03.Mahabharata Volume 3 — पृष्ठ 1221–1230
महाभारत — खण्ड ३ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1221–1230
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पञ्चनवत्यधिकशततमोऽध्यायः कौरव सेनाका रणके लिये प्रस्थान वैशम्पायन उवाच
ततः प्रभाते विमले धार्तराष्ट्रेण चोदिताः ।
दुर्योधनेन राजानः प्रययुः पाण्डवान् प्रति ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते है–जनमेजय! तदनन्तर निर्मल प्रभातकालमें धृतराष्ट्रपुत्र दुर्योधनसे प्रेरित हो सब राजा पाण्डवोंसे युद्ध करनेके लिये चले ॥ १ ॥
आप्लाव्य शुचयः सर्वे स्रग्विणः शुक्लवाससः ।
गृहीतशस्त्रा ध्वजिनः स्वस्ति वाच्य हुताग्नयः ॥ २ ॥
चलनेके पहले उन सबने स्नान करके शुद्ध हो श्वेत वस्त्र धारण किये, पुष्पोंकी मालाएँ पहनीं, ब्राह्मणोंसे स्वस्तिवाचन कराया, अग्निमें आहुतियाँ दीं, फिर ध्वजा फहराते हुए हाथोंमें अस्त्र- शस्त्र लेकर रणभूमिकी ओर प्रस्थित हुए ॥ २ ॥
सर्वे ब्रह्मविदः शूराः सर्वे सुचरितव्रताः ।
सर्वे वर्मभृतश्चैव सर्वे चाहवलक्षणाः ॥ ३ ॥
वे सभी वेदवेत्ता, शूरवीर तथा उत्तम विधिसे व्रतका पालन करनेवाले थे । सभी कवचधारी तथा युद्धके चिह्नोंसे सुशोभित थे ॥ ३ ॥
आहवेषु पराँल्लोकान् जिगीषन्तो महाबलाः ।
एकाग्रमनसः सर्वे श्रद्दधानाः परस्परम् ॥ ४ ॥
वे महाबली वीर युद्धमें पराक्रम दिखाकर उत्तम लोकोंपर विजय पाना चाहते थे । उन सबका चित्त एकाग्र था और वे सभी एक- दूसरेपर विश्वास करते थे ॥ ४ ॥
विन्दानुविन्दावावन्त्यौ केकया बाह्निकैः सह ।
प्रययुः सर्व एवैते भारद्वाजपुरोगमाः ॥ ५ ॥
अवन्तीदेशके राजकुमार विन्द और अनुविन्द, बाह्लीकदेशीय सैनिकोंके साथ केकयराजकुमार — ये सब द्रोणाचार्यको आगे करके चले ॥ ५ ॥
अश्वत्थामा शान्तनवः सैन्धवोऽथ जयद्रथः ।
दाक्षिणात्याः प्रतीच्याश्च पर्वतीयाश्च ये नृपाः ॥ ६ ॥
गान्धारराजः शकुनिः प्राच्योदीच्याश्च सर्वशः ।
शकाः किराता यवनाः शिबयोऽथ वसातयः ॥ ७ ॥
स्वैः स्वैरनीकैः सहिताः परिवार्य महारथम् ।
एते महारथाः सर्वे द्वितीये निर्ययुर्बले ॥ ८ ॥
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अश्वत्थामा, भीष्म, सिन्धुराज जयद्रथ, दाक्षिणात्य नरेश, पाश्चात्त्य भूपाल और पर्वतीय भूपाल, गान्धारराज शकुनि तथा पूर्व और उत्तरदिशाके नरेश, शक, किरात, यवन, शिबि और वसाति भूपालगण -ये सभी महारथीलोग अपनी-अपनी सेनाओंके साथ महारथी ( भीष्म) को सब ओरसे घेरकर दूसरे सैन्य दलके रूपमें सुसज्जित होकर निकले ॥ ६–८ ॥
कृतवर्मा सहानीकस्त्रिगर्तश्च महारथः ।
दुर्योधनश्च नृपतिर्भ्रातृभिः परिवारितः ॥ ९ ॥
शलो भूरिश्रवाः शल्यः कौसल्योऽथ बृहद्रथः ।
एते पश्चादनुगता धार्तराष्ट्रपुरोगमाः ॥ १० ॥
सेनासहित कृतवर्मा, महारथी त्रिगर्त, भाइयोंसे घिरा हुआ महाराज दुर्योधन, शल, भूरिश्रवा, शल्य तथा कोसलराज बृहद्रथ - ये दुर्योधनको आगे करके उसके पीछे - पीछे ( तृतीय सैन्यदलमें) चले ॥ ९ -१० ॥
ते समेत्य यथान्यायं धार्तराष्ट्रा महाबलाः ।
कुरुक्षेत्रस्य पश्चार्धे व्यवातिष्ठन्त दंशिताः ॥ ११ ॥
धृतराष्ट्रके वे महाबली पुत्र रणक्षेत्रमें जाकर कवच आदिसे सुसज्जित हो कुरुक्षेत्रके पश्चिम भागमें यथोचितरूपसे खड़े हुए ॥ ११ ॥
दुर्योधनस्तु शिबिरं कारयामास भारत ।
यथैव हास्तिनपुरं द्वितीयं समलंकृतम् ॥ १२ ॥
न विशेषं विजानन्ति पुरस्य शिबिरस्य वा ।
कुशला अपि राजेन्द्र नरा नगरवासिनः ॥ १३ ॥
भारत! दुर्योधनने पहलेसे ही ऐसा निवासस्थान बनवा रखा था, जो दूसरे हस्तिनापुरकी भाँति सजा हुआ था । राजेन्द्र! नगरमें निवास करनेवाले चतुर मनुष्य भी उस शिविर तथा हस्तिनापुर नामक नगरमें क्या अन्तर है, यह नहीं समझ पाते थे ॥ १२-१३ ॥
तादृशान्येव दुर्गाणि राज्ञामपि महीपतिः ।
कारयामास कौरव्यः शतशोऽथ सहस्रशः ॥ १४ ॥
अन्य राजाओंके लिये भी कुरुवंशी भूपालने वैसे ही सैकड़ों तथा सहस्रों दुर्ग बनवाये थे ॥ १४ ॥
पञ्चयोजनमुत्सृज्य मण्डलं तद्रणाजिरम् ।
सेनानिवेशास्ते राजन्नाविशञ्छतसंघशः ॥ १५ ॥
समरांगणके लिये पाँच योजनका घेरा छोड़कर सैनिकोंके ठहरनेके लिये सौ - सौकी संख्यामें कितनी ही श्रेणीबद्ध छावनियाँ डाली गयी थीं ॥ १५ ॥
तत्र ते पृथिवीपाला यथोत्साहं यथाबलम् ।
विविशुः शिबिराण्यत्र द्रव्यवन्ति सहस्रशः ॥ १६ ॥
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उन्हीं बहुमूल्य आवश्यक सामग्रियोंसे सम्पन्न हजारों छावनियोंमें वे भूपाल अपने बल और उत्साहके अनुरूप युद्धके लिये उद्यत होकर रहते थे ॥ १६ ॥
तेषां दुर्योधनो राजा ससैन्यानां महात्मनाम् ।
व्यादिदेश सवाह्यानां भक्ष्यभोज्यमनुत्तमम् ॥ १७ ॥
सनागाश्वमनुष्याणां ये च शिल्पोपजीविनः ।
ये चान्येऽनुगतास्तत्र सूतमागधबन्दिनः ॥ १८ ॥
राजा दुर्योधन सवारियों और सैनिकोंसहित उन महामना नरेशोंको परम उत्तम भक्ष्य-भोज्य पदार्थ देता था। हाथियों, अश्वों, पैदल मनुष्यों, शिल्प - जीवियों, अन्य अनुगामियों तथा सूत, मागध और बंदीजनोंको भी राजाकी ओरसे भोजन प्राप्त होता था ॥ १७-१८ ॥
वणिजो गणिकाश्चारा ये चैव प्रेक्षका जनाः ।
सर्वांस्तान् कौरवो राजा विधिवत् प्रत्यवैक्षत ॥ १ ९ ॥
वहाँ जो वणिक्, गणिकाएँ, गुप्तचर तथा दर्शक मनुष्य आते थे, उन सबकी कुरुराज दुर्योधन विधिपूर्वक देखभाल करता था ॥ १ ९ ॥ इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि अम्बोपाख्यानपर्वणि कौरवसैन्यनिर्याणे पञ्चनवत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १ ९ ५ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत अम्बोपाख्यानपर्वमें कौरव- सेनाका युद्धके लिये प्रस्थानविषयक एक सौ पंचानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १ ९ ५ ॥
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षण्णवत्यधिकशततमोऽध्यायः पाण्डवसेनाका युद्धके लिये प्रस्थान वैशम्पायन उवाच
तथैव राजा कौन्तेयो धर्मपुत्रो युधिष्ठिरः ।
धृष्टद्युम्नमुखान् वीरांश्चोदयामास भारत ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! इसी प्रकार कुन्तीनन्दन धर्मपुत्र राजा युधिष्ठिरने भी धृष्टद्युम्न आदि वीरोंको युद्धके लिये जानेकी आज्ञा दी ॥ १ ॥
चेदिकाशिकरूषाणां नेतारं दृढविक्रमम् ।
सेनापतिममित्रघ्नं धृष्टकेतुमथादिशत् ॥ २ ॥
चेदि, काशि और करूषदेशोंके अधिनायक दृढ़ पराक्रमी शत्रुनाशक सेनापति धृष्टकेतुको भी प्रस्थान करनेका आदेश दिया ॥ २ ॥
विराटं द्रुपदं चैव युयुधानं शिखण्डिनम् ।
पाञ्चाल्यौ च महेष्वासौ युधामन्यूत्तमौजसौ ॥ ३ ॥
विराट, द्रुपद, सात्यकि, शिखण्डी, महाधनुर्धर पांचालवीर युधामन्यु और उत्तमौजाको भी राजाका आदेश प्राप्त हुआ ॥ ३ ॥
ते शूराश्चित्रवर्माणस्तप्तकुण्डलधारिणः ।
आज्यावसिक्ता ज्वलिता धिष्ण्येष्विव हुताशनाः ॥ ४ ॥
अशोभन्त महेष्वासा ग्रहाः प्रज्वलिता इव । वे महाधनुर्धर शूरवीर विचित्र कवच और तपाये हुए सोनेके कुण्डल धारण किये वेदीपर घीकी आहुतिसे प्रज्वलित हुए अग्निदेवके समान तथा आकाशमें प्रकाशित होनेवाले ग्रहोंकी भाँति शोभा पा रहे थे ॥ ४३ ॥
अथ सैन्यं यथायोगं पूजयित्वा नरर्षभः ॥ ५ ॥
दिदेश तान्यनीकानि प्रयाणाय महीपतिः ।
तेषां युधिष्ठिरो राजा ससैन्यानां महात्मनाम् ॥ ६ ॥
व्यादिदेश सवाह्यानां भक्ष्यभोज्यमनुत्तमम् ।
सगजाश्वमनुष्याणां ये च शिल्पोपजीविनः ॥ ७ ॥
तदनन्तर योग्यतानुसार सम्पूर्ण सेनाका समादर करके नरश्रेष्ठ राजा युधिष्ठिरने उन सैनिकोंको प्रस्थान करनेकी आज्ञा दी और सेना तथा सवारियोंसहित उन महामना नरेशोंको उत्तमोत्तम खाने - पीनेकी वस्तुएँ देनेकी आज्ञा दी । उनके साथ जो भी हाथी, घोड़े, मनुष्य और शिल्पजीवी पुरुष थे, उन सबके लिये भोजन प्रस्तुत करनेका आदेश दिया ॥ ५— ७ ॥
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अभिमन्युं बृहन्तं च द्रौपदेयांश्च सर्वशः ।
धृष्टद्युम्नमुखानेतान् प्राहिणोत् पाण्डुनन्दनः ॥ ८ ॥
पाण्डुनन्दन युधिष्ठिरने धृष्टद्युम्नको आगे करके अभिमन्यु, बृहन्त तथा द्रौपदीके पाँचों पुत्र- इन सबको प्रथम सेनादलके साथ भेजा ॥ ८ ॥
भीमं च युयुधानं च पाण्डवं च धनंजयम् ।
द्वितीयं प्रेषयामास बलस्कन्धं युधिष्ठिरः ॥ ९ ॥
भीमसेन, सात्यकि तथा पाण्डुनन्दन अर्जुनको युधिष्ठिरने द्वितीय सैन्यसमूहका नेता बनाकर भेजा ॥ ९ ॥
भाण्डं समारोपयतां चरतां सम्प्रधावताम् ।
हृष्टानां तत्र योधानां शब्दो दिवमिवास्पृशत् ॥ १० ॥
वहाँ हर्षमें भरे हुए कुछ योद्धा सवारियोंपर युद्धकी सामग्री चढ़ाते, कुछ इधर- उधर जाते और कुछ लोग कार्यवश दौड़- धूप करते थे । उन सबका कोलाहल मानो स्वर्गलोकको छूने लगा ॥ १० ॥
स्वयमेव ततः पश्चाद् विराटद्रुपदान्वितः ।
अथापरैर्महीपालैः सह प्रायान्महीपतिः ॥ ११ ॥
तत्पश्चात् राजा विराट और द्रुपदको साथ ले अन्यान्य भूपालोंसहित स्वयं राजा युधिष्ठिर चले ॥ ११ ॥
भीमधन्वायनी सेना धृष्टद्युम्नेन पालिता ।
गङ्गेव पूर्णा स्तिमिता स्यन्दमाना व्यदृश्यत ॥ १२ ॥
भयंकर धनुर्धरोंसे भरी हुई और धृष्टद्युम्नके द्वारा सुरक्षित हो कहीं ठहरती और कहीं आगे बढ़ती हुई वह पाण्डवसेना कहीं निश्चल और कहीं प्रवाहशील जलसे भरी गंगाके समान दिखायी देती थी ॥ १२ ॥
ततः पुनरनीकानि न्ययोजयत बुद्धिमान् ।
मोहयन् धृतराष्ट्रस्य पुत्राणां बुद्धिनिश्चयम् ॥ १३ ॥
थोड़ी दूर जाकर बुद्धिमान् राजा युधिष्ठिरने धृतराष्ट्रके पुत्रोंके बौद्धिक निश्चयमें भ्रम उत्पन्न करनेके लिये अपनी सेनाका दुबारा संगठन किया ॥ १३ ॥
द्रौपदेयान् महेष्वासानभिमन्युं च पाण्डवः ।
नकुलं सहदेवं च सर्वांश्चैव प्रभद्रकान् ॥ १४ ॥
दश चाश्वसहस्राणि द्विसहस्राणि दन्तिनाम् ।
अयुतं च पदातीनां रथाः पञ्चशतं तथा ॥ १५ ॥
भीमसेनस्य दुर्धर्षं प्रथमं प्रादिशद् बलम् ।
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पाण्डुपुत्र युधिष्ठिरने द्रौपदीके महाधनुर्धर पुत्र, अभिमन्यु, नकुल, सहदेव, समस्त प्रभद्रक वीर, दस हजार घुड़सवार, दो हजार हाथीसवार, दस हजार पैदल तथा पाँच सौ रथी— इनके प्रथम दुर्धर्ष दलको भीमसेनकी अध्यक्षतामें दे दिया ॥ १४-१५३ ॥ मध्यमे च विराटं च जयत्सेनं च पाण्डवः ॥ १६ ॥
महारथौ च पाञ्चाल्यौ युधामन्यूत्तमौजसौ ।
वीर्यवन्तौ महात्मानौ गदाकार्मुकधारिणौ ॥ १७ ॥
अन्वयातां तदा मध्ये वासुदेवधनंजयौ । बीचके दलमें राजाने विराट, जयत्सेन तथा पांचालदेशीय महारथी युधामन्यु और उत्तमौजाको रखा । हाथोंमें गदा और धनुष धारण किये ये दोनों वीर ( युधामन्यु - उत्तमौजा) बड़े पराक्रमी और मनस्वी थे । उस समय इन सबके मध्यभागमें भगवान् श्रीकृष्ण और अर्जुन सेनाके पीछे - पीछे जा रहे थे ॥ १६-१७३ ॥ बभूवुरतिसंरब्धाः कृतप्रहरणा नराः ॥ १८ ॥
तेषां विंशतिसाहस्रा हयाः शूरैरधिष्ठिताः ।
पञ्च नागसहस्राणि रथवंशाश्च सर्वशः ॥ १ ९ ॥
उस समय जो योद्धा पहले कभी युद्ध कर चुके थे, वे आवेशमें भरे हुए थे । उनमें बीस हजार घोड़े ऐसे थे जिनकी पीठपर शौर्यसम्पन्न वीर बैठे हुए थे । इन घुड़सवारोंके साथ पाँच हजार गजारोही तथा बहुत - से रथी भी थे ॥ १८-१९ ॥
पदातयश्च ये शूराः कार्मुकासिगदाधराः ।
सहस्रशोऽन्वयुः पश्चादग्रतश्च सहस्रशः ॥ २० ॥
धनुष, बाण, खड्ग और गदा धारण करनेवाले जो पैदल सैनिक थे, वे सहस्रोंकी संख्यामें सेनाके आगे और पीछे चलते थे ॥ २० ॥
युधिष्ठिरो यत्र सैन्ये स्वयमेव बलार्णवे ।
तत्र ते पृथिवीपाला भूयिष्ठं पर्यवस्थिताः ॥ २१ ॥
जिस सैन्य - समुद्रमें स्वयं राजा युधिष्ठिर थे, उसमें बहुत - से भूमिपाल उन्हें चारों ओरसे घेरकर चलते थे ॥
तत्र नागसहस्राणि हयानामयुतानि च ।
तथा रथसहस्राणि पदातीनां च भारत ॥ २२ ॥
भारत! उसमें एक हजार हाथीसवार, दस हजार घुड़सवार, एक हजार रथी और कई सहस्र पैदल सैनिक थे ॥
चेकितानः स्वसैन्येन महता पार्थिवर्षभ ।
धृष्टकेतुश्च चेदीनां प्रणेता पार्थिवो ययौ ॥ २३ ॥
नृपश्रेष्ठ! अपनी विशाल सेनाके साथ चेकितान तथा चेदिराज धृष्टकेतु भी उन्हींके साथ जा रहे थे ॥ २३ ॥
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सात्यकिश्च महेष्वासो वृष्णीनां प्रवरो रथः ।
वृतः शतसहस्रेण रथानां प्रणुदन् बली ॥ २४ ॥
वृष्णिवंशके प्रमुख महारथी महान् धनुर्धर बलवान् सात्यकि एक लाख रथियोंसे घिरकर गर्जना करते हुए आगे बढ़ रहे थे ॥ २४ ॥
क्षत्रदेवब्रह्मदेवौ रथस्थी पुरुषर्षभौ ।
जघनं पालयन्तौ च पृष्ठतोऽनुप्रजग्मतुः ॥ २५ ॥
क्षत्रदेव और ब्रह्मदेव ये दोनों पुरुषरत्न रथपर बैठकर सेनाके पिछले भागकी रक्षा करते हुए पीछे - पीछे जा रहे थे ॥ २५ ॥
शकटापणवेशाश्च यानं युग्यं च सर्वशः ।
तत्र नागसहस्राणि हयानामयुतानि च ।
फल्गु सर्वं कलत्रं च यत्किञ्चित् कृशदुर्बलम् ॥ २६ ॥
कोशसंचयवाहांश्च कोष्ठागारं तथैव च ।
गजानीकेन संगृह्य शनैः प्रायाद् युधिष्ठिरः ॥ २७ ॥
इनके सिवा और भी बहुत- से छकड़े, दूकानें, वेश- भूषाके सामान, सवारियाँ, सामान ढोनेकी गाड़ी, एक सहस्र हाथी, अनेक अयुत घोड़े, अन्य छोटी- मोटी वस्तुएँ, स्त्रियाँ, कृश और दुर्बल मनुष्य, कोश- संग्रह और उनके ढोनेवाले लोग तथा कोष्ठागार आदि सब कुछ संग्रह करके राजा युधिष्ठिर धीरे - धीरे गजसेनाके साथ यात्रा कर रहे थे ॥ २६-२७ ॥
तमन्वयात् सत्यधृतिः सौचित्तिर्युद्धदुर्मदः ।
श्रेणिमान् वसुदानश्च पुत्रः काश्यस्य वा विभुः ॥ २८ ॥
रथा विंशतिसाहस्रा ये तेषामनुयायिनः ।
हयानां दश कोट्यश्च महतां किंकिणीकिनाम् ॥ २ ९ ॥
गजा विंशतिसाहस्रा ईषादन्ताः प्रहारिणः ।
कुलीना भिन्नकरटा मेघा इव विसर्पिणः ॥ ३० ॥
उनके पीछे सुचित्तके पुत्र रणदुर्मद सत्यधृति, श्रेणिमान, वसुदान तथा काशिराजके सामर्थ्यशाली पुत्र जा रहे थे । इन सबका अनुगमन करनेवाले बीस हजार रथी, घुँघुरुओंसे सुशोभित दस करोड़ घोड़े, ईषादण्डके समान दाँतवाले, प्रहारकुशल, अच्छी जातिमें उत्पन्न, मदस्रावी और मेघोंकी घटाके समान चलनेवाले बीस हजार हाथी थे ॥
षष्टिर्नागसहस्राणि दशान्यानि च भारत ।
युधिष्ठिरस्य यान्यासन् युधि सेना महात्मनः ॥ ३१ ॥
क्षरन्त इव जीमूताः प्रभिन्नकरटामुखाः ।
राजानमन्वयुः पश्चाच्चलन्त इव पर्वताः ॥ ३२ ॥
भारत! इनके सिवा, युद्धमें महात्मा युधिष्ठिरके पास निजी तौरपर सत्तर हजार हाथी और थे, जो जल बरसानेवाले बादलोंकी भाँति अपने गण्डस्थलसे मदकी धारा बहाते थे । वे
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सब - के - सब जंगम पर्वतोंकी भाँति राजा युधिष्ठिरका अनुसरण कर रहे थे ॥ ३१-३२ ॥
एवं तस्य बलं भीमं कुन्तीपुत्रस्य धीमतः ।
यदाश्रित्याथ युयुधे धार्तराष्ट्रं सुयोधनम् ॥ ३३ ॥
इस प्रकार बुद्धिमान् कुन्तीपुत्रके पास भयंकर एवं विशाल सेना थी, जिसका आश्रय लेकर वे धृतराष्ट्रपुत्र दुर्योधनसे लोहा ले रहे थे ॥ ३३ ॥
ततोऽन्ये शतशः पश्चात् सहस्रायुतशो नराः ।
नर्दन्तः प्रययुस्तेषामनीकानि सहस्रशः ॥ ३४ ॥
इन सबके अतिरिक्त पीछे - पीछे लाखों पैदल मनुष्य तथा उनकी सहस्रों सेनाएँ गर्जना करती हुई आगे बढ़ रही थीं ॥ ३४ ॥
तत्र भेरीसहस्राणि शङ्खानामयुतानि च ।
न्यवादयन्त संहृष्टाः सहस्रायुतशो नराः ॥ ३५ ॥
उस समय उस रणक्षेत्रमें लाखों मनुष्य हर्ष और उत्साहमें भरकर हजारों भेरियों तथा शंखोंकी ध्वनि कर रहे थे ॥ ३५ ॥
इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि अम्बोपाख्यानपर्वणि पाण्डवसेनानिर्याणे षण्णवत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १ ९ ६ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत अम्बोपाख्यानपर्वमें पाण्डवसेनानिर्याणविषयक एक सौ छानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १ ९ ६ ॥ उद्योगपर्व सम्पूर्णम् अनुष्टुप् छन्द ( अन्य बड़े छन्द ) बड़े छन्दोंको ३२ अक्षरोंके कुलयोग अनुष्टुप् मानकर गिननेपर उत्तर भारतीय पाठसे लिये गये श्लोक - ५ ९ ७८ ॥ ( ७८४।- ) १०७८ I= ७०५६ ॥।= दक्षिण भारतीय पाठसे लिये गये श्लोक - ६८ ॥ ( ५॥ ) ७॥- ७६- उद्योगपर्वकी सम्पूर्ण श्लोक संख्या ७१३३
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ॐ श्रीपरमात्मने नमः श्रीमहाभारतम् भीष्मपर्व |जम्बूखण्डविनिर्माणपर्व प्रथमोऽध्यायः कुरुक्षेत्रमें उभय पक्षके सैनिकोंकी स्थिति तथा युद्धके नियमोंका निर्माण
नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम् ।
देवीं सरस्वतीं व्यासं ततो जयमुदीरयेत् ॥
अन्तर्यामी नारायणस्वरूप भगवान् श्रीकृष्ण, ( उनके नित्य सखा ) नरस्वरूप नरश्रेष्ठ अर्जुन, ( उनकी लीला प्रकट करनेवाली ) भगवती सरस्वती और ( उन लीलाओंका संकलन करनेवाले ) महर्षि वेदव्यासको नमस्कार करके जय ( महाभारत ) -का पाठ करना चाहिये । जनमेजय उवाच
कथं युयुधिरे वीराः कुरुपाण्डवसोमकाः ।
पार्थिवाः सुमहात्मानो नानादेशसमागताः ॥ १ ॥
जनमेजयने पूछा- मुने! कौरव, पाण्डव और सोमकवीरों तथा नाना देशोंसे आये हुए अन्य महामना नरेशोंने वहाँ किस प्रकार युद्ध किया? ॥ १ ॥
वैशम्पायन उवाच
यथा युयुधिरे वीराः कुरुपाण्डवसोमकाः ।
कुरुक्षेत्रे तपःक्षेत्रे शृणु त्वं पृथिवीपते ॥ २ ॥
वैशम्पायनजीने कहा – पृथ्वीपते! वीर कौरव, पाण्डव और सोमकोंने तपोभूमि कुरुक्षेत्रमें जिस प्रकार युद्ध किया था, उसे बताता हूँ; सुनो ॥ २ ॥
तेऽवतीर्य कुरुक्षेत्रं पाण्डवाः सहसोमकाः ।
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कौरवाः समवर्तन्त जिगीषन्तो महाबलाः ॥ ३ ॥
सोमकोंसहित पाण्डव तथा कौरव दोनों महाबली थे । वे एक- दूसरेको जीतनेकी आशासे कुरुक्षेत्रमें उतरकर आमने - सामने डटे हुए थे ॥ ३ ॥
वेदाध्ययनसम्पन्नाः सर्वे युद्धाभिनन्दिनः ।
आशंसन्तो जयं युद्धे बलेनाभिमुखा रणे ॥ ४ ॥
वे सब- के - सब वेदाध्ययनसे सम्पन्न और युद्धका अभिनन्दन करनेवाले थे और संग्राममें विजयकी आशा रखकर रणभूमिमें बलपूर्वक एक- दूसरेके सम्मुख खड़े थे ॥ ४ ॥
अभियाय च दुर्धर्षां धार्तराष्ट्रस्य वाहिनीम् ।
प्राङ्मुखाः पश्चिमे भागे न्यविशन्त ससैनिकाः ॥ ५ ॥
पाण्डवोंके योद्धालोग अपने- अपने सैनिकोंके सहित धृतराष्ट्रपुत्रकी दुर्धर्ष सेनाके सम्मुख जाकर पश्चिमभागमें पूर्वाभिमुख होकर ठहर गये थे ॥ ५ ॥
समन्तपञ्चकाद् बाह्यं शिबिराणि सहस्रशः ।
कारयामास विधिवत् कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः ॥ ६ ॥
कुन्तीनन्दन युधिष्ठिरने समन्तपंचक क्षेत्रसे बाहर यथायोग्य सहस्रों शिविर बनवाये थे ॥ ६ ॥
शून्या च पृथिवी सर्वा बालवृद्धावशेषिता ।
निरश्वपुरुषेवासीद् रथकुञ्जरवर्जिता ॥ ७ ॥
समस्त पृथ्वीके सभी प्रदेश नवयुवकोंसे सूने हो रहे थे । उनमें केवल बालक और वृद्ध ही शेष रह गये थे । सारी वसुधा घोड़े, हाथी, रथ और तरुण पुरुषोंसे हीन- सी हो रही थी ॥ ७ ॥
यावत्तपति सूर्यो हि जम्बूद्वीपस्य मण्डलम् ।
तावदेव समायातं बलं पार्थिवसत्तम ॥ ८ ॥
नृपश्रेष्ठ! सूर्यदेव जम्बूद्वीपके जितने भूमण्डलको अपनी किरणोंसे तपाते हैं, उतनी दूरकी सेनाएँ वहाँ युद्धके लिये आ गयी थीं ॥ ८ ॥
एकस्थाः सर्ववर्णास्ते मण्डलं बहुयोजनम् ।
पर्याक्रामन्त देशांश्च नदीः शैलान् वनानि च ॥ ९ ॥
वहाँ सभी वर्णके लोग एक ही स्थानपर एकत्र थे । युद्धभूमिका घेरा कई योजन लंबा था । उन सब लोगोंने वहाँके अनेक प्रदेशों, नदियों, पर्वतों और वनोंको सब ओरसे घेर लिया था ॥ ९ ॥
तेषां युधिष्ठिरो राजा सर्वेषां पुरुषर्षभ ।
व्यादिदेश सवाह्यानां भक्ष्यभोज्यमनुत्तमम् ॥ १० ॥
नरश्रेष्ठ! राजा युधिष्ठिरने सेना और सवारियों सहित उन सबके लिये उत्तमोत्तम भोजन प्रस्तुत करनेका आदेश दे दिया था ॥ १० ॥