03.Mahabharata Volume 3 — पृष्ठ 2051–2060

महाभारत — खण्ड ३ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 2051–2060

पृष्ठ 2051

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अपश्याम महाराज भीष्मास्त्रेण प्रमोहितान् ॥ ७ ॥

महाराज! हमने देखा, भीष्मके अस्त्रसे मूर्च्छित हो बहुत-से पर्वताकार गजराज रणभूमिमें पड़े हैं और उनके पास कोई मनुष्य नहीं है ॥ ७ ॥

न तत्रासीत् पुमान् कश्चित् पाण्डवानां विशाम्पते ।

अन्यत्र रथिनां श्रेष्ठाद् भीमसेनान्महाबलात् ॥ ८ ॥

प्रजानाथ! उस समय वहाँ रथियोंमें श्रेष्ठ महाबली भीमसेनके सिवा पाण्डवपक्षका कोई भी वीर भीष्मके सामने नहीं ठहर सका ॥ ८ ॥

स हि भीष्मं समासाद्य ताडयामास संयुगे ।

ततो निष्ठानको घोरो भीष्म भीमसमागमे ॥ ९ ॥

बभूव सर्वसैन्यानां घोररूपो भयानकः ।

तथैव पाण्डवा हृष्टाः सिंहनादमथानदन् ॥ १० ॥

वे ही युद्धमें भीष्मका सामना करते हुए उनपर अपने बाणोंका प्रहार कर रहे थे । भीष्म और भीमसेनमें युद्ध होते समय सम्पूर्ण सेनाओंमें भयंकर कोलाहल मच गया और पाण्डव हर्षमें भरकर जोर- जोरसे सिंहनाद करने लगे ॥ ९ -१० ॥

ततो दुर्योधनो राजा सोदर्यैः परिवारितः ।

भीष्मं जुगोप समरे वर्तमाने जनक्षये ॥ ११ ॥

जिस समय युद्धमें वह जनसंहार हो रहा था, उसी समय राजा दुर्योधन अपने भाइयोंसे घिरा हुआ वहाँ आ पहुँचा और भीष्मकी रक्षा करने लगा ॥ ११ ॥

भीमस्तु सारथिं हत्वा भीष्मस्य रथिनां वरः ।

प्रद्रुताश्वे रथे तस्मिन् द्रवमाणे समन्ततः ॥ १२ ॥

इसी समय रथियोंमें श्रेष्ठ भीमसेनने भीष्मके सारथिको मार डाला । फिर तो उनके घोड़े उस रथको लेकर रणभूमिमें चारों ओर दौड़ लगाने लगे ॥ १२ ॥

(चचार युधि राजेन्द्र भीमो भीमपराक्रमः ।

सुनाभस्तव पुत्रो वै भीमसेनमुपाद्रवत् ॥

जघान निशितैर्बाणैर्भीमं विव्याध सप्तभिः । भीमसेनः सुसंक्रुद्धः शरेण नतपर्वणा ॥ )

सुनाभस्य शरेणाशु शिरश्चिच्छेद भारत ।

क्षुरप्रेण सुतीक्ष्णेन स हतो न्यपतद् भुवि ॥ १३ ॥

राजेन्द्र! भयंकर पराक्रमी भीमसेन युद्धमें सब ओर विचरने लगे । उस समय आपके पुत्र सुनाभने भीमसेनपर धावा किया और उन्हें सात तीखे बाणोंसे बींध डाला । भारत! तब भीमसेनने भी अत्यन्त कुपित होकर झुकी हुई गाँठवाले क्षुरप्र नामक बाणसे शीघ्र ही सुनाभका सिर काट दिया । उस तीखे क्षुरप्रसे मारा जाकर वह पृथ्वीपर गिर पड़ा ॥ १३ ॥

हते तस्मिन् महाराज तव पुत्रे महारथे ।

पृष्ठ 2052

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नामृष्यन्त रणे शूराः सोदराः सप्त संयुगे ॥ १४ ॥

महाराज! आपके उस महारथी पुत्रके मारे जानेपर उसके सात रणवीर भाई, जो वहीं मौजूद थे, भीमसेनका यह अपराध सहन न कर सके ॥ १४ ॥

आदित्यकेतुर्बह्वाशी कुण्डधारो महोदरः ।

अपराजितः पण्डितको विशालाक्षः सुदुर्जयः ॥ १५ ॥

पाण्डवं चित्रसंनाहा विचित्रकवचध्वजाः ।

अभ्यद्रवन्त संग्रामे योद्धुकामारिमर्दनाः ॥ १६ ॥

आदित्यकेतु, बह्वाशी, कुण्डधार, महोदर, अपराजित, पण्डितक और अत्यन्त दुर्जय वीर विशालाक्ष — ये सातों शत्रुमर्दन भाई विचित्र वेशभूषासे सुसज्जित हो विचित्र कवच और ध्वज धारण किये संग्राम- भूमिमें युद्धकी इच्छासे पाण्डुपुत्र भीमसेनपर टूट पड़े ॥ १५-१६ ॥

महोदरस्तु समरे भीमं विव्याध पत्रिभिः ।

नवभिर्वज्रसंकाशैर्नमुचिं वृत्रहा यथा ॥ १७ ॥

जैसे वृत्रविनाशक इन्द्रने नमुचि नामक दैत्यपर प्रहार किया था, उसी प्रकार महोदरने समरभूमिमें अपने वज्रसरीखे नौ बाणोंसे भीमसेनको घायल कर दिया ॥ १७ ॥

आदित्यकेतुः सप्तत्या बह्वाशी चापि पञ्चभिः ।

नवत्या कुण्डधारश्च विशालाक्षश्च पञ्चभिः ॥ १८ ॥

अपराजितो महाराज पराजिष्णुर्महारथम् ।

शरैर्बहुभिरानर्च्छद् भीमसेनं महाबलम् ॥ १ ९ ॥

महाराज! आदित्यकेतुने सत्तर, बह्वाशीने पाँच, कुण्डधारने नब्बे, विशालाक्षने पाँच और अपराजितने महारथी महाबली भीमसेनको पराजित करनेके लिये उन्हें बहुत - से बाणोंद्वारा पीड़ित किया ॥ १८-१९ ॥

रणे पण्डितकश्चैनं त्रिभिर्बाणैः समार्पयत् ।

स तन्न ममृषे भीमः शत्रुभिर्वधमाहवे ॥ २० ॥

पण्डितकने उस युद्धमें तीन बाणोंसे भीमसेनको घायल कर दिया । तब भीम उस रणक्षेत्रमें शत्रुओंद्वारा किये हुए प्रहारको सहन न कर सके ॥ २० ॥

धनुः प्रपीड्य वामेन करेणामित्रकर्शनः ।

शिरश्चिच्छेद समरे शरेणानतपर्वणा ॥ २१ ॥

अपराजितस्य सुनसं तव पुत्रस्य संयुगे । उन शत्रुसूदन वीरने बायें हाथसे धनुषको अच्छी तरह दबाकर झुकी हुई गाँठवाले बाणसे समरभूमिमें आपके पुत्र अपराजितका सुन्दर नासिकासे युक्त मस्तक काट डाला ॥ २१३ ॥

पराजितस्य भीमेन निपपात शिरो महीम् ॥ २२ ॥

पृष्ठ 2053

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अथापरेण भल्लेन कुण्डधारं महारथम् ।

प्राहिणोन्मृत्युलोकाय सर्वलोकस्य पश्यतः ॥ २३ ॥

भीमसेनसे पराजित हुए अपराजितका मस्तक धरतीपर जा गिरा । तत्पश्चात् भीमसेनने एक- दूसरे भल्लके द्वारा सब लोगोंके देखते -देखते महारथी कुण्डधारको यमराजके लोकमें भेज दिया ॥ २२-२३ ॥

ततः पुनरमेयात्मा प्रसंधाय शिलीमुखम् ।

प्रेषयामास समरे पण्डितं प्रति भारत ॥ २४ ॥

भरतनन्दन! तब अमेय आत्मबलसे सम्पन्न भीमने समरमें पुनः एक बाणका संधान करके उसे पण्डितककी ओर चलाया ॥ २४ ॥

स शरः पण्डितं हत्वा विवेश धरणीतलम् ।

यथा नरं निहत्याशु भुजगः कालचोदितः ॥ २५ ॥

जैसे कालप्रेरित सर्प किसी मनुष्यको शीघ्र ही डँसकर लापता हो जाता है, उसी प्रकार वह बाण पण्डितककी हत्या करके धरतीमें समा गया ॥ २५ ॥

विशालाक्षशिरश्छित्त्वा पातयामास भूतले ।

त्रिभिः शरैरदीनात्मा स्मरन् क्लेशं पुरातनम् ॥ २६ ॥

उसके बाद उदार हृदयवाले भीमने अपने पूर्व- क्लेशोंका स्मरण करके तीन बाणोंद्वारा विशालाक्षके मस्तकको काटकर धरतीपर गिरा दिया ॥ २६ ॥

महोदरं महेष्वासं नाराचेन स्तनान्तरे ।

विव्याध समरे राजन् स हतो न्यपतद् भुवि ॥ २७ ॥

राजन्! तत्पश्चात् उन्होंने महाधनुर्धर महोदरकी छातीमें एक नाराचसे प्रहार किया ।

उससे मारा जाकर वह युद्धमें धरतीपर गिर पड़ा ॥ २७ ॥

आदित्यकेतोः केतुं च छित्त्वा बाणेन संयुगे ।

भल्लेन भृशतीक्ष्णेन शिरश्चिच्छेद भारत ॥ २८ ॥

भारत! तदनन्तर भीमने रणक्षेत्रमें एक बाणसे आदित्यकेतुकी ध्वजा काटकर अत्यन्त तीखे भल्लके द्वारा उसका मस्तक भी काट दिया ॥ २८ ॥

बह्वाशिनं ततो भीमः शरेणानतपर्वणा ।

प्रेषयामास संक्रुद्धो यमस्य सदनं प्रति ॥ २ ९ ॥

इसके बाद क्रोधमें भरे हुए भीमसेनने झुकी हुई गाँठवाले बाणसे मारकर बह्वाशीको यमलोक भेज दिया ॥ २ ९ ॥

प्रदुद्रुवुस्ततस्तेऽन्ये पुत्रास्तव विशाम्पते ।

मन्यमाना हि तत् सत्यं सभायां तस्य भाषितम् ॥ ३० ॥

प्रजानाथ! तब आपके दूसरे पुत्र भीमसेनके द्वारा सभामें की हुई उस प्रतिज्ञाको सत्य मानकर वहाँसे भाग खड़े हुए ॥ ३० ॥

पृष्ठ 2054

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ततो दुर्योधनो राजा भ्रातृव्यसनकर्शितः ।

अबवीत् तावकान् योधान् भीमोऽयं युधि वध्यताम् ॥ ३१ ॥

भाइयोंके मरनेसे राजा दुर्योधनको बड़ा कष्ट हुआ । अतः उसने आपके समस्त सैनिकोंको आज्ञा दी कि इस भीमसेनको युद्धमें मार डालो ॥ ३१ ॥

एवमेते महेष्वासाः पुत्रास्तव विशाम्पते ।

भ्रातॄन् संदृश्य निहतान् प्रास्मरंस्ते हि तद् वचः ॥ ३२ ॥

यदुक्तवान् महाप्राज्ञः क्षत्ता हितमनामयम् ।

तदिदं समनुप्राप्तं वचनं दिव्यदर्शिनः ॥ ३३ ॥

प्रजानाथ! इस प्रकार ये आपके महाधनुर्धर पुत्र अपने भाइयोंको मारा गया देख उन बातोंकी याद करने लगे, जिन्हें महाज्ञानी विदुरने कहा था । वे सोचने लगे —दिव्यदर्शी विदुरने हमारे कुशल एवं हितके लिये जो बात कही थी, वह आज सिरपर आ गयी ॥ ३२-३३ ॥

लोभमोहसमाविष्टः पुत्रप्रीत्या जनाधिप ।

न बुध्यसे पुरा यत् तत् तथ्यमुक्तं वचो महत् ॥ ३४ ॥

जनेश्वर! आपने अपने पुत्रोंके प्रति प्रेमके कारण लोभ और मोहके वशीभूत हो, विदुरने पहले जो सत्य एवं हितकी महत्त्वपूर्ण बात बतायी थी, उसपर ध्यान नहीं दिया ॥ ३४ ॥

तथैव च वधार्थाय पुत्राणां पाण्डवो बली ।

नूनं जातो महाबाहुर्यथा हन्ति स्म कौरवान् ॥ ३५ ॥

उनके कथनानुसार ही बलवान् पाण्डुपुत्र महाबाहु भीम आपके पुत्रोंके वधका कारण बनते जा रहे हैं और उसी प्रकार वे कौरवोंका सर्वनाश कर रहे हैं ॥ ३५ ॥

ततो दुर्योधनो राजा भीष्ममासाद्य संयुगे ।

दुःखेन महताऽऽविष्टो विललाप सुदुःखितः ॥ ३६ ॥

उस समय राजा दुर्योधन युद्धभूमिमें भीष्मके पास जाकर महान् दुःखसे व्याप्त एवं अत्यन्त शोकमग्न होकर विलाप करने लगा ॥ ३६ ॥

निहता भ्रातरः शूरा भीमसेनेन मे युधि ।

यतमानास्तथान्येऽपि हन्यन्ते सर्वसैनिकाः ॥ ३७ ॥

‘ पितामह! भीमसेनने युद्धमें मेरे शूरवीर बन्धुओंको मार डाला और दूसरे भी समस्त सैनिक विजयके लिये पूर्ण प्रयत्न करते हुए भी असफल हो उनके हाथसे मारे जा रहे हैं ॥ ३७ ॥

भवांश्च मध्यस्थतया नित्यमस्मानुपेक्षते ।

सोऽहं कुपथमारूढः पश्य दैवमिदं मम ॥ ३८ ॥

‘ आप मध्यस्थ बने रहनेके कारण सदा हम लोगोंकी उपेक्षा करते हैं । मैं बड़े बुरे

मार्गपर चढ़ आया । मेरे इस दुर्भाग्यको देखिये ' ॥ ३८ ॥

पृष्ठ 2055

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एतच्छ्रुत्वा वचः क्रूरं पिता देवव्रतस्तव ।

दुर्योधनमिदं वाक्यमब्रवीत् साश्रुलोचनः ॥ ३ ९ ॥

यह क्रूरतापूर्ण वचन सुनकर आपके ताऊ भीष्म अपने नेत्रोंसे आँसू बहाते हुए वहाँ दुर्योधनसे इस प्रकार बोले— ॥ ३ ९ ॥

उक्तमेतन्मया पूर्वं द्रोणेन विदुरेण च ।

गान्धार्या च यशस्विन्या तत् त्वं तात न बुद्धवान् ॥ ४० ॥

‘ तात! मैंने, द्रोणाचार्यने, विदुरने तथा यशस्विनी गान्धारी देवीने भी पहले ही यह सब बात कह दी थी, परंतु तुमने इसपर ध्यान नहीं दिया ॥ ४० ॥

समयश्च मया पूर्वं कृतो वै शत्रुकर्शन ।

नाहं युधि नियोक्तव्यो नाप्याचार्यः कथंचन ॥ ४१ ॥

‘शत्रुसूदन! मैंने पहले ही यह निश्चय प्रकट कर दिया था कि तुम्हें मुझे या द्रोणाचार्यको युद्धमें किसी प्रकार भी नहीं लगाना चाहिये ( क्योंकि हमलोगोंका कौरवों तथा पाण्डवोंके प्रति समान स्नेह है ) ॥ ४१ ॥

यं यं हि धार्तराष्ट्राणां भीमो द्रक्ष्यति संयुगे ।

हनिष्यति रणे नित्यं सत्यमेतद् ब्रवीमि ते ॥ ४२ ॥

' मैं तुमसे यह सत्य कहता हूँ कि भीमसेन धृतराष्ट्रके पुत्रोंमेंसे जिस- जिसको युद्धमें ( अपने सामने आया हुआ ) देख लेंगे, उसे प्रतिदिनके संग्राममें अवश्य मार डालेंगे ॥ ४२ ॥

स त्वं राजन् स्थिरो भूत्वा रणे कृत्वा दृढां मतिम् ।

योधयस्व रणे पार्थान् स्वर्गं कृत्वा परायणम् ॥ ४३ ॥

‘ अतः राजन्! तुम स्थिर होकर युद्धके विषयमें अपना दृढ़ निश्चय बना लो और स्वर्गको ही अन्तिम आश्रय मानकर रणभूमिमें पाण्डवोंके साथ युद्ध करो ॥

न शक्याः पाण्डवा जेतुं सेन्द्रैरपि सुरासुरैः ।

तस्माद् युद्धे स्थिरां कृत्वा मतिं युद्धयस्व भारत ॥ ४४ ॥

‘ भारत! इन्द्रसहित सम्पूर्ण देवता और असुर मिलकर भी पाण्डवोंको जीत नहीं सकते। अतः युद्धके लिये पहले अपनी बुद्धिको स्थिर कर लो । उसके बाद युद्ध करो ' ॥ ४४ ॥

इति श्रीमहाभारते भीष्मपर्वणि भीष्मवधपर्वणि सुनाभादिधृतराष्ट्रपुत्रवधे अष्टाशीतितमोऽध्यायः ॥ ८८ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत भीष्मपर्वके अन्तर्गत भीष्मवधपर्वमें सुनाभ आदि धृतराष्ट्रके पुत्रोंका वधविषयक अट्ठासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ८८ ॥

[दाक्षिणात्य अधिक पाठके २ श्लोक मिलाकर कुल ४६ श्लोक हैं ]

पृष्ठ 2056

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एकोननवतितमोऽध्यायः कौरव - पाण्डव - सेनाका घमासान युद्ध और भयानक जनसंहार धृतराष्ट्रउवाच

दृष्ट्वा मे निहतान् पुत्रान् बहूनेकेन संजय ।

भीष्मो द्रोणः कृपश्चैव किमकुर्वत संयुगे ॥ १ ॥

धृतराष्ट्र बोले- संजय! एकमात्र भीमसेनके द्वारा युद्धमें मेरे बहुत-से पुत्रोंको मारा गया देख भीष्म, द्रोण और कृपाचार्यने क्या किया? ॥ १ ॥

अहन्यहनि मे पुत्राः क्षयं गच्छन्ति संजय ।

मन्येऽहं सर्वथा सूत दैवेनोपहता भृशम् ॥ २ ॥

मेरे पुत्र प्रतिदिन नष्ट होते जा रहे हैं । सूत! मेरा तो ऐसा विश्वास है कि हमलोग सर्वथा अत्यन्त दुर्भाग्यके मारे हुए हैं ॥ २ ॥

यत्र मे तनयाः सर्वे जीयन्ते न जयन्त्युत ।

यत्र भीष्मस्य द्रोणस्य कृपस्य च महात्मनः ॥ ३ ॥

सौमदत्तेश्च वीरस्य भगदत्तस्य चोभयोः ।

अश्वत्थाम्नस्तथा तात शूराणामनिवर्तिनाम् ॥ ४ ॥

अन्येषां चैव शूराणां मध्यगास्तनया मम ।

यदहन्यन्त संग्रामे किमन्यद् भागधेयतः ५ ॥

दुर्भाग्यके अधीन होनेके कारण ही मेरे पुत्र हारते जा रहे हैं; विजयी नहीं हो रहे हैं । जहाँ भीष्म, द्रोण, महामना कृपाचार्य, वीरवर भूरिश्रवा, भगदत्त, अश्वत्थामा तथा युद्धमें पीठ न दिखानेवाले अन्य शूरवीरोंके बीचमें रहकर भी मेरे पुत्र प्रतिदिन संग्राममें मारे जाते हैं, वहाँ दुर्भाग्यके सिवा और क्या कारण हो सकता है? ॥ ३–५ ॥

न हि दुर्योधनो मन्दः पुरा प्रोक्तमबुध्यत ।

वार्यमाणो मया तात भीष्मेण विदुरेण च ॥ ६ ॥

गान्धार्या चैव दुर्मेधाः सततं हितकाम्यया ।

नाबुध्यत पुरा मोहात् तस्य प्राप्तमिदं फलम् ॥ ७ ॥

यद् भीमसेनः समरे पुत्रान् मम विचेतसः ।

अहन्यहनि संक्रुद्धो नयते यमसादनम् ॥ ८ ॥

मूर्ख दुर्योधनने पहले मेरी कही हुई बातोंपर ध्यान नहीं दिया । तात! मैंने, भीष्मने, विदुरने तथा गान्धारीने भी सदा हितकी इच्छासे दुर्बुद्धि दुर्योधनको बार- बार मना किया;

पृष्ठ 2057

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परंतु मोहवश पूर्वकालमें हमारी ये बातें उसके समझमें नहीं आयीं । उसीका यह फल अब प्राप्त हुआ है, जिससे भीमसेन समरांगणमें कुपित होकर मेरे मूर्ख पुत्रोंको प्रतिदिन यमलोक भेज रहा है ॥ ६–८ ॥ संजय उवाच

इदं तत् समनुप्राप्तं क्षत्तुर्वचनमुत्तमम् ।

न बुद्धवानसि विभो प्रोच्यमानं हितं तदा ॥ ९ ॥

संजयने कहा — प्रभो! उस समय आपने जो विदुरजीके कहे हुए उत्तम एवं हितकारक वचनको नहीं सुना ( सुनकर भी उसपर ध्यान नहीं दिया ), उसीका यह फल प्राप्त हुआ है ॥ ९ ॥

निवारय सुतान् द्यूतात् पाण्डवान् मा द्रुहेति च ।

सुहृदां हितकामानां ब्रुवतां तत् तदेव च ॥ १० ॥

न शुश्रूषसि तद् वाक्यं मर्त्यः पथ्यमिवौषधम् ।

तदेव त्वामनुप्राप्तं वचनं साधुभाषितम् ॥ ११ ॥

उन्होंने कहा था कि ‘ आप अपने पुत्रोंको जुआ खेलनेसे रोकिये । पाण्डवोंसे द्रोह न कीजिये । ' आपका हित चाहनेवाले अन्यान्य सुहृदोंने भी आपसे वे ही बातें कही थीं; परंतु जैसे मरणासन्न पुरुषको हितकारक ओषधि अच्छी नहीं लगती, उसी प्रकार आप उन हितकर वचनोंको सुनना भी नहीं चाहते थे । अतः श्रेष्ठ विदुरने जैसा बताया था, वैसा ही परिणाम आपके सामने आया है ॥ १०-११ ॥

विदुरद्रोणभीष्माणां तथान्येषां हितैषिणाम् ।

अकृत्वा वचनं पथ्यं क्षयं गच्छन्ति कौरवाः ॥ १२ ॥

विदुर, द्रोण, भीष्म तथा अन्य हितैषियोंके हितकर वचनोंको न माननेके कारण इन कौरवोंका विनाश हो रहा है ॥ १२ ॥

तदेतत् समनुप्राप्तं पूर्वमेव विशाम्पते ।

तस्मात् त्वं शृणु तत्त्वेन यथा युद्धमवर्तत ॥ १३ ॥

प्रजापालक नरेश! यह सब तो पहले से ही प्राप्त है । अब आप जिस प्रकार युद्ध हुआ, उसका यथावत् समाचार सुनिये ॥ १३ ॥

मध्याह्ने सुमहारौद्रः संग्रामः समपद्यत ।

लोकक्षयकरो राजंस्तन्मे निगदतः शृणु ॥ १४ ॥

राजन्! उस दिन दोपहर होते -होते बड़ा भयंकर संग्राम होने लगा, जो सम्पूर्ण जगत्के

योद्धाओंका विनाश करनेवाला था । वह सब मैं कह रहा हूँ, सुनिये ॥ १४ ॥

ततः सर्वाणि सैन्यानि धर्मपुत्रस्य शासनात् ।

संरब्धान्यभ्यवर्तन्त भीष्ममेव जिघांसया ॥ १५ ॥

पृष्ठ 2058

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तदनन्तर धर्मपुत्र युधिष्ठिरके आदेशसे क्रोधमें भरी हुई उनकी सारी सेनाएँ भीष्मपर ही टूट पड़ीं । वे भीष्मको मार डालना चाहती थीं ॥ १५ ॥

धृष्टद्युम्नः शिखण्डी च सात्यकिश्च महारथः ।

युक्तानीका महाराज भीष्ममेव समभ्ययुः ॥ १६ ॥

महाराज! धृष्टद्युम्न, शिखण्डी तथा महारथी सात्यकि- इन सबने अपनी सेनाओंके साथ भीष्मपर ही आक्रमण किया ॥ १६ ॥

विराटो द्रुपदश्चैव सहिताः सर्वसोमकैः ।

अभ्यद्रवन्त संग्रामे भीष्ममेव महारथम् ॥ १७ ॥

राजा विराट और सम्पूर्ण सोमकोंसहित द्रुपदने संग्राममें महारथी भीष्मपर ही चढ़ाई की ॥ १७ ॥

केकया धृष्टकेतुश्च कुन्तिभोजश्च दंशितः ।

युक्तानीका महाराज भीष्ममेव समभ्ययुः ॥ १८ ॥

नरेश्वर! केकय, धृष्टकेतु और कवचधारी कुन्तिभोज- इन सबने अपनी सेनाओंके साथ भीष्मपर ही धावा किया ॥ १८ ॥

अर्जुनो द्रौपदेयाश्च चेकितानश्च वीर्यवान् ।

दुर्योधनसमादिष्टान् राज्ञः सर्वान् समभ्ययुः ॥ १ ९ ॥

अर्जुन, द्रौपदीके पाँचों पुत्र और पराक्रमी चेकितान – ये दुर्योधनके भेजे हुए समस्त राजाओंपर चढ़ आये ॥ १ ९ ॥

अभिमन्युस्तथा शूरो हैडिम्बश्च महारथः ।

भीमसेनश्च संक्रुद्धस्तेऽभ्यधावन्त कौरवान् ॥ २० ॥

शूरवीर अभिमन्यु, महारथी घटोत्कच तथा क्रोधमें भरे हुए भीमसेन– इन सबने कौरवोंपर धावा किया ॥ २० ॥

त्रिधाभूतैरवध्यन्त पाण्डवैः कौरवा युधि ।

तथैव कौरवै राजन्नवध्यन्त परे रणे ॥ २१ ॥

राजन्! पाण्डवोंने तीन दलोंमें विभक्त होकर कौरवोंका वध आरम्भ किया । इसी प्रकार कौरव भी रणभूमिमें शत्रुओंका नाश करने लगे ॥ २१ ॥

द्रोणस्तु रथिनः श्रेष्ठान् सोमकान् सृजयैः सह ।

अभ्यधावत संक्रुद्धः प्रेषयिष्यन् यमक्षयम् ॥ २२ ॥

द्रोणाचार्य श्रेष्ठ रथी सोमकों और सृजयोंको यमलोक भेजनेके लिये क्रोधपूर्वक उनके ऊपर धावा बोल दिया ॥ २२ ॥

तत्राक्रन्दो महानासीत् सृजयानां महात्मनाम् ।

वध्यतां समरे राजन् भारद्वाजेन धन्विना ॥ २३ ॥

पृष्ठ 2059

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राजन्! धनुर्धर द्रोणाचार्यके द्वारा समरभूमिमें मारे जाते हुए महामना सृजयोंका महान् आर्तनाद सुनायी देने लगा ॥ २३ ॥

द्रोणेन निहतास्तत्र क्षत्रिया बहवो रणे ।

विचेष्टन्तो ह्यदृश्यन्त व्याधिक्लिष्टा नरा इव ॥ २४ ॥

द्रोणाचार्यके मारे हुए बहुत - से क्षत्रिय रणभूमिमें व्याधिग्रस्त मनुष्योंकी भाँति छटपटाते हुए दिखायी देते थे ॥ २४ ॥

कूजतां क्रन्दतां चैव स्तनतां चैव भारत ।

अनिशं शुश्रुवे शब्दः क्षुत्क्लिष्टानां नृणामिव ॥ २५ ॥

भरतनन्दन! भूखसे पीड़ित मनुष्योंकी भाँति कूजते, क्रन्दन करते और गरजते हुए योद्धाओंका शब्द निरन्तर सुनायी देता था ॥ २५ ॥

तथैव कौरवेयाणां भीमसेनो महाबलः ।

चकार कदनं घोरं क्रुद्धः काल इवापरः ॥ २६ ॥

इसी प्रकार महाबली भीमसेन क्रोधमें भरे हुए दूसरे कालके समान कौरव सैनिकोंका घोर संहार करने लगे ॥

वध्यतां तत्र सैन्यानामन्योन्येन महारणे ।

प्रावर्तत नदी घोरा रुधिरौघप्रवाहिनी ॥ २७ ॥

उस महायुद्धमें परस्पर मारकाट करनेवाले सैनिकोंकी रक्तराशिको प्रवाहित करनेवाली एक भयंकर नदी बह चली ॥ २७ ॥

स संग्रामो महाराज घोररूपोऽभवन्महान् ।

कुरूणां पाण्डवानां च यमराष्ट्रविवर्धनः ॥ २८ ॥

महाराज! कौरवों और पाण्डवोंका वह घोर महा- संग्राम यमलोककी वृद्धि करनेवाला था ॥ २८ ॥

ततो भीमो रणे क्रुद्धो रभसश्च विशेषतः ।

गजानीकं समासाद्य प्रेषयामास मृत्यवे ॥ २ ९ ॥

तब युद्धमें विशेष वेगशाली भीमसेनने कुपित हो हाथियोंकी सेनामें प्रवेशकर उन्हें कालके गालमें भेजना आरम्भ किया ॥ २ ९ ॥

तत्र भारत भीमेन नाराचाभिहता गजाः ।

पेतुर्नेदुश्च सेदुश्च दिशश्च परिबभ्रमुः ॥ ३० ॥

भारत! वहाँ भीमके नाराचोंसे पीड़ित हुए हाथी गिरते, चिग्घाड़ते, बैठ जाते अथवा सम्पूर्ण दिशाओंमें चक्कर लगाने लगते थे ॥ ३० ॥

छिन्नहस्ता महानागाश्छिन्नगात्राश्च मारिष ।

क्रौञ्चवद् व्यनदन् भीताः पृथिवीमधिशेरते ॥ ३१ ॥

पृष्ठ 2060

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आर्य! सूँड़ तथा दूसरे - दूसरे अंगोंके कट जाने से हाथी भयभीत हो क्रौंच पक्षीकी भाँति चीत्कार करते और धराशायी हो जाते थे ॥ ३१

नकुलः सहदेवश्च हयानीकमभिद्रुती ।

ते हयाः काञ्चनापीडा रुक्मभाण्डपरिच्छदाः ॥ ३२ ॥

वध्यमाना व्यदृश्यन्त शतशोऽथ सहस्रशः । नकुल और सहदेवने घुड़सवारोंकी सेनापर आक्रमण किया । राजन्! उन घोड़ोंने सोनेकी कलँगी तथा सोनेके ही अन्यान्य आभूषण धारण किये थे । वे सब सैकड़ों और सहस्रोंकी संख्यामें मरकर गिरते दिखायी देते थे ॥ ३२ ॥

पतद्भिस्तुरगै राजन् समास्तीर्यत मेदिनी ॥ ३३ ॥

निर्जिहैश्च श्वसद्भिश्च कूजद्भिश्च गतासुभिः ।

हयैर्बभौ नरश्रेष्ठ नानारूपधरैर्धरा ॥ ३४ ॥

राजन्! वहाँ गिरते हुए घोड़ोंकी लाशोंसे सारी पृथ्वी पट गयी । किन्हींकी जीभ निकल आयी थी, कोई लंबी साँस खींच रहे थे1, कोई धीरे - धीरे अव्यक्त शब्द करते और कितनोंके प्राण निकल गये थे । नरश्रेष्ठ! इस प्रकार विभिन्न रूपधारी घोड़ोंसे आच्छादित होनेके कारण इस पृथ्वीकी अद्भुत शोभा हो रही थी ॥ ३३-३४ ॥

अर्जुनेन हतैः संख्ये तथा भारत राजभिः ।

प्रबभौ वसुधा घोरा तत्र तत्र विशाम्पते ॥ ३५ ॥

भारत! प्रजानाथ! जहाँ - तहाँ अर्जुनके द्वारा युद्धमें मारे गये राजाओंसे भरी हुई वह रणभूमि बड़ी भयानक जान पड़ती थी ॥ ३५ ॥

रथैर्भग्नैर्ध्वजैश्छिन्नैर्निकृत्तैश्च महायुधैः ।

चामरैर्व्यजनैश्चैव छत्रैश्च सुमहाप्रभैः ॥ ३६ ॥

हारैर्निष्कैः सकेयूरैः शिरोभिश्च सकुण्डलैः ।

उष्णीषैरपविद्धैश्च पताकाभिश्च सर्वशः ॥ ३७ ॥

अनुकर्षैः शुभै राजन् योक्त्रैश्चैव सरश्मिभिः ।

संकीर्णा वसुधा भाति वसन्ते कुसुमैरिव ॥ ३८ ॥

राजन्! टूटे हुए रथ, कटे हुए ध्वज, छिन्न - भिन्न हुए बड़े- बड़े आयुध, चँवर, व्यजन, अत्यन्त प्रकाशमान छत्र, सोनेके हार, केयूर, कुण्डलमण्डित मस्तक, गिरे हुए शिरोभूषण ( पगड़ी आदि ), पताका, सुन्दर अनुकर्ष,* जोत और बागडोर आदिसे आच्छादित हुई वह संग्रामभूमि ऐसी जान पड़ती थी, मानो वसन्तऋतुमें उसपर भाँति- भाँतिके फूल गिरे हुए हों ॥ ३६–३८ ॥

एवमेष क्षयो वृत्तः पाण्डूनामपि भारत ।

क्रुद्धे शान्तनवे भीष्मे द्रोणे च रथसत्तमे ॥ ३ ९ ॥

अश्वत्थाम्नि कृपे चैव तथैव कृतवर्मणि ।