03.Mahabharata Volume 3 — पृष्ठ 2291–2300
महाभारत — खण्ड ३ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 2291–2300
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रथोंपर बैठकर पाण्डवोंपर चढ़ आये और रणक्षेत्रमें उनकी सेनाको कँपाने लगे ॥ ५-६ ॥
सा वध्यमाना समरे पाण्डुसेना महात्मभिः ।
भ्राम्यते बहुधा राजन् मारुतेनेव नौर्जले ॥ ७ ॥
राजन्! जैसे वायुके थपेड़े खाकर नौका जलमें चक्कर काटने लगती है, उसी प्रकार उन महामनस्वी वीरोंद्वारा समरांगणमें मारी जाती हुई पाण्डवसेना बहुधा इधर - उधर भटक रही थी ॥ ७ ॥
यथा हि शैशिरः कालो गवां मर्माणि कृन्तति ।
तथा पाण्डुसुतानां वै भीष्मो मर्माणि कृन्तति ॥ ८ ॥
जैसे शिशिरकाल गौओंके मर्मस्थानोंका उच्छेद करने लगता है, उसी प्रकार भीष्म पाण्डवोंके मर्मस्थानोंको विदीर्ण करने लगे ॥ ८ ॥
तथैव तव सैन्यस्य पार्थेन च महात्मना ।
नवमेघप्रतीकाशाः पातिता बहुधा गजाः ॥ ९ ॥
इसी प्रकार महात्मा अर्जुनने आपकी सेनाके नूतन मेघके समान काले रंगवाले बहुत-त- से हाथी मार गिराये ॥ ९ ॥
मृद्यमानाश्च दृश्यन्ते पार्थेन नरयूथपाः ।
इषुभिस्ताड्यमानाश्च नाराचैश्च सहस्रशः ॥ १० ॥
पेतुरार्तस्वरं घोरं कृत्वा तत्र महागजाः । अर्जुनके द्वारा बहुत - से पैदलोंके यूथपति मिट्टीमें मिलते दिखायी दे रहे थे । नाराचों और बाणोंसे पीड़ित हुए सहस्रों महान् गज घोर आर्तनाद करके पृथ्वीपर गिर रहे थे ॥ १०३ ॥
आनद्धाभरणैः कायैर्निहतानां महात्मनाम् ॥ ११ ॥
छन्नमायोधनं रेजे शिरोभिश्च सकुण्डलैः । मारे गये महामनस्वी वीरोंके आभरणभूषित शरीरों और कुण्डलमण्डित मस्तकोंसे आच्छादित हुई वह रणभूमि बड़ी शोभा पा रही थी ॥ ११३ ॥
तस्मिन्नेव महाराज महावीरवरक्षये ॥ १२ ॥
भीष्मे च युधि विक्रान्ते पाण्डवे च धनंजये ।
ते पराक्रान्तमालोक्य राजन् युधि पितामहम् ॥ १३ ॥
अभ्यवर्तन्त ते पुत्राः सर्वे सैन्यपुरस्कृताः ।
इच्छन्तो निधनं युद्धे स्वर्गं कृत्वा परायणम् ॥ १४ ॥
पाण्डवानभ्यवर्तन्त तस्मिन् वीरवरक्षये । महाराज! बड़े -बड़े वीरोंका विनाश करनेवाले उस महायुद्धमें जब एक ओर भीष्म और दूसरी ओर पाण्डुनन्दन धनंजय पराक्रम प्रकट कर रहे थे, उस समय पितामह भीष्मको पराक्रममें प्रवृत्त देख आपके सभी पुत्र सेनाओंके साथ स्वर्गको अपना परम लक्ष्यमहान् बनाकर युद्धमें मृत्यु चाहते हुए पाण्डवोंपर चढ़ आये ॥ १२–१४३ ॥
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पाण्डवाऽपि महाराज स्मरन्तो विविधान् बहून् ॥ १५ ॥
क्लेशान् कृतान् सपुत्रेण त्वया पूर्वं नराधिप ।
भयं त्यक्त्वा रणे शूरा ब्रह्मलोकाय तत्पराः ॥ १६ ॥
तावकांस्तव पुत्रांश्च योधयन्ति प्रहृष्टवत् । राजन्! नरेश्वर! शूरवीर पाण्डव भी पुत्रोंसहित आपके दिये हुए नाना प्रकारके अनेक क्लेशोंका स्मरण करके युद्धमें भय छोड़कर ब्रह्मलोक जानेके लिये उत्सुक हो बड़ी प्रसन्नताके साथ आपके सैनिकों और पुत्रोंके साथ युद्ध करने लगे ॥ १५-१६३ ॥ सेनापतिस्तु समरे प्राह सेनां महारथः ॥ १७ ॥
अभिद्रवत गाङ्गेयं सोमकाः सृञ्जयैः सह । उस समय समरभूमिमें पाण्डव सेनापति महारथी धृष्टद्युम्नने अपनी सेनासे कहा — ' सोमको! तुम सृजय वीरोंको साथ लेकर गंगानन्दन भीष्मपर टूट पड़ो ' ॥ सेनापतिवचः श्रुत्वा सोमकाः सृञ्जयाश्च ते ॥ १८ ॥
अभ्यद्रवन्त गाङ्गेयं शरवृष्ट्या समाहताः । सेनापतिकी यह बात सुनकर सोमक और संजय वीर बाणोंकी भारी वर्षासे घायल होनेपर भी गंगानन्दन भीष्मकी ओर दौड़े ॥ १८३ ॥
वध्यमानस्ततो राजन् पिता शान्तनवस्तव ॥ १ ९ ॥ अमर्षवशमापन्नो योधयामास सृञ्जयान् । राजन्! तब आपके पितृतुल्य शान्तनुनन्दन भीष्म बाणोंकी मार खाकर अमर्षमें भर गये और सृजयोंके साथ युद्ध करने लगे ॥ १ ९ ३ ॥ तस्य कीर्तिमतस्तात पुरा रामेण धीमता ॥ २० ॥
सम्प्रदत्तास्त्रशिक्षा वै परानीकविनाशनी ।
सतां शिक्षामधिष्ठाय कुर्वन् परबलक्षयम् ॥ २१ ॥
अहन्यहनि पार्थानां वृद्धः कुरुपितामहः ।
भीष्मो दश सहस्राणि जघान परवीरहा ॥ २२ ॥
तात! पूर्वकालमें परम बुद्धिमान् परशुरामजीने उन यशस्वी भीष्मको शत्रु- सेनाका विनाश करनेवाली जो अस्त्रशिक्षा प्रदान की थी, उसका आश्रय लेकर पाण्डवपक्षीय शत्रु-सेनाका संहार करते हुए कुरुकुलके वृद्ध पितामह एवं शत्रुवीरोंका नाश करनेवाले भीष्म नित्यप्रति दस हजार मुख्य योद्धाओंका वध करते आ रहे थे ॥ २०–२२ ॥
तस्मिंस्तु दशमे प्राप्ते दिवसे भरतर्षभ ।
भीष्मेणैकेन मत्स्येषु पञ्चालेषु च संयुगे ॥ २३ ॥
गजाश्वममितं हत्वा हताः सप्त महारथाः ।
हत्वा पञ्च सहस्राणि रथानां प्रपितामहः ॥ २४ ॥
नराणां च महायुद्धे सहस्राणि चतुर्दश ।
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दन्तिनां च सहस्राणि हयानामयुतं पुनः ॥ २५ ॥
शिक्षाबलेन निहतं पित्रा तव विशाम्पते । भरतश्रेष्ठ! उस दसवें दिनके आनेपर एकमात्र भीष्मने युद्धमें मत्स्य और पांचालदेशकी सेनाओंके अगणित हाथी, घोड़ोंको मारकर सात महारथियोंका वध कर डाला । प्रजानाथ! फिर पाँच हजार रथियोंका वध करके आपके पितृतुल्य भीष्मने अपने अस्त्र- शिक्षाबलसे उस महायुद्धमें चौदह हजार पैदल सिपाहियों, एक हजार हाथियों और दस हजार घोड़ोंका संहार कर डाला ॥ २३–२५३ ॥ ततः सर्वमहीपानां क्षपयित्वा वरूथिनीम् ॥ २६ ॥
विराटस्य प्रियो भ्राता शतानीको निपातितः ।
शतानीकं च समरे हत्वा भीष्मः प्रतापवान् ॥ २७ ॥
सहस्राणि महाराज राज्ञां भल्लैरपातयत् । तदनन्तर समस्त भूमिपालोंकी सेनाका उच्छेद करके राजा विराटके प्रिय भाई शतानीकको मार गिराया । महाराज! शतानीकको रणक्षेत्रमें मारकर प्रतापी भीष्मने भल्ल नामक बाणोंद्वारा एक हजार नरेशोंको धराशायी कर दिया ॥ २६-२७३ ॥ उद्विग्नाः समरे योधा विक्रोशन्ति धनंजयम् ॥ २८ ॥
ये च केचन पार्थानामभियाता धनंजयम् ।
राजानो भीष्ममासाद्य गतास्ते यमसादनम् ॥ २ ९ ॥
उस रणक्षेत्रमें समस्त योद्धा भीष्मके भयसे उद्विग्न हो अर्जुनको पुकारने लगे । पाण्डवपक्षके जो कोई नरेश अर्जुनके साथ गये थे, वे भीष्मके सामने पहुँचते ही यमलोकके पथिक हो गये ॥ २८-२९ ॥
एवं दश दिशो भीष्मः शरजालैः समन्ततः ।
अतीत्य सेनां पार्थानामवतस्थे चमूमुखे ॥ ३० ॥
इस प्रकार भीष्मने दसों दिशाओंमें सब ओर अपने बाणोंका जाल -सा बिछा दिया और कुन्तीकुमारोंकी सेनाको परास्त करके वे सेनाके प्रमुख भागमें स्थित हो गये ॥ ३० ॥
स कृत्वा सुमहत् कर्म तस्मिन् वै दशमेऽहनि ।
सेनयोरन्तरे तिष्ठन् प्रगृहीतशरासनः ॥ ३१ ॥
दसवें दिन यह महान् पराक्रम करके हाथमें धनुष लिये वे दोनों सेनाओंके बीचमें खड़े हो गये ॥ ३१ ॥
न चैनं पार्थिवाः केचिच्छक्ता राजन् निरीक्षितुम् ।
मध्यं प्राप्तं यथा ग्रीष्मे तपन्तं भास्करं दिवि ॥ ३२ ॥
राजन्! जैसे ग्रीष्म - ऋतुमें आकाशके मध्यभागमें पहुँचे हुए दोपहरके तपते हुए सूर्यकी ओर देखना कठिन होता है, उसी प्रकार उस समय कोई राजा भीष्मकी ओर आँख उठाकर देखनेका भी साहस न कर सके ॥ ३२ ॥
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यथा दैत्यचमूं शक्रस्तापयामास संयुगे ।
तथा भीष्मः पाण्डवेयांस्तापयामास भारत ॥ ३३ ॥
भारत! जैसे पूर्वकालमें देवराज इन्द्रने संग्रामभूमिमें दैत्योंकी सेनाको संतप्त किया था, उसी प्रकार भीष्मजी पाण्डवयोद्धाओंको संताप दे रहे थे ॥ ३३ ॥
तथा चैनं पराक्रान्तमालोक्य मधुसूदनः ।
उवाच देवकीपुत्रः प्रीयमाणो धनंजयम् ॥ ३४ ॥
उन्हें इस प्रकार पराक्रम करते देख मधु दैत्यको मारनेवाले देवकीनन्दन भगवान् श्रीकृष्णने अर्जुनसे प्रसन्नतापूर्वक कहा— ॥ ३४ ॥
एष शान्तनवो भीष्मः सेनयोरन्तरे स्थितः ।
संनिहत्य बलादेनं विजयस्ते भविष्यति ॥ ३५ ॥
‘ अर्जुन! ये शान्तनुनन्दन भीष्म दोनों सेनाओंके बीचमें खड़े हैं । यदि तुम बलपूर्वक इन्हें मार सको तो तुम्हारी विजय हो जायगी ॥ ३५ ॥
बलात् संस्तम्भयस्वैनं यत्रैषा भिद्यते चमूः ।
न हि भीष्मशरानन्यः सोढुमुत्सहते विभो ॥ ३६ ॥
‘ जहाँ ये इस सेनाका संहार कर रहे हैं, वहीं पहुँचकर इन्हें बलपूर्वक स्तम्भित कर दो ( जिससे ये आगे या पीछे किसी ओर हट न सकें ) । विभो! तुम्हारे सिवा दूसरा कोई ऐसा नहीं है, जो भीष्मके बाणोंकी चोट सह सके ' ॥ ३६ ॥
ततस्तस्मिन् क्षणे राजंश्चोदितो वानरध्वजः ।
सध्वजं सरथं साश्वं भीष्ममन्तर्दधे शरैः ॥ ३७ ॥
राजन्! इस प्रकार भगवान्से प्रेरित होकर कपिध्वज अर्जुनने उसी क्षण अपने बाणोंद्वारा ध्वज, रथ और घोड़ोंसहित भीष्मको आच्छादित कर दिया ॥ ३७ ॥
स चापि कुरुमुख्यानामृषभः पाण्डवेरितान् ।
शरव्रातैः: शरव्रातान् बहुधा विदुधाव तान् ॥ ३८ ॥
कुरुश्रेष्ठ वीरोंमें प्रधान भीष्मने भी अपने बाणसमूहोंद्वारा अर्जुनके चलाये हुए बाणसमुदायके टुकड़े - टुकड़े कर दिये ॥ ३८ ॥
( तथा पुनर्जघानाशु पाण्डवानां महारथान् । शरैरशनिकल्पैश्च शिताग्रैश्च सुपर्वभिः ॥ ) तत्पश्चात् उत्तम गाँठ और तीखी धारवाले वज्रतुल्य बाणोंद्वारा वे पुनः पाण्डव महारथियों का शीघ्रतापूर्वक वध करने लगे ।
ततः पञ्चालराजश्च धृष्टकेतुश्च वीर्यवान् ।
पाण्डवो भीमसेनश्च धृष्टद्युम्नश्च पार्षतः ॥ ३ ९ ॥
यमौ च चेकितानश्च केकयाः पञ्च चैव ह ।
सात्यकिश्च महाबाहुः सौभद्रोऽथ घटोत्कचः ॥ ४० ॥
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द्रौपदेयाः शिखण्डी च कुन्तिभोजश्च वीर्यवान् ।
सुशर्मा च विराटश्च पाण्डवेया महाबलाः ॥ ४१ ॥
एते चान्ये च बहवः पीडिता भीष्मसायकैः ।
समुद्धृताः फाल्गुनेन निमग्नाः शोकसागरे ॥ ४२ ॥
इसी समय पांचालराज द्रुपद, पराक्रमी धृष्टकेतु, पाण्डुनन्दन भीमसेन, द्रुपदकुमार धृष्टद्युम्न, नकुल सहदेव, चेकितान, पाँच केकयराजकुमार, महाबाहु सात्यकि, सुभद्राकुमार अभिमन्यु, घटोत्कच, द्रौपदीके पाँचों पुत्र, शिखण्डी, पराक्रमी कुन्तिभोज, सुशर्मा तथा विराट — ये और दूसरे भी बहुत- से महाबली पाण्डव- सैनिक भीष्मके बाणोंसे पीड़ित हो शोकके समुद्रमें डूब रहे थे; परंतु अर्जुनने उन सबका उद्धार कर दिया ॥ ३ ९ –४२ ॥
ततः शिखण्डी वेगेन प्रगृह्य परमायुधम् ।
भीष्ममेवाभिदुद्राव रक्ष्यमाणः किरीटिना ॥ ४३ ॥
तब शिखण्डी अपने उत्तम अस्त्र - शस्त्रोंको लेकर बड़े वेगसे भीष्मकी ही ओर दौड़ा ।
उस समय किरीटधारी अर्जुन उसकी रक्षा कर रहे थे ॥ ४३ ॥
ततोऽस्यानुचरान् हत्वा सर्वान् रणविभागवित् ।
भीष्ममेवाभिदुद्राव बीभत्सुरपराजितः ॥ ४४ ॥
तत्पश्चात् युद्धविभागके अच्छे ज्ञाता और किसीसे भी परास्त न होनेवाले अर्जुनने भीष्मके पीछे चलनेवाले समस्त योद्धाओंको मारकर स्वयं भी भीष्मपर ही धावा किया ॥ ४४ ॥
सात्यकिश्चेकितानश्च धृष्टद्युम्नश्च पार्षतः ।
विराटो द्रुपदश्चैव माद्रीपुत्रौ च पाण्डवौ ॥ ४५ ॥
दुद्रुवुर्भीष्ममेवाजौ रक्षिता दृढधन्वना । इनके साथ सात्यकि, चेकितान, द्रुपदकुमार धृष्टद्युम्न, विराट, द्रुपद, माद्रीकुमार पाण्डुपुत्र नकुल - सहदेवने भी युद्धमें भीष्मपर ही आक्रमण किया । ये सब - के - सब सुदृढ़ धनुष धारण करनेवाले अर्जुनसे सुरक्षित थे ॥ अभिमन्युश्च समरे द्रौपद्याः पञ्च चात्मजाः ॥ ४६ ॥
दुद्रुवुः समरे भीष्मं समुद्यतमहायुधाः । द्रौपदीके पाँचों पुत्र और अभिमन्यु भी महान् अस्त्र- शस्त्र लिये उस समरांगणमें भीष्मकी ही ओर दौड़े ॥ ते सर्वे दृढधन्वानः संयुगेष्वपलायिनः ॥ ४७ ॥
बहुधा भीष्ममानछ्रेर्मार्गणैः क्षतमार्गणैः । ये सभी वीर सुदृढ़ धनुष धारण करनेवाले और युद्धसे कभी पीछे न हटनेवाले थे । इन्होंने शत्रुओंके बाणोंको नष्ट करनेवाले सायकोंद्वारा भीष्मको बारंबार पीड़ित किया ॥ ४७ ॥
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विधूय तान् बाणगणान् ये मुक्ताः पार्थिवोत्तमैः ॥ ४८ ॥
पाण्डवानामदीनात्मा व्यगाहत वरूथिनीम् । परंतु उदारचेता भीष्म उन श्रेष्ठ राजाओंके छोड़े हुए समस्त बाणसमूहोंका नाश करके पाण्डवोंकी विशाल सेनामें घुस गये ॥ ४८ ॥
चक्रे शरविघातं च क्रीडन्निव पितामहः ॥ ४ ९ ॥
नाभिसंधत्त पाञ्चाल्ये स्मयमानो मुहुर्मुहुः ।
स्त्रीत्वं तस्यानुसंस्कृत्य भीष्मो बाणात् शिखण्डिने ॥ ५० ॥
वहाँ पितामह भीष्म खेल- सा करते हुए अपने बाणोंद्वारा पाण्डवसैनिकोंके अस्त्र-शस्त्रोंका विनाश करने लगे । परंतु शिखण्डीके स्त्रीत्वका स्मरण करके वे बारंबार मुसकराकर रह जाते थे; उसपर बाण नहीं चलाते थे ॥ ४ ९ -५० ॥
जघान द्रुपदानीके रथान् सप्त महारथः ।
ततः किलकिलाशब्दः क्षणेन समभूत् तदा ॥ ५१ ॥
मत्स्यपाञ्चालचेदीनां तमेकमभिधावताम् । महारथी भीष्मने द्रुपदकी सेनाके सात रथियोंको मार डाला । तब एकमात्र भीष्मपर धावा करनेवाले मत्स्य, पांचाल और चेदिदेशके योद्धाओंका महान् कोलाहल क्षणभरमें वहाँ गूँज उठा ॥ ५१ ॥
ते नराश्वरथव्रातैर्मार्गणैश्च परंतप ॥ ५२ ॥
तमेकं छादयामासुर्मेघा इव दिवाकरम् ।
भीष्मं भागीरथीपुत्रं प्रतपन्तं रणे रिपून् ॥ ५३ ॥
परंतप! जैसे बादल सूर्यको ढक लेते हैं, उसी प्रकार उन वीरोंने पैदल, घुड़सवार तथा रथियोंके समुदायसे एवं बहुसंख्यक बाणोंद्वारा भीष्मको आच्छादित कर दिया । उस समय गंगानन्दन भीष्म अकेले युद्धके मैदानमें शत्रुओंको अत्यन्त संतप्त कर रहे थे ॥ ५२-५३ ॥
ततस्तस्य च तेषां च युद्धे देवासुरोपमे ।
किरीटी भीष्ममागच्छत् पुरस्कृत्य शिखण्डिनम् ॥ ५४ ॥
तदनन्तर भीष्म तथा उन योद्धाओंमें देवासुर संग्रामके समान भयंकर युद्ध होने लगा ।
इसी बीचमें किरीटधारी अर्जुन शिखण्डीको आगे करके भीष्मके समीप जा पहुँचे ॥ ५४ ॥
इति श्रीमहाभारते भीष्मपर्वणि भीष्मवधपर्वणि भीष्मपराक्रमे अष्टादशाधिकशततमोऽध्यायः ॥ ११८ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत भीष्मपर्वके अन्तर्गत भीष्मवधपर्वमें भीष्मपराक्रमविषयक एक सौ अठारहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ११८ ॥
[दाक्षिणात्य अधिक पाठका १ श्लोक मिलाकर कुल ५५ श्लोक हैं । ]
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एकोनविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः कौरवपक्षके प्रमुख महारथियोंद्वारा सुरक्षित होनेपर भी अर्जुनका भीष्मको रथसे गिराना, शरशय्यापर स्थित भीष्मके समीप हंसरूपधारी ऋषियोंका आगमन एवं उनके कथनसे भीष्मका उत्तरायणकी प्रतीक्षा करते हुए प्राण धारण करना संजय उवाच
एवं ते पाण्डवाः सर्वे पुरस्कृत्य शिखण्डिनम् ।
विव्यधुः समरे भीष्मं परिवार्य समन्ततः ॥ १ ॥
संजय कहते हैं — राजन्! इस प्रकार शिखण्डीको आगे करके सभी पाण्डवोंने समरभूमिमें भीष्मको सब ओरसे घेरकर बींधना आरम्भ किया ॥ १ ॥
शतघ्नीभिः सुघोराभिः परिघैश्च परश्वधैः ।
मुद्गरैर्मुसलैः प्रासैः क्षेपणीयैश्च सर्वशः ॥ २ ॥
शरैः कनकपुङ्खैश्च शक्तितोमरकम्पनैः ।
नाराचैर्वत्सदन्तैश्च भुशुण्डीभिश्च सर्वशः ॥ ३ ॥
अताडयन् रणे भीष्मं सहिताः सर्वसृञ्जयाः । समस्त सृ॑जय वीर एक साथ संगठित हो भयंकर शतघ्नी, परिघ, फरसे, मुद्गर, मुसल, प्रास, गोफन, स्वर्णमय पंखवाले बाण, शक्ति, तोमर, कम्पन, नाराच, वत्सदन्त और भुशुण्डी आदि अस्त्र- शस्त्रोंद्वारा रणभूमिमें भीष्मको सब ओरसे पीड़ा देने लगे ॥ २-३३ ॥ स विशीर्णतनुत्राणः पीडितो बहुभिस्तदा ॥ ४ ॥
न विव्यथे तदा भीष्मो भिद्यमानेषु मर्मसु । उस समय बहुसंख्यक योद्धाओंके द्वारा अनेक प्रकारके अस्त्रोंसे पीड़ित होनेके कारण भीष्मका कवच छिन्न-भिन्न हो गया । उनके मर्मस्थान विदीर्ण होने लगे, तो भी उनके मनमें व्यथा नहीं हुई ॥ ४३ ॥
संदीप्तशरचापाग्निरस्त्रप्रसृतमारुतः ॥ ५ ॥
नेमिनिर्ह्रादसंतापो महास्त्रोदयपावकः ।
चित्रचापमहाज्वालो वीरक्षयमहेन्धनः ॥ ६ ॥
युगान्ताग्निसमप्रख्यः परेषां समपद्यत । वे शत्रुओंके लिये प्रलयकालकी अग्निके समान अद्भुत तेजसे प्रज्वलित हो उठे । धनुष और बाण ही धधकती हुई आग थे । अस्त्रोंका प्रसार ही वायुका सहारा था । रथोंके
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पहियोंकी घरघराहट उस आगकी आँच थी । बड़े -बड़े अस्त्रोंका प्राकट्य अंगारके समान था । विचित्र चाप ही उस आगकी प्रचण्ड ज्वालाओंके समान था । बड़े - बड़े वीर ही ईंधनके समान उसमें गिरकर भस्म हो रहे थे ॥ विवृत्य रथसङ्घानामन्तरेण विनिःसृतः ॥ ७ ॥
दृश्यते स्म नरेन्द्राणां पुनर्मध्यगतश्चरन् । पितामह भीष्म एक ही क्षणमें रथकी पंक्ति तोड़कर घेरेसे बाहर निकल आते और पुनः राजाओंकी सेनाके मध्यभागमें प्रवेश करके वहाँ विचरते दिखायी देते थे ॥ ततः पञ्चालराजं च धृष्टकेतुमचिन्त्य च ॥ ८ ॥
पाण्डवानीकिनीमध्यमाससाद विशाम्पते । प्रजानाथ! तत्पश्चात् पांचालराज द्रुपद तथा धृष्टकेतुकी कुछ भी परवा न करके वे पाण्डव- सेनाके भीतर घुस आये ॥ ८३ ॥
ततः सात्यकिभीमौ च पाण्डवं च धनंजयम् ॥ ९ ॥
द्रुपदं च विराटं च धृष्टद्युम्नं च पार्षतम् ।
भीमघोषैर्महावेगैर्मर्मावरणभेदिभिः ॥ १० ॥
षडेतान् निशितैर्भीष्मः प्रविव्याधोत्तमैः शरैः । फिर भयंकर शब्द करनेवाले, महान् वेगशाली, मर्मस्थानों और कवचोंको भी विदीर्ण कर देनेवाले, तीखे एवं उत्तम बाणोंद्वारा उन्होंने सात्यकि, भीमसेन, पाण्डुपुत्र अर्जुन, विराट, द्रुपद तथा उनके पुत्र धृष्टद्युम्न-इन छः महाराथियोंको अत्यन्त घायल कर दिया ॥ ९ -१० ॥ तस्य ते निशितान् बाणान् संनिवार्य महारथाः ॥ ११ ॥
दशभिर्दशभिर्भीष्ममर्दयामासुरोजसा । तब उन महारथी वीरोंने भीष्मके उन तीखे बाणोंका निवारण करके पुनः दस-दस बाणोंद्वारा भीष्मको बलपूर्वक पीड़ित किया ॥ ११३ ॥
शिखण्डी तु महाबाणान् यान् मुमोच महारथः ॥ १२ ॥
न चक्रुस्ते रुजं तस्य स्वर्णपङ्खाः शिलाशिताः । महारथी शिखण्डीने जिन महान् बाणोंका प्रयोग किया था, वे सब सुवर्णमय पंखसे युक्त और शिलापर रगड़कर तेज किये गये थे, तो भी भीष्मजीके शरीरमें घाव या पीड़ा नहीं उत्पन्न कर सके ॥ १२ ॥
ततः किरीटी संरब्धो भीष्ममेवाभ्यधावत ॥ १३ ॥
शिखण्डिनं पुरस्कृत्य धनुश्चास्य समाच्छिनत् । तब किरीटधारी अर्जुनने कुपित हो शिखण्डीको आगे किये हुए ही भीष्मपर धावा किया और उनके धनुषको काट डाला ॥ १३३ ॥
भीष्मस्य धनुषश्छेदं नामृष्यन्त महारथाः ॥ १४ ॥
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द्रोणश्च कृतवर्मा च सैन्धवश्च जयद्रथः ।
भूरिश्रवाः शलः शल्यो भगदत्तस्तथैव च ॥ १५ ॥
सप्तैते परमक्रुद्धाः किरीटिनमभिद्रुताः ।
तत्र शस्त्राणि दिव्यानि दर्शयन्तो महारथाः ॥ १६ ॥
अभिपेतुर्भृशं क्रुद्धाश्छादयन्तश्च पाण्डवम् । भीष्मके धनुषका काटा जाना कौरव महारथियोंको सहन नहीं हुआ । द्रोण, कृतवर्मा, सिन्धुराज जयद्रथ, भूरिश्रवा, शल, शल्य और भगदत्त- ये सात महारथी अत्यन्त क्रुद्ध हो किरीटधारी अर्जुनकी ओर दौड़े तथा अपने दिव्य अस्त्र- शस्त्रोंका प्रदर्शन करते हुए पाण्डुनन्दन अर्जुनको अत्यन्त क्रोधपूर्वक बाणोंसे आच्छादित करने लगे ॥ १४–१६३ ॥ तेषामापततां शब्दः शुश्रुवे फाल्गुनं प्रति ॥ १७ ॥
उद्वृत्तानां यथा शब्दः समुद्राणां युगक्षये । अर्जुनके प्रति आक्रमण करते हुए उन वीरोंका सिंहनाद उसी प्रकार सुनायी पड़ा, जैसे प्रलयकालमें अपनी मर्यादा छोड़कर बढ़नेवाले समुद्रोंकी भीषण गर्जना सुनायी पड़ती है ॥ १७३ ॥
घ्नतानयत गृह्णीत विद्धयध्वमवकर्तत ॥ १८ ॥
इत्यासीत् तुमुलः शब्दः फाल्गुनस्य रथं प्रति । अर्जुनके रथके समीप ‘ मार डालो, ले आओ, पकड़ लो, बींध डालो, टुकड़े -टुकड़े कर दो' इस प्रकार भयंकर शब्द गूँजने लगा ॥ १८३ ॥
तं शब्दं तुमुलं श्रुत्वा पाण्डवानां महारथाः ॥ १ ९ ॥ अभ्यधावन् परीप्सन्तः फाल्गुनं भरतर्षभ । भरतश्रेष्ठ! उस भयानक शब्दको सुनकर पाण्डव महारथी अर्जुनकी रक्षाके लिये दौड़े ॥ १ ९ ३ ॥ सात्यकिर्भीमसेनश्च धृष्टद्युम्नश्च पार्षतः ॥ २० ॥
विराटद्रुपदौ चोभौ राक्षसश्च घटोत्कचः ।
अभिमन्युश्च संक्रुद्धः सप्तैते क्रोधमूर्च्छिताः ॥ २१ ॥
समभ्यधावंस्त्वरिताश्चित्रकार्मुकधारिणः । सात्यकि, भीमसेन, द्रुपदकुमार धृष्टद्युम्न, विराट, द्रुपद, राक्षस घटोत्कच और अभिमन्यु — ये सात वीर क्रोधसे मूर्च्छित हो तुरंत ही विचित्र धनुष धारण किये वहाँ दौड़े आये ॥ २०-२१ ॥ तेषां समभवद् युद्धं तुमुलं लोमहर्षणम् ॥ २२ ॥
संग्रामे भरतश्रेष्ठ देवानां दानवैरिव । भरतभूषण! उनका वह भयंकर युद्ध देवासुरसंग्रामके समान रोंगटे खड़े कर देनेवाला था ॥ २२ ॥
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शिखण्डी तु रणे श्रेष्ठो रक्ष्यमाणः किरीटिना ॥ २३ ॥
अविध्यद् दशभिर्भीष्मं छिन्नधन्वानमाहवे ।
सारथिं दशभिश्चास्य ध्वजं चैकेन चिच्छिदे ॥ २४ ॥
सोऽन्यत् कार्मुकमादाय गाङ्गेयो वेगवत्तरम् । (जघान निशितैर्बाणैरर्जुनं परवीरहा । ) तदप्यस्य शितैर्बाणैस्त्रिभिश्चिच्छेद फाल्गुनः ॥ २५ ॥
भीष्मजीका धनुष कट गया था । उसी अवस्थामें अर्जुनसे सुरक्षित शिखण्डीने दस बाणोंसे उन्हें और दस बाणोंसे उनके सारथिको भी घायल कर दिया । तत्पश्चात् एक बाणसे ध्वजको काट गिराया । तब शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले गंगानन्दन भीष्मने दूसरा अत्यन्त वेगशाली धनुष लेकर तीखे बाणोंसे अर्जुनको घायल करना आरम्भ किया । यह देख अर्जुनने उस धनुषको भी तीन पैने बाणोंद्वारा काट डाला ॥ २३–२५ ॥
एवं स पाण्डवः क्रुद्ध आत्तमात्तं पुनः पुनः ।
धनुश्चिच्छेद भीष्मस्य सव्यसाची परंतपः ॥ २६ ॥
इस प्रकार क्रोधमें भरे हुए शत्रुसंतापी, सव्यसाची पाण्डुनन्दन अर्जुन जो- जो धनुष भीष्म लेते, उसी उसीको काट डालते थे ॥ २६ ॥
स छिन्नधन्वा संक्रुद्धः सृक्किणी परिसंलिहन् ।
शक्तिं जग्राह तरसा गिरीणामणि दारणीम् ॥ २७ ॥
धनुष कट जानेपर क्रोधपूर्वक अपने मुँहके दोनों कोनोंको चाटते हुए भीष्मने बलपूर्वक एक शक्ति हाथमें ली, जो पर्वतोंको भी विदीर्ण करनेवाली थी ॥ २७ ॥
तां च चिक्षेप संक्रुद्धः फाल्गुनस्य रथं प्रति ।
तामापतन्तीं सम्प्रेक्ष्य ज्वलन्तीमशनीमिव ॥ २८ ॥
समादत्त शितान् भल्लान् पञ्च पाण्डवनन्दनः ।
तस्य चिच्छेद तां शक्तिं पञ्चधा पञ्चभिः शरैः ॥ २ ९ ॥
संक्रुद्धो भरतश्रेष्ठ भीष्मबाहुप्रवेरिताम् । भरतश्रेष्ठ! फिर उसे क्रोधपूर्वक उन्होंने अर्जुनके रथकी ओर चला दिया । प्रज्वलित वज्रके समान उस शक्तिको आती देख पाण्डवोंको आनन्दित करनेवाले अर्जुनने अपने हाथमें भल्ल नामक पाँच तीखे बाण लिये और कुपित हो उन पाँच बाणोंद्वारा भीष्मकी भुजाओंसे प्रेषित हुई उस शक्तिके पाँच टुकड़े कर दिये ॥ २८-२९ ३ ॥ सा पपात तथा च्छिन्ना संक्रुद्धेन किरीटिना ॥ ३० ॥
मेघवृन्दपरिभ्रष्टा विच्छिन्नेव शतह्रदा । क्रोधमें भरे हुए अर्जुनद्वारा काटी हुई वह शक्ति मेघोंके समूहसे निर्मुक्त होकर गिरी हुई बिजलीके समान पृथ्वीपर गिर पड़ी ॥ ३०३ ॥
छिन्नां तां शक्तिमालोक्य भीष्मः क्रोधसमन्वितः ॥ ३१ ॥