03.Mahabharata Volume 3 — पृष्ठ 1261–1270
महाभारत — खण्ड ३ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1261–1270
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करनेवाला शृंगवान् पर्वत । राजन्! ये छ: पर्वत सिद्धों तथा चारणोंके निवास स्थान हैं ॥ ४-५ ॥
एषामन्तरविष्कम्भो योजनानि सहस्रशः ।
तत्र पुण्या जनपदास्तानि वर्षाणि भारत ॥ ६ ॥
भरतनन्दन! इनके बीचका विस्तार सहस्रों योजन है । वहाँ भिन्न-भिन्न वर्ष ( खण्ड ) और उनमें बहुत - से पवित्र जनपद हैं ॥ ६ ॥
वसन्ति तेषु सत्त्वानि नानाजातीनि सर्वशः ।
इदं तु भारतं वर्षं ततो हैमवतं परम् ॥ ७ ॥
उनमें सब ओर नाना जातियोंके प्राणी निवास करते हैं, उनमेंसे यह भारतवर्ष है । इसके बाद हिमालयसे उत्तर हैमवतवर्ष है ॥ ७ ॥
हेमकूटात् परं चैव हरिवर्षं प्रचक्षते ।
दक्षिणेन तु नीलस्य निषधस्योत्तरेण तु ॥ ८ ॥
प्रागायतो महाभाग माल्यवान् नाम पर्वतः ।
ततः परं माल्यवतः पर्वतो गन्धमादनः ॥ ९ ॥
हेमकूट पर्वतसे आगे हरिवर्षकी स्थिति बतायी जाती है। महाभाग! नीलगिरिके दक्षिण
और निषधपर्वतके उत्तर पूर्व से पश्चिमकी ओर फैला हुआ माल्यवान् नामक पर्वत है ।
माल्यवान्से आगे गन्धमादन पर्वत है ॥ ८ - ९ ॥
परिमण्डलस्तयोर्मध्ये मेरुः कनकपर्वतः ।
आदित्यतरुणाभासो विधूम इव पावकः ॥ १० ॥
इन दोनोंके बीचमें मण्डलाकार सुवर्णमय मेरुपर्वत है, जो प्रातःकालके सूर्यके समान प्रकाशमान तथा धूमरहित अग्निके समान कान्तिमान् है ॥ १० ॥
योजनानां सहस्राणि चतुरशीतिरुच्छ्रितः ।
अधस्ताच्चतुरशीतिर्योजनानां महीपते ॥ ११ ॥
उसकी ऊँचाई चौरासी हजार योजन है । राजन्! वह नीचे भी चौरासी हजार योजनतक पृथ्वीके भीतर घुसा हुआ है ॥ ११ ॥
ऊर्ध्वमधश्च तिर्यक् च लोकानावृत्य तिष्ठति ।
तस्य पार्श्वेष्वमी द्वीपाश्चत्वारः संस्थिता विभो ॥ १२ ॥
प्रभो! मेरुपर्वत ऊपर- नीचे तथा अगल- बगल सम्पूर्ण लोकोंको आवृत करके खड़ा है ।
उसके पार्श्वभागमें ये चार द्वीप बसे हुए हैं ॥ १२ ॥
भद्राश्वः केतुमालश्च जम्बूद्वीपश्च भारत ।
उत्तराश्चैव कुरवः कृतपुण्यप्रतिश्रयाः ॥ १३ ॥
भारत! उनके नाम ये हैं— भद्राश्व, केतुमाल, जम्बूद्वीप तथा उत्तरकुरु । उत्तरकुरु द्वीपमें पुण्यात्मा पुरुषोंका निवास है ॥ १३ ॥
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विहगः सुमुखो यस्तु सुपर्णस्यात्मजः किल ।
स वै विचिन्तयामास सौवर्णान् वीक्ष्य वायसान् ॥ १४ ॥
मेरुरुत्तममध्यानामधमानां च पक्षिणाम् ।
अविशेषकरो यस्मात् तस्मादेनं त्यजाम्यहम् ॥ १५ ॥
एक समय पक्षिराज गरुड़के पुत्र सुमुखने मेरु पर्वतपर सुनहरे शरीरवाले कौवोंको देखकर सोचा कि यह सुमेरुपर्वत उत्तम, मध्यम तथा अधम पक्षियोंमें कुछ भी अन्तर नहीं रहने देता है। इसलिये मैं इसको त्याग दूँगा । ऐसा विचार करके वे वहाँसे अन्यत्र चले गये ॥ १४-१५ ॥
तमादित्योऽनुपर्येति सततं ज्योतिषां वरः ।
चन्द्रमाश्च सनक्षत्रो वायुश्चैव प्रदक्षिणः ॥ १६ ॥
ज्योतिर्मय ग्रहोंमें सर्वश्रेष्ठ सूर्यदेव, नक्षत्रोंसहित चन्द्रमा तथा वायुदेव भी प्रदक्षिणक्रमसे सदा मेरुगिरिकी परिक्रमा करते रहते हैं ॥ १६ ॥
स पर्वतो महाराज दिव्यपुष्पफलान्वितः ।
भवनैरावृतः सर्वैर्जाम्बूनदपरिष्कृतैः ॥ १७ ॥
महाराज! वह पर्वत दिव्य पुष्पों और फलोंसे सम्पन्न है । वहाँके सभी भवन जाम्बूनद
नामक सुवर्णसे विभूषित हैं । उनसे घिरे हुए उस पर्वतकी बड़ी शोभा होती है ॥ १७ ॥
तत्र देवगणा राजन् गन्धर्वासुरराक्षसाः ।
अप्सरोगणसंयुक्ताः शैले क्रीडन्ति सर्वदा ॥ १८ ॥
राजन्! उस पर्वतपर देवता, गन्धर्व, असुर, राक्षस तथा अप्सराएँ सदा क्रीड़ा करती रहती हैं ॥ १८ ॥
तत्र ब्रह्मा च रुद्रश्च शक्रश्चापि सुरेश्वरः ।
समेत्य विविधैर्यज्ञैर्यजन्तेऽनेकदक्षिणैः ॥ १ ९ ॥
वहाँ ब्रह्मा, रुद्र तथा देवराज इन्द्र एकत्र हो पर्याप्त दक्षिणावाले नाना प्रकारके यज्ञोंका अनुष्ठान करते हैं ॥ १ ९ ॥
तुम्बुरुर्नारदश्चैव विश्वावसुर्हहा हुहूः ।
अभिगम्यामरश्रेष्ठांस्तुष्टुवुर्विविधैः स्तवैः ॥ २० ॥
उस समय तुम्बुरु, नारद, विश्वावसु, हाहा और हुहू नामक गन्धर्व उन देवेश्वरोंके पास जाकर भाँति - भाँतिके स्तोत्रोंद्वारा उनकी स्तुति करते हैं ॥ २० ॥
सप्तर्षयो महात्मानः कश्यपश्च प्रजापतिः ।
तत्र गच्छन्ति भद्रं ते सदा पर्वणि पर्वणि ॥ २१ ॥
राजन्! आपका कल्याण हो । वहाँ महात्मा सप्तर्षिगण तथा प्रजापति कश्यप प्रत्येक पर्वपर सदा पधारते हैं ॥ २१ ॥
तस्यैव मूर्धन्युशनाः काव्यो दैत्यैर्महीपते ।
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इमानि तस्य रत्नानि तस्येमे रत्नपर्वताः ॥ २२ ॥
भूपाल! उस मेरुपर्वतके ही शिखरपर दैत्योंके साथ शुक्राचार्य निवास करते हैं । ये सब रत्न तथा ये रत्नमय पर्वत शुक्राचार्यके ही अधिकारमें हैं ॥ २२ ॥
तस्मात् कुबेरो भगवांश्चतुर्थं भागमश्नुते ।
ततः कलांशं वित्तस्य मनुष्येभ्यः प्रयच्छति ॥ २३ ॥
भगवान् कुबेर उन्हींसे धनका चतुर्थ भाग प्राप्त करके उसका उपभोग करते हैं और उस धनका सोलहवाँ भाग मनुष्योंको देते हैं ॥ २३ ॥
पार्श्वे तस्योत्तरे दिव्यं सर्वर्तुकुसुमैश्चितम् ।
कर्णिकारवनं रम्यं शिलाजालसमुद्गतम् ॥ २४ ॥
सुमेरुपर्वतके उत्तर भागमें समस्त ऋतुओंके फूलोंसे भरा हुआ दिव्य एवं रमणीय कर्णिकार ( कनेर वृक्षोंका ) वन है, जहाँ शिलाओंके समूह संचित हैं ॥ २४ ॥
तत्र साक्षात् पशुपतिर्दिव्यैर्भूतैः समावृतः ।
उमासहायो भगवान् रमते भूतभावनः ॥ २५ ॥
कर्णिकारमयीं मालां बिभ्रत्पादावलम्बिनीम् ।
त्रिभिर्नेत्रैः कृतोद्योतस्त्रिभिः सूर्यैरिवोदितैः ॥ २६ ॥
वहाँ दिव्य भूतोंसे घिरे हुए साक्षात् भूतभावन भगवान् पशुपति पैरोंतक लटकनेवाली कनेरके फूलोंकी दिव्य माला धारण किये भगवती उमाके साथ विहार करते हैं । वे अपने तीनों नेत्रोंद्वारा ऐसा प्रकाश फैलाते हैं, मानो तीन सूर्य उदित हुए हों ॥ २५-२६ ॥
तमुग्रतपसः सिद्धाः सुव्रताः सत्यवादिनः ।
पश्यन्ति न हि दुर्वृत्तैः शक्यो द्रष्टुं महेश्वरः ॥ २७ ॥
उग्र तपस्वी एवं उत्तम व्रतोंका पालन करनेवाले सत्यवादी सिद्ध पुरुष ही वहाँ उनका दर्शन करते हैं । दुराचारी लोगोंको भगवान् महेश्वरका दर्शन नहीं हो सकता ॥ २७ ॥
तस्य शैलस्य शिखरात् क्षीरधारा नरेश्वर ।
विश्वरूपापरिमिता भीमनिर्घातनिः स्वना ॥ २८ ॥
पुण्या पुण्यतमैर्जुष्टा गङ्गा भागीरथी शुभा ।
प्लवन्तीव प्रवेगेन हृदे चन्द्रमसः शुभे ॥ २ ९ ॥
नरेश्वर! उस मेरुपर्वतके शिखरसे दुग्धके समान श्वेतधारवाली, विश्वरूपा, अपरिमित शक्तिशालिनी, भयंकर वज्रपातके समान शब्द करनेवाली, परम पुण्यात्मा पुरुषों -द्वारा सेवित, शुभस्वरूपा पुण्यमयी भागीरथी गंगा बड़े प्रबल वेगसे सुन्दर चन्द्रकुण्डमें गिरती ॥ २८-२९ ॥
तया ह्युत्पादितः पुण्यः स हृदः सागरोपमः ।
तां धारयामास तदा दुर्धरां पर्वतैरपि ॥ ३० ॥
शतं वर्षसहस्राणां शिरसैव पिनाकधृक् ।
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वह पवित्र कुण्ड स्वयं गंगाजीने ही प्रकट किया है, जो अपनी अगाध जलराशिके कारण समुद्रके समान शोभा पाता है । जिन्हें अपने ऊपर धारण करना पर्वतोंके लिये भी कठिन था, उन्हीं गंगाको पिनाकधारी भगवान् शिव एक लाख वर्षोंतक अपने मस्तकपर ही धारण किये रहे ॥ ३० ॥
मेरोस्तु पश्चिमे पार्श्वे केतुमालो महीपते ॥ ३१ ॥
जम्बूखण्डस्तु तत्रैव सुमहान् नन्दनोपमः ।
आयुर्दश सहस्राणि वर्षाणां तत्र भारत ॥ ३२ ॥
राजन्! मेरुके पश्चिम भागमें केतुमाल द्वीप है, वहीं अत्यन्त विशाल जम्बूखण्ड नामक प्रदेश है, जो नन्दन -वनके समान मनोहर जान पड़ता है । भारत! वहाँके निवासियोंकी आयु दस हजार वर्षोंकी होती है ॥ ३१-३२ ॥
सुवर्णवर्णाश्च नराः स्त्रियश्चाप्सरसोपमाः ।
अनामया वीतशोका नित्यं मुदितमानसाः ॥ ३३ ॥
वहाँके पुरुष सुवर्णके समान कान्तिमान् और स्त्रियाँ अप्सराओंके समान सुन्दरी होती
हैं । उन्हें कभी रोग और शोक नहीं होते । उनका चित्त सदा प्रसन्न रहता है ॥ ३३ ॥
जायन्ते मानवास्तत्र निष्टप्तकनकप्रभाः ।
गन्धमादनशृङ्गेषु कुबेरः सह राक्षसैः ॥ ३४ ॥
संवृतोऽप्सरसां सङ्घैर्मोदते गुह्यकाधिपः । वहाँ तपाये हुए सुवर्णके समान गौर कान्तिवाले मनुष्य उत्पन्न होते हैं । गन्धमादन पर्वतके शिखरोंपर गुह्यकोंके स्वामी कुबेर राक्षसोंके साथ रहते और अप्सराओं- के समुदायोंके साथ आमोद- प्रमोद करते हैं ॥ ३४ ॥
गन्धमादनपादेषु परेष्वपरगण्डिकाः ॥ ३५ ॥
एकादश सहस्राणि वर्षाणां परमायुषः । गन्धमादनके अन्यान्य पार्श्वर्ती पर्वतोंपर दूसरी - दूसरी नदियाँ हैं, जहाँ निवास करनेवाले लोगोंकी आयु ग्यारह हजार वर्षोंकी होती है ॥ ३५३ ॥
तत्र हृष्टा नरा राजंस्तेजोयुक्ता महाबलाः ।
स्त्रियश्चोत्पलवर्णाभाः सर्वाः सुप्रियदर्शनाः ॥ ३६ ॥
राजन्! वहाँके पुरुष हृष्ट- पुष्ट, तेजस्वी और महाबली होते हैं तथा सभी स्त्रियाँ कमलके समान कान्तिमती और देखनेमें अत्यन्त मनोरम होती हैं ॥ ३६ ॥
नीलात् परतरं श्वेतं श्वेताद्धैरण्यकं परम् ।
वर्षमैरावतं राजन् नानाजनपदावृतम् ॥ ३७ ॥
नील पर्वतसे उत्तर श्वेतवर्ष और श्वेतवर्षसे उत्तर हिरण्यकवर्ष है । तत्पश्चात् शृंगवान् पर्वतसे आगे ऐरावत नामक वर्ष है। राजन्! वह अनेकानेक जनपदोंसे भरा हुआ है ॥ ३७ ॥
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धनुःसंस्थे महाराज द्वे वर्षे दक्षिणोत्तरे ।
इलावृतं मध्यमं तु पञ्च वर्षाणि चैव हि ॥ ३८ ॥
महाराज! दक्षिण और उत्तरके क्रमशः भारत और ऐरावत नामक दो वर्ष धनुषकी दो कोटियोंके समान स्थित हैं और बीचमें पाँच वर्ष श्वेत(, हिरण्यक, इलावृत, हरिवर्ष तथा हैमवत) हैं । इन सबके बीचमें इलावृतवर्ष है ॥ ३८ ॥
उत्तरोत्तरमेतेभ्यो वर्षमुद्रिच्यते गुणैः ।
आयुः प्रमाणमारोग्यं धर्मतः कामतोऽर्थतः ॥ ३ ९ ॥
भारतसे आरम्भ करके ये सभी वर्ष आयुके प्रमाण, आरोग्य, धर्म, अर्थ और काम— इन सभी दृष्टियोंसे गुणोंमें उत्तरोत्तर बढ़ते गये हैं ॥ ३ ९ ॥
समन्वितानि भूतानि तेषु वर्षेषु भारत ।
एवमेषा महाराज पर्वतैः पृथिवी चिता ॥ ४० ॥
भारत! इन सब वर्षोंमें निवास करनेवाले प्राणी परस्पर मिल- जुलकर रहते हैं ।
महाराज! इस प्रकार यह सारी पृथ्वी पर्वतोंद्वारा स्थिर की गयी है ॥ ४० ॥
हेमकूटस्तु सुमहान् कैलासो नाम पर्वतः ।
यत्र वैश्रवणो राजन् गुह्यकैः सह मोदते ॥ ४१ ॥
राजन्! विशाल पर्वत हेमकूट ही कैलास नामसे प्रसिद्ध है । जहाँ कुबेर गुह्यकोंके साथ सानन्द निवास करते हैं ॥ ४१ ॥
अस्त्युत्तरेण कैलासं मैनाकं पर्वतं प्रति ।
हिरण्यशृङ्गः सुमहान् दिव्यो मणिमयो गिरिः ॥ ४२ ॥
कैलाससे उत्तर मैनाक है और उससे भी उत्तर दिव्य तथा महान् मणिमय पर्वत हिरण्यशृंग है ॥ ४२ ॥
तस्य पार्श्वे महद् दिव्यं शुभ्रं काञ्चनवालुकम् ।
रम्यं बिन्दुसरो नाम यत्र राजा भगीरथः ॥ ४३ ॥
द्रष्टुं भागीरथीं गङ्गामुवास बहुलाः समाः । उसीके पास विशाल, दिव्य, उज्ज्वल तथा कांचनमयी बालुकासे सुशोभित रमणीय बिन्दुसरोवर है, जहाँ राजा भगीरथने भागीरथी गंगाका दर्शन करनेके लिये बहुत वर्षोंतक निवास किया था ॥ ४३ ३ ॥ यूपा मणिमयास्तत्र चैत्याश्चापि हिरण्मयाः ॥ ४४ ॥
तत्रेष्ट्वा तु गतः सिद्धिं सहस्राक्षो महायशाः । वहाँ बहुत - से मणिमय यूप तथा सुवर्णमय चैत्य ( महल) शोभा पाते हैं । वहीं यज्ञ करके महायशस्वी इन्द्रने सिद्धि प्राप्त की थी ॥ ४४ ॥
स्रष्टा भूतपतिर्यत्र सर्वलोकैः सनातनः ॥ ४५ ॥
उपास्यते तिग्मतेजा यत्र भूतैः समन्ततः ।
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नरनारायणौ ब्रह्मा मनुः स्थाणुश्च पञ्चमः ॥ ४६ ॥
उसी स्थानपर सब ओर सम्पूर्ण जगत्के लोग लोकस्रष्टा प्रचण्ड तेजस्वी सनातन भगवान् भूतनाथकी उपासना करते हैं । नर, नारायण, ब्रह्मा, मनु और पाँचवें भगवान् शिव वहाँ सदा स्थित रहते हैं ॥ ४५-४६ ॥
तत्र दिव्या त्रिपथगा प्रथमं तु प्रतिष्ठिता ।
ब्रह्मलोकादपक्रान्ता सप्तधा प्रतिपद्यते ॥ ४७ ॥
ब्रह्मलोकसे उतरकर त्रिपथगामिनी दिव्य नदी गंगा पहले उस बिन्दुसरोवरमें ही प्रतिष्ठित हुई थीं । वहींसे उनकी सात धाराएँ विभक्त हुई हैं ॥ ४७ ॥
वस्वोकसारा नलिनी पावनी च सरस्वती ।
जम्बूनदी च सीता च गङ्गा सिन्धुश्च सप्तमी ॥ ४८ ॥
उन धाराओंके नाम इस प्रकार हैं - वस्वोकसारा, नलिनी, पावनी सरस्वती, जम्बूनदी, सीता, गंगा और सिंधु ॥ ४८ ॥
अचिन्त्या दिव्यसंकाशा प्रभोरेषैव संविधिः ।
उपासते यत्र सत्रं सहस्रयुगपर्यये ॥ ४ ९ ॥
यह ( सात धाराओंका प्रादुर्भाव जगत्के उपकारके लिये ) भगवान्का ही अचिन्त्य एवं दिव्य सुन्दर विधान है । जहाँ लोग कल्पके अन्ततक यज्ञानुष्ठानके द्वारा परमात्माकी उपासना करते हैं ॥ ४ ९ ॥
दृश्यादृश्या च भवति तत्र तत्र सरस्वती ।
एता दिव्याः सप्तगङ्गास्त्रिषु लोकेषु विश्रुताः ॥ ५० ॥
इन सात धाराओंमें जो सरस्वती नामवाली धारा है, वह कहीं प्रत्यक्ष दिखायी देती है और कहीं अदृश्य हो जाती है । ये सात दिव्य गंगाएँ तीनों लोकोंमें विख्यात हैं ॥ ५० ॥
रक्षांसि वै हिमवति हेमकूटे तु गुह्यकाः ।
सर्पा नागाश्च निषधे गोकर्णं च तपोवनम् ॥ ५१ ॥
हिमालयपर राक्षस, हेमकूटपर गुह्यक तथा निषधपर्वतपर सर्प और नाग निवास करते हैं । गोकर्ण तो तपोवन है ॥ ५१ ॥
देवासुराणां सर्वेषां श्वेतपर्वत उच्यते ।
गन्धर्वा निषधे नित्यं नीले ब्रह्मर्षयस्तथा ।
शृङ्गवांस्तु महाराज देवानां प्रतिसंचरः ॥ ५२ ॥
श्वेतपर्वत सम्पूर्ण देवताओं और असुरोंका निवासस्थान बताया जाता है । निषधगिरिपर गन्धर्व तथा नीलगिरिपर ब्रह्मर्षि निवास करते हैं । महाराज! शृंगवान् पर्वत तो केवल देवताओंकी ही विहारस्थली है ॥ ५२ ॥
इत्येतानि महाराज सप्त वर्षाणि भागशः ।
भूतान्युपनिविष्टानि गतिमन्ति ध्रुवाणि च ॥ ५३ ॥
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राजेन्द्र! इस प्रकार स्थावर और जंगम सम्पूर्ण प्राणी इन सात वर्षोंमें विभागपूर्वक स्थित हैं ॥ ५३ ॥
तेषामृद्धिर्बहुविधा दृश्यते दैवमानुषी ।
अशक्या परिसंख्यातुं श्रद्धेया तु बुभूषता ॥ ५४ ॥
उनकी अनेक प्रकारकी दैवी और मानुषी समृद्धि देखी जाती है । उसकी गणना असम्भव है । कल्याणकी इच्छा रखनेवाले मनुष्यको उस समृद्धिपर विश्वास करना चाहिये ॥ ५४ ॥
( स वै सुदर्शनद्वीपो दृश्यते शशवद् द्विधा । ) यां तु पृच्छसि मां राजन् दिव्यामेतां शशाकृतिम् ।
पार्श्वे शशस्य द्वे वर्षे उक्ते ये दक्षिणोत्तरे ।
कर्णौ तु नागद्वीपश्च काश्यपद्वीप एव च ॥ ५५ ॥
इस प्रकार वह सुदर्शनद्वीप बताया गया है, जो दो भागोंमें विभक्त होकर चन्द्रमण्डलमें प्रतिबिम्बित हो खरगोशकी - सी आकृतिमें दृष्टिगोचर होता है । राजन्! आपने जो मुझसे इस शशाकृति ( खरगोशकी - सी आकृति) - के विषयमें प्रश्न किया है उसका वर्णन करता हूँ, सुनिये । पहले जो दक्षिण और उत्तरमें स्थित ( भारत और ऐरावत नामक ) दो द्वीप बताये गये हैं, वे ही दोनों उस शश (खरगोश) के दो पार्श्वभाग हैं । नागद्वीप तथा काश्यपद्वीप उसके दोनों कान हैं ॥ ५५ ॥
ताम्रपर्णः शिरो राजञ्छ्रीमान् मलयपर्वतः ।
एतद् द्वितीयं द्वीपस्य दृश्यते शशसंस्थितम् ॥ ५६ ॥
राजन्! ताम्रवर्णके वृक्षों और पत्रोंसे सुशोभित श्रीमान् मलयपर्वत ही इसका सिर है । इस प्रकार यह सुदर्शनद्वीपका दूसरा भाग खरगोशके आकारमें दृष्टिगोचर होता है ॥ ५६ ॥
इति श्रीमहाभारते भीष्मपर्वणि जम्बूखण्डविनिर्माणपर्वणि भूम्यादिपरिमाणविवरणे षष्ठोऽध्यायः ॥ ६ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत भीष्मपर्वके अन्तर्गत जम्बूखण्डविनिर्माणपर्वमें भूमि आदि परिमाणका विवरणविषयक छठा अध्याय पूरा हुआ ॥ ६ ॥
[ दाक्षिणात्य अधिक पाठका श्लोक मिलाकर कुल ५६३ श्लोक हैं । ] 0
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सप्तमोऽध्यायः उत्तर कुरु, भद्राश्ववर्ष तथा माल्यवान्का वर्णन धृतराष्ट्रउवाच
मेरोरथोत्तरं पार्श्वं पूर्वं चाचक्ष्व संजय ।
निखिलेन महाबुद्धे माल्यवन्तं च पर्वतम् ॥ १ ॥
धृतराष्ट्रने कहा - परमबुद्धिमान् संजय! तुम मेरुके उत्तर तथा पूर्वभागमें जो कुछ है, उसका पूर्ण रूपसे वर्णन करो । साथ ही माल्यवान् पर्वतके विषयमें भी जाननेयोग्य बातें बताओ ॥ १ ॥
संजय उवाच
दक्षिणेन तु नीलस्य मेरोः पार्श्वे तथोत्तरे ।
उत्तराः कुरवो राजन् पुण्याः सिद्धनिषेविताः ॥ २ ॥
संजयने कहा — राजन्! नीलगिरिसे दक्षिण तथा मेरुपर्वतके उत्तरभागमें पवित्र उत्तर कुरुवर्ष है, जहाँ सिद्ध पुरुष निवास करते हैं ॥ २ ॥
तत्र वृक्षा मधुफला नित्यपुष्पफलोपगाः ।
पुष्पाणि च सुगन्धीनि रसवन्ति फलानि च ॥ ३ ॥
वहाँके वृक्ष सदा पुष्प और फलसे सम्पन्न होते हैं और उनके फल बड़े मधुर एवं स्वादिष्ट होते हैं । उस देशके सभी पुष्प सुगन्धित और फल सरस होते हैं ॥ ३ ॥
सर्वकामफलास्तत्र केचिद् वृक्षा जनाधिप ।
अपरे क्षीरिणो नाम वृक्षास्तत्र नराधिप । ४ ॥
ये क्षरन्ति सदा क्षीरं षड्रसं चामृतोपमम् ।
वस्त्राणि च प्रसूयन्ते फलेष्वाभरणानि च ॥ ५ ॥
नरेश्वर! वहाँके कुछ वृक्ष ऐसे होते हैं, जो सम्पूर्ण मनोवांछित फलोंके दाता हैं । राजन्! दूसरे क्षीरी नामवाले वृक्ष हैं, जो सदा षड्विध रसोंसे युक्त एवं अमृतके समान स्वादिष्ट दुग्ध बहाते रहते हैं । उनके फलोंमें इच्छानुसार वस्त्र और आभूषण भी प्रकट होते हैं ॥ ४-५ ॥ सर्वा मणिमयी भूमिः सूक्ष्मकाञ्चनवालुका ।
सर्वर्तुसुखसंस्पर्शा निष्पङ्का च जनाधिप ।
पुष्करिण्यः शुभास्तत्र सुखस्पर्शा मनोरमाः ॥ ६ ॥
जनेश्वर! वहाँकी सारी भूमि मणिमयी है । वहाँ जो सूक्ष्म बालूके कण हैं, वे सब सुवर्णमय हैं । उस भूमिपर कीचड़का कहीं नाम भी नहीं है । उसका स्पर्श सभी ऋतुओंमें
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सुखदायक होता है । वहाँके सुन्दर सरोवर अत्यन्त मनोरम होते हैं । उनका स्पर्श सुखद जान पड़ता है ॥ ६ ॥
देवलोकच्युताः सर्वे जायन्ते तत्र मानवाः ।
शुक्लाभिजनसम्पन्नाः सर्वे सुप्रियदर्शनाः ॥ ७ ॥
वहाँ देवलोकसे भूतलपर आये हुए समस्त पुण्यात्मा मनुष्य ही जन्म ग्रहण करते हैं । ये सभी उत्तम कुलसे सम्पन्न और देखनेमें अत्यन्त प्रिय होते हैं ॥ ७ ॥
मिथुनानि च जायन्ते स्त्रियश्चाप्सरसोपमाः ।
तेषां ते क्षीरिणां क्षीरं पिबन्त्यमृतसंनिभम् ॥ ८ ॥
वहाँ स्त्री - पुरुषोंके जोड़े भी उत्पन्न होते हैं । स्त्रियाँ अप्सराओंके समान सुन्दरी होती हैं । उत्तरकुरुके निवासी क्षीरी वृक्षोंके अमृततुल्य दूध पीते हैं ॥ ८ ॥
मिथुनं जायते काले समं तच्च प्रवर्धते ।
तुल्यरूपगुणोपेतं समवेषं तथैव च ॥ ९ ॥
वहाँ स्त्री - पुरुषोंके जोड़े एक ही साथ उत्पन्न होते और साथ- साथ बढ़ते हैं । उनके रूप, गुण और वेष सब एक - से होते हैं ॥ ९ ॥
एकैकमनुरक्तं च चक्रवाकसमं विभो ।
निरामयाश्च ते लोका नित्यं मुदितमानसाः ॥ १० ॥
प्रभो! वे चकवा- चकवीके समान सदा एक- दूसरेके अनुकूल बने रहते हैं । उत्तरकुरुके लोग सदा नीरोग और प्रसन्नचित्त रहते हैं ॥ १० ॥
दश वर्षसहस्राणि दश वर्षशतानि च ।
जीवन्ति ते महाराज न चान्योन्यं जहत्युत ॥ ११ ॥
महाराज! वे ग्यारह हजार वर्षोंतक जीवित रहते हैं । एक-दूसरेका कभी त्याग नहीं करते ॥ ११ ॥
भारुण्डा नाम शकुनास्तीक्ष्णतुण्डा महाबलाः ।
तान् निर्हरन्तीह मृतान् दरीषु प्रक्षिपन्ति च ॥ १२ ॥
वहाँ भारुण्ड नामके महाबली पक्षी हैं, जिनकी चोंचें बड़ी तीखी होती हैं । वे वहाँके मरे हुए लोगों की लाशें उठाकर ले जाते और कन्दराओंमें फेंक देते हैं ॥ १२ ॥
उत्तराः कुरवो राजन् व्याख्यातास्ते समासतः ।
मेरोः पार्श्वमहं पूर्वं वक्ष्याम्यथ यथातथम् ॥ १३ ॥
राजन्! इस प्रकार मैंने आपसे थोड़ेमें उत्तरकुरु- वर्षका वर्णन किया । अब मैं मेरुके पूर्वभागमें स्थित भद्राश्ववर्षका यथावत् वर्णन करूँगा ॥ १३ ॥
तस्य मूर्धाभिषेकस्तु भद्राश्वस्य विशाम्पते ।
भद्रसालवनं यत्र कालाम्रश्च महाद्रुमः ॥ १४ ॥
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प्रजानाथ! भद्राश्ववर्षके शिखरपर भद्रशाल नामका एक वन है एवं वहाँ कालाम्र नामक महान् वृक्ष भी है ॥ १४ ॥
कालाम्रस्तु महाराज नित्यपुष्पफलः शुभः ।
द्रुमश्च योजनोत्सेधः सिद्धचारणसेवितः ॥ १५ ॥
महाराज! कालाम्रवृक्ष बहुत ही सुन्दर और एक योजन ऊँचा है । उसमें सदा फूल और फल लगे रहते हैं । सिद्ध और चारण पुरुष उसका सदा सेवन करते हैं ॥ १५ ॥
तत्र ते पुरुषाः श्वेतास्तेजोयुक्ता महाबलाः ।
स्त्रियः कुमुदवर्णाश्च सुन्दर्यः प्रियदर्शनाः ॥ १६ ॥
वहाँके पुरुष श्वेतवर्णके होते हैं । वे तेजस्वी और महान् बलवान् हुआ करते हैं । वहाँकी स्त्रियाँ कुमुद- पुष्पके समान गौरवर्णवाली, सुन्दरी तथा देखनेमें प्रिय होती हैं ॥ १६ ॥
चन्द्रप्रभाश्चन्द्रवर्णाः पूर्णचन्द्रनिभाननाः ।
चन्द्रशीतलगात्र्यश्च नृत्यगीतविशारदाः ॥ १७ ॥
उनकी अंगकान्ति एवं वर्ण चन्द्रमाके समान है । उनके मुख पूर्णचन्द्रके समान मनोहर होते हैं । उनका एक- एक अंग चन्द्ररश्मियोंके समान शीतल प्रतीत होता है । वे नृत्य और गीतकी कलामें कुशल होती हैं ॥ १७ ॥
दश वर्षसहस्राणि तत्रायुर्भरतर्षभ ।
कालाम्ररसपीतास्ते नित्यं संस्थितयौवनाः ॥ १८ ॥
भरतश्रेष्ठ! वहाँके लोगोंकी आयु दस हजार वर्षकी होती है । वे कालाम्रवृक्षका रस पीकर सदा जवान बने रहते हैं ॥ १८ ॥
दक्षिणेन तु नीलस्य निषधस्योत्तरेण तु ।
सुदर्शनो नाम महाञ्जम्बूवृक्षः सनातनः ॥ १ ९ ॥
नीलगिरिके दक्षिण और निषधके उत्तर सुदर्शन नामक एक विशाल जामुनका वृक्ष है, जो सदा स्थिर रहनेवाला है ॥ १ ९ ॥
सर्वकामफलः पुण्यः सिद्धचारणसेवितः ।
तस्य नाम्ना समाख्यातो जम्बूद्वीपः सनातनः ॥ २० ॥
वह समस्त मनोवांछित फलोंको देनेवाला, पवित्र तथा सिद्धों और चारणोंका आश्रय है । उसीके नामपर यह सनातन प्रदेश जम्बूद्वीपके नामसे विख्यात है ॥ २० ॥
योजनानां सहस्रं च शतं च भरतर्षभ ।
उत्सेधो वृक्षराजस्य दिवस्पृङ्मनुजेश्वर ॥ २१ ॥
भरतश्रेष्ठ! मनुजेश्वर! उस वृक्षराजकी ऊँचाई ग्यारह सौ योजन है । वह (ऊँचाई) स्वर्गलोकको स्पर्श करती हुई - सी प्रतीत होती है ॥ २१ ॥
अरत्नीनां सहस्रं च शतानि दश पञ्च च ।
परिणाहस्तु वृक्षस्य फलानां रसभेदिनाम् ॥ २२ ॥