03.Mahabharata Volume 3 — पृष्ठ 1761–1770

महाभारत — खण्ड ३ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1761–1770

पृष्ठ 1761

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शिखण्डी च महाबाहो भीष्मस्य निधनं किल ॥ ३० ॥

( करिष्यति न संदेहो नृपाणां युधि पश्यताम् । ) ' महाबाहो! निश्चय ही इन समस्त राजाओंके देखते - देखते यह शिखण्डी भीष्मका वध कर डालेगा, इसमें तनिक भी संदेह नहीं है ' ॥ ३० ॥

एतच्छ्रुत्वा ततो राजा धृष्टद्युम्नं महारथम् ।

अब्रवीत् समितौ तस्यां वासुदेवस्य शृण्वतः ॥ ३१ ॥

यह सुनकर धर्मराज युधिष्ठिरने भगवान् श्रीकृष्णके सुनते ही उस सभामें महारथी धृष्टद्युम्नसे कहा— ॥ ३१ ॥

धृष्टद्युम्न निबोधेदं यत् त्वां वक्ष्यामि मारिष ।

नातिक्रम्यं भवेत् तच्च वचनं मम भाषितम् ॥ ३२ ॥

' आदरणीय वीर धृष्टद्युम्न! मैं तुमसे जो कुछ कहता हूँ, इसे ध्यान देकर सुनो । मेरे कहे हुए वचनोंका तुम्हें उल्लंघन नहीं करना चाहिये ॥ ३२ ॥

भवान् सेनापतिर्मह्यं वासुदेवेन सम्मितः ।

कार्तिकेयो यथा नित्यं देवानामभवत् पुरा ॥ ३३ ॥

तथा त्वमपि पाण्डूनां सेनानीः पुरुषर्षभ । ' तुम मेरे सेनापति हो, भगवान् श्रीकृष्णके समान पराक्रमी हो । पुरुषरत्न! पूर्वकालमें भगवान् कार्तिकेय जिस प्रकार देवताओंके सेनापति हुए थे, उसी प्रकार तुम भी पाण्डवोंके सेनानायक होओ ' ॥ ३३३ ॥

( तच्छ्रुत्वा जहृषुः पार्थाः पार्थिवाश्च महारथाः ।

साधु साध्विति तद्वाक्यमूचुः सर्वे महीक्षितः ॥

पुनरप्यब्रवीद् राजा धृष्टद्युम्नं महाबलम् ॥ ) युधिष्ठिरका यह कथन सुनकर समस्त पाण्डव और महारथी भूपालगण सब - के - सब ‘ साधु - साधु' कहकर उनके इन वचनोंकी सराहना करने लगे । तत्पश्चात् राजा युधिष्ठिरने

पुनः महाबली धृष्टद्युम्नसे कहा— ।

स त्वं पुरुषशार्दूल विक्रम्य जहि कौरवान् ॥ ३४ ॥

अहं च तेऽनुयास्यामि भीमः कृष्णश्च मारिष ।

माद्रीपुत्रौ च सहितौ द्रौपदेयाश्च दंशिताः ॥ ३५ ॥

ये चान्ये पृथिवीपालाः प्रधानाः पुरुषर्षभ । 'पुरुषसिंह! तुम पराक्रम करके कौरवोंका नाश करो । मारिष! नरश्रेष्ठ! मैं, भीमसेन, श्रीकृष्ण, माद्रीकुमार नकुल सहदेव, द्रौपदीके पाँचों पुत्र तथा अन्य प्रधान-प्रधान भूपाल कवच धारण करके तुम्हारे पीछे - पीछे चलेंगे ' ॥ ३४-३५३ ॥ तत उद्धर्षयन् सर्वान् धृष्टद्युम्नोऽभ्यभाषत ॥ ३६ ॥

अहं द्रोणान्तकः पार्थ विहितः शम्भुना पुरा ।

पृष्ठ 1762

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रणे भीष्मं कृपं द्रोणं तथा शल्यं जयद्रथम् ॥ ३७ ॥

सर्वानद्य रणे दृप्तान् प्रतियोत्स्यामि पार्थिव । तब धृष्टद्युम्नने सबका हर्ष बढ़ाते हुए कहा– ' पार्थ! मुझे भगवान् शंकरने पहलेसे ही द्रोणाचार्यका काल बनाकर उत्पन्न किया है । पृथ्वीपते! आज समरांगणमें मैं भीष्म, कृपाचार्य, द्रोणाचार्य, शल्य तथा जयद्रथ - इन समस्त अभिमानी योद्धाओंका सामना करूँगा' ॥ ३६-३७३ ॥ अथोत्कृष्टं महेष्वासैः पाण्डवैर्युद्धदुर्मदैः ॥ ३८ ॥

समुद्यते पार्थिवेन्द्रे पार्षते शत्रुसूदने ।

तमब्रवीत् ततः पार्थः पार्षतं पृतनापतिम् ॥ ३ ९ ॥

यह सुनकर युद्धके लिये उन्मत्त रहनेवाले महान् धनुर्धर पाण्डवोंने उच्चस्वरमें सिंहनाद किया तथा शत्रुसूदन नृपश्रेष्ठ द्रुपदपुत्र धृष्टद्युम्नके इस प्रकार युद्धके लिये उद्यत होनेपर कुन्तीकुमार युधिष्ठिरने सेनापति द्रुपदकुमारसे पुनः इस प्रकार कहा- ॥ ३८-३९ ॥

व्यूहः क्रौञ्चारुणो नाम सर्वशत्रुनिबर्हणः ।

यं बृहस्पतिरिन्द्राय तदा देवासुरेऽब्रवीत् ॥ ४० ॥

' सेनापते! क्रौंचारुण नामक व्यूह समस्त शत्रुओंका संहार करनेवाला है; जिसे बृहस्पतिने देवासुर- संग्रामके अवसरपर इन्द्रको बताया था ॥ ४० ॥

तं यथावत् प्रतिव्यूह परानीकविनाशनम् ।

अदृष्टपूर्वं राजानः पश्यन्तु कुरुभिः सह ॥ ४१ ॥

‘ शत्रुसेनाका विनाश करनेवाले उस क्रौंचारुण व्यूहका तुम यथावत् रूपसे निर्माण करो । आज समस्त राजा कौरवोंके साथ उस अदृष्टपूर्व व्यूहको अपनी आँखोंसे देखें ' ॥ ४१ ॥

यथोक्तः स नृदेवेन विष्णुर्वज्रभृता यथा । ( बार्हस्पत्येन विधिना व्यूहमार्गविचक्षणः । ) प्रभाते सर्वसैन्यानामग्रे चक्रे धनंजयम् ॥ ४२ ॥

जैसे वज्रधारी इन्द्र भगवान् विष्णुसे कुछ कहते हों, उसी प्रकार नरदेव युधिष्ठिरके पूर्वोक्त बात कहनेपर व्यूह- रचनामें कुशल धृष्टद्युम्नने बृहस्पतिकी बतायी हुई विधिसे प्रातःकाल ( सूर्योदयसे पूर्व) ही समस्त सेनाओंका व्यूह -निर्माण किया; उन्होंने सबसे आगे अर्जुनको खड़ा किया ॥ ४२ ॥

आदित्यपथगः केतुस्तस्याद्भुतमनोरमः ।

शासनात् पुरुहूतस्य निर्मितो विश्वकर्मणा ॥ ४३ ॥

उनका अद्भुत एवं मनोरम ध्वज सूर्यके पथमें ( ऊँचे आकाशमें) फहरा रहा था। इन्द्रके आदेशसे साक्षात् विश्वकर्माने उसका निर्माण किया था ॥ ४३ ॥

इन्द्रायुधसवर्णाभिः पताकाभिरलङ्कृतः ।

पृष्ठ 1763

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आकाशग इवाकाशे गन्धर्वनगरोपमः ॥ ४४ ॥

इन्द्रधनुषके रंगकी पताकाएँ उस ध्वजकी शोभा बढ़ाती थीं । वह ध्वज आकाशमें आकाशचारी पक्षीकी भाँति बिना आधारके ही चलता था । वह दूरसे गन्धर्वनगरके समान जान पड़ता था ॥ ४४ ॥

नृत्यमान इवाभाति रथचर्यासु मारिष ।

तेन रत्नवता पार्थः स च गाण्डीवधन्वना ॥ ४५ ॥

बभूव परमोपेतः सुमेरुरिव भानुना । आर्य! रथके मार्गोंपर अर्जुनका वह ध्वज नृत्य करता- सा प्रतीत होता था । उस रत्नयुक्त ध्वजसे अर्जुनकी और गाण्डीवधारी अर्जुनसे उस ध्वजकी बड़ी शोभा होती थी, ठीक उसी तरह जैसे मेरु पर्वतसे सूर्यकी और सूर्यसे मेरु पर्वतकी शोभा होती है ॥ ४५३ || शिरोऽभूद् द्रुपदो राजन् महत्या सेनया वृतः ॥ ४६ ॥

कुन्तिभोजश्च चैद्यश्च चक्षुर्भ्यां तो जनेश्वरौ ।

दाशार्णकाः प्रभद्राश्च दाशेरकगणैः सह ॥ ४७ ॥

अनूपकाः किराताश्च ग्रीवायां भरतर्षभ । राजन्! अपनी विशाल सेनाके साथ राजा द्रुपद उस व्यूहके सिरके स्थानपर थे । कुन्तिभोज और धृष्टकेतु—ये दोनों नरेश नेत्रोंके स्थानपर प्रतिष्ठित हुए । भरतश्रेष्ठ! दाशार्णक, दाशेरकसमूहोंके साथ प्रभद्रक, अनूपक और किरातगण गर्दनके स्थानमें खड़े किये गये ॥ ४६-४७ ॥ पटच्चरैश्च पौण्ड्रैश्च राजन् पौरवकैस्तथा ॥ ४८ ॥

निषादैः सहितश्चापि पृष्ठमासीद् युधिष्ठिरः ।

पक्षौ तु भीमसेनश्च धृष्टद्युम्नश्च पार्षतः ॥ ४ ९ ॥

द्रौपदेयाभिमन्युश्च सात्यकिश्च महारथः ।

पिशाचा दारदाश्चैव पुण्ड्राः कुण्डीविषैः सह ॥ ५० ॥

मारुता धेनुकाश्चैव तङ्गणाः परतङ्गणाः ।

बाह्लिकास्तित्तिराश्चैव चोलाः पाण्ड्याश्च भारत ॥ ५१ ॥

एते जनपदा राजन् दक्षिणं पक्षमाश्रिताः । पटच्चर, पौण्ड्र, पौरव तथा निषादोंके साथ स्वयं राजा युधिष्ठिर पृष्ठभागमें स्थित हुए । भीमसेन और धृष्टद्युम्न क्रौंचपक्षीके दोनों पंखोंके स्थानपर नियुक्त किये गये । राजन्! द्रौपदीके पुत्र, अभिमन्यु और महारथी सात्यकिके साथ पिशाच, दारद, पुण्ड्र, कुण्डीविष, मारुत, धेनुक, तंगण, परतंगण, बाह्लिक, तित्तिर, चोल तथा पाण्ड्य– इन जनपदोंके लोग दाहिने पंखका आश्रय लेकर खड़े हुए ॥ ४८-५१३ ॥ अग्निवेश्यास्तु हुण्डाश्च मालवा दानभारयः ॥ ५२ ॥

पृष्ठ 1764

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शबरा उद्भसाश्चैव वत्साश्च सह नाकुलैः ।

नकुलः सहदेवश्च वामं पक्षं समाश्रिताः ॥ ५३ ॥

अग्निवेश्य, हुण्ड, मालव, दानभारि, शबर, उद्भस, वत्स तथा नाकुल जनपदोंके साथ दोनों भाई नकुल और सहदेवने बायें पंखका आश्रय लिया ॥ ५२-५३ ॥

रथानामयुतं पक्षौ शिरस्तु नियुतं तथा ।

पृष्ठमर्बुदमेवासीत् सहस्राणि च विंशतिः ॥ ५४ ॥

ग्रीवायां नियुतं चापि सहस्राणि च सप्ततिः । उस क्रौंचपक्षीके पंखभागमें दस हजार, शिरोभागमें एक लाख, पृष्ठभागमें एक अर्बुद बीस हजार तथा ग्रीवाभागमें एक लाख सत्तर हजार रथ मौजूद थे ॥ ५४ ॥

पक्षकोटिप्रपक्षेषु पक्षान्तेषु च वारणाः ॥ ५५ ॥

जग्मुः परिवृता राजंश्चलन्त इव पर्वताः । राजन्! पक्ष, कोटि, प्रपक्ष तथा पक्षान्त - भागोंमें चलते - फिरते पर्वतोंके समान हाथियोंके झुंड चले । वे सब - के - सब सेनाओंसे घिरे हुए थे ॥ ५५३ ॥

जघनं पालयामास विराटः सह केकयैः ॥ ५६ ॥

काशिराजश्च शैब्यश्च रथानामयुतैस्त्रिभिः । राजा विराट केकयराजकुमारोंके साथ उस व्यूहके जघन ( कटिके अग्रभाग ) -की रक्षा करते थे । काशिराज और शैब्य भी तीस हजार रथियोंके साथ उसीकी रक्षामें तत्पर थे ॥ ५६३ ॥

एवमेनं महाव्यूहं व्यूह्य भारत पाण्डवाः ॥ ५७ ॥

सूर्योदयं त इच्छन्तः स्थिता युद्धाय दंशिताः । भारत! इस प्रकार पाण्डव क्रौंचारुण नामक महाव्यूहकी रचना करके सूर्योदयकी प्रतीक्षा करते हुए युद्धके लिये कवच आदिसे सुसज्जित हो खड़े हो गये ॥ ५७ ॥

तेषामादित्यवर्णानि विमलानि महान्ति च ।

श्वेतच्छत्राण्यशोभन्त वारणेषु रथेषु च ॥ ५८ ॥

उनके हाथियों और रथोंके ऊपर सूर्यके समान प्रकाशमान, निर्मल एवं महान् श्वेतच्छत्र शोभा पा रहे थे ॥ ५८ ॥

इति श्रीमहाभारते भीष्मपर्वणि भीष्मवधपर्वणि क्रौञ्चव्यूहनिर्माणे पञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५० ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत भीष्मपर्वके अन्तर्गत भीष्मवधपर्वमें क्रौंचव्यूहनिर्माणविषयक पचासवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ५० ॥

[ दाक्षिणात्य अधिक पाठके २ श्लोक मिलाकर कुल ६०३ श्लोक हैं। ]

पृष्ठ 1765

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3. यहाँ ‘ नियुत' का अर्थ एक लाख किया गया है । किसी- किसीके मतमें उसका अर्थ दस लाख भी होता है । २. दस करोड़की संख्याको अर्बुद कहते हैं । ३. पंख । ४. अग्रभाग । ५. पंखके भीतरके छोटे - छोटे पंख ।

पृष्ठ 1766

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एकपञ्चाशत्तमोऽध्यायः कौरव - सेनाकी व्यूह - रचना तथा दोनों दलोंमें शंखध्वनि और सिंहनाद संजय उवाच

क्रौञ्चं 'दृष्ट्वा ततो व्यूहमभेद्यं तनयस्तव ।

रक्ष्यमाणं महाघोरं पार्थेनामिततेजसा ॥ १ ॥

आचार्यमुपसंगम्य कृपं शल्यं च पार्थिव ।

सौमदत्तिं विकर्णं च सोऽश्वत्थामानमेव च ॥ २ ॥

दुःशासनादीत् भ्रातॄंश्च सर्वानेव च भारत ।

अन्यांश्च सुबहून् शूरान् युद्धाय समुपागतान् ॥ ३ ॥

प्राहेदं वचनं काले हर्षयंस्तनयस्तव ।

नानाशस्त्रप्रहरणाः सर्वे युद्धविशारदाः ॥ ४ ॥

संजय कहते हैं — महाराज! उस अत्यन्त भयंकर अभेद्य क्रौंचव्यूहको अमिततेजस्वी अर्जुनके द्वारा सुरक्षित देखकर आपका पुत्र दुर्योधन आचार्य द्रोण, कृप, शल्य, भूरिश्रवा, विकर्ण, अश्वत्थामा और दुःशासन आदि सब भाइयों तथा युद्धके लिये आये हुए अन्य बहुतेरे शूरवीरोंके पास जाकर उन सबका हर्ष बढ़ाता हुआ यह समयोचित वचन बोला —‘वीरो! आप सब लोग नाना प्रकारके अस्त्र- शस्त्रोंके प्रहारमें कुशल तथा युद्धकी कलामें निपुण हैं ॥ १–४ ॥ एकैकशः समर्था हि यूयं सर्वे महारथाः ।

पृष्ठ 1767

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पाण्डुपुत्रान् रणे हन्तुं ससैन्यान् किमु संहताः ॥ ५ ॥

' आप सभी महारथी हैं । आपमेंसे प्रत्येक योद्धा रणक्षेत्रमें सेनासहित पाण्डवोंका वध करनेमें समर्थ हैं । फिर सब लोग मिलकर उन्हें परास्त कर दें, इसके लिये तो कहना ही क्या है ॥ ५ ॥

अपर्याप्तं तदस्माकं बलं भीष्माभिरक्षितम् ।

पर्याप्तमिदमेतेषां बलं भीमाभिरक्षितम् ॥ ६ ॥

संस्थानाः शूरसेनाश्च वेत्रिकाः कुकुरास्तथा ।

आरोचकास्त्रिगर्ताश्च मद्रका यवनास्तथा ॥ ७ ॥

शत्रुंजयेन सहितास्तथा दुःशासनेन च ।

विकर्णेन च वीरेण तथा नन्दोपनन्दकैः ॥ ८ ॥

चित्रसेनेन सहिताः सहिताः पारिभद्रकैः ।

भीष्ममेवाभिरक्षन्तु सहसैन्यपुरस्कृताः ॥ ९ ॥

' भीष्मपितामहके द्वारा सुरक्षित हमारी वह सेना सब प्रकारसे अजेय है, परन्तु भीमसेनके द्वारा सुरक्षित इन पाण्डवोंकी यह सेना जीतनेमें सुगम है; अतः मेरी राय है कि संस्थान, शूरसेन, वेत्रिक, कुकुर, आरोचक, त्रिगर्त, मद्रक तथा यवन आदि देशोंके लोग शत्रुंजय, दुःशासन, वीर विकर्ण, नन्द, उपनन्द, चित्रसेन तथा पारिभद्रक वीरोंके साथ जाकर अपनी सेनाको आगे रखते हुए भीष्मकी ही रक्षा करें ' ॥ ६ – ९ ॥ (संजय उवाच दुर्योधनवचः श्रुत्वा सर्व एव महारथाः । तथेत्येनं नृपा ऊचुस्तदा द्रोणपुरोगमाः ॥ ) संजय कहते हैं - महाराज! दुर्योधनकी यह बात सुनकर द्रोण आदि सभी महारथियों एवं राजाओंने उस समय ' तथास्तु ' कहकर उसकी बात मान ली ।

ततो भीष्मश्च द्रोणश्च तव पुत्राश्च मारिष ।

अव्यूहन्त महाव्यूहं पाण्डूनां प्रतिबाधनम् ॥ १० ॥

आर्य! तदनन्तर भीष्म, द्रोण तथा आपके पुत्रोंने मिलकर अपनी सेनाका महान् व्यूह बनाया, जो पाण्डव - सैनिकोंको बाधा पहुँचानेमें समर्थ था ॥ १० ॥

भीष्मः सैन्येन महता समन्तात् परिवारितः ।

ययौ प्रकर्षन् महतीं वाहिनीं सुरराडिव ॥ ११ ॥

तदनन्तर बहुत बड़ी सेनाद्वारा सब ओरसे घिरे हुए भीष्म देवराज इन्द्रकी भाँति विशाल वाहिनी साथ लिये आगे - आगे चले ॥ ११ ॥

तमन्वयान्महेष्वासो भारद्वाजः प्रतापवान् ।

कुन्तलैश्च दशार्णैश्च मागधैश्च विशाम्पते ॥ १२ ॥

पृष्ठ 1768

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विदर्भेर्मेकलैश्चैव कर्णप्रावरणैरपि ।

सहिताः सर्वसैन्येन भीष्ममाहवशोभिनम् ॥ १३ ॥

गान्धाराः सिन्धुसौवीराः शिबयोऽथ वसातयः । उनके पीछे प्रतापी वीर महाधनुर्धर द्रोणाचार्यने युद्धके लिये प्रस्थान किया । महाराज! उस समय कुन्तल, दशार्ण, मागध, विदर्भ, मेकल तथा कर्णप्रावरण आदि देशोंके सैनिकोंके साथ गान्धार, सिन्धु, सौवीर, शिबि तथा वसाति देशोंके वीर क्षत्रिय युद्धमें शोभा पानेवाले भीष्मकी रक्षा करने लगे ॥ १२-१३ ३ ॥ शकुनिश्च स्वसैन्येन भारद्वाजमपालयत् ॥ १४ ॥

ततो दुर्योधनो राजा सहितः सर्वसोदरैः ।

अश्वातकैर्विकर्णैश्च तथा चाम्बष्ठकोसलैः ॥ १५ ॥

दरदैश्च शकैश्चैव तथा क्षुद्रकमालवैः ।

अभ्यरक्षत संहृष्टः सौबलेयस्य वाहिनीम् ॥ १६ ॥

शकुनिने अपनी सेना साथ लेकर द्रोणाचार्यकी रक्षामें योग दिया । तत्पश्चात् अपने भाइयोंसहित राजा दुर्योधन अत्यन्त हर्षमें भरकर अश्वातक, विकर्ण, अम्बष्ठ, कोसल, दरद, शक, क्षुद्रक तथा मालव आदि देशोंके योद्धाओंके साथ सुबलपुत्र शकुनिकी सेनाका संरक्षण करने लगा ॥ १४–१६ ॥

भूरिश्रवाः शलः शल्यो भगदत्तश्च मारिषः ।

विन्दानुविन्दावावन्त्यौ वामं पार्श्वमपालयन् ॥ १७ ॥

सौमदत्तिः सुशर्मा च काम्बोजश्च सुदक्षिणः ।

श्रुतायुश्चाच्युतायुश्च दक्षिणं पक्षमास्थिताः ॥ १८ ॥

भूरिश्रवा, शल, शल्य, आदरणीय राजा भगदत्त तथा अवन्तीके राजकुमार विन्द और अनुविन्द उस सारी सेनाके वामभागकी रक्षा कर रहे थे । सोमदत्तपुत्र भूरि, त्रिगर्तराज सुशर्मा, काम्बोजराज सुदक्षिण, श्रुतायु तथा अच्युतायु —ये दक्षिणभागमें स्थित होकर उस सेनाकी रक्षा कर रहे थे ॥ १७-१८ ॥

अश्वत्थामा कृपश्चैव कृतवर्मा च सात्वतः ।

महत्या सेनया सार्धं सेनापृष्ठे व्यवस्थिताः ॥ १९ ॥

अश्वत्थामा, कृपाचार्य तथा सात्वतवंशी कृतवर्मा अपनी विशाल सेनाके साथ कौरव- सेनाके पृष्ठभागमें खड़े होकर उसका संरक्षण करते थे ॥ १ ९ ॥

पृष्ठगोपास्तु तस्यासन् नानादेश्या जनेश्वराः ।

केतुमान् वसुदानश्च पुत्रः काश्यस्य चाभिभूः ॥ २० ॥

केतुमान्, वसुदान, काशिराजके पुत्र अभिभू तथा अन्य अनेक देशोंके नरेश सेना पृष्ठके पोषक थे ॥ २० ॥

ततस्ते तावकाः सर्वे हृष्टा युद्धाय भारत ।

पृष्ठ 1769

महाभारत — खण्ड ३, पृष्ठ 1769 का मूल पृष्ठ
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दध्मुः शङ्खान् मुदा युक्ताः सिंहनादांस्तथोन्नदन् ॥ २१ ॥

भारत! तदनन्तर आपकी सेनाके समस्त सैनिक हर्षसे उल्लसित हो प्रसन्नतापूर्वक शंख बजाने और सिंहनाद करने लगे ॥ २१ ॥

तेषां श्रुत्वा तु हृष्टानां वृद्धः कुरुपितामहः ।

सिंहनादं विनद्योच्चैः शङ्खं दध्मौ प्रतापवान् ॥ २२ ॥

उनका हर्षनाद सुनकर कुरुकुलके वृद्ध पितामह प्रतापी भीष्मने जोर- जोरसे सिंहनाद करके अपना शंख बजाया ॥ २२ ॥

ततः शङ्खाश्च भेर्यश्च पणवा विविधाः परे ।

आनकाश्चाभ्यहन्यन्त स शब्दस्तुमुलोऽभवत् ॥ २३ ॥

तदनन्तर शंख, भेरी, नाना प्रकारके पणव और आनक आदि अन्य बाजे सहसा बज उठे और उन सबका सम्मिलित शब्द सब ओर गूँज उठा ॥ २३ ॥

ततः श्वेतैर्हयैर्युक्ते महति स्यन्दने स्थितौ ।

प्रदध्मतुः शङ्खवरौ हेमरत्नपरिष्कृतौ ॥ २४ ॥

तत्पश्चात् श्वेत घोड़ोंसे जुते हुए विशाल रथपर बैठे भगवान् श्रीकृष्ण और अर्जुन अपने सुवर्णभूषित श्रेष्ठ शंखोंको बजाने लगे ॥ २४ ॥

पाञ्चजन्यं हृषीकेशो देवदत्तं धनंजयः ।

पौण्ड्रं दध्मौ महाशङ्खं भीमकर्मा वृकोदरः ॥ २५ ॥

हृषीकेशने पांचजन्य, अर्जुनने देवदत्त तथा भयंकर कर्म करनेवाले भीमसेनने पौण्ड्र नामक महान् शंख बजाया ॥ २५ ॥

अनन्तविजयं राजा कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः ।

नकुलः सहदेवश्च सुघोषमणिपुष्पकौ ॥ २६ ॥

कुन्तीपुत्र राजा युधिष्ठिरने अनन्तविजय तथा नकुल सहदेवने सुघोष और मणिपुष्पक नामक शंख बजाया ॥ २६ ॥

काशिराजश्च शैब्यश्च शिखण्डी च महारथः ।

धृष्टद्युम्नो विराटश्च सात्यकिश्च महारथः ॥ २७ ॥

पाञ्चाल्याश्च महेष्वासा द्रौपद्याः पञ्च चात्मजाः ।

सर्वे दध्मुर्महाशङ्खान् सिंहनादांश्च नेदिरे ॥ २८ ॥

काशिराज, शैब्य, महारथी शिखण्डी, धृष्टद्युम्न, विराट, महारथी सात्यकि, पांचालवीर, महाधनुर्धर द्रौपदीके पाँचों पुत्र - ये सभी बड़े- बड़े शंखोंको बजाने और सिंहनाद करने लगे ॥ २७-२८ ॥

स घोषः सुमहांस्तत्र वीरैस्तैः समुदीरितः ।

नभश्च पृथिवीं चैव तुमुलो व्यनुनादयत् ॥ २९ ॥

पृष्ठ 1770

महाभारत — खण्ड ३, पृष्ठ 1770 का मूल पृष्ठ
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वहाँ उन वीरोंद्वारा प्रकट किया हुआ वह महान् तुमुल घोष पृथ्वी और आकाशको निनादित करने लगा ॥ २ ९ ॥

एवमेते महाराज प्रहृष्टाः कुरुपाण्डवाः ।

पुनर्युद्धाय संजग्मुस्तापयानाः परस्परम् ॥ ३० ॥

महाराज! इस प्रकार ये हर्षमें भरे हुए कौरव - पाण्डव एक- दूसरेको संताप देते हुए पुनः युद्धके लिये रणक्षेत्रमें जा पहुँचे ॥ ३० ॥

इति श्रीमहाभारते भीष्मपर्वणि भीष्मवधपर्वणि कौरवव्यूहरचनायामेकपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५१ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत भीष्मपर्वके अन्तर्गत भीष्मवधपर्वमें कौरव- व्यूह-रचनाविषयक इक्यावनवाँ अध्याय पूराहुआ ॥ ५१ ॥

[दाक्षिणात्य अधिक पाठका १ श्लोक मिलाकर कुल ३१ श्लोक हैं । ]