03.Mahabharata Volume 3 — पृष्ठ 1851–1860
महाभारत — खण्ड ३ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1851–1860
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षष्टितमोऽध्यायः चौथे दिन -– दोनों सेनाओंका व्यूह - निर्माण तथा भीष्म और अर्जुनका द्वैरथ - युद्ध संजय उवाच व्युष्टां निशां भारत भारताना- मनीकिनीनां प्रमुखे महात्मा । ययौ सपत्नान् प्रति जातकोपो वृतः समग्रेण बलेन भीष्मः ॥ १ ॥
संजय कहते हैं - भारत! जब रात बीती और प्रभात हुआ, तब भरतवंशियोंकी सेनाके अग्रभागमें स्थित हुए महामना भीष्म समग्रसेनासे घिरकर शत्रुओंसे युद्ध करनेके लिये चले । उस समय उनके मनमें शत्रुओंके प्रति बड़ा क्रोध था ॥ १ ॥
तं द्रोणदुर्योधनबाह्लिकाश्च
तथैव दुर्मर्षणचित्रसेनौ ।
जयद्रथश्चातिबलो बलौघै- र्नृपास्तथान्ये प्रययुः समन्तात् ॥ २ ॥
उनके साथ चारों ओरसे द्रोण, दुर्योधन, बाह्निक, दुर्मर्षण, चित्रसेन, अत्यन्त बलवान् जयद्रथ तथा अन्य नरेश विशाल वाहिनीको साथ लिये प्रस्थित हुए ॥ २ ॥
स तैर्महद्भिश्च महारथैश्च
तेजस्विभिर्वीर्यवद्भिश्च राजन् ।
रराज राजा स तु राजमुख्यै- र्वृतः स देवैरिव वज्रपाणिः ॥ ३ ॥
राजन्! इस महान्, तेजस्वी, पराक्रमी और महारथी नरपतियोंसे घिरा हुआ राजा दुर्योधन देवताओंसहित वज्रपाणि इन्द्रके समान शोभा पा रहा था ॥ ३ ॥
तस्मिन्ननीकप्रमुखे विषक्ता दोधूयमानाश्च महापताकाः । सुरक्तपीतासितपाण्डुराभा महागजस्कन्धगता विरेजुः ॥ ४ ॥
इस सेनाके प्रमुख भागमें बड़े -बड़े गजराजोंके कंधोंपर लगी हुई लाल, पीली, काली और सफेद रंगकी फहराती हुई विशाल पताकाएँ शोभा पा रही थीं ॥ ४ ॥
सा वाहिनी शान्तनवेन गुप्ता
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महारथैर्वारणवाजिभिश्च । बभौ सविद्युत्स्तनयित्नुकल्पा जलागमे द्यौरिव जातमेघा ॥ ५ ॥
शान्तनुनन्दन भीष्मसे रक्षित वह विशाल वाहिनी बड़े - बड़े रथों, हाथियों और घोड़ोंसे ऐसी शोभा पा रही थी, मानो वर्षाकालमें मेघोंकी घटासे आच्छादित आकाश बिजलीसहित बादलोंसे सुशोभित हो ॥ ५ ॥
ततो रणायाभिमुखी प्रयाता प्रत्यर्जुनं शान्तनवाभिगुप्ता । सेना महोग्रा सहसा कुरूणां वेगो यथा भीम इवापगायाः ॥ ६ ॥
तदनन्तर नदीके भयानक वेगकी भाँति कौरवोंकी वह अत्यन्त भयंकर सेना शान्तनुनन्दन भीष्मसे सुरक्षित हो रणके लिये अर्जुनकी ओर सहसा चली ॥ ६ ॥
तं व्यालनानाविधगूढसारं गजाश्वपादातरथौघपक्षम् । व्यूहं महामेघसमं महात्मा ददर्श दूरात् कपिराजकेतुः ॥ ७ ॥
महामना कपिध्वज अर्जुनने दूरसे देखा कि कौरवसेना व्याल नामक व्यूहमें आबद्ध होनेके कारण अनेक प्रकारकी दिखायी दे रही है । उसकी शक्ति छिपी हुई है । उसमें हाथी, घोड़े, पैदल तथा रथियोंके समूह भरे हुए हैं । सेनाका वह व्यूह महान् मेघोंकी घटाके समान जान पड़ता है ॥ ७ ॥
विनिर्ययौ केतुमता रथेन नरर्षभः श्वेतहयेन वीरः । वरूथिना सैन्यमुखे महात्मा वधे धृतः सर्वसपत्नयूनाम् ॥ ८ ॥
तदनन्तर नरश्रेष्ठ महामना वीर अर्जुन समस्त शत्रुपक्षीय युवकोंके वधका संकल्प लेकर श्वेत घोड़ोंसे जुते हुए ध्वज एवं आवरणसे युक्त रथपर आरूढ़ हो शत्रुसेनाके सामने चले ॥ ८ ॥
सूपस्करं सोत्तरबन्धुरेषं यत्तं यदूनामृषभेण संख्ये । कपिध्वजं प्रेक्ष्य विषेदुराजौ सहैव पुत्रैस्तव कौरवेयाः ॥ ९ ॥
जिसमें सब सामग्री सुन्दरतासे सजाकर रखी गयी थी, अच्छी तरह बँधी होनेके कारण जिसकी ईषा अत्यन्त मनोहर दिखायी देती है तथा यदुकुलतिलक श्रीकृष्ण जिसका
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संचालन करते हैं, उस वानरके चिह्नवाली ध्वजासे युक्त रथको युद्धभूमिमें उपस्थित देख आपके पुत्रोंसहित समस्त कौरवसैनिक विषादमग्न हो गये ॥ प्रकर्षता गुप्तमुदायुधेन
किरीटिना लोकमहारथेन ।
तं व्यूहराजं ददृशुस्त्वदीया- श्चतुश्चतुर्व्यालसहस्रकर्णम् ॥ १० ॥
लोकविख्यात महारथी किरीटधारी अर्जुन अस्त्र- शस्त्र लेकर जिसे सुरक्षितरूपसे अपने साथ ले आ रहे थे और जिसमें चार- चार हजार मतवाले हाथी प्रत्येक दिशामें खड़े किये गये थे, उस व्यूहराजको आपके सैनिकोंने देखा ॥ १० ॥
यथा हि पूर्वेऽहनि धर्मराज्ञा व्यूहः कृतः कौरवसत्तमेन । तथा न भूतो भुवि मानुषेषु न दृष्टपूर्वो न च संश्रुतश्च ॥ ११ ॥
कुरुश्रेष्ठ धर्मराज युधिष्ठिरने पहले दिन जैसा व्यूह बनाया था, वैसा ही वह भी था । वैसा व्यूह इस भूतलपर मनुष्योंकी सेनाओंमें न तो पहले कभी देखा गया था और न कभी सुना ही गया था ॥ ११ ॥
ततो यथादेशमुपेत्य तस्थुः पाञ्चालमुख्याः सह चेदिमुख्यैः । ततः समादेशसमाहतानि भेरीसहस्राणि विनेदुराजौ ॥ १२ ॥
तदनन्तर सेनापतिकी आज्ञाके अनुसार यथोचित स्थानपर पहुँचकर पांचाल और चेदिदेशके प्रमुख वीर खड़े हुए । फिर उस युद्धस्थलमें प्रधानके आदेशानुसार सहस्रों रणभेरियाँ एक साथ बज उठीं ॥ १२ ॥
शङ्खस्वनास्तूर्यरथस्वनाश्च सर्वेष्वनीकेषु ससिंहनादाः । ततः सबाणानि महास्वनानि विस्फार्यमाणानि धनूंषि वीरैः ॥ १३ ॥
सभी सेनाओंमें शंखनाद, तूर्यनाद ( वाद्योंकी ध्वनि) तथा वीरोंके सिंहनादसहित रथोंकी घर- घराहटके शब्द होने लगे । फिर वीरोंके द्वारा खींचे जानेवाले बाणसहित धनुषके महान् टंकार- शब्द गूँज उठे ॥ १३ ॥
क्षणेन भेरीपणवप्रणादा- नन्तर्दधुः शङ्खमहास्वनाश्च । तच्छङ्खशब्दावृतमन्तरिक्ष-
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मुद्धूत भीमाद्भुतरेणुजालम् ॥ १४ ॥
क्षणभरमें भेरी और पणव आदिके शब्दोंको महान् शंखनादोंने दबा लिया तथा उस शंखध्वनिसे व्याप्त हुए आकाशमें ( पृथ्वीसे ) उठी हुई धूलोंका भयंकर एवं अद्भुत जाल - सा फैल गया ॥ १४ ॥
महानुभावाश्च ततः प्रकाश- मालोक्य वीराः सहसाभिपेतुः । रथी रथेनाभिहतः ससूतः पपात साश्वः सरथः सकेतुः ॥ १५ ॥
तदनन्तर महान् प्रभावशाली वीर सूर्यदेवका प्रकाश देखकर सहसा शत्रुमण्डलीपर टूट पड़े । रथी रथीसे भड़कर सारथि, घोड़े, रथ और ध्वजसहित मरकर गिरने लगा ॥ १५ ॥
गजो गजेनाभिहतः पपात पदातिना चाभिहतः पदातिः । आवर्तमानान्यभिवर्तमानै- र्घोरीकृतान्यद्भुतदर्शनानि । प्रासैश्च खड्गैश्च समाहतानि सदश्ववृन्दानि सदश्ववृन्दैः ॥ १६ ॥
सुवर्णतारागणभूषितानि सूर्यप्रभाभानि शरावराणि । विदार्यमाणानि परश्वधैश्च प्रासैश्च खड्गैश्च निपेतुरुर्व्याम् ॥ १७ ॥
हाथी हाथीके आघातसे और पैदल पैदलकी चोटसे धराशायी होने लगे । श्रेष्ठ घोड़ोंके समूहपर उत्तम अश्वोंके समुदाय आक्रमण- प्रत्याक्रमण करते थे । ये सवारोंद्वारा किये हुए खड्ग और प्रासोंके आघातसे घायल होकर भयंकर और अद्भुत दिखायी देते थे । स्वर्णमय तारागणोंके चिह्नोंसे विभूषित सूर्यके समान चमकीले कवच फरसों, तलवारों और प्रासोंकी चोटसे विदीर्ण होकर धरतीपर गिर रहे थे ॥ १६-१७ ॥ गजैर्विषाणैर्वरहस्तरुग्णाः केचित् ससूता रथिनः प्रपेतुः । गजर्षभाश्चापि रथर्षभेण निपातिता बाणहताः पृथिव्याम् ॥ १८ ॥
दन्तार हाथियोंके दाँतों और सूँड़ोंके आघातसे रथ चूर- चूर हो जानेके कारण कितने ही रथी सारथि - सहित धरतीपर गिर पड़ते थे । कितने ही श्रेष्ठ रथियोंने बड़े बड़े हाथियोंको अपने बाणोंसे मारकर धराशायी कर दिया ॥ १८ ॥
गजौघवेगोद्धतसादितानां
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श्रुत्वा विषेदुः सहसा मनुष्याः । आर्तस्वनं सादिपदातियूनां विषाणगात्रावरताडितानाम् ॥ १ ९ ॥ हाथियोंके वेगसे कुचलकर कितने ही घुड़सवार और पैदल युवक मारे गये । वे उनके दाँतों और नीचेके अंगसे कुचलकर हताहत हो रहे थे । सहसा उनकी आर्त चीत्कार सुनकर सभी मनुष्योंको बड़ा खेद होता था ॥ १ ९ ॥ सम्भ्रान्तनागाश्वरथे मुहूर्ते महाक्षये सादिपदातियूनाम् । महारथैः सम्परिवार्यमाणो ददर्श भीष्मः कपिराजकेतुम् ॥ २० ॥
उस मुहूर्तमें जब कि घुड़सवारों और पैदल युवकोंका विकट संहार हो रहा था तथा हाथी, घोड़े और रथ सभी अत्यन्त घबराहटमें पड़े हुए थे, महा -रथियोंसे घिरे हुए भीष्मने वानरचिह्नसे युक्त ध्वजवाले अर्जुनको देखा ॥ २० ॥
तं पञ्चतालोच्छ्रिततालकेतुः सदश्ववेगाद्भुतवीर्ययानः । महास्त्रबाणाशनिदीप्तिमन्तं किरीटिनं शान्तनवोऽभ्यधावत् ॥ २१ ॥
भीष्मका ध्वज पाँच तालवृक्षोंसे चिह्नित और ऊँचा था । उनके रथमें अच्छे घोड़े जुते हुए थे, जिनके वेगसे वह रथ अद्भुत शक्तिशाली जान पड़ता था । उसपर आरूढ़ होकर शान्तनुनन्दन भीष्मने किरीटधारी अर्जुनपर धावा किया, जो बाण और अशनि आदि महान् दिव्यास्त्रोंकी दीप्तिसे उद्दीप्त हो रहे थे ॥ २१ ॥
तथैव शक्रप्रतिमप्रभाव- मिन्द्रात्मजं द्रोणमुखा विसस्रुः । कृपश्च शल्यश्च विविंशतिश्च दुर्योधनः सौमदत्तिश्च राजन् ॥ २२ ॥
राजन्! इसी प्रकार इन्द्रतुल्य प्रभावशाली इन्द्रकुमार अर्जुनपर द्रोणाचार्य, कृपाचार्य, शल्य, विविंशति, दुर्योधन तथा भूरिश्रवाने भी आक्रमण किया ॥ २२ ॥
ततो रथानां प्रमुखादुपेत्य
सर्वास्त्रवित् काञ्चनचित्रवर्मा ।
जवेन शूरोऽभिससार सर्वा- स्तानर्जुनस्यात्मसुतोऽभिमन्युः ॥ २३ ॥
तदनन्तर सम्पूर्ण अस्त्रोंके ज्ञाता, सोनेके विचित्र कवच धारण करनेवाले शूरवीर अर्जुनपुत्र अभिमन्युने एक श्रेष्ठ रथके द्वारा वेगपूर्वक वहाँ पहुँचकर उन समस्त कौरव
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महारथियोंपर धावा किया ॥ २३ ॥
तेषां महास्त्राणि महारथाना- मसह्यकर्मा विनिहत्य कार्ष्णिः । बभौ महामन्त्रहुतार्चिमाली सदोगतः सन् भगवानिवाग्निः ॥ २४ ॥
अर्जुनकुमारका पराक्रम दूसरोंके लिये असह्य था । वह उन कौरव महारथियोंके बड़े-बड़े अस्त्रोंको नष्ट करके यज्ञ मण्डपमें महान् मन्त्रोंद्वारा हविष्यकी आहुति पाकर प्रज्वलित हुई ज्वालामालाओंसे अलंकृत भगवान् अग्निदेवके समान शोभा पाने लगा ॥ २४ ॥
ततः स तूर्णं रुधिरोदफेनां कृत्वा नदीमाशु रणे रिपूणाम् । जगाम सौभद्रमतीत्य भीष्मो महारथं पार्थमदीनसत्त्वः ॥ २५ ॥
तदनन्तर उदार शक्तिशाली भीष्मने रणभूमिमें तुरंत ही शत्रुओंके रक्तरूपी जल एवं फेनसे भरी नदी बहाकर सुभद्राकुमार अभिमन्युको टालकर महारथी अर्जुनपर आक्रमण किया ॥ २५ ॥
ततः प्रहस्याद्भुतविक्रमेण गाण्डीवमुक्तेन शिलाशितेन । विपाठजालेन महास्त्रजालं विनाशयामास किरीटमाली ॥ २६ । तब किरीटधारी अर्जुनने हँसकर अद्भुत पराक्रम दिखाते हुए गाण्डीव धनुषसे छोड़े और शिलापर रगड़कर तेज किये हुए विपाठ नामक बाणोंके समूहसे शत्रुओंके बड़े - बड़े अस्त्रोंके जालको छिन्न- भिन्न कर दिया ॥ २६ ॥
तमुत्तमं सर्वधनुर्धराणा- मसक्तकर्मा कपिराजकेतुः । भीष्मं महात्माभिववर्ष तूर्णं शरौघजालैर्विमलैश्च भल्लैः ॥ २७ ॥
तत्पश्चात् अप्रतिहत पराक्रमवाले महामना कपि- ध्वज अर्जुनने सम्पूर्ण धनुर्धरोंमें श्रेष्ठ भीष्मपर तुरंत ही निर्मल भल्लों तथा बाणसमूहोंकी वर्षा आरम्भ कर दी ॥ २७ ॥
तथैव भीष्माहतमन्तरिक्षे महास्त्रजालं कपिराजकेतोः । विशीर्यमाणं ददृशुस्त्वदीया दिवाकरेणेव तमोऽभिभूतम् ॥ २८ ॥
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इसी प्रकार आपके सैनिकोंने देखा कि आकाशमें कपिध्वज अर्जुनके बिछाये हुए महान् अस्त्रजालको भीष्मजीने अपने अस्त्रोंके आघातसे उसी प्रकार छिन्न - भिन्न कर दिया है, जैसे भगवान् सूर्य अन्धकारराशिको नष्ट कर देते हैं ॥ २८ ॥
एवंविधं कार्मुकभीमनाद- मदीनवत् सत्पुरुषोत्तमाभ्याम् । ददर्श लोकः कुरुसंजयाश्च तद् द्वैरथं भीष्मधनंजयाभ्याम् ॥ २ ९ ॥ इस तरह सत्पुरुषोंमें श्रेष्ठ भीष्म और अर्जुनमें धनुषोंकी भयंकर टंकारसे युक्त, दैन्यरहित द्वैरथ- युद्ध होने लगा, जिसे कौरव और संजय वीरों तथा दूसरे लोगोंने भी देखा ॥ २ ९ ॥ इति श्रीमहाभारते भीष्मपर्वणि भीष्मवधपर्वणि भीष्मार्जुनद्वैरथे षष्टितमोऽध्यायः ॥ ६० ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत भीष्मपर्वके अन्तर्गत भीष्मवधपर्वमें भीष्म और अर्जुनके द्वैरथ- युद्धसे सम्बन्ध रखनेवाला साठवाँअध्याय पूरा हुआ ॥ ६० ॥
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एकषष्टितमोऽध्यायः अभिमन्युका पराक्रम और धृष्टद्युम्नद्वारा शलके पुत्रका वध संजय उवाच
द्रौणिर्भूरिश्रवाः शल्यश्चित्रसेनश्च मारिष ।
पुत्रः सांयमनेश्चैव सौभद्रं पर्यवारयन् ॥ १ ॥
संजय कहते हैं— माननीय राजन्! द्रोणपुत्र अश्वत्थामा, भूरिश्रवा, शल्य, चित्रसेन तथा शलके पुत्रने सुभद्राकुमार अभिमन्युको आगे बढ़नेसे रोका ॥ १ ॥
संसक्तमतितेजोभिस्तमेकं ददृशुर्जनाः ।
पञ्चभिर्मनुजव्याघ्रैर्गजैः सिंहशिशुं यथा ॥ २ ॥
जैसे सिंहका बच्चा पाँच हाथियोंसे भिड़ा हुआहो, उसी प्रकार सुभद्राकुमार अभिमन्यु उन अत्यन्त तेजस्वी पाँच पुरुषसिंहोंसे अकेला ही युद्ध कर रहा था । यह बात वहाँ सब लोगोंने प्रत्यक्ष देखी ॥ २ ॥
नातिलक्ष्यतया कश्चिन्न शौर्ये न पराक्रमे ।
बभूव सदृशः कार्ष्णेर्नास्त्रे नापि च लाघवे ॥ ३ ॥
लक्ष्य वेधने, शौर्य प्रकट करने, पराक्रम दिखाने, अस्त्रज्ञान प्रदर्शित करने तथा हाथोंकी फुर्तीमें कोई भी अभिमन्युकी समानता न कर सका ॥ ३ ॥
तथा तमात्मजं युद्धे विक्रमन्तमरिंदमम् ।
दृष्ट्वा पार्थः सुसंयत्तं सिंहनादमथानदत् ॥ ४ ॥
अपने शत्रुसूदन पुत्र अभिमन्युको युद्धमें इस प्रकार प्रयत्नपूर्वक पराक्रम प्रकट करते देख कुन्तीपुत्र अर्जुनने सिंहके समान गर्जना की ॥ ४ ॥
पीडयानं तु तत् सैन्यं पौत्रं तव विशाम्पते ।
दृष्ट्वा त्वदीया राजेन्द्र समन्तात् पर्यवारयन् ॥ ५ ॥
प्रजानाथ! राजेन्द्र! आपके पौत्र अभिमन्युको कौरवसेनाको पीड़ा देते देख आपके ही सैनिकोंने सब ओरसे घेर लिया ॥ ५ ॥
ध्वजिनीं धार्तराष्ट्राणां दीनशत्रुरदीनवत् ।
प्रत्युद्ययौ स सौभद्रस्तेजसा च बलेन च ॥ ६ ॥
अपने शत्रुओंको दीन बना देनेवाले सुभद्राकुमारने दैन्यरहित होकर अपने तेज और बलसे कौरवसेनापर धावा किया ॥ ६ ॥
तस्य लाघवमार्गस्थमादित्यसदृशप्रभम् ।
व्यदृश्यत महच्चापं समरे युध्यतः परैः ॥ ७ ॥
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समरभूमिमें शत्रुओंके साथ युद्ध करते हुए अभिमन्युका विशाल धनुष अस्त्रलाघवके पथपर स्थित हो सूर्यके समान प्रकाशित हो रहा था ॥ ७ ॥
स द्रौणिमिषुणैकेन विद्ध्वा शल्यं च पञ्चभिः ।
ध्वजं सांयमनेश्चैव सोऽष्टाभिश्चिच्छिदे ततः ॥ ८ ॥
उसने अश्वत्थामाको एक और शल्यको पाँच बाणोंसे घायल करके शलके ध्वजको आठ बाणोंसे काट डाला ॥ ८ ॥
रुक्मदण्डां महाशक्तिं प्रेषितां सौमदत्तिना ।
शितेनोरगसंकाशां पत्रिणापजहार ताम् ॥ ९ ॥
फिर भूरिश्रवाकी चलायी हुई स्वर्णदण्डविभूषित सर्पसदृश महाशक्तिको तीखे बाणसे छिन्न - भिन्न कर डाला ॥ ९ ॥
शल्यस्य च महावेगानस्यतः समरे शरान् । ( धनुश्चिच्छेद भल्लेन तीव्रवेगेन फाल्गुनिः । ) निवार्यार्जुनदायादो जघान चतुरो हयान् ॥ १० ॥
शल्य समरभूमिमें बड़े वेगशाली बाणोंका प्रहार कर रहे थे; किंतु अर्जुनपुत्र अभिमन्युने तीव्र वेगवाले भल्लसे उनके धनुषके टुकड़े -टुकड़े कर दिये और उनकी प्रगतिको रोककर पार्थकुमारने चारों घोड़ोंको मार गिराया ॥ १० ॥
भूरिश्रवाश्च शल्यश्च द्रौणिः सांयमनिः शलः ।
नाभ्यवर्तन्त संरब्धाः कार्ष्णेर्बाहुबलोदयम् ॥ ११ ॥
भूरिश्रवा, शल्य, अश्वत्थामा तथा सांयमनि ( सोमदत्तपुत्र) शल – ये सब लोग अत्यन्त क्रोधमें भरे हुए थे, तथापि अभिमन्युके बाहुबलकी वृद्धिको रोक न सके ॥ ११ ॥
ततस्त्रिगर्ता राजेन्द्र मद्राश्च सह केकयैः ।
पञ्चविंशतिसाहस्रास्तव पुत्रेण चोदिताः ॥ १२ ॥
धनुर्वेदविदो मुख्या अजेयाः शत्रुभिर्युधि ।
सहपुत्रं जिघांसन्तं परिवव्रुः किरीटिनम् ॥ १३ ॥
राजेन्द्र! तब आपके पुत्र दुर्योधनसे प्रेरित होकर त्रिगर्तों तथा केकयोंसहित मद्रदेशके पचीस हजार योद्धाओंने शत्रुवधकी इच्छा रखनेवाले पुत्रसहित किरीटधारी अर्जुनको घेर लिया । वे सब- के - सब धनुर्वेदके प्रधान ज्ञाता और युद्धस्थलमें शत्रुओंके लिये अजेय थे ॥ १२-१३ ॥
तौ तु तत्र पितापुत्रौ परिक्षिप्तौ महारथौ ।
ददर्श राजन् पाञ्चाल्यः सेनापतिररिंदम ॥ १४ ॥
स वारणरथौघानां सहस्रैर्बहुभिर्वृतः ।
वाजिभिः पत्तिभिश्चैव वृतः शतसहस्रशः ॥ १५ ॥
धनुर्विस्फार्य संक्रुद्धो नोदयित्वा च वाहिनीम् ।
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ययौ तं मद्रकानीकं केकयांश्च परंतप ॥ १६ ॥
शत्रुदमन नरेश! पिता -पुत्र महारथी अर्जुन और अभिमन्युको शत्रुओंद्वारा घिरे हुए देख पांचालराजकुमार सेनापति धृष्टद्युम्न कई हजार हाथियों और रथों तथा सैकड़ों- हजारों घुड़सवारों एवं पैदलोंसे घिरकर अपनी विशाल वाहिनीको आगे बढ़ाते तथा क्रोधपूर्वक धनुषकी टंकार करते हुए मद्रों और केकयोंकी सेनापर चढ़ आये ॥ १४–१६ ॥
तेन कीर्तिमता गुप्तमनीकं दृढधन्वना ।
संरब्धरथनागाश्वं योत्स्यमानमशोभत ॥ १७ ॥
सुदृढ़ धनुष धारण करनेवाले यशस्वी धृष्टद्युम्नसे सुरक्षित हुई वह सेना युद्धके लिये उद्यत हो बड़ी शोभा पाने लगी, उसके रथी, हाथीसवार और घुड़सवार सभी रोषावेशमें भरे हुए थे ॥ १७ ॥
सोऽर्जुनप्रमुखे यान्तं पाञ्चालकुलवर्धनः ।
त्रिभिः शारद्वतं बाणैर्जत्रुदेशे समार्पयत् ॥ १८ ॥
पांचालवंशकी वृद्धि करनेवाले धृष्टद्युम्नने अर्जुनके सामने जाते हुए कृपाचार्यको उनके गलेकी हँसलीपर तीन बाण मारे ॥ १८ ॥
ततः स मद्रकान् हत्वा दशैव दशभिः शरैः ।
पृष्ठरक्षं जघानाशु भल्लेन कृतवर्मणः ॥ १ ९ ॥
तत्पश्चात् दस बाणोंसे मद्रदेशीय दस योद्धाओंको मारकर तुरंत ही एक भल्लके द्वारा कृतवर्माके पृष्ठ - रक्षकको मार डाला ॥ १ ९ ॥
दमनं चापि दायादं पौरवस्य महात्मनः ।
जघान विमलाग्रेण नाराचेन परंतपः ॥ २० ॥
इसके बाद शत्रुओंको संताप देनेवाले पाण्डव सेनापतिने निर्मल धारवाले नाराचसे महामना'पौरव पुत्र दमनको भी मार डाला ॥ २० ॥
ततः सांयमनेः पुत्रः पाञ्चाल्यं युद्धदुर्मदम् ।
अविध्यत् त्रिंशता बाणैर्दशभिश्चास्य सारथिम् ॥ २१ ॥
तब शलके पुत्रने तीस बाणोंसे रणदुर्मद धृष्टद्युम्नको और दस बाणोंद्वारा उनके सारथिको घायल कर दिया ॥
सोऽतिविद्धो महेष्वासः सृक्किणी परिसंलिहन् ।
भल्लेन भृशतीक्ष्णेन निचकर्तास्य कार्मुकम् ॥ २२ ॥
इस प्रकार अत्यन्त घायल होकर अपने मुँहके दोनों कोनोंको चाटते हुए महाधनुर्धर धृष्टद्युम्नने अत्यन्त तीखे भल्लसे शलके पुत्रका धनुष काट दिया ॥ २२ ॥
अथैनं पञ्चविंशत्या क्षिप्रमेव समार्पयत् ।
अश्वांश्चास्यावधीद् राजन्नुभौ तौ पार्ष्णि सारथी ॥ २३ ॥