03.Mahabharata Volume 3 — पृष्ठ 1751–1760
महाभारत — खण्ड ३ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1751–1760
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मन्ये शरैः शरीराणि शत्रूणां प्रमथिष्यति ॥ १५ ॥
तात! अर्जुनसे मुझे अधिक भय बना रहता है और वह भय कभी शान्त नहीं होता; क्योंकि कुन्ती-नन्दन अर्जुन शूरवीर तथा शीघ्रतापूर्वक अस्त्र संचालन करनेवाला है । मैं समझता हूँ कि वह अपने बाणोंद्वारा शत्रुओंके शरीरोंको मथ डालेगा ॥ १४-१५ ॥
ऐन्द्रिमिन्द्रानुजसमं महेन्द्रसदृशं बले ।
अमोघक्रोधसंकल्पं दृष्ट्वा वः किमभून्मनः ॥ १६ ॥
इन्द्रकुमार अर्जुन भगवान् विष्णुके समान पराक्रमी और महेन्द्रके समान बलवान् है । उसका क्रोध और संकल्प कभी व्यर्थ नहीं होता । उसे देखकर तुमलोगोंके मनमें क्या विचार उठा था? ॥ १६ ॥
तथैव वेदविच्छूरो ज्वलनार्कसमद्युतिः ।
इन्द्रास्त्रविदमेयात्मा प्रपतन् समितिंजयः ॥ १७ ॥
वज्रसंस्पर्शरूपाणामस्त्राणां च प्रयोजकः ।
स खड्गाक्षेपहस्तस्तु घोषं चक्रे महारथः ॥ १८ ॥
अर्जुन वेदज्ञ, शौर्यसम्पन्न, अग्नि और सूर्यके समान तेजस्वी, इन्द्रास्त्रका ज्ञाता, अमेय आत्मबलसे सम्पन्न, वेगपूर्वक आक्रमण करनेवाला और बड़े-बड़े संग्रामोंमें विजय पानेवाला है । वह ऐसे- ऐसे अस्त्रोंका प्रयोग करता है, जिनका हलका - सा स्पर्श भी वज्रके समान कठोर है । महारथी अर्जुन अपने हाथमें सदा तलवार खींचे ही रहता है और उसका प्रहार करके विकट गर्जना करता है ॥ १७-१८ ॥
स संजय महाप्राज्ञो द्रुपदस्यात्मजो बली ।
धृष्टद्युम्नः किमकरोच्छ्वेते युधि निपातिते ॥ १ ९ ॥
संजय! द्रुपदके परम बुद्धिमान् पुत्र बलवान् धृष्टद्युम्नने श्वेतके युद्धमें मारे जानेपर क्या किया? ॥ १ ९ ॥
पुरा चैवापराधेन वधेन च चमूपतेः ।
मन्ये मनः प्रजज्वाल पाण्डवानां महात्मनाम् ॥ २० ॥
पहले भी कौरवोंद्वारा पाण्डवोंका अपराध हुआ है; उससे तथा सेनापतिके वधसे महामना पाण्डवोंके हृदयमें आग सी लग गयी होगी, यह मेरा विश्वास है ॥ २० ॥
तेषां क्रोधं चिन्तयंस्तु अहःसु च निशासु च ।
न शान्तिमधिगच्छामि दुर्योधनकृतेन हि ।
कथं चाभून्महायुद्धं सर्वमाचक्ष्व संजय ॥ २१ ॥
दुर्योधनके कारण पाण्डवोंके मनमें जो क्रोध है, उसका चिन्तन करके मुझे न तो दिनमें शान्ति मिलती है, न रात्रिमें ही । संजय! वह महायुद्ध किस प्रकार हुआ, यह सब मुझे बताओ ॥ २१ ॥
संजय उवाच
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शृणु राजन् स्थिरो भूत्वा तवापनयनो महान् ।
न च दुर्योधने दोषमिममाधातुमर्हसि ॥ २२ ॥
संजयने कहा- राजन्! स्थिर होकर सुनिये । इस युद्धके होनेमें सबसे बड़ा अन्याय आपका ही है । इसका सारा दोष आपको दुर्योधनके ही माथे नहीं मढ़ना चाहिये ॥ २२ ॥
गतोदके सेतुबन्धो यादृक् तादृङ्मतिस्तव ।
संदीप्ते भवने यद्वत् कूपस्य खननं तथा ॥ २३ ॥
जैसे पानीकी बाढ़ निकल जानेपर पुल बाँधनेका प्रयास किया जाय अथवा घरमें आग लग जानेपर उसे बुझानेके लिये कुआँ खोदनेकी चेष्टा की जाय, उसी प्रकार आपकी यह समझ है ॥ २३ ॥
गतपूर्वाह्णभूयिष्ठे तस्मिन्नहनि दारुणे ।
तावकानां परेषां च पुनर्युद्धमवर्तत ॥ २४ ॥
उस भयंकर दिनके पूर्वभागका अधिकांश व्यतीत हो जानेपर आपके और पाण्डवोंके सैनिकोंमें पुनः युद्ध आरम्भ हुआ ॥ २४ ॥
श्वेतं तु निहतं दृष्ट्वा विराटस्य चमूपतिम् ।
कृतवर्मणा च सहितं दृष्ट्वा शल्यमवस्थितम् ॥ २५ ॥
शङ्खः क्रोधात् प्रजज्वाल हविषा हव्यवाडिव । विराटके सेनापति श्वेतको मारा गया और राजा शल्यको कृतवर्माके साथ रथपर बैठा हुआ देख शंख क्रोधसे जल उठा, मानो अग्निमें घीकी आहुति पड़ गयी हो ॥ २५३ ॥
स विस्फार्य महच्चापं शक्रचापोपमं बली ॥ २६ ॥
अभ्यधावज्जिघांसन् वै शल्यं मद्राधिपं युधि । उस बलवान् वीरने इन्द्रधनुषके समान अपने विशाल शरासनको कानोंतक खींचकर मद्रराज शल्यको युद्धमें मार डालनेकी इच्छासे उनपर धावा किया ॥ २६३ ॥
महता रथसंघेन समन्तात् परिरक्षितः ॥ २७ ॥
सृजन् बाणमयं वर्षं प्रायाच्छल्यरथं प्रति । विशाल रथसेनाके द्वारा सब ओरसे घिरकर बाणोंकी वर्षा करते हुए उसने शल्यके रथपर आक्रमण किया ॥ २७ ॥
तमापतन्तं सम्प्रेक्ष्य मत्तवारणविक्रमम् ॥ २८ ॥
तावकानां रथाः सप्त समन्तात् पर्यवारयन् ।
मद्रराजं परीप्सन्तो मृत्योर्दंष्ट्रान्तरं गतम् ॥ २ ९ ॥
मतवाले हाथीके समान पराक्रम प्रकट करनेवाले शंखको धावा करते देख आपके सात रथियोंने मौतके दाँतोंमें फँसे हुए मद्रराज शल्यको बचानेकी इच्छा रखकर उन्हें चारों ओरसे घेर लिया ॥ २८-२९ ॥ बृहद्बलश्च कौसल्यो जयत्सेनश्च मागधः ।
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तथा रुक्मरथो राजन् पुत्रः शल्यस्य मानितः ॥ ३० ॥
विन्दानुविन्दावावन्त्यौ काम्बोजश्च सुदक्षिणः ।
बृहत्क्षत्रस्य दायादः सैन्धवश्च जयद्रथः ॥ ३१ ॥
राजन्! उन रथियोंके नाम ये हैं- कोसलनरेश बृहद्बल, मगधदेशीय जयत्सेन, शल्यके प्रतापी पुत्र रुक्मरथ, अवन्ति- के राजकुमार विन्द और अनुविन्द, काम्बोजराज सुदक्षिण तथा बृहत्क्षत्रके पुत्र सिन्धुराज जयद्रथ ॥ ३०-३१ ॥
नानाधातुविचित्राणि कार्मुकाणि महात्मनाम् ।
विस्फारितान्यदृश्यन्त तोयदेष्विव विद्युतः ॥ ३२ ॥
इन महामना वीरोंके फैलाये हुए अनेक रूप- रंगके विचित्र धनुष बादलोंमें बिजलियोंके समान दृष्टिगोचर हो रहे थे ॥ ३२ ॥
ते तु बाणमयं वर्षं शङ्खमूर्ध्नि न्यपातयन् ।
निदाघान्तेऽनिलोद्धूता मेघा इव नगे जलम् ॥ ३३ ॥
उन सबने शंखके मस्तकपर बाणोंकी वर्षा आरम्भ कर दी, मानो ग्रीष्म ऋतुके अन्तमें वायुद्वारा उठाये हु मेघ पर्वतपर जल बरसा रहे हों ॥ ३३ ॥
ततः क्रुद्धो महेष्वासः सप्तभल्लैः सुतेजनैः ।
धनूंषि तेषामाच्छिद्य ननर्द पृतनापतिः ॥ ३४ ॥
उस समय महान् धनुर्धर सेनापति शंखने कुपित होकर तेज किये हुए भल्ल नामक सात बाणोंद्वारा उन सातों रथियोंके धनुष काटकर गर्जना की ॥ ३४ ॥
ततो भीष्मो महाबाहुर्विनद्य जलदो यथा ।
तालमात्रं धनुर्गृह्य शङ्खमभ्यद्रवद् रणे ॥ ३५ ॥
तदनन्तर महाबाहु भीष्मने मेघके समान गर्जना करके चार हाथ लंबा धनुष लेकर रणभूमिमें शंखपर धावा किया ॥ ३५ ॥
तमुद्यन्तमुदीक्ष्याथ महेष्वासं महाबलम् ।
संत्रस्ता पाण्डवी सेना वातवेगहतेव नौः ॥ ३६ ॥
उस समय महाधनुर्धर महाबली भीष्मको युद्धके लिये उद्यत देख पाण्डवसेना वायुके वेगसे डगमग होनेवाली नौकाकी भाँति काँपने लगी ॥ ३६ ॥
ततोऽर्जुनः संत्वरितः शङ्खस्यासीत् पुरःसरः ।
भीष्माद् रक्ष्योऽयमद्येति ततो युद्धमवर्तत ॥ ३७ ॥
यह देख अर्जुन तुरंत ही शंखके आगे आ गये । उनके आगे आनेका उद्देश्य यह था कि
आज भीष्मके हाथसे शंखको बचाना चाहिये । फिर तो महान् युद्ध आरम्भ हुआ ॥ ३७ ॥
हाहाकारो महानासीद् योधानां युधि युध्यताम् ।
तेजस्तेजसि सम्पृक्तमित्येवं विस्मयं ययुः ॥ ३८ ॥
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उस समय रणक्षेत्रमें जूझनेवाले योद्धाओंका महान् हाहाकार सब ओर फैल गया ।
तेजके साथ तेज टक्कर ले रहा है, यह कहते हुए सब लोग बड़े विस्मयमें पड़ गये ॥ ३८ ॥
अथ शल्यो गदापाणिरवतीर्य महारथात् ।
शङ्खस्य चतुरो वाहानहनद् भरतर्षभ ॥ ३ ९ ॥
भरतश्रेष्ठ! उस समय राजा शल्यने हाथमें गदा लिये अपने विशाल रथसे उतरकर शंखके चारों घोड़ोंको मार डाला ॥ ३ ९ ॥
स हताश्वाद् रथात् तूर्णं खड्गमादाय विद्रुतः ।
बीभत्सोश्च रथं प्राप्य पुनः शान्तिमविन्दत ॥ ४० ॥
घोड़े मारे जानेपर शंख तुरंत ही तलवार लेकर रथसे कूद पड़ा और अर्जुनके रथपर चढ़कर उसने पुनः शान्तिकी साँस ली ॥ ४० ॥
ततो भीष्मरथात् तूर्णमुत्पतन्ति पतत्त्रिणः ।
यैरन्तरिक्षं भूमिश्च सर्वतः समवस्तृता ॥ ४१ ॥
तत्पश्चात् भीष्मके रथसे शीघ्रतापूर्वक पंखयुक्त बाण पक्षीके समान उड़ने लगे, जिन्होंने पृथ्वी और आकाश सबको आच्छादित कर लिया ॥ ४१ ॥
पञ्चालानथ मत्स्यांश्च केकयांश्च प्रभद्रकान् ।
भीष्मः प्रहरतां श्रेष्ठः पातयामास पत्रिभिः ॥ ४२ ॥
योद्धाओंमें श्रेष्ठ भीष्म पांचाल, मत्स्य, केकय तथा प्रभद्रक वीरोंको अपने बाणोंसे मार- मारकर गिराने लगे ॥ ४२ ॥
उत्सृज्य समरे राजन् पाण्डवं सव्यसाचिनम् ।
अभ्यद्रवत पाञ्चाल्यं द्रुपदं सेनया वृतम् ॥ ४३ ॥
प्रियं सम्बन्धिनं राजन् शरानवकिरन् बहून् । राजन्! भीष्मने समरभूमिमें सव्यसाची अर्जुनको छोड़कर सेनासे घिरे हुए पांचालराज द्रुपदपर धावा किया और अपने प्रिय सम्बन्धीपर बहुत- से बाणोंकी वर्षा की ॥ ४३३ ॥
अग्निनेव प्रदग्धानि वनानि शिशिरात्यये ॥ ४४ ॥
शरदग्धान्यदृश्यन्त सैन्यानि द्रुपदस्य ह । जैसे ग्रीष्म-ऋतुमें आग लगनेसे सारे वन दग्ध हो जाते हैं, उसी प्रकार द्रुपदकी सारी सेनाएँ भीष्मके बाणोंसे दग्ध दिखायी देने लगीं ॥ ४४३ ॥
अत्यतिष्ठद् रणे भीष्मो विधूम इव पावकः ॥ ४५ ॥
मध्यंदिने यथाऽऽदित्यं तपन्तमिव तेजसा ।
न शेकुः पाण्डवेयस्य योधा भीष्मं निरीक्षितुम् ॥ ४६ ॥
उस समय भीष्म रणभूमिमें धूमरहित अग्निके समान खड़े थे। जैसे दुपहरीमें अपने तेजसे तपते हुए सूर्यकी ओर देखना कठिन है, उसी प्रकार पाण्डव-- सेनाके सैनिक भीष्मकी ओर दृष्टिपात करनेमें भी असमर्थ हो गये ॥ ४५-४६ ॥
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वीक्षांचक्रुः समन्तात् ते पाण्डवा भयपीडिताः ।
त्रातारं नाध्यगच्छन्त गावः शीतार्दिता इव ॥ ४७ ॥
पाण्डव योद्धा भयसे पीड़ित हो सब ओर देखने लगे; परंतु सर्दीसे पीड़ित हुई गौओंकी भाँति उन्हें अपना कोई रक्षक नहीं मिला ॥ ४७ ॥
सा तु यौधिष्ठिरी सेना गाङ्गेयशरपीडिता ।
सिंहेनेव विनिर्भिन्ना शुक्ला गौरिव गोपते ॥ ४८ ॥
राजन्! गंगानन्दन भीष्मके बाणोंसे पीड़ित हुई वह युधिष्ठिरकी (श्वेत-परिधानविभूषित ) सेना सिंहके द्वारा सतायी हुई सफेद गायके समान प्रतीत होने लगी ॥ ४८ ॥
हते विप्रद्रुते सैन्ये निरुत्साहे विमर्दिते ।
हाहाकारो महानासीत् पाण्डुसैन्येषु भारत ॥ ४ ९ ॥
भारत! पाण्डव- सेनाके सैनिक बहुत - से मारे गये, बहुतेरे भाग गये, कितने रौंद डाले गये और कितने ही उत्साहशून्य हो गये । इस प्रकार पाण्डवदलमें बड़ा हाहाकार मच गया था ॥ ४ ९ ॥
ततो भीष्मः शान्तनवो नित्यं मण्डलकार्मुकः ।
मुमोच बाणान् दीप्ताग्रानहीनाशीविषानिव ॥ ५० ॥
उस समय शान्तनुनन्दन भीष्म अपने धनुषको खींचकर गोल बना देते और उसके द्वारा विषैले सर्पोंकी भाँति भयंकर प्रज्वलित अग्रभागवाले बाणोंकी निरन्तर वर्षा करते थे ॥ ५० ॥
शरैरेकायनीकुर्वन् दिशः सर्वा यतव्रतः ।
जघान पाण्डवरथानादिश्यादिश्य भारत ॥ ५१ ॥
भारत! नियमपूर्वक व्रतोंका पालन करनेवाले भीष्म सम्पूर्ण दिशाओंमें बाणोंसे एक रास्ता बना देते और पाण्डवरथियोंको चुन- चुनकर –उनके नाम ले- लेकर मारते थे ॥ ५१ ॥
ततः सैन्येषु भग्नेषु मथितेषु च सर्वशः ।
प्राप्ते चास्तं दिनकरे न प्राज्ञायत किंचन ॥ ५२ ॥
इस प्रकार सारी सेना मथित हो उठी, व्यूह भंग हो गया और सूर्य अस्ताचलको चले गये; उस समय अँधेरेमें कुछ भी सूझ नहीं पड़ता था ॥ ५२ ॥
भीष्मं च समुदीर्यन्तं दृष्ट्वा पार्था महाहवे ।
अवहारमकुर्वन्त सैन्यानां भरतर्षभ ॥ ५३ ॥
भरतश्रेष्ठ! इधर, उस महान् युद्धमें भीष्मका वेग अधिकाधिक प्रचण्ड होता जा रहा था, यह देख कुन्तीके पुत्रोंने अपनी सेनाओंको युद्धक्षेत्रसे पीछे हटा लिया ॥ ५३ ॥
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इति श्रीमहाभारते भीष्मपर्वणि भीष्मवधपर्वणि शङ्खयुद्धे प्रथमदिवसावहारे एकोनपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ४ ९ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत भीष्मपर्वके अन्तर्गत भीष्मवधपर्वमें शंखका युद्ध तथा प्रथम दिनके युद्धका उपसंहारविषयक उनचासवाँ अध्याय पूराहुआ ॥ ४९ ॥
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पञ्चाशत्तमोऽध्यायः युधिष्ठिरकी चिन्ता, भगवान् श्रीकृष्णद्वारा आश्वासन, धृष्टद्युम्नका उत्साह तथा द्वितीय दिनके युद्धके लिये क्रौंचारुणव्यूहका निर्माण संजय उवाच
कृतेऽवहारे सैन्यानां प्रथमे भरतर्षभ ।
भीष्मे च युद्धसंरब्धे हृष्टे दुर्योधने तथा ॥ १ ॥
धर्मराजस्ततस्तूर्णमभिगम्य जनार्दनम् ।
भ्रातृभिः सहितः सर्वैः सर्वैश्चैव जनेश्वरैः ॥ २ ॥
शुचा परमया युक्तश्चिन्तयानः पराजयम् ।
वार्ष्णेयमब्रवीद् राजन् दृष्ट्वा भीष्मस्य विक्रमम् ॥ ३ ॥
संजय कहते हैं— भरतश्रेष्ठ! प्रथम दिनके युद्धमें जब पाण्डव - सेना पीछे हटा दी गयी, भीष्मजीका युद्धविषयक उत्साह बढ़ता ही गया और दुर्योधन हर्षातिरेकसे उल्लसित हो उठा, उस समय धर्मराज युधिष्ठिर अपने सभी भाइयों और सम्पूर्ण राजाओंके साथ तुरंत भगवान् श्रीकृष्णके पास गये और अत्यन्त शोकसे संतप्त हो भीष्मका पराक्रम देखकर अपनी पराजयके लिये चिन्ता करते हुए भगवान् श्रीकृष्णसे इस प्रकार बोले— ॥ १-३ ॥
कृष्ण पश्य महेष्वासं भीष्मं भीमपराक्रमम् ।
शरैर्दहन्तं सैन्यं मे ग्रीष्मे कक्षमिवानलम् ॥ ४ ॥
' श्रीकृष्ण! देखिये, महान् धनुर्धर और भयंकर पराक्रमी भीष्म अपने बाणोंद्वारा मेरी सेनाको उसी प्रकार दग्ध कर रहे हैं, जैसे ग्रीष्म ऋतुमें लगी हुई आग घास--फूँसको जलाकर भस्म कर डालती है ॥ ४ ॥
कथमेनं महात्मानं शक्ष्यामः प्रतिवीक्षितुम् ।
लेलिह्यमानं सैन्यं मे हविष्मन्तमिवानलम् ॥ ५ ॥
‘जैसे अग्निदेव प्रज्वलित होकर हविष्यकी आहुति ग्रहण करते हैं, उसी प्रकार ये महामना भीष्म अपनी बाणरूपी जिह्वासे मेरी सेनाको चाटते जा रहे हैं। हमलोग कैसे इनकी ओर देख सकेंगे - किस प्रकार इनका सामना कर सकेंगे? ॥ ५ ॥
एतं हि पुरुषव्याघ्रं धनुष्मन्तं महाबलम् ।
दृष्ट्त्वा विप्रद्रुतं सैन्यं समरे मार्गणाहतम् ॥ ६ ॥
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' हाथमें धनुष लिये इन महाबली पुरुषसिंह भीष्मको देखकर और समरभूमिमें इनके बाणोंसे आहत होकर मेरी सारी सेना भागने लगती है ॥ ६ ॥
शक्यो जेतुं यमः क्रुद्धो वज्रपाणिश्च संयुगे ॥ वरुणः पाशभृद् वापि कुबेरो वा गदाधरः ॥ ७ ॥
न तु भीष्मो महातेजाः शक्यो जेतुं महाबलः । ' क्रोधमें भरे हुए यमराज, वज्रधारी इन्द्र, पाशधारी वरुण अथवा गदाधारी कुबेर भी कदाचित् युद्धमें जीते जा सकते हैं; परंतु महातेजस्वी, महाबली भीष्मको जीतना अशक्य है ॥ ७३ ॥
सोऽहमेवंगते मग्नो भीष्मागाधजलेऽप्लवे ॥ ८ ॥
आत्मनो बुद्धिदौर्बल्याद् भीष्ममासाद्य केशव । ‘ केशव! ऐसी दशामें मैं तो अपनी बुद्धिकी दुर्बलताके कारण भीष्मसे टक्कर लेकर भीष्मरूपी अगाध जलराशिमें नावके बिना डूबा जा रहा हूँ ॥ ८३ ॥
वनं यास्यामि वार्ष्णेय श्रेयो मे तत्र जीवितुम् ॥ ९ ॥
न त्वेतान् पृथिवीपालान् दातुं भीष्माय मृत्यवे । ‘ वार्ष्णेय! अब मैं वनको चला जाऊँगा । वहीं जीवन बिताना मेरे लिये कल्याणकारी होगा । इन भूपालोंको व्यर्थ ही भीष्मरूपी मृत्युको सौंप देनेमें कोई भलाई नहीं है ॥ ९ ३ ॥ क्षपयिष्यति सेनां मे कृष्ण भीष्मो महास्त्रवित् ॥ १० ॥
यथानलं प्रज्वलितं पतङ्गाः समभिद्रुताः ।
विनाशायोपगच्छन्ति तथा मे सैनिको जनः ॥ ११ ॥
‘ श्रीकृष्ण! भीष्म महान् दिव्यास्त्रोंके ज्ञाता हैं । वे मेरी सारी सेनाका संहार कर डालेंगे । जैसे पतिंगे मरनेके लिये ही जलती आगमें कूद पड़ते हैं, उसी प्रकार मेरे समस्त सैनिक अपने विनाशके लिये ही भीष्मके समीप जाते हैं ॥ १०-११ ॥
क्षयं नीतोऽस्मि वार्ष्णेय राज्यहेतोः पराक्रमी ।
भ्रातरश्चैव मे वीराः कर्शिताः शरपीडिताः ॥ १२ ॥
‘ वार्ष्णेय! राज्यके लिये पराक्रम करके मैं सब प्रकारसे क्षीण होता जा रहा हूँ । मेरे वीर भ्राता बाणोंसे पीड़ित होकर अत्यन्त कृश होते जा रहे हैं ॥ १२ ॥
मत्कृते भ्रातृहार्देन राज्याद् भ्रष्टास्तथा सुखात् ।
जीवितं बहु मन्येऽहं जीवितं ह्यद्य दुर्लभम् ॥ १३ ॥
‘ ये बन्धुजनोचित सौहार्दके कारण मेरे लिये राज्य और सुखसे वंचित हो दुःख भोग रहे हैं । इस समय मैं इनके और अपने जीवनको ही बहुत अच्छा समझता हूँ; क्योंकि अब जीवन भी दुर्लभ है ॥ १३ ॥
जीवितस्य च शेषेण तपस्तप्स्यामि दुश्चरम् ।
न घातयिष्यामि रणे मित्राणीमानि केशव ॥ १४ ॥
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' केशव! जीवन बच जानेपर मैं दुष्कर तपस्या करूँगा; परंतु रणक्षेत्रमें इन मित्रोंकी व्यर्थ हत्या नहीं कराऊँगा ॥ १४ ॥
रथान् मेमे बहुसाहस्रान् दिव्यैरस्त्रैर्महाबलः ।
घातयत्यनिशं भीष्मः प्रवराणां प्रहारिणाम् ॥ १५ ॥
' महाबली भीष्म अपने दिव्य अस्त्रोंद्वारा मेरे पक्षके श्रेष्ठ एवं प्रहारकुशल कई सहस्र रथियोंका निरन्तर संहार कर रहे हैं ॥ १५ ॥
किं नुकृत्वा हितं मे स्याद् ब्रूहि माधव माचिरम् ।
मध्यस्थमिव पश्यामि समरे सव्यसाचिनम् ॥ १६ ॥
‘ माधव! शीघ्र बताइये, क्या करनेसे मेरा हित होगा? सव्यसाची अर्जुनको तो मैं इस युद्धमें मध्यस्थ ( उदासीन ) - सा देख रहा हूँ ॥ १६ ॥
एको भीमः परं शक्त्या युध्यत्येव महाभुजः ।
केवलं बाहुवीर्येण क्षत्रधर्ममनुस्मरन् ॥ १७ ॥
‘ एकमात्र महाबाहु भीमसेन ही क्षत्रिय धर्मका विचार करता हुआ केवल बाहुबलके भरोसे अपनी पूरी शक्ति लगाकर युद्ध कर रहा है ॥ १७ ॥
गदया वीरघातिन्या यथोत्साहं महामनाः ।
करोत्यसुकरं कर्म रथाश्वनरदन्तिषु ॥ १८ ॥
‘ महामना भीमसेन उत्साहपूर्वक अपनी वीरघातिनी गदाके द्वारा रथ, घोड़े, मनुष्य और हाथियोंपर अपना दुष्कर पराक्रम प्रकट कर रहा है ॥ १८ ॥
नालमेष क्षयं कर्तुं परसैन्यस्य मारिष ।
आर्जवेनैव युद्धेन वीर वर्षशतैरपि ॥ १ ९ ॥
' माननीय वीर श्रीकृष्ण! यदि इस तरह सरलतापूर्वक ही युद्ध किया जाय तो यह भीमसेन अकेला सौ वर्षोंमें भी शत्रु सेनाका विनाश नहीं कर सकता ॥ १ ९ ॥
एकोऽस्त्रवित् सखा तेऽयं सोऽप्यस्मान् समुपेक्षते ।
निर्दह्यमानान् भीष्मेण द्रोणेन च महात्मना ॥ २० ॥
‘ केवल आपका यह सखा अर्जुन ही दिव्यास्त्रोंका ज्ञाता है, परंतु यह भी महामना भीष्म और द्रोणके द्वारा दग्ध होते हुए हमलोगोंकी उपेक्षा कर रहा है ॥ २० ॥
दिव्यान्यस्त्राणि भीष्मस्य द्रोणस्य च महात्मनः ।
धक्ष्यन्ति क्षत्रियान् सर्वान् प्रयुक्तानि पुनः पुनः ॥ २१ ॥
' महामना भीष्म और द्रोणके दिव्यास्त्र बार- बार प्रयुक्त होकर सम्पूर्ण क्षत्रियोंको भस्म कर डालेंगे ॥ २१ ॥
कृष्ण भीष्मः सुसंरब्धः सहितः सर्वपार्थिवैः ।
क्षपयिष्यति नो नूनं यादृशोऽस्य पराक्रमः ॥ २२ ॥
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‘ श्रीकृष्ण! भीष्म क्रोधमें भरकर अपने पक्षके समस्त राजाओंके साथ मिलकर निश्चय ही हमलोगोंका विनाश कर देंगे । जैसा उनका पराक्रम है, उससे यही सूचित होता है ॥ २२ ॥
स त्वं पश्य महाभाग योगेश्वर महारथम् ।
भीष्मं यः शमयेत् संख्ये दावाग्निं जलदो यथा ॥ २३ ॥
‘ महाभाग योगेश्वर! आप ऐसे किसी महारथीको ढूँढ निकालिये, जो संग्रामभूमिमें भीष्मको उसी प्रकार शान्त कर दे, जैसे बादल दावानलको बुझा देता है ॥ २३ ॥
तव प्रसादाद् गोविन्द पाण्डवा निहतद्विषः ।
स्वराज्यमनुसम्प्राप्ता मोदिष्यन्ते सबान्धवाः ॥ २४ ॥
‘ गोविन्द! आपकी कृपासे ही पाण्डव अपने शत्रुओंको मारकर स्वराज्य प्राप्त करके बन्धु - बान्धवोंसहित सुखी होंगे ' ॥ २४ ॥
एवमुक्त्वा ततः पार्थो ध्यायन्नास्ते महामनाः ।
चिरमन्तर्मना भूत्वा शोकोपहतचेतनः ।
शोकर्तं तमथो ज्ञात्वा दुःखोपहतचेतसम् ॥ २५ ॥
अब्रवीत् तत्र गोविन्दो हर्षयन् सर्वपाण्डवान् । ऐसा कहकर महामना युधिष्ठिर शोकसे व्याकुल- चित्त हो बहुत देरतक मनको अन्तर्मुख करके ध्यानमग्न बैठे रहे । युधिष्ठिरको शोकसे आतुर और दुःखसे व्यथितचित्त जानकर गोविन्दने समस्त पाण्डवोंका हर्ष बढ़ाते हुए कहा – ॥ २५३ ॥
मा शुचो भरतश्रेष्ठ न त्वं शोचितुमर्हसि ॥ २६ ॥
यस्य ते भ्रातरः शूराः सर्वलोकेषु धन्विनः ।
अहं च प्रियकृद् राजन् सात्यकिश्च महायशाः ॥ २७ ॥
विराटद्रुपदौ चेमौ धृष्टद्युम्नश्च पार्षतः ।
तथैव सबलाश्चेमे राजानो राजसत्तम ॥ २८ ॥
त्वत्प्रसादं प्रतीक्षन्ते त्वद्भक्ताश्च विशाम्पते । ‘ भरतश्रेष्ठ! तुम शोक न करो । इस प्रकार शोक करना तुम्हारेयोग्य नहीं है । तुम्हारे शूरवीर भाई सम्पूर्ण लोकोंमें विख्यात धनुर्धर हैं । राजन्! मैं भी तुम्हारा प्रिय करनेवाला ही हूँ । नृपश्रेष्ठ! महायशस्वी सात्यकि, विराट, द्रुपद, द्रुपदपुत्र धृष्टद्युम्न तथा सेनासहित ये सम्पूर्ण नरेश आपके कृपाप्रसादकी प्रतीक्षा करते हैं । महाराज! ये सब - के - सब आपके भक्त हैं ॥ २६–२८३ ॥ एष ते पार्षतो नित्यं हितकामः प्रिये रतः ॥ २९ ॥
सैनापत्यमनुप्राप्तो धृष्टद्युम्नो महाबलः । 'ये द्रुपदपुत्र महाबली धृष्टद्युम्न भी सदा आपका हित चाहते हैं और आपके प्रिय-साधनमें तत्पर होकर ही इन्होंने प्रधान सेनापतिका गुरुतर भार ग्रहण किया है ॥ २ ९ ३ ॥