03.Mahabharata Volume 3 — पृष्ठ 401–410
महाभारत — खण्ड ३ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 401–410
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स्तदा युद्धं धार्तराष्ट्रोऽन्वतप्स्यत् ॥ ३२ ॥
अभिमन्यु साक्षात् भगवान् श्रीकृष्णके समान पराक्रमी तथा अस्त्रविद्यामें निपुण है, वह शत्रुपक्षके वीरोंका संहार करनेमें समर्थ है । जिस समय वह मेघके समान बाणोंकी बौछार करता हुआ शत्रुओंकी सेनामें प्रवेश करेगा, उस समय धृतराष्ट्रपुत्र दुर्योधन युद्धके लिये मन-ही - मन बहुत ही संतप्त होगा ॥ ३२ ॥
यदा द्रष्टा बालमबालवीर्यं द्विषच्चमूं मृत्युमिवोत्पतन्तम् । सौभद्रमिन्द्रप्रतिमं कृतास्त्रं तदा युद्धं धार्तराष्ट्रोऽन्वतप्स्यत् ॥ ३३ ॥
सुभद्राकुमार अवस्थामें यद्यपि बालक है, तथापि उसका पराक्रम युवकोंके समान है । वह इन्द्रके समान शक्तिशाली तथा अस्त्रविद्यामें पारंगत है । जिस समय वह शत्रुसेनापर विकराल कालके समान आक्रमण करेगा, उस समय उसे देखकर दुर्योधनको युद्ध छेड़नेके कारण बड़ा पश्चात्ताप होगा ॥ ३३ ॥
प्रभद्रकाः शीघ्रतरा युवानो विशारदाः सिंहसमानवीर्याः । यदा क्षेप्तारो धार्तराष्ट्रान् ससैन्यां- स्तदा युद्धं धार्तराष्ट्रोऽन्वतप्स्यत् ॥ ३४ ॥
अस्त्र-संचालनमें शीघ्रता दिखानेवाले, युद्धविशारद तथा सिंहके समान पराक्रमी प्रभद्रकदेशीय नवयुवक जब सेनासहित धृतराष्ट्रपुत्रोंको मार भगायेंगे, उस समय दुर्योधनको यह सोचकर बड़ा पश्चात्ताप होगा कि मैंने क्यों युद्ध छेड़ा? ॥ ३४ ॥
वृद्धौ विराटद्रुपदौ महारथौ पृथक् चमूभ्यामभिवर्तमानौ । यदा द्रष्टारौ धार्तराष्ट्रान् ससैन्यां- स्तदा युद्धं धार्तराष्ट्रोऽन्वतप्स्यत् ॥ ३५ ॥
जिस समय वृद्ध महारथी राजा विराट और द्रुपद अपनी पृथक् - पृथक् सेनाओंके साथ आक्रमण करके सैनिकोंसहित धृतराष्ट्रपुत्रोंपर दृष्टि डालेंगे, उस समय दुर्योधनको युद्धका परिणाम सोचकर महान् पश्चात्ताप करना पड़ेगा ॥ ३५ ॥
यदा कृतास्त्रो द्रुपदः प्रचिन्वन्
शिरांसि यूनां समरे रथस्थः ।
क्रुद्धः शरैश्छेत्स्यति चापमुक्तै- स्तदा युद्धं धार्तराष्ट्रोऽन्वतप्स्यत् ॥ ३६ ॥
जब अस्त्रविद्यामें निपुण राजा द्रुपद कुपित हो रथपर बैठकर समरभूमिमें अपने धनुषसे छोड़े हुए बाणोंद्वारा विपक्षी युवकोंके मस्तकोंको चुन- चुनकर काटने लगेंगे, उस
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समय दुर्योधनको इस युद्धके कारण भारी पछतावा होगा ॥ ३६ ॥
यदा विराटः परवीरघाती
रणान्तरे शत्रुचमूं प्रवेष्टा ।
मत्स्यैः सार्धमनृशंसरूपै- स्तदा युद्धं धार्तराष्ट्रोऽन्वतप्स्यत् ॥ ३७ ॥
जब शत्रु - वीरोंका संहार करनेवाले राजा विराट सौम्य स्वरूपवाले मत्स्यदेशीय योद्धाओंको साथ लेकर रणभूमिमें शत्रुसेनाके भीतर प्रवेश करेंगे, उस समय दुर्योधन युद्ध छेड़नेका परिणाम सोचकर शोकसे संतप्त हो उठेगा ॥ ३७ ॥
ज्येष्ठं मात्स्यमनृशंसार्यरूपं विराटपुत्रं रथिनं पुरस्तात् । यदा द्रष्टा दंशितं पाण्डवार्थे तदा युद्धं धार्तराष्ट्रोऽन्वतप्स्यत् ॥ ३८ ॥
सौम्य तथा श्रेष्ठ स्वरूपवाले राजा विराटके ज्येष्ठ पुत्र मत्स्यदेशीय महारथी श्वेतको जब दुर्योधन पाण्डवोंके हितके लिये कवच धारण किये देखेगा, तब उसे युद्धका परिणाम सोचकर मन - ही - मन बड़ा कष्ट होगा ॥ ३८ ॥
रहते कौरवाणां प्रवीरे
शिखण्डिना सत्तमे शान्तनूजे ।
न जातु नः शत्रवो धारयेयु- रसंशयं सत्यमेतद् ब्रवीमि ॥ ३ ९ ॥
कौरववंशके प्रमुख वीर शान्तनुनन्दन साधुशिरो - मणि भीष्मजी जब युद्धमें शिखण्डीके हाथसे मार दिये जायँगे, उस समय हमारे शत्रु कौरव कभी हमलोगोंका वेग नहीं सह सकेंगे, यह मैं सत्य कहता हूँ, इसमें तनिक भी संशय नहीं है ॥ ३ ९ ॥ यदा शिखण्डी रथिनः प्रचिन्वन्
भीष्मं रथेनाभियाता वरूथी ।
दिव्यैर्हयैरवमृद्नन् रथौघां- स्तदा युद्धं धार्तराष्ट्रोऽन्वतप्स्यत् ॥ ४० ॥
जब शिखण्डी अपने रथकी रक्षाके साधनोंसे सम्पन्न हो रथियोंको चुन - चुनकर मारता तथा दिव्य अश्वोंद्वारा रथसमूहोंको रौंदता हुआ रथारूढ़ हो भीष्मपर आक्रमण करेगा, उस समय दुर्योधनको युद्ध छिड़ जानेके कारण बड़ा पश्चात्ताप होगा ॥ ४० ॥
यदा द्रष्टा सृजयानामनीके धृष्टद्युम्नं प्रमुखे रोचमानम् । अस्त्रं यस्मै गुह्यमुवाच धीमान् द्रोणस्तदा तप्स्यति धार्तराष्ट्रः ॥ ४१ ॥
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जिसे परम बुद्धिमान् आचार्य द्रोणने अस्त्रविद्याके गोपनीय रहस्यकी भी शिक्षा दी है, वह धृष्टद्युम्न जब सृ॑जयवंशी वीरोंकी सेनाके अग्रभागमें प्रकाशित होगा और उसे उस दशामें दुर्योधन देखेगा, तब वह अत्यन्त संतप्त हो उठेगा ॥ ४१ ॥
यदा स सेनापतिरप्रमेयः परामृनन्निषुभिर्धार्तराष्ट्रान् । द्रोणं रणे शत्रुसोऽभियाता तदा युद्धं धार्तराष्ट्रोऽन्वतप्स्यत् ॥ ४२ ॥
जब शत्रुओंका सामना करनेमें समर्थ अपरिमित शक्तिशाली सेनापति धृष्टद्युम्न अपने बाणोंद्वारा धृतराष्ट्र- पुत्रोंको कुचलता हुआ आचार्य द्रोणपर आक्रमण करेगा, उस समय युद्धका परिणाम सोचकर दुर्योधन बहुत पछतायेगा ॥ ४२ ॥
ह्रीमान् मनीषी बलवान् मनस्वी स लक्ष्मीवान् सोमकानां प्रबर्हः । न जातु तं शत्रवोऽन्ये सहेरन् येषां स स्यादग्रणीर्वृष्णिसिंहः ॥ ४३ ॥
सोमकवंशका वह प्रमुख वीर धृष्टद्युम्न लज्जाशील, बलवान्, बुद्धिमान्, मनस्वी तथा वीरोचित शोभासे सम्पन्न है । इसी प्रकार वृष्णिवंशमें सिंहके समान पराक्रमी वीरवर सात्यकि जिनके अगुआ हैं, उनके वेगको दूसरे शत्रु कदापि नहीं सह सकते ॥ ४३ ॥
इदं च ब्रूया मा वृणीष्वेति लोके युद्धेऽद्वितीयं सचिवं रथस्थम् । शिनेर्नप्तारं प्रवृणीम सात्यकिं महाबलं वीतभयं कृतास्त्रम् ॥ ४४ ॥
तुम दुर्योधनसे यह भी कह देना कि अब संसारमें जीवित रहकर तुम राज्य भोगनेकी इच्छा न करो । हमने युद्धके लिये अद्वितीय वीर, महान् बलवान्, निर्भय तथा अस्त्रविद्यामें निपुण शिनिपौत्र रथारूढ़ सात्यकिको अपना सहायक चुन लिया है ॥ ४४ ॥
महोरस्को दीर्घबाहुः प्रमाथी युद्धेऽद्वितीयः परमास्त्रवेदी । शिनेर्नप्ता तालमात्रायुधोऽयं महारथो वीतभयः कृतास्त्रः ॥ ४५ ॥
शिनिके पौत्र महारथी सात्यकि चार हाथ लंबा धनुष धारण करते हैं । उनकी छाती चौड़ी और भुजाएँ बड़ी हैं । वे अद्वितीय वीर हैं और युद्धमें शत्रुओंको मथ डालते हैं। उन्हें उत्तम अस्त्रोंका ज्ञान है । वे निर्भय तथा अस्त्रविद्याके पारंगत विद्वान् हैं ॥ ४५ ॥
यदा शिनीनामधिपो मयोक्तः शरैः परान् मेघ इव प्रवर्षन् ।
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प्रच्छादयिष्यत्यरिहा योधमुख्यां- स्तदा युद्धं धार्तराष्ट्रोऽन्वतप्स्यत् ॥ ४६ ॥
जब मेरे कहनेसे शिनिप्रवर शत्रुमर्दन सात्यकि शत्रुओंपर मेघकी भाँति बाणोंकी झड़ी लगाते हुए मुख्य- मुख्य योद्धाओंको आच्छादित कर देंगे, उस समय दुर्योधन युद्धका परिणाम सोचकर बहुत पछतायेगा ॥ यदा धृतिं कुरुते योत्स्यमानः स दीर्घबाहुर्दृढधन्वा महात्मा । सिंहस्येव गन्धमाघ्राय गावः संचेष्टन्ते शत्रवोऽस्माद् रणाग्रे ॥ ४७ ॥
सुदृढ़ धनुष धारण करनेवाले दीर्घबाहु महामना सात्यकि जब युद्धके लिये उत्सुक हो समरभूमिमें डट जाते हैं, उस समय जैसे सिंहकी गन्ध पाकर गौएँ इधर- उधर भागने लगती हैं, उसी प्रकार शत्रु युद्धके मुहानेपर इनके पास आकर तुरंत भाग खड़े होते हैं ॥ ४७ ॥
स दीर्घबाहुर्दृढधन्वा महात्मा भिन्द्याद् गिरीन् संहरेत् सवलोकान् । अस्त्रे कृती निपुणः क्षिप्रहस्तो दिवि स्थितः सूर्य इवाभिभाति ॥ ४८ ॥
'विशालबाहु, दृढ़ धनुर्धर, युद्धकुशल और हाथोंकी फुर्ती दिखानेवाले अस्त्रवेत्ता सात्यकि पर्वतोंको विदीर्ण कर सकते हैं और सम्पूर्ण लोकोंका संहार करनेमें समर्थ हैं । वे आकाशमें विद्यमान सूर्यदेवकी भाँति प्रकाशित होते हैं ॥ ४८ ॥
चित्रः सूक्ष्मः सुकृतो यादवस्य अस्त्रे योगो वृष्णिसिंहस्य भूयान् । यथाविधं योगमाहुः प्रशस्तं सर्वैर्गुणैः सात्यकिस्तैरुपेतः ॥ ४ ९ ॥ 'युद्धनिपुण वीर पुरुष जैसे - जैसे अस्त्रोंकी उपलब्धिको प्रशंसाके योग्य मानते हैं, उन सबसे तथा समस्त वीरोचित गुणोंसे वृष्णिसिंह सात्यकि सम्पन्न हैं । उन यदुकुल- तिलकको बहुत - से उत्तम अस्त्रोंका ज्ञान प्राप्त है । उनका वह अस्त्रयोग विचित्र, सूक्ष्म और भलीभाँति अभ्यासमें लाया हुआ है ॥ ४ ९ ॥ हिरण्मयं श्वेतहयैश्चतुर्भि- र्यदा युक्तं स्यन्दनं माधवस्य । द्रष्टा युद्धे सात्यकेर्धार्तराष्ट्र- स्तदा तप्स्यत्यकृतात्मा स मन्दः ॥ ५० ॥
' जब युद्धमें मधुवंशी सात्यकिके चार श्वेत घोड़ोंसे जुते हुए सुवर्णमय रथको पापात्मा मन्दबुद्धि दुर्योधन देखेगा, तब उसे अवश्य संताप होगा ॥ ५० ॥
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यदा रथं हेममणिप्रकाशं श्वेताश्वयुक्तं वानरकेतुमुग्रम् । द्रष्टा ममाप्यास्थितं केशवेन तदा तप्स्यत्यकृतात्मा स मन्दः ॥ ५१ ॥
‘ जब सुवर्ण और मणियोंसे प्रकाशित होनेवाले मेरे भयंकर रथको जिसमें चार श्वेत अश्व जुते होंगे, जिसपर वानरध्वजा फहरा रही होगी तथा साक्षात् भगवान् श्रीकृष्ण जिसपर बैठकर सारथिका कार्य सँभालते होंगे, अकृतात्मा मन्दबुद्धि दुर्योधन देखेगा, तब मन ही मन संतप्त हो उठेगा ॥ ५१ ॥
यदा मौर्व्यास्तलनिष्पेषमुग्रं महाशब्दं वज्रनिष्पेषतुल्यम् । विधूयमानस्य महारणे मया स गाण्डिवस्य श्रोष्यति मन्दबुद्धिः ॥ ५२ ॥
तदा मूढो धृतराष्ट्रस्य पुत्र- स्तप्ता युद्धे दुर्मतिर्दुःसहायः । दृष्ट्वा सैन्यं बाणवर्षान्धकारे प्रभज्यन्तं गोकुलवद् रणाग्रे ॥ ५३ ॥
‘ महान् संग्रामके समय जब मैं गाण्डीव धनुषकी डोरी खीचूँगा, उस समय मेरे हाथोंकी रगड़से वज्रपातके समान अत्यन्त भयंकर आवाज होगी, मन्दबुद्धि दुर्योधन जब गाण्डीवकी उस उग्र टंकारको सुनेगा तथा रणस्थलीके अग्रभागमें मेरी बाण- वर्षासे फैले हुए अन्धकारमें इधर- उधर भागती हुई गौओंकी भाँति अपनी सेनाको युद्धसे पलायन करती देखेगा, तब दुष्ट सहायकोंसे युक्त उस दुर्बुद्धि एवं मूढ़ धृतराष्ट्रपुत्रके मनमें बड़ा संताप होगा ॥ ५२-५३ ॥ बलाहकादुच्चरतः सुभीमान् विद्युत्स्फुलिङ्गानिव घोररूपान् । सहस्रघ्नान् द्विषतां सङ्गरेषु अस्थिच्छिदो मर्मभिदः सुपुङ्खान् ॥ ५४ ॥
यदा द्रष्टा ज्यामुखाद् बाणसंघान्
गाण्डीवमुक्तानापततः शिताग्रान् ।
हयान् गजान् वर्मिणश्चाददानां- स्तदा युद्धं धार्तराष्ट्रोऽन्वतप्स्यत् ॥ ५५ ॥
' मेरे गाण्डीव धनुषकी प्रत्यंचासे छोड़े हुए तीखी धारवाले सुन्दर पंखोंसे युक्त भयंकर बाणसमूह मेघसे निकली हुई अत्यन्त भयानक विद्युत्की चिनगारियोंके समान जब युद्धभूमिमें शत्रुओंपर पड़ेंगे और उनकी हड्डियोंको काटते तथा मर्मस्थानोंको विदीर्ण करते हुए सहस्र - सहस्र सैनिकोंको मौतके घाट उतारने लगेंगे, साथ ही कितने ही घोड़ों, हाथियों
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तथा कवचधारी योद्धाओंके प्राण लेना प्रारम्भ करेंगे, उस समय जब धृतराष्ट्रपुत्र दुर्योधन यह सब देखेगा, तब युद्ध छेड़नेकी भूलके कारण वह बहुत पछतायेगा ॥ ५४-५५ ॥ यदा मन्दः परबाणान् विमुक्तान् ममेषुभिर्ह्रियमाणान् प्रतीपम् । तिर्यग्विध्याच्छिद्यमानान् पृषत्कै- स्तदा युद्धं धार्तराष्ट्रोऽन्वतप्स्यत् ॥ ५६ ॥
' युद्धमें दूसरे योद्धा जो बाण चलायेंगे, उन्हें मेरे बाण टक्कर लेकर पीछे लौटा देंगे । साथ ही मेरे दूसरे बाण शत्रुओंके शरसमूहको तिर्यग्भावसे विद्ध करके टुकड़े - टुकड़े कर डालेंगे। जब मन्दबुद्धि दुर्योधन यह सब देखेगा, तब उसे युद्ध छेड़नेके कारण बड़ा पश्चात्ताप होगा ॥ ५६ ॥
यदा विपाठा मद्भुजविप्रमुक्ता द्विजाः फलानीव महीरुहाग्रात् । प्रचेतार उत्तमाङ्गानि यूनां तदा युद्धं धार्तराष्ट्रोऽन्वतप्स्यत् ॥ ५७ ॥
'जब मेरे बाहुबलसे छूटे हुए विपाठ नामक बाण युवक योद्धाओंके मस्तकोंको उसी प्रकार काट - काटकर ढेर लगाने लगेंगे, जैसे पक्षी वृक्षोंके अग्रभागसे फल गिराकर उनके ढेर लगा देते हैं, उस समय यह सब देखकर दुर्योधनको बड़ा पश्चात्ताप होगा ॥ ५७ ॥
यदा द्रष्टा पततः स्यन्दनेभ्यो महागजेभ्योऽश्वगतान् सुयोधनान् । शरैर्हतान् पातितांश्चैव रङ्गे तदा युद्धं धार्तराष्ट्रोऽन्वतप्स्यत् ॥ ५८ ॥
' जब दुर्योधन देखेगा कि उसके रथोंसे, बड़े - बड़े गजोंसे और घोड़ोंकी पीठपरसे भी असंख्य योद्धा मेरे बाणोंद्वारा मारे जाकर समरांगणमें गिरते चले जा रहे हैं, तब उसे युद्धके लिये भारी पछतावा होगा ॥ ५८ ॥
असम्प्राप्तानस्त्रपथं परस्य तदा द्रष्टा नश्यतो धार्तराष्ट्रान् । अकुर्वतः कर्म युद्धे समन्तात् तदा युद्धं धार्तराष्ट्रोऽन्वतप्स्यत् ॥ ५ ९ ॥ ' दुर्योधनको जब यह दिखायी देगा कि उसके दूसरे भाई शत्रुओंकी बाण वर्षाके निकट न जाकर उसे दूरसे देखकर ही अदृश्य हो रहे हैं, युद्धमें कोई पराक्रम नहीं कर पा रहे हैं, -मन बहुत -तब वह लड़ाई छेड़नेके कारण मन ही- पछतायेगा ॥ ५ ९ ॥ पदातिसंघान् रथसंघान् समन्ताद् ह्यात्ताननः काल इवाततेषुः ।
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प्रणोत्स्यामि ज्वलितैर्बाणवर्षैः शत्रूंस्तदा तप्स्यति मन्दबुद्धिः ॥ ६० ॥
‘ जब मैं सायकोंकी अविच्छिन्न वर्षा करते हुए मुख फैलाये खड़े हुए कालकी भाँति अपने प्रज्वलित बाणोंकी बौछारोंसे शत्रुपक्षके झुंड के झुंड पैदलों तथा रथियोंके समूहोंको छिन्न - भिन्न करने लगूँगा, उस समय मन्दबुद्धि दुर्योधनको बड़ा संताप होगा ॥ ६० ॥
सर्वा दिशः सम्पतता रथेन रजोध्वस्तं गाण्डिवेन प्रकृत्तम् । यदा द्रष्टा स्वबलं सम्प्रमूढं तदा पश्चात् तप्स्यति मन्दबुद्धिः ॥ ६१ ॥
‘ मन्दबुद्धि धृतराष्ट्रपुत्र जब यह देखेगा कि सम्पूर्ण दिशाओंमें दौड़नेवाले मेरे रथके द्वारा उड़ायी हुई धूलिसे आच्छादित हो उसकी सारी सेना धराशायी हो रही है और मेरे गाण्डीव धनुषसे छूटे हुए बाणोंद्वारा उसके समस्त सैनिक छिन्न - भिन्न होते चले जा रहे हैं, तब उसे बड़ा पछतावा होगा ॥ ६१ ॥
कान्दिग्भूतं छिन्नगात्रं विसंज्ञं दुर्योधनो द्रक्ष्यति सर्वसैन्यम् । हताश्ववीराग्रयनरेन्द्रनागं पिपासितं श्रान्तपत्रं भयार्तम् ॥ ६२ ॥
आर्तस्वरं हन्यमानं हतं च विकीर्णकेशास्थिकपालसंघम् । प्रजापतेः कर्म यथार्थनिश्चितं तदा दृष्ट्वा तप्स्यति मन्दबुद्धिः ॥ ६३ ॥
' दुर्योधन अपनी आँखों यह देखेगा कि उसकी सारी सेना ( भयसे भागने लगी है और उस ) -को यह भी नहीं सूझता है कि किस दिशाकी ओर जाऊँ? कितने ही योद्धाओंके अंग-प्रत्यंग छिन्न - भिन्न हो गये हैं । समस्त सैनिक अचेत हो रहे हैं । हाथी, घोड़े तथा वीराग्रगण्य नरेश मार डाले गये हैं । सारे वाहन थक गये हैं और सभी योद्धा प्यास तथा भयसे पीड़ित हो रहे हैं । बहुतेरे सैनिक आर्त स्वरसे रो रहे हैं, कितने ही मारे गये और मारे जा रहे हैं । बहुतोंके केश, अस्थि तथा कपालसमूह सब ओर बिखरे पड़े हैं । मानो विधाताका यथार्थ निश्चित विधान हो, इस प्रकार यह सब कुछ होकर ही रहेगा । यह सब देखकर उस समय मन्दबुद्धि दुर्योधनके मनमें बड़ा पश्चात्ताप होगा ॥ ६२-६३ ॥ यदा रथे गाण्डिवं वासुदेवं दिव्यं शङ्खं पाञ्चजन्यं हयांश्च । तूणावक्षय्यौ देवदत्तं च मां च द्रष्टा युद्धे धार्तराष्ट्रोऽन्वतप्स्यत् ॥ ६४ ॥
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' जब धृतराष्ट्रपुत्र दुर्योधन रथपर मेरे गाण्डीव धनुषको, सारथि भगवान् श्रीकृष्णको, उनके दिव्य पांचजन्य शंखको, रथमें जुते हुए दिव्य घोड़ोंको, बाणोंसे भरे हुए दो अक्षय तूणीरोंको, मेरे देवदत्त नामक शंखको और मुझको भी देखेगा, उस समय युद्धका परिणाम सोचकर उसे बड़ा संताप होगा ॥ ६४ ॥
उद्वर्तयन् दस्युसङ्घान् समेतान् प्रवर्तयन् युगमन्यद् युगान्ते । यदा धक्ष्याम्यग्निवत् कौरवेयां- स्तदा तप्ता धृतराष्ट्रः सपुत्रः ॥ ६५ ॥
'जिस समय युद्धके लिये एकत्र हुए इन डाकुओंके दलोंका संहार करके प्रलयकालके पश्चात् युगान्तर उपस्थित करता हुआ मैं अग्निके समान प्रज्वलित होकर कौरवोंको भस्म करने लगूँगा, उस समय पुत्रोंसहित महाराज धृतराष्ट्रको बड़ा संताप होगा ॥ ६५ ॥
सभ्राता वै सहसैन्यः सभृत्यो भ्रष्टैश्वर्यः क्रोधवशोऽल्पचेताः । दर्पस्यान्ते निहतो वेपमानः पश्चान्मन्दस्तप्स्यति धार्तराष्ट्रः ॥ ६६ ॥
‘ सदा क्रोधके वशमें रहनेवाला अल्पबुद्धि मूढ़ दुर्योधन जब भाई, भृत्यगण तथा सेनाओंसहित ऐश्वर्यसे भ्रष्ट एवं आहत होकर काँपने लगेगा, उस समय सारा घमंड चूर- चूर हो जानेपर उसे ( अपने कुकृत्योंके लिये ) बड़ा पश्चात्ताप होगा ॥ ६६ ॥
पूर्वाह्णे मां कृतजप्यं कदाचिद् विप्रः प्रोवाचोदकान्ते मनोज्ञम् । कर्तव्यं ते दुष्करं कर्म पार्थ योद्धव्यं ते शत्रुभिः सव्यसाचिन् ॥ ६७ ॥
इन्द्रो वा ते हरिमान् वज्रहस्तः पुरस्ताद् यातु समरेऽरीन् विनिघ्नन् । सुग्रीवयुक्तेन रथेन वा ते पश्चात् कृष्णो रक्षतु वासुदेवः ॥ ६८ ॥
'एक दिनकी बात है, मैं पूर्वाह्नकालमें संध्या-वन्दन एवं गायत्रीजप करके आचमनके पश्चात् बैठा हुआ था, उस समय एक ब्राह्मणने आकर एकान्तमें मुझसे यह मधुर वचन कहा -' कुन्तीनन्दन! तुम्हें दुष्कर कर्म करना है । सव्यसाचिन्! तुम्हें अपने शत्रुओंके साथ युद्ध करना होगा । बोलो, क्या चाहते हो? इन्द्र उच्चैःश्रवा घोड़ेपर बैठकर वज्र हाथमें लिये तुम्हारे आगे - आगे समरभूमिमें शत्रुओंका नाश करते हुए चलें अथवा सुग्रीव आदि अश्वोंसे जुते हुए रथपर बैठकर वसुदेवनन्दन भगवान् श्रीकृष्ण पीछेकी ओरसे तुम्हारी रक्षा करें ॥ ६७-६८ ॥
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वव्रे चाहं वज्रहस्तान्महेन्द्रा- दस्मिन् युद्धे वासुदेवं सहायम् । स मे लब्धो दस्युवधाय कृष्णो मन्ये चैतद् विहितं दैवतैर्मे ॥ ६ ९ ॥ ‘ उस समय मैंने वज्रपाणि इन्द्रको छोड़कर इस युद्धमें भगवान् श्रीकृष्णको अपना सहायक चुना था, इस प्रकार इन डाकुओंके वधके लिये मुझे श्रीकृष्ण मिल गये हैं । मालूम होता है, देवताओंने ही मेरे लिये ऐसी व्यवस्था कर रखी है ॥ ६ ९ ॥ अयुद्धयमानो मनसापि यस्य जयं कृष्णः पुरुषस्याभिनन्देत् । एवं सर्वान् स व्यतीयादमित्रान् सेन्द्रान् देवान् मानुषे नास्ति चिन्ता ॥ ७० ॥
भगवान् श्रीकृष्ण युद्ध न करके मनसे भी जिस पुरुषकी विजयका अभिनन्दन करेंगे, वह अपने समस्त शत्रुओंको, भले ही वे इन्द्र आदि देवता ही क्यों न हों, पराजित कर देता है, फिर मनुष्य - शत्रुके लिये तो चिन्ता ही क्या है? ॥ ७० ॥
स बाहुभ्यां सागरमुत्तितीर्षे- न्महोदधिं सलिलस्याप्रमेयम् ।
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तेजस्विनं कृष्णमत्यन्तशूरं युद्धेन यो वासुदेवं जिगीषेत् ॥ ७१ ॥
'जो युद्धके द्वारा अत्यन्त शौर्यसम्पन्न तेजस्वी वसुदेवनन्दन भगवान् श्रीकृष्णको जीतनेकी इच्छा करता है, वह अनन्त अपार जलनिधि समुद्रको दोनों बाँहोंसे तैरकर पार करना चाहता है ॥ ७१ ॥
गिरिं य इच्छेत् तु तलेन भेत्तुं
शिलोच्चयं श्वेतमतिप्रमाणम् ।
तस्यैव पाणिः सनखो विशीर्ये- न्न चापि किंचित् स गिरेस्तु कुर्यात् ॥ ७२ ॥
‘ जो अत्यन्त विशाल प्रस्तरराशिपूर्ण श्वेत कैलास पर्वतको हथेली से मारकर विदीर्ण करना चाहता है, उस मनुष्यका नखसहित हाथ ही छिन्न-भिन्न हो जायगा । वह उस पर्वतका कुछ भी बिगाड़ नहीं कर सकता ॥ ७२ ॥
अग्निं समिद्धं शमयेद् भुजाभ्यां चन्द्रं च सूर्यं च निवारयेत । हरेद् देवानाममृतं प्रसह्य युद्धेन यो वासुदेवं जिगीषेत् ॥ ७३ ॥
' जो युद्धके द्वारा भगवान् श्रीकृष्णको जीतना चाहता है, वह प्रज्वलित अग्निको दोनों हाथोंसे बुझानेकी चेष्टा करता है, चन्द्रमा और सूर्यकी गतिको रोकना चाहता है तथा हठपूर्वक देवताओंका अमृत हर लानेका प्रयत्न करता है ॥ ७३ ॥
यो रुक्मिणीमेकरथेन भोजा- नुत्साद्य राज्ञः समरे प्रसह्य । उवाह भार्यां यशसा ज्वलन्तीं यस्यां जज्ञे रौक्मिणेयो महात्मा ॥ ७४ ॥
'जिन्होंने एकमात्र रथकी सहायतासे युद्धमें भोजवंशी राजाओंको बलपूर्वक पराजित करके ( रूप, सौन्दर्य और) सुयशके द्वारा प्रकाशित होनेवाली उस परम सुन्दरी रुक्मिणीको पत्नीरूपसे ग्रहण किया, जिसके गर्भसे महामना प्रद्युम्नका जन्म हुआ है ॥ ७४ ॥
अयं गान्धारांस्तरसा सम्प्रमथ्य जित्वा पुत्रान् नग्नजितः समग्रान् । बद्धं मुमोच विनदन्तं प्रसह्य सुदर्शनं वै देवतानां ललामम् ॥ ७५ ॥
‘ इन श्रीकृष्णने ही गान्धारदेशीय योद्धाओंको अपने वेगसे कुचलकर राजा नग्नजित्के समस्त पुत्रोंको पराजित किया और वहाँ कैदमें पड़कर क्रन्दन करते हुए राजा सुदर्शनको, जो देवताओंके भी आदरणीय हैं, बन्धनमुक्त किया ॥ ७५ ॥