03.Mahabharata Volume 3 — पृष्ठ 1821–1830
महाभारत — खण्ड ३ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1821–1830
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तत्र सौबलकाः क्रुद्धा वार्ष्णेयस्य रथोत्तमम् ।
तिलशश्चिच्छिदुः क्रोधाच्छस्त्रैर्नानाविधैर्युधि ॥ ८ ॥
वहाँ जाते ही क्रोधमें भरे हुए सुबलपुत्रोंने युद्ध -स्थलमें नाना प्रकारके अस्त्र- शस्त्रोंद्वारा सात्यकिके श्रेष्ठ रथको रोषपूर्वक तिल- तिल करके काट डाला ॥ ८ ॥
सात्यकिस्तु रथं त्यक्त्वा वर्तमाने भयावहे ।
अभिमन्यो रथं तूर्णमारुरोह परंतपः ॥ ९ ॥
तब शत्रुओंको संताप देनेवाले सात्यकि उस समय छिड़े हुए भयंकर संग्राममें अपने टूटे हुए रथको त्यागकर तुरंत ही अभिमन्युके रथपर जा बैठे ॥ ९ ॥
तावेकरथसंयुक्तौ सौबलेयस्य वाहिनीम् ।
व्यधमेतां शितैस्तूर्णं शरैः संनतपर्वभिः ॥ १० ॥
फिर एक ही रथपर बैठे हुए वे दोनों वीर झुकी हुई गाँठवाले पैने बाणोंसे तुरंत ही सुबलपुत्र शकुनिकी सेनाका संहार करने लगे ॥ १० ॥
द्रोणभीष्मौ रणे यत्तौ धर्मराजस्य वाहिनीम् ।
नाशयेतां शरैस्तीक्ष्णैः कङ्कपत्रपरिच्छदैः ॥ ११ ॥
इसी प्रकार एक ओरसे आकर युद्धके लिये सदा उद्यत रहनेवाले द्रोणाचार्य और भीष्मने कंकपक्षीके पंखोंसे युक्त तीखे बाणोंद्वारा धर्मराज युधिष्ठिरकी सेनाका विनाश आरम्भ कर दिया ॥ ११ ॥
ततो धर्मसुतो राजा माद्रीपुत्रौ च पाण्डवौ ।
मिषतां सर्वसैन्यानां द्रोणानीकमुपाद्रवन् ॥ १२ ॥
तब धर्मपुत्र राजा युधिष्ठिर तथा माद्रीकुमार पाण्डुनन्दन नकुल सहदेवने समस्त सेनाओंके देखते -देखते द्रोणाचार्यकी सेनापर धावा किया ॥ १२ ॥
तत्रासीत् सुमहद् युद्धं तुमुलं लोमहर्षणम् ।
यथा देवासुरं युद्धं पूर्वमासीत् सुदारुणम् ॥ १३ ॥
जैसे पूर्वकालमें अत्यन्त भयंकर देवासुर संग्राम हुआ था, उसी प्रकार वहाँ अत्यन्त भयानक रोमांचकारी युद्ध होने लगा ॥ १३ ॥
कुर्वाणौ सुमहत् कर्म भीमसेनघटोत्कचौ । ( दुर्योधनस्य महतीं द्रावयामास वाहिनीम् । ) दुर्योधनस्ततोऽभ्येत्य तावुभावप्यवारयत् ॥ १४ ॥
दूसरी ओर भीमसेनने और घटोत्कचने महान् पराक्रमका परिचय देते हुए दुर्योधनकी विशाल वाहिनीको खदेड़ना आरम्भ किया । उस समय दुर्योधनने सामने आकर उन दोनोंको रोक दिया ॥ १४ ॥
तत्राद्भुतमपश्याम हैडिम्बस्य पराक्रमम् ।
अतीत्य पितरं युद्धे यदयुध्यत भारत ॥ १५ ॥
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भारत! वहाँ हमने हिडिम्बापुत्र घटोत्कचका अद्भुत पराक्रम देखा । वह रणक्षेत्रमें पितासे भी बढ़कर पुरुषार्थ प्रकट करते हुए युद्ध कर रहा था ॥ १५ ॥
भीमसेनस्तु संक्रुद्धो दुर्योधनममर्षणम् ।
हृद्यविध्यत् पृषत्केन प्रहसन्निव पाण्डवः ॥ १६ ॥
क्रोधमें भरे हुए पाण्डुनन्दन भीमसेनने हँसते हुए- से एक बाण मारकर अमर्षशील दुर्योधनकी छाती छेद डाली ॥ १६ ॥
ततो दुर्योधनो राजा प्रहारवरपीडितः ।
निषसाद रथोपस्थे कश्मलं च जगाम ह ॥ १७ ॥
तब उस बाणके गहरे आघातसे पीड़ित हो राजा दुर्योधन रथकी बैठकमें बैठ गया और उसे मूर्च्छा आ गयी ॥ १७ ॥
तं विसंज्ञं विदित्वा तु त्वरमाणोऽस्य सारथिः ।
अपोवाह रणाद् राजंस्ततः सैन्यमभज्यत ॥ १८ ॥
राजन्! उसे संज्ञाशून्य जानकर उसका सारथि बड़ी उतावलीके साथ उसे रणभूमिसे बाहर ले गया । फिर तो उसकी सेनामें भगदड़ मच गयी ॥ १८ ॥
ततस्तां कौरवीं सेनां द्रवमाणां समन्ततः ।
निघ्नन् भीमः शरैस्तीक्ष्णैरनुवव्राज पृष्ठतः ॥ १ ९ ॥
तब चारों ओर भागती हुई उस कौरव सेनापर तीखे बाणोंका प्रहार करते हुए भीमसेन उसे पीछे - से खदेड़ने लगे ॥ १ ९ ॥
पार्षतश्च रथश्रेष्ठो धर्मपुत्रश्च पाण्डवः ।
द्रोणस्य पश्यतः सैन्यं गाङ्गेयस्य च पश्यतः ॥ २० ॥
जघ्नतुर्विशिखैस्तीक्ष्णैः परानीकविनाशनैः । दूसरी ओरसे रथियोंमें श्रेष्ठ द्रुपदकुमार धृष्टद्युम्न तथा धर्मपुत्र युधिष्ठिर शत्रु- सेनाका विनाश करनेवाले तीखे बाणोंद्वारा द्रोणाचार्य और भीष्मके देखते- देखते कौरव सेनाको पीड़ित करते हुए उसका पीछा करने लगे ॥ २० ॥
द्रवमाणं तु तत् सैन्यं तव पुत्रस्य संयुगे ॥ २१ ॥
नाशक्नुतां वारयितुं भीष्मद्रोणौ महारथौ । महाराज! उस युद्धस्थलमें आपके पुत्रकी भागती हुई सेनाको महारथी द्रोण और भीष्म भी रोक न सके ॥ २१ ॥
वार्यमाणं च भीष्मेण द्रोणेन च महात्मना ॥ २२ ॥
विद्रवत्येव तत् सैन्यं पश्यतोर्द्रोणभीष्मयोः । महामना भीष्म और द्रोणके रोकनेपर भी उनके सामने ही वह सेना भागती ही चली जा रही थी ॥ २२ ॥
ततो रथसहस्रेषु विद्रवत्सु ततस्ततः ॥ २३ ॥
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तावास्थितावेकरथं सौभद्रशिनिपुङ्गवी ।
सौबलीं समरे सेनां शातयेतां समन्ततः ॥ २४ ॥
उधर सहस्रों रथी जब इधर - उधर भाग रहे थे, उसी समय एक रथपर बैठे हुए अभिमन्यु और सात्यकि सुबलपुत्रकी सेनाका संग्रामभूमिमें सब ओरसे संहार करने लगे ॥ २३-२४ ॥
शुशुभाते तदा तौ तु शैनेयकुरुपुङ्गवौ ।
अमावास्यां गतौ यद्वत् सोमसूर्यौ नभस्तले ॥ २५ ॥
उस अवसरपर ( एक रथमें बैठे हुए ) सात्यकि और अभिमन्यु उसी प्रकार शोभा पा रहे थे, जैसे अमावास्या तिथिको आकाशमें सूर्य और चन्द्रमा एक ही स्थानमें सुशोभित होते हैं ॥ २५ ॥
अर्जुनस्तु ततः क्रुद्धस्तव सैन्यं विशाम्पते ।
ववर्ष शरवर्षेण धाराभिरिव तोयदः ॥ २६ ॥
प्रजानाथ! तदनन्तर क्रोधमें भरे हुए अर्जुन आपकी सेनापर उसी प्रकार बाणोंकी वर्षा करने लगे, जैसे बादल पानीकी धारा बरसाता है ॥ २६ ॥
वध्यमानं ततस्तत्र शरैः पार्थस्य संयुगे ।
दुद्राव कौरवं सैन्यं विषादभयकम्पितम् ॥ २७ ॥
तब पार्थके बाणोंसे संग्रामभूमिमें पीड़ित हुई कौरव सेना विषाद और भयसे काँपती हुई इधर - उधर भाग चली ॥ २७ ॥
द्रवतस्तान् समालक्ष्य भीष्मद्रोणौ महारथौ ।
न्यवारयेतां संरब्धौ दुर्योधनहितैषिणौ ॥ २८ ॥
उन योद्धाओंको भागते देख दुर्योधनका हित चाहनेवाले महारथी भीष्म और द्रोण क्रोधपूर्वक उन्हें रोकने लगे ॥ २८ ॥
ततो दुर्योधनो राजा समाश्वस्य विशाम्पते ।
न्यवर्तयत तत् सैन्यं द्रवमाणं समन्ततः ॥ २९ ॥
प्रजानाथ! इसी बीचमें राजा दुर्योधनकी मूर्च्छा दूर हो गयी और उसने आश्वस्त होकर चारों ओर भागती हुई सेनाको पुनः लौटाया ॥ २ ९ ॥
यत्र यत्र सुतस्तुभ्यं यं यं पश्यति भारत ।
तत्र तत्र न्यवर्तन्त क्षत्रियाणां महारथाः ॥ ३० ॥
भारत! आपका पुत्र दुर्योधन जहाँ -जहाँ जिस- जिसकी ओर दृष्टिपात करता, वहीं-वहींसे ऐसे योद्धा भी लौट आते थे जो क्षत्रियोंमें महारथी थे ॥ ३० ॥
तान् निवृत्तान् समीक्ष्यैव ततोऽन्येऽपीतरे जनाः ।
अन्योन्यस्पर्धया राजल्लज्जया चावतस्थिरे ॥ ३१ ॥
राजन्! उन सबको लौटते देख दूसरे लोग भी एक-दूसरेकी स्पर्धा तथा लज्जाके कारण ठहर गये ॥ ३१ ॥
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पुनरावर्ततां तेषां वेग आसीद् विशाम्पते ।
पूर्वतः सागरस्येव चन्द्रस्योदयनं प्रति ॥ ३२ ॥
महाराज! पुनः लौटते हुए उन योद्धाओंका महान् वेग चन्द्रोदयके समय बढ़ते हुए महासागरके समान जान पड़ता था ॥ ३२ ॥
संनिवृत्तांस्ततस्तांस्तु दृष्ट्वा राजा सुयोधनः ।
अब्रवीत् त्वरितो गत्वा भीष्मं शान्तनवं वचः ॥ ३३ ॥
तब उन सबको लौटा हुआ देख राजा दुर्योधन तुरंत ही शान्तनुनन्दन भीष्मके पास जाकर बोला-- ॥ ३३ ॥
पितामह निबोधेदं यत् त्वां वक्ष्यामि भारत ।
नानुरूपमहं मन्ये त्वयि जीवति कौरव ॥ ३४ ॥
द्रोणे चास्त्रविदां श्रेष्ठे सपुत्रे ससुहृज्जने ।
कृपे चैव महेष्वासे द्रवते यद् वरूथिनी ॥ ३५ ॥
‘ पितामह भरतनन्दन! मैं आपसे जो कुछ कहता हूँ, उसे सुनिये । कुरुनन्दन! आपके, अस्त्रवेत्ताओंमें श्रेष्ठ द्रोणाचार्यके और महाधनुर्धर कृपाचार्यके पुत्रों और सुहृदोंसहित जीते-जी जो मेरी सेना भाग रही है, इसे मैं आपलोगोंके योग्य नहीं मानता हूँ ॥ ३४-३५ ॥
न पाण्डवान् प्रतिबलांस्तव मन्ये कथंचन ।
तथा द्रोणस्य संग्रामे द्रौणेश्चैव कृपस्य च ॥ ३६ ॥
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' मैं किसी तरह यह नहीं मान सकता कि पाण्डव संग्राममें आपके, द्रोणाचार्यके, कृपाचार्यके और अश्वत्थामाके समान बलवान् हैं ॥ ३६ ॥
अनुग्राह्याः पाण्डुसुतास्तव नूनं पितामह ।
यथेमां क्षमसे वीर वध्यमानां वरूथिनीम् ॥ ३७ ॥
' वीर पितामह! निश्चय ही पाण्डव आपके कृपापात्र हैं, तभी तो मेरी सेनाका वध हो रहा है और आप चुपचाप इसकी दुर्दशाको सहते चले जा रहे हैं ॥
सोऽस्मि वाच्यस्त्वया राजन् पूर्वमेव समागमे ।
न योत्स्ये पाण्डवान् संख्ये नापि पार्षतसात्यकी ॥ ३८ ॥
‘ महाराज! यदि पाण्डवोंपर दया ही करनी थी तो आप युद्ध आरम्भ होनेके पहले ही मुझे यह बता देते कि मैं संग्रामभूमिमें पाण्डुपुत्रोंसे, धृष्टद्युम्नसे और सात्यकिसे भी युद्ध नहीं करूँगा ॥ ३८ ॥
श्रुत्वा तु वचनं तुभ्यमाचार्यस्य कृपस्य च ।
कर्णेन सहितः कृत्यं चिन्तयानस्तदैव हि ॥ ३ ९ ॥
‘ उस अवस्थामें आपका, आचार्यका तथा कृपका वचन सुनकर मैं कर्णके साथ उसी समय अपने कर्तव्यका निश्चय कर लेता ॥ ३ ९ ॥
यदि नाहं परित्याज्यो युवाभ्यामिह संयुगे ।
विक्रमेणानुरूपेण युध्येतां पुरुषर्षभौ ॥ ४० ॥
‘ यदि युद्धमें आप दोनोंको मेरा परित्याग करना उचित नहीं जान पड़ता हो तो द्रोणाचार्य और आप दोनों श्रेष्ठ पुरुष अपने योग्य पराक्रम प्रकट करते हुए युद्ध कीजिये' ॥ ४० ॥
एतच्छ्रुत्वा वचो भीष्मः प्रहसन् वै मुहुर्मुहुः ।
अब्रवीत् तनयं तुभ्यं क्रोधादुद्धृत्य चक्षुषी ॥ ४१ ॥
यह सुनकर भीष्म बारंबार हँसकर क्रोधसे आँखें तरेरते हुए आपके पुत्रसे बोले - ॥ ४१ ॥
बहुशोऽसि मया राजंस्तथ्यमुक्तो हितं वचः ।
अजेयाः पाण्डवा युद्धे देवैरपि सवासवैः ॥ ४२ ॥
‘ राजन्! मैंने तुमसे अनेक बार यह सत्य और हितकी बात बतायी है कि युद्धमें पाण्डवोंको इन्द्र आदि देवता भी जीत नहीं सकते ॥ ४२ ॥
यत् तु शक्यं मया कर्तुं वृद्धेनाद्य नृपोत्तम ।
करिष्यामि यथाशक्ति प्रेक्षेदानीं सबान्धवः ॥ ४३ ॥
' नृपश्रेष्ठ! तो भी मुझ वृद्धके द्वारा जो कुछ किया जा सकता है, उसे आज यथाशक्ति करूँगा । तुम इस समय अपने भाइयोंसहित देखो ॥ ४३ ॥
अद्य पाण्डुसुतानेकः ससैन्यान् सह बन्धुभिः ।
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सोऽहं निवारयिष्यामि सर्वलोकस्य पश्यतः ॥ ४४ ॥
‘ आज मैं अकेला ही सबके देखते - देखते सेना और बन्धुओंसहित समस्त पाण्डवोंको आगे बढ़नेसे रोक दूँगा' ॥ ४४ ॥
एवमुक्ते तु भीष्मेण पुत्रास्तव जनेश्वर ।
दध्मुः शङ्खान् मुदा युक्ता भेरी: संजघ्निरे भृशम् ॥ ४५ ॥
जनेश्वर! भीष्मके ऐसा कहनेपर आपके पुत्र आनन्दमग्न होकर जोर- जोरसे शंख बजाने और डंका पीटने लगे ॥ ४५ ॥
पाण्डवा हि ततो राजन् श्रुत्वा तं निनदं महत् ।
दध्मुः शङ्खांश्च भेरीश्च मुरजांश्चाप्यनादयन् ॥ ४६ ॥
राजन्! उनका वह महान् शंखनाद सुनकर पाण्डववीर शंख बजाने तथा नगारे और ढोल पीटने लगे ॥ इति श्रीमहाभारते भीष्मपर्वणि भीष्मवधपर्वणि तृतीये युद्धदिवसे भीष्मदुर्योधनसंवादे अष्टपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५८ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत भीष्मपर्वके अन्तर्गत भीष्मवधपर्वमें तृतीय युद्धदिवसमें भीष्म और दुर्योधनका संवादविषयक अट्ठावनवाँ अध्याय पूराहुआ ॥ ५८ ॥
[ दाक्षिणात्य अधिक पाठका श्लोक मिलाकर कुछ ४६३ श्लोक हैं ]
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एकोनषष्टितमोऽध्यायः भीष्मका पराक्रम, श्रीकृष्णका भीष्मको मारनेके लिये उद्यत होना, अर्जुनकी प्रतिज्ञा और उनके द्वारा कौरव- सेनाकी पराजय, तृतीय दिवसके युद्धकी समाप्ति धृतराष्ट्रउवाच
प्रतिज्ञाते ततस्तस्मिन् युद्धे भीष्मेण दारुणे ।
क्रोधितो मम पुत्रेण दुःखितेन विशेषतः ॥ १ ॥
भीष्मः किमकरोत् तत्र पाण्डवेयेषु संयुगे ।
पितामहे वा पञ्चालास्तन्ममाचक्ष्व संजय ॥ २ ॥
धृतराष्ट्रने पूछा – संजय! उस भयंकर युद्धमें जब भीष्मने मेरे विशेष दुःखी हुए पुत्रके क्रोध दिलानेपर प्रतिज्ञा कर ली, तब उन्होंने उस युद्धस्थलमें पाण्डवोंके प्रति क्या किया? तथा पांचाल योद्धाओंने पितामह भीष्मके प्रति क्या किया? ॥ १-२ ॥ संजय उवाच
गतपूर्वाह्णभूयिष्ठे तस्मिन्नहनि भारत ।
पश्चिमां दिशमास्थाय स्थिते चापि दिवाकरे ॥ ३ ॥
जयं प्राप्तेषु हृष्टेषु पाण्डवेषु महात्मसु ।
सर्वधर्मविशेषज्ञः पिता देवव्रतस्तव ॥ ४ ॥
अभ्ययाज्जवनैरश्वैः पाण्डवानामनीकिनीम् ।
महत्या सेनया गुप्तस्तव पुत्रैश्च सर्वशः ॥ ५ ॥
संजयने कहा — भारत! उस दिन जब पूर्वाह्णकालका अधिक भाग व्यतीत हो गया, सूर्यदेव पश्चिम दिशामें जाकर स्थित हुए और विजयको प्राप्त हुए महामना पाण्डव खुशी मनाने लगे, उस समय सब धर्मोंके विशेषज्ञ आपके ताऊ भीष्मजीने वेगशाली अश्वोंद्वारा पाण्डवोंकी सेनापर आक्रमण किया । उनके साथ विशाल सेना चली और आपके पुत्र सब ओरसे उनकी रक्षा करने लगे ॥ ३-५ ॥
प्रावर्तत ततो युद्धं तुमुलं लोमहर्षणम् ।
अस्माकं पाण्डवैः सार्धमनयात् तव भारत ॥ ६ ॥
भारत! तदनन्तर आपके अन्यायसे हमलोगोंका पाण्डवोंके साथ रोमांचकारी भयंकर संग्राम होने लगा ॥ ६ ॥
धनुषां कूजतां तत्र तलानां चाभिहन्यताम् ।
महान् समभवच्छब्दो गिरीणामिव दीर्यताम् ॥ ७ ॥
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उस समय वहाँ धनुषोंकी टंकार तथा हथेलियोंके आघातसे पर्वतोंके विदीर्ण होनेके समान बड़े जोरसे शब्द होता था ॥ ७ ॥
तिष्ठ स्थितोऽस्मि विद्धेनं निवर्तस्व स्थिरो भव ।
स्थिरोऽस्मि प्रहरस्वेति शब्दोऽश्रूयत सर्वशः ॥ ८ ॥
उस समय ‘ खड़े रहो, खड़ा हूँ, इसे बींध डालो, लौटो, स्थिर भावसे रहो, हाँ-हाँ स्थिरभावसे ही हूँ, तुम प्रहार करो ' ऐसे शब्द सब ओर सुनायी पड़ते थे ॥ ८ ॥
काञ्चनेषु तनुत्रेषु किरीटेषु ध्वजेषु च ।
शिलानामिव शैलेषु पतितानामभूद् ध्वनिः ॥ ९ ॥
जब सोनेके कवचों, किरीटों और ध्वजोंपर योद्धाओं के अस्त्र- शस्त्र टकराते, तब उनसे पर्वतोंपर गिरकर टकरानेवाली शिलाओंके समान भयानक शब्द होता था ॥ ९ ॥
पतितान्युत्तमाङ्गानि बाहवश्च विभूषिताः ।
व्यचेष्टन्त महीं प्राप्य शतशोऽथ सहस्रशः ॥ १० ॥
सैनिकोंके सैकड़ों- हजारों मस्तक तथा स्वर्ण- भूषित भुजाएँ कट- कटकर पृथ्वीपर गिरने और तड़पने लगीं ॥ १० ॥
हतोत्तमाङ्गाः केचित् तु तथैवोद्यतकार्मुकाः ।
प्रगृहीतायुधाश्चापि तस्थुः पुरुषसत्तमाः ॥ ११ ॥
कितने ही पुरुषशिरोमणि वीरोंके मस्तक तो कट गये, परंतु उनके धड़ पूर्ववत् धनुष-बाण एवं अन्य आयुध लिये खड़े ही रह गये ॥ ११ ॥
प्रावर्तत महावेगा नदी रुधिरवाहिनी ।
मातङ्गाङ्गशिला रौद्रा मांसशोणितकर्दमा ॥ १२ ॥
वराश्वनरनागानां शरीरप्रभवा तदा ।
परलोकार्णवमुखी गृध्रगोमायुमोदिनी ॥ १३ ॥
रणक्षेत्रमें बड़े वेगसे रक्तकी नदी बह चली, जो देखनेमें बड़ी भयानक थी । हाथियोंके शरीर उसके भीतर शिलाखण्डोंके समान जान पड़ते थे । खून और मांस कीचड़के समान प्रतीत होते थे । बड़े - बड़े हाथी, घोड़े और मनुष्योंके शरीरोंसे ही वह नदी निकली थी और परलोकरूपी समुद्रकी ओर प्रवाहित हो रही थी । वह रक्त -मांसकी नदी गीधों और गीदड़ोंको आनन्द प्रदान करनेवाली थी ॥ १२-१३ ॥
न दृष्टं न श्रुतं वापि युद्धमेतादृशं नृप ।
यथा तव सुतानां च पाण्डवानां च भारत ॥ १४ ॥
भारत! नरेश्वर! पाण्डवों और आपके पुत्रोंका उस दिन जैसा भयानक युद्ध हुआ, वैसा न कभी देखा गया है और न सुना ही गया है ॥ १४ ॥
नासीद् रथपथस्तत्र योधैर्युधि निपातितैः ।
गजैश्च पतितैर्नीलैर्गिरिशृङ्गैरिवावृतः ॥ १५ ॥
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वहाँ युद्धस्थलमें गिराये हुए योद्धाओं तथा पर्वतके श्याम शिखरोंके समान पड़े हुए हाथियोंसे अवरुद्ध हो जानेके कारण रथोंके आने- जानेके लिये रास्ता नहीं रह गया था ॥ १५ ॥
विकीर्णैः कवचैश्चित्रैः शिरस्त्राणैश्च मारिष ।
शुशुभे तद् रणस्थानं शरदीव नभस्तलम् ॥ १६ ॥
माननीय महाराज! इधर- उधर बिखरे हुए विचित्र कवचों तथा शिरस्त्राणों ( लोहेके टोपों ) -से वह रणभूमि शरद्ऋतुमें तारिकाओंसे विभूषित आकाशकी भाँति शोभा पाने लगी ॥ १६ ॥
विनिर्भिन्नाः शरैः केचिदन्त्रापीडप्रकर्षिणः ।
अभीताः समरे शत्रूनभ्यधावन्त दर्पिताः ॥ १७ ॥
कुछ वीर बाणोंसे विदीर्ण होकर आँतोंमें उठनेवाली पीड़ासे अत्यन्त कष्ट पानेपर भी समरभूमिमें निर्भय तथा दर्पयुक्त भावसे शत्रुओंकी ओर दौड़ रहे थे ॥ १७ ॥
तात भ्रातः सखे बन्धो वयस्य मम मातुल ।
मा मां परित्यजेत्यन्ये चुक्रुशुः पतिता रणे ॥ १८ ॥
कितने ही योद्धा रणभूमिमें गिरकर इस प्रकार आर्तभावसे स्वजनोंको पुकार रहे थे ——तात! भ्रातः! सखे! बन्धो! मेरे मित्र! मेरे मामा! मुझे छोड़कर न जाओ ' ॥ १८ ॥
अथाभ्येहित्वमागच्छ किं भीतोऽसि क्व यास्यसि ।
स्थितोऽहं समरे मा भैरिति चान्ये विचुक्रुशुः ॥ १ ९ ॥
दूसरे सैनिक यों चिल्ला रहे थे — ' अरे आओ, मेरे पास आओ, क्यों डरे हुए हो? कहाँ
जाओगे? मैं संग्राममें डटा हुआ हूँ । तुम भय न करो ' ॥ १ ९ ॥
तत्र भीष्मः शान्तनवो नित्यं मण्डलकार्मुकः ।
मुमोच बाणान् दीप्ताग्रानहीनाशीविषानिव ॥ २० ॥
वहाँ शान्तनुनन्दन भीष्म अपने धनुषको मण्डलाकार करके विषधर सर्पोंके समान भयंकर एवं प्रज्वलित बाणोंकी निरन्तर वर्षा कर रहे थे ॥ २० ॥
शरैरेकायनीकुर्वन् दिशः सर्वा यतव्रतः ।
जघान पाण्डवरथानादिश्य भरतर्षभ ॥ २१ ॥
भरतश्रेष्ठ! उत्तम व्रतका पालन करनेवाले भीष्म सम्पूर्ण दिशाओंको बाणोंसे व्याप्त करते हुए पाण्डव - पक्षीय रथियोंको अपना नाम सुना- सुनाकर मारने लगे ॥ २१ ॥
स उत्पन् वै रथोपस्थे दर्शयन् पाणिलाघवम् ।
अलातचक्रवद् राजंस्तत्र तत्र स्म दृश्यते ॥ २२ ॥
राजन्! उस समय भीष्म अपने हाथकी फुर्ती दिखाते हुए रथकी बैठकपर नृत्य - सा कर रहे थे । घूमते हुए अलातचक्रकी भाँति वे यत्र- तत्र सर्वत्र दिखायी देने लगे ॥ २२ ॥
तमेकं समरे शूरं पाण्डवाः सृजयैः सह ।
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अनेकशतसाहस्रं समपश्यन्त लाघवात् ॥ २३ ॥
युद्धमें शूरवीर भीष्म यद्यपि अकेले थे, तथापि सृजयोंसहित पाण्डवोंको वे अपनी फुर्तीके कारण कई लाख व्यक्तियोंके समान दिखायी दिये ॥ २३ ॥
मायाकृतात्मानमिव भीष्मं तत्र स्म मेनिरे ।
पूर्वस्यां दिशि तं दृष्ट्वा प्रतीच्यां ददृशुर्जनाः ॥ २४ ॥
लोगोंको ऐसा मालूम हो रहा था कि रणक्षेत्रमें भीष्मजीने मायासे अपनेको अनेक रूपोंमें प्रकट कर लिया है । जिन लोगोंने उन्हें पूर्वदिशामें देखा था, उन्हीं लोगोंको अखि फिरते ही वे पश्चिममें दिखायी दिये ॥
उदीच्यां चैवमालोक्य दक्षिणस्यां पुनः प्रभो ।
एवं स समरे शूरो गाङ्गेयः प्रत्यदृश्यत ॥ २५ ॥
प्रभो! बहुतोंने उन्हें उत्तर दिशामें देखकर तत्काल ही दक्षिण दिशामें भी देखा । इस प्रकार समरभूमिमें वे शूरवीर गंगानन्दन भीष्म सब ओर दिखायी दे रहे थे ॥ २५ ॥
न चैवं पाण्डवेयानां कश्चिच्छक्नोति वीक्षितुम् ।
विशिखानेव पश्यन्ति भीष्मचापच्युतान् बहून् ॥ २६ ॥
पाण्डवोंमेंसे कोई भी उन्हें देख नहीं पाता था । सब लोग भीष्मजीके धनुषसे छूटे हुए बहुसंख्यक बाणोंको ही देखते थे ॥ २६ ॥
कुर्वाणं समरे कर्म सूदयानं च वाहिनीम् ।
व्याक्रोशन्त रणे तत्र नरा बहुविधा बहु ॥ २७ ॥
अमानुषेण रूपेण चरन्तं पितरं तव । उस समय रणक्षेत्रमें अद्भुत कर्म करते हुए आपके ताऊ भीष्म अमानुषरूपसे विचरते तथा पाण्डव - सेनाका संहार करते थे । वहाँ अनेक प्रकारके मनुष्य उनके सम्बन्धमें नाना प्रकारकी बातें कर रहे थे ॥ २७ ॥
शलभा इव राजानः पतन्ति विधिचोदिताः ॥ २८ ॥
भीष्माग्निमभिसंक्रुद्धं विनाशाय सहस्रशः । वहाँ विधातासे प्रेरित होकर पतंगोंके समान सहस्रों राजा क्रोधमें भरे हुए भीष्मरूपी प्रचण्ड अग्निमें अपने विनाशके लिये स्वयं ही आ गिरते थे ॥ २८३ ॥
न हि मोघः शरः कश्चिदासीद् भीष्मस्य संयुगे ॥ २ ९ ॥ नरनागाश्वकायेषु बहुत्वाल्लघुयोधिनः । युद्धमें मनुष्यों, हाथियों और घोड़ोंके शरीरोंपर चलाया हुआ भीष्मका कोई भी बाण व्यर्थ नहीं होता था । एक तो उनके पास बाण बहुत थे और दूसरे वे बड़ी फुर्तीसे चलाते थे ॥ २ ९ ३ ॥ ( प्रच्छादयन् शरान् भीष्मो निशितान् कङ्कपत्रिणः । ) भिनत्त्येकेन बाणेन सुमुखेन पतत्त्रिणा ॥ ३० ॥