श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड ३ — पृष्ठ 1841–1850
महाभारत — खण्ड ३ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1841–1850
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क्षयं कुरूणामिव चिन्तयित्वा ॥ ९ ३ ॥ महेन्द्रके छोटे भाई श्रीकृष्ण कुपित हो हाथमें चक्र उठाये बड़े चोरसे गरज रहे थे । उन्हें इस रूपमें देखकर कौरवोंके संहारका विचार करके सभी प्राणी हाहाकार करने लगे ॥ ९ ३ ॥ स वासुदेवः प्रगृहीतचक्रः संवर्तयिष्यन्निव सर्वलोकम् । अभ्युत्पतँल्लोकगुरुर्बभासे भूतानि धक्ष्यन्निव धूमकेतुः ॥ ९ ४ ॥ वे जगद्गुरु वसुदेवनन्दन श्रीकृष्ण हाथमें चक्र ले मानो सम्पूर्ण जगत्का संहार करनेके लिये उद्यत थे और समस्त प्राणियोंको जलाकर भस्म कर डालनेके लिये उठी हुई प्रलयाग्निके समान प्रकाशित हो रहे थे ॥ ९ ४ ॥ तमाद्रवन्तं प्रगृहीतचक्रं दृष्ट्वा देवं शान्तनवस्तदानीम् । असम्भ्रमं तद् विचकर्ष दोर्भ्यां महाधनुर्गाण्डिवतुल्यघोषम् ॥ ९ ५ ॥ भगवान्को चक्र लिये अपनी ओर वेगपूर्वक आते देख शान्तनुनन्दन भीष्म उस समय तनिक भी भय अथवा घबराहटका अनुभव न करते हुए दोनों हाथोंसे गाण्डीव धनुषके समान गम्भीर घोष करनेवाले अपने महान् धनुषको खींचने लगे ॥ ९ ५ ॥ उवाच भीष्मस्तमनन्तपौरुषं गोविन्दमाजावविमूढचेताः । एह्येहि देवेश जगन्निवास नमोऽस्तु ते माधव चक्रपाणे ॥ ९ ६ ॥ प्रसह्य मां पातय लोकनाथ रथोत्तमात् सर्वशरण्य संख्ये ॥ ९७ ॥
उस समय युद्ध स्थलमें भीष्मके चित्तमें तनिक भी मोह नहीं था । वे अनन्त पुरुषार्थशाली भगवान् श्रीकृष्णका आह्वान करते हुए बोले- ' आइये, आइये, देवेश्वर! जगन्निवास! आपको नमस्कार है । हाथमें चक्र लिये आये हुए माधव! सबको शरण देनेवाले लोकनाथ! आज युद्धभूमिमें बलपूर्वक इस उत्तम रथसे मुझे मार गिराइये ॥ ९ ६- ९ ७ ॥ त्वया हतस्यापि ममाद्य कृष्ण श्रेयः परस्मिन्निह चैव लोके । सम्भावितोऽस्म्यन्धकवृष्णिनाथ लोकैस्त्रिभिर्वीर तवाभियानात् ॥ ९ ८ ॥
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' श्रीकृष्ण! आज आपके हाथसे यदि मैं मारा जाऊँगा तो इहलोक और परलोकमें भी मेरा कल्याण होगा । अन्धक और वृष्णिकुलकी रक्षा करनेवाले वीर! आपके इस आक्रमणसे तीनों लोकोंमें मेरा गौरव बढ़ गया ' ॥ ९ ८ ॥ रथादवप्लुत्य ततस्त्वरावान् पार्थोऽप्यनुद्रुत्य यदुप्रवीरम् । जग्राह पीनोत्तमलम्बबाहुं बाह्वोर्हरिं व्यायतपीनबाहुः ॥ ९९ ॥
मोटी, लंबी और उत्तम भुजाओंवाले यदुकुलके श्रेष्ठ वीर भगवान् श्रीकृष्णको आगे बढ़ते देख अर्जुन भी बड़ी उतावलीके साथ रथसे कूदकर उनके पीछे दौड़े और निकट जाकर भगवान्की दोनों बाहें पकड़ लीं । अर्जुनकी भुजाएँ भी मोटी और विशाल थीं ॥ ९९ ॥
निगृह्यमाणश्च तदाऽऽदिदेवो
भृशं सरोषः किल चात्मयोगी ।
आदाय वेगेन जगाम विष्णु- र्जिष्णुं महावात इवैकवृक्षम् ॥ १००
आदिदेव आत्मयोगी भगवान् श्रीकृष्ण बहुत रोषमें भरे हुए थे । वे अर्जुनके पकड़नेपर भी रुक न सके । जैसे आँधी किसी वृक्षको खींचे लिये चली जाय, उसी प्रकार वे भगवान् विष्णु अर्जुनको लिये हुए ही बड़े वेगसे आगे बढ़ने लगे ॥ १०० ॥
पार्थस्तु विष्टभ्य बलेन पादौ भीष्मान्तिकं तूर्णमभिद्रवन्तम् । बलान्निजग्राह हरिं किरीटी पदेऽथ राजन् दशमे कथञ्चित् ॥ १०१ ॥
राजन्! तब किरीटधारी अर्जुनने भीष्मके निकट बड़े वेगसे जाते हुए श्रीहरिके चरणोंको बलपूर्वक पकड़ लिया और किसी प्रकार दसवें कदमपर पहुँचते - पहुँचते उन्हें रोका ॥ १०१ ॥
अवस्थितं च प्रणिपत्य कृष्णं प्रीतोऽर्जुनः काञ्चनचित्रमाली । उवाच कोपं प्रतिसंहरेति गतिर्भवान् केशव पाण्डवानाम् ॥ १०२ ॥
जब श्रीकृष्ण खड़े हो गये, तब सुवर्णका विचित्र हार पहने हुए अर्जुनने अत्यन्त प्रसन्न हो उनके चरणोंमें प्रणाम करके कहा– ' केशव! आप अपना क्रोध रोकिये । प्रभो! आप ही पाण्डवोंके परम आश्रय हैं ॥ १०२ ॥
न हास्यते कर्म यथाप्रतिज्ञं
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पुत्रैः शपे केशव सोदरैश्च । अन्तं करिष्यामि यथा कुरूणां त्वयाहमिन्द्रानुज सम्प्रयुक्तः ॥ १०३ ॥
‘ केशव! अब मैं अपनी प्रतिज्ञाके अनुसार कर्तव्यका पालन करूँगा, उसका त्याग कभी नहीं करूँगा । यह बात मैं अपने पुत्रों और भाइयोंकी शपथ खाकर कहता हूँ । उपेन्द्र! आपकी आज्ञा मिलनेपर मैं समस्त कौरवोंका अन्त कर डालूँगा' ॥ १०३ ॥
ततः प्रतिज्ञां समयं च तस्य जनार्दनः प्रीतमना निशम्य । स्थितः प्रिये कौरवसत्तमस्य रथं सचक्रः पुनरारुरोह ॥ १०४ ॥
अर्जुनकी यह प्रतिज्ञा और कर्तव्य पालनका यह निश्चय सुनकर भगवान् श्रीकृष्णका मन प्रसन्न हो गया । वे कुरुश्रेष्ठ अर्जुनका प्रिय करनेके लिये उद्यत हो पुनः चक्र लिये रथपर जा बैठे ॥ १०४ ॥
स तानभीषून् पुनराददानः प्रगृह्य शङ्खं द्विषतां निहन्ता । निनादयामास ततो दिशश्च स पाञ्चजन्यस्य रवेण शौरिः ॥ १०५ ॥
शत्रुओंका संहार करनेवाले भगवान् श्रीकृष्णने पुन: घोड़ोंकी बागडोर सँभाली और पांचजन्य शंख लेकर उसकी ध्वनिसे सम्पूर्ण दिशाओंको प्रतिध्वनित कर दिया ॥ १०५ ॥
व्याविद्धनिष्काङ्गदकुण्डलं तं रजोविकीर्णाञ्चितपद्मनेत्रम् । विशुद्धदंष्ट्रं प्रगृहीतशङ्खं विचुक्रुशुः प्रेक्ष्य कुरुप्रवीराः ॥ १०६ ॥
उस समय उनके कण्ठका हार, भुजाओंके बाजू- बन्द और कानोंके कुण्डल हिलने लगे थे । उनके कमलके समान सुन्दर नेत्रोंपर सेनासे उठी हुई धूल बिखरी थी । उनकी दन्तावली शुद्ध एवं स्वच्छ थी और उन्होंने अपने हाथमें शंख ले रखा था । उस अवस्थामें श्रीकृष्णको देखकर कौरवपक्षके प्रमुख वीर कोलाहल कर उठे ॥ १०६ ॥
मृदङ्गभेरीपणवप्रणादा नेमिस्वना दुन्दुभिनिःस्वनाश्च । ससिंहनादाश्च बभूवुरुग्राः सर्वेष्वनीकेषु ततः कुरूणाम् ॥ १०७ ॥
तत्पश्चात् कौरवोंके सम्पूर्ण सैन्यदलोंमें मृदंग, भेरी पणव तथा दुन्दुभिकी ध्वनि होने लगी । रथके पहियोंकी घरघराहट सुनायी देने लगी । वे सभी शब्द वीरोंके सिंहनादसे
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मिलकर अत्यन्त उग्र प्रतीत हो रहे थे ॥ १०७ ॥
गाण्डीवघोषः स्तनयित्नुकल्पो जगाम पार्थस्य नभो दिशश्च । जग्मुश्च बाणा विमलाः प्रसन्नाः सर्वा दिशः पाण्डवचापमुक्ताः ॥ १०८ ॥
अर्जुनके गाण्डीव धनुषका गम्भीर घोष मेघकी गर्जनाके समान आकाश तथा सम्पूर्ण दिशाओंमें फैल गया तथा उनके धनुषके छूटे हुए निर्मल एवं स्वच्छ बाण सम्पूर्ण दिशाओंमें बरसने लगे ॥ १०८ ॥
तं कौरवाणामधिपो जवेन भीष्मेण भूरिश्रवसा च सार्धम् । अभ्युद्ययावुद्यतबाणपाणिः कक्षं दिधक्षन्निव धूमकेतुः ॥ १० ९ ॥ उस समय कौरवराज दुर्योधन हाथमें धनुष -बाण लिये बड़े वेगसे अर्जुनके सामने आया, मानो घास - फूँसको जलानेके लिये प्रज्वलित आग बढ़ती चली आ रही हो । भीष्म और भूरिश्रवाने भी दुर्योधनका साथ दिया ॥ १० ९ ॥ अथार्जुनाय प्रजिघाय भल्लान् भूरिश्रवाः सप्त सुवर्णपुङ्खान् । दुर्योधनस्तोमरमुग्रवेगं शल्यो गदां शान्तनवश्च शक्तिम् ॥ ११० ॥
तदनन्तर भूरिश्रवाने सोनेके पंखसे युक्त सात भल्ल अर्जुनपर चलाये । दुर्योधनने भयंकर वेगशाली तोमरका प्रहार किया । शल्यने गदा और शान्तनुनन्दन भीष्मने शक्ति चलायी ॥ ११० ॥
स सप्तभिः सप्त शरप्रवेकान् संवार्य भूरिश्रवसा विसृष्टान् । शितेन दुर्योधनबाहुमुक्तं क्षुरेण तत् तोमरमुन्ममाथ ॥ १११ ॥
अर्जुनने सात बाणोंसे भूरिश्रवाके छोड़े हुए सातों भल्लोंको काटकर तीखे छूरेसे दुर्योधनकी भुजाओंसे मुक्त हुए उस तोमरको भी नष्ट कर दिया ॥ १११ ॥
ततः शुभामापततीं स शक्तिं विद्युत्प्रभां शान्तनवेन मुक्ताम् । गदां च मद्राधिपबाहुमुक्तां द्वाभ्यां शराभ्यां निचकर्त वीरः ॥ ११२ ॥
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तत्पश्चात् वीर अर्जुनने शान्तनुनन्दन भीष्मकी छोड़ी हुई बिजलीके समान चमकीली और शोभामयी शक्तिको तथा मद्रराज शल्यकी भुजाओंसे मुक्त हुई गदाको भी दो बाणोंसे काट डाला ॥ ११२ ॥
ततो भुजाभ्यां बलवद् विकृष्य चित्रं धनुर्गाण्डिवमप्रमेयम् । माहेन्द्रमस्त्रं विधिवत् सुघोरं प्रादुश्चकाराद्भुतमन्तरिक्षे ॥ ११३ ॥
तदनन्तर अप्रमेय शक्तिशाली विचित्र गाण्डीव धनुषको दोनों भुजाओंसे बलपूर्वक खींचकर अर्जुनने विधिपूर्वक अत्यन्त भयंकर माहेन्द्र अस्त्रको प्रकट किया । वह अद्भुत अस्त्र अन्तरिक्षमें चमक उठा ॥ ११३ ॥
तेनोत्तमास्त्रेण ततो महात्मा सर्वाण्यनीकानि महाधनुष्मान् । शरौघजालैर्विमलाग्निवर्णै- र्निवारयामास किरीटमाली ॥ ११४ ॥
फिर किरीटधारी महामना महाधनुर्धर अर्जुनने उस उत्तम अस्त्रद्वारा निर्मल एवं अग्निके समान प्रज्वलित बाणोंका जाल-सा बिछाकर कौरवोंके समस्त सैनिकोंको आगे बढ़नेसे रोक दिया ॥ ११४ ॥
शिलीमुखाः पार्थधनुःप्रमुक्ता रथान् ध्वजाग्राणि धनूंषि बाहून् । निकृत्य देहान् विविशुः परेषां नरेन्द्रनागेन्द्रतुरङ्गमाणाम् ॥ ११५ ॥
अर्जुनके धनुषसे छूटे हुए बाण शत्रुओंके रथ, ध्वजाग्र, धनुष और बाहु काटकर नरेशों, गजराजों तथा घोड़ोंके शरीरोंमें घुसने लगे ॥ ११५ ॥
ततो दिशः सोऽनुदिशश्च पार्थः शरैः सुधारैः समरे वितत्य । गाण्डीवशब्देन मनांसि तेषां किरीटमाली व्यथयाञ्चकार ॥ ११६ ॥
तदनन्तर तीखी धारवाले बाणोंसे युद्धस्थलमें सम्पूर्ण दिशाओं और कोणोंको आच्छादित करके किरीटधारी अर्जुनने गाण्डीव धनुषकी टंकारसे कौरवोंके मनमें भारी व्यथा उत्पन्न कर दी ॥ ११६ ॥
तस्मिंस्तथा घोरतमे प्रवृत्ते शङ्खस्वना दुन्दुभिनिःस्वनाश्च । अन्तर्हिता गाण्डिवनिःस्वनेन
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बभूवुरुग्राश्वरथप्रणादाः ॥ ११७ ॥
इस प्रकारके उस अत्यन्त भयंकर युद्धमें शंख- ध्वनि, दुन्दुभि - ध्वनि तथा घोड़ों और रथके पहियोंके भयंकर शब्द गाण्डीव धनुषकी टंकारके सामने दब गये ॥ ११७ ॥
गाण्डीवशब्दं तमथो विदित्वा
विराटराजप्रमुखाः प्रवीराः ।
पाञ्चालराजो द्रुपदश्च वीर- स्तं देशमाजग्मुरदीनसत्त्वाः ॥ ११८ ॥
तब उस गाण्डीवके शब्दको पहचानकर राजा विराट आदि प्रमुख वीर और वीरवर पांचालराज द्रुपद — ये सभी उदारचित्त नरेश उस स्थानपर आ गये ॥ ११८ ॥
सर्वाणि सैन्यानि तु तावकानि
यतो यतो गाण्डिवजः प्रणादः ।
ततस्ततः संनतिमेव जग्मु- र्न तं प्रतीपोऽभिससार कश्चित् ॥ ११ ९ ॥
जहाँ -जहाँ गाण्डीव धनुषकी टंकार होती, वहाँ -वहाँ आपके सारे सैनिक मस्तक टेक देते थे । कोई भी उनके प्रतिकूल आक्रमण नहीं करता था ॥ ११ ९ ॥ तस्मिन् सुघोरे नृपसम्प्रहारे हताः प्रवीराः सरथाश्वसूताः । गजाश्च नाराचनिपाततप्ता महापताकाः शुभरुक्मकक्ष्याः ॥ १२० ॥
परीतसत्त्वाः सहसा निपेतुः किरीटिना भिन्नतनुत्रकायाः । दृढं हताः पत्रिभिरुग्रवेगैः पार्थेन भल्लैर्विमलैः शिताग्रैः ॥ १२१ ॥
राजाओंके उस भयानक संग्राममें रथ, घोड़े और सारथिसहित बड़े - बड़े वीर मारे गये । सुन्दर सुनहरे रस्सोंसे कसे हुए, बड़ी - बड़ी पताकाओंवाले हाथी नाराचोंकी मारसे पीड़ित हो शक्ति और चेतना खोकर सहसा धराशायी हो गये । कुन्तीकुमार अर्जुनके भयंकर वेगवाले तीखे एवं पंखयुक्त निर्मल भल्लोंसे गहरी चोट पड़नेपर कवच और शरीर दोनोंके विदीर्ण हो जानेसे कौरव सैनिक सहसा प्राणशून्य होकर गिर जाते थे ॥ १२०-१२१ ॥ निकृत्तयन्त्रा निहतेन्द्रकीला ध्वजा महान्तो ध्वजिनीमुखेषु । पदातिसङ्घाश्च रथाश्च संख्ये हयाश्च नागाश्च धनंजयेन ॥ १२२ ॥
बाणाहतास्तूर्णमपेतसत्त्वा
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विष्टभ्य गात्राणि निपेतुरुर्व्याम् । ऐन्द्रेण तेनास्त्रवरेण राजन् महाहवे भिन्नतनुत्रदेहाः ॥ १२३ ॥
युद्धके मुहानेपर जिनके यन्त्र कट गये और इन्द्रकील नष्ट हो गये थे, ऐसे बड़े - बड़े ध्वज छिन्न - भिन्न होकर गिरने लगे । उस संग्राममें अर्जुनके बाणोंसे घायल पैदलोंके समूह, रथी, घोड़े और हाथी शीघ्र ही सत्त्वशून्य होकर अपने अंगोंको पकड़े हुए पृथ्वीपर गिरने लगे । राजन्! उस महान् ऐन्द्रास्त्रसे समरभूमिमें सभी सैनिकोंके शरीर और कवच छिन्न-भिन्न हो गये ॥ १२२-१२३ ॥ ततः शरौघैर्निशितैः किरीटिना नृदेहशस्त्रक्षतलोहितोदा । नदी सुघोरा नरमेदफेना प्रवर्तिता तत्र रणाजिरे वै ॥ १२४ ॥
उस समय समरांगणमें किरीटधारी अर्जुनने अपने तीखे बाणसमूहोंद्वारा योद्धाओंके शरीरमें लगे हुए आघातसे निकलनेवाले रक्तकी एक भयंकर नदी बहा दी; जिसमें मनुष्योंके मेदे फेनके समान जान पड़ते थे ॥ १२४ ॥
वेगेन सातीव पृथुप्रवाहा परेतनागाश्वशरीररोधा । नरेन्द्रमज्जोच्छ्रितमांसपङ्का प्रभूतरक्षोगणभूतसेविता ॥ १२५ ॥
वह नदी बड़े वेगसे बह रही थी । उसका प्रवाह पुष्ट था । मरे हुए हाथी, घोड़ोंके शरीर तटोंके समान प्रतीत होते थे । राजाओंके मज्जा और मांस कीचड़के समान थे । बहुत -से राक्षस और भूतगण उसका सेवन करते थे ॥ १२५ ॥
शिरःकपालाकुलकेशशाद्वला शरीरसङ्घातसहस्रवाहिनी । विशीर्णनानाकवचोर्मिसंकुला नराश्वनागास्थिनिकृत्तशर्करा ॥ १२६ ॥
मुर्दोंकी खोपड़ियोंके केश सेवारका भ्रम उत्पन्न करते थे । सहस्रों शरीर उसमें जल-जन्तुओंके समान बह रहे थे । छिन्न- भिन्न होकर बिखरे हुए कवच लहरोंके समान उसमें सर्वत्र व्याप्त थे । मनुष्यों, घोड़ों और हाथियोंकी कटी हुई हड्डियाँ छोटे - छोटे कंकड़-पत्थरोंका काम दे रही थीं ॥ १२६ ॥
श्वकङ्कशालावृकगृध्रकाकैः क्रव्यादसङ्घैश्च तरक्षुभिश्च । उपेतकूलां ददृशुर्मनुष्याः
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क्रूरां महावैतरणीप्रकाशाम् ॥ १२७ ॥
उसके दोनों किनारोंपर कुत्ते, कौवे, भेड़िये, गीध, कंक, तरक्षु- तथा अन्यान्य मांसभक्षी जन्तु निवास करते थे । उस भयानक नदीको लोगोंने महावैतरणीके समान देखा ॥ १२७ ॥
प्रवर्तितामर्जुनबाणसङ्घै- र्मेदोवसासृक्प्रवहां सुभीमाम् । हतप्रवीरां च तथैव दृष्ट्वा सेनां कुरूणामथ फाल्गुनेन ॥ १२८ ॥
ते चेदिपाञ्चालकरूषमत्स्याः पार्थाश्च सर्वे सहिताः प्रणेदुः । जयप्रगल्भाः पुरुषप्रवीराः संत्रासयन्तः कुरुवीरयोधान् ॥ १२ ९ ॥ अर्जुनके बाणसमूहोंसे उस नदीका प्राकट्य हुआ था । वह चर्बी, मज्जा तथा रक्त बहानेके कारण बड़ी भयंकर जान पड़ती थी । इस प्रकार कौरवसेनाके प्रधान प्रधान वीर अर्जुनके द्वारा मारे गये । यह देखकर चेदि, पांचाल, करूष और मत्स्यदेशके क्षत्रिय तथा कुन्तीके पुत्र- ये सभी नरवीर विजय पानेसे निर्भय हो कौरवयोद्धाओंको भयभीत करते हुए एक साथ सिंहनाद करने लगे ॥ हतप्रवीराणि बलानि दृष्ट्वा किरीटिना शत्रुभयावहेन । वित्रास्य सेनां ध्वजिनीपतीनां सिंहो मृगाणामिव यूथसङ्घान् ॥ १३० ॥
विनेदतुस्तावतिहर्षयुक्तौ गाण्डीवधन्वा च जनार्दनश्च । शत्रुओंको भय देनेवाले किरीटधारी अर्जुनके द्वारा कौरवसेनाके प्रमुख वीरोंको मारे गये देख पाण्डवपक्षके वीरोंको बड़ी प्रसन्नता हुई थी । गाण्डीवधारी अर्जुन तथा भगवान् श्रीकृष्ण मृगोंके यूथोंको भयभीत करनेवाले सिंहके समान कौरवसेनापतियोंकी सारी सेनाको संत्रस्त करके अत्यन्त हर्षमें भरकर गर्जना करने लगे ॥ १३०३ ॥
ततो रविं संवृतरश्मिजालं दृष्ट्वा भृशं शस्त्रपरिक्षताङ्गाः ॥ १३१ ॥
तदैन्द्रमस्त्रं विततं च घोर- मसह्यमुद्वीक्ष्य युगान्तकल्पम् । अथापयानं कुरवः सभीष्माः सद्रोणदुर्योधनबाह्लिकाश्च ॥ १३२ ॥
चक्रुर्निशां संधिगतां समीक्ष्य
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विभावसोर्लोहितरागयुक्ताम् । तदनन्तर शस्त्रोंके आघातसे अत्यन्त क्षत- विक्षत अंगोंवाले भीष्म, द्रोण, दुर्योधन, बाह्लिक तथा अन्य कौरवयोद्धाओंने सूर्यदेवको अपनी किरणोंको समेटते देख और उस भयंकर ऐन्द्रास्त्रको प्रलयंकर अग्निके समान सर्वत्र व्याप्त एवं असह्य हुआ जानकर सूर्यकी लालीसे युक्त संध्या एवं निशाके आरम्भकालका अवलोकन कर सेनाको युद्धभूमिसे लौटा लिया ॥ १३१-१३२ ॥ अवाप्य कीर्तिं च यशश्च लोके विजित्य शत्रूंश्च धनंजयोऽपि ॥ १३३ ॥
ययौ नरेन्द्रैः सह सोदरैश्च समाप्तकर्मा शिबिरं निशायाम् । धनंजय भी शत्रुओंको जीतकर एवं लोकमें सुयश और सुकीर्ति पाकर भाइयों तथा राजाओंके साथ सारा कार्य समाप्त करके निशाके आरम्भमें अपने शिविरको लौट गये ॥ १३३ ॥
ततः प्रजज्ञे तुमुलः कुरूणां निशामुखे घोरतमः प्रणादः ॥ १३४ ॥
रणे रथानामयुतं निहत्य हता गजाः सप्तशतार्जुनेन । प्राच्याश्च सौवीरगणाश्च सर्वे निपातिताः क्षुद्रकमालवाश्च ॥ १३५ ॥
महत् कृतं कर्म धनंजयेन कर्तुं यथा नार्हति कश्चिदन्यः । उस समय रात्रिके आरम्भमें कौरवोंके दलमें बड़ा भयंकर कोलाहल होने लगा । वे आपसमें कहने लगे — ' आज अर्जुनने रणक्षेत्रमें दस हजार रथियोंका विनाश करके सात सौ हाथी मार डाले हैं । प्राच्य, सौवीर, क्षुद्रक और मालव सभी क्षत्रियगणोंको मार गिराया है । धनंजयने जो महान् पराक्रम किया है, उसे दूसरा कोई वीर नहीं कर सकता' ॥ १३४-१३५ ¾ ॥ श्रुतायुरम्बष्ठपतिश्च राजा तथैव दुर्मर्षणचित्रसेनौ ॥ १३६ ॥
द्रोणः कृपः सैन्धवबाह्लिकौ च भूरिश्रवाः शल्यशलौ च राजन् । अन्ये च योधाः शतशः समेताः क्रुद्धेन पार्थेन रणस्य मध्ये ॥ १३७ ॥
स्वबाहुवीर्येण जिताः सभीष्माः
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किरीटिना लोकमहारथेन । ‘ श्रुतायु, राजा अम्बष्ठपति, दुर्मर्षण, चित्रसेन, द्रोण, कृप, जयद्रथ, बाह्लिक, भूरिश्रवा, शल्य और शल — ये तथा और भी सैकड़ों योद्धा क्रोधमें भरे हुए लोकमहारथी, किरीटधारी कुन्तीकुमार अर्जुनके द्वारा रणभूमिमें अपनी ही भुजाओंके पराक्रमसे भीष्मसहित परास्त किये गये हैं ' ॥ १३६-१३७ई ॥ ब्रुवन्तः शिबिराणि'जग्मुः सर्वे गणा भारत ये त्वदीयाः ॥ १३८ ॥
उल्कासहस्रैश्च सुसम्प्रदीप्तै- र्विभ्राजमानैश्च तथा प्रदीपैः । किरीटिवित्रासितसर्वयोधा चक्रे निवेशं ध्वजिनी कुरूणाम् ॥ १३ ९ ॥ भारत! उपर्युक्त बातें कहते हुए आपके समस्त सैनिक सहस्रों जलती हुई मसालें तथा प्रकाशमान दीपोंके उजालेमें अपने - अपने शिबिरमें गये । कौरवसेनाके सम्पूर्ण सैनिकोंपर अर्जुनका त्रास छा रहा था । इसी अवस्थामें उस सेनाने रातमें विश्राम किया ॥ १३८-१३९ ॥ इति श्रीमहाभारते भीष्मपर्वणि भीष्मवधपर्वणि तृतीयदिवसावहारे एकोनषष्टितमोऽध्यायः ॥ ५ ९ ॥ इसप्रकार श्रीमहाभारत भीष्मपर्वके अन्तर्गत भीष्मवधपर्वमें तीसरे दिन सेनाके विश्रामके लिये लौटनेसे सम्बन्ध रखनेवाला उनसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ५ ९ ॥ [दाक्षिणात्य अधिक पाठके १३ श्लोक मिलाकर कुल १४० श्लोक हैं । ] * सेई जन्तु, जिसके बदनमें काँटे होते हैं ।