03.Mahabharata Volume 3 — पृष्ठ 1991–2000

महाभारत — खण्ड ३ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1991–2000

पृष्ठ 1991

महाभारत — खण्ड ३, पृष्ठ 1991 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

तदाज्ञया तानि विनिर्ययुर्द्रुतं गजाश्वपादातरथायुतानि ॥ १३ ॥

तदनन्तर दुर्योधनने हर्षमें भरकर सम्पूर्ण राजाओं तथा सारी सेनाओंसे कहा — ' युद्धके लिये निकलो । ' राजा दुर्योधनकी आज्ञा पाकर सहस्रों हाथी, घोड़े, पैदल तथा रथोंसे भरी हुई वे सारी सेनाएँ तुरंत रणके लिये प्रस्थित हुईं ॥ १३ ॥

प्रहर्षयुक्तानि तु तानि राजन् महान्ति नानाविधशस्त्रवन्ति । स्थितानि नागाश्वपदातिमन्ति विरेजुराजौ तव राजन् बलानि ॥ १४ ॥

महाराज! आपकी वे विशाल सेनाएँ नाना प्रकारके अस्त्र- शस्त्रोंसे सम्पन्न हो अत्यन्त हर्ष एवं उत्साहमें भरी हुई थीं । राजन्! घोड़े, हाथी और पैदलोंसे युक्त हो रणभूमिमें खड़ी हुई उन सेनाओंकी बड़ी शोभा होती थी ॥ १४ ॥

शस्त्रास्त्रविद्भिर्नरवीरयोधै- रधिष्ठिताः सैन्यगणास्त्वदीयाः । रथौघपादातगजाश्वसंघैः प्रयाद्भिराजौ विधिवत् प्रणुन्नैः ॥ १५ ॥

समुद्धतं वै तरुणार्कवर्णं जो बभौच्छादयन् सूर्यरश्मीन् । रेजुः पताका रथदन्तिसंस्था वातेरिता भ्राम्यमाणाः समन्तात् ॥ १६ ॥

आपकी सेनाओंके सेनापति अस्त्र- शस्त्रोंके ज्ञाता एवं नरवीर योद्धा थे । उनसे विधिपूर्वक अनुशासित हो रथसमूह, पैदल, हाथी और घोड़ोंके समुदाय जब युद्ध - भूमिमें जाने लगे, तब उनके पैरोंसे उठी हुई धूल सूर्यकी किरणोंको आच्छादित करके प्रातःकालिक सूर्यकी प्रभाके समान कान्तिमती प्रतीत होने लगी । रथों और हाथियोंपर खड़ी की हुई पताकाएँ चारों ओर वायुकी प्रेरणासे फहराती हुई बड़ी शोभा पा रही थीं ॥ नानारङ्गाः समरे तत्र राजन्

मेघैर्युता विद्युतः खे यथैव ।

वृन्दैः स्थिताश्चापि सुसम्प्रयुक्ता- श्चकाशिरे दन्तिगणाः समन्तात् ॥ १७ ॥

राजन्! जैसे आकाशमें बादलोंके साथ बिजलियाँ चमक रही हों, उसी प्रकार उस समरांगणमें चारों ओर अनेक रंगोंके दन्तार हाथी झुंड के |- झुंड खड़े हुए शोभा पा रहे थे । उनका संचालन सुन्दर ढंगसे हो रहा था ॥ १७ ॥

धनूंषि विस्फारयतां नृपाणां

पृष्ठ 1992

महाभारत — खण्ड ३, पृष्ठ 1992 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

बभूव शब्दस्तुमुलोऽतिघोरः ।

विमथ्यतो देवमहासुरौघै- र्यथार्णवस्यादियुगे तदानीम् ॥ १८ ॥

जैसे आदियुगमें देवताओं और दैत्योंके समूहद्वारा समुद्रके मथे जाते समय अत्यन्त घोर शब्द होता था, उसी प्रकार उस समय युद्धस्थलमें अपने धनुषोंकी टंकार करनेवाले राजाओंका अत्यन्त भयानक तुमुल शब्द प्रकट हो रहा था ॥ तदुग्रनागं बहुरूपवर्णं तवात्मजानां समुदीर्णमेवम् । बभूव सैन्यं रिपुसैन्यहन्तृ युगान्तमेघौघनिभं तदानीम् ॥ १ ९ ॥ महाराज! आपके पुत्रोंकी वह सेना भयंकर गजराजोंसे भरी थी । वह अनेक रूप-रंगोंकी दिखायी देती थी । उसका वेग बढ़ता ही जा रहा था । वह उस समय प्रलयकालके मेघसमुदायकी भाँति शत्रु - सेनाका संहार करनेमें समर्थ प्रतीत होती थी ॥ १ ९ ॥ इति श्रीमहाभारते भीष्मपर्वणि भीष्मवधपर्वणि भीष्मदुर्योधनसंवादे अशीतितमोऽध्यायः ॥ ८० ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत भीष्मपर्वके अन्तर्गत भीष्मवधपर्वमें भीष्म-दुर्योधन-संवादविषयक अस्सीवाँअध्याय पूरा हुआ ॥ ८० ॥

पृष्ठ 1993

महाभारत — खण्ड ३, पृष्ठ 1993 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

एकाशीतितमोऽध्यायः सातवें दिनके युद्धमें कौरव - पाण्डव सेनाओंका मण्डल और वज्रव्यूह बनाकर भीषण संघर्ष संजय उवाच

अथात्मजं तव पुनर्गाङ्गेयो ध्यानमास्थितम् ।

अब्रवीद् भरतश्रेष्ठः सम्प्रहर्षकरं वचः ॥ १ ॥

संजय कहते हैं - महाराज! तदनन्तर आपके पुत्रको चिन्तामें निमग्न देख भरतश्रेष्ठ गंगानन्दन भीष्मने उससे पुनः हर्ष बढ़ानेवाली बात कही- ॥ १ ॥

अहं द्रोणश्च शल्यश्च कृतवर्मा च सात्वतः ।

अश्वत्थामा विकर्णश्च भगदत्तोऽथ सौबलः ॥ २ ॥

विन्दानुविन्दावावन्त्यौ बाह्लीकः सह बाह्लिकैः ।

त्रिगर्तराजो बलवान् मागधश्च सुदुर्जयः ॥ ३ ॥

बृहद्बलश्च कौसल्यश्चित्रसेनो विविंशतिः ।

रथाश्च बहुसाहस्राः शोभनाश्च महाध्वजाः ॥ ४ ॥

देशजाश्च हया राजन् स्वारूढा हयसादिभिः ।

गजेन्द्राश्च मदोद्वृत्ताः प्रभिन्नकरटामुखाः ॥ ५ ॥

पादाताश्च तथा शूरा नानाप्रहरणध्वजाः ।

नानादेशसमुत्पन्नास्त्वदर्थे योद्धुमुद्यताः ॥ ६ ॥

' राजन्! मैं, द्रोणाचार्य, शल्य, यदुवंशी कृतवर्मा, अश्वत्थामा, विकर्ण, भगदत्त, सुबलपुत्र शकुनि, अवन्तिदेशके राजकुमार विन्द और अनुविन्द, बाह्लिकदेशीय वीरोंके साथ राजा बाह्लीक, बलवान् त्रिगर्तराज, अत्यन्त दुर्जय मगधराज, कोसलनरेश बृहद्बल, चित्रसेन, विविंशति तथा विशाल ध्वजाओंवाले परम सुन्दर कई हजार रथ, घुड़सवारोंसे युक्त देशीय घोड़े, गण्डस्थलसे मदकी धारा बहानेवाले मदोन्मत्त गजराज और भाँति - भाँतिके आयुध एवं ध्वज धारण करनेवाले विभिन्न देशोंके शूरवीर पैदल सैनिक तुम्हारे लिये युद्ध करनेको उद्यत हैं ॥ २–६ ॥

एते चान्ये च बहवस्त्वदर्थे त्यक्तजीविताः ।

देवानपि रणे जेतुं समर्था इति मे मतिः ॥ ७ ॥

‘ ये तथा और भी बहुत - से ऐसे सैनिक हैं, जिन्होंने तुम्हारे लिये अपना जीवन निछावर कर दिया है । मेरा तो ऐसा विश्वास है कि ये सब मिलकर युद्धस्थलमें देवताओंको भी जीतनेमें समर्थ हैं ॥ ७ ॥

पृष्ठ 1994

महाभारत — खण्ड ३, पृष्ठ 1994 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

अवश्यं हि मया राजंस्तव वाच्यं हितं सदा ।

अशक्याः पाण्डवा जेतुं देवैरपि सवासवैः ॥ ८ ॥

' राजन्! मुझे सदा तुम्हारे हितकी बात अवश्य कहनी चाहिये; इसीलिये कहता हूँ-पाण्डवोंको इन्द्र- सहित सम्पूर्ण देवता भी जीत नहीं सकते ॥ ८ ॥

वासुदेवसहायाश्च महेन्द्रसमविक्रमाः ।

सर्वथाहं तु राजेन्द्र करिष्ये वचनं तव ॥ ९ ॥

‘ राजेन्द्र! एक तो वे देवराज इन्द्रके समान पराक्रमी हैं, दूसरे साक्षात् भगवान् श्रीकृष्ण उनके सहायक हैं, ( अतः उन्हें जीतना असम्भव है तथापि) मैं सर्वथा तुम्हारे वचनका पालन करूँगा ॥ ९ ॥

पाण्डवांश्च रणे जेष्ये मां वा जेष्यन्ति पाण्डवाः ।

एवमुक्त्वा ददावस्मै विशल्यकरणीं शुभाम् ॥ १० ॥

ओषधीं वीर्यसम्पन्नां विशल्यश्चाभवत् तदा । ‘ पाण्डवोंको मैं युद्धमें जीतूंगा अथवा पाण्डव ही मुझे परास्त कर देंगे । ' ऐसा कहकर भीष्मजीने दुर्योधनको विशल्यकरणी नामक शुभ एवं शक्तिशालिनी ओषधि प्रदान की । उस समय उसके प्रभावसे दुर्योधनके शरीरमें धँसे हुए बाण आसानीसे निकल गये और वह आघातजनित घाव तथा उसकी पीड़ासे मुक्त हो गया ॥ १०३ ॥

ततः प्रभाते विमले स्वेन सैन्येन वीर्यवान् ॥ ११ ॥

अव्यूहत स्वयं व्यूहं भीष्मो व्यूहविशारदः ।

मण्डलं मनुजश्रेष्ठो नानाशस्त्रसमाकुलम् ॥ १२ ॥

तदनन्तर निर्मल प्रभातकी बेलामें व्यूहविशारद नरश्रेष्ठ बलवान् भीष्मने अपनी सेनाके द्वारा स्वयं ही मण्डल नामक व्यूहका निर्माण किया, जो नाना प्रकारके अस्त्र- शस्त्रोंसे सम्पन्न था ॥ ११-१२ ॥

सम्पूर्णं योधमुख्यैश्च तथा दन्तिपदातिभिः ।

रथैरनेकसाहस्रैः समन्तात् परिवारितम् ॥ १३ ॥

वह व्यूह हाथी और पैदल आदि मुख्य- मुख्य योद्धाओंसे भरा हुआ था । कई सहस्र रथोंने उसे सब ओरसे घेर रखा था ॥ १३ ॥

अश्ववृन्दैर्महद्भिश्च ऋष्टितोमरधारिभिः ।

नागे नागे रथाः सप्त सप्त चाश्वा रथे रथे ॥ १४ ॥

अन्वश्वं दश धानुष्का धानुष्के दश चर्मिणः । वह व्यूह ऋष्टि और तोमर धारण करनेवाले अश्वारोहियोंके महान् समुदायोंसे भरा था । एक- एक हाथीके पीछे सात-सात रथ, एक-एक रथके साथ सात-सात घुड़सवार, प्रत्येक घुड़सवारके पीछे दस -दस धनुर्धर और प्रत्येक धनुर्धरके साथ दस- दस ढाल - तलवार लिये रहनेवाले वीर खड़े थे ॥ १४ ॥

पृष्ठ 1995

महाभारत — खण्ड ३, पृष्ठ 1995 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

एवं व्यूढं महाराज तव सैन्यं महारथैः ॥ १५ ॥

स्थितं रणाय महते भीष्मेण युधि पालितम् । महाराज! इस प्रकार महारथियोंके द्वारा व्यूहबद्ध होकर आपकी सेना महायुद्धके लिये खड़ी थी और भीष्म युद्धस्थलमें उसकी रक्षा करते थे ॥ १५३ ॥

दशाश्वानां सहस्राणि दन्तिनां च तथैव च ॥ १६ ॥

रथानामयुतं चापि पुत्राश्च तव दंशिताः ।

चित्रसेनादयः शूरा अभ्यरक्षन् पितामहम् ॥ १७ ॥

उसमें दस हजार घोड़े, उतने ही हाथी और दस हजार रथ तथा आपके चित्रसेन आदि शूरवीर पुत्र कवच धारण करके पितामह भीष्मकी रक्षा कर रहे थे ॥

रक्ष्यमाणः स तैः शूरैर्गोप्यमानाश्च तेन ते ।

संनद्धाः समदृश्यन्त राजानश्च महाबलाः ॥ १८ ॥

उन वीरोंसे भीष्म सुरक्षित थे और भीष्मसे उन शूरवीरोंकी रक्षा हो रही थी । वहाँ बहुत-से महाबली नरेश कवच बाँधकर युद्धके लिये तैयार दिखायी देते थे ॥ १८ ॥

दुर्योधनस्तु समरे दंशितो रथमास्थितः ।

व्यराजत श्रिया जुष्टो यथा शक्रस्त्रिविष्टपे ॥ १ ९ ॥

शोभासम्पन्न राजा दुर्योधन भी युद्धस्थलमें कवच बाँधकर रथपर आरूढ़ हो ऐसा सुशोभित हो रहा था, मानो देवराज इन्द्र स्वर्गमें अपनी दिव्य प्रभासे प्रकाशित हो रहे हों ॥ १ ९ ॥

ततः शब्दो महानासीत् पुत्राणां तव भारत ।

रथघोषश्च विपुलो वादित्राणां च निस्वनः ॥ २० ॥

भारत! तदनन्तर आपके पुत्रोंका महान् सिंहनाद सुनायी देने लगा, साथ ही रथों और वाद्योंका गम्भीर घोष गूँज उठा ॥ २० ॥

भीष्मेण धार्तराष्ट्राणां व्यूढः प्रत्यङ्मुखो युधि ।

मण्डलः स महाव्यूहो दुर्भेद्योऽमित्रघातनः ॥ २१ ॥

भीष्मने युद्धस्थलमें कौरव- सैनिकोंका पश्चिमाभिमुख व्यूह बनाया था । वह मण्डल नामक महाव्यूह दुर्भेद्य होनेके साथ ही शत्रुओंका संहार करनेवाला था ॥ २१ ॥

सर्वतः शुशुभे राजन् रणेऽरीणां दुरासदः ।

मण्डलं तु समालोक्य व्यूहं परमदुर्जयम् ॥ २२ ॥

स्वयं युधिष्ठिरो राजा वज्रं व्यूहमथाकरोत् । राजन्! उस रणभूमिमें सब ओर उस व्यूहकी बड़ी शोभा हो रही थी । वह शत्रुओंके लिये सर्वथा दुर्गम था । कौरवोंके परम दुर्जय मण्डलव्यूहको देखकर राजा युधिष्ठिरने स्वयं अपनी सेनाके लिये वज्रव्यूहका निर्माण किया ॥ २२३ ॥

तथा व्यूढेष्वनीकेषु यथास्थानमवस्थिताः ॥ २३ ॥

पृष्ठ 1996

महाभारत — खण्ड ३, पृष्ठ 1996 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

रथिनः सादिनः सर्वे सिंहनादमथानदन् । इस प्रकार सेनाओंकी व्यूह रचना हो जानेपर यथास्थान खड़े हुए रथी और घुड़सवार आदि सब सैनिक सिंहनाद करने लगे ॥ २३ ॥

बिभित्सवस्ततो व्यूहं निर्ययुर्युद्धकाङ्क्षिणः ॥ २४ ॥

इतरेतरतः शूराः सहसैन्याः प्रहारिणः । तत्पश्चात् प्रहार करनेमें कुशल सभी शूरवीर एक- दूसरेका व्यूह तोड़ने और परस्पर युद्ध करनेकी इच्छासे सेनासहित आगे बढ़े ॥ २४ ॥

भारद्वाजो ययौ मत्स्यं द्रौणिश्चापि शिखण्डिनम् ॥ २५ ॥

स्वयं दुर्योधनो राजा पार्षतं समुपाद्रवत् । द्रोणाचार्यने विराटपर और अश्वत्थामाने शिखण्डीपर धावा किया। स्वयं राजा दुर्योधनने द्रुपदपर चढ़ाई की ॥ नकुलः सहदेवश्च मद्रराजानमीयतुः ॥ २६ ॥

विन्दानुविन्दावावन्त्याविरावन्तमभिद्रुतौ । नकुल और सहदेवने अपने मामा मद्रराज शल्यपर धावा किया । अवन्तीके विन्द और अनुविन्दने इरावान्पर आक्रमण किया ॥ २६ ॥

सर्वे नृपास्तु समरे धनंजयमयोधयन् ॥ २७ ॥

भीमसेनो रणे यान्तं हार्दिक्यं समवारयत् । समस्त नरेशोंने संग्रामभूमिमें अर्जुनके साथ युद्ध किया । भीमसेनने युद्धमें विचरते हुए कृतवर्माको आगे बढ़नेसे रोका ॥ २७ ॥

चित्रसेनं विकर्णं च तथा दुर्मर्षणं विभुः ॥ २८ ॥

आर्जुनिः समरे राजंस्तव पुत्रानयोधयत् । राजन्! शक्तिशाली अर्जुनकुमार अभिमन्युने संग्रामभूमिमें आपके तीन पुत्र चित्रसेन, विकर्ण तथा दुर्मर्षणके साथ युद्ध आरम्भ किया ॥ २८३ ॥

प्राग्ज्योतिषो महेष्वासो हैडिम्बं राक्षसोत्तमम् ॥ २ ९ ॥ अभिदुद्राव वेगेन मत्तो मत्तमिव द्विपम् । महाधनुर्धर भगदत्तने राक्षसप्रवर घटोत्कचपर बड़े वेगसे आक्रमण किया, मानो एक मतवाला हाथी दूसरे मतवाले हाथीपर टूट पड़ा हो ॥ २ ९ ॥ अलम्बुषस्तदा राजन् सात्यकिं युद्धदुर्मदम् ॥ ३० ॥

ससैन्यं समरे क्रुद्धो राक्षसः समुपाद्रवत् । राजन्! उस समय राक्षस अलम्बुषने युद्धमें उन्मत्त होकर लड़नेवाले सेनासहित सात्यकिपर क्रोधपूर्वक धावा किया ॥ ३० ॥

भूरिश्रवा रणे यत्तो धृष्टकेतुमयोधयत् ॥ ३१ ॥

श्रुतायुषं च राजानं धर्मपुत्रो युधिष्ठिरः ।

पृष्ठ 1997

महाभारत — खण्ड ३, पृष्ठ 1997 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

अर्जुनका व्यूहबद्ध कौरव सेनाकी ओर श्रीकृष्णका ध्यान आकृष्ट करना भूरिश्रवाने रणभूमिमें प्रयत्नपूर्वक धृष्टकेतुके साथ युद्ध छेड़ दिया। धर्मपुत्र युधिष्ठिरने राजा श्रुतायुपर धावा किया ॥ ३१३ ॥

चेकितानश्च समरे कृपमेवान्वयोधयत् ॥ ३२ ॥

शेषाः प्रतिययुर्यत्ता भीष्ममेव महारथम् । चेकितानने समरमें कृपाचार्यके ही साथ युद्ध छेड़ दिया। शेष योद्धा प्रयत्नपूर्वक महारथी भीष्मका ही सामना करने लगे ॥ ३२३ ॥

ततो राजसमूहास्ते परिवव्रुर्धनंजयम् ॥ ३३ ॥

शक्तितोमरनाराचगदापरिघपाणयः । तदनन्तर उन राजसमूहोंने कुन्तीपुत्र धनंजयको सब ओरसे घेर लिया । उन सबके हाथोंमें शक्ति, तोमर, नाराच, गदा और परिघ आदि आयुध शोभा पा रहे थे ॥ अर्जुनोऽथ भृशं क्रुद्धो वार्ष्णेयमिदमब्रवीत् ॥ ३४ ॥

पश्य माधव सैन्यानि धार्तराष्ट्रस्य संयुगे ।

व्यूढानि व्यूहविदुषा गाङ्गेयेन महात्मना ॥ ३५ ॥

पृष्ठ 1998

महाभारत — खण्ड ३, पृष्ठ 1998 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

तत्पश्चात् अर्जुनने अत्यन्त क्रुद्ध होकर भगवान् श्रीकृष्णसे इस प्रकार कहा — ‘ माधव! युद्धस्थलमें दुर्योधनकी इन सेनाओंको देखिये, व्यूहके विद्वान् महात्मा गंगानन्दनने इनका व्यूह रचा है ॥ ३४-३५ ॥

युद्धाभिकामान् शूरांश्च पश्य माधव दंशितान् ।

त्रिगर्तराजं सहितं भ्रातृभिः पश्य केशव ॥ ३६ ॥

‘ माधव! युद्धकी इच्छासे कवच बाँधकर आये हुए इन शूरवीरोंपर दृष्टिपात कीजिये ।

केशव! यह देखिये, यह भाइयोंसहित त्रिगर्तराज खड़ा है ॥ ३६ ॥

अद्यैतान् नाशयिष्यामि पश्यतस्ते जनार्दन ।

य इमे मां यदुश्रेष्ठ योद्धुकामा रणाजिरे ॥ ३७ ॥

‘जनार्दन! यदुश्रेष्ठ! ये जो रणक्षेत्रमें मुझसे युद्ध करना चाहते हैं, मैं इन सबको आज आपके देखते - देखते नष्ट कर दूँगा' ॥ ३७ ॥

एतदुक्त्वा तु कौन्तेयो धनुर्ज्यामवमृज्य च ।

ववर्ष शरवर्षाणि नराधिपगणान् प्रति ॥ ३८ ॥

ऐसा कहकर कुन्तीनन्दन अर्जुनने अपने धनुषकी प्रत्यंचापर हाथ फेरा और विपक्षी नरेशोंपर बाणोंकी वर्षा प्रारम्भ कर दी ॥ ३८ ॥

तेऽपि तं परमेष्वासाः शरवर्षैरपूरयन् ।

तडागं वारिधाराभिर्यथा प्रावृषि तोयदाः ॥ ३ ९ ॥

जैसे बादल वर्षा ऋतुमें जलकी धाराओंसे तालाबको भरते हैं, उसी प्रकार वे महाधनुर्धर नरेश भी बाणोंकी वृष्टिसे अर्जुनको भरपूर करने लगे ॥ ३ ९ ॥

हाहाकारो महानासीत् तव सैन्ये विशाम्पते ।

छाद्यमानौ रणे कृष्णौ शरैर्दृष्ट्वा महारणे ॥ ४० ॥

प्रजानाथ! उस महायुद्धमें श्रीकृष्ण और अर्जुनको बाणोंसे आच्छादित देख आपकी सेनामें बड़े जोरसे कोलाहल होने लगा ॥ ४० ॥

देवा देवर्षयश्चैव गन्धर्वाश्च सहोरगैः ।

विस्मयं परमं जग्मुर्दृष्ट्वा कृष्णौ तथागतौ ॥ ४१ ॥

श्रीकृष्ण और अर्जुनको उस अवस्थामें देखकर देवताओं, देवर्षियों, गन्धर्वों और नागोंको महान् आश्चर्य हुआ ॥ ४१ ॥

ततः क्रुद्धोऽर्जुनो राजन्नैन्द्रमस्त्रमुदैरयत् ।

तत्राद्भुतमपश्याम विजयस्य पराक्रमम् ॥ ४२ ॥

राजन्! तब अर्जुनने कुपित होकर इन्द्रास्त्रका प्रयोग किया । उस समय हमलोगोंने अर्जुनका अद्भुत पराक्रम देखा ॥ ४२ ॥

शस्त्रवृष्टिं परैर्मुक्तां शरौघैर्यदवारयत् ।

न च तत्राप्यनिर्भिन्नः कश्चिदासीद् विशाम्पते ॥ ४३ ॥

पृष्ठ 1999

महाभारत — खण्ड ३, पृष्ठ 1999 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

उन्होंने अपने बाणसमूहद्वारा शत्रुओंकी की हुई बाण- वर्षाको रोक दिया । महाराज! उस समय वहाँ कोई भी योद्धा ऐसा नहीं रह गया था, जो उनके बाणोंसे क्षत - विक्षत न हो गया हो ॥ ४३ ॥

तेषां राजसहस्राणां हयानां दन्तिनां तथा ।

द्वाभ्यां त्रिभिः शरैश्चान्यान् पार्थो विव्याध मारिष ॥ ४४ ॥

आर्य! कुन्तीकुमार अर्जुनने उन सहस्रों राजाओंके घोड़ों तथा हाथियोंमेंसे किन्हींको दो - दो और किन्हींको तीन- तीन बाणोंसे घायल कर दिया ॥ ४४ ॥

ते हन्यमानाः पार्थेन भीष्मं शान्तनवं ययुः ।

अगाधे मज्जमानानां भीष्मः पोतोऽभवत् तदा ॥ ४५ ॥

अर्जुनकी मार खाकर वे सब - के - सब शान्तनुनन्दन भीष्मकी शरणमें गये । उस समय अगाध विपत्तिसमुद्रमें डूबते हुए सैनिकोंके लिये भीष्म जहाज बन गये ॥

आपतद्भिस्तु तैस्तत्र प्रभग्नं तावकं बलम् ।

संचुक्षुभे महाराज वातैरिव महार्णवः ॥ ४६ ॥

महाराज! पाण्डवोंके आक्रमण करनेपर आपकी सेनाका व्यूह भंग हो गया । वह सेना प्रचण्ड वायुके वेगसे समुद्रकी भाँति विक्षुब्ध हो उठी ॥ ४६ ॥

इति श्रीमहाभारते भीष्मपर्वणि भीष्मवधपर्वणि सप्तमयुद्धदिवसे एकाशीतितमोऽध्यायः ॥ ८१ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत भीष्मपर्वके अन्तर्गत भीष्मवधपर्वमें सातवें दिनका युद्धविषयक इक्यासीवाँ अध्याय पूराहुआ ॥ ८१ ॥

20

पृष्ठ 2000

महाभारत — खण्ड ३, पृष्ठ 2000 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

द्व्यशीतितमोऽध्यायः श्रीकृष्ण और अर्जुनसे डरकर कौरवसेनामें भगदड़, द्रोणाचार्य और विराटका युद्ध, विराटपुत्र शंखका वध, शिखण्डी और अश्वत्थामाका युद्ध, सात्यकिके द्वारा अलम्बुषकी पराजय, धृष्टद्युम्नके द्वारा दुर्योधनकी हार तथा भीमसेन और कृतवर्माका युद्ध संजय उवाच

तथा प्रवृत्ते संग्रामे निवृत्ते च सुशर्मणि ।

भग्नेषु चापि वीरेषु पाण्डवेन महात्मना ॥ १ ॥

संजय कहते हैं— राजन्! इस प्रकार संग्राम आरम्भ होनेपर महामना पाण्डुनन्दन अर्जुनसे पराजित हो सुशर्मा युद्धभूमिसे दूर हो गया और अन्यान्य वीर भी भाग खड़े हुए ॥ १ ॥

क्षुभ्यमाणे बले तूर्णं सागरप्रतिमे तव ।

प्रत्युद्याते च गाङ्गेये त्वरितं विजयं प्रति ॥ २ ॥

द्र-जैसी विशाल वाहिनीमें तुरंत आपकी समुद्र- ही हलचल मच गयी। उस समयगंगानन्दन भीष्मने शीघ्रतापूर्वक अर्जुनपर आक्रमण किया ॥ २ ॥

दृष्ट्वा दुर्योधनो राजा रणे पार्थस्य विक्रमम् ।

त्वरमाणः समभ्येत्य सर्वांस्तानब्रवीन्नृपान् ॥३ ॥

राजा दुर्योधनने रणभूमिमें अर्जुनका पराक्रम देखकर बड़ी उतावलीके साथ निकट जा उन समस्त नरेशोंसे कहा ॥ ३ ॥

तेषां तु प्रमुखे शूंर सुशर्माणं महाबलम् ।

मध्ये सर्वस्य सैन्यस्य भृशं संहर्षयन्निव ॥ ४ ॥

उन नरेशोंके सम्मुख सारी सेनाके बीचमें शूरवीर महाबली सुशर्माको अत्यन्त हर्ष प्रदान करता हुआ - सा दुर्योधन यों बोला- ॥ ४ ॥

एष भीष्मः शान्तनवो योद्धुकामो धनंजयम् ।

सर्वात्मना कुरुश्रेष्ठस्त्यक्त्वा जीवितमात्मनः ॥ ५ ॥

' वीरो! ये शान्तनुनन्दन कुरुश्रेष्ठ भीष्म अपना जीवन निछावर करके सम्पूर्ण हृदयसे अर्जुनके साथ युद्ध करना चाहते हैं ॥ ५ ॥

तं प्रयान्तं रणे वीरं सर्वसैन्येन भारतम् ।

संयत्ताः समरे सर्वे पालयध्वं पितामहम् ॥ ६ ॥