श्रीगणेशाय नमः।

महाभारत — खण्ड ३ — पृष्ठ 2171–2180

महाभारत — खण्ड ३ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 2171–2180

पृष्ठ 2171

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गुणवत्सु कथं द्वेषं धृतराष्ट्रो जनेश्वरः ।

कृतवान् पाण्डुपुत्रेषु पापात्मा लोभमोहितः ॥ ४० ॥

पापात्मा राजा धृतराष्ट्रने लोभसे मोहित होकर गुणवान् पाण्डवोंसे द्वेष क्यों किया? ॥ ४० ॥

एवं बहुविधा वाचः श्रूयन्ते स्म परस्परम् ।

पाण्डवस्तवसंयुक्ताः पुत्राणां ते सुदारुणाः ॥ ४१ ॥

महाराज! इस प्रकार वहाँ परस्पर कही हुई पाण्डवोंकी प्रशंसा तथा आपके पुत्रोंकी अत्यन्त भयंकर निन्दासे युक्त नाना प्रकारकी बातें सुनायी पड़ती थीं ॥ ४१ ॥

ता निशम्य ततो वाचः सर्वयोधैरुदाहृताः ।

आगस्कृत् सर्वलोकस्य पुत्रो दुर्योधनस्तव ॥ ४२ ॥

भीष्मं द्रोणं कृपं चैव शल्यं चोवाच भारत ।

युध्यध्वमनहंकाराः किं चिरं कुरुथेति च ॥ ४३ ॥

भारत! तब सम्पूर्ण योद्धाओंके मुखसे निकली हुई उन बातोंको सुनकर सम्पूर्ण लोकोंका अपराध करनेवाले आपके पुत्र दुर्योधनने भीष्म, द्रोण, कृप और शल्यसे कहा ——आपलोग अहंकार छोड़कर युद्ध करें; विलम्ब क्यों कर रहे हैं? ' ॥ ४२-४३ ॥

ततः प्रववृते युद्धं कुरूणां पाण्डवैः सह ।

अक्षद्यूतकृतं राजन् सुघोरं वैशसं तदा ॥ ४४ ॥

राजन्! तदनन्तर कौरवोंका पाण्डवोंके साथ अत्यन्त भयंकर युद्ध होने लगा, जो कपटपूर्ण द्यूतके कारण सम्भव हुआ था और जिसमें बड़ी भारी मारकाट मच रही थी ॥

यत् पुरा न निगृह्णासि वार्यमाणो महात्मभिः ।

वैचित्रवीर्य तस्येदं फलं पश्य सुदारुणम् ॥ ४५ ॥

विचित्रवीर्यनन्दन महाराज धृतराष्ट्र! पूर्वकालमें महात्मा पुरुषोंके मना करनेपर भी जो आपने उनकी बातें नहीं मानीं, उसीका यह भयंकर फल प्राप्त हुआ है, इसे देखिये ॥ ४५ ॥

न हि पाण्डुसुता राजन् ससैन्याः सपदानुगाः ।

रक्षन्ति समरे प्राणान् कौरवा वापि संयुगे ॥ ४६ ॥

राजन्! सेना और सेवकोंसहित पाण्डव अथवा कौरव समरभूमिमें अपने प्राणोंकी रक्षा नहीं करते हैं — प्राणोंका मोह छोड़कर युद्ध कर रहे हैं ॥ ४६ ॥

एतस्मात् कारणाद् घोरो वर्तते स्वजनक्षयः ।

दैवाद् वा पुरुषव्याघ्र तव चापनयान्नृप ॥ ४७ ॥

पुरुषसिंह! नरेश्वर! इस कारणसे अथवा दैवकी प्रेरणासे या आपके ही अन्यायसे होनेवाले इस युद्धमें स्वजनोंका घोर संहार हो रहा है ॥ ४७ ॥

पृष्ठ 2172

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इति श्रीमहाभारते भीष्मपर्वणि भीष्मवधपर्वणि संकुलयुद्धे त्र्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १०३ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत भीष्मपर्वके अन्तर्गत भीष्मवधपर्वमें घमासान युद्धविषयक एक सौ तीसरा अध्याय पूरा हुआ ॥ १०३ ॥

पृष्ठ 2173

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चतुरधिकशततमोऽध्यायः अर्जुनके द्वारा त्रिगर्तोंकी पराजय, कौरव - पाण्डव- सैनिकोंका घोर युद्ध, अभिमन्युसे चित्रसेनकी, द्रोणसे द्रुपदकी और भीमसेनसे बाह्लीककी पराजय तथा सात्यकि और भीष्मका युद्ध संजय उवाच

अर्जुनस्तान् नरव्याघ्रः सुशर्मानुचरान् नृपान् ।

अनयत् प्रेतराजस्य सदनं सायकैः शितैः ॥ १ ॥

संजय कहते हैं — राजन्! पुरुषसिंह अर्जुन अपने तीखे बाणोंसे सुशर्माके अनुगामी नरेशोंको यमलोक भेजने लगे ॥ १ ॥

सुशर्मापि ततो बाणैः पार्थं विव्याध संयुगे ।

वासुदेवं च सप्तत्या पार्थं च नवभिः पुनः ॥ २ ॥

तब सुशर्माने भी युद्धस्थलमें अनेक बाणोंद्वारा कुन्तीकुमार अर्जुनको घायल कर दिया । फिर उसने वसुदेवनन्दन श्रीकृष्णको सत्तर और अर्जुनको नौ बाण मारे ॥

तं निवार्य शरौघेण शक्रसूनुर्महारथः ।

सुशर्मणो रणे योद्धान् प्राहिणोद् यमसादनम् ॥ ३ ॥

यह देख इन्द्रपुत्र महारथी अर्जुनने अपने बाण- समूहोंके द्वारा सुशर्माको रोककर रणक्षेत्रमें उसके योद्धाओंको यमलोक पहुँचाना आरम्भ किया ॥ ३ ॥

ते वध्यमानाः पार्थेन कालेनेव युगक्षये ।

व्यद्रवन्त रणे राजन् भये जाते महारथाः ॥ ४ ॥

राजन्! जैसे युगान्तमें साक्षात् कालके द्वारा सारी प्रजा मारी जाती है, उसी प्रकार रणक्षेत्रमें अर्जुनके द्वारा मारे जाते हुए सारे महारथी युद्धका मैदान छोड़कर भागने लगे ॥ ४ ॥

उत्सृज्य तुरगान् केचिद् रथान् केचिच्च मारिष ।

गजानन्ये समुस्तृज्य प्राद्रवन्त दिशो दश ॥ ५ ॥

आर्य! कुछ लोग घोड़ोंको, कुछ दूसरे लोग रथोंको और इसी प्रकार कुछ लोग हाथियोंको छोड़कर दसों दिशाओंमें भागने लगे ॥ ५ ॥

अपरे तु तदाऽऽदाय वाजिनागरथान् रणे ।

त्वरया परया युक्ताः प्राद्रवन्त विशाम्पते ॥ ६ ॥

पादाताश्चापि शस्त्राणि समुत्सृज्य महारणे ।

पृष्ठ 2174

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निरपेक्षा व्यधावन्त तेन तेन स्म भारत ॥ ७ ॥

प्रजानाथ! दूसरे लोग उस समय बड़ी उतावलीके साथ अपने हाथी, घोड़े एवं रथको साथ ले रणभूमिसे भाग निकले । भारत! उस महायुद्धमें पैदल सिपाही भी अपने अस्त्र-शस्त्रोंको फेंककर उनकी कोई अपेक्षा न रखकर जिधरसे राह मिली, उधरसे ही भागने लगे ॥

वार्यमाणाः सुबहुशस्त्रैगर्तेन सुशर्मणा ।

तथान्यैः पार्थिवश्रेष्ठैर्न व्यतिष्ठन्त संयुगे ॥ ८ ॥

यद्यपि त्रिगर्तराज सुशर्मा तथा अन्य श्रेष्ठ नरेशोंने भी बारंबार रोकनेका प्रयत्न किया, तथापि वे सैनिक युद्धमें ठहर न सके ॥ ८ ॥

तद् बलं प्रद्रुतं दृष्ट्वा पुत्रो दुर्योधनस्तव ।

पुरस्कृत्य रणे भीष्मं सर्वसैन्यपुरस्कृतः ॥ ९ ॥

सर्वोद्योगेन महता धनंजयमुपाद्रवत् ।

त्रिगर्ताधिपतेरर्थे जीवितस्य विशाम्पते ॥ १० ॥

उस सेनाको भागती देख आपके पुत्र दुर्योधनने रणभूमिमें भीष्मको आगे करके सम्पूर्ण सेनाओंके साथ महान् प्रयत्नपूर्वक धनंजयपर धावा किया । प्रजानाथ! उसके आक्रमणका उद्देश्य था त्रिगर्तराजके जीवनकी रक्षा ॥ ९ -१० ॥

स एकः समरे तस्थौ किरन् बहुविधाञ्शरान् ।

भ्रातृभिः सहितः सर्वैः शेषा हि प्रद्रुता नराः ॥ ११ ॥

केवल दुर्योधन ही अपने समस्त भाइयोंके साथ नाना प्रकारके बाणोंकी वर्षा करता

हुआ समरभूमिमें खड़ा रहा। शेष सब मनुष्य भाग गये ॥ ११ ॥

तथैव पाण्डवा राजन् सर्वोद्योगेन दंशिताः ।

प्रययुः फाल्गुनार्थाय यत्र भीष्मो व्यतिष्ठत ॥ १२ ॥

राजन्! उसी प्रकार पाण्डव भी कवच बाँधकर सम्पूर्ण उद्योगके साथ अर्जुनकी रक्षाके लिये उसी स्थानपर गये, जहाँ भीष्म स्थित थे ॥ १२ ॥

ज्ञायमाना रणे वीर्यं घोरं गाण्डीवधन्वनः ।

हाहाकारकृतोत्साहा भीष्मं जग्मुः समन्ततः ॥ १३ ॥

गाण्डीवधारी अर्जुनके भयंकर पराक्रमको जाननेके कारण वे लोग उत्साहके साथ कोलाहल और सिंहनाद करते हुए सब ओरसे भीष्मपर आक्रमण करने लगे ॥

ततस्तालध्वजः शूरः पाण्डवानां वरूथिनीम् ।

छादयामास समरे शरैः संनतपर्वभिः ॥ १४ ॥

तदनन्तर तालचिह्नित ध्वजावाले शूरवीर भीष्मने झुकी हुई गाँठवाले बाणोंसे युद्धमें पाण्डवसेनाको आच्छादित कर दिया ॥ १४ ॥

एकीभूतास्ततः सर्वे कुरवः सह पाण्डवैः ।

पृष्ठ 2175

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अयुध्यन्त महाराज मध्यं प्राप्ते दिवाकरे ॥ १५ ॥

महाराज! तत्पश्चात् समस्त कौरव एकत्र संगठित होकर दोपहर होते - होते पाण्डवोंके साथ घोर युद्ध करने लगे ॥ १५ ॥

सात्यकिः कृतवर्माणं विद्ध्वा पञ्चभिराशुगैः ।

अतिष्ठदाहवे शूरः किरन् बाणान् सहस्रशः ॥ १६ ॥

श्हवीर सात्यकि कृतवर्माको पाँच बाणोंसे घायल करके समरभूमिमें सहस्रों बाणोंकी वर्षा करते हुए खड़े रहे ॥ १६ ॥

तथैव द्रुपदो राजा द्रोणं विद्ध्वा शितैः शरैः ।

पुनर्विव्याध सप्तत्या सारथिं चास्थ पञ्चभिः ॥ १७ ॥

इसी प्रकार राजा द्रुपदने द्रोणाचार्यको तीखे बाणोंसे एक बार घायल करके सत्तर बाणोंद्वारा पुनः घायल किया और पाँच बाणोंसे उनके सारथिको भी भारी चोट पहुँचायी ॥ १७ ॥

भीमसेनस्तु राजानं बाह्लीकं प्रपितामहम् ।

विद्ध्वा नदन्महानादं शार्दूल इव कानने ॥ १८ ॥

भीमसेनने अपने प्रपितामह राजा बाह्लीकको बाणोंद्वारा घायल करके वनमें सिंहके समान बड़े जोरसे गर्जना की ॥ १८ ॥

आर्जुनिश्चित्रसेनेन विद्धो बहुभिराशुगैः ।

अतिष्ठदाहवे शूरः किरन् बाणान् सहस्रशः ॥ १ ९ ॥

अर्जुनकुमार अभिमन्युको चित्रसेनने बहुत- से बाणों द्वारा घायल कर दिया था, तो भी शूरवीर अभिमन्यु सहस्रों बाणोंकी वर्षा करता हुआ युद्धभूमिमें डटा रहा ॥ १ ९ ॥

चित्रसेनं त्रिभिर्बाणैर्विव्याध समरे भृशम् ।

समागतौ तौ तु रणे महामात्रौ व्यरोचताम् ॥ २० ॥

यथा दिवि महाघोरौ राजन् बुधशनैश्चरौ । उसने तीन बाणोंसे समरांगणमें चित्रसेनको अत्यन्त घायल कर दिया । राजन्! जैसे आकाशमें दो महाघोर ग्रह बुध और शनैश्चर सुशोभित होते हैं, उसी प्रकार दो महान् वीर चित्रसेन और अभिमन्यु रण- भूमिमें शोभा पा रहे थे ॥ २०३ ॥

तस्याश्वांश्चतुरो हत्वा सूतं च नवभिः शरैः ॥ २१ ॥

ननाद बलवन्नादं सौभद्रः परवीरहा । तब शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले सुभद्राकुमार अभिमन्युने चित्रसेनके चारों घोड़ोंको मारकर नौ बाणोंसे उसके सारथिको भी नष्ट कर दिया । तत्पश्चात् बड़े जोरसे सिंहनाद किया ॥ २१३ ॥

हताश्वात् तु रथात् तूर्णं सोऽवप्लुत्य महारथः ॥ २२ ॥

आरुरोह रथं तूर्णं दुर्मुखस्य विशाम्पते ।

पृष्ठ 2176

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प्रजानाथ! घोड़ोंके मारे जानेपर महारथी चित्रसेन तुरंत ही रथसे कूद पड़े और दुर्मुखके रथपर आरूढ़ हो गये ॥ २२ ॥

द्रोणश्च द्रुपदं भित्त्वा शरैः संनतपर्वभिः ॥ २३ ॥

सारथिं चास्य विव्याध त्वरमाणः पराक्रमी । पराक्रमी द्रोणाचार्यने भी झुकी हुई गाँठवाले बाणोंसे द्रुपदको घायल करके बड़ी उतावलीके साथ उनके सारथिको भी बींध डाला ॥ २३३ ॥

पीड्यमानस्ततो राजा द्रुपदो वाहिनीमुखे ॥ २४ ॥

अपायाज्जवनैरश्वैः पूर्ववैरमनुस्मरन् । इस प्रकार युद्धके मुहानेपर द्रोणाचार्यसे पीड़ित हो राजा द्रुपद पूर्व वैरका स्मरण करते हुए शीघ्रगामी घोड़ोंद्वारा वहाँसे भाग गये ॥ २४ ॥

भीमसेनस्तु राजानं मुहूर्तादिव बाह्निकम् ॥ २५ ॥

व्यश्वसूतरथं चक्रे सर्वसैन्यस्य पश्यतः । भीमसेनने दो ही घड़ीमें सारी सेनाके देखते- देखते राजा बाह्लीकको घोड़े, सारथि तथा रथसे शून्य कर दिया ॥ २५ ॥

ससम्भ्रमो महाराज संशयं परमं गतः ॥ २६ ॥

अवप्लुत्य ततो वाहाद् बाह्लीकः पुरुषोत्तमः ।

आरुरोह रथं तूर्णं लक्ष्मणस्य महारणे ॥ २७ ॥

महाराज! नरश्रेष्ठ बाह्लीक बड़ी घबराहटमें पड़ गये। उनका जीवन अत्यन्त संशयमें पड़ गया । उस अवस्थामें वे रथसे कूदकर शीघ्र ही उस महायुद्धमें लक्ष्मणके रथपर आरूढ़ हो गये ॥ २६-२७ ॥

सात्यकिः कृतवर्माणं वारयित्वा महारणे ।

शरैर्बहुविधै राजन्नाससाद पितामहम् ॥ २८ ॥

राजन्! दूसरी ओर उस महायुद्धमें सात्यकिने कृतवर्माको रोककर नाना प्रकारके बाणोंकी वर्षा करते हुए पितामह भीष्मपर धावा किया ॥ २८ ॥

स विद्ध्वा भारतं षष्ट्य निशितैर्लोमवाहिभिः ।

नृत्यन्निव रथोपस्थे विधुन्वानो महद् धनुः ॥ २ ९ ॥

उन्होंने अपने विशाल धनुषकी टंकार फैलाते तथा रथकी बैठकमें नृत्य करते हुए- से पंखयुक्त साठ तीखे बाणोंद्वारा भरतवंशी पितामह भीष्मको घायल कर दिया ॥ २ ९ ॥

तस्यायसीं महाशक्तिं चिक्षेपाथ पितामहः ।

हेमचित्रां महावेगां नागकन्योपमां शुभाम् ॥ ३० ॥

पितामहने सात्यकिपर लोहेकी बनी हुई एक विशाल शक्ति चलायी, जो सुवर्णजटित, अत्यन्त वेगशालिनी तथा सर्पिणीके समान आकारवाली एवं सुन्दर थी ॥ ३० ॥

तामापतन्तीं सहसा मृत्युकल्पां सुदुर्जयाम् ।

पृष्ठ 2177

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व्यंसयामास वार्ष्णेयो लाघवेन महायशाः ॥ ३१ ॥

उस अत्यन्त दुर्जय मृत्युस्वरूपा शक्तिको सहसा आती देख महायशस्वी सात्यकिने अपनी फुर्तीके कारण उसको असफल कर दिया ॥ ३१ ॥

अनासाद्य तु वार्ष्णेयं शक्तिः परमदारुणा ।

न्यपतद् धरणीपृष्ठे महोल्केव महाप्रभा ॥ ३२ ॥

वह परम भयंकर शक्ति सात्यकितक न पहुँचकर अत्यन्त तेजस्विनी बड़ी भारी उल्काके समान पृथ्वीपर गिर पड़ी ॥ ३२ ॥

वार्ष्णेयस्तु ततो राजन् स्वां शक्तिं कनकप्रभाम् । वेगवद् गृह्य चिक्षेप पितामहरथं प्रति ॥ ३३ ॥

राजन्! तब सात्यकिने भी अपनी सुनहरी प्रभावाली शक्ति लेकर उसे भीष्मके रथपर बड़े वेगसे चलाया ॥ ३३ ॥

वार्ष्णेय भुजवेगेन प्रणुन्ना सा महाहवे ।

अभिदुद्राव वेगेन कालरात्रिर्यथा नरम् ॥ ३४ ॥

उस महासमरमें सात्यकिकी भुजाओंके वेगसे चलायी हुई वह शक्ति अत्यन्त वेगपूर्वक भीष्मकी ओर चली, मानो कालरात्रि मनुष्यकी ओर जा रही हो ॥ ३४ ॥

तामापतन्तीं सहसा द्विधा चिच्छेद भारतः ।

क्षुरप्राभ्यां सुतीक्ष्णाभ्यां सा व्यशीर्यत मेदिनीम् ॥ ३५ ॥

परंतु भरतवंशी भीष्मने अपने अत्यन्त तीखे दो क्षुरप्रोंसे उस सहसा आती हुई शक्तिको दो जगहसे काट दिया । वह छिन्न-भिन्न होकर पृथ्वीपर गिर पड़ी ॥ ३५ ॥

छित्त्वा शक्तिं तु गाङ्गेयः सात्यकिं नवभिः शरैः ।

आजघानोरसि क्रुद्धः प्रहसञ्छत्रुकर्शनः ॥ ३६ ॥

शक्तिको काटकर हँसते हुए शत्रुसूदन गंगानन्दन भीष्मने कुपित हो सात्यकिकी छातीमें नौ बाण मारे ॥ ३६ ॥

ततः सरथनागाश्वाः पाण्डवाः पाण्डुपूर्वज ।

परिवव्रू रणे भीष्मं माधवत्राणकारणात् ॥ ३७ ॥

पाण्डुके बड़े भाई महाराज धृतराष्ट्र! उस समय मधुवंशी सात्यकिको बचानेके लिये पाण्डवोंने रथ, घोड़े और हाथियोंकी सेनाके साथ आकर युद्धभूमिमें भीष्मको चारों ओरसे घेर लिया ॥ ३७ ||

ततः प्रववृते युद्धं तुमुलं लोमहर्षणम् ।

पाण्डवानां कुरूणां च समरे विजयैषिणाम् ॥ ३८ ॥

पृष्ठ 2178

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तत्पश्चात् युद्धमें विजयकी अभिलाषा रखनेवाले कौरवों तथा पाण्डवोंमें परस्पर घोर युद्ध हुआ, जो रोंगटे खड़े कर देनेवाला था ॥ ३८ ॥

इति श्रीमहाभारते भीष्मपर्वणि भीष्मवधपर्वणि वार्ष्णेययुद्धे चतुरधिकशततमोऽध्यायः ॥ १०४ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत भीष्मपर्वके अन्तर्गत भीष्मवधपर्वमें सात्यकिका युद्धविषयक एक सौचारवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १०४ ॥

पृष्ठ 2179

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पञ्चाधिकशततमोऽध्यायः दुर्योधनका दुःशासनको भीष्मकी रक्षाके लिये आदेश, युधिष्ठिर और नकुल - सहदेवके द्वारा शकुनिकी घुड़सवार- सेनाकी पराजय तथा शल्यके साथ उन सबका युद्ध संजय उवाच

दृष्ट्वा भीष्मं रणे क्रुद्धं पाण्डवैरभिसंवृतम् ।

यथा मेघैर्महाराज तपान्ते दिवि भास्करम् ॥ १ ॥

दुर्योधनो महाराज दुःशासनमभाषत । संजय कहते हैं- महाराज! ग्रीष्म ऋतुके अन्तमें ( वर्षारम्भ होनेपर) जैसे मेघ आकाशमें सूर्यदेवको ढक लेते हैं, उसी प्रकार पाण्डवोंने युद्धभूमिमें क्रुद्ध हुए भीष्मको सब ओरसे घेर लिया है । यह देखकर आपके पुत्र दुर्योधनने दुःशासनसे कहा— ॥ १३ ॥

एष शूरो महेष्वासो भीष्मः शूरनिषूदनः ॥ २ ॥

छादितः पापडवैः शूरैः समन्ताद् भरतर्षभ । ‘ भरतश्रेष्ठ! ये शूरवीरोंका नाश करनेवाले महाधनुर्धर शौर्यसम्पन्न भीष्म पराक्रमी पाण्डवोंद्वारा चारों ओरसे घेर लिये गये हैं ॥ २३ ॥

तस्य कार्यं त्वया वीर रक्षणं सुमहात्मनः ॥ ३ ॥

रक्ष्यमाणो हि समरे भीष्मोऽस्माकं पितामहः ।

निहन्यात् समरे यत्तान् पञ्चालान् पाण्डवैः सह ॥ ४ ॥

' वीर! तुम्हें उन महात्मा भीष्मकी रक्षा करनी चाहिये । युद्धमें सुरक्षित रहनेपर हमारे पितामह भीष्म समरांगणमें विजयके लिये प्रयत्न करनेवाले पाण्डवोंसहित पांचालोंका संहार कर डालेंगे ॥ ३-४ ॥

तत्र कार्यतमं मन्ये भीष्मस्यैवाभिरक्षणम् ।

गोप्ता ह्येष महेष्वासो भीष्मोऽस्माकं महाव्रतः ॥ ५ ॥

‘ अतः इस अवसरपर मैं भीष्मजीकी रक्षाको ही प्रधान कार्य समझता हूँ; क्योंकि ये महाव्रती महाधनुर्धर भीष्म हमलोगोंके रक्षक हैं ॥ ५ ॥

स भवान् सर्वसैन्येन परिवार्य पितामहम् ।

समरे कर्म कुर्वाणं दुष्करं परिरक्षतु ॥ ६ ॥

' अतः तुम सम्पूर्ण सेनाके साथ समरभूमिमें दुष्कर कर्म करनेवाले पितामह भीष्मको चारों ओरसे घेरकर उनकी रक्षा करो ' ॥ ६ ॥

स एवमुक्तः समरे पुत्रो दुःशासनस्तव ।

पृष्ठ 2180

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परिवार्य स्थितो भीष्मं सैन्येन महता वृतः ॥ ७ ॥

( पालयामास महता यत्नेन च सुसंयतः । ) दुर्योधनके ऐसा कहनेपर आपका पुत्र दुःशासन समरभूमिमें अपनी विशाल सेनाके साथ जा भीष्मको सब ओरसे घेरकर खड़ा हो गया और बड़े यत्नसे सावधान रहकर उनकी रक्षा करने लगा ॥ ७ ||

ततः शतसहस्राणां हयानां सुबलात्मजः ।

विमलप्रासहस्तानामृष्टितोमरधारिणाम् ॥ ८ ॥

दर्पितानां सुवेशानां बलस्थानां पताकिनाम् ।

शिक्षितैर्युद्धकुशलैरुपेतानां नरोत्तमैः ॥ ९ ॥

तदनन्तर सुबलपुत्र शकुनि एक लाख घुड़सवारोंकी सेनाके साथ युद्धके लिये आ पहुँचा । वे सभी सैनिक अपने हाथोंमें चमकते हुए प्रास, ऋष्टि और तोमर लिये हुए थे । सबको अपने शौर्यका अभिमान था । सभी बलवान्, सुन्दर वेशभूषासे सुसज्जित और ध्वजा- पताकासे सुशोभित थे । अस्त्र- विद्याकी शिक्षा पाये हुए युद्धकुशल श्रेष्ठ पैदल सिपाहियोंकी भी बहुत बड़ी संख्या उन घुड़सवारोंके साथ थी ॥ ८ - ९ ॥ (एवं बहुसहस्रैश्च योधानां युद्धशालिनाम् । संवृतः शकुनिस्तस्थौ युद्धायैव सुदंशितः ॥ ) इस प्रकार युद्धभूमिमें शोभा पानेवाले कई हजार योद्धाओंसे घिरा हुआ शकुनि कवच धारण करके युद्धके लिये ही वहाँ खड़ा हो गया ।

नकुलं सहदेवं च धर्मराजं च पाण्डवम् ।

न्यवारयन्नरश्रेष्ठान् परिवार्य समन्ततः ॥ १० ॥

राजन्! शकुनि नकुल, सहदेव तथा धर्मराज युधिष्ठिर- इन तीनों श्रेष्ठ पुरुषोंको सब ओरसे घेरकर इन्हें आगे बढ़नेसे रोकने लगा ॥ १० ॥

ततो दुर्योधनो राजा शूराणां हयसादिनाम् ।

अयुतं प्रेषयामास पाण्डवानां निवारणे ॥ ११ ॥

तदनन्तर राजा दुर्योधनने पाण्डवोंकी प्रगतिको रोकने के लिये दस हजार घुड़सवार सैनिक और भेजे ॥ ११ ॥

तैः प्रविष्टैर्महावेगैर्गरुत्मद्भिरिवाहवे । ( शुशुभे स महातेजाः शकुनिः सुबलात्मजः । तैरश्वैः सुमहावेगैर्मरुद्भिरिव वासवः ॥ ) गरुड़के समान अत्यन्त वेगशाली वे अश्व रणभूमिमें यथास्थान पहुँच गये । जैसे मरुद्गणोंसे महातेजस्वी इन्द्रकी शोभा होती है, उसी प्रकार उन अत्यन्त वेगशाली अश्वोंके द्वारा अत्यन्त तेजस्वी सुबलपुत्र शकुनि सुशोभित होने लगा ॥ ११३ ॥

खुराहता धरा राजंश्चकम्पे च ननाद च ॥ १२ ॥