श्रीगणेशाय नमः।

महाभारत — खण्ड ३ — पृष्ठ 1831–1840

महाभारत — खण्ड ३ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1831–1840

पृष्ठ 1831

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गजकण्टकसंनद्धं वज्रेणेव शिलोच्चयम् । भीष्म कंकपत्रसे युक्त बहुसंख्यक तीखे बाणोंको युद्धमें बिखेर रहे थे । वे एक ही पंखयुक्त सीधे बाणसे लोहेकी झुलसे युक्त हाथीको भी विदीर्ण कर डालते थे । जैसे इन्द्र महान् पर्वतको अपने वज्रसे विदीर्ण कर देते हैं ॥ ३० ॥

पि गजारोहान् पिण्डितान् वर्मितानपि ॥ ३१ ॥

नाराचेन सुमुक्तेन निजघान पिता तव । आपके ताऊ भीष्म अच्छी तरहसे छोड़े हुए एक ही नाराचके द्वारा एक जगह बैठे हुए दो - तीन हाथी - सवारोंको कवच धारण किये होनेपर भी छेद डालते थे ॥ ३१ ॥

यो यो भीष्मं नरव्याघ्रमभ्येति युधि कश्चन ॥ ३२ ॥

मुहूर्तदृष्टः स मया पतितो भुवि दृश्यते । जो कोई भी योद्धा नरश्रेष्ठ भीष्मके सम्मुख आ जाता, वह मुझे एक ही मुहूर्तमें खड़ा दिखायी देकर उसी क्षण धरतीपर लोटता दिखायी देता था ॥ ३२३ ॥

एवं सा धर्मराजस्य वध्यमाना महाचमूः ॥ ३३ ॥

भीष्मेणातुलवीर्येण व्यशीर्यत सहस्रधा । इस प्रकार अतुल पराक्रमी भीष्मके द्वारा मारी जाती हुई धर्मराज युधिष्ठिरकी वह विशाल वाहिनी सहस्रों भागों में बिखर गयी ॥ ३३३ ॥

प्राकम्पत महासेना शरवर्षेण तापिता ॥ ३४ ॥

पश्यतो वासुदेवस्य पार्थस्याथ शिखण्डिनः । उनकी बाण - वर्षासे संतप्त हो पाण्डवोंकी वह महती सेना श्रीकृष्ण, अर्जुन और शिखण्डीके देखते - देखते काँपने लगी ॥ ३४३ ॥

वर्तमानाऽपि ते वीरा द्रवमाणान् महारथान् ॥ ३५ ॥

नाशक्नुवन् वारयितुं भीष्मबाणप्रपीडितान् । वे सब वीर वहाँ मौजूद होते हुए भी भीष्मके बाणोंसे अत्यन्त पीड़ित होकर भागते हुए अपने महारथियोंको रोकनेमें समर्थ न हो सके ॥ ३५३ ॥

महेन्द्रसमवीर्येण वध्यमाना महाचमूः ॥ ३६ ॥

अभज्यत महाराज न च द्वौ सह धावतः । महाराज! महेन्द्रके समान पराक्रमी भीष्मकी मार खाकर वह विशाल सेना इस प्रकार तितर- बितर हुई कि उसके दो -दो सैनिक भी एक साथ नहीं भाग सकते थे ॥ ३६३ ॥

आविद्धनरनागाश्वं पतितध्वजकूबरम् ॥ ३७ ॥

अनीकं पाण्डुपुत्राणां हाहाभूतमचेतनम् । मनुष्य, हाथी और घोड़े सभी बाणोंसे छिद गये थे । रथके ध्वज और कूबर टूटकर गिर चुके थे । इस प्रकार पाण्डवोंकी सेना अचेत -सी होकर हाहाकार कर रही थी ॥ ३७ ॥

जघानात्र पिता पुत्र पुत्रश्च पितरं तथा ॥ ३८ ॥

पृष्ठ 1832

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प्रियं सखायं चाक्रन्दे सखा दैवबलात्कृतः । इस युद्धमें दैवके वशीभूत होकर पिताने पुत्रको पुत्रने पिताको और मित्रने प्रिय मित्रको मार डाला ॥ ३८३ ॥

विमुच्य कवचान्यन्ये पाण्डुपुत्रस्य सैनिकाः ॥ ३ ९ ॥ विमुक्तकेशा धावन्तः प्रत्यदृश्यन्त भारत । भारत! पाण्डुपुत्र युधिष्ठिरके बहुत - से सैनिक कवच खोलकर बाल बिखेरे इधर- उधर दौड़ते दिखायी देते थे ॥ ३ ९ ॥ तद् गोकुलमिवोद्भ्रान्तमुद्भ्रान्तरथयूथपम् ॥ ४० ॥

ददृशे पाण्डुपुत्रस्य सैन्यमार्तस्वरं तदा ।

प्रभज्यमानं सैन्यं तु दृष्ट्वा यादवनन्दनः ॥ ४१ ॥

उवाच पार्थं बीभत्सुं निगृह्य रथमुत्तमम् । उस समय पाण्डुनन्दन युधिष्ठिरकी वह सेना व्याकुल होकर भटकती हुई गौओंके समूहकी भाँति आर्तस्वरसे हाहाकार करती हुई देखी गयी। कितने ही रथयूथपति भी किंकर्तव्यविमूढ़ होकर घूम रहे थे । अपनी सेनामें इस प्रकार भगदड़ मची हुई देख यदुकुलनन्दन भगवान् श्रीकृष्णने अपने उत्तम रथको खड़ा करके कुन्तीपुत्र अर्जुनसे कहा I ॥ ४०-४१३ ॥ अयं स कालः सम्प्राप्तः पार्थ यस्तेऽभिकाङ्क्षितः ॥ ४२ ॥

प्रहरस्व नरव्याघ्र न चेन्मोहाद् विमुह्यसे । ‘ पुरुषसिंह! जिसकी तुम दीर्घकालसे अभिलाषा करते थे, वही यह अवसर प्राप्त हुआ है । यदि तुम मोहसे किंकर्तव्यविमूढ़ नहीं हो गये हो तो पूरी शक्ति लगाकर युद्ध करो ॥ ४२ || यत् त्वया कथितं वीर पुरा राज्ञां समागमे ॥ ४३ ॥

भीष्मद्रोणमुखान् सर्वान् धार्तराष्ट्रस्य सैनिकान् ।

सानुबन्धान् हनिष्यामि ये मां योत्स्यन्ति संयुगे ॥ ४४ ॥

इति तत् कुरु कौन्तेय सत्यं वाक्यमरिंदम ।

बीभत्सो पश्य सैन्यं स्वं भज्यमानं ततस्ततः ॥ ४५ ॥

‘वीर! पहले राजाओंकी मण्डलीमें तुमने जो यह कहा था कि 'जो मेरे साथ संग्रामभूमिमें उतरकर युद्ध करेंगे, दुर्योधनके उन भीष्म, द्रोण आदि समस्त सैनिकोंको मैं सगे - सम्बन्धियोंसहित मार डालूँगा । ' शत्रुसूदन कुन्तीनन्दन! अपनी उस बातको सत्य कर दिखाओ । अर्जुन! देखो, तुम्हारी सेना इधर - उधर भाग रही है ॥ ४३–४५ ॥

द्रवतश्च महीपालान् पश्य यौधिष्ठिरे बले ।

दृष्ट्वा हि भीष्मं समरे व्यात्ताननमिवान्तकम् ॥ ४६ ॥

भयार्ताः प्रपलायन्ते सिंहात् क्षुद्रमृगा इव ।

पृष्ठ 1833

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‘ समरभूमिमें मुँह बाये हुए कालके समान भीष्मको देखकर युधिष्ठिरकी सेनामें भागते हुए इन राजाओंकी ओर दृष्टिपात करो । ये सिंहसे डरे हुए क्षुद्र मृगोंकी भाँति भयसे आतुर होकर पलायन कर रहे हैं ' ॥ ४६३ ॥

एवमुक्तः प्रत्युवाच वासुदेवं धनंजयः ॥ ४७ ॥

दयाश्वान् यतो भीष्मो विगाहैतद् बलार्णवम् ।

पातयिष्यामि दुर्धर्षं वृद्धं कुरुपितामहम् ॥ ४८ ॥

वसुदेवनन्दन श्रीकृष्णके ऐसा कहनेपर अर्जुनने उन्हें इस प्रकार उत्तर दिया – ' भगवन्! इन घोड़ोंको हाँककर वहीं ले चलिये, जहाँ भीष्म मौजूद हैं । इस सेनारूपी समुद्रमें प्रवेश कीजिये । आज मैं कुरुलके वृद्ध पितामह दुर्धर्ष वीर भीष्मको रथसे नीचे गिरा दूँगा' ॥ ४७-४८ ॥ संजय उवाच

ततोऽश्वान् रजतप्रख्यान् नोदयामास माधवः ।

यतो भीष्मरथो राजन् दुष्प्रेक्ष्यो रश्मिवानिव ॥ ४ ९ ॥

संजय कहते हैं— राजन्! तब भगवान् श्रीकृष्णने अर्जुनके चाँदीके समान सफेद घोड़ोंको उसी दिशाकी ओर हाँका, जिस ओर भीष्मजीका रथ विद्यमान था । सूर्यकी भाँति उस रथकी ओर आँख उठाकर देखना भी कठिन था ॥ ४ ९ ॥

ततस्तत् पुनरावृत्तं युधिष्ठिरबलं महत् ।

दृष्ट्वा पार्थं महाबाहुं भीष्मायोद्यतमाहवे ॥ ५० ॥

उस समय महाबाहु अर्जुनको समरभूमिमें भीष्मसे लोहा लेनेके लिये उद्यत देख युधिष्ठिरकी वह विशाल सेना पुनः लौट आयी ॥ ५० ॥

ततो भीष्मः कुरुश्रेष्ठ सिंहवद् विनदन् मुहुः ।

धनंजयरथं शीघ्रं शरवर्षैरवाकिरत् ॥ ५१ ॥

कुरुश्रेष्ठ! तदनन्तर भीष्म सिंहके समान बारंबार गर्जना करते हुए अर्जुनके रथपर शीघ्रतापूर्वक बाणोंकी वर्षा करने लगे ॥ ५१ ॥

क्षणेन स रथस्तस्य सहयः सहसारथिः ।

शरवर्षेण महता संछन्नो न प्रकाशते ॥ ५२ ॥

उस महान् बाण- वर्षासे एक ही क्षणमें घोड़े और सारथिसहित आच्छादित होकर अर्जुनका रथ किसीकी दृष्टिमें नहीं आता था ॥ ५२ ॥

वासुदेवस्त्वसम्भ्रान्तो धैर्यमास्थाय सत्त्ववान् ।

चोदयामास तानश्वान् विचितान् भीष्मसायकैः ॥ ५३ ॥

परंतु शक्तिशाली भगवान् श्रीकृष्ण तनिक भी घबराहटमें न पड़कर धैर्यका सहारा ले उन घोड़ोंको हाँकते रहे। यद्यपि भीष्मके बाण उन अश्वोंके सभी अंगोंमें धँसे हुए

पृष्ठ 1834

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थे ॥ ५३ ॥

ततः पार्थो धनुर्गृह्य दिव्यं जलदनिःस्वनम् ।

पातयामास भीष्मस्य धनुश्छित्त्वा त्रिभिः शरैः ॥ ५४ ॥

तब अर्जुनने मेघके समान गम्भीर घोष करनेवाले दिव्य धनुषको हाथमें लेकर तीन बाणोंसे भीष्मके धनुषको काट गिराया ॥ ५४ ॥

स च्छिन्नधन्वा कौरव्यः पुनरन्यन्महद् धनुः ।

निमिषान्तरमात्रेण सज्यं चक्रे पिता तव ॥ ५५ ॥

धनुष कट जानेपर आपके ताऊ कुरुनन्दन भीष्मने पलक मारते - मारते पुनः दूसरे विशाल धनुषपर प्रत्यंचा चढ़ा दी ॥ ५५ ॥

विचकर्ष ततो दोर्भ्यां धनुर्जलदनिःस्वनम् ।

अथास्य तदपि क्रुद्धश्चिच्छेद धनुरर्जुनः ॥ ५६ ॥

फिर मेघके समान गम्भीर शब्द करनेवाले उस धनुषको दोनों हाथोंसे खींचा । इतनेहीमें कुपित हुए अर्जुनने उनके उस धनुषको भी काट डाला ॥ ५६ ॥

तस्य तत् पूजयामास लाघवं शान्तनोः सुतः ।

साधु पार्थ महाबाहो साधु भोः पाण्डुनन्दन ॥ ५७ ॥

त्वय्येवैतद् युक्तरूपं महत् कर्म धनंजय ।

प्रीतोऽस्मि सुभृशं पुत्र कुरु युद्धं मया सह ॥ ५८ ॥

अर्जुनकी इस फुर्तीको देखकर शान्तनुनन्दन भीष्मने बड़ी प्रशंसा की और कहा —' महाबाहु कुन्तीकुमार! तुम्हें साधुवाद । पाण्डुनन्दन! धन्यवाद । बेटा! तुम्हारी इस फुर्तीसे मैं बहुत प्रसन्न हूँ । धनंजय! यह महान् कर्म तुम्हारे ही योग्य है । तुम मेरे साथ युद्ध करो ' ॥ ५७-५८ ॥

इति पार्थं प्रशस्याथ प्रगृह्यान्यन्महद् धनुः ।

मुमोच समरे वीरः शरान् पार्थरथं प्रति ॥ ५ ९ ॥

इस प्रकार कुन्तीकुमार अर्जुनकी प्रशंसा करके फिर दूसरा विशाल धनुष हाथमें लेकर वीर भीष्मने युद्धस्थलमें उनके रथकी ओर बाण बरसाना आरम्भ किया ॥ ५ ९ ॥

अदर्शयद् वासुदेवो हययाने परं बलम् ।

मोघान् कुर्वन् शरांस्तस्य मण्डलान्याचरल्लघु ॥ ६० ॥

भगवान् श्रीकृष्णने घोड़ोंको हाँकनेकी कलामें अपने उत्तम बलका परिचय दिया । वे भीष्मके बाणोंको व्यर्थ करते हुए बड़ी फुर्तीके साथ रथको मण्डलाकार चलाने लगे ॥ ६० ॥

तथा भीष्मस्तु सुदृढं वासुदेवधनंजयौ ।

विव्याध निशितैर्बाणैः सर्वगात्रेषु भारत ॥ ६१ ॥

पृष्ठ 1835

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भारत! तथापि भीष्मने श्रीकृष्ण और अर्जुनके सम्पूर्ण अंगोंमें अपने पैने बाणोंसे गहरे आघात किये ॥ ६१ ॥

शुशुभाते नरव्याघ्रौ तौ भीष्मशरविक्षतौ ।

गोवृषाविव संरब्धौ विषाणैर्लिखिताङ्कितौ ॥ ६२ ॥

भीष्मके बाणोंसे क्षत-विक्षत हो वे नरश्रेष्ठ श्रीकृष्ण और अर्जुन क्रोधमें भरे हुए उन दो साँड़ोंके समान सुशोभित हुए, जिनके सम्पूर्ण शरीरमें सींगोंके आघातसे बहुत - से घाव हो गये हों ॥ ६२ ॥

पुनश्चापि सुसंरब्धः शरैः शतसहस्रशः ।

कृष्णयोर्युधि संरब्धो भीष्मोऽथावारयद् दिशः ॥ ६३ ॥

तत्पश्चात् रोषावेशमें भरे हुए भीष्मने सैकड़ों- हजारों बाणोंकी वर्षा करके युद्धभूमिमें श्रीकृष्ण और अर्जुनकी सम्पूर्ण दिशाओंको आच्छादित एवं अवरुद्ध कर दिया ॥ ६३ ॥

वार्ष्णेयं च शरैस्तीक्ष्णैः कम्पयामास रोषितः ।

मुहुरभ्यर्दयन् भीष्मः प्रहस्य स्वनवत् तदा ॥ ६४ ॥

इतना ही नहीं, रोषमें भरे हुए भीष्मने जोर- जोर से हँसकर अपने तीखे बाणोंसे बारंबार पीड़ित करते हुए वृष्णिकुलभूषण श्रीकृष्णको कम्पित- सा कर दिया ॥ ६४ ॥

ततस्तु कृष्णः समरे दृष्ट्वा भीष्मपराक्रमम् ।

सम्प्रेक्ष्य च महाबाहुः पार्थस्य मृदुयुद्धताम् ॥ ६५ ॥

भीष्मं च शरवर्षाणि सृजन्तमनिशं युधि ।

प्रतपन्तमिवादित्यं मध्यमासाद्य सेनयोः ॥ ६६ ॥

वरान् वरान् विनिघ्नन्तं पाण्डुपुत्रस्य सैनिकान् ।

युगान्तमिव कुर्वाणं भीष्मं यौधिष्ठिरे बले ॥ ६७ ॥

तदनन्तर महाबाहु श्रीकृष्णने उस समरांगणमें भीष्मका पराक्रम देखकर यह विचार किया कि अर्जुन तो कोमलतापूर्वक युद्ध कर रहा है और भीष्म युद्धस्थलमें निरन्तर बाणोंकी वर्षा कर रहे हैं । ये दोनों सेनाओंके बीचमें आकर तपते हुए सूर्यकी भाँति सुशोभित होते और पाण्डुपुत्र युधिष्ठिरके अच्छे - अच्छे सैनिकोंको चुन- चुनकर मार रहे हैं । युधिष्ठिरकी सेनामें भीष्मने प्रलयकालका - सा दृश्य उपस्थित कर दिया है ॥ ६५–६७ ॥

अमृष्यमाणो भगवान् केशवः परवीरहा ।

अचिन्तयदमेयात्मा नास्ति यौधिष्ठिरं बलम् ॥ ६८ ॥

एकाह्ना हि रणे भीष्मो नाशयेद् देवदानवान् ।

किंनु पाण्डुसुतान् युद्धे सबलान् सपदानुगान् ॥ ६ ९ ॥

यह सब देख और सोचकर शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले अप्रमेयस्वरूप भगवान् श्रीकृष्ण सहन न कर सके । उन्होंने मन- ही- मन विचार किया कि युधिष्ठिरकी सेनाका अस्तित्व मिटना चाहता है । भीष्म रणभूमिमें एक ही दिनमें सम्पूर्ण देवताओं और दानवोंका

पृष्ठ 1836

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नाश कर सकते हैं । फिर सेना और सेवकोंसहित पाण्डवोंको युद्धमें परास्त करना इनके लिये कौन बड़ी बात है? ॥ ६८-६९ ॥

द्रवते च महासैन्यं पाण्डवस्य महात्मनः ।

एते च कौरवास्तूर्णं प्रभग्नान् वीक्ष्य सोमकान् ॥ ७० ॥

प्राद्रवन्ति रणे दृष्ट्वा हर्षयन्तः पितामहम् ।

सोऽहं भीष्मं निहन्म्यद्य पाण्डवार्थाय दंशितः ॥ ७१ ॥

महात्मा पाण्डुपुत्र युधिष्ठिरकी यह विशाल सेना भागी जा रही है और ये कौरवलोग रणक्षेत्रमें सोमकोंको शीघ्रतापूर्वक भागते देख पितामहका हर्ष बढ़ाते हुए उन्हें खदेड़ रहे हैं; अतः आज पाण्डवोंके लिये कवच धारण किया हुआ मैं स्वयं ही भीष्मको मारे डालता हूँ ॥ ७०-७१ ॥

भारमेतं विनेष्यामि पाण्डवानां महात्मनाम् ।

अर्जनो हि शरैस्तीक्ष्णैर्वध्यमानोऽपि संयुगे ॥ ७२ ॥

कर्तव्यं नाभिजानाति रणे भीष्मस्य गौरवात् । महामना पाण्डवोंके इस भारी भारको मैं ही दूर करूँगा । अर्जुन इस युद्धमें तीखे बाणोंकी मार खाकर भी भीष्मके प्रति गौरवबुद्धि रखनेके कारण अपने कर्तव्यको नहीं समझ रहा है ॥ ७२ ॥

तथा चिन्तयतस्तस्य भूय एव पितामहः ।

प्रेषयामास संक्रुद्धः शरान् पार्थरथं प्रति ॥ ७३ ॥

भगवान् श्रीकृष्णके इस प्रकार चिन्तन करते समय अत्यन्त कुपित हुए पितामह भीष्मने अर्जुनके रथपर पुनः बहुत - से बाण चलाये ॥ ७३ ॥

तेषां बहुत्वात् तु भृशं शराणां दिशश्च सर्वाः पिहिता बभूवुः । न चान्तरिक्षं न दिशो न भूमि- र्न भास्करोऽदृश्यत रश्मिमाली । वयुश्च वातास्तुमुलाः सधूमा दिशश्च सर्वाः क्षुभिता बभूवुः ॥ ७४ ॥

उन बाणोंकी अत्यधिकताके कारण उनसे सम्पूर्ण दिशाएँ आच्छादित हो गयीं । न आकाश दिखायी देता था, न दिशाएँ; न तो भूमि दिखायी देती थी और न मरीचिमाली

भगवान् भास्करका ही दर्शन होता था । उस समय धूमयुक्त भयंकर हवा चलने लगी ।

सम्पूर्ण दिशाएँ क्षुब्ध हो उठीं ॥ ७४ ॥

द्रोणो विकर्णोऽथ जयद्रथश्च भूरिश्रवाः कृतवर्मा कृपश्च । श्रुतायुरम्बष्ठपतिश्च राजा

पृष्ठ 1837

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विन्दानुविन्दौ च सुदक्षिणश्च ॥ ७५ ॥

प्राच्याश्च सौवीरगणाश्च सर्वे

वसातयः क्षुद्रकमालवाश्च ।

किरीटिनं त्वरमाणाऽभिसस्रु- र्निदेशगाः शान्तनवस्य राज्ञः ॥ ७६ ॥

तब द्रोण, विकर्ण, जयद्रथ, भूरिश्रवा, कृतवर्मा, कृपाचार्य, श्रुतायु, राजा अम्बष्ठपति, विन्द, अनुविन्द, सुदक्षिण, पूर्वीय नरेशगण, सौवीरदेशीय क्षत्रियगण, वसाति, क्षुद्रक और मालवगण — ये सभी शानानुनन्दन भीष्मकी आज्ञाके अनुसार चलते हुए तुरंत ही किरीटधारी अर्जुनका सामना करनेके लिये निकट चले आये ॥ ७५-७६ ॥ तं वाजिपादातरथौघजालै- रनेकसाहस्रशतैर्ददर्श । किरीटिनं सम्परिवार्यमाणं शिनेर्नप्ता वारणयूथपैश्च ॥ ७७ ॥

सात्यकिने दूरसे देखा, किरीटधारी अर्जुन घोड़े, पैदल तथा रथियोंसहित कई लाख सैनिकोंसे घिर गये हैं, गजराजयूथपतियोंने भी उन्हें सब ओरसे घेर रखा है ॥ ततस्तु दृष्ट्वार्जुनवासुदेवी पदातिनागाश्वरथैः समन्तात् । अभिद्रुती शस्त्रभृतां वरिष्ठौ शिनिप्रवीरोऽभिससार तूर्णम् ॥ ७८ ॥

तत्पश्चात् पैदल, हाथी, घोड़े और रथोंद्वारा चारों ओरसे आक्रान्त हुए शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ श्रीकृष्ण और अर्जुनको देखकर शिनिवंशके प्रमुख वीर सात्यकि तुरंत वहाँ आ पहुँचे ॥ ७८ ॥

स तान्यनीकानि महाधनुष्मा- ञ्शिनिप्रवीरः सहसाभिपत्य । चकार साहाय्यमथार्जुनस्य विष्णुर्यथा वृत्रनिषूदनस्य ॥ ७९ ॥

महाधनुर्धर शिनिवीर सात्यकिने सहसा उन सेनाओंके समीप पहुँचकर अर्जुनकी उसी प्रकार सहायता की, जैसे भगवान् विष्णु वृत्रविनाशक इन्द्रकी सहायता करते हैं ॥ ७ ९ ॥ विशीर्णनागाश्वरथध्वजौघं भीष्मेण वित्रासितसर्वयोधम् । युधिष्ठिरानीकमभिद्रवन्तं प्रोवाच संदृश्य शिनिप्रवीरः ॥ ८० ॥

पृष्ठ 1838

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युधिष्ठिरकी सेनाके हाथी, घोड़े, रथ और ध्वजाओंके समूह तितर-बितर हो गये थे । भीष्मने उनके सम्पूर्ण योद्धाओंको भयभीत कर दिया था । इस प्रकार युधिष्ठिरके सैनिकोंको भागते देख शिनिवंशके प्रमुख वीर सात्यकिने उनसे कहा— ॥ ८० ॥

क्व क्षत्रिया यास्यथ नैष धर्मः सतां पुरस्तात् कथितः पुराणैः । मा स्वां प्रतिज्ञां त्यजत प्रवीराः स्व वीरधर्मं परिपालयध्वम् ॥ ८१ ॥

' क्षत्रियो! कहाँ जा रहे हो? प्राचीन महापुरुषों द्वारा यह श्रेष्ठ क्षत्रियोंका धर्म नहीं बताया गया है । वीरो! अपनी प्रतिज्ञा न छोड़ो, अपने वीर धर्मका पालन करो ' ॥ ८१ ॥

तान् वासवानन्तरजो निशाम्य नरेन्द्रमुख्यान् द्रवतः समन्तात् । पार्थस्य दृष्ट्वा मृदुयुद्धतां च भीष्मं च संख्ये समुदीर्यमाणम् ॥ ८२ ॥

अमृष्यमाणः स ततो महात्मा यशस्विनं सर्वदशार्हभर्ता । उवाच शैनेयमभिप्रशंसन् दृष्ट्वा कुरूनापततः समग्रान् ॥ ८३ ॥

इन्द्रके छोटे भाई श्रीकृष्णने उन श्रेष्ठ राजाओंको सब ओर भागते देखा और इस बातपर भी लक्ष्य किया कि अर्जुन तो कोमलताके साथ युद्ध कर रहा है और भीष्म इस संग्राममें अधिकाधिक प्रचण्ड होते जा रहे हैं । यह सब देखकर सम्पूर्ण यदुकुलका भरण-पोषण करनेवाले महात्मा भगवान् श्रीकृष्ण सहन न कर सके । उन्होंने समस्त कौरवोंको सब ओरसे आक्रमण करते देख यशस्वी वीर सात्यकिकी प्रशंसा करते हुए कहा ॥ ८२-८३ ॥ ये यान्ति ते यान्तु शिनिप्रवीर येऽपि स्थिताः सात्वत तेऽपि यान्तु । भीष्मं रथात् पश्य निपात्यमानं द्रोणं च संख्ये सगणं मयाद्य ॥ ८४ ॥

‘शिनिवंशके प्रमुख वीर! सात्वतरत्न! जो भाग रहे हैं, वे भाग जायँ । जो खड़े हैं, वे भी चले जायँ । ( मैं इन लोगोंका भरोसा नहीं करता । ) तुम देखो, मैं अभी संग्रामभूमिमें सहायकगणोंके साथ भीष्म और द्रोणाचार्यको रथसे मार गिराता हूँ ॥ ८४ ॥

न मे रथी सात्वत कौरवाणां क्रुद्धस्य मुच्येत रणेऽद्य कश्चित् । तस्मादहं गृह्य रथाङ्गमुग्रं

पृष्ठ 1839

महाभारत — खण्ड ३, पृष्ठ 1839 का मूल पृष्ठ
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प्राणं हरिष्यामि महाव्रतस्य ॥ ८५ ॥

‘ सात्वत वीर! आज कौरव सेनाका कोई भी रथी क्रोधमें भरे हुए मुझ कृष्णके हाथसे जीवित नहीं छूट सकता । मैं अपना भयंकर चक्र लेकर महान् व्रतधारी भीष्मके प्राण हर लूँगा ॥ ८५ ॥

निहत्य भीष्मं सगणं तथाऽऽजौ द्रोणं च शैनेय रथप्रवीरौ । प्रीतिं करिष्यामि धनंजयस्य राज्ञश्च भीमस्य तथाश्विनोश्च ॥ ८६ ॥

' सात्यके! सहायकगणोंसहित भीष्म और द्रोण- इन दोनों वीर महारथियोंको युद्धमें मारकर मैं अर्जुन, राजा युधिष्ठिर, भीमसेन तथा नकुल सहदेवको प्रसन्न करूँगा ॥ ८६ ॥

निहत्य सर्वान् धृतराष्ट्रपुत्रां- स्तत्पक्षिणो ये च नरेन्द्रमुख्याः । राज्येन राजानमजातशत्रुं सम्पादयिष्याम्यहमद्य हृष्टः ॥ ८७ ॥

' धृतराष्ट्रके सभी पुत्रों तथा उसके पक्षमें आये हुए सभी श्रेष्ठ नरेशोंको मारकर मैं प्रसन्नतापूर्वक आज अजातशत्रु राजा युधिष्ठिरको राज्यसे सम्पन्न कर दूँगा' ॥ संजय उवाच ( इतीदमुक्त्वा स महानुभावः सस्मार चक्रं निशितं पुराणम् । सुदर्शनं चिन्तितमात्रमेव तस्याग्रहस्तं स्वयमारुरोह || ) संजय कहते हैं- ऐसा कहकर महानुभाव श्रीकृष्णने अपने पुरातन एवं तीक्ष्ण आयुध सुदर्शनचक्रका स्मरण किया । उनके चिन्तन करनेमात्रसे ही वह स्वयं उनके हाथके अग्रभागमें प्रस्तुत हो गया । ततः सुनाभं वसुदेवपुत्रः सूर्यप्रभं वज्रसमप्रभावम् । क्षुरान्तमुद्यम्य भुजेन चक्रं रथादवप्लुत्य विसृज्य वाहान् ॥ ८८ ॥

संकम्पयन् गां चरणैर्महात्मा वेगेन कृष्णः प्रससार भीष्मम् । मदान्धमाजी समुदीर्णदर्प सिंहो जिघांसन्निव वारणेन्द्रम् ॥ ८ ९ ॥

पृष्ठ 1840

महाभारत — खण्ड ३, पृष्ठ 1840 का मूल पृष्ठ
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उस चक्रकी नाभि बड़ी सुन्दर थी । उसका प्रकाश सूर्यके समान और प्रभाव वज्रके तुल्य था । उसके किनारे छूरेके समान तीक्ष्ण थे । वसुदेवनन्दन महात्मा भगवान् श्रीकृष्ण घोड़ोंकी लगाम छोड़कर हाथमें उस चक्रको घुमाते हुए रथसे कूद पड़े और जिस प्रकार सिंह बढ़े हुए घमंडवाले मदान्ध एवं उन्मत्त गजराजको मार डालनेकी इच्छासे उसकी ओर झपटे, उसी प्रकार वे भी अपने पैरोंकी धमकसे पृथ्वीको कँपाते हुए युद्धस्थलमें भीष्मकी ओर बड़े वेगसे दौड़े ॥ ८८-८९ ॥ सोऽभिद्रवन् भीष्ममनीकमध्ये क्रुद्धो महेन्द्रावरजः प्रमाथी । व्यालम्बिपीतान्तपटश्चकाशे घनो यथा खे तडितावनद्धः ॥ ९ ० ॥ देवराज इन्द्रके छोटे भाई श्रीकृष्ण समस्त शत्रुओंको मथ डालनेकी शक्ति रखते थे । वे उस सेनाके मध्यभागमें कुपित होकर जिस समय भीष्मकी ओर झपटे, उस समय उनके श्याम विग्रहपर लटककर हवाके वेगसे फहराता हुआ पीताम्बरका छोर उन्हें ऐसी शोभा दे रहा था, मानो आकाशमें बिजलीसे आवेष्टित हुआ श्याम मेघ सुशोभित हो रहा हो ॥ ९ ० ॥ सुदर्शनं चास्य रराज शौरे- स्तच्चक्रपद्मं सुभुजोरुनालम् । यथादिपद्मं तरुणार्कवर्णं रराज नारायणनाभिजातम् ॥ ९ १ ॥ श्रीकृष्णकी सुन्दर भुजारूपी विशाल नालसे सुशोभित वह सुदर्शनचक्र कमलके समान शोभा पा रहा था, मानो भगवान् नारायणके नाभिसे प्रकट हुआ प्रातःकालीन सूर्यके समान कान्तिवाला आदिकमल प्रकाशित हो रहा हो ॥ ९ १ ॥ तत् कृष्णकोपोदयसूर्यबुद्धं क्षुरान्ततीक्ष्णाग्रसुजातपत्रम् । तस्यैव देहोरुसरः प्ररूढं रराज नारायणबाहुनालम् ॥ ९ २ ॥ श्रीकृष्णके क्रोधरूपी सूर्योदयसे वह कमल विकसित हुआ था। उसके किनारे छूरेके समान तीक्ष्ण थे । वे ही मानो उसके सुन्दर दल थे । भगवान्‌के श्रीविग्रहरूपी महान् सरोवरमें ही वह बढ़ा हुआ था और नारायणस्वरूप श्रीकृष्णकी बाहुरूपी नाल उसकी शोभा बढ़ा रही थी ॥ ९ २ ॥ तमात्तचक्रं प्रणदन्तमुच्चैः क्रुद्धं महेन्द्रावरजं समीक्ष्य । सर्वाणि भूतानि भृशं विनेदुः