03.Mahabharata Volume 3 — पृष्ठ 371–380
महाभारत — खण्ड ३ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 371–380
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आचार्यने जो अपना उपकार किया, उसे ध्यानमें रखकर तथा उससे जो प्रयोजन सिद्ध हुआ, उसका भी विचार करके मन- ही- मन प्रसन्न होकर शिष्य आचार्यके प्रति जो ऐसा भाव रखता है कि इन्होंने मुझे बड़ी उन्नत अवस्थामें पहुँचा दिया - यह ब्रह्मचर्यका तीसरा पाद है ॥ १४ ॥
नाचार्यस्यानपाकृत्य प्रवासं प्राज्ञः कुर्वीत नैतदहं करोमि । इतीव मन्येत न भाषयेत सवै चतुर्थो ब्रह्मचर्यस्य पादः ॥ १५ ॥
आचार्यके उपकारका बदला चुकाये बिना अर्थात् गुरुदक्षिणा आदिके द्वारा उन्हें संतुष्ट किये बिना विद्वान् शिष्य वहाँसे अन्यत्र न जाय । [दक्षिणा देकर या गुरुकी सेवा करके ] कभी मनमें ऐसा विचार न लावे कि मैं गुरुका उपकार कर रहा हूँ तथा मुँहसे भी कभी ऐसी बात न निकाले । यह ब्रह्मचर्यका चौथा पाद है ॥ १५ ॥
कालेन पादं लभते तथार्थं
ततश्च पादं गुरुयोगतश्च ।
उत्साहयोगेन च पादमृच्छे- च्छास्त्रेण पादं च ततोऽभियाति ॥ १६ ॥
सनातनी विद्याके कुछ अंशको तथा उसके मर्मको तो मनुष्य समयके योगसे प्राप्त करता है, कुछ अंशको गुरुके सम्बन्धसे तथा कुछ अंशको अपने उत्साहके सम्बन्धसे और कुछ अंशको परस्पर शास्त्र के विचारसे प्राप्त करता है ॥ १६ ॥
धर्मादयो द्वादश यस्य रूप- मन्यानि चाङ्गानि तथा बलं च ।
आचार्ययोगे फलतीति चाहु- ब्रह्मार्थयोगेन च ब्रह्मचर्यम् ॥ १७ ॥
पूर्वोक्त धर्मादि बारह गुण जिसके स्वरूप हैं तथा और भी जो धर्मके अंग एवं सामर्थ्य हैं, वे भी जिसके स्वरूप हैं, वह ब्रह्मचर्य आचार्यके सम्बन्धसे प्राप्त वेदार्थके ज्ञानसे सफल होता है, ऐसा कहा जाता है ॥ एवं प्रवृत्तो यदुपालभेत वै धनमाचार्याय तदनुप्रयच्छेत् । सतां वृत्तिं बहुगुणामेवमेति गुरोः पुत्रे भवति च वृत्तिरेषा ॥ १८ ॥
इस तरह ब्रह्मचर्यपालनमें प्रवृत्त हुए ब्रह्मचारीको चाहिये कि जो कुछ भी धन ( जीवननिर्वाहयोग्य वस्तुएँ) भिक्षामें प्राप्त हो, उसे आचार्यको अर्पण कर दे । ऐसा करनेसे
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वह शिष्य सत्पुरुषोंके अनेक गुणोंसे युक्त आचारको प्राप्त होता है। गुरुपुत्रके प्रति भी उसकी यही भावना रहनी चाहिये ॥ १८ ॥
एवं वसन् सर्वतो वर्धतीह बहून् पुत्राँल्लभते च प्रतिष्ठाम् । वर्षन्ति चास्मै प्रदिशो दिशश्च वसन्त्यस्मिन् ब्रह्मचर्ये जनाश्च ॥ १ ९ ॥ ऐसी वृत्तिसे गुरुगृहमें रहनेवाले शिष्यकी इस संसारमें सब प्रकारसे उन्नति होती है । वह ( गृहस्थाश्रममें प्रवेश करके ) बहुत-से पुत्र और प्रतिष्ठा प्राप्त करता है । सम्पूर्ण दिशा-विदिशाएँ उसके लिये सुखकी वर्षा करती हैं तथा उसके निकट बहुत- से दूसरे लोग ब्रह्मचर्यपालनके लिये निवास करते हैं ॥ १ ९ ॥
एतेन ब्रह्मचर्येण देवा देवत्वमाप्नुवन् ।
ऋषयश्च महाभागा ब्रह्मलोकं मनीषिणः ॥ २० ॥
इस ब्रह्मचर्यके पालनसे ही देवताओंने देवत्व प्राप्त किया और महान् सौभाग्यशाली मनीषी ऋषियोंने ब्रह्मलोकको प्राप्त किया ॥ २० ॥
गन्धर्वाणामनेनैव रूपमप्सरसामभूत् ।
एतेन ब्रह्मचर्येण सूर्योऽप्यह्नाय जायते ॥ २१ ॥
इसीके प्रभावसे गन्धर्वों और अप्सराओंको दिव्य रूप प्राप्त हुआ । इस ब्रह्मचर्यके ही प्रतापसे सूर्यदेव समस्त लोकोंको प्रकाशित करनेमें समर्थ होते हैं ॥
आकाङ्क्ष्यार्थस्य संयोगाद् रसभेदार्थिनामिव ।
एवं ह्येते समाज्ञाय तादृग्भावं गता इमे ॥ २२ ॥
रसभेदरूप चिन्तामणिसे याचना करनेवालोंको जैसे उनके अभीष्ट अर्थकी प्राप्ति होती है, उसी प्रकार ब्रह्मचर्य भी मनोवांछित वस्तु प्रदान करनेवाला है । ऐसा समझकर ये ऋषि-देवता आदि ब्रह्मचर्यके पालनसे वैसे भावको प्राप्त हुए ॥ २२ ॥
य आश्रयेत् पावयेच्चापि राजन् सर्वं शरीरं तपसा तप्यमानः । एतेन वै बाल्यमभ्येति विद्वान् मृत्युं तथा स जयत्यन्तकाले ॥ २३ ॥
राजन्! जो इस ब्रह्मचर्यका आश्रय लेता है, वह ब्रह्मचारी यम- नियमादि तपका आचरण करता हुआ अपने सम्पूर्ण शरीरको भी पवित्र बना लेता है तथा इससे विद्वान् पुरुष निश्चय ही अबोध बालककी भाँति राग- द्वेषसे शून्य हो जाता है और अन्त समयमें वह मृत्युको भी जीत लेता है ॥ २३ ॥
अन्तवतः क्षत्रिय ते जयन्ति लोकान् जनाः कर्मणा निर्मलेन ।
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ब्रह्मैव विद्वांस्तेन चाभ्येति सर्वं नान्यः पन्था अयनाय विद्यते ॥ २४ ॥
राजन्! सकाम पुरुष अपने पुण्यकर्मोंके द्वारा नाशवान् लोकोंको ही प्राप्त करते हैं; किंतु जो ब्रह्मको जाननेवाला विद्वान् है, वही उस ज्ञानके द्वारा सर्वरूप परमात्माको प्राप्त होता है । मोक्षके लिये ज्ञानके सिवा दूसरा कोई मार्ग नहीं है ॥ २४ ॥
धृतराष्ट्रउवाच आभाति शुक्लमिव लोहितमिवाथो कृष्णमथाञ्जनं काद्रवं वा । सद्ब्रह्मणः पश्यति योऽत्र विद्वान् कथं रूपं तदमृतमक्षरं पदम् ॥ २५ ॥
धृतराष्ट्र बोले- विद्वान् पुरुष यहाँ सत्यस्वरूप परमात्माके जिस अमृत एवं अविनाशी परमपदका साक्षात्कार करते हैं, उसका रूप कैसा है? क्या वह सफेद -सा, लाल- सा, काजल - सा काला या सुवर्ण- जैसे पीले रंगका प्रतीत होता है? ॥ २५ ॥
सनत्सुजात उवाच आभाति शुक्लमिव लोहितमिवाथो कृष्णमायसमर्कवर्णम् । न पृथिव्यां तिष्ठति नान्तरिक्षे नैतत् समुद्रे सलिलं बिभर्ति ॥ २६ ॥
सनत्सुजातने कहा —यद्यपि श्वेत, लाल, काले, लोहेके सदृश अथवा सूर्यके समान प्रकाशमान अनेकों प्रकारके रूप प्रतीत होते हैं, तथापि ब्रह्मका वास्तविक रूप न पृथ्वीमें है, न आकाशमें । समुद्रका जल भी उस रूपको नहीं धारण करता ॥ २६ ॥
न तारकासु न च विद्युदाश्रितं न चाभ्रेषु दृश्यते रूपमस्य । न चापि वायौ न च देवतासु नैतच्चन्द्रे दृश्यते नोत सूर्ये ॥ २७ ॥
इस ब्रह्मका वह रूप न तारोंमें है, न बिजलीके आश्रित है और न बादलोंमें ही दिखायी देता है । इसी प्रकार वायु, देवगण, चन्द्रमा और सूर्यमें भी वह नहीं देखा जाता ॥ नैवर्क्षे तन्न यजुष्षु नाप्यथर्वसु न दृश्यते वै विमलेषु सामसु । रथन्तरे बार्हद्रथे वापि राजन् महाव्रते नैव दृश्येद् ध्रुवं तत् ॥ २८ ॥
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राजन्! ऋग्वेदकी ऋचाओंमें, यजुर्वेदके मन्त्रोंमें, अथर्ववेदके सूक्तोंमें तथा विशुद्ध सामवेदमें भी वह नहीं दृष्टिगोचर होता । रथन्तर और बार्हद्रथ नामक साममें तथा महान् व्रतमें भी उसका दर्शन नहीं होता; क्योंकि वह ब्रह्म नित्य है ॥ २८ ॥
अपारणीयं तमसः परस्तात् तदन्तकोऽप्येति विनाशकाले । अणीयो रूपं क्षुरधारया समं महच्च रूपं तद् वै पर्वतेभ्यः ॥ २ ९ ॥ ब्रह्मके उस स्वरूपका कोई पार नहीं पा सकता । वह अज्ञानरूप अन्धकारसे सर्वथा अतीत है । महाप्रलयमें सबका अन्त करनेवाला काल भी उसीमें लीन हो जाता है । वह रूप अस्तुरेकी धारके समान अत्यन्त सूक्ष्म और पर्वतोंसे भी महान् है ( अर्थात् वह सूक्ष्मसे भी सूक्ष्मतर और महान्से भी महान् है ) ॥ २ ९ ॥
सा प्रतिष्ठा तदमृतं लोकास्तद् ब्रह्म तद् यशः ।
भूतानि जज्ञिरे तस्मात् प्रलयं यान्ति तत्र हि ॥ ३० ॥
वही सबका आधार है, वही अमृत है, वही लोक, वही यश तथा वही ब्रह्म है । सम्पूर्ण भूत उसीसे प्रकट हुए और उसीमें लीन होते हैं ॥ ३० ॥
अनामयं तन्महदुद्यतं यशो वाचो विकारं कवयो वदन्ति । यस्मिन् जगत् सर्वमिदं प्रतिष्ठितं ये तद् विदुरमृतास्ते भवन्ति ॥ ३१ ॥
विद्वान् कहते हैं, कार्यरूप जगत् वाणीका विकारमात्र है; किंतु जिसमें यह सम्पूर्ण जगत् प्रतिष्ठित है, वह ब्रह्म रोग, शोक और पापसे रहित है और उसका महान् यश सर्वत्र फैला हुआ है । उस नित्य कारण- स्वरूप ब्रह्मको जो जानते हैं, वे अमर हो जाते हैं अर्थात् मुक्त हो जाते हैं ॥ ३१ ॥
इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि सनत्सुजातपर्वणि सनत्सुजातवाक्ये चतुश्चत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४४ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत सनत्सुजातपर्वमें सनत्सुजातवाक्यविषयक चौवालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ४४ ॥
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पञ्चचत्वारिंशोऽध्यायः गुण - दोषोंके लक्षणोंका वर्णन और ब्रह्मविद्याका प्रतिपादन सनत्सुजात उवाच
शोकः क्रोधश्च लोभश्च कामो मानः परासुता ।
ईर्ष्या मोहो विधित्सा च कृपासूया जुगुप्सुता ॥ १ ॥
द्वादशैते महादोषा मनुष्यप्राणनाशनाः । सनत्सुजातजी कहते हैं - राजन्! शोक, क्रोध, लोभ, काम, मान, अत्यन्त निद्रा, ईर्ष्या, मोह, तृष्णा, कायरता, गुणोंमें दोष देखना और निन्दा करना – ये बारह महान् दोष मनुष्योंके प्राणनाशक हैं ॥ १३ ॥
एकैकमेते राजेन्द्र मनुष्यान् पर्युपासते ।
यैराविष्टो नरः पापं मूढसंज्ञो व्यवस्यति ॥ २ ॥
राजेन्द्र! क्रमशः एकके पीछे दूसरा आकर ये सभी दोष मनुष्योंको प्राप्त होते जाते हैं, जिनके वशमें होकर मूढ़बुद्धि मानव पापकर्म करने लगता है ॥ २ ॥
स्पृहयालुरुग्रः परुषो वा वदान्यः क्रोधं बिभ्रन्मनसा वै विकत्थी । नृशंसधर्माः षडिमे जना वै प्राप्याप्यर्थं नोत सभाजयन्ते ॥ ३ । लोलुप, क्रूर, कठोरभाषी, कृपण, मन- ही- मन क्रोध करनेवाले और अधिक आत्मप्रशंसा करनेवाले - ये छः प्रकारके मनुष्य निश्चय ही क्रूर कर्म करनेवाले होते हैं । ये प्राप्त हुई सम्पत्तिका उचित उपयोग नहीं करते ॥ ३ ॥
सम्भोगसंविद् विषमोऽतिमानी दत्त्वा विकत्थी कृपणो दुर्बलश्च । बहुप्रशंसी वन्दितद्विट् सदैव सप्तैवोक्ताः पापशीला नृशंसाः ॥ ४ ॥
सम्भोगमें मन लगानेवाले, विषमता रखनेवाले, अत्यन्त अभिमानी, दान देकर आत्मश्लाघा करनेवाले, कृपण, असमर्थ होकर भी अपनी बहुत बड़ाई करनेवाले और सम्मान्य पुरुषोंसे सदा द्वेष रखनेवाले – ये सात प्रकारके मनुष्य ही पापी और क्रूर कहे गये हैं ॥ ४ ॥
धर्मश्च सत्यं च तपो दमश्च अमात्सर्यं ह्रीस्तितिक्षानसूया । दानं श्रुतं चैव धृतिः क्षमा च
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महाव्रता द्वादश ब्राह्मणस्य ॥ ५ ॥
धर्म, सत्य, तप, इन्द्रियसंयम, डाह न करना, लज्जा, सहनशीलता, किसीके दोष न देखना, दान, शास्त्रज्ञान, धैर्य और क्षमा — ये ब्राह्मणके बारह महान् व्रत हैं ॥ ५ ॥
यो नैतेभ्यः प्रच्यवेद् द्वादशभ्यः सर्वामपीमां पृथिवीं स शिष्यात् । त्रिभिर्द्वाभ्यामेकतो वान्वितो यो नास्य स्वमस्तीति च वेदितव्यम् ॥ ६ ॥
जो इन बारह व्रतोंसे कभी च्युत नहीं होता, वह इस सम्पूर्ण पृथ्वीपर शासन कर सकता है । इनमेंसे तीन, दो या एक गुणसे भी जो युक्त है, उसका अपना कुछ भी नहीं होता- ऐसा समझना चाहिये ( अर्थात् उसकी किसी भी वस्तुमें ममता नहीं होती ) ॥ ६ ॥
दमस्त्यागोऽथाप्रमाद इत्येतेष्वमृतं स्थितम् ।
एतानि ब्रह्ममुख्यानां ब्राह्मणानां मनीषिणाम् ॥ ७ ॥
इन्द्रियनिग्रह, त्याग और अप्रमाद – इनमें अमृतकी स्थिति है । ब्रह्म ही जिनका प्रधान लक्ष्य है, उन बुद्धिमान् ब्राह्मणोंके ये ही मुख्य साधन हैं ॥ ७ ॥
सद् वासद् वा परीवादो ब्राह्मणस्य न शस्यते ।
नरकप्रतिष्ठास्ते वै स्युर्य एवं कुर्वते जनाः ॥ ८ ॥
सच्ची हो या झूठी, दूसरोंकी निन्दा करना ब्राह्मणको शोभा नहीं देता। जो लोग दूसरोंकी निन्दा करते हैं, वे अवश्य ही नरकमें पड़ते हैं ॥ ८ ॥
मदोऽष्टादशदोषः स स्यात् पुरा योऽप्रकीर्तितः ।
लोकद्वेष्यं प्रातिकूल्यमभ्यसूया मृषा वचः ॥ ९ ॥
मदके अठारह दोष हैं, जो पहले सूचित करके भी स्पष्टरूपसे नहीं बताये गये थे— लोकविरोधी कार्य करना, शास्त्रके प्रतिकूल आचरण करना, गुणियोंपर दोषारोपण, असत्यभाषण ॥ ९ ॥
कामक्रोधौ पारतन्त्र्यं परिवादोऽथ पैशुनम् ।
अर्थहानिर्विवादश्च मात्सर्यं प्राणिपीडनम् ॥ १० ॥
काम, क्रोध, पराधीनता, दूसरोंके दोष बताना, चुगली करना, धनका ( दुरुपयोगसे ) नाश, कलह, डाह, प्राणियोंको कष्ट पहुँचाना ॥ १० ॥
ईर्ष्या मोदोऽतिवादश्च संज्ञानाशोऽभ्यसूयिता ।
तस्मात् प्राज्ञो न माद्येत सदा ह्येतद् विगर्हितम् ॥ ११ ॥
ईर्ष्या, हर्ष, बहुत बकवाद, विवेकशून्यता तथा गुणोंमें दोष देखनेका स्वभाव । इसलिये विद्वान् पुरुषको मदके वशीभूत नहीं होना चाहिये; क्योंकि सत्पुरुषोंने इस मदको सदा ही निन्दित बताया है ॥ ११ ॥
सौहृदे वै षड् गुणा वेदितव्याः
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प्रिये हृष्यन्त्यप्रिये च व्यथन्ते । स्यादात्मनः सुचिरं याचते यो
ददात्ययाच्यमपि देयं खलु स्यात् ।
इष्टान् पुत्रान् विभवान् स्वांश्चदारा- नभ्यर्थितश्चार्हति शुद्धभावः ॥ १२ ॥
सौहार्द ( मित्रता ) -के छः गुण हैं, जो अवश्य ही जाननेयोग्य हैं। सुहृद्वा प्रिय होनेपर हर्षित होना और अप्रिय होनेपर कष्टका अनुभव करना - ये दो गुण हैं । तीसरा गुण यह है कि अपना जो कुछ चिरसंचित धन है, उसे मित्रके माँगनेपर दे डाले। मित्रके लिये अयाच्य वस्तु भी अवश्य देनेयोग्य हो जाती है और तो क्या, सुहृद् माँगनेपर वह शुद्धभावसे अपने प्रिय पुत्र, वैभव तथा पत्नीको भी उसके हितके लिये निछावर कर देता है ॥ १२ ॥
त्यक्तद्रव्यः संवसेन्नेह कामाद् भुङ्क्ते कर्म स्वाशिषं बाधते च ॥ १३ ॥
मित्रको धन देकर उसके यहाँ प्रत्युपकार पानेकी कामनासे निवास न करे — यह चौथा गुण है। अपने परिश्रमसे उपार्जित धनका उपभोग करे ( मित्रकी कमाईपर अव - लम्बित न रहे ) – यह पाँचवाँ गुण है तथा मित्रकी भलाईके लिये अपने भलेकी परवा न करे – यह छठा गुण है ॥ १३ ॥
द्रव्यवान् गुणवानेवं त्यागी भवति सात्त्विकः ।
पञ्च भूतानि पञ्चभ्यो निवर्तयति तादृशः ॥ १४ ॥
जो धनी गृहस्थ इस प्रकार गुणवान्, त्यागी और सात्त्विक होता है, वह अपनी पाँचों इन्द्रियोंसे पाँचों विषयोंको हटा देता है ॥ १४ ॥
एतत् समृद्धमप्यूर्ध्वं तपो भवति केवलम् ।
सत्त्वात् प्रच्यवमानानां संकल्पेन समाहितम् ॥ १५ ॥
जो ( वैराग्यकी कमीके कारण) सत्त्वसे भ्रष्ट हो गये हैं, ऐसे मनुष्योंके दिव्य लोकोंकी प्राप्तिके संकल्पसे संचित किया हुआ यह इन्द्रियनिग्रहरूप तप समृद्ध होनेपर भी केवल ऊर्ध्वलोकोंकी प्राप्तिका कारण होता है [ मुक्तिका नहीं ] ॥ १५ ॥
यतो यज्ञाः प्रवर्धन्ते सत्यस्यैवावरोधनात् ।
मनसान्यस्य भवति वाचान्यस्याथ कर्मणा ॥ १६ ॥
क्योंकि सत्यस्वरूप ब्रह्मका बोध न होनेसे ही इन सकाम यज्ञोंकी वृद्धि होती है । किसीका यज्ञ मनसे, किसीका वाणीसे और किसीका क्रियाके द्वारा सम्पन्न होता ॥ १६ ॥
संकल्पसिद्धं पुरुषमसंकल्पोऽधितिष्ठति ।
ब्राह्मणस्य विशेषण किञ्चान्यदपि मे शृणु ॥ १७ ॥
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संकल्पसिद्ध अर्थात् सकामपुरुषसे संकल्परहित यानी निष्कामपुरुषकी स्थिति ऊँची होती है; किंतु ब्रह्मवेत्ताकी स्थिति उससे भी विशिष्ट है । इसके सिवा एक बात और बताता हूँ, सुनो ॥ १७ ॥
अध्यापयेन्महदेतद् यशस्यं वाचो विकाराः कवयो वदन्ति । अस्मिन् योगे सर्वमिदं प्रतिष्ठितं ये तद् विदुरमृतास्ते भवन्ति ॥ १८ ॥
यह महत्त्वपूर्ण शास्त्र परम यशरूप परमात्माकी प्राप्ति करानेवाला है, इसे शिष्योंको अवश्य पढ़ाना चाहिये । परमात्मासे भिन्न यह सारा दृश्य- प्रपंच वाणीका विकारमात्र है-ऐसा विद्वान् लोग कहते हैं । इस योगशास्त्रमें यह परमात्मविषयक सम्पूर्ण ज्ञान प्रतिष्ठित है; इसे जो जान लेते हैं, वे अमर हो जाते हैं अर्थात् जन्म- मरणसे मुक्त हो जाते ॥ १८ ॥
न कर्मणा सुकृतेनैव राजन् सत्यं जयेज्जुहुयाद् वा यजेद् वा । नैतेन बालोऽमृत्युमभ्येति राजन् रतिं चासौ न लभत्यन्तकाले ॥ १ ९ ॥ राजन्! ( निष्कामभावके बिना किये हुए) केवल पुण्यकर्मके द्वारा सत्यस्वरूप ब्रह्मको नहीं जीता जा सकता । अथवा जो हवन या यज्ञ किया जाता है, उससे भी अज्ञानी पुरुष अमरत्व — मुक्तिको नहीं पा सकता तथा अन्तकालमें उसे शान्ति भी नहीं मिलती ॥ १ ९ ॥
तूष्णीमेक उपासीत चेष्टेत मनसापि न ।
तथा संस्तुतिनिन्दाभ्यां प्रीतिरोषौ विवर्जयेत् ॥ २० ॥
इसलिये सब प्रकारकी चेष्टासे रहित होकर एकान्तमें उपासना करे, मनसे भी कोई चेष्टा न होने दे तथा स्तुतिमें राग और निन्दामें द्वेष न करे ॥ २० ॥
अत्रैव तिष्ठन् क्षत्रिय ब्रह्माविशति पश्यति ।
वेदेषु चानुपूर्व्येण एतद् विद्वन् ब्रवीमि ते ॥ २१ ॥
राजन्! उपर्युक्त साधन करनेसे मनुष्य यहाँ ही ब्रह्मका साक्षात्कार करके उसमें विलीन हो जाता है । विद्वन्! वेदोंमें क्रमशः विचार करके जो मैंने जाना है, वही तुम्हें बता रहा ॥ २१ ॥
इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि सनत्सुजातपर्वणि सनत्सुजातवाक्ये पञ्चचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४५ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत सनत्सुजातपर्वमें सनत्सुजातवाक्यविषयक पैंतालीसवाँअध्याय पूरा हुआ ॥ ४५ ॥
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षट्चत्वारिंशोऽध्यायः परमात्माके स्वरूपका वर्णन और योगीजनोंके द्वारा उनके साक्षात्कारका प्रतिपादन सनत्सुजातउवाच यत् तच्छुक्रं महज्ज्योतिर्दीप्यमानं महद् यशः ।
तद् वै देवा उपासते तस्मात् सूर्यो विराजते ।
योगिनस्तं प्रपश्यन्ति भगवन्तं सनातनम् ॥ १ ॥
सनत्सुजातजी कहते हैं - राजन्! जो शुद्ध ब्रह्म है, वह महान् ज्योतिर्मय, देदीप्यमान एवं विशाल यशरूप है । सब देवता उसीकी उपासना करते हैं । उसीके प्रकाशसे सूर्य प्रकाशित होते हैं, उस सनातन भगवान्का योगीजन साक्षात्कार करते हैं ॥ १ ॥
शुक्राद् ब्रह्म प्रभवति ब्रह्म शुक्रेण वर्धते ।
तच्छुक्रं ज्योतिषां मध्येऽतप्तं तपति तापनम् ।
योगिनस्तं प्रपश्यन्ति भगवन्तं सनातनम् ॥ २ ॥
शुद्ध सच्चिदानन्द परब्रह्मसे हिरण्यगर्भकी उत्पत्ति होती है तथा उसीसे वह वृद्धिको प्राप्त होता है । वह शुद्ध ज्योतिर्मय ब्रह्म ही सूर्यादि सम्पूर्ण ज्योतियोंके भीतर स्थित होकर सबको प्रकाशित कर रहा है और तपा रहा है; वह स्वयं सब प्रकारसे अतप्त और स्वयंप्रकाश है, उसी सनातन भगवान्का योगीजन साक्षात्कार करते हैं ॥ २ ॥
अपोऽथ अद्भयः सलिलस्य मध्ये उभौ देवौ शिश्रियातेऽन्तरिक्षे ।
अतन्द्रितः सवितुर्विवस्वा- भौ बिभर्ति पृथिवीं दिवं च ।
योगिनस्तं प्रपश्यन्ति भगवन्तं सनातनम् ॥ ३ ॥
जलकी भाँति एकरस परब्रह्म परमात्मामें स्थित पाँच सूक्ष्म महाभूतोंसे अत्यन्त स्थूल पांचभौतिक शरीरके हृदयाकाशमें दो देव-ईश्वर और जीव उसको आश्रय बनाकर रहते हैं । सबको उत्पन्न करनेवाला सर्वव्यापी परमात्मा सदैव जाग्रत् रहता है । वही इन दोनोंको तथा पृथ्वी और द्युलोकको भी धारण करता है । उस सनातन भगवान्का योगीजन साक्षात्कार करते हैं ॥ ३ ॥
उभौ च देवौ पृथिवीं दिवं च
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दिशः शुक्रो भुवनं बिभर्ति । तस्माद् दिशः सरितश्च स्रवन्ति
तस्मात् समुद्रा विहिता महान्ताः ।
योगिनस्तं प्रपश्यन्ति भगवन्तं सनातनम् ॥ ४ ॥
उक्त दोनों देवताओंको, पृथ्वी और आकाशको, सम्पूर्ण दिशाओंको तथा समस्त लोकसमुदायको वह शुद्ध ब्रह्म ही धारण करता है । उसी परब्रह्मसे दिशाएँ प्रकट हुई हैं, उसीसे सरिताएँ प्रवाहित होती हैं तथा उसीसे बड़े - बड़े समुद्र प्रकट हुए हैं । उस सनातन भगवान्का योगीजन साक्षात्कार करते हैं ॥ ४ ॥
चक्रे रथस्य तिष्ठन्तोऽध्रुवस्याव्ययकर्मणः ।
केतुमन्तं वहन्त्यश्वास्तं दिव्यमजरं दिवि ।
योगिनस्तं प्रपश्यन्ति भगवन्तं सनातनम् ॥ ५ ॥
जो इन्द्रिय, मन और बुद्धि आदिका संघात - शरीर विनाशशील है, जिसके कर्म अपने - आप नष्ट होनेवाले नहीं हैं, ऐसे इस शरीररूप रथके चक्रकी भाँति इसे घुमानेवाले कर्मसंस्कारसे युक्त मनमें जुते हुए इन्द्रियरूप घोड़े उस हृदयाकाशमें स्थित ज्ञानस्वरूप दिव्य अविनाशी जीवात्माको जिस सनातन परमेश्वरके निकट ले जाते हैं, उस सनातन भगवान्का योगीजन साक्षात्कार करते हैं ॥ ५ ॥
न सादृश्ये तिष्ठति रूपमस्य न चक्षुषा पश्यति कश्चिदेनम् । मनीषयाथो मनसा हृदा च
य एनं विदुरमृतास्ते भवन्ति ।
योगिनस्तं प्रपश्यन्ति भगवन्तं सनातनम् ॥ ६ ॥
उस परमात्माका स्वरूप किसी दूसरेकी तुलनामें नहीं आ सकता; उसे कोई चर्मचक्षुओंसे नहीं देख सकता । जो निश्चयात्मिका बुद्धिसे, मनसे और हृदयसे उसे जान लेते हैं, वे अमर हो जाते हैं अर्थात् परमात्माको प्राप्त हो जाते हैं । उस सनातन भगवान्का योगीजन साक्षात्कार करते हैं ॥ ६ ॥
द्वादशपूगां सरितं पिबन्तो देवरक्षिताम् ।
मध्वीक्षन्तश्च ते तस्याः संचरन्तीह घोराम् ।
योगिनस्तं प्रपश्यन्ति भगवन्तं सनातनम् ॥ ७ ॥
जो दस इन्द्रियाँ, मन और बुद्धि – इन बारहके समुदायसे युक्त है तथा जो परमात्मासे सुरक्षित है, उस संसाररूप भयंकर नदीके विषयरूप मधुर जलको