03.Mahabharata Volume 3 — पृष्ठ 1981–1990
महाभारत — खण्ड ३ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1981–1990
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तत्पश्चात् उस महाबली वीरने अत्यन्त कुपित हो शानपर चढ़ाकर तेज किये हुए अप्रतिहत धारवाले दूसरे पानीदार बाण विकर्णपर चलाये ॥ ३० ॥
ते विकर्णं समासाद्य कङ्कबर्हिणवाससः ।
भित्त्वा देहं गता भूमिं ज्वलन्त इव पन्नगाः ॥ ३१ ॥
उन बाणोंके पुच्छभागमें मोरके पंख लगे हुए थे । वे विकर्णके शरीरको विदीर्ण करके भीतर घुस गये और वहाँसे भी निकलकर प्रज्वलित सर्पोंकी भाँति पृथ्वीपर गिर पड़े ॥ ३१ ॥
ते शरा हेमपुङ्खाग्रा व्यदृश्यन्त महीतले ।
विकर्णरुधिरक्लिन्ना वमन्त इव शोणितम् ॥ ३२ ॥
उन बाणोंके पुच्छ और अग्रभाग सुनहरे थे । वे विकर्णके रुधिरमें भीगे हुए बाण पृथ्वीपर रक्त वमन करते हुए - से दृष्टिगोचर हो रहे थे ॥ ३२ ॥
विकर्णं वीक्ष्य निर्भिन्नं तस्यैवान्ये सहोदराः ।
अभ्यद्रवन्त समरे सौभद्रप्रमुखान् रथान् ॥ ३३ ॥
विकर्णको क्षत- विक्षत हुआ देख उसके दूसरे भाइयोंने समरभूमिमें अभिमन्यु आदि रथियोंपर धावा किया ॥ ३३ ॥
अभियात्वा तथैवान्यान् रथांस्तान् सूर्यवर्चसः ।
अविध्यन् समरेऽन्योन्यं संरम्भाद् युद्धदुर्मदाः ॥ ३४ ॥
वे सब - के - सब युद्धमें उन्मत्त होकर लड़नेवाले थे । उन्होंने दूसरे दूसरे रथियोंपर भी, जो अभिमन्युकी ही भाँति सूर्यके समान तेजस्वी थे, आक्रमण किया । फिर वे सब लोग अत्यन्त क्रोधमें भरकर एक- दूसरेको अपने बाणोंद्वारा घायल करने लगे ॥ ३४ ॥
दुर्मुखः श्रुतकर्माणं विद्ध्वा सप्तभिराशुगैः ।
ध्वजमेकेन चिच्छेद सारथिं चास्य सप्तभिः ॥ ३५ ॥
दुर्मुखने श्रुतकर्माको सात शीघ्रगामी बाणोंद्वारा बींधकर एकसे उसका ध्वज काट डाला और सात बाणोंसे उसके सारथिको घायल कर दिया ॥ ३५ ॥
अश्वान् जाम्बूनदैर्जालैः प्रच्छन्नान् वातरंहसः ।
जघान षड्भिरासाद्य सारथिं चाभ्यपातयत् ॥ ३६ ॥
उसके घोड़े वायुके समान वेगशाली तथा सोनेकी जालीसे आच्छादित थे । दुर्मुखने उन घोड़ोंको छः बाणोंसे मार डाला और सारथिको भी रथसे नीचे गिरा दिया ॥ ३६ ॥
स हताश्वे रथे तिष्ठन् श्रुतकर्मा महारथः ।
शक्तिं चिक्षेप संक्रुद्धो महोल्कां ज्वलितामिव ॥ ३७ ॥
महारथी श्रुतकर्मा घोड़ोंके मारे जानेपर भी उसी रथपर खड़ा रहा और अत्यन्त क्रोधमें भरकर उसने दुर्मुखपर प्रज्वलित उल्काके समान एक शक्ति चलायी ॥ ३७ ॥
सा दुर्मुखस्य विमलं वर्म भित्त्वा यशस्विनः ।
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विदार्य प्राविशद् भूमिं दीप्यमाना स्वतेजसा ॥ ३८ ॥
वह शक्ति अपने तेजसे उद्दीप्त हो रही थी । उसने यशस्वी दुर्मुखके चमकीले कवचको फाड़ डाला । फिर वह धरतीको चीरती हुई उसमें समा गयी ॥ ३८ ॥
तं दृष्ट्वा विरथं तत्र सुतसोमो महारथः ।
पश्यतां सर्वसैन्यानां रथमारोपयत् स्वकम् ॥ ३ ९ ॥
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भीमसेनके बाणसे मूर्च्छित दुर्योधन महारथी सुतसोमने अपने भाई श्रुतकर्माको युद्धमें रथहीन हुआ देख समस्त सैनिकोंके देखते -देखते उसे अपने रथपर चढ़ा लिया ॥ ३ ९ ॥
श्रुतकीर्तिस्तथा वीरो जयत्सेनं सुतं तव ।
अभ्ययात् समरे राजन् हन्तुकामो यशस्विनम् ॥ ४० ॥
राजन्! इसी प्रकार वीरवर श्रुतकीर्तिने युद्धभूमिमें आपके यशस्वी पुत्र जयत्सेनको मार डालनेकी इच्छासे उसपर आक्रमण किया ॥ ४० ॥
तस्य विक्षिपतश्चापं श्रुतकीर्तेर्महास्वनम् ।
चिच्छेद समरे तूर्णं जयत्सेनः सुतस्तव ॥ ४१ ॥
क्षुरप्रेण सुतीक्ष्णेन प्रहसन्निव भारत । भारत! श्रुतकीर्ति जब बड़े जोर- जोरसे खींचकर अपने विशाल धनुषकी गम्भीर टंकार फैला रहा था, उसी समय रणभूमिमें आपके पुत्र जयत्सेनने हँसते हुए - से एक तीखे क्षुरप्रद्वारा तुरंत उसका धनुष काट दिया ॥ तं दृष्ट्वा छिन्नधन्वानं शतानीकः सहोदरम् ॥ ४२ ॥
अभ्यपद्यत तेजस्वी सिंहवन्निनदन् मुहुः ।
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अपने भाईका धनुष कटा हुआ देख तेजस्वी शतानीक बारंबार सिंहके समान गर्जना करता हुआ वहाँ आ पहुँचा ॥ ४२ ॥
शतानीकस्तु समरे दृढं विस्फार्य कार्मुकम् ॥ ४३ ॥
विव्याध दशभिस्तूर्णं जयत्सेनं शिलीमुखैः ।
ननाद सुमहानादं प्रभिन्न इव वारणः ॥ ४४ ॥
शतानीकने संग्रामभूमिमें अपने धनुषको जोरसे खींचकर शीघ्रतापूर्वक दस बाण मारकर जयत्सेनको घायल कर दिया । फिर उसने मदवर्षी गजराजके समान बड़े जोरसे गर्जना की ॥ ४३-४४ ॥
अथान्येन सुतीक्ष्णेन सर्वावरणभेदिना ।
शतानीको जयत्सेनं विव्याध हृदये भृशम् ॥ ४५ ॥
तत्पश्चात् समस्त आवरणोंका भेदन करनेमें समर्थ दूसरे तीक्ष्ण बाणद्वारा शतानीकने जयत्सेनके वक्षःस्थलमें गहरी चोट पहुँचायी ॥ ४५ ॥
तथा तस्मिन् वर्तमाने दुष्कर्णो भ्रातुरन्तिके ।
चिच्छेद समरे चापं नाकुलेः क्रोधमूर्च्छितः ॥ ४६ ॥
उसके इस प्रकार करनेपर अपने भाईके पास खड़ा हुआ दुष्कर्ण क्रोधसे व्याकुल हो उठा । उसने समरभूमिमें नकुलपुत्र शतानीकका धनुष काट दिया ॥
अथान्यद् धनुरादाय भारसाहमनुत्तमम् ।
समादत्त शरान् घोरान् शतानीको महाबलः ॥ ४७ ॥
तब महाबली शतानीकने भार सहन करनेमें समर्थ दूसरा अत्यन्त उत्तम धनुष लेकर उसपर भयंकर बाणोंका अनुसंधान किया ॥ ४७ ॥
तिष्ठ तिष्ठेति चामन्त्र्य दुष्कर्णं भ्रातुरग्रतः ।
मुमोचास्मै शितान् बाणान् ज्वलितान् पन्नगानिव ॥ ४८ ॥
फिर भाईके सामने ही दुष्कर्णसे 'खड़ा रह, खड़ा रह ' ऐसा कहकर उसके ऊपर प्रज्वलित सर्पोंके समान तीखे बाणोंका प्रहार किया ॥ ४८ ॥
ततोऽस्य धनुरेकेन द्वाभ्यां सूतं च मारिष ।
चिच्छेद समरे तूर्णं तं च विव्याध सप्तभिः ॥ ४ ९ ॥
आर्य! तदनन्तर एक बाणसे उसके धनुषको काट दिया, दोसे उसके सारथिको क्षत-विक्षत कर दिया और सात बाणोंसे उस युद्धस्थलमें स्वयं दुष्कर्णको भी तुरंत घायल कर दिया ॥ ४ ९ ॥
अश्वान् मनोजवांस्तस्य कर्बुरान् वातरंहसः ।
जघान निशितैस्तूर्णं सर्वान् द्वादशभिः शरैः ॥ ५० ॥
दुष्कर्णके घोड़े मन और वायुके समान वेगशाली थे । उनका रंग चितकबरा था ।
शतानीकने बारह तीखे बाणोंसे उन सब घोड़ोंको भी तुरंत मार डाला ॥ ५० ॥
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अथापरेण भल्लेन सुयुक्तेनाशुपातिना ।
दुष्कर्णं सुदृढं क्रुद्धो विव्याध हृदये भृशम् ॥ ५१ ॥
स पपात ततो भूमौ वज्राहत इव द्रुमः । तत्पश्चात् लक्ष्यको शीघ्र मार गिरानेवाले एक दूसरे भल्ल नामक बाणका उत्तम रीतिसे प्रयोग करके क्रोधमें भरे हुए शतानीकने दुष्कर्णके हृदयमें अत्यन्त गहरा आघात किया । इससे दुष्कर्ण वज्राहत वृक्षकी भाँति पृथ्वीपर गिर पड़ा ॥ ५१३ ॥
दुष्कर्णं व्यथितं दृष्ट्वा पञ्च राजन् महारथाः ॥ ५२ ॥
जिघांसन्तः शतानीकं सर्वतः पर्यवारयन् । राजन्! दुष्कर्णको आघातसे पीड़ित देख पाँच महारथियोंने शतानीकको मार डालनेकी इच्छासे उसे सब ओरसे घेर लिया ॥ ५२ ॥
छाद्यमानं शरव्रातैः शतानीकं यशस्विनम् ॥ ५३ ॥
अभ्यधावन्त संक्रुद्धाः केकयाः पञ्च सोदराः । उनके बाणसमूहोंसे यशस्वी शतानीकको आच्छादित होते देख क्रोधमें भरे हुए पाँच भाई केकयराजकुमारोंने उन पाँचों महारथियोंपर धावा किया ॥ ५३ ॥
तानभ्यापततः प्रेक्ष्य तव पुत्रा महारथाः ॥ ५४ ॥
प्रत्युद्ययुर्महाराज गजानिव महागजाः । महाराज! उन्हें आते देख आपके महारथी पुत्र उनका सामना करनेके लिये आगे बढ़े, जैसे हाथी दूसरे हाथियोंसे भिड़नेके लिये आगे बढ़ते हैं ॥ ५४३ ॥
दुर्मुखो दुर्जयश्चैव तथा दुर्मर्षणो युवा ॥ ५५ ॥
शत्रुञ्जयः शत्रुसहः सर्वे क्रुद्धा यशस्विनः ।
प्रत्युद्याता महाराज केकयान् भ्रातरः समम् ॥ ५६ ॥
नरेश्वर! दुर्मुख, दुर्जय, युवा वीर दुर्मर्षण, शत्रुंजय तथा शत्रुसह –ये सब- के--सब यशस्वी वीर क्रोधमें भरकर पाँचों भाई केकयोंका सामना करनेके लिये एक साथ आगे बढ़े ॥ ५५-५६ ॥
रथैर्नगरसंकाशैर्हयैर्युक्तैर्मनोजवैः ।
नानावर्णविचित्राभिः पताकाभिरलंकृतैः ॥ ५७ ॥
वरचापधरा वीरा विचित्रकवचध्वजाः ।
विविशुस्ते परं सैन्यं सिंहा इव वनाद् वनम् ॥ ५८ ॥
उनके रथ नगरोंके समान प्रतीत होते थे । उनमें मनके समान वेगशाली घोड़े जुते हुए थे । नाना प्रकारके रूप- रंगवाली और विचित्र पताकाएँ उन्हें अलंकृत कर रही थीं । ऐसे रथोंपर आरूढ़ सुन्दर धनुष धारण किये विचित्र कवच और ध्वजोंसे सुशोभित उन वीरोंने शत्रुकी सेनामें उसी प्रकार प्रवेश किया, जैसे सिंह एक वनसे दूसरे वनमें प्रवेश करते हैं ॥ ५७-५८ ॥
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तेषां सुतुमुलं युद्धं व्यतिषक्तरथद्विपम् ।
अवर्तत महारौद्रं निघ्नतामितरेतरम् ॥ ५ ९ ॥
फिर तो एक- दूसरेपर प्रहार करते हुए उन सभी महारथियोमें अत्यन्त भयंकर तुमुल युद्ध होने लगा । रथोंसे रथ और हाथियोंसे हाथी भिड़ गये ॥ ५ ९ ॥
अन्योन्यागस्कृतां राजन् यमराष्ट्रविवर्धनम् ।
मुहूर्तास्तमिते सूर्ये चक्रुर्युद्धं सुदारुणम् ॥ ६० ॥
राजन्! एक- दूसरेपर प्रहार करनेवाले उन महारथियोंका वह युद्ध यमलोककी वृद्धि करनेवाला था । सूर्यास्तके दो घड़ी बादतक उन सब लोगोंने बड़ा भयंकर युद्ध किया ॥ ६० ॥
रथिनः सादिनश्चाथ व्यकीर्यन्त सहस्रशः ।
ततः शान्तनवः क्रुद्धः शरैः संनतपर्वभिः ॥ ६१ ॥
नाशयामास सेनां तां भीष्मस्तेषां महात्मनाम् ।
पञ्चालानां च सैन्यानि शरैर्निन्ये यमक्षयम् ॥ ६२ ॥
उसमें सहस्रों रथी और घुड़सवार प्राणशून्य होकर बिखर गये । तब शान्तनुनन्दन भीष्मने कुपित होकर झुकी हुई गाँठवाले बाणोंद्वारा उन महामना वीरोंकी सेनाका विनाश कर डाला; पांचालोंकी सेनाकी कितनी ही टुकड़ियोंको अपने बाणोंद्वारा यमलोक पहुँचा दिया ॥
एवं भित्त्वा महेष्वासः पाण्डवानामनीकिनीम् ।
कृत्वावहारं सैन्यानां ययौ स्वशिबिरं नृप ॥ ६३ ॥
नरेश्वर! महाधनुर्धर भीष्म इस प्रकार पाण्डव- सेनाका संहार करके अपनी समस्त सेनाओंको युद्धसे लौटाकर अपने शिविरको चले गये ॥ ६३ ॥
( नाशयामासतुर्वीरौ धृष्टद्युम्नवृकोदरौ । कौरवाणामनीकानि शरैः संनतपर्वभिः ॥ ) इसी प्रकार धृष्टद्युम्न और भीमसेन– इन दोनों वीरोंने झुकी हुई गाँठवाले बाणोंद्वारा कौरवसेनाओंका विनाश कर डाला ।
धर्मराजोऽपि सम्प्रेक्ष्य धृष्टद्युम्नवृकोदरौ ।
मूर्ध्नि चैतावुपाघ्राय प्रहृष्टः शिबिरं ययौ ॥ ६४ ॥
धर्मराज युधिष्ठिरने धृष्टद्युम्न और भीमसेन दोनोंसे मिलकर उनका मस्तक सूँघा और बड़े हर्षके साथ अपने शिविरको प्रस्थान किया ॥ ६४ ॥
( अर्जुनो वासुदेवश्च कौरवाणामनीकिनीम् । हत्वा विद्राव्य च शरैः शिबिरायैव जग्मतुः II ) अर्जुन और भगवान् श्रीकृष्ण भी कौरव - सेनाको बाणोंद्वारा मारकर तथा रणभूमिसे भगाकर शिविरको ही चल दिये ।
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इति श्रीमहाभारते भीष्मपर्वणि भीष्मवधपर्वणि षष्ठदिवसावहारे एकोनाशीतितमोऽध्यायः ॥ ७ ९ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत भीष्मपर्वके अन्तर्गत भीष्मवधपर्वमें छठे दिनके युद्धमें सेनाके शिविरके लिये लौटनेसे सम्बन्ध रखनेवाला उन्यासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ७९ ॥
[दाक्षिणात्य अधिक पाठके २ श्लोक मिलाकर कुल ६६ श्लोक हैं । ]
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अशीतितमोऽध्यायः भीष्मद्वारा दुर्योधनको आश्वासन तथा सातवें दिनके युद्धके लिये कौरव- सेनाका प्रस्थान संजय उवाच
अथ शूरा महाराज परस्परकृतागसः ।
जग्मुः स्वशिबिराण्येव रुधिरेण समुक्षिताः ॥ १ ॥
संजय कहते हैं - महाराज! आपसमें एक- दूसरेको चोट पहुँचानेवाले वे सभी शूरवीर खूनसे लथपथ हो अपने शिविरोंको ही चले गये ॥ १ ॥
विश्रम्य च यथान्यायं पूजयित्वा परस्परम् ।
संनद्धाः समदृश्यन्त भूयो युद्धचिकीर्षया ॥ २ ॥
यथायोग्य विश्राम करके एक- दूसरेकी प्रशंसा करते हुए वे लोग पुनः युद्ध करनेकी इच्छासे तैयार दिखायी देने लगे ॥ २ ॥
ततस्तव सुतो राजंश्चिन्तयाभिपरिप्लुतः ।
विस्रवच्छोणिताक्ताङ्गः पप्रच्छेदं पितामहम् ॥ ३ ॥
राजन्! तदनन्तर आपके पुत्र दुर्योधनने, जिसका शरीर बहते हुए रक्तसे भीगा हुआ था, चिन्तामग्न होकर पितामह भीष्मके पास जाकर इस प्रकार पूछा— ॥ ३ ॥
सैन्यानि रौद्राणि भयानकानि
व्यूढानि सम्यग् बहुलध्वजानि ।
विदार्य हत्वा च निपीड्य शूरा- स्ते पाण्डवानां त्वरिता महारथाः ॥ ४ ॥
‘ दादाजी! हमारी सेनाएँ अत्यन्त भयंकर तथा रौद्ररूप धारण करनेवाली हैं । उनकी व्यूह - रचना भी अच्छे ढंगसे की जाती है । इन सेनाओंमें ध्वजोंकी संख्या बहुत अधिक है, तथापि शूरवीर पाण्डव महारथी उनमें प्रवेश करके तुरंत हमारे सैनिकोंको विदीर्ण करते, मारते और पीड़ा देकर चले जाते हैं ॥ ४ ॥
सम्मोह्य सर्वान् युधि कीर्तिमन्तो व्यूहं च तं मकरं वज्रकल्पम् । प्रविश्य भीमेन रणे हतोऽस्मि घोरैः शरैर्मृत्युदण्डप्रकाशैः ॥ ५ ॥
' वे युद्धमें सबको मोहित करके अपनी कीर्तिका विस्तार करते हैं । देखिये न, भीमसेनने वज्रके समान दुर्भेद्य मकर-व्यूहमें प्रवेश करके मृत्युदण्डके समान भयंकर बाणोंद्वारा मुझे
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युद्धस्थलमें क्षत - विक्षत कर दिया है ॥ ५ ॥
क्रुद्धं तमुद्वीक्ष्य भयेन राजन् सम्मूर्च्छितो न लभे शान्तिमद्य । इच्छे प्रसादात् तव सत्यसंध प्राप्तुं जयं पाण्डवेयांश्च हन्तुम् ॥ ६ ॥
‘ राजन्! भीमसेनको कुपित देखकर मैं भयसे व्याकुल हो उठता हूँ। आज मुझे शान्ति नहीं मिल रही है । सत्यप्रतिज्ञ पितामह! मैं आपकी कृपासे पाण्डवोंको मारना और उनपर विजय पाना चाहता हूँ' ॥ ६ ॥
तेनैवमुक्तः प्रहसन् महात्मा दुर्योधनं मन्युगतं विदित्वा । तं प्रत्युवाचाविमना मनस्वी गङ्गासुतः शस्त्रभृतां वरिष्ठः ॥ ७ ॥
दुर्योधनके ऐसा कहनेपर और उसे क्रोधमें भरा हुआ जानकर शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ मनस्वी महात्मा गंगानन्दन भीष्मने जोर- जोर से हँसते हुए प्रसन्न मनसे उसे इस प्रकार उत्तर दिया— ॥ ७ ॥
परेण यत्नेन विगाह्य सेनां सर्वात्मनाहं तव राजपुत्र । इच्छामि दातुं विजयं सुखं च न चात्मानं छादयेऽहं त्वदर्थे ॥ ८ ॥
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' राजकुमार! मैं अपनी पूरी शक्ति लगाकर महान् प्रयत्नके साथ पाण्डवोंकी सेनामें प्रवेश करके तुम्हें विजय और सुख देना चाहता हूँ । तुम्हारे लिये अपने- आपको छिपाकर नहीं रखता हूँ ॥ ८ ॥
एते तु रौद्रा बहवो महारथा यशस्विनः शूरतमाः कृतास्त्राः । ये पाण्डवानां समरे सहाया जितक्लमा रोषविषं वमन्ति ॥ ९ ॥
‘ जो समरभूमिमें पाण्डवोंके सहायक हुए हैं, उनमें बहुत - से ये महारथी वीर अत्यन्त भयंकर, परम शौर्यसम्पन्न, शस्त्रविद्याके विद्वान् तथा यशस्वी हैं । इन्होंने थकावटको जीत लिया है और ये हमलोगोंपर रोषरूपी विष उगल रहे हैं ॥ ९ ॥
ते नैव शक्याः सहसा विजेतुं वीर्योद्धताः कृतवैरास्त्वया च । अहं सेनां प्रतियोत्स्यामि राजन् सर्वात्मना जीवितं त्यज्य वीर ॥ १० ॥
‘ ये बल - पराक्रममें प्रचण्ड और तुम्हारे साथ वैर बाँधे हुए हैं । इन्हें सहसा पराजित नहीं किया जा सकता है । राजन्! वीरवर! मैं सम्पूर्ण शरीरसे अपने प्राणोंकी परवा छोड़कर पाण्डवोंकी सेनाके साथ युद्ध करूँगा ॥ १० ॥
रणे तवार्थाय महानुभाव न जीवितं रक्ष्यतमं ममाद्य । सर्वांस्तवार्थाय सदेवदैत्यान् घोरान् दहेयं किमु शत्रुसेनाम् ॥ ११ ॥
'महानुभाव! तुम्हारे कार्यकी सिद्धिके लिये अब युद्धमें मुझे अपने जीवनकी रक्षा भी अत्यन्त आवश्यक नहीं जान पड़ती है । मैं तुम्हारे मनोरथकी सिद्धिके लिये देवताओंसहित समस्त भयंकर दैत्योंको भी दग्ध कर सकता हूँ; फिर शत्रुओंकी सेनाकी तो बात ही क्या है? ॥ तान् पाण्डवान् योधयिष्यामि राजन् प्रियं च ते सर्वमहं करिष्ये । श्रुत्वैव चैतद् वचनं तदानीं दुर्योधनः प्रीतमना बभूव ॥ १२ ॥
‘ राजन्! मैं उन पाण्डवोंसे भी युद्ध करूँगा और तुम्हारा सम्पूर्ण प्रिय कार्य सिद्ध करूँगा । ' उस समय भीष्मजीकी यह बात सुनते ही दुर्योधनका मन प्रसन्न हो गया ॥ १२ ॥
सर्वाणि सैन्यानि ततः प्रहृष्टो निर्गच्छतेत्याह नृपांश्च सर्वान् ।