03.Mahabharata Volume 3 — पृष्ठ 361–370

महाभारत — खण्ड ३ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 361–370

पृष्ठ 361

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विस्मृति, अधिक बकवाद और अपनेको बड़ा समझना – इन दोषोंसे जो मुक्त है, उसीको सत्पुरुष दाना ( जितेन्द्रिय) कहते हैं ॥

मदोऽष्टादशदोषः स्यात् त्यागो भवति षड्विधः ।

विपर्ययाः स्मृता एते मददोषा उदाहृताः ॥ २६ ॥

श्रेयांस्तु षड्विधस्त्यागस्तृतीयो दुष्करो भवेत् ।

तेन दुःखं तरत्येव भिन्नं तस्मिन् जितं कृते ॥ २७ ॥

मदमें अठारह दोष हैं; ऊपर जो दमके विपर्यय सूचित किये गये हैं, वे ही मदके दोष बताये गये हैं । त्याग छः प्रकारका होता है, वह छहों प्रकारका त्याग अत्यन्त उत्तम है; किंतु इनमें तीसरा अर्थात् कामत्याग बहुत ही कठिन है, इसके द्वारा मनुष्य त्रिविध दुःखोंको निश्चय ही पार कर जाता है । कामका त्याग कर देनेपर सब कुछ जीत लिया जाता है ॥ २६-२७ ॥

श्रेयांस्तु षड्विधस्त्यागः श्रियं प्राप्य न हृष्यति ।

इष्टापूर्ते द्वितीयं स्यान्नित्यवैराग्ययोगतः ॥ २८ ॥

कामत्यागश्च राजेन्द्र स तृतीय इति स्मृतः ।

अप्यवाच्यं वदन्त्येतं स तृतीयो गुणः स्मृतः ॥ २ ९ ॥

राजेन्द्र! छः प्रकारका जो सर्वश्रेष्ठ त्याग है, उसे बताते हैं । लक्ष्मीको पाकर हर्षित न होना — यह प्रथम त्याग है; यज्ञ- होमादिमें तथा कुएँ, तालाब और बगीचे आदि बनानेमें धन खर्च करना दूसरा त्याग है और सदा वैराग्यसे युक्त रहकर कामका त्याग करना — यह तीसरा त्याग कहा गया है । महर्षिलोग इसे अनिर्वचनीय मोक्षका उपाय कहते हैं । अतः यह तीसरा त्याग विशेष गुण माना गया है ॥ २८-२९ ॥

त्यक्तैर्द्रव्यैर्यद् भवति नोपयुक्तैश्च कामतः ।

न च द्रव्यैस्तद् भवति नोपयुक्तैश्च कामतः ॥ ३० ॥

( वैराग्यपूर्वक ) पदार्थोंके त्यागसे जो निष्कामता आती है, वह स्वेच्छापूर्वक उनका उपभोग करनेसे नहीं आती । अधिक धन-सम्पत्तिके संग्रहसे निष्कामता नहीं सिद्ध होती तथा कामनापूर्तिके लिये उसका उपभोग करनेसे भी कामका त्याग नहीं होता ॥ ३० ॥

न च कर्मस्वसिद्धेषु दुःखं तेन च न ग्लपेत् ।

सर्वैरेव गुणैर्युक्तो द्रव्यवानपि यो भवेत् ॥ ३१ ॥

जो पुरुष सब गुणोंसे युक्त और धनवान् हो, यदि उसके किये हुए कर्म सिद्ध न हों तो उनके लिये दुःख एवं ग्लानि न करे ॥ ३१ ॥

अप्रिये च समुत्पन्ने व्यथां जातु न गच्छति ।

इष्टान् पुत्रांश्च दारांश्च न याचेत कदाचन ॥ ३२ ॥

कोई अप्रिय घटना हो जाय तो कभी व्यथाको न प्राप्त हो ( यह चौथा त्याग है ) । अपने अभीष्ट पदार्थ— स्त्री- पुत्रादिकी कभी याचना न करे ( यह पाँचवाँ त्याग है ) ॥ ३२ ॥

पृष्ठ 362

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अर्हते याचमानाय प्रदेयं तच्छुभं भवेत् ।

अप्रमादी भवेदेतैः स चाप्यष्टगुणो भवेत् ॥ ३३ ॥

सत्यं ध्यानं समाधानं चोद्यं वैराग्यमेव च ।

अस्तेयं ब्रह्मचर्यं च तथा संग्रहमेव च ॥ ३४ ॥

सुयोग्य याचकके आ जानेपर उसे दान करे ( यह छठा त्याग है ) । इन सबसे कल्याण होता है । इन त्यागमय गुणोंसे मनुष्य अप्रमादी होता है । उस अप्रमादके भी आठ गुण माने गये हैं — सत्य, ध्यान, अध्यात्मविषयक विचार, समाधान, वैराग्य, चोरी न करना, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह ॥ ३३-३४ ॥

एवं दोषा मदस्योक्तास्तान् दोषान् परिवर्जयेत् ।

तथा त्यागोऽप्रमादश्च स चाप्यष्टगुणो मतः ॥ ३५ ॥

ये आठ गुण त्याग और अप्रमाद दोनोंके ही समझने चाहिये । इसी प्रकार जो मदके अठारह दोष पहले बताये गये हैं, उनका सर्वथा त्याग करना चाहिये । प्रमादके आठ दोष हैं, उन्हें भी त्याग देना चाहिये ॥ अष्टौ दोषाः प्रमादस्य तान् दोषान् परिवर्जयेत् ।

इन्द्रियेभ्यश्च पञ्चभ्यो मनसश्चैव भारत ।

अतीतानागतेभ्यश्च मुक्त्युपेतः सुखी भवेत् ॥ ३६ ॥

भारत! पाँच इन्द्रियाँ और छठा मन- इनकी अपने - अपने विषयोंमें जो भोगबुद्धिसे प्रवृत्ति होती है, छः तो ये ही प्रमादविषयक दोष हैं और भूतकालकी चिन्ता तथा भविष्यकी आशा– दो दोष ये हैं । इन आठ दोषोंसे मुक्त पुरुष सुखी होता है ॥ ३६ ॥

सत्यात्मा भव राजेन्द्र सत्ये लोकाः प्रतिष्ठिताः ।

तांस्तु सत्यमुखानाहुः सत्ये ह्यमृतमाहितम् ॥ ३७ ॥

राजेन्द्र! तुम सत्यस्वरूप हो जाओ, सत्यमें ही सम्पूर्ण लोक प्रतिष्ठित हैं । वे दम, त्याग और अप्रमाद आदि गुण भी सत्यस्वरूप परमात्माकी प्राप्ति करानेवाले हैं; सत्यमें ही अमृतकी प्रतिष्ठा है ॥ ३७ ॥

निवृत्तेनैव दोषेण तपोव्रतमिहाचरेत् ।

एतद् धातृकृतं वृत्तं सत्यमेव सतां व्रतम् ॥ ३८ ॥

दोषैरेतैर्वियुक्तस्तु गुणैरेतैः समन्वितः ।

एतत् समृद्धमत्यर्थं तपो भवति केवलम् ॥ ३ ९ ॥

यन्मां पृच्छसि राजेन्द्र संक्षेपात् प्रब्रवीमि ते ।

एतत् पापहरं पुण्यं जन्ममृत्युजरापहम् ॥ ४० ॥

दोषोंको निवृत्त करके ही यहाँ तप और व्रतका आचरण करना चाहिये, यह विधाताका बनाया हुआ नियम है । सत्य ही श्रेष्ठ पुरुषोंका व्रत है । मनुष्यको उपर्युक्त दोषोंसे रहित और गुणोंसे युक्त होना चाहिये । ऐसे पुरुषका ही विशुद्ध तप अत्यन्त समृद्ध होता है । राजन्!

पृष्ठ 363

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तुमने जो मुझसे पूछा है, वह मैंने संक्षेपसे बता दिया । यह तप जन्म, मृत्यु और वृद्धावस्थाके कष्टको दूर करनेवाला, पापहारी तथा परम पवित्र है ॥ ३८–४० ॥ धृतराष्ट्रउवाच

आख्यानपञ्चमैर्वेदैर्भूयिष्ठं कथ्यते जनः ।

तथा चान्ये चतुर्वेदास्त्रिवेदाश्च तथा परे ॥ ४१ ॥

धृतराष्ट्रने कहा – मुने! इतिहास - पुराण जिनमें पाँचवाँ है, उन सम्पूर्ण वेदोंके द्वारा कुछ लोगोंका विशेषरूपसे नाम लिया जाता है ( अर्थात् वे पंचवेदी कहलाते हैं ), दूसरे लोग चतुर्वेदी और त्रिवेदी कहे जाते हैं ॥ ४१ ॥

द्विवेदाश्चैकवेदाश्चाप्यनृचश्च तथा परे ।

तेषां तु कतरः सस्याद् यमहं वेद वै द्विजम् ॥ ४२ ॥

इसी प्रकार कुछ लोग द्विवेदी, एकवेदी तथा अनृच* कहलाते हैं । इनमें से कौन - से ऐसे हैं, जिन्हें मैं निश्चितरूपसे ब्राह्मण समझँ? ॥ ४२ ॥

सनत्सुजात उवाच

एकस्य वेदस्याज्ञानाद् वेदास्ते बहवः कृताः ।

सत्यस्यैकस्य राजेन्द्र सत्ये कश्चिदवस्थितः ॥ ४३ ॥

सनत्सुजातने कहा— राजन्! सृष्टिके आदिमें वेद एक ही थे, परंतु न समझनेके कारण (एक ही वेदके ) बहुत - से विभाग कर दिये गये हैं । उस सत्यस्वरूप एक वेदके सारतत्त्व परमात्मामें तो कोई बिरला ही स्थित होता है ॥ ४३ ॥

एवं वेदमविज्ञाय प्राज्ञोऽहमिति मन्यते ।

दानमध्ययनं यज्ञो लोभादेतत् प्रवर्तते ॥ ४४ ॥

इस प्रकार वेदके तत्त्वको न जानकर भी कुछ लोग ' मैं विद्वान् हूँ ' ऐसा मानने लगते हैं; फिर उनकी दान, अध्ययन और यज्ञादि कर्मोंमें ( सांसारिक सुखकी प्राप्तिरूप फलके ) लोभसे प्रवृत्ति होती है ॥ ४४ ॥

सत्यात् प्रच्यवमानानां संकल्पश्च तथा भवेत् ।

ततो यज्ञः प्रतायेत सत्यस्यैवावधारणात् ॥ ४५ ॥

वास्तवमें जो सत्यस्वरूप परमात्मासे च्युत हो गये हैं, उन्हींका वैसा संकल्प होता है । फिर सत्यरूप वेदके प्रामाण्यका निश्चय करके ही उनके द्वारा यज्ञोंका विस्तार ( अनुष्ठान) किया जाता है ॥ ४५ ॥

मनसान्यस्य भवति वाचान्यस्याथ कर्मणा ।

संकल्पसिद्धः पुरुषः संकल्पानधितिष्ठति ॥ ४६ ॥

किसीका यज्ञ मनसे, किसीका वाणीसे तथा किसीका क्रियाके द्वारा सम्पादित होता है ।

सत्यसंकल्प पुरुष संकल्पके अनुसार ही लोकोंको प्राप्त होता है ॥ ४६ ॥

पृष्ठ 364

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अनैभृत्येन चैतस्य दीक्षितव्रतमाचरेत् ।

नामैतद् धातुनिर्वृत्तं सत्यमेव सतां परम् ॥ ४७ ॥

किंतु जबतक संकल्प सिद्ध न हो, तबतक दीक्षित व्रतका आचरण अर्थात् यज्ञादि कर्म करते रहना चाहिये । यह दीक्षित नाम ' दक्षि व्रतादेशे ' इस धातुसे बना है । सत्पुरुषोंके सत्यस्वरूप परमात्मा ही सबसे बढ़कर हैं ॥ ४७ ॥

ज्ञानं वै नाम प्रत्यक्षं परोक्षं जायते तपः ।

विद्याद् बहु पठन्तं तु द्विजं वै बहुपाठिनम् ॥ ४८ ॥

क्योंकि परमात्माके ज्ञानका फल प्रत्यक्ष है और तपका फल परोक्ष है ( इसलिये ज्ञानका ही आश्रय लेना चाहिये ) । बहुत पढ़नेवाले ब्राह्मणको केवल बहुपाठी ( बहुज्ञ ) समझना चाहिये ॥ ४८ ॥

तस्मात् क्षत्रिय मा मंस्था जल्पितेनैव वै द्विजम् ।

य एव सत्यान्नापैति स ज्ञेयो ब्राह्मणस्त्वया ॥ ४ ९ ॥

इसलिये महाराज! केवल बातें बनानेसे ही किसीको ब्राह्मण न मान लेना । जो सत्यस्वरूप परमात्मासे कभी पृथक् नहीं होता, उसीको तुम ब्राह्मण समझो ॥ ४ ९ ॥ छन्दांसि नाम क्षत्रिय तान्यथर्वा पुरा जगौ महर्षिसङ्घ एषः । छन्दोविदस्ते य उत नाधीतवेदा न वेदवेद्यस्य विदुर्हि तत्त्वम् ॥ ५० ॥

राजन्! अथर्वा मुनि एवं महर्षिसमुदायने पूर्व- कालमें जिनका गान किया है, वे ही छन्द ( वेद ) हैं । किंतु सम्पूर्ण वेद पढ़ लेनेपर भी जो वेदोंके द्वारा जाननेयोग्य परमात्माके तत्त्वको नहीं जानते, वे वास्तवमें वेदके विद्वान् नहीं हैं ॥ ५० ॥

छन्दांसि नाम द्विपदां वरिष्ठ स्वच्छन्दयोगेन भवन्ति तत्र । छन्दोविदस्तेन च तानधीत्य गता न वेदस्य न वेद्यमार्याः ॥ ५१ ॥

नरश्रेष्ठ! छन्द ( वेद ) उस परमात्मामें स्वच्छन्द सम्बन्धसे स्थित ( स्वतःप्रमाण) हैं । इसलिये उनका अध्ययन करके ही वेदवेत्ता आर्यजन वेद्यरूप परमात्माके तत्त्वको प्राप्त हुए हैं ॥ ५१ ॥

न वेदानां वेदिता कश्चिदस्ति कश्चित् त्वेतान् बुध्यते वापि राजन् । यो वेद वेदान् न स वेद वेद्यं सत्ये स्थितो यस्तु स वेद वेद्यम् ॥ ५२ ॥

पृष्ठ 365

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राजन्! वास्तवमें वेदके तत्त्वको जाननेवाला कोई नहीं है अथवा यों समझो कि कोई बिरला ही उनका रहस्य जान पाता है । जो केवल वेदके वाक्योंको जानता है, वह वेदोंके द्वारा जाननेयोग्य परमात्माको नहीं जानता; किंतु जो सत्यमें स्थित है, वह वेदवेद्य परमात्माको जानता है ॥ न वेदानां वेदिता कश्चिदस्ति वेद्येन वेदं न विदुर्न वेद्यम् । यो वेद वेदं स च वेद वेद्यं यो वेद वेद्यं न स वेद सत्यम् ॥ ५३ ॥

जाननेवालोंमेंसे कोई भी वेदोंको अर्थात् उनके रहस्यको जाननेवाला नहीं है; क्योंकि जाननेमें आनेवाले मन- बुद्धि आदिके द्वारा न तो कोई वेदके रहस्यको जान पाता है और न जाननेयोग्य परमात्मतत्त्वको ही । जो मनुष्य केवल कर्म -विधायक वेदको जानता है; वह तो बुद्धिद्वारा जाननेमें आनेवाले पदार्थोंको ही जानता है; किंतु जो बुद्धिद्वारा जाननेयोग्य पदार्थोंको जानता है, वह ( सकामी पुरुष ) वास्तविक तत्त्व परब्रह्म परमात्माको नहीं जानता ॥ ५३ ॥

यो वेद वेदान् स च वेद वेद्यं न तं विदुर्वेदविदो न वेदाः । तथापि वेदेन विदन्ति वेदं ये ब्राह्मणा वेदविदो भवन्ति ॥ ५४ ॥

जो महापुरुष वेदोंके रहस्यको जानता है, वह जाननेयोग्य परमात्माको भी जानता है; परंतु उस ( जाननेवाले ) को न तो वेदोंके शब्दोंको जाननेवाला जानता है और न वेद ही जानते हैं । तथापि वेदके रहस्यको जाननेवाले जो ब्रह्मवेत्ता महापुरुष हैं, वे उस वेदके द्वारा ही वेदके रहस्यको जान लेते हैं ( अर्थात् वेदोंका कथन इतना गुप्त है कि केवल शब्दज्ञानसे उसका रहस्य एवं उसमें वर्णित परमात्मतत्त्व समझमें नहीं आता । अन्तःकरण शुद्ध होनेपर सद्गुरु या प्रभुकी कृपासे ही साधक उसे समझ पाता है ) ॥ ५४ ॥

धामांशभागस्य तथा हि वेदा यथा च शाखा हि महीरुहस्य । संवेदने चैव यथाऽऽमनन्ति तस्मिन् हि सत्ये परमात्मनोऽर्थे ॥ ५५ ॥

द्वितीयाके चन्द्रमाकी सूक्ष्म कलाको बतानेके लिये जैसे वृक्षकी शाखाकी ओर संकेत किया जाता है, उसी प्रकार उस सत्यस्वरूप परमात्माका ज्ञान करानेके लिये ही वेदोंका भी उपयोग किया जाता है; ऐसा विद्वान् पुरुष मानते हैं ॥ ५५ ॥

अभिजानामि ब्राह्मणं व्याख्यातारं विचक्षणम् ।

यश्छिन्नविचिकित्सः स व्याचष्टे सर्वसंशयान् ॥ ५६ ॥

पृष्ठ 366

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मैं तो उसीको ब्राह्मण समझता हूँ, जो परमात्माके तत्त्वको जाननेवाला और वेदोंकी यथार्थ व्याख्या करनेवाला हो, जिसके अपने संदेह मिट गये हों और जो दूसरोंके भी सम्पूर्ण संशयोंको मिटा सके ॥ ५६ ॥

नास्य पर्येषणं गच्छेत् प्राचीनं नोत दक्षिणम् ।

नार्वाचीनं कुतस्तिर्यङ्नादिशं तु कथञ्चन ॥ ५७ ॥

इस आत्माकी खोज करनेके लिये पूर्व, दक्षिण, पश्चिम या उत्तरकी ओर जानेकी आवश्यकता नहीं है; फिर आग्नेय आदि कोणोंकी तो बात ही क्या है? इसी प्रकार दिग्विभागसे रहित प्रदेशमें भी उसे नहीं ढूँढ़ना चाहिये ॥ ५७ ॥

तस्य पर्येषणं गच्छेत् प्रत्यर्थिषु कथञ्चन ।

अविचिन्वन्निमं वेदे तपः पश्यति तं प्रभुम् ॥ ५८ ॥

आत्माका अनुसंधान अनात्मपदार्थोंमें तो किसी तरह करे ही नहीं, वेदके वाक्योंमें भी न ढूँढ़कर केवल तपके द्वारा उस प्रभुका साक्षात्कार करे ॥ ५८ ॥

तूष्णीम्भूत उपासीत न चेष्टेन्मनसापि च ।

उपावर्तस्व तद् ब्रह्म अन्तरात्मनि विश्रुतम् ॥ ५ ९ ॥

वागादि इन्द्रियोंकी सब प्रकारकी चेष्टासे रहित होकर परमात्माकी उपासना करे, मनसे भी कोई चेष्टा न करे । राजन्! तुम भी अपने हृदयाकाशमें स्थित उस विख्यात परमेश्वरकी बुद्धिपूर्वक उपासना करो ॥ ५ ९ ॥

मौनान्न स मुनिर्भवति नारण्यवसनान्मुनिः ।

स्वलक्षणं तु यो वेद स मुनिः श्रेष्ठ उच्यते ॥ ६० ॥

मौन रहने अथवा जंगलमें निवास करनेमात्रसे कोई मुनि नहीं होता। जो अपने आत्माके स्वरूपको जानता है, वही श्रेष्ठ मुनि कहलाता है ॥ ६० ॥

सर्वार्थानां व्याकरणाद् वैयाकरण उच्यते ।

तन्मूलतो व्याकरणं व्याकरोतीति तत् तथा ॥ ६१ ॥

सम्पूर्ण अर्थोंको व्याकृत ( प्रकट ) करनेके कारण ज्ञानी पुरुष ' वैयाकरण' कहलाता है । यह समस्त अर्थोंका प्रकटीकरण मूलभूत ब्रह्मसे ही होता है, अतः वही मुख्य वैयाकरण है; विद्वान् पुरुष भी इसी प्रकार अर्थोंको व्याकृत ( व्यक्त ) करता है, इसलिये वह भी वैयाकरण है ॥ ६१ ॥

प्रत्यक्षदर्शी लोकानां सर्वदर्शी भवेन्नरः ।

सत्ये वै ब्राह्मणस्तिष्ठंस्तद् विद्वान् सर्वविद् भवेत् ॥ ६२ ॥

जो ( योगी) सम्पूर्ण लोकोंको प्रत्यक्ष देख लेता है, वह मनुष्य उन सब लोकोंका द्रष्टा कहलाता है; परंतु जो एकमात्र सत्यस्वरूप ब्रह्ममें ही स्थित है, वही ब्रह्मवेत्ता ब्राह्मण सर्वज्ञ होता है ॥ ६२ ॥

धर्मादिषु स्थितोऽप्येवं क्षत्रिय ब्रह्म पश्यति ।

पृष्ठ 367

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वेदानां चानुपूर्व्येण एतद् बुद्धया ब्रवीमि ते ॥ ६३ ॥

राजन्! पूर्वोक्त धर्म आदिमें स्थित होनेसे तथा वेदोंका क्रमसे ( विधिवत्) अध्ययन करनेसे भी मनुष्य इसी प्रकार परमात्माका साक्षात्कार करता है । यह बात अपनी बुद्धिद्वारा निश्चय करके मैं तुम्हें बता रहा हूँ ॥ ६३ ॥

इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि सनत्सुजातपर्वणि सनत्सुजातवाक्ये त्रिचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४३ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत सनत्सुजातपर्वमें सनत्सुजातवाक्यविषयक तैंतालीसवाँअध्याय पूरा हुआ ॥ ४३ ॥

Fard ‘ऋग्यजुःसामभिः पूतो ब्रह्मलोके महीयते । ' (ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेदसे पवित्र होकर ब्राह्मण ब्रह्मलोकमें प्रतिष्ठित होता है; ) इत्यादि वेदवचन वेदवेत्ता ब्राह्मणोंके पवित्र एवं निष्पाप होनेकी बात कहते हैं । * जिन्होंने ऋगादि वेदोंका अध्ययन नहीं किया है, वे अनृच कहलाते हैं ।

पृष्ठ 368

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चतुश्चत्वारिंशोऽध्यायः ब्रह्मचर्य तथा ब्रह्मका निरूपण धृतराष्ट्रउवाच सनत्सुजात यामिमां परां त्वं ब्राह्मीं वाचं वदसे विश्वरूपाम् । परां हि कामेन सुदुर्लभां कथां प्रब्रूहि मे वाक्यमिदं कुमार ॥ १ ॥

धृतराष्ट्रने कहा – सनत्सुजातजी! आप जिस सर्वोत्तम और सर्वरूपा ब्रह्मसम्बन्धिनी विद्याका उपदेश कर रहे हैं, कामी पुरुषोंके लिये वह अत्यन्त दुर्लभ है । कुमार! मेरा तो यह कहना है कि आप इस उत्कृष्ट विषयका पुनः प्रतिपादन करें ॥ १ ॥

सनत्सुजात उवाच नैतद् ब्रह्म त्वरमाणेन लभ्यं यन्मां पृच्छन्नतिहृष्यतीव । बुद्धौ विलीने मनसि प्रचिन्त्या विद्या हि सा ब्रह्मचर्येण लभ्या ॥ २ ॥

सनत्सुजातने कहा — राजन्! तुम जो मुझसे बारंबार प्रश्न करते समय अत्यन्त हर्षित हो उठते हो, सो इस प्रकार जल्दबाजी करनेसे ब्रह्मकी उपलब्धि नहीं होती । बुद्धिमें मनके लय हो जानेपर सब वृत्तियोंका विरोध करनेवाली जो स्थिति है, उसका नाम है ब्रह्मविद्या और वह ब्रह्मचर्यका पालन करनेसे ही उपलब्ध होती है ॥ २ ॥

धृतराष्ट्रउवाच अत्यन्तविद्यामिति यत् सनातनीं ब्रवीषि त्वं ब्रह्मचर्येण सिद्धाम् । अनारभ्यां वसतीह कार्यकाले कथं ब्राह्मण्यममृतत्वं लभेत ॥ ३ ॥

धृतराष्ट्रने कहा- जो कर्मोंद्वारा आरम्भ होनेयोग्य नहीं है तथा कार्यके समयमें भी जो इस आत्मामें ही रहती है, उस अनन्त ब्रह्मसे सम्बन्ध रखनेवाली इस सनातन विद्याको यदि आप ब्रह्मचर्यसे ही प्राप्त होनेयोग्य बता रहे हैं तो मुझ जैसे लोग ब्रह्मसम्बन्धी अमृतत्व ( मोक्ष) को कैसे पा सकते हैं? ॥ ३ ॥

सनत्सुजात उवाच

पृष्ठ 369

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अव्यक्तविद्यामभिधास्ये पुराणीं बुद्धया च तेषां ब्रह्मचर्येण सिद्धाम् । यां प्राप्यैनं मर्त्यलोकं त्यजन्ति या वै विद्या गुरुवृद्धेषु नित्या ॥ ४ ॥

सनत्सुजातजी बोले- अब मैं ( सच्चिदानन्दघन ) अव्यक्त ब्रह्मसे सम्बन्ध रखनेवाली उस पुरातन विद्याका वर्णन करूँगा, जो मनुष्योंको बुद्धि और ब्रह्मचर्यके द्वारा प्राप्त होती है, जिसे पाकर विद्वान् पुरुष इस मरणधर्मा शरीरको सदाके लिये त्याग देते हैं तथा जो वृद्ध गुरुजनोंमें नित्य विद्यमान रहती है ॥ ४ ॥

धृतराष्ट्रउवाच

ब्रह्मचर्येण या विद्या शक्या वेदितुमञ्जसा ।

तत् कथं ब्रह्मचर्यं स्यादेतद् ब्रह्मन् ब्रवीहि मे ॥ ५ ॥

धृतराष्ट्रने कहा — ब्रह्मन्! यदि वह ब्रह्मविद्या ब्रह्मचर्यके द्वारा ही सुगमतासे जानी जा सकती है तो पहले मुझे यही बताइये कि ब्रह्मचर्यका पालन कैसे होता है? ॥ ५ ॥

सनत्सुजातउवाच आचार्ययोनिमिह ये प्रविश्य भूत्वा गर्भे ब्रह्मचर्यं चरन्ति । इहैव ते शास्त्रकारा भवन्ति प्रहाय देहं परमं यान्ति योगम् ॥ ६ ॥

सनत्सुजातजी बोले —जो लोग आचार्यके आश्रममें प्रवेश कर अपनी सेवासे उनके अन्तरंग भक्त हो ब्रह्मचर्यका पालन करते हैं, वे यहीं शास्त्रकार हो जाते हैं और देहत्यागके पश्चात् परम योगरूप परमात्माको प्राप्त होते हैं ॥ ६ ॥

अस्मिँल्लोके वै जयन्तीह कामान्

ब्राह्मीं स्थितिं ह्यनुतितिक्षमाणाः ।

त आत्मानं निर्हरन्तीह देहा- न्मुञ्जादिषीकामिव सत्त्वसंस्थाः ॥ ७ ॥

इस जगत्में जो लोग वर्तमान स्थितिमें रहते हुए ही सम्पूर्ण कामनाओंको जीत लेते हैं और ब्राह्मी स्थिति प्राप्त करनेके लिये ही नाना प्रकारके द्वन्द्वोंको सहन करते हैं, वे सत्त्वगुणमें स्थित हो यहाँ ही मूँजसे सींककी भाँति इस देहसे आत्माको ( विवेकद्वारा ) पृथक् कर लेते हैं ॥ ७ ॥

शरीरमेतौ कुरुतः पिता माता च भारत ।

आचार्यशास्ता या जातिः सा पुण्या साजरामरा ॥ ८ ॥

पृष्ठ 370

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भारत! यद्यपि माता और पिता-ये ही दोनों इस शरीरको जन्म देते हैं, तथापि आचार्यके उपदेशसे जो जन्म प्राप्त होता है, वह परम पवित्र और अजर- अमर है ॥ ८ ॥

यः प्रावृणोत्यवितथेन वर्णा- नृतं कुर्वन्नमृतं सम्प्रयच्छन् । तं मन्येत पितरं मातरं च तस्मै न द्रुह्येत् कृतमस्य जानन् ॥ ९ ॥

जो परमार्थतत्त्वके उपदेशसे सत्यको प्रकट करके अमरत्व प्रदान करते हुए ब्राह्मणादि वर्णोंकी रक्षा करते हैं, उन आचार्यको पिता-माता ही समझना चाहिये तथा उनके किये हुए उपकारका स्मरण करके कभी उनसे द्रोह नहीं करना चाहिये ॥ ९ ॥

गुरुं शिष्यो नित्यमभिवादयीत

स्वाध्यायमिच्छेच्छुचिरप्रमत्तः ।

मानं न कुर्यान्नादधीत रोष- मेष प्रथमो ब्रह्मचर्यस्य पादः ॥ १० ॥

ब्रह्मचारी शिष्यको चाहिये कि वह नित्य गुरुको प्रणाम करे, बाहर- भीतरसे पवित्र हो प्रमाद छोड़कर स्वाध्यायमें मन लगावे, अभिमान न करे, मनमें क्रोधको स्थान न दे । यह ब्रह्मचर्यका पहला चरण है ॥ १० ॥

शिष्यवृत्तिक्रमेणैव विद्यामाप्नोति यः शुचिः ।

ब्रह्मचर्यव्रतस्यास्य प्रथमः पाद उच्यते ॥ ११ ॥

जो शिष्यकी वृत्तिके क्रमसे ही जीवन- निर्वाह करता हुआ पवित्र हो विद्या प्राप्त करता है, उसका यह नियम भी ब्रह्मचर्यव्रतका पहला ही पाद कहलाता है ॥

आचार्यस्य प्रियं कुर्यात् प्राणैरपि धनैरपि ।

कर्मणा मनसा वाचा द्वितीयः पाद उच्यते ॥ १२ ॥

अपने प्राण और धन लगाकर भी मन, वाणी तथा कर्मसे आचार्यका प्रिय करे, यह दूसरा पाद कहलाता है ॥ १२ ॥

समा गुरौ यथा वृत्तिर्गुरुपत्न्यां तथाऽऽचरेत् ।

तत्युत्रे च तथा कुर्वन् द्वितीय: पाद उच्यते ॥ १३ ॥

गुरुके प्रति शिष्यका जैसा श्रद्धा और सम्मानपूर्ण बर्ताव हो, वैसा ही गुरुकी पत्नी और

पुत्रके साथ भी होना चाहिये । यह भी ब्रह्मचर्यका द्वितीय पाद ही कहलाता है ॥

आचार्येणात्मकृतं विजानन् ज्ञात्वा चार्थं भावितोऽस्मीत्यनेन । यन्मन्यते तं प्रति हृष्टबुद्धिः सवै तृतीयो ब्रह्मचर्यस्य पादः ॥ १४ ॥