03.Mahabharata Volume 3 — पृष्ठ 391–400

महाभारत — खण्ड ३ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 391–400

पृष्ठ 391

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द्वारपालके इतना कहते ही कानोंमें कुण्डल धारण किये संजय रथसे नीचे उतरकर राजसभाके निकट आया और महामना महीपालोंसे भरी हुई उस सभाके भीतर प्रविष्ट हुआ ॥ १४ ॥

संजय उवाच

प्राप्तोऽस्मि पाण्डवान् गत्वा तं विजानीत कौरवाः ।

यथावयः कुरून् सर्वान् प्रतिनन्दन्ति पाण्डवाः ॥ १५ ॥

संजयने कहा— कौरवो! आपको विदित होना चाहिये कि मैं पाण्डवोंके यहाँ जाकर लौटा हूँ। पाण्डवलोग अवस्थाक्रमके अनुसार सभी कौरवोंका अभिनन्दन करते हैं ॥ १५ ॥

अभिवादयन्ति वृद्धांश्च वयस्यांश्च वयस्यवत् ।

यूनश्चाभ्यवदन् पार्थाः प्रतिपूज्य यथावयः ॥ १६ ॥

उन्होंने बड़े - बूढ़ोंको प्रणाम कहलाया है । जो समवयस्क हैं, उनके साथ मित्रोचित बर्तावका संदेश दिया है तथा नवयुवकोंको भी उनकी अवस्थाके अनुसार सम्मान देकर उनसे प्रेमालापकी इच्छा प्रकट की है ॥ १६ ॥

यथाहं धृतराष्ट्रेण शिष्टः पूर्वमितो गतः ।

अब्रुवं पाण्डवान् गत्वा तन्निबोधत पार्थिवाः ॥ १७ ॥

( अब्रूतां तत्र धर्मेण वासुदेवधनंजयौ । ) पहले यहाँसे जाते समय महाराज धृतराष्ट्रने मुझे जैसा उपदेश दिया था, पाण्डवोंके पास जाकर मैंने वैसी ही बातें कही हैं । राजाओ! अब भगवान् श्रीकृष्ण और अर्जुनने जो धर्मके अनुकूल उत्तर दिया है, उसे आपलोग ध्यान देकर सुनें ॥ १७ ॥

इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि यानसंधिपर्वणि संजयप्रत्यागमने सप्तचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४७ ॥

इसप्रकार श्रीमहाभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत यानसंधिपर्वमें संजयके लौटनेसे सम्बन्ध रखनेवाला सैंतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ४७ ॥

[दाक्षिणात्य अधिक पाठका श्लोक मिलाकर कुल १७ श्लोक हैं । ]

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अष्टचत्वारिंशोऽध्यायः संजयका कौरवसभामें अर्जुनका संदेश सुनाना धृतराष्ट्रउवाच पृच्छामि त्वां संजय राजमध्ये किमब्रवीद् वाक्यमदीनसत्त्वः । धनंजयस्तात युधां प्रणेता दुरात्मनां जीवितच्छिन्महात्मा ॥ १ ॥

धृतराष्ट्रने कहा – संजय! मैं इन राजाओंके बीच तुमसे यह पूछ रहा हूँ कि अनेक युद्धोंके संचालक तथा दुरात्माओंके जीवनका नाश करनेवाले उदारहृदय महात्मा अर्जुनने हमारे लिये कौन - सा संदेश भेजा है? ॥ १ ॥

संजय उवाच दुर्योधनो वाचमिमां शृणोतु यदब्रवीदर्जुनो योत्स्यमानः । युधिष्ठिरस्यानुमते महात्मा धनंजयः शृण्वतः केशवस्य ॥ २ ॥

संजय बोला — राजन्! युधिष्ठिरकी आज्ञासे युद्धके लिये उद्यत हुए महात्मा अर्जुनने भगवान् श्रीकृष्णके सुनते- सुनते जो बात कही है, उसे दुर्योधन सुनें ॥ २ ॥

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अन्वत्रस्तो बाहुवीर्यं विदान उपह्वरे वासुदेवस्य धीरः । अवोचन्मां योत्स्यमानः किरीटी मध्ये ब्रूया धार्तराष्ट्रं कुरूणाम् ॥ ३ ॥

संशृण्वतस्तस्य दुर्भाषिणो वै दुरात्मनः सूतपुत्रस्य सूत । यो योद्धुमाशंसति मां सदैव मन्दप्रज्ञः कालपक्वोऽतिमूढः ॥ ४ ॥

ये वै राजानः पाण्डवायोधनाय समानीताः शृण्वतां चापि तेषाम् । यथा समग्रं वचनं मयोक्तं सहामात्यं श्रावयेथा नृपं तत् ॥ ५ ॥

अपने बाहुबलको अच्छी तरह जाननेवाले धीर- वीर किरीटधारी अर्जुनने भावी युद्धके लिये उद्यत हो भगवान् श्रीकृष्णके समीप मुझसे इस प्रकार कहा है- ' संजय! जो कालके

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गालमें जानेवाला, मन्दबुद्धि एवं महामूर्ख सदा मेरे साथ युद्ध करनेके लिये डींग हाँकता रहता है, उस कटुभाषी दुरात्मा सूतपुत्र कर्णको सुनाकर तथा और भी जो - जो राजालोग पाण्डवोंके साथ युद्ध करनेके लिये बुलाये गये हैं, उन सबको सुनाते हुए तुम कौरवोंकी मण्डलीमें मेरे द्वारा कही हुई सारी बातें मन्त्रियोंसहित धृतराष्ट्रपुत्र राजा दुर्योधनसे इस प्रकार कहना, जिससे वह अच्छी तरह सुन ले’– ॥ ३–५ ॥ यथा नूनं देवराजस्य देवाः शुश्रूषन्ते वज्रहस्तस्य सर्वे । तथाशृण्वन् पाण्डवाः सृजयाश्च किरीटिना वाचमुक्तां समर्थाम् ॥ ६ ॥

जैसे सब देवता वज्रधारी देवराज इन्द्रकी बातें सुनना चाहते हैं, निश्चय ही उसी प्रकार समस्त सृ॑जय और पाण्डव अर्जुनकी मुझसे कही हुई ओजभरी बातें सुन रहे थे ॥ ६ ॥

इत्यब्रवीदर्जुनो योत्स्यमानो गाण्डीवधन्वा लोहितपद्मनेत्रः । न चेद् राज्यं मुञ्चति धार्तराष्ट्रो युधिष्ठिरस्याजमीढस्य राज्ञः ॥ ७ ॥

अस्ति नूनं कर्म कृतं पुरस्ता- दनिर्विष्टं पापकं धार्तराष्ट्रैः । उस समय गाण्डीवधारी अर्जुन युद्धके लिये उत्सुक जान पड़ते थे । उनके कमलसदृश नेत्र लाल हो गये थे । उन्होंने इस प्रकार कहा –' यदि दुर्योधन अजमीढकुलनन्दन महाराज युधिष्ठिरका राज्य नहीं छोड़ता है तो निश्चय ही धृतराष्ट्रके पुत्रोंका पूर्वजन्ममें किया हुआ कोई ऐसा पापकर्म प्रकट हुआ है, जिसका फल उन्हें भोगना है ॥ ७३ ॥

येषां युद्धं भीमसेनार्जुनाभ्यां तथाश्विभ्यां वासुदेवेन चैव ॥ ८ ॥

शैनेयेन ध्रुवमात्तायुधेन धृष्टद्युम्नेनाथ शिखण्डिना च । युधिष्ठिरेणेन्द्रकल्पेन चैव योऽपध्यानान्निर्दहेद् गां दिवं च ॥ ९ ॥

तभी तो उनका भीमसेन, अर्जुन, नकुल सहदेव, भगवान् श्रीकृष्ण, अस्त्र- शस्त्रोंसे सुसज्जित सात्यकि, धृष्टद्युम्न, शिखण्डी तथा इन्द्रके समान तेजस्वी उन महाराज युधिष्ठिरके साथ युद्ध होनेवाला है, जो अनिष्टचिन्तन करते ही पृथ्वी तथा स्वर्गलोकको भी भस्म कर सकते हैं ॥ ८ - ९ ॥ तैश्चेद् योद्धुं मन्यते धार्तराष्ट्रो निर्वृत्तोऽर्थःसकलःपाण्डवानाम् ।

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मा तत् कार्षीः पाण्डवस्यार्थहेतो- रुपैहि युद्धं यदि मन्यसे त्वम् ॥ १० ॥

यदि दुर्योधन चाहता है कि इन सब वीरोंके साथ कौरवोंका युद्ध हो तो ठीक है, इससे पाण्डवोंका सारा मनोरथ सिद्ध हो जायगा । तुम केवल पाण्डवोंके लाभके लिये संधि कराने या आधा राज्य दिलानेकी चेष्टा न करना । उस दशामें यदि ठीक समझो तो उससे कह देना —'दुर्योधन! तुम युद्धभूमिमें ही उतरो ॥ १० ॥

यां तां वने दुःखशय्यामवात्सीत्

प्रव्राजितः पाण्डवो धर्मचारी ।

आप्नोतु तां दुःखतरामनर्था- मन्त्यां श्य्यां धार्तराष्ट्रः परासुः ॥ ११ ॥

धर्मात्मा पाण्डुनन्दन युधिष्ठिरने वनमें निर्वासित होकर जिस दुःखशय्यापर शयन किया है, दुर्योधन अपने प्राणोंका त्याग करके उससे भी अधिक दुःख- दायिनी और अनर्थकारिणी मृत्युकी अन्तिम शय्याको ग्रहण करे ॥ ११ ॥

ह्रिया ज्ञानेन तपसा दमेन

शौर्येणाथो धर्मगुप्त्या धनेन ।

अन्यायवृत्तिः कुरुपाण्डवेया- नध्यातिष्ठेद् धार्तराष्ट्रो दुरात्मा ॥ १२ ॥

अन्यायपूर्ण बर्ताव करनेवाले दुरात्मा दुर्योधनको उचित है कि वह लज्जा, ज्ञान, तपस्या, इन्द्रियसंयम, शौर्य, धर्मरक्षा आदि गुणों तथा धनके द्वारा कौरव- पाण्डवोंपर अधिकार प्राप्त करे ( सद्गुणोंद्वारा सबके हृदयको जीते, अन्यायसे शासन करना असम्भव है ) ॥ १२ ॥

मायोपधः प्रणिपातार्जवाभ्यां

तपोदमाभ्यां धर्मगुप्त्या बलेन ।

सत्यं ब्रुवन् प्रतिपन्नो नृपो न- स्तितिक्षमाणः क्लिश्यमानोऽतिवेलम् ॥ १३ ॥

हमारे महाराज युधिष्ठिर नम्रता, सरलता, तप, इन्द्रिय - संयम, धर्मरक्षा और बल— इन सभी गुणोंसे सम्पन्न हैं । वे बहुत दिनोंसे अनेक प्रकारके क्लेश उठाते हुए भी सदा सत्य ही बोलते हैं तथा कौरवोंके कपटपूर्ण व्यवहारों तथा वचनोंको सहन करते रहते हैं ॥ १३ ॥

यदा ज्येष्ठः पाण्डवः संशितात्मा

क्रोधं यत्तं वर्षपूगान् सुघोरम् ।

अवस्रष्टा कुरुषूद्वृत्तचेता- स्तदा युद्धं धार्तराष्ट्रोऽन्वतप्स्यत् ॥ १४ ॥

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परंतु अपने मनको शुद्ध एवं संयत रखनेवाले ज्येष्ठ पाण्डव युधिष्ठिर जिस समय उत्तेजित हो अनेक वर्षोंसे दबे हुए अपने अत्यन्त भयंकर क्रोधको कौरवोंपर छोड़ेंगे, उस समय जो भयानक युद्ध होगा, उसे देखकर दुर्योधनको पछताना पड़ेगा ॥ १४ ॥

कृष्णवर्त्येव ज्वलितः समिद्धो यथा दहेत् कक्षमग्निर्निदाघे । एवं दग्धा धार्तराष्ट्रस्य सेनां युधिष्ठिरः क्रोधदीप्तोऽन्ववेक्ष्य ॥ १५ ॥

जैसे ग्रीष्म ऋतुमें प्रज्वलित अग्नि सब ओरसे धधक उठती और घास- फूस एवं जंगलोंको जलाकर भस्म कर देती है, उसी प्रकार क्रोधसे तमतमाये हुए युधिष्ठिर दुर्योधनकी सेनाको अपने दृष्टिपातमात्रसे दग्ध कर देंगे ॥ १५ ॥

यदा द्रष्टा भीमसेनं रथस्थं गदाहस्तं क्रोधविषं वमन्तम् । अमर्षणं पाण्डवं भीमवेगं तदा युद्धं धार्तराष्ट्रोऽन्वतप्स्यत् ॥ १६ ॥

जिस समय दुर्योधन हाथमें गदा लिये रथपर बैठे हुए भयानक वेगवाले अमर्षशील पाण्डुनन्दन भीमसेनको क्रोधरूप विष उगलते देखेगा, उस समय युद्धके परिणामको सोचकर उसे महान् पश्चात्ताप करना पड़ेगा ॥ १६ ॥

सेनाग्रगं दंशितं भीमसेनं स्वालक्षणं वीरहणं परेषाम् । घ्नन्तं चमूमन्तकसंनिकाशं तदा स्मर्ता वचनस्यातिमानी ॥ १७ ॥

जब भीमसेन कवच धारण करके शत्रुपक्षके वीरोंका नाश करते हुए अपने पक्षके लोगोंके लिये भी अलक्षित हो सेनाके आगे- आगे तीव्र वेगसे बढ़ेंगे और यमराजके समान विपक्षी सेनाका संहार करने लगेंगे, उस समय अत्यन्त अभिमानी दुर्योधनको मेरी ये बातें याद आयेंगी ॥ १७ ॥

यदा द्रष्टा भीमसेनेन नागान्

निपातितान् गिरिकूटप्रकाशान् ।

कुम्भैरिवासृग्वमतो भिन्नकुम्भां- स्तदा युद्धं धार्तराष्ट्रोऽन्वतप्स्यत् ॥ १८ ॥

जब भीमसेन पर्वताकार प्रतीत होनेवाले बड़े - बड़े गजराजोंको गदाके आघातसे उनका कुम्भस्थल विदीर्ण करके मार गिरायेंगे और वे मानो घड़ोंसे खून उँडेल रहे हों, इस प्रकार मस्तकसे रक्तकी धारा बहाने लगेंगे, उस समय दुर्योधन जब यह दृश्य देखेगा, तब उसे युद्ध छेड़नेके कारण बड़ा भारी पश्चात्ताप होगा ॥ १८ ॥

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महासिंहो गाव इव प्रविश्य गदापाणिर्धार्तराष्ट्रानुपेत्य । यदा भीमो भीमरूपो निहन्ता तदा युद्धं धार्तराष्ट्रोऽन्वतप्स्यत् ॥ १ ९ ॥ जब भयंकर रूपधारी भीमसेन हाथमें गदा लिये तुम्हारी सेनामें घुसकर धृतराष्ट्रपुत्रोंके पास जाकर उनका उसी प्रकार संहार करने लगेंगे, जैसे महान् सिंह गौओंके झुंडमें घुसकर उन्हें दबोच लेता है, तब दुर्योधनको युद्धके लिये बड़ा पछतावा होगा ॥ १ ९ ॥ महाभये वीतभयः कृतास्त्रः समागमे शत्रुबलावमर्दी । सकृद् रथेनाप्रतिमान् रथौघान् पदातिसंघान् गदयाभिनिघ्नन् ॥ २० ॥

शैक्येन नागांस्तरसा विगृह्णन्

यदा छेत्ता धार्तराष्ट्रस्य सैन्यम् ।

छिन्दन् वनं परशुनेव शूर- स्तदा युद्धं धार्तराष्ट्रोऽन्वतप्स्यत् ॥ २१ ॥

जो भारी - से - भारी भय आनेपर भी निर्भय रहते हैं, जिन्होंने सम्पूर्ण अस्त्र- शस्त्रोंकी शिक्षा प्राप्त की है तथा जो संग्रामभूमिमें शत्रुसेनाको रौंद डालते हैं, वे ही शूरवीर भीमसेन जब एकमात्र रथपर आरूढ़ हो गदाके आघातसे असंख्य रथसमूहों तथा पैदल सैनिकोंको मौतके घाट उतारते और छींकोंके समान फंदोंमें बड़े -बड़े नागोंको फँसाकर मरे हुए बछड़ोंके समान उन्हें बलपूर्वक घसीटते हुए दुर्योधनकी सेनाको वैसे ही छिन्न - भिन्न करने लगेंगे, जैसे कोई फरसेसे जंगल काट रहा हो, उस समय धृतराष्ट्रपुत्र मन - ही- मन यह सोचकर पछतायेगा कि मैंने युद्ध छेड़कर बड़ी भारी भूल की है ॥ २०-२१ ॥ तृणप्रायं ज्वलनेनेव दग्धं ग्रामं यथा धार्तराष्ट्रान् समीक्ष्य । पक्वं सस्यं वैद्युतेनेव दग्धं परासिक्तं विपुलं स्वं बलौघम् ॥ २२ ॥

हतप्रवीरं विमुखं भयार्त पराङ्मुखं प्रायशोऽधृष्टयोधम् । शस्त्रार्चिषा भीमसेनेन दग्धं तदा युद्धं धार्तराष्ट्रोऽन्वतप्स्यत् ॥ २३ ॥

जब दुर्योधन यह देखेगा कि जैसे घास- फूसके झोपड़ोंका गाँव आगसे जलकर खाक हो जाता है, उसी प्रकार धृतराष्ट्रके अन्य सभी पुत्र भीमसेनकी क्रोधाग्निसे दग्ध हो गये, मेरी विशाल वाहिनी बिजलीकी आगसे जली हुई पकी खेतीके समान नष्ट हो गयी, उसके मुख्य-

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मुख्य वीर मारे गये, सैनिकोंने पीठ दिखा दी, सभी भयसे पीड़ित हो रणभूमिसे भाग निकले, प्रायः समस्त योद्धा साहस अथवा धृष्टता खो बैठे तथा भीमसेनके अस्त्र- शस्त्रोंकी आगसे सब कुछ स्वाहा हो गया; उस समय उसे युद्धके लिये बड़ा पछतावा होगा ॥ २२-२३ ॥ उपासंगानाचरेद दक्षिणेन वराङ्गानां नकुलश्चित्रयोधी । यदा रथाग्रयो रथिनः प्रणेता तदा युद्धं धार्तराष्ट्रोऽन्वतप्स्यत् ॥ २४ ॥

रथियोंमें श्रेष्ठ और विचित्र रीतिसे युद्ध करनेवाले नकुल जब दाहिने हाथमें लिये हुए खड्गसे तुम्हारे सैनिकोंके मस्तक काट- काटकर धरतीपर उनके ढेर लगाने लगेंगे और रथी योद्धाओंको यमलोक भेजना प्रारम्भ करेंगे, उस समय धृतराष्ट्रपुत्र दुर्योधन युद्धका परिणाम सोचकर शोकसे संतप्त हो उठेगा ॥ २४ ॥

सुखोचितो दुःखशय्यां वनेषु दीर्घं कालं नकुलो यामशेत । आशीविषः क्रुद्ध इवोद्वमन् विषं तदा युद्धं धार्तराष्ट्रोऽन्वतप्स्यत् ॥ २५ ॥

सुख भोगनेके योग्य वीरवर नकुलने दीर्घकाल-तकत वनोंमें रहकर जिस दुःख - शय्यापर शयन किया है, उसका स्मरण करके जब वह क्रोधमें भरे हुए विषैले सर्पकी भाँति विष उगलने लगेगा, उस समय धृतराष्ट्रपुत्र दुर्योधनको युद्ध छेड़नेके कारण पछताना पड़ेगा ॥ २५ ॥

त्यक्तात्मानः पार्थिवा योधनाय समादिष्टा धर्मराजेन सूत । रथैः शुभ्रैः सैन्यमभिद्रवन्तो दृष्ट्वा पश्चात् तप्स्यते धार्तराष्ट्रः ॥ २६ ॥

संजय! धर्मराज युधिष्ठिरके द्वारा युद्धके लिये आदेश पाकर उनके लिये प्राण देनेको उद्यत रहनेवाले भूमण्डलके नरेश जब तेजस्वी रथोंपर आरूढ़ होकर कौरव- सेनापर आक्रमण करेंगे, उस समय उन्हें देखकर दुर्योधनको युद्धके लिये अत्यन्त पश्चात्ताप करना पड़ेगा ॥ २६ ॥

शिशून् कृतास्त्रानशिशुप्रकाशान्

यदा द्रष्टा कौरवः पञ्च शूरान् ।

त्यक्त्वा प्राणान् कौरवानाद्रवन्त- स्तदा युद्धं धार्तराष्ट्रोऽन्वतप्स्यत् ॥ २७ ॥

पृष्ठ 399

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जो अवस्थामें बालक होते हुए भी अस्त्र- शस्त्रोंकी पूर्ण शिक्षा पाकर युद्धमें नवयुवकोंके समान पराक्रम प्रकाशित करते हैं, द्रौपदीके वे पाँचों शूरवीर पुत्र प्राणोंका मोह छोड़कर जब कौरव- सेनापर टूट पड़ेंगे और कुरुराज दुर्योधन जब उन्हें उस अवस्थामें देखेगा, तब उसे युद्ध छेड़नेकी भूलके कारण भारी पश्चात्ताप होगा ॥ २७ ॥

यदा गतोद्वाहमकूजनाक्षं सुवर्णतारं रथमुत्तमाश्वैः । दान्तैर्युक्तं सहदेवोऽधिरूढः शिरांसि राज्ञां क्षेप्स्यते मार्गणौघैः ॥ २८ ॥

महाभये सम्प्रवृत्ते रथस्थं विवर्तमानं समरे कृतास्त्रम् । सर्वा दिशः सम्पतन्तं समीक्ष्य तदा युद्धं धार्तराष्ट्रोऽन्वतप्स्यत् ॥ २ ९ ॥ जब सहदेव उत्तम जातिके सुशिक्षित घोड़ोंसे जुते हुए अपनी इच्छाके अनुकूल चलनेवाले तथा पहियोंकी धुरीसे तनिक भी आवाज न करनेवाले रथपर, जो अलातचक्रकी भाँति घूमनेके कारण सोनेके गोलाकार तारके समान प्रतीत होता है, आरूढ़ हो अपने बाणसमूहोंद्वारा विपक्षी राजाओंके मस्तक काट- काटकर गिराने लगेंगे और इस प्रकार महान् भयका वातावरण छा जानेपर रथपर बैठे हुए अस्त्रवेत्ता सहदेव समरभूमिमें डटे रहकर जब सभी दिशाओंमें शत्रुओंपर आक्रमण करेंगे, उस दशामें उन्हें देखकर धृतराष्ट्रपुत्र दुर्योधनके मनमें युद्धका परिणाम सोचकर महान् पश्चात्ताप होगा ॥ २८-२९ ॥

पृष्ठ 400

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ह्रीनिषेवो निपुणः सत्यवादी महाबलः सर्वधर्मोपपन्नः । गान्धारिमाछंस्तुमुले क्षिप्रकारी क्षेप्ता जनान् सहदेवस्तरस्वी ॥ ३० ॥

यदा द्रष्टा द्रौपदेयान् महेषून्

शूरान् कृतास्त्रान् रथयुद्धकोविदान् ।

आशीविषान् घोरविषानिवायत- स्तदा युद्धं धार्तराष्ट्रोऽन्वतप्स्यत् ॥ ३१ ॥

लज्जाशील, युद्धकुशल, सत्यवादी, महाबली, सर्वधर्मसम्पन्न, वेगवान् तथा शीघ्रतापूर्वक बाण चलानेवाले सहदेव जब घमासान युद्धमें शकुनिपर आक्रमण करके शत्रुओंके सैनिकोंका संहार करने लगेंगे तथा जब दुर्योधन महाधनुर्धर शूरवीर अस्त्रविद्यामें निपुण तथा रथयुद्धकी कलामें कुशल द्रौपदीके पाँचों पुत्रोंको भयंकर विषवाले विषधर सर्पोंकी भाँति आक्रमण करते देखेगा, तब उसे युद्ध छेड़नेकी भूलपर भारी पश्चात्ताप होगा ॥ ३०-३१ ॥ यदाभिमन्युः परवीरघाती शरैः परान् मेघ इवाभिवर्षन् । विगाहिता कृष्णसमः कृतास्त्र-