03.Mahabharata Volume 3 — पृष्ठ 2301–2310

महाभारत — खण्ड ३ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 2301–2310

पृष्ठ 2301

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अचिन्तयद् रणे वीरो बुद्धया परपुरंजयः । अपनी उस शक्तिको छिन्न -भिन्न हुई देख भीष्मजी क्रोधमें निमग्न हो गये और शत्रुनगरविजयी उन वीर शिरोमणिने रणक्षेत्रमें अपनी बुद्धिके द्वारा इस प्रकार विचार किया - ॥ ३१३ ॥

शक्तोऽहं धनुषैकेन निहन्तुं सर्वपाण्डवान् ॥ ३२ ॥

यद्येषां न भवेद् गोप्ता विष्वक्सेनो महाबलः । ' यदि महाबली भगवान् श्रीकृष्ण उन पाण्डवोंकी रक्षा न करते तो मैं इन सबको केवल एक धनुषके ही द्वारा मार सकता था ॥ ३२ ॥

(अजय्यश्चैव लोकानां सर्वेषामिति मे मतिः । ) कारणद्वयमास्थाय नाहं योत्स्यामि पाण्डवान् ॥ ३३ ॥

अवध्यत्वाच्च पाण्डूनां स्त्रीभावाच्च शिखण्डिनः । ‘ भगवान् सम्पूर्ण लोकोंके लिये अजेय हैं; ऐसा मेरा विश्वास है । इस समय मैं दो कारणोंका आश्रय लेकर पाण्डवोंसे युद्ध नहीं करूँगा । एक तो ये पाण्डुकी संतान होनेके कारण मेरे लिये अवध्य हैं और दूसरे मेरे सामने शिखण्डी आ गया है, जो पहले स्त्री था ॥ ३३ ॥

पित्रा तुष्टेन मे पूर्वं यदा कालीमुदावहम् ॥ ३४ ॥

स्वच्छन्दमरणं दत्तमवध्यत्वं रणे तथा ।

तस्मान्मृत्युमहं मन्ये प्राप्तकालमिवात्मनः ॥ ३५ ॥

' पूर्वकालमें जब मैंने माता सत्यवतीका विवाह पिताजीके साथ कराया था, उस समय मेरे पिताने संतुष्ट होकर मुझे दो वर दिये थे—' जब तुम्हारी इच्छा होगी, तभी तुम मरोगे तथा युद्धमें कोई भी तुम्हें मार न सकेगा। ' ऐसी दशामें मुझे स्वेच्छासे ही मृत्यु स्वीकार कर लेनी चाहिये । मैं समझता हूँ कि अब उसका अवसर आ गया है ' ॥ ३४-३५ ॥

एवं ज्ञात्वा व्यवसितं भीष्मस्यामिततेजसः ।

ऋषयो वसवश्चैव वियत्स्था भीष्ममब्रुवन् ॥ ३६ ॥

अमिततेजस्वी भीष्मके इस निश्चयको जानकर आकाशमें खड़े हुए ऋषियों और वसुओंने उनसे इस प्रकार कहा— ॥ ३६ ॥

यत् ते व्यवसितं तात तदस्माकमपि प्रियम् ।

तत् कुरुष्व महाराज युद्धे बुद्धिं निवर्तय ॥ ३७ ॥

' तात! तुमने जो निश्चय किया है, वह हमलोगोंको भी बहुत प्रिय है । महाराज! अब तुम वही करो । युद्धकी ओरसे अपनी चित्तवृत्ति हटा लो ' ॥ ३७ ॥

अस्य वाक्यस्य निधने प्रादुरासीच्छिवोऽनिलः ।

अनुलोमः सुगन्धी च पृषतैश्च समन्वितः ॥ ३८ ॥

पृष्ठ 2302

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यह बात समाप्त होते ही जलकी बूँदोंके साथ सुखद, शीतल, सुगन्धित एवं मनके अनुकूल वायु चलने लगी ॥ ३८ ॥

देवदुन्दुभयश्चैव सम्प्रणेदुर्महास्वनाः ।

पपात पुष्पवृष्टिश्च भीष्मस्योपरि मारिष ॥ ३ ९ ॥

आर्य! देवताओंकी दुन्दुभियाँ जोर - जोरसे बज उठीं । भीष्मके ऊपर फूलोंकी वर्षा होने लगी ॥ ३ ९ ॥

न च तच्छुश्रुवे कश्चित् तेषां संवदतां नृप ।

ऋते भीष्मं महाबाहुं मां चापि मुनितेजसा ॥ ४० ॥

राजन्! उस समय उपर्युक्त बातें कहनेवाले ऋषियोंका शब्द महाबाहु भीष्म तथा मुझको छोड़कर और कोई नहीं सुन सका । मुझे तो महर्षि व्यासके प्रभावसे ही वह बात सुनायी पड़ी ॥ ४० ॥

सम्भ्रमश्च महानासीत् त्रिदशानां विशाम्पते ।

पतिष्यति रथाद् भीष्मे सर्वलोकप्रिये तदा ॥ ४१ ॥

प्रजानाथ! सम्पूर्ण लोकोंके प्रिय भीष्म रथसे गिरना चाहते हैं, यह जानकर उस समय सम्पूर्ण देवताओंको भी महान् आश्चर्य हुआ ॥ ४१ ॥

इति देवगणानां च वाक्यं श्रुत्वा महातपाः ।

ततः शान्तनवो भीष्मो बीभत्सुं नात्यवर्तत ॥ ४२ ॥

भिद्यमानः शितैर्बाणैः सर्वावरणभेदिभिः । देवताओंकी वह बात सुनकर महातपस्वी शान्तनुनन्दन भीष्म समस्त आवरणोंका भेदन करनेवाले तीखे बाणोंद्वारा विदीर्ण होनेपर भी अर्जुनको जीतनेका प्रयत्न न कर सके ॥ ४२ ॥

शिखण्डी तु महाराज भरतानां पितामहम् ॥ ४३ ॥

आजघानोरसि क्रुद्धो नवभिर्निशितैः शरैः । महाराज! उस समय शिखण्डीने कुपित होकर भरतवंशियोंके पितामह भीष्मजीकी छातीमें नौ पैने बाण मारे ॥ ४३३ ॥

स तेनाभिहतः संख्ये भीष्मः कुरुपितामहः ॥ ४४ ॥

नाकम्पत महाराज क्षितिकम्पे यथाचलः । नरेश्वर! युद्धमें शिखण्डीके द्वारा आहत होकर भी कुरुवंशियोंके पितामह भीष्म उसी प्रकार कम्पित नहीं हुए, जैसे भूकम्प होनेपर भी पर्वत नहीं हिलता ॥ ४४ ॥

ततः प्रहस्य बीभत्सुर्व्याक्षिपन् गाण्डिवं धनुः ॥ ४५ ॥

गाङ्गेयं पञ्चविंशत्या क्षुद्रकाणां समार्पयत् । तदनन्तर अर्जुनने हँसकर गाण्डीव धनुषकी टंकार करते हुए गंगानन्दन भीष्मको पचीस बाण मारे ॥ ४५३ ॥

पृष्ठ 2303

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पुनः पुनः शतैरेनं त्वरमाणो धनंजयः ॥ ४६ ॥

सर्वगात्रेषु संक्रुद्धः सर्वमर्मस्वताडयत् । तत्पश्चात् पुनः उन्होंने अत्यन्त कुपित हो शीघ्रतापूर्वक सौ बाणोंद्वारा भीष्मके सम्पूर्ण अंगों और सभी मर्मस्थानोंमें आघात किया ॥ ४६३ ॥

एवमन्यैरपि भृशं विद्धयमानः सहस्रशः ॥ ४७ ॥

तानप्याशु शरैर्भीष्मः प्रविव्याध महारथः । इसी प्रकार दूसरे लोगोंने भी सहस्रों बाणोंद्वारा भीष्मजीको घायल किया । तब महारथी भीष्मने भी तुरंत ही अपने बाणोंद्वारा उन सबको बींध डाला ॥ ४७ ॥

तैश्च मुक्ताञ्छरान् भीष्मो युधि सत्यपराक्रमः ॥ ४८ ॥

निवारयामास शरैः समं संनतपर्वभिः । सत्यपराक्रमी भीष्म युद्धस्थलमें अन्य सब राजाओं द्वारा छोड़े हुए बाणोंका झुकी हुई गाँठवाले अपने बाणोंद्वारा तुरंत ही निवारण कर देते थे ॥ ४८३ ॥

शिखण्डी तु रणे बाणान् यान् मुमोच महारथः ॥ ४ ९ ॥ न चक्रुस्ते रुजं तस्य रुक्मपुङ्खाः शिलाशिताः । महारथी शिखण्डीने रणक्षेत्रमें जिनका प्रयोग किया था, वे शानपर चढ़ाकर तेज किये हुए सुवर्णमय पंखयुक्त बाण भीष्मजीके शरीरमें कोई घाव या पीड़ा नहीं उत्पन्न कर सके ॥ ४ ९ ॥ ततः किरीटी संक्रुद्धो भीष्ममेवाभ्यवर्तत ॥ ५० ॥

शिखण्डिनं पुरस्कृत्य धनुश्चास्य समाच्छिनत् ।

तत्पश्चात् क्रोधमें भरे हुए अर्जुन शिखण्डीको आगे रखकर पुनः भीष्मकी ही ओर बढ़े ।

उन्होंने भीष्मजीके धनुषको काट दिया ॥ ५० ॥

अथैनं नवभिर्विद्ध्वा ध्वजमेकेन चिच्छिदे ॥ ५१ ॥

सारथिं विशिखैश्चास्य दशभिः समकम्पयत् ।

तदनन्तर नौ बाणोंसे उन्हें घायल करके एक बाणसे उनके ध्वजको भी काट डाला ।

फिर दस बाणोंद्वारा उनके सारथिको कम्पित कर दिया ॥ ५१३ ॥

सोऽन्यत् कार्मुकमादाय गाङ्गेयो बलवत्तरम् ॥ ५२ ॥

तदप्यस्य शितैर्भल्लैस्त्रिधा त्रिभिरघातयत् । तब गंगानन्दन भीष्मने दूसरा अत्यन्त प्रबल धनुष हाथमें लिया; परंतु अर्जुनने तीन तीखे भल्लोंद्वारा मारकर उसे भी तीन जगहसे खण्डित कर दिया ॥ ५२ ॥

निमेषार्धेन कौन्तेय आत्तमात्तं महारणे ॥ ५३ ॥

एवमस्य धनूंष्याजौ चिच्छेद सुबहून्यथ ।

पृष्ठ 2304

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उस महायुद्धमें भीष्म जो- जो धनुष हाथमें लेते थे कुन्तीकुमार अर्जुन उसे आधे निमेषमें काट डालते थे । इस प्रकार उन्होंने रणक्षेत्रमें उनके बहुत - से धनुष खण्डित कर दिये ॥ ५३ ॥

ततः शान्तनवो भीष्मो बीभत्सुं नात्यवर्तत ॥ ५४ ॥

अथैनं पञ्चविंशत्या क्षुद्रकाणां समार्पयत् । तब शान्तनुनन्दन भीष्मने अर्जुनपर हाथ उठाना बंद कर दिया । फिर भी अर्जुनने उन्हें पचीस बाण मारे ॥ ५४ ॥

सोऽतिविद्धो महेष्वासो दुःशासनमभाषत ॥ ५५ ॥

एष पार्थो रणे क्रुद्धः पाण्डवानां महारथः ।

शरैरनेकसाहस्रैर्मामेवाभ्यहनद् रणे ॥ ५६ ॥

इस प्रकार अत्यन्त घायल होनेपर महाधनुर्धर भीष्मने दुःशासनसे कहा — ‘ ये पाण्डव महारथी अर्जुन युद्धमें क्रुद्ध होकर अनेक सहस्र बाणोंद्वारा मुझे घायल कर चुके हैं ॥ ५५-५६ ॥

न चैष समरे शक्यो जेतुं वज्रभृता अपि ।

न चापि सहिता वीरा देवदानवराक्षसाः ॥ ५७ ॥

मां चापि शक्ता निर्जेतुं किमु मर्त्या महारथाः । ‘ इन्हें वज्रधारी इन्द्र भी युद्धमें जीत नहीं सकते । इसी प्रकार समस्त देवता, दानव तथा राक्षस वीर एक साथ आ जायँ तो मुझे भी वे युद्धमें परास्त नहीं कर सकते; फिर दूसरे मानव महारथियोंकी तो बात ही क्या है? ' ॥ ५७ ॥

एवं तयोः संवदतोः फाल्गुनो निशितैः शरैः ॥ ५८ ॥

शिखण्डिनं पुरस्कृत्य भीष्मं विव्याध संयुगे । इस प्रकार दुःशासन और भीष्ममें जब बातचीत हो रही थी, उसी समय अर्जुनने अपने तीखे बाणोंद्वारा युद्धस्थलमें शिखण्डीको आगे करके भीष्मको क्षत - विक्षत कर दिया ॥ ५८ ३ ॥ ततो दुःशासनं भूयः स्मयमान इवाब्रवीत् ॥ ५ ९ ॥

अतिविद्धः शितैर्बाणैर्भृशं गाण्डीवधन्वना ।

वज्राशनिसमस्पर्शा अर्जुनेन शरा युधि ॥ ६० ॥

मुक्ताः सर्वेऽव्यवच्छिन्ना नेमे बाणाः शिखण्डिनः । तब वे पुनः दुःशासनसे मुसकराते हुए-से बोले - ' गाण्डीवधारी अर्जुनने युद्धस्थलमें ऐसे बाण छोड़े हैं, जिनका स्पर्श वज्र और विद्युत्के समान असह्य है । उनके तीखे बाणोंसे मैं अत्यन्त घायल हो गया हूँ। ये अविच्छिन्न रूपसे छूटनेवाले समस्त बाण शिखण्डीके नहीं हो सकते; ॥ ५ ९ -६० ॥ निकृन्तमाना मर्माणि दृढावरणभेदिनः ॥ ६१ ॥

पृष्ठ 2305

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मुसला इव मे घ्नन्ति नेमे बाणाः शिखण्डिनः ।

वज्रदण्डसमस्पर्शा वज्रवेगदुरासदाः ॥ ६२ ॥

‘ क्योंकि ये मेरे सुदृढ़ कवचको छेदकर मर्मस्थानोंमें आघात कर रहे हैं, ये बाण मेरे शरीरपर मुसलके समान चोट करते हैं । इनका स्पर्श वज्र और यमदण्डके समान असह्य है । इनका वेग वज्रके समान होनेके कारण निवारण करना कठिन है । ये शिखण्डीके बाण कदापि नहीं ॥ ६१-६२ ॥

मम प्राणानारुजन्ति नेमे बाणाः शिखण्डिनः ।

नाशयन्तीव मे प्राणान् यमदूता इवाहिताः ॥ ६३ ॥

‘ ये मेरे प्राणोंमें व्यथा उत्पन्न कर देते हैं । अहितकारी यमदूतोंके समान मेरे प्राणोंका

विनाश- सा कर रहे हैं । ये शिखण्डीके बाण कदापि नहीं हो सकते ॥

गदापरिघसंस्पर्शा नेमे बाणाः शिखण्डिनः ।

भुजगा इव संक्रुद्धा लेलिहाना विषोल्बणाः ॥ ६४ ॥

' इनका स्पर्श गदा और परिघकी चोटके समान प्रतीत होता है, ये क्रोधमें भरे हुए

प्रचण्ड विषवाले सर्पोंके समान इसे लेते हैं । ये शिखण्डीके बाण नहीं हैं ॥ ६४ ॥

समाविशन्ति मर्माणि नेमे बाणाः शिखण्डिनः ।

अर्जुनस्य इमे बाणा नेमे बाणाः शिखण्डिनः ॥ ६५ ॥

कृन्तन्ति मम गात्राणि माघमां सेगवा इव । ‘ ये बाण मेरे मर्मस्थानोंमें प्रवेश कर रहे हैं, अतः शिखण्डीके नहीं हैं । ये अर्जुनके बाण हैं । ये शिखण्डीके बाण नहीं हैं । जैसे केंकड़ीके बच्चे अपनी माताका उदर विदीर्ण करके बाहर निकलते हैं, उसी प्रकार ये बाण मेरे सम्पूर्ण अंगोंको छेदे डालते हैं ॥ ६५३ ॥

सर्वे ह्यपि न मे दुःखं कुर्युरन्ये नराधिपाः ॥ ६६ ॥

वीरं गाण्डीवधन्वानमृते जिष्णुं कपिध्वजम् । ‘ गाण्डीवधारी वीर कपिध्वज अर्जुनको छोड़कर अन्य सभी नरेश अपने प्रहारोंद्वारा मुझे इतनी पीड़ा नहीं दे सकते ' ॥ ६६३ ॥

इति ब्रुवञ्छान्तनवो दिधक्षुरिव पाण्डवान् ॥ ६७ ॥

शक्तिं भीष्मः स पार्थाय ततश्चिक्षेप भारत ।

तामस्य विशिखैश्छित्त्वा त्रिधा त्रिभिरपातयत् ॥ ६८ ॥

भारत! ऐसा कहते हुए शान्तनुनन्दन भीष्मने पाण्डवोंकी ओर इस प्रकार देखा, मानो उन्हें भस्म कर डालेंगे । फिर उन्होंने अर्जुनपर एक शक्ति चलायी; परंतु अर्जुनने तीन बाणोंद्वारा उनकी उस शक्तिको तीन जगहसे काट गिराया ॥ ६७-६८ ॥

पश्यतां कुरुवीराणां सर्वेषां तव भारत ।

चर्माथादत्त गाङ्गेयो जातरूपपरिष्कृतम् ॥ ६ ९ ॥

खड्गं चान्यतरप्रेप्सुर्मृत्योरग्रे जयाय वा ।

पृष्ठ 2306

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भरतनन्दन! समस्त कौरव वीरोंके देखते - देखते गंगानन्दन भीष्मने मृत्यु अथवा विजय इन दोमेंसे किसी एकका वरण करनेके लिये अपने हाथमें सुवर्णभूषित ढाल और तलवार ले ली ॥ ६ ९ ३ ॥ तस्य तच्छतधा चर्म व्यधमत् सायकैस्तथा ॥ ७० ॥

रथादनवरूढस्य तदद्भुतमिवाभवत् । परंतु वे अभी अपने रथसे उतर भी नहीं पाये थे कि अर्जुनने अपने बाणोंद्वारा उनकी ढालके सौ टुकड़े कर दिये, वह एक अद्भुत- सी बात हुई ॥ ७०३ ॥

ततो युधिष्ठिरो राजा स्वान्यनीकान्यचोदयत् ॥ ७१ ॥

अभिद्रवत गाङ्गेयं मा वोऽस्तु भयमण्वपि । इसी समय राजा युधिष्ठिरने अपने सैनिकोंको आज्ञा दी - ' वीरो! गंगानन्दन भीष्मपर आक्रमण करो । उनकी ओरसे तुम्हारे मनमें तनिक भी भय नहीं होना चाहिये ' ॥ ७१३ ॥

अथ ते तोमरैः प्रासैर्बाणौघैश्च समन्ततः ॥ ७२ ॥

पट्टिशैश्च सुनिस्त्रिंशैर्नाराचैश्च तथा शितैः ।

वत्सदन्तैश्च भल्लैश्च तमेकमभिदुद्रुवुः ॥ ७३ ॥

तदनन्तर वे पाण्डव- सैनिक सब ओरसे तोमर, प्रास, बाणसमुदाय, पट्टिश, खड्ग, तीखे नाराच, वत्सदन्त तथा भल्लोंका प्रहार करते हुए एकमात्र भीष्मकी ओर दौड़े ॥ ७२-७३ ॥

सिंहनादस्ततो घोरः पाण्डवानामभूत् तदा ।

तथैव तव पुत्राश्च नेदुर्भीष्मजयैषिणः ॥ ७४ ॥

तदनन्तर पाण्डवोंकी सेनामें घोर सिंहनाद हुआ। इसी प्रकार भीष्मकी विजय चाहनेवाले आपके पुत्र भी उस समय गर्जना करने लगे ॥ ७४ ॥

तमेकमभ्यरक्षन्त सिंहनादांश्च चक्रिरे ।

तत्रासीत् तुमुलं युद्धं तावकानां परैः सह ॥ ७५ ॥

आपके सैनिक एकमात्र भीष्मकी रक्षा और सिंहनाद करने लगे । वहाँ आपके योद्धाओंका शत्रुओंके साथ भयंकर युद्ध हुआ ॥ ७५ ॥

दशमेऽहनि राजेन्द्र भीष्मार्जुनसमागमे ।

आसीद् गाङ्ग इवावर्तो मुहूर्तमुदधेरिव ॥ ७६ ॥

राजेन्द्र! दसवें दिन भीष्म और अर्जुनके संघर्षमें दो घड़ीतक ऐसा दृश्य दिखायी दिया, मानो समुद्रमें गंगाजीके गिरते समय उनके जलमें भारी भँवर उठ रही हो ॥ ७६ ॥

सैन्यानां युध्यमानानां निघ्नतामितरेतरम् ।

असौम्यरूपा पृथिवी शोणिताक्ताभवत् तदा ॥ ७७ ॥

उस समय एक- दूसरेको मारनेवाले युद्धपरायण सैनिकोंके रक्तसे रंजित हो वहाँकी सारी पृथ्वी भयानक हो गयी थी ॥ ७७ ॥

पृष्ठ 2307

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समं च विषमं चैव न प्राज्ञायत किंचन ।

योधानामयुतं हत्वा तस्मिन् स दशमेऽहनि ॥ ७८ ॥

अतिष्ठदाहवे भीष्मो भिद्यमानेषु मर्मसु । वहाँ ऊँची और नीची भूमिका भी कुछ ज्ञान नहीं हो पाता था, दसवें दिनके उस युद्धमें अपने मर्मस्थानोंके विदीर्ण होते रहनेपर भी भीष्मजी दस हजार योद्धाओंको मारकर वहाँ खड़े हुए थे ॥ ७८ ॥

ततः सेनामुखे तस्मिन् स्थितः पार्थो धनुर्धरः ॥ ७९ ॥

मध्येन कुरुसैन्यानां द्रावयामास वाहिनीम् । उस समय सेनाके अग्रभागमें खड़े हुए धनुर्धर अर्जुनने कौरव सेनाके भीतर प्रवेश करके आपके सैनिकोंको खदेड़ना आरम्भ किया ॥ ७ ९ ॥

(तथा च तव सैन्यानि तापयामासुरोजसा ।

शरैरशनिसंकाशैः पाण्डवाश्चेतरे नृपाः ॥

तत्राद्भुतमपश्याम पाण्डवानां पराक्रमम् । द्रावयामासुरिषुभिः सर्वान् भीष्मपदानुगान् ॥ ) पाण्डवों तथा अन्य राजाओंने वज्रके समान बाणोंद्वारा आपकी सेनाओंको बलपूर्वक पीड़ित किया । वहाँ हमने पाण्डवोंका यह अद्भुत पराक्रम देखा कि उन्होंने अपने बाणोंकी

वर्षासे भीष्मका अनुगमन करनेवाले समस्त योद्धाओंको मार भगाया ।

वयं श्वेतहयाद् भीताः कुन्तीपुत्राद् धनंजयात् ॥ ८० ॥

पीड्यमानाः शितैः शस्त्रैः प्राद्रवाम रणे तदा । राजन्! उस समय श्वेतवाहन कुन्तीपुत्र धनंजयसे डरकर उनके तीखे अस्त्र - शस्त्रोंसे पीड़ित हो हम सभी लोग रणभूमिसे भागने लगे थे ॥ ८०३ ॥

सौवीराः कितवाः प्राच्याः प्रतीच्योदीच्यमालवाः ॥ ८१ ॥

अभीषाहाः शूरसेनाः शिबयोऽथ वसातयः ।

शाल्वाश्रयास्त्रिगर्ताश्च अम्बष्ठाः केकयैः सह ॥ ८२ ॥

सर्व एते महात्मानः शरार्ता व्रणपीडिताः ।

संग्रामे न जहुर्भीष्मं युध्यमानं किरीटिना ॥ ८३ ॥

सौवीर, कितव, प्राच्य, प्रतीच्य, उदीच्य, मालव, अभीषाह, शूरसेन, शिबि, वसाति, शाल्वाश्रय, त्रिगर्त, अम्बष्ठ और केकय - इन सभी देशोंके ये सारे महामनस्वी वीर बाणोंसे घायल और घावोंसे पीड़ित होनेपर भी अर्जुनके साथ युद्ध करनेवाले भीष्मको संग्रामभूमिमें छोड़ न सके ॥ ८१–८३ ॥

ततस्तमेकं बहवः परिवार्य समन्ततः ।

परिकाल्य कुरून् सर्वान् शरवर्षैरवाकिरन् ॥ ८४ ॥

पृष्ठ 2308

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तदनन्तर एकमात्र भीष्मको पाण्डव पक्षीय बहुत - से योद्धाओंने चारों ओरसे घेर लिया और समस्त कौरवोंको सब ओर खदेड़कर उनके ऊपर बाणोंकी वर्षा आरम्भ कर दी ॥ ८४ ॥

निपातयत गृह्णीत युध्यध्वमवकृन्तत ।

इत्यासीत् तुमुलः शब्दो राजन् भीष्मरथं प्रति ॥ ८५ ॥

राजन्! उस समय भीष्मके रथके समीप ' मार गिराओ, पकड़ लो, युद्ध करो, टुकड़े-टुकड़े कर डालो ' इत्यादि भयंकर शब्द गूँज रहे थे ॥ ८५ ॥

निहत्य समरे राजन् शतशोऽथ सहस्रशः ।

न तस्यासीदनिर्भिन्नं गात्रे द्वयङ्गुलमन्तरम् ॥ ८६ ॥

महाराज! समरमें भीष्म सैकड़ों और हजारों वीरोंका वध करके स्वयं इस स्थितिमें पहुँच गये थे कि उनके शरीरमें दो अंगुल भी ऐसा स्थान नहीं रह गया था, जो बाणोंसे विद्ध न हुआ हो ॥ ८६ ॥

एवंभूतस्तव पिता शरैर्विशकलीकृतः ।

शिताग्रैः फाल्गुनेनाजौ प्राक्शिराः प्रापतद् रथात् ॥ ८७ ॥

किंचिच्छेषे दिनकरे पुत्राणां तव पश्यताम् । इस प्रकार आपके ताऊ भीष्म युद्धस्थलमें अर्जुनके तीखे बाणोंसे अत्यन्त विद्ध हो गये थे — उनका शरीर छिदकर छलनी हो रहा था । वे उसी अवस्थामें, जब कि दिन थोड़ा ही शेष था, आपके पुत्रोंके देखते- देखते पूर्व दिशाकी ओर मस्तक किये रथसे नीचे गिर पड़े ॥ ८७ ¾ ॥ हाहेति दिवि देवानां पार्थिवानां च भारत ॥ ८८ ॥

पतमाने रथाद् भीष्मे बभूव सुमहास्वनः । भारत! रथसे भीष्मके गिरते समय आकाशमें खड़े हुए देवताओं तथा भूतलवर्ती राजाओंमें बड़े जोरसे हाहाकार मच गया ॥ ८८ ॥

सम्पतन्तमभिप्रेक्ष्य महात्मानं पितामहम् ॥ ८ ९ ॥ सह भीष्मेण सर्वेषां प्रापतन् हृदयानि नः । महाराज! महात्मा पितामह भीष्मको रथसे नीचे गिरते देखकर हम सब लोगोंके हृदय भी उनके साथ ही गिर पड़े ॥ ८ ९ ३ ॥ स पपात महाबाहुर्वसुधामनुनादयन् ॥ ९ ० ॥

इन्द्रध्वज इवोत्सृष्टः केतुः सर्वधनुष्मताम् ।

धरणीं न स पस्पर्श शरसंघैः समावृतः ॥ ९ १ ॥

महाबाहु भीष्म सम्पूर्ण धनुर्धरोंमें श्रेष्ठ थे । वे कटी हुई इन्द्रकी ध्वजाके समान पृथ्वीको शब्दायमान करते हुए गिर पड़े । उनके सारे अंगोंमें सब ओर बाण बिंधे हुए थे । इसलिये गिरनेपर भी उनका धरतीसे स्पर्श नहीं हुआ ॥ ९० - ९ १ ॥

पृष्ठ 2309

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शरतल्पे महेष्वासं शयानं पुरुषर्षभम् ।

रथात् प्रपतितं चैनं दिव्यो भावः समाविशत् ॥ ९ २ ॥

रथसे गिरकर बाणशय्यापर सोये हुए पुरुषप्रवर महाधनुर्धर भीष्मके भीतर दिव्यभावका आवेश हुआ ॥ ९ २ ॥

अभ्यवर्षच्च पर्जन्यः प्राकम्पत च मेदिनी ।

पतन् स ददृशे चापि दक्षिणेन दिवाकरम् ॥ ९ ३ ॥

आकाशसे मेघ वर्षा करने लगा, धरती काँपने लगी, गिरते - गिरते उन्होंने देखा, अभी सूर्य दक्षिणायनमें हैं ( यह मृत्युके लिये उत्तम समय नहीं है ) ॥ ९ ३ ॥

संज्ञां चोपालभद् वीरः कालं संचिन्त्य भारत ।

अन्तरिक्षे च शुश्राव दिव्या वाचः समन्ततः ॥ ९ ४ ॥

भारत! समयका विचार करके वीरवर भीष्मने अपने होश- हवाशको ठीक रखा । उस समय आकाशमें सब ओरसे दिव्य वाणी सुनायी दी ॥ ९ ४ ॥

कथं महात्मा गाङ्गेयः सर्वशस्त्रभृतां वरः ।

कालकर्ता नरव्याघ्रः सम्प्राप्ते दक्षिणायने ॥ ९ ५ ॥

महात्मा गंगानन्दन भीष्म सम्पूर्ण शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ, मनुष्योंमें सिंहके समान पराक्रमी तथा कालपर भी प्रभुत्व रखनेवाले थे । इन्होंने दक्षिणायनमें मृत्यु क्यों स्वीकार की? ॥ ९ ५ ॥

स्थितोऽस्मीति च गाङ्गेयस्तच्छ्रुत्वा वाक्यमब्रवीत् ।

धारयामास च प्राणान् पतितोऽपि महीतले ॥ ९ ६ ॥

उत्तरायणमन्विच्छन् भीष्मः कुरुपितामहः ।

तस्य तन्मतमाज्ञाय गंगा हिमवतः सुता ॥ ९ ७ ॥

महर्षीन् हंसरूपेण प्रेषयामास तत्र वै । उनकी वह बात सुनकर गंगानन्दन भीष्मने कहा- ' मैं अभी जीवित हूँ । ' कुरुकुलके वृद्ध पितामह भीष्म पृथ्वीपर गिरकर भी उत्तरायणकी प्रतीक्षा करते हुए अपने प्राणोंको रोके हुए हैं । उनके इस अभिप्रायको जानकर हिमालयनन्दिनी गंगादेवीने महर्षियोंको हंसरूपसे वहाँ भेजा ॥ ९ ६ - ९ ७ ॥ ततः सम्पातिनो हंसास्त्वरिता मानसौकसः ॥ ९ ८ ॥

आजग्मुः सहिता द्रष्टुं भीष्मं कुरुपितामहम् ।

यत्र शेते नरश्रेष्ठः शरतल्पे पितामहः ॥ ९९ ॥

वे मानससरोवरमें निवास करनेवाले हंसरूपधारी महर्षि एक साथ उड़ते हुए बड़ी उतावलीके साथ कुरुकुलके वृद्धपितामह भीष्मका दर्शन करनेके लिये उस स्थानपर आये, जहाँ वे नरश्रेष्ठ बाणशय्यापर सो रहे थे ॥ तु भीष्मं समासाद्य ऋषयो हंसरूपिणः ।

पृष्ठ 2310

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अपश्यञ्छरतल्पस्थं भीष्मं कुरुकुलोद्वहम् ॥ १०० ॥

उन हंसरूपधारी ऋषियोंने वहाँ पहुँचकर कुरुकुल- धुरन्धर वीर भीष्मको बाणशय्यापर सोये हुए देखा ॥ १०० ॥

ते तं दृष्ट्वा महात्मानं कृत्वा चापि प्रदक्षिणम् ।

गाङ्गेयं भरतश्रेष्ठं दक्षिणेन च भास्करम् ॥ १०१ ॥

इतरेतरमामन्त्र्य प्राहुस्तत्र मनीषिणः । उन भरतश्रेष्ठ महात्मा गंगानन्दन भीष्मका दर्शन करके ऋषियोंने उनकी प्रदक्षिणा की । फिर दक्षिणायन - युक्त सूर्यके सम्बन्धमें परस्पर सलाह करके वे मनीषी मुनि इस प्रकार बोले - ॥ १०१३ ॥

भीष्मः कथं महात्मा सन् संस्थाता दक्षिणायने ॥ १०२ ॥

इत्युक्त्वा प्रस्थिता हंसा दक्षिणामभितो दिशम् । ‘ भीष्मजी महात्मा होकर दक्षिणायनमें कैसे अपनी मृत्यु स्वीकार करेंगे ' ऐसा कहकर वे हंसगण दक्षिणदिशाकी ओर चले गये ॥ १०२ ॥

सम्प्रेक्ष्य वै महाबुद्धिश्चिन्तयित्वा च भारत ॥ १०३ ॥

तानब्रवीच्छान्तनवो नाहं गन्ता कथंचन ।

दक्षिणावर्त आदित्ये एतन्मे मनसि स्थितम् ॥ १०४ ॥

भारत! हंसोंके जाते समय उन्हें देखकर परम बुद्धिमान् भीष्मने कुछ चिन्तन करके उनसे कहा — ' मैं सूर्यके दक्षिणायन रहते किसी प्रकार यहाँसे प्रस्थान नहीं करूँगा । यह मेरे मनका निश्चित विचार है ॥ १०३-१०४ ॥

गमिष्यामि स्वकं स्थानमासीद् यन्मे पुरातनम् ।

उदगायन आदित्ये हंसाः सत्यं ब्रवीमि वः ॥ १०५ ॥

' हंसो! सूर्यके उत्तरायण होनेपर ही मैं उस लोककी यात्रा करूँगा, जो मेरा पुरातन स्थान है । यह मैं आपलोगोंसे सच्ची बात कह रहा हूँ ॥ १०५ ॥

धारयिष्याम्यहं प्राणानुत्तरायणकाङ्क्षया ।

ऐश्वर्यभूतः प्राणानामुत्सर्गो हि यतो मम ॥ १०६ ॥

‘ मैं उत्तरायणकी प्रतीक्षामें अपने प्राणोंको धारण किये रहूँगा; क्योंकि मैं जब इच्छा करूँ, तभी अपने प्राणोंको छोड़ू, यह शक्ति मुझे प्राप्त है ॥ १०६ ॥

तस्मात् प्राणान् धारयिष्ये मुमूर्षुरुदगायने ।

यश्च दत्तो वरो मह्यं पित्रा तेन महात्मना ॥ १०७ ॥

छन्दतो मृत्युरित्येवं तस्य चास्तु वरस्तथा ।

धारयिष्ये ततः प्राणानुत्सर्गे नियते सति ॥ १०८ ॥

‘ अतः उत्तरायणमें मृत्यु प्राप्त करनेकी इच्छासे मैं अपने प्राणोंको धारण करूँगा । मेरे महात्मा पिताने मुझे जो वर दिया था कि तुम्हें अपनी इच्छा होनेपर ही मृत्यु प्राप्त होगी,