुदुस्त्यजान् ॥ ३ ॥
भारत! उस तुमुल युद्धमें अपने दुस्त्यज प्राणोंकी परवा न करके मैंने उनके सभी अस्त्रोंका विघातक अस्त्रोंद्वारा संहार कर डाला ॥ ३ ॥
अस्त्रैरस्त्रेषु बहुधा हतेष्वेव च भारत ।
अक्रुध्यत महातेजास्त्यक्तप्राणः स संयुगे ॥ ४ ॥
भरतनन्दन! इस प्रकार बार-बार मेरे अस्त्रोंद्वारा अपने अस्त्रोंके विनष्ट होनेपर महातेजस्वी परशुरामजी उस युद्धमें प्राणोंका मोह छोड़कर अत्यन्त कुपित हो उठे ॥ ४ ॥
ततः शक्तिं प्राहिणोद् घोररूपा- मस्त्रे रुद्धे जामदग्न्यो महात्मा । कालोत्सृष्टां प्रज्वलितामिवोल्कां संदीप्ताग्रां तेजसा व्याप्य लोकम् ॥ ५ ॥
इस प्रकार अपने अस्त्रोंका अवरोध होनेपर जमदग्निनन्दन महात्मा परशुरामने कालकी छोड़ी हुई प्रज्वलित उल्काके समान एक भयंकर शक्ति छोड़ी, जिसका अग्रभाग उद्दीप्त हो रहा था । वह शक्ति अपने तेजसे सम्पूर्ण लोकको व्याप्त किये हुए थी ॥ ५ ॥
ततोऽहं तामिषुभिर्दीप्यमानां समायान्तीमन्तकालार्कदीप्ताम् । छित्त्वा त्रिधा पातयामास भूमौ ततो ववौ पवनः पुण्यगन्धिः ॥ ६ ॥
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तब मैंने प्रलयकालके सूर्यकी भाँति प्रज्वलित होनेवाली उस देदीप्यमान शक्तिको
अपनी ओर आती देख अनेक बाणोंद्वारा उसके तीन टुकड़े करके उसे भूमिपर गिरा दिया ।
फिर तो पवित्र सुगन्धसे युक्त मन्द मन्द वायु चलने लगी ॥ ६ ॥
तस्यां छिन्नायां क्रोधदीप्तोऽथ रामः शक्तीर्घोराः प्राहिणोद् द्वादशान्याः । तासां रूपं भारत नोत शक्यं तेजस्वित्वाल्लाघवाच्चैव वक्तुम् ॥ ७ ॥
उस शक्तिके कट जानेपर परशुरामजी क्रोधसे जल उठे तथा उन्होंने दूसरी -दूसरी भयंकर बारह शक्तियाँ और छोड़ीं । भारत! वे इतनी तेजस्विनी तथा शीघ्रगामिनी थीं कि उनके स्वरूपका वर्णन करना असम्भव है ॥ ७ ॥
किं त्वेवाहं विह्वलः सम्प्रदृश्य दिग्भ्यः सर्वास्ता महोल्का इवाग्नेः । नानारूपास्तेजसोग्रेण दीप्ता यथाऽऽदित्या द्वादश लोकसंक्षये ॥ ८ ॥
प्रलयकालके बारह सूर्योंके समान भयंकर तेजसे प्रज्वलित अनेक रूपवाली तथा अग्निकी प्रचण्ड ज्वालाओंके समान धधकती हुई उन शक्तियोंको सब ओरसे आती देख मैं अत्यन्त विह्वल हो गया ॥ ८ ॥
ततो जालं बाणमयं विवृत्तं संदृश्य भित्त्वा शरजालेन राजन् । द्वादशेषून् प्राहिणवं रणेऽहं ततः शक्तीरप्यधमं घोररूपाः ॥ ९ ॥
राजन्! तत्पश्चात् वहाँ फैले हुए बाणमय जालको देखकर मैंने अपने बाणसमूहोंसे उसे छिन्न - भिन्न कर डाला और उस रणभूमिमें बारह सायकोंका प्रयोग किया, जिनसे उन भयंकर शक्तियों को भी व्यर्थ कर दिया ॥ ततो राजञ्जामदग्न्यो महात्मा शक्तीर्घोरा व्याक्षिपद्धेमदण्डाः । विचित्रिताः काञ्चनपट्टनद्धा यथा महोल्का ज्वलितास्तथा ताः ॥ १० ॥
राजन्! तत्पश्चात् महात्मा जमदग्निनन्दम परशुरामने स्वर्णमय दण्डसे विभूषित और भी बहुत - सी भयानक शक्तियाँ चलायीं, जो विचित्र दिखायी देती थीं, उनके ऊपर सोनेके पत्र जड़े हुए थे और वे जलती हुई बड़ी - बड़ी उल्काओंके समान प्रतीत होती थीं ॥ १० ॥
ताश्चाप्युग्राश्चर्मणा वारयित्वा खड्गेनाजौ पातयित्वा नरेन्द्र ।
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बाणैर्दिव्यैर्जामदग्न्यस्य संख्ये दिव्यानश्वानभ्यवर्षं ससूतान् ॥ ११ ॥
नरेन्द्र! उन भयंकर शक्तियोंको भी मैंने ढालसे रोककर तलवारसे रणभूमिमें काट गिराया । तत्पश्चात् परशुरामजीके दिव्य घोड़ों तथा सारथिपर मैंने दिव्य बाणोंकी वर्षा आरम्भ कर दी ॥ ११ ॥
निर्मुक्तानां पन्नगानां सरूपा दृष्ट्वा शक्तीर्हेमचित्रा निकृत्ताः । प्रादुश्चक्रे दिव्यमस्त्रं महात्मा क्रोधाविष्टो हैहयेशप्रमाथी ॥ १२ ॥
केंचुलिसे छूटकर निकले हुए सर्पोंके समान आकृतिवाली उन सुवर्णजटित विचित्र शक्तियोंको कटी हुई देख हैहयराजका विनाश करनेवाले महात्मा परशुरामजीने कुपित होकर पुनः अपना दिव्य अस्त्र प्रकट किया ॥ ततः श्रेण्यः शलभानामिवोग्राः समापेतुर्विशिखानां प्रदीप्ताः । समाचिनोच्चापि भृशं शरीरं हयान् सूतं सरथं चैव मह्यम् ॥ १३ ॥
फिर तो टिड्डियोंकी पंक्तियोंके समान प्रज्वलित एवं भयंकर बाणोंके समूह प्रकट होने लगे । इस प्रकार उन्होंने मेरे शरीर, रथ, सारथि और घोड़ोंको सर्वथा आच्छादित कर दिया ॥ १३ ॥
रथः शरैर्मे निचितः सर्वतोऽभूत् तथा वाहाः सारथिश्चैव राजन् । युगं रथेषां च तथैव चक्रे तथैवाक्षः शरकृत्तोऽथ भग्नः ॥ १४ ॥
राजन्! मेरा रथ चारों ओरसे उनके बाणोंद्वारा व्याप्त हो रहा था । घोड़ों और सारथिकी भी यही दशा थी । युग तथा ईषादण्डको भी उन्होंने उसी प्रकार बाणविद्ध कर रखा था और रथका धुरा उनके बाणोंसे कटकर टूक - टूक हो गया था ॥ १४ ॥
ततस्तस्मिन् बाणवर्षे व्यतीते
शरौघेण प्रत्यवर्षं गुरुं तम् ।
स विक्षतो मार्गणैर्ब्रह्मराशि- हादसक्तं मुमुचे भूरि रक्तम् ॥ १५ ॥
जब उनकी बाण - वर्षा समाप्त हुई, तब मैंने भी बदलेमें गुरुदेवपर बाणसमूहोंकी बौछार आरम्भ कर दी । वे ब्रह्मराशि महात्मा मेरे बाणोंसे क्षत- विक्षत होकर अपने शरीरसे अधिकाधिक रक्तकी धारा बहाने लगे ॥ १५ ॥
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यथा रामो बाणजालाभितप्त- स्तथैवाहं सुभृशं गाढविद्धः । ततो युद्धं व्यरमच्चापराह्णे भानावस्तं प्रति याते महीध्रम् ॥ १६ ॥
जिस प्रकार परशुरामजी मेरे सायकसमूहों से संतप्त थे, उसी प्रकार मैं भी उनके बाणोंसे अत्यन्त घायल हो रहा था । तदनन्तर सायंकालमें जब सूर्यदेव अस्ताचलको चले गये, तब युद्ध बंद हो गया ॥ १६ ॥
इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि अम्बोपाख्यानपर्वणि एकाशीत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १८१ ॥
इसप्रकार श्रीमहाभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत अम्बोपाख्यानपर्वमें एक सौ इक्यासीवाँ अध्याय पूराहुआ ॥ १८१ ॥
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द्वयशीत्यधिकशततमोऽध्यायः भीष्म और परशुरामका युद्ध भीष्म उवाच
ततः प्रभाते राजेन्द्र सूर्ये विमलतां गते ।
भार्गवस्य मया सार्धं पुनर्युद्धमवर्तत ॥ १ ॥
भीष्मजी कहते हैं - राजेन्द्र! तदनन्तर प्रातःकाल जब सूर्यदेव उदित होकर प्रकाशमें आ गये, उस समय मेरे साथ परशुरामजीका युद्ध पुनः प्रारम्भ हुआ ॥ १ ॥
ततोऽभ्रान्ते रथे तिष्ठन् रामः प्रहरतां वरः ।
ववर्ष शरजालानि मयि मेघ इवाचले ॥ २ ॥
तत्पश्चात् योद्धाओंमें श्रेष्ठ परशुरामजी स्थिर रथपर खड़े हो जैसे मेघ पर्वतपर जलकी बौछार करता है, उसी प्रकार मेरे ऊपर बाणसमूहोंकी वर्षा करने लगे ॥ २ ॥
ततः सूतो मम सुहृच्छरवर्षेण ताडितः ।
अपयातो रथोपस्थान्मनो मम विषादयन् ॥ ३ ॥
उस समय मेरा प्रिय सुहृद् सारथि बाणवर्षासे पीड़ित हो मेरे मनको विषादमें डालता हुआ रथकी बैठकसे नीचे गिर गया ॥ ३ ॥
ततः सूतो ममात्यर्थं कश्मलं प्राविशन्महत् ।
पृथिव्यां च शराघातान्निपपात मुमोह च ॥ ४ ॥
मेरे सारथिको अत्यन्त मोह छा गया था। वह बाणोंके आघातसे पृथ्वीपर गिरा और अचेत हो गया ॥
ततः सूतोऽजहात् प्राणान् रामबाणप्रपीडितः ।
मुहूर्तादिव राजेन्द्र मां च भीराविशत् तदा ॥ ५ ॥
राजेन्द्र! परशुरामजीके बाणोंसे अत्यन्त पीड़ित होनेके कारण दो ही घड़ीमें सूतने प्राण त्याग दिये । उस समय मेरे मनमें बड़ा भय समा गया ॥ ५ ॥
ततः सूते हते तस्मिन् क्षिपतस्तस्य मे शरान् ।
प्रमत्तमनसो रामः प्राहिणोन्मृत्युसम्मितम् ॥ ६ ॥
उस सारथिके मारे जानेपर मैं असावधान मनसे परशुरामजीके बाणोंको काट रहा था! इतनेहीमें परशुरामजीने मुझपर मृत्युके समान भयंकर बाण छोड़ा ॥ ६ ॥
ततः सूतव्यसनिनं विप्लुतं मां स भार्गवः ।
शरेणाभ्यहनद् गाढं विकृष्य बलवद्धनुः ॥ ७ ॥
उस समय मैं सारथिकी मृत्युके कारण व्याकुल था तो भी भृगुनन्दन परशुरामने अपने सुदृढ़ धनुषको जोर- जोर से खींचकर मुझपर बाणसे गहरा आघात किया ॥ ७ ॥
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स मे भुजान्तरे राजन् निपत्य रुधिराशनः ।
मयैव सह राजेन्द्र जगाम वसुधातलम् ॥ ८ ॥
राजेन्द्र! वह रक्त पीनेवाला बाण मेरी दोनों भुजाओंके बीच (वक्षःस्थलमें ) चोट पहुँचाकर मुझे साथ लिये दिये पृथ्वीपर जा गिरा ॥ ८ ॥
मत्वा तु निहतं रामस्ततो मां भरतर्षभ ।
मेघवद् विननादोच्चैर्जहृषे च पुनः पुनः ॥ ९ ॥
भरतश्रेष्ठ! उस समय मुझे मारा गया जानकर परशुरामजी मेघके समान गम्भीर स्वरसे गर्जना करने लगे । उनके शरीरमें बार - बार हर्षजनित रोमांच होने लगा ॥ ९ ॥
तथा तु पतिते राजन् मयि रामो मुदा युतः ।
उदक्रोशन्महानादं सह तैरनुयायिभिः ॥ १० ॥
राजन्! इस प्रकार मेरे धराशायी होनेपर परशुरामजीको बड़ी प्रसन्नता हुई । उन्होंने अपने अनुयायियोंके साथ महान् कोलाहल मचाया ॥ १० ॥
मम तत्राभवन् ये तु कुरवः पार्श्वतः स्थिताः ।
आगता अपि युद्धं तज्जनास्तत्र दिदृक्षवः ।
आर्तिं परमिकां जग्मुस्ते तदा पतिते मयि ॥ ११ ॥
वहाँ मेरे पार्श्वभागमें जो कुरुवंशी क्षत्रियगण खड़े थे तथा जो लोग वहाँ युद्ध देखनेकी इच्छासे आये थे, उन सबको मेरे गिर जानेपर बड़ा दुःख हुआ ॥ ११ ॥
ततोऽपश्यं पतितो राजसिंहं द्विजानष्टौ सूर्यहुताशनाभान् । ते मां समन्तात् परिवार्य तस्थुः स्वबाहुभिः परिधार्याजिमध्ये ॥ १२ ॥
राजसिंह! वहाँ गिरते समय मैंने देखा कि सूर्य और अग्निके समान तेजस्वी आठ ब्राह्मण आये और संग्रामभूमिमें मुझे सब ओरसे घेरकर अपनी भुजाओंपर ही मेरे शरीरको धारण करके खड़े हो गये ॥ १२ ॥
रक्ष्यमाणश्च तैर्विप्रैर्नाहं भूमिमुपास्पृशम् ।
अन्तरिक्षे धृतो ह्यस्मि तैर्विप्रैर्बान्धवैरिव ॥ १३ ॥
उन ब्राह्मणोंसे सुरक्षित होनेके कारण मुझे धरतीका स्पर्श नहीं करना पड़ा । मेरे सगे भाई- बन्धुओंकी भाँति उन ब्राह्मणोंने मुझे आकाशमें ही रोक लिया था ॥ १३ ॥
श्वसन्निवान्तरिक्षे च जलबिन्दुभिरुक्षितः ।
ततस्ते ब्राह्मणा राजन्नब्रुवन् परिगृह्य माम् ॥ १४ ॥
राजन्! आकाशमें मैं साँस लेता- सा ठहर गया था । उस समय ब्राह्मणोंने मुझपर
जलकी बूँदें छिड़क दीं । फिर वे मुझे पकड़कर बोले ॥ १४ ॥
मा भैरिति समं सर्वे स्वस्ति तेऽस्त्विति चासकृत् ।