03.Mahabharata Volume 3 — पृष्ठ 1731–1740

महाभारत — खण्ड ३ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1731–1740

पृष्ठ 1731

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भारत! तब सेनापति श्वेतको शीघ्रतापूर्वक शल्यके रथकी ओर जाते देख आपकी सेनाओंमें हाहाकार मच गया ६३ ॥

ततो भीष्मं पुरस्कृत्य तव पुत्रो महाबलः ।

वृतस्तु सर्वसैन्येन प्रायाच्छ्वेतरथं प्रति ॥ ६४ ॥

मृत्योरास्यमनुप्राप्तं मद्रराजममोचयत् । तब आपके महाबली पुत्र दुर्योधनने भीष्मजीको आगे करके सम्पूर्ण सेनाके साथ श्वेतके रथपर चढ़ाई की और मृत्युके मुखमें पहुँचे हुए मद्रराज शल्यको छुड़ा लिया ॥ ६४३ || ततो युद्धं समभवत् तुमुलं लोमहर्षणम् ॥ ६५ ॥

तावकानां परेषां च व्यतिषक्तरथद्विपम् । तदनन्तर आपके और पाण्डवोंके सैनिकोंमें अत्यन्त भयंकर रोमांचकारी युद्ध होने लगा । रथसे रथ और हाथीसे हाथी गुँथ गये ॥ ६५३ ॥

सौभद्रे भीमसेने च सात्यकौ च महारथे ॥ ६६ ॥

कैकेये च विराटे च धृष्टद्युम्ने च पार्षते ।

एतेषु नरसिंहेषु चेदिमत्स्येषु चैव ह ।

ववर्ष शरवर्षाणि कुरुवृद्धः पितामहः ॥ ६७ ॥

पाण्डवपक्षकी ओरसे सुभद्राकुमार अभिमन्यु, भीमसेन, महारथी सात्यकि, केकयराजकुमार, राजा विराट तथा द्रुपदपुत्र धृष्टद्युम्न -ये पुरुषसिंह और चेदि एवं मत्स्यदेशके क्षत्रिय युद्ध कर रहे थे । कुरुकुलके वृद्ध पुरुष पितामह भीष्मने इन सबपर बाणोंकी वर्षा प्रारम्भ कर दी ॥ ६६-६७ ॥ इति श्रीमहाभारते भीष्मपर्वणि भीष्मवधपर्वणि श्वेतयुद्धे सप्तचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४७ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत भीष्मपर्वके अन्तर्गत भीष्मवधपर्वमें श्वेतयुद्धविषयक सैंतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ४७ ॥

पृष्ठ 1732

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अष्टचत्वारिंशोऽध्यायः श्वेतका महाभयंकर पराक्रम और भीष्मके द्वारा उसका वध धृतराष्ट्रउवाच

एवं श्वेते महेष्वासे प्राप्ते शल्यरथं प्रति ।

कुरवः पाण्डवेयाश्च किमकुर्वत संजय ॥ १ ॥

भीष्मः शान्तनवः किं वा तन्ममाचक्ष्व पृच्छतः । धृतराष्ट्रने पूछा – संजय! इस प्रकार महान् धनुर्धर श्वेतके शल्यके रथके समीप पहुँचनेपर कौरवों तथा पाण्डवोंने क्या किया? अथवा शान्तनुनन्दन भीष्मने कौन - सा पुरुषार्थ किया? मेरे पूछनेके अनुसार ये सब बातें मुझसे कहो ॥ १३ ॥

संजय उवाच राजन् शतसहस्राणि ततः क्षत्रियपुङ्गवाः ॥ २ ॥

श्वेतं सेनापतिं शूरं पुरस्कृत्य महारथाः ।

राज्ञो बलं दर्शयन्तस्तव पुत्रस्य भारत ॥ ३ ॥

शिखण्डिनं पुरस्कृत्य त्रातुमैच्छन्महारथाः ।

अभ्यवर्तन्त भीष्मस्य रथं हेमपरिष्कृतम् ॥ ४ ॥

जिघांसन्तं युधां श्रेष्ठं तदाऽऽसीत् तुमुलं महत् । संजय कहते हैं - राजन्! पाण्डवपक्षके लाखों क्षत्रियशिरोमणि महारथी विराट सेनापति शूरवीर श्वेतको आगे करके आपके पुत्र दुर्योधनको अपना बल दिखाते हुए शिखण्डीको सामने रखकर भीष्मके सुवर्णभूषित रथपर चढ़ आये । भारत! वे महारथी श्वेतकी रक्षा करना चाहते थे । इसलिये उसे मारनेकी इच्छावाले योद्धाओंमें श्रेष्ठ भीष्मपर

उन्होंने धावा किया । उस समय बड़ा भयंकर युद्ध छिड़ गया ॥ २–४३ ॥

तत् तेऽहं सम्प्रवक्ष्यामि महावैशसमद्भुतम् ॥ ५ ॥

तावकानां परेषां च यथा युद्धमवर्तत । आपके और पाण्डवोंके सैनिकोंमें जो महान् संहारकारी युद्ध जिस प्रकार हुआ, उसका उसी रूपमें आपसे वर्णन करता हूँ ॥ ५३ ॥

तत्राकरोद् रथोपस्थान् शून्यान् शान्तनवो बहून् ॥ ६ ॥

तत्राद्भुतं महच्चक्रे शरैरार्च्छद् रथोत्तमान् ।

समावृणोच्छरैरर्कमर्कतुल्यप्रतापवान् ॥ ७ ॥

उस युद्धमें शान्तनुनन्दन भीष्मने बहुत - से रथोंकी बैठकोंको रथियोंसे शून्य कर दिया । वहाँ उन्होंने अत्यन्त अद्भुत कार्य किया । अपने बाणोंद्वारा बहुत से श्रेष्ठ रथियोंको बहुत

पृष्ठ 1733

महाभारत — खण्ड ३, पृष्ठ 1733 का मूल पृष्ठ
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पीड़ा दी । वे सूर्यके समान तेजस्वी थे । उन्होंने अपने सायकोंद्वारा सूर्यदेवको भी आच्छादित कर दिया ॥ ६-७ ॥

नुदन् समन्तात् समरे रविरुद्यन् यथा तमः ।

तेनाजौ प्रेषिता राजन् शराः शतसहस्रशः ॥ ८ ॥

क्षत्रियान्तकराः संख्ये महावेगा महाबलाः ।

शिरांसि पातयामासुर्वीराणां शतशो रणे ॥ ९ ॥

जैसे सूर्य उदित होकर अन्धकारको नष्ट कर देते हैं, उसी प्रकार वे सब ओर समरभूमिमें शत्रु - सेनाओंका संहार कर रहे थे । राजन्! उनके द्वारा चलाये हुए महान् वेग और बलसे सम्पन्न तथा क्षत्रियोंका विनाश करनेवाले लाखों बाणोंने रणभूमिमें सैकड़ों श्रेष्ठ वीरोंके मस्तक काट गिराये ॥ ८ - ९ ॥

गजान् कण्टकसन्नाहान् वज्रेणेव शिलोच्चयान् ।

रथा रथेषु संसक्ता व्यदृश्यन्त विशाम्पते ॥ १० ॥

उन बाणोंने वज्रके मारे हुए पर्वतोंकी भाँति काँटेदार कवचोंसे सुसज्जित हाथियोंको भी धराशायी कर दिया । प्रजानाथ! उस समय रथ रथोंसे सटे हुए दिखायी देते थे ॥ १० ॥

एके रथं पर्यवहंस्तुरगाः सतुरङ्गमम् ।

युवानं निहतं वीरं लम्बमानं सकार्मुकम् ॥ ११ ॥

कितने ही घोड़े अपनेसहित रथको लिये हुए दूर भागे जा रहे थे और उसपर मरा हुआ नवयुवक वीर रथी धनुषके साथ ही लटक रहा था ॥ ११ ॥

उदीर्णाश्च हया राजन् वहन्तस्तत्र तत्र ह ।

बद्धखड्गनिषङ्गाश्च विध्वस्तशिरसो हताः ॥ १२ ॥

शतशः पतिता भूमौ वीरशय्यासु शेरते । राजन्! वे प्रचण्ड घोड़े उस रथको लिये दिये यत्र- तत्र घूम रहे थे । कमरमें तलवार और पीठपर तरकस बाँधे हुए सैकड़ों आहत वीर मस्तक कट जानेके कारण पृथ्वीपर गिरकर वीरोचित शय्याओंपर शयन कर रहे थे ॥ १२३ ॥

परस्परेण धावन्तः पतिताः पुनरुत्थिताः ॥ १३ ॥

उत्थाय च प्रधावन्तो द्वन्द्वयुद्धमवाप्नुवन् ।

पीडिताः पुनरन्योन्यं लुठन्तो रणमूर्धनि ॥ १४ ॥

एक- दूसरेपर धावा करनेवाले कितने ही सैनिक गिर पड़ते और फिर उठकर खड़े हो जाते थे । खड़े होकर वे दौड़ते और परस्पर द्वन्द्वयुद्ध करने लगते थे । फिर आपसके प्रहारोंसे पीड़ित हो वे युद्धके मुहानेपर ही गिरकर लुढ़क जाते थे ॥ १३-१४ ॥

सचापाः सनिषङ्गाश्च जातरूपपरिष्कृताः ।

विस्रब्धहतवीराश्च शतशः परिपीडिताः ॥ १५ ॥

तेन तेनाभ्यधावन्त विसृजन्तश्च भारत ।

पृष्ठ 1734

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भारत! सैकड़ों वीर धनुष और तरकस लिये सुवर्णमय आभूषणोंसे विभूषित हो कितने ही विपक्षी वीरोंका विश्वस्त भावसे विनाश करके स्वयं भी शत्रुओंके प्रहारसे अत्यन्त पीड़ित हो रहे थे और स्वयं भी अस्त्र- शस्त्रोंका प्रहार करते हुए विभिन्न मार्गोंसे इधर- उधर भाग-दौड़ कर रहे थे ॥ १५३ ॥

मत्तो गजः पर्यवर्तद्धयांश्च हतसादिनः ॥ १६ ॥

सरथा रथिनश्चापि विमृद्नन्तः समन्ततः । मतवाले हाथी उन घोड़ोंके पीछे पड़े थे, जिनके सवार मारे गये थे । इसी प्रकार रथोंसहित रथी चारों ओर भूतलपर पड़ी हुई लाशोंको रौंदते हुए विचरण करते थे ॥ १६३ || स्यन्दनादपतत् कश्चिन्निहतोऽन्येन सायकैः ॥ १७ ॥

हतसारथिरप्युच्चैः पपात काष्ठवद् रथः । कितने ही वीर दूसरोंके बाणोंसे मारे जाकर रथसे गिर पड़ते थे । कहीं सारथिके मारे जानेपर रथ साधारण काष्ठकी भाँति ऊँचेसे नीचे गिर पड़ता था ॥ १७३ ॥

युध्यमानस्य संग्रामे व्यूढे रजसि चोत्थिते ॥ १८ ॥

धनुः कूजितविज्ञानं तत्रासीत् प्रतियुद्धयतः ।

गात्रस्पर्शेन योधानां व्यज्ञास्त परिपन्थिनम् ॥ १ ९ ॥

उस संग्राममें इतनी धूल उड़ी कि कुछ सूझ नहीं पड़ता था । केवल धनुषकी टंकारसे ही यह जाना जाता था कि प्रतिद्वन्द्वी युद्ध कर रहा है । कितने ही योद्धा दूसरे योद्धाओंके शरीरका स्पर्श करके ही यह समझ पाते थे कि यह शत्रुदलका है ॥ १८-१९ ॥

युद्धयमानं शरै राजन् सिञ्जिनीध्वजिनीरवात् ।

अन्योन्यं वीरसंशब्दो नाश्रूयत भटैः कृतः ॥ २० ॥

राजन्! कुछ लोग धनुषकी टंकार और सेनाका कोलाहल सुनकर ही यह समझ पाते थे कि कोई बाणोंद्वारा युद्ध कर रहा है। योद्धा एक- दूसरे के प्रति जो वीरोचित गर्जना करते थे, वह भी उस समय अच्छी तरह सुनायी नहीं देती थी ॥ २० ॥

शब्दायमाने संग्रामे पटहे कर्णदारिणि ।

युद्धयमानस्य संग्रामे कुर्वतः पौरुषं स्वकम् ॥ २१ ॥

नाश्रौषं नामगोत्राणि कीर्तनं च परस्परम् । कानोंका परदा फाड़नेवाले डंकेकी आवाजसे सारी रणभूमि गूँज उठी थी । अतः वहाँ अपने पुरुषार्थको प्रकट करनेवाले किसी योद्धाकी बात मुझे नहीं सुनायी देती थी । वे लोग जो आपसमें नाम - गोत्र आदिका परिचय देते थे, उसे भी मैं नहीं सुन पाता था ॥ २१३ ॥

भीष्मचापच्युतैर्बाणैरार्तानां युध्यतां मृधे ॥ २२ ॥

परस्परेषां वीराणां मनांसि समकम्पयन् ।

पृष्ठ 1735

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युद्धमें भीष्मजीके धनुषसे छूटे हुए बाणोंसे समस्त योद्धा पीड़ित हो रहे थे । उन बाणोंने परस्पर सभी वीरोंके हृदय कँपा दिये थे ॥ २२ ॥

तस्मिन्नत्याकुले युद्धे दारुणे लोमहर्षणे ॥ २३ ॥

पिता पुत्रं च समरे नाभिजानाति कश्चन । वह युद्ध अत्यन्त भयंकर, रोमांचकारी तथा सबको व्याकुल कर देनेवाला था । उसमें कोई पिता अपने पुत्रको भी पहचान नहीं पाता था ॥ २३३ ॥

चक्रे भग्ने युगे छिन्ने एकधुर्ये हये हतः ॥ २४ ॥

आक्षिप्तः स्यन्दनाद् वीरः ससारथिरजिह्मगैः । भीष्मके बाणोंसे पहिये टूट गये, जूआ कट गया और एकमात्र बचा हुआ रथका घोड़ा भी मारा गया । उस दशामें रथपर बैठा हुआ सारथिसहित वीर रथी भी उनके बाणोंसे आहत होकर स्वर्ग सिधारा ॥ २४३ ॥

एवं च समरे सर्वे वीराश्च विरथीकृताः ॥ २५ ॥

तेन तेन स्म दृश्यन्ते धावमानाः समन्ततः । इस प्रकार उस समरांगणमें रथहीन हुए सभी वीर भिन्न -भिन्न मार्गोंसे सब ओर दौड़ते दिखायी देते थे ॥ २५३ ॥

गजो हतः शिरश्छिन्नं मर्म भिन्नं हयो हतः ॥ २६ ॥

अहतः कोऽपि नैवासीद् भीष्मे निघ्नति शात्रवान् । किसीका हाथी मारा गया, किसीका मस्तक कट गया, किसीके मर्मस्थान विदीर्ण हो गये और किसीका घोड़ा ही नष्ट हो गया । जब भीष्मजी शत्रुओंका संहार कर रहे थे, उस समय ( उनके सम्मुख आया हुआ ) कोई भी ऐसा विपक्षी नहीं बचा, जो घायल न हुआ हो ॥ २६३ ॥

श्वेतः कुरूणामकरोत् क्षयं तस्मिन् महाहवे ॥ २७ ॥

राजपुत्रान् रथोदारानवधीच्छतसंघशः । इसी प्रकार उस महायुद्धमें श्वेत भी कौरवोंका संहार कर रहे थे । उन्होंने सैकड़ों श्रेष्ठ रथी राजकुमारोंका संहार कर डाला ॥ २७३ ॥

चिच्छेद रथिनां बाणैः शिरांसि भरतर्षभ ॥ २८ ॥

भरतश्रेष्ठ! श्वेतने अपने बाणोंद्वारा बहुत - से रथियोंके मस्तक काट डाले ॥ २८ ॥

साङ्गदा बाहवश्चैव धनूंषि च समन्ततः ।

रथेषां रथचक्राणि तूणीराणि युगानि च ॥ २ ९ ॥

उन्होंने सब ओर बाण मारकर कितने ही योद्धाओंके धनुष और बाजूबंदसहित भुजाएँ काट डालीं । रथके ईषादण्ड, रथ -चक्र, तूणीर और जूए भी छिन्न- भिन्न कर दिये ॥ २ ९ ॥

छत्राणि च महार्हाणि पताकाश्च विशाम्पते ।

हयौघाश्च रथौघाश्च नरौघाश्चैव भारत ॥ ३० ॥

पृष्ठ 1736

महाभारत — खण्ड ३, पृष्ठ 1736 का मूल पृष्ठ
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वारणाः शतशश्चैव हताः श्वेतेन भारत । राजन्! बहुमूल्य छत्र और पताकाएँ भी उनके बाणोंसे खण्डित हो गयीं । भरतनन्दन! श्वेतने अश्वों, रथों और मनुष्योंके समुदायका तो वध किया ही; सैकड़ों हाथी भी मार गिराये ॥ ३० ॥

वयं श्वेतभयाद् भीता विहाय रथसत्तमम् ॥ ३१ ॥

अपयातास्तथा पश्चाद् विभुं पश्याम धृष्णवः ।

शरपातमतिक्रम्य कुरवः कुरुनन्दन ॥ ३२ ॥

भीष्मं शान्तनवं युद्धे स्थिताः पश्याम सर्वशः । कुरुनन्दन! हमलोग भी श्वेतके भयसे महारथी भीष्मको अकेला छोड़कर भाग खड़े हुए। इसीलिये इस समय जीवित रहकर महाराजका दर्शन कर रहे हैं । हम सभी कौरव श्वेतका बाण जहाँतक पहुँच पाता था, उतनी दूरीको लाँघकर युद्धभूमिमें खड़े हो दर्शककी भाँति शान्तनुनन्दन भीष्मको देख रहे थे ॥ ३१-३२३ ॥ अदीनो दीनसमये भीष्मोऽस्माकं महाहवे ॥ ३३ ॥

एकस्तस्थौ नरव्याघ्रो गिरिर्मेरुरिवाचलः । उस महान् संग्राममें हमलोगोंके लिये कातरताका समय आ गया था, तो भी अकेले नरश्रेष्ठ भीष्म ही दीनतासे रहित हो मेरुपर्वतकी भाँति वहाँ अविचलभावसे खड़े रहे ॥ ३३ ई ॥ आददान इव प्राणान् सविता शिशिरात्यये ॥ ३४ ॥

गभस्तिभिरिवादित्यस्तस्थौ शरमरीचिमान् । जैसे सर्दीके अन्तमें सूर्यदेव धरतीका जल सोखने लगते हैं, उसी प्रकार भीष्म समस्त सैनिकोंके प्राणोंका अपहरण- सा कर रहे थे । किरणोंसे सुशोभित सूर्यदेवकी भाँति भीष्म बाणरूपी रश्मियोंसे शोभा पाते हुए वहाँ खड़े थे ॥ ३४३ ॥

स मुमोच महेष्वासः शरसंघाननेकशः ॥ ३५ ॥

निघ्नन्नमित्रान् समरे वज्रपाणिरिवासुरान् । जैसे वज्रपाणि इन्द्र असुरोंका संहार करते हैं, उसी प्रकार महाधनुर्धर भीष्म उस रणक्षेत्रमें शत्रुओंका विनाश करते हुए बारंबार बाणसमूहोंकी वर्षा कर रहे थे ॥ ३५३ ॥

ते वध्यमाना भीष्मेण प्रजहुस्तं महाबलम् ॥ ३६ ॥

स्वयूथादिव ते यूथान्मुक्तं भूमिषु दारुणम् । महाबली भीष्मजी अपने झुंडसे बिछुड़े हुए हाथीकी भाँति आपकी सेनासे विलग होकर उस रणभूमिमें अत्यन्त भयंकर हो रहे थे; उनकी मार खाकर सम्पूर्ण शत्रु उन्हें छोड़कर भाग गये ॥ ३६ ॥

तमेवमुपलक्ष्यैको हृष्टः पुष्टः परंतप ॥ ३७ ॥

दुर्योधनप्रिये युक्तः पाण्डवान् परिशोचयन् ।

पृष्ठ 1737

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जीवितं दुस्त्यजं त्यक्त्वा भयं च सुमहाहवे ॥ ३८ ॥

परंतप! श्वेतको पूर्वोक्तरूपसे कौरव सेनाका संहार करते देख एकमात्र भीष्म ही उत्साहित और प्रफुल्ल हो पाण्डवोंको शोकमें डालते हुए जीवनका मोह और भय छोड़कर उस महासमरमें दुर्योधनके प्रिय कार्यमें जुट गये ॥ ३७-३८ ॥

पातयामास सैन्यानि पाण्डवानां विशाम्पते ।

प्रहरन्तमनीकानि पिता देवव्रतस्तव ॥ ३ ९ ॥

दृष्ट्वा सेनापतिं भीष्मस्त्वरितः श्वेतमभ्ययात् । राजन्! भीष्मजीने पाण्डवोंके बहुत- से सैनिकोंको मार गिराया। आपके पिता देवव्रतने जब देखा कि सेनापति श्वेत हमारी सेनापर प्रहार कर रहे हैं, तब वे तुरंत उनका सामना करनेके लिये गये ॥ ३ ९ ॥ स भीष्मं शरजालेन महता समवाकिरत् ॥ ४० ॥

श्वेतं चापि तथा भीष्मः शरौघैः समवाकिरत् । श्वेतने अपने असंख्य बाणोंका जाल- सा बिछाकर भीष्मको ढक दिया । तब भीष्मने भी श्वेतपर बाण - समूहोंकी वर्षा की ॥ ४० ॥

तौ वृषाविव नर्दन्तौ मत्ताविव महाद्विपौ । ४१ ॥ व्याघ्राविव सुसंरब्धावन्योन्यमभिजघ्नतुः । वे दोनों वीर गर्जते हुए दो साँड़ों, मदसे उन्मत्त हुए दो गजराजों तथा क्रोधमें भरे हुए दो सिंहोंकी भाँति एक- दूसरेपर चोट करने लगे ॥ ४१३ ॥

अस्त्रैरस्त्राणि संवार्य ततस्तौ पुरुषर्षभौ ॥ ४२ ॥

भीष्मः श्वेतश्च युयुधे परस्परवधैषिणौ । तदनन्तर वे दोनों पुरुषश्रेष्ठ भीष्म और श्वेत अपने अस्त्रोंद्वारा विपक्षीके अस्त्रोंका निवारण करके एक- दूसरेको मार डालनेकी इच्छासे युद्ध करने लगे ॥ ४२ ॥

एकाह्ना निर्दहेद् भीष्मः पाण्डवानामनीकिनीम् ॥ ४३ ॥

शरैः परमसंक्रुद्धो यदि श्वेतो न पालयेत् । यदि श्वेत पाण्डव- सेनाकी रक्षा न करते तो भीष्मजी अत्यन्त क्रुद्ध होकर एक ही दिनमें उसे भस्म कर डालते ॥ ४३३ ॥

पितामहं ततो दृष्ट्वा श्वेतेन विमुखीकृतम् ॥ ४४ ॥

प्रहर्षं पाण्डवा जग्मुः पुत्रस्ते विमनाऽभवत् । तदनन्तर पितामह भीष्मको श्वेतके द्वारा युद्धसे विमुख किया हुआ देख समस्त पाण्डवोंको बड़ा हर्ष हुआ; परंतु आपके पुत्र दुर्योधनका मन उदास हो गया ॥ ४४ ॥

ततो दुर्योधनः क्रुद्धः पार्थिवैः परिवारितः ॥ ४५ ॥

ससैन्यः पाण्डवानीकमभ्यद्रवत संयुगे ।

पृष्ठ 1738

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तब दुर्योधनने कुपित हो समस्त राजाओं तथा सेनाके साथ उस युद्धभूमिमें पाण्डव- सेनापर आक्रमण किया ॥ ४५३ ॥

दुर्मुखः कृतवर्मा च कृपः शल्यो विशाम्पतिः ॥ ४६ ॥

भीष्मं जुगुपुरासाद्य तव पुत्रेण नोदिताः । दुर्मुख, कृतवर्मा, कृपाचार्य तथा राजा शल्य आपके पुत्रकी आज्ञासे आकर भीष्मकी रक्षा करने लगे ॥ ४६३ ॥

दृष्ट्वा तु पार्थिवैः सर्वैर्दुर्योधनपुरोगमैः ॥ ४७ ॥

पाण्डवानामनीकानि वध्यमानानि संयुगे ।

श्वेतो गाङ्गेयमुत्सृज्य तव पुत्रस्य वाहिनीम् ॥। ४८ ॥

नाशयामास वेगेन वायुर्वृक्षानिवौजसा । दुर्योधन आदि सब राजाओंके द्वारा पाण्डवसेनाको युद्धमें मारी जाती देख श्वेतने गंगापुत्र भीष्मको छोड़कर आपके पुत्रकी सेनाका उसी प्रकार वेगपूर्वक विनाश आरम्भ किया, जैसे आँधी अपनी शक्तिसे वृक्षोंको उखाड़ फेंकती है ॥ ४७-४८३ ॥ द्रावयित्वा चमूं राजन् वैराटिः क्रोधमूर्च्छितः ॥ ४ ९ ॥ आपतत् सहसा भूयो यत्र भीष्मो व्यवस्थितः । राजन्! विराटपुत्र श्वेत उस समय क्रोधसे मूर्च्छित हो रहे थे । वे आपकी सेनाको दूर भगाकर फिर सहसा वहीं आ पहुँचे, जहाँ भीष्म खड़े थे ॥ ४ ९ ३ ॥ तौ तत्रोपगतौ राजन् शरदीप्तौ महाबलौ ॥ ५० ॥

अयुध्येतां महात्मानौ यथोभौ वृत्रवासवौ ।

अन्योन्यं तु महाराज परस्परवधैषिणौ ॥ ५१ ॥

महाराज! वे दोनों महाबली महामना वीर बाणोंसे उद्दीप्त हो एक- दूसरेको मार डालनेकी इच्छासे समीप आकर वृत्रासुर और इन्द्रके समान युद्ध करने लगे ॥ ५०-५१ ॥

निगृह्य कार्मुकं श्वेतो भीष्मं विव्याध सप्तभिः ।

पराक्रमं ततस्तस्य पराक्रम्य पराक्रमी ॥ ५२ ॥

तरसा वारयामास मत्तो मत्तमिव द्विपम् । श्वेतने धनुष खींचकर सात बाणोंद्वारा भीष्मको बेध डाला । तब पराक्रमी भीष्मने श्वेतके उस पराक्रमको स्वयं पराक्रम करके वेगपूर्वक रोक दिया; मानो किसी मतवाले हाथीने दूसरे मतवाले हाथीको रोक दिया हो ॥ ५२ ॥

श्वेतः शान्तनवं भूयः शरैः संनतपर्वभिः ॥ ५३ ॥

विव्याध पञ्चविंशत्या तदद्भुतमिवाभवत् । तदनन्तर श्वेतने पुनः झुकी हुई गाँठवाले पचीस बाणोंसे शान्तनुनन्दन भीष्मको बींध डाला । वह एक अद्भुत - सी घटना हुई ॥ ५३ ॥

तं प्रत्यविध्यद् दशभिर्भीष्मः शान्तनवस्तदा ॥ ५४ ॥

पृष्ठ 1739

महाभारत — खण्ड ३, पृष्ठ 1739 का मूल पृष्ठ
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स विद्धस्तेन बलवान् नाकम्पत यथाचलः । तब शान्तनुनन्दन भीष्मने भी दस बाण मारकर बदला चुकाया । उनके द्वारा घायल किये जानेपर भी बलवान् श्वेत विचलित नहीं हुआ । वह पर्वतकी भाँति अविचलभावसे खड़ा रहा ॥ ५४ ॥

वैराटिः समरे क्रुद्धो भृशमायम्य कार्मुकम् ॥ ५५ ॥

आजघान ततो भीष्मं श्वेतः क्षत्रियनन्दनः । तदनन्तर क्षत्रियकुलको आनन्दित करनेवाले विराटकुमार श्वेतने युद्धमें कुपित हो धनुषको जोर- जोरसे खींचकर भीष्मपर पुनः बाणोंद्वारा प्रहार किया ॥ ५५३ ॥

सम्प्रहस्य ततः श्वेतः सृक्किणी परिसंलिहन् ॥ ५६ ॥

धनुश्चिच्छेद भीष्मस्य नवभिर्दशधा शरैः । इसके बाद उन्होंने हँसकर अपने मुँहके दोनों कोनोंको चाटते हुए नौ बाण मारकर भीष्मके धनुषके दस टुकड़े कर दिये ॥ ५६३ ॥

संधाय विशिखं चैव शरं लोमप्रवाहिनम् ॥ ५७ ॥

उन्ममाथ ततस्तालं ध्वजशीर्षं महात्मनः । फिर शिखाशून्य पंखयुक्त बाणका संधान करके उसके द्वारा महात्मा भीष्मके तालचिह्नयुक्त ध्वजका ऊपरी भाग काट डाला ॥ ५७३ ॥

केतुं निपतितं दृष्ट्वा भीष्मस्य तनयास्तव ॥ ५८ ॥

हतं भीष्मममन्यन्त श्वेतस्य वशमागतम् । भीष्मके ध्वजको नीचे गिरा देख आपके पुत्रोंने उन्हें श्वेतके वशमें पड़कर मरा हुआ ही माना ॥ ५८३ ॥

पाण्डवाश्चापि संहृष्टा दध्मुः शङ्खान् मुदा युताः ॥ ५ ९ ॥ भीष्मस्य पतितं केतुं दृष्ट्वा तालं महात्मनः । महात्मा भीष्मके तालध्वजको पृथ्वीपर पड़ा देख पाण्डव हर्षसे उल्लसित हो प्रसन्नतापूर्वक शंख बजाने लगे ॥ ५ ९ ॥ ततो दुर्योधनः क्रोधात् स्वमनीकमनोदयत् ॥ ६० ॥

यत्ता भीष्मं परीप्सध्वं रक्षमाणाः समन्ततः ।

मा नः प्रपश्यमानानां श्वेतान्मृत्युमवाप्स्यति ॥ ६१ ॥

भीष्मः शान्तनवः शूरस्तथा सत्यं ब्रवीमि वः । तब दुर्योधनने क्रोधपूर्वक अपनी सेनाको आदेश दिया- ' वीरो! सावधान होकर सब ओरसे भीष्मकी रक्षा करते हुए उन्हें घेरकर खड़े हो जाओ । कहीं ऐसा न हो कि ये हमारे देखते - देखते श्वेतके हाथों मारे जायँ। मैं तुमलोगोंको सत्य कहता हूँ कि शान्तनुनन्दन भीष्म महान् शूरवीर हैं ' ॥ ६०-६१ ॥ राज्ञस्तु वचनं श्रुत्वा त्वरमाणा महारथाः ॥ ६२ ॥

पृष्ठ 1740

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बलेन चतुरङ्गेण गाङ्गेयमन्वपालयन् । राजा दुर्योधनकी यह बात सुनकर सब महारथी बड़ी उतावलीके साथ वहाँ आये और चतुरंगिणी सेनाद्वारा गंगानन्दन भीष्मकी रक्षा करने लगे ॥ ६२ ॥

बाह्लीकः कृतवर्मा च शलः शल्यश्च भारत ॥ ६३ ॥

जलसंधो विकर्णश्च चित्रसेनो विविंशतिः ।

त्वरमाणास्त्वराकाले परिवार्य समन्ततः ॥ ६४ ॥

शस्त्रवृष्टिं सुतुमुलां श्वेतस्योपर्यपातयन् । भारत! बाह्लीक, कृतवर्मा, शल, शल्य, जलसंध, विकर्ण, चित्रसेन और विविंशति — इन सबने शीघ्रताके अवसरपर शीघ्रता करते हुए चारों ओरसे भीष्मजीको घेर लिया और श्वेतके ऊपर भयंकर शस्त्र - वर्षा करने लगे ॥ ६३-६४३ ॥ तान् क्रुद्धो निशितैर्बाणैस्त्वरमाणो महारथः ॥ ६५ ॥

अवारयदमेयात्मा दर्शयन् पाणिलाघवम् । तब अपरिमित आत्मबलसे सम्पन्न महारथी श्वेतने अपने हाथोंकी फुर्ती दिखाते हुए बड़ी उतावलीके साथ क्रोधपूर्वक पैने बाणोंद्वारा उन सबको रोक दिया ॥ ६५३ ॥

सनिवार्य तु तान् सर्वान् केसरी कुञ्जरानिव ॥ ६६ ॥

महता शरवर्षेण भीष्मस्य धनुराच्छिनत् । जैसे सिंह हाथियोंके समूहको आगे बढ़नेसे रोक देता है, उसी प्रकार उन सभी महारथियोंको रोककर भारी बाणवर्षाके द्वारा श्वेतने भीष्मका धनुष काट दिया ॥ ६६३ ॥

ततोऽन्यद् धनुरादाय भीष्मः शान्तनवो युधि ॥ ६७ ॥

श्वेतं विव्याध राजेन्द्र कङ्कपत्रैः शितैः शरैः । राजेन्द्र! तब शान्तनुनन्दन भीष्मने दूसरा धनुष लेकर युद्धस्थलमें कंकपत्रयुक्त पैने बाणोंद्वारा श्वेतको घायल कर दिया ॥ ६७३ ॥

ततः सेनापतिः क्रुद्धो भीष्मं बहुभिरायसैः ॥ ६८ ॥

विव्याध समरे राजन् सर्वलोकस्य पश्यतः । राजन्! तब सेनापति श्वेतने कुपित हो उस समरभूमिमें बहुत -से लौहमय बाणोंद्वारा सब लोगोंके देखते - देखते भीष्मको क्षत- विक्षत कर दिया ॥ ६८ ॥

ततः प्रव्यथितो राजा भीष्मं दृष्ट्वा निवारितम् ॥ ६ ९ ॥

प्रवीरं सर्वलोकस्य श्वेतेन युधि वै तदा ।

निष्ठानकश्च सुमहांस्तव सैन्यस्य चाभवत् ॥ ७० ॥

श्वेतने सम्पूर्ण विश्वके विख्यात वीर भीष्मको युद्धमें आगे बढ़नेसे रोक दिया, यह देखकर राजा दुर्योधनके मनमें बड़ी व्यथा हुई । साथ ही आपकी सेनामें सब लोगोंपर महान् भय छा गया ॥ ६ ९ -७० ॥ तं वीरं वारितं दृष्ट्वा श्वेतेन शरविक्षतम् ।