श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड ३ — पृष्ठ 1251–1260
महाभारत — खण्ड ३ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1251–1260
पृष्ठ 1251
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
ही निश्चित कर लेते हैं । इसके विपरीत जिन्हें शत्रुसेनामें प्रवेश करते समय सामनेसे निषेधसूचक वचन सुननेको मिलते हैं, उनकी पराजय होती है ॥ ७१ ॥
शब्दरूपरसस्पर्शगन्धाश्चाविकृताः शुभाः ।
सदा हर्षश्च योधानां जयतामिह लक्षणम् ॥ ७२ ॥
जिनके शब्द, रूप, रस, गन्ध और स्पर्श आदि निर्विकार एवं शुभ होते हैं तथा जिन योद्धाओंके हृदयमें सदा हर्ष और उत्साह बना रहता है, उनके विजयी होनेका यही शुभ लक्षण है ॥ ७२ ॥
अनुगा वायवो वान्ति तथाभ्राणि वयांसि च ।
अनुप्लवन्ति मेघाश्च तथैवेन्द्रधनूंषि च ॥ ७३ ॥
एतानि जयमानानां लक्षणानि विशाम्पते ।
भवन्ति विपरीतानि मुमूर्षूणां जनाधिप ॥ ७४ ॥
राजन्! हवा जिनके अनुकूल बहती है, बादल और पक्षी भी जिनके अनुकूल होते हैं, मेघ जिनके पीछे - पीछे छत्रछाया किये चलते हैं तथा इन्द्रधनुष भी जिन्हें अनुकूल दिशामें ही दृष्टिगोचर होते हैं, उन विजयी वीरोंके लिये ये विजयके शुभ लक्षण हैं। जनेश्वर! मरणासन्न मनुष्योंको इसके विपरीत अशुभ लक्षण दिखायी देते हैं ॥ ७३-७४ ॥
अल्पायां वा महत्यां वा सेनायामिति निश्चयः ।
हर्षो योधगणस्यैको जयलक्षणमुच्यते ॥ ७५ ॥
सेना छोटी हो या बड़ी, उसमें सम्मिलित होनेवाले सैनिकोंका एकमात्र हर्ष ही निश्चितरूपसे विजयका लक्षण बताया जाता है ॥ ७५ ॥
एको दीर्णो दारयति सेनां सुमहतीमपि ।
तां दीर्णामनुदीर्यन्ते योधाः शूरतरा अपि ॥ ७६ ॥
यदि सेनाका एक सैनिक भी उत्साहहीन होकर पीछे हटे तो वह अपनी ही देखा -देखी अत्यन्त विशाल सेनाको भी भगा देता है ( उसके भागनेमें कारण बन जाता है ) । उस सेनाके पलायन करनेपर बड़े - बड़े शूरवीर सैनिक भी भागनेको विवश होते हैं ॥ ७६ ॥
दुर्निवर्त्या तदा चैव प्रभग्ना महती चमूः ।
अपामिव महावेगास्त्रस्ता मृगगणा इव ॥ ७७ ॥
जब बड़ी भारी सेना भागने लगती है, तब डरकर भागे हुए मृगोंके झुंड तथा नीची भूमिकी ओर बहनेवाले जलके महान् वेगकी भाँति उसे पीछे लौटाना बहुत कठिन है ॥ ७७ ॥
नैव शक्या समाधातुं संनिपाते महाचमूः ।
दीर्णामित्येव दीर्यन्ते सुविद्वांसोऽपि भारत ॥ ७८ ॥
भरतनन्दन! विशाल सेनामें जब भगदड़ मच जाती है, तब उसे समझा- बुझाकर रोकना कठिन हो जाता है । सेना भाग रही है, इतना सुनकर ही बड़े - बड़े युद्धविद्याके विद्वान् भी
पृष्ठ 1252
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
भागने लगते हैं ॥ ७८ ॥
भीतान् भग्नांश्च सम्प्रेक्ष्य भयं भूयोऽभिवर्धते ।
प्रभग्ना सहसा राजन् दिशो विद्रवते चमूः ॥ ७९ ॥
राजन्! भयभीत होकर भागते हुए सैनिकोंको देखकर अन्य योद्धाओंका भय, बहुत अधिक बढ़ जाता है; फिर तो सहसा सारी सेना हतोत्साह होकर सम्पूर्ण दिशाओंमें भागने लगती है ॥ ७ ९ ॥ नैव स्थापयितुं शक्या शूरैरपि महाचमूः ।
सत्कृत्य महतीं सेनां चतुरङ्गां महीपतिः ।
उपायपूर्वं मेधावी यतेत सततोत्थितः ॥ ८० ॥
उस समय बहुत - से शूरवीर भी उस विशाल वाहिनीको रोककर खड़ी नहीं रख सकते । इसलिये बुद्धिमान् राजाको चाहिये कि वह सतत सावधान रहकर कोई-न- कोई उपाय करके अपनी विशाल चतुरंगिणी सेनाको विशेष सत्कारपूर्वक स्थिर रखनेका यत्न करे ॥ ८० ॥
उपायविजयं श्रेष्ठमाहुर्भेदेन मध्यमम् ।
जघन्य एष विजयो यो युद्धेन विशाम्पते ॥ ८१ ॥
राजन्! साम - दानरूप उपायसे जो विजय प्राप्त होती है, उसे श्रेष्ठ बताया गया है । भेदनीतिके द्वारा शत्रुसेनामें फूट डालकर जो विजय प्राप्त की जाती है, वह मध्यम है तथा युद्धके द्वारा मार- काट मचाकर जो शत्रुको पराजित किया जाता है, वह सबसे निम्नश्रेणीकी विजय है ॥ ८१ ॥
महादोषः संनिपातस्तस्याद्यः क्षय उच्यते ।
परस्परज्ञाः संहृष्टा व्यवधूताः सुनिश्चिताः ॥ ८२ ॥
पञ्चाशदपि ये शूरा मृद्गन्ति महतीं चमूम् ।
अपि वा पञ्च षट् सप्त विजयन्त्यनिवर्तिनः ॥ ८३ ॥
युद्ध महान् दोषका भण्डार है। उन दोषोंमें सबसे प्रधान है जनसंहार । यदि एक दूसरेको जाननेवाले, हर्ष और उत्साहमें भरे रहनेवाले, कहीं भी आसक्त न होकर विजय-प्राप्तिका दृढ़ निश्चय रखनेवाले तथा शौर्यसम्पन्न पचास सैनिक भी हों तो वे बड़ी भारी सेनाको धूलमें मिला देते हैं । यदि पीछे पैर न हटानेवाले पाँच, छः और सात ही योद्धा हों तो वे भी निश्चितरूपसे विजयी होते हैं ॥ ८२-८३ ॥
न वैनतेयो गरुडः प्रशंसति महाजनम् ।
दृष्ट्वा सुपर्णोऽपचितिं महत्या अपि भारत ॥ ८४ ॥
भारत! सुन्दर पंखोंवाले विनतानन्दन गरुड़ विशाल सेनाका भी विनाश होता देखकर अधिक जनसमूहकी प्रशंसा नहीं करते हैं ॥ ८४ ॥
न बाहुल्येन सेनाया जयो भवति नित्यशः ।
पृष्ठ 1253
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अध्रुवो हि जयो नाम दैवं चात्र परायणम् ।
जयवन्तो हि संग्रामे कृतकृत्या भवन्ति हि ॥ ८५ ॥
सदा अधिक सेना होनेसे ही विजय नहीं होती है । युद्धमें जीत प्रायः अनिश्चित होती है । उसमें दैव ही सबसे बड़ा सहारा है । जो संग्राममें विजयी होते हैं, वे ही कृतकार्य होते हैं ॥ ८५ ॥
इति श्रीमहाभारते भीष्मपर्वणि जम्बूखण्डविनिर्माणपर्वणि निमित्ताख्याने तृतीयोऽध्यायः ॥ ३ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत भीष्मपर्वके अन्तर्गत जम्बूखण्डविनिर्माणपर्वमें अमंगलसूचक उत्पातों तथा विजयसूचक लक्षणोंका वर्णनविषयक तीसरा अध्याय पूराहुआ ॥ ३ ॥
* राहु और केतु सदा एक-दूसरेसे सातवीं राशिपर स्थित होते हैं, किंतु उस समय दोनों एक राशिपर आ गये थे; अतः महान् अनिष्टके सूचक थे । सूर्य तुलापर थे, उनके निकट राहुके आनेका वर्णन पहले आ चुका है; फिर केतुके वहाँ पहुँचनेसे महान् दुर्योग बन गया है ।
पृष्ठ 1254
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
चतुर्थोऽध्यायः धृतराष्ट्रके पूछनेपर संजयके द्वारा भूमिके महत्त्वका वर्णन वैशम्पायन उवाच
एवमुक्त्वा ययौ व्यासो 'धृतराष्ट्राय धीमते ।
धृतराष्ट्रोऽपि तच्छ्रुत्वा ध्यानमेवान्वपद्यत ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! बुद्धिमान् राजा धृतराष्ट्रसे ऐसा कहकर महर्षि व्यासजी चले गये । धृतराष्ट्र भी उनके पूर्वोक्त वचन सुनकर कुछ कालतक उनपर सोच-विचार करते रहे ॥ १ ॥
स मुहूर्तमिव ध्यात्वा विनिःश्वस्य मुहुर्मुहुः ।
संजयं संशितात्मानमपृच्छद् भरतर्षभ ॥ २ ॥
भरतश्रेष्ठ! दो घड़ीतक सोचने - विचारनेके पश्चात् बारंबार लंबी साँस खींचते हुए उन्होंने विशुद्ध हृदयवाले संजयसे पूछा— ॥ २ ॥
संजये महीपालाः शूरा युद्धाभिनन्दिनः ।
अन्योन्यमभिनिघ्नन्ति शस्त्रैरुच्चावचैरिह ॥ ३ ॥
पार्थिवाः पृथिवीहेतोः समभित्यज्य जीवितम् ।
न वा शाम्यन्ति निघ्नन्तो वर्धयन्ति यमक्षयम् ॥ ४ ॥
भौममैश्वर्यमिच्छन्तो न मृष्यन्ते परस्परम् ।
मन्ये'बहुगुणा भूमिस्तन्ममाचक्ष्व संजय ॥ ५ ॥
‘ संजय! पृथ्वीका पालन करनेवाले ये शूरवीर नरेश इस भूमिके लिये ही अपना जीवन निछावर करके युद्धका अभिनन्दन करते और छोटे- बड़े अस्त्र- शस्त्रोंद्वारा एक- दूसरेपर घातक प्रहार करते हैं । इस भूतलके ऐश्वर्यको स्वयं ही चाहते हुए वे एक- दूसरेको सहन नहीं कर पाते हैं । परस्पर प्रहार करते हुए यमलोककी जनसंख्या बढ़ाते हैं, परंतु शान्त नहीं होते हैं । अतः मैं ऐसा मानता हूँ कि यह भूमि बहुसंख्यक गुणोंसे विभूषित है । इसलिये संजय! तुम मुझसे इस भूमिके गुणोंका ही वर्णन करो ॥ ३–५ ॥
बहूनि च सहस्राणि प्रयुतान्यर्बुदानि च ।
कोट्यश्च लोकवीराणां समेताः कुरुजाङ्गले ॥ ६ ॥
' कुरुक्षेत्रमें इस जगत्के कई हजार, लाख, करोड़ और अरबों वीर एकत्र हुए हैं ॥ ६ ॥
देशानां च परीमाणं नगराणां च संजय ।
श्रोतुमिच्छामि तत्त्वेन यत एते समागताः ॥ ७ ॥
‘ संजय! ये लोग जहाँ - जहाँसे आये हैं, उन देशों और नगरोंका यथार्थ परिमाण मैं तुमसे सुनना चाहता हूँ ॥ ७ ॥
पृष्ठ 1255
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
दिव्यबुद्धिप्रदीपेन युक्तस्त्वं ज्ञानचक्षुषा ।
प्रभावात् तस्य विप्रर्षेर्व्यासस्यामिततेजसः ॥ ८ ॥
‘ क्योंकि तुम अमित तेजस्वी ब्रह्मर्षि व्यासजीके प्रभावसे दिव्य बुद्धिरूपी प्रदीपसे प्रकाशित ज्ञानदृष्टिसे सम्पन्न हो गये हो ' ॥ ८ ॥
संजय उवाच
यथाप्रज्ञं महाप्राज्ञ भौमान् वक्ष्यामि ते गुणान् ।
शास्त्रचक्षुरवेक्षस्व नमस्ते भरतर्षभ ॥ ९ ॥
संजयने कहा – महाप्राज्ञ! मैं अपनी बुद्धिके अनुसार आपसे इस भूमिके गुणोंका वर्णन करूँगा । भरतश्रेष्ठ! आपको नमस्कार है; आप शास्त्रदृष्टिसे इस विषयको देखिये और समझिये ॥ ९ ॥
द्विविधानीह भूतानि चराणि स्थावराणि च ।
त्रसानां त्रिविधा योनिरण्डस्वेदजरायुजाः ॥ १० ॥
राजन्! इस पृथ्वीपर दो तरहके प्राणी उपलब्ध हैं- स्थावर और जंगम । जंगम प्राणियोंकी उत्पत्तिके तीन स्थान हैं - अण्डज, स्वेदज और जरायुज ॥ १० ॥
त्रसानां खलु सर्वेषां श्रेष्ठा राजन् जरायुजाः ।
जरायुजानां प्रवरा मानवाः पशवश्च ये ॥ ११ ॥
राजन्! सम्पूर्ण जंगम जीवोंमें जरायुज श्रेष्ठ माने गये हैं, जरायुजोंमें भी मनुष्य और पशु उत्तम हैं ॥ ११ ॥
नानारूपधरा राजंस्तेषां भेदाश्चतुर्दश ।
वेदोक्ताः पृथिवीपाल येषु यज्ञाः प्रतिष्ठिताः ॥ १२ ॥
वे नाना प्रकारकी आकृतिवाले होते हैं। राजन्! उनके चौदह भेद हैं, जो वेदोंमें बताये गये हैं । भूपाल! उन्हींमें यज्ञोंकी प्रतिष्ठा है ॥ १२ ॥
ग्राम्याणां पुरुषाः श्रेष्ठाः सिंहाश्चारण्यवासिनाम् ।
सर्वेषामेव भूतानामन्योन्येनोपजीवनम् ॥ १३ ॥
ग्रामवासी पशु और मनुष्योंमें मनुष्य श्रेष्ठ हैं और वनवासी पशुओंमें सिंह श्रेष्ठ हैं । समस्त प्राणियोंका जीवन- निर्वाह एक- दूसरेके सहयोगसे होता है ॥ १३ ॥
उद्भिज्जाः स्थावराः प्रोक्तास्तेषां पञ्चैव जातयः ।
वृक्षगुल्मलतावल्ल्यस्त्वक्सारास्तृणजातयः ॥ १४ ॥
स्थावरोंको उद्भिज्ज कहते हैं । उनकी पाँच ही जातियाँ हैं - वृक्ष, गुल्म, लता, वल्ली
और त्वक्सार ( बाँस आदि) । ये सब तृणवर्गकी जातियाँ हैं ॥ १४ ॥
तेषां विंशतिरेकोना महाभूतेषु पञ्चसु ।
चतुर्विंशतिरुद्दिष्टा गायत्री लोकसम्मता ॥ १५ ॥
पृष्ठ 1256
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
ये स्थावर- जंगमरूप उन्नीस प्राणी हैं । इनके साथ पाँच महाभूतोंको गिन लेनेपर इनकी संख्या चौबीस हो जाती है । गायत्रीके भी चौबीस ही अक्षर होते हैं । इसलिये इन चौबीस भूतोंको भी लोकसम्मत गायत्री कहा गया है ॥ १५ ॥
य एतां वेद गायत्रीं पुण्यां सर्वगुणान्विताम् ।
तत्त्वेन भरतश्रेष्ठ स लोके न प्रणश्यति ॥ १६ ॥
भरतश्रेष्ठ! जो लोकमें स्थित इस सर्वगुणसम्पन्न पुण्यमयी गायत्रीको यथार्थरूपसे जानता है, वह कभी नष्ट नहीं होता ॥ १६ ॥
अरण्यवासिनः सप्त सप्तैषां ग्रामवासिनः ।
सिंहा व्याघ्रा वराहाश्च महिषा वारणास्तथा ॥ १७ ॥
ऋक्षाश्च वानराश्चैव सप्तारण्याः स्मृता नृप । नरेश्वर! उपर्युक्त चौदह प्रकारके जरायुज प्राणियोंमें वनवासी पशु सात हैं और ग्रामवासी भी सात ही हैं । सिंह, व्याघ्र, वराह, महिष, गज, रीछ और वानर - ये सात वनवासी पशु माने गये हैं ॥ १७३ ॥
गौरजाविमनुष्याश्च अश्वाश्वतरगर्दभाः ॥ १८ ॥
एते ग्राम्याः समाख्याताः पशवः सप्त साधुभिः ।
एते वै पशवो राजन् ग्राम्यारण्याश्चतुर्दश ॥ १ ९ ॥
गाय, बकरी, भेड़, मनुष्य, घोड़े, खच्चर और गदहे – इन सात पशुओंको साधु पुरुषोंने ग्रामवासी बताया है । राजन्! इस प्रकार ये ग्रामवासी और वनवासी मिलकर कुल चौदह पशु कहे गये हैं ॥ १८-१९ ॥
भूमौ च जायते सर्वं भूमौ सर्वं विनश्यति ।
भूमिः प्रतिष्ठा भूतानां भूमिरेव परायणम् ॥ २० ॥
सब कुछ इस भूमिपर ही उत्पन्न होता है और भूमिमें ही विलीन होता है । भूमि ही सब प्राणियोंकी प्रतिष्ठा और भूमि ही सबका परम आश्रय है ॥ २० ॥
यस्य भूमिस्तस्य सर्वं जगत् स्थावरजङ्गमम् ।
तत्रातिगृद्धा राजानो विनिघ्नन्तीतरेतरम् ॥ २१ ॥
जिसके अधिकारमें भूमि है, उसीके अधिकारमें सम्पूर्ण चराचर जगत् है, इसीलिये भूमिके प्रति आसक्ति रखनेवाले राजालोग एक- दूसरेको मारते हैं ॥ २१ ॥
इति श्रीमहाभारते भीष्मपर्वणि जम्बूखण्डविनिर्माणपर्वणि भौमगुणकथने चतुर्थोऽध्यायः ॥ ४ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत भीष्मपर्वके अन्तर्गत जम्बूखण्डविनिर्माणपर्वमें भूमिगुणवर्णनविषयक चौथा अध्याय पूरा हुआ ॥ ४ ॥
पृष्ठ 1257
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
पञ्चमोऽध्यायः पंचमहाभूतों तथा सुदर्शनद्वीपका संक्षिप्त वर्णन धृतराष्ट्रउवाच
नदीनां पर्वतानां च नामधेयानि संजय ।
तथा जनपदानां च ये चान्ये भूमिमाश्रिताः ॥ १ ॥
धृतराष्ट्र बोले- संजय! नदियों, पर्वतों तथा जनपदोंके और दूसरे भी जो पदार्थ इस भूतलपर आश्रित हैं, उन सबके नाम बताओ ॥ १ ॥
प्रमाणं च प्रमाणज्ञ पृथिव्या मम सर्वतः ।
निखिलेन समाचक्ष्व काननानि च संजय ॥ २ ॥
प्रमाणवेत्ता संजय! तुम सारी पृथ्वीका पूरा प्रमाण ( लम्बाई-चौड़ाईका माप ) मुझे बताओ । साथ ही यहाँके वनोंका भी वर्णन करो ॥ २ ॥
संजय उवाच
पञ्चेमानि महाराज महाभूतानि संग्रहात् ।
जगतीस्थानि सर्वाणि समान्याहुर्मनीषिणः ॥ ३ ॥
संजय बोले — महाराज! इस पृथ्वीपर रहनेवाली जितनी भी वस्तुएँ हैं, वे सब- की--सब संक्षेपसे पंचमहाभूतस्वरूप हैं । इसीलिये मनीषी पुरुष उन सबको ' सम्*' कहते हैं ॥ ३ ॥
भूमिरापस्तथा वायुरग्निराकाशमेव च ।
गुणोत्तराणि सर्वाणि तेषां भूमिः प्रधानतः ॥ ४ ॥
आकाश, वायु, अग्नि, जल और भूमि— ये पंच महाभूत हैं । आकाशसे लेकर भूमितक जो पंचमहाभूतोंका कम है, उसमें पूर्वकी अपेक्षा उत्तरोत्तर सब भूतोंमें एक- एक गुण अधिक होते हैं । इन सब भूतोंमें भूमिकी प्रधानता है ॥ ४ ॥
शब्दः स्पर्शश्च रूपं च रसो गन्धश्च पञ्चमः ।
भूमेरेते गुणाः प्रोक्ता ऋषिभिस्तत्त्ववेदिभिः ॥ ५ ॥
शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध-इन पांचोंको तत्त्ववेत्ता महर्षियोंने पृथ्वीका गुण बताया है ॥ ५ ॥
चत्वारोऽप्सु गुणा राजन् गन्धस्तत्र न विद्यते ।
शब्दः स्पर्शश्च रूपं च तेजसोऽथ गुणास्त्रयः ।
शब्दः स्पर्शश्च वायोस्तु आकाशे शब्द एव तु ॥ ६ ॥
राजन्! जलमें चार ही गुण हैं । उसमें गन्धका अभाव है । तेजके शब्द, स्पर्श तथा रूप - ये तीन गुण हैं । वायुके शब्द और स्पर्श दो ही गुण हैं और आकाशका एकमात्र शब्द ही
पृष्ठ 1258
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
गुण है || ६ ||
एते पञ्च गुणा राजन् महाभूतेषु पञ्चसु ।
वर्तन्ते सर्वलोकेषु येषु भूताः प्रतिष्ठिताः ॥ ७ ॥
राजन्! ये पाँच गुण सम्पूर्ण लोकोंके आश्रय- भूत पंचमहाभूतोंमें रहते हैं । जिनमें समस्त प्राणी प्रतिष्ठित हैं ॥ ७ ॥
अन्योन्यं नाभिवर्तन्ते साम्यं भवति वै यदा ॥ ८ ॥
ये पाँचों गुण जब साम्यावस्थामें रहते हैं, तब एक- दूसरेसे संयुक्त नहीं होते हैं ॥ ८ ॥
यदा तु विषमीभावमाविशन्ति परस्परम् ।
तदा देहैर्देहवन्तो व्यतिरोहन्ति नान्यथा ॥ ९ ॥
जब ये विषमभावको प्राप्त होते हैं, तब एक- दूसरेसे मिल जाते हैं। उस समय ही देहधारी प्राणी अपने शरीरोंसे संयुक्त होते हैं, अन्यथा नहीं ॥ ९ ॥
आनुपूर्व्या विनश्यन्ति जायन्ते चानुपूर्वशः ।
सर्वाण्यपरिमेयाणि तदेषां रूपमैश्वरम् ॥ १० ॥
ये सब भूत क्रमसे नष्ट होते और क्रमसे ही उत्पन्न होते हैं ( पृथ्वी आदिके क्रमसे इनका लय होता है और आकाश आदिके क्रमसे इनका प्रादुर्भाव) । ये सब अपरिमेय हैं । इनका रूप ईश्वरकृत है ॥ १० ॥
तत्र तत्र हि दृश्यन्ते धातवः पाञ्चभौतिकाः ।
तेषां मनुष्यास्तर्केण प्रमाणानि प्रचक्षते ॥ ११ ॥
भिन्न - भिन्न लोकोंमें पांचभौतिक धातु दृष्टिगोचर होते हैं । मनुष्य तर्कके द्वारा उनके प्रमाणोंका प्रतिपादन करते हैं ॥ ११ ॥
अचिन्त्याः खलु ये भावा न तांस्तर्केण साधयेत् ।
प्रकृतिभ्यः परं यत् तु तदचिन्त्यस्य लक्षणम् ॥ १२ ॥
परंतु जो अचिन्त्य भाव हैं, उन्हें तर्कसे सिद्ध करनेकी चेष्टा नहीं करनी चाहिये । जो प्रकृतिसे परे है, वही अचिन्त्यस्वरूप है ॥ १२ ॥
सुदर्शनं प्रवक्ष्यामि द्वीपं तु कुरुनन्दन ।
परिमण्डलो महाराज द्वीपोऽसौ चक्रसंस्थितः ॥ १३ ॥
कुरुनन्दन! अब मैं सुदर्शन नामक द्वीपका वर्णन करूँगा । महाराज! वह द्वीप चक्रकी भाँति गोलाकार स्थित है ॥ १३ ॥
नदीजलप्रतिच्छन्नः पर्वतैश्चाभ्रसंनिभैः ।
पुरैश्च विविधाकारै रम्यैर्जनपदैस्तथा ॥ १४ ॥
वृक्षैः पुष्पफलोपेतैः सम्पन्नधनधान्यवान् ।
लवणेन समुद्रेण समन्तात् परिवारितः ॥ १५ ॥
पृष्ठ 1259
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
वह नाना प्रकारकी नदियोंके जलसे आच्छादित, मेघके समान उच्चतम पर्वतोंसे सुशोभित, भाँति- भाँतिके नगरों, रमणीय जनपदों तथा फल-फूलसे भरे हुए वृक्षोंसे विभूषित है । यह द्वीप भाँति- भाँतिकी सम्पदाओं तथा धन- धान्यसे सम्पन्न है । उसे सब ओरसे लवणसमुद्रने घेर रखा है ॥ १४-१५ ॥
यथा हि पुरुषः पश्येदादर्शे मुखमात्मनः ।
एवं सुदर्शनद्वीपो दृश्यते चन्द्रमण्डले ॥ १६ ॥
जैसे पुरुष दर्पणमें अपना मुँह देखता है, उसी प्रकार सुदर्शनद्वीप चन्द्रमण्डलमें दिखायी देता है ॥ १६ ॥
द्विरंशे पिप्पलस्तत्र द्विरंशे च शशो महान् ।
सर्वौषधिसमावायः सर्वतः परिवारितः ॥ १७ ॥
इसके दो अंशमें पिप्पल और दो अंशमें महान् शश दृष्टिगोचर होता है । इनके सब ओर सम्पूर्ण ओषधियोंका समुदाय फैला हुआ है ॥ १७ ॥
आपस्ततोऽन्या विज्ञेयाः शेषः संक्षेप उच्यते ।
ततोऽन्य उच्यते चायमेनं संक्षेपतः शृणु ॥ १८ ॥
इन सबको छोड़कर शेष स्थान जलमय समझना चाहिये । इससे भिन्न संक्षिप्त भूमिखण्ड बताया जाता है । उस खण्डका मैं संक्षेपसे वर्णन करता हूँ, उसे सुनिये ॥ १८ ॥
इति श्रीमहाभारते भीष्मपर्वणि जम्बूखण्डविनिर्माणपर्वणि सुदर्शनद्वीपवर्णने पञ्चमोऽध्यायः ॥ ५ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत भीष्मपर्वके अन्तर्गत जम्बूखण्डविनिर्माणपर्वमें सुदर्शनद्वीपवर्णनविषयक पाँचवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ५ ॥
Fard एक समान ।
पृष्ठ 1260
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
षष्ठोऽध्यायः सुदर्शनके वर्ष, पर्वत, मेरुगिरि, गंगानदी तथा शशाकृतिका वर्णन धृतराष्ट्रउवाच
उक्तो द्वीपस्य संक्षेपो विधिवद् बुद्धिमंस्त्वया ।
तत्त्वज्ञश्चासि सर्वस्य विस्तरं ब्रूहि संजय ॥ १ ॥
धृतराष्ट्र बोले- बुद्धिमान् संजय! तुमने सुदर्शन- द्वीपका विधिपूर्वक थोड़ेमें ही वर्णन कर दिया, परंतु तुम तो तत्त्वोंके ज्ञाता हो; अतः इस सम्पूर्ण द्वीपका विस्तारके साथ वर्णन करो ॥ १ ॥
यावान् भूम्यवकाशोऽयं दृश्यते शशलक्षणे ।
तस्य प्रमाणं प्रब्रूहि ततो वक्ष्यसि पिप्पलम् ॥२ ॥
चन्द्रमाके शश- चिह्नमें भूमिका जितना अवकाश दृष्टिगोचर होता है, उसका प्रमाण बताओ । तत्पश्चात् पिप्पलस्थानका वर्णन करना ॥ २ ॥
वैशम्पायन उवाच एवं राज्ञा स पृष्टस्तु संजयो वाक्यमब्रवीत् । वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! राजा धृतराष्ट्रके इस प्रकार पूछनेपर संजयने कहना आरम्भ किया ॥ २३ ॥
संजय उवाच
प्रागायता महाराज षडेते वर्षपर्वताः ।
अवगाढा ह्युभयतः समुद्रौ पूर्वपश्चिमौ ॥ ३ ॥
संजय बोले — महाराज! पूर्वदिशासे पश्चिम दिशाकी ओर फैले हुए ये छ: वर्ष पर्वत हैं, जो दोनों ओर पूर्व तथा पश्चिम समुद्रमें घुसे हुए हैं ॥ ३ ॥
हिमवान् हेमकूटश्च निषधश्च नगोत्तमः ।
नीलश्च वैदूर्यमयः श्वेतश्च शशिसंनिभः ॥ ४ ॥
सर्वधातुविचित्रश्च शृङ्गवान् नाम पर्वतः ।
एते वै पर्वता राजन् सिद्धचारणसेविताः ॥ ५ ॥
उनके नाम इस प्रकार हैं - हिमवान्, हेमकूट, पर्वतश्रेष्ठ निषध, वैदूर्यमणिमय नीलगिरि, चन्द्रमाके समान उज्ज्वल श्वेतगिरि तथा सब धातुओंसे सम्पन्न होकर विचित्र शोभा धारण