03.Mahabharata Volume 3 — पृष्ठ 411–420

महाभारत — खण्ड ३ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 411–420

पृष्ठ 411

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अयं कपाटेन जघान पाण्ड्यं तथा कलिङ्गान् दन्तकूरे ममर्द । अनेन दग्धा वर्षपूगान् विनाथा वाराणसी नगरी सम्बभूव ॥ ७६ ॥

‘ इन्होंने पाण्ड्यनरेशको किंवाड़के पल्लेसे मार डाला, भयंकर युद्धमें कलिंगदेशीय योद्धाओंको कुचल डाला तथा इन्होंने ही काशीपुरीको इस प्रकार जलाया था कि वह बहुत वर्षोंतक अनाथ पड़ी रही ॥ ७६ ॥

अयं स्म युद्धे मन्यतेऽन्यैरजेयं तमेकलव्यं नाम निषादराजम् । वेगेनैव शैलमभिहत्य जम्भः शेते स कृष्णेन हतः परासुः ॥ ७७ ॥

‘ ये भगवान् श्रीकृष्ण उस निषादराज एकलव्यको सदा युद्धके लिये ललकारा करते थे, जो दूसरोंके लिये अजेय था; परंतु वह श्रीकृष्णके हाथसे मारा जाकर प्राणशून्य हो सदाके लिये रणशय्यामें सो रहा है, ठीक उसी तरह, जैसे जम्भ नामक दैत्य स्वयं ही वेगपूर्वक पर्वतपर आघात करके प्राणशून्य हो महानिद्रामें निमग्न हो गया था ॥ ७७ ॥

तथोग्रसेनस्य सुतं सुदुष्टं वृष्ण्यन्धकानां मध्यगतं सभास्थम् । अपातयद् बलदेवद्वितीयो हत्वा ददौ चोग्रसेनाय राज्यम् ॥ ७८ ॥

‘उग्रसेनका पुत्र कंस बड़ा दुष्ट था । वह जब भरी सभामें वृष्णि और अन्धकवंशी क्षत्रियोंके बीचमें बैठा हुआ था, श्रीकृष्णने बलदेवजीके साथ वहाँ जाकर उसे मार गिराया । इस प्रकार कंसका वध करके इन्होंने मथुराका राज्य उग्रसेनको दे दिया ॥ ७८ ॥

अयं सौभं योधयामास खस्थं विभीषणं मायया शाल्वराजम् । सौभद्वारि प्रत्यगृह्णाच्छतघ्नीं दोर्भ्यां क एनं विषहेत मर्त्यः ॥ ७ ९ ॥ ‘ इन्होंने सौभ नामक विमानपर बैठे हुए तथा मायाके द्वारा अत्यन्त भयंकर रूप धारण करके आये हुए आकाशमें स्थित शाल्वराजके साथ युद्ध किया और सौभ विमानके द्वारपर लगी हुई शतघ्नीको अपने दोनों हाथोंसे पकड़ लिया था । फिर इनका वेग कौन मनुष्य सह सकता है? ॥ ७ ९ ॥ प्राग्ज्योतिषं नाम बभूव दुर्गं पुरं घोरमसुराणामसह्यम् । महाबलो नरकस्तत्र भौमो

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जहारादित्या मणिकुण्डले शुभे ॥ ८० ॥

‘ असुरोंका प्राग्ज्योतिषपुर नामसे प्रसिद्ध एक भयंकर किला था, जो शत्रुओंके लिये सर्वथा अजेय था । वहाँ भूमिपुत्र महाबली नरकासुर निवास करता था, जिसने देवमाता अदितिके सुन्दर मणिमय कुण्डल हर लिये थे ॥ न तं देवाः सह शक्रेण शेकुः समागता युधि मृत्योरभीताः । दृष्ट्वा च तं विक्रमं केशवस्य बलं तथैवास्त्रमवारणीयम् ॥ ८१ ॥

जानन्तोऽस्य प्रकृतिं केशवस्य

न्ययोजयन् दस्युवधाय कृष्णम् ।

स तत् कर्म प्रतिशुश्राव दुष्कर- मैश्वर्यवान् सिद्धिषु वासुदेवः ॥ ८२ ॥

' मृत्युके भयसे रहित देवता इन्द्रके साथ उसका सामना करनेके लिये आये, परंतु नरकासुरको युद्धमें पराजित न कर सके । तब देवताओंने भगवान् श्रीकृष्णके अनिवार्य बल, पराक्रम और अस्त्रको देखकर तथा इनकी दयालु एवं दुष्टदमनकारिणी प्रकृतिको जानकर इन्हींसे पूर्वोक्त डाकू नरकासुरका वध करनेकी प्रार्थना की, तब समस्त कार्योंकी सिद्धिमें समर्थ भगवान् श्रीकृष्णने वह दुष्कर कार्य पूर्ण करना स्वीकार किया ॥ ८१-८२ ॥ निर्मोचने षट् सहस्राणि हत्वा संच्छिद्य पाशान् सहसा क्षुरान्तान् । मुरं हत्वा विनिहत्यौघरक्षो निर्मोचनं चापि जगाम वीरः ॥ ८३ । ‘ फिर वीरवर श्रीकृष्णने निर्मोचन नगरकी सीमापर जाकर सहसा छः हजार लोहमय पाश काट दिये, जो तीखी धारवाले थे । फिर मुर दैत्यका वध और राक्षस - समूहका नाश करके निर्मोचन नगरमें प्रवेश किया ॥ ८३ ॥

तत्रैव तेनास्य बभूव युद्धं

महाबलेनातिबलस्य विष्णोः ।

शेते स कृष्णेन हतः परासु- र्वातेनेवोन्मथितः कर्णिकारः ॥ ८४ ॥

‘ वहीं उस महाबली नरकासुरके साथ अत्यन्त बलशाली भगवान् श्रीकृष्णका युद्ध हुआ । श्रीकृष्णके हाथसे मारा जाकर वह प्राणोंसे हाथ धो बैठा और आँधीके उखाड़े हुए कनेरवृक्षकी भाँति सदाके लिये रणभूमिमें सो गया ॥ ८४ ॥

आहृत्य कृष्णो मणिकुण्डले ते हत्वा च भौमं नरकं मुरं च ।

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श्रिया वृतो यशसा चैव विद्वान् प्रत्याजगामाप्रतिमप्रभावः ॥ ८५ ॥

‘ इस प्रकार अनुपम प्रभावशाली विद्वान् श्रीकृष्ण भूमिपुत्र नरकासुर तथा मुरका वध करके देवी अदितिके वे दोनों मणिमय कुण्डल वहाँसे लेकर विजयलक्ष्मी और उज्ज्वल यशसे सुशोभित हो अपनी पुरीमें लौट आये ॥ ८५ ॥

अस्मै वराण्यददंस्तत्र देवा

दृष्ट्वा भीमं कर्म कृतं रणे तत् ।

ते श्रमश्च ते युध्यमानस्य न स्या- दाकाशे चाप्सु च ते क्रमः स्यात् ॥ ८६ ॥

शस्त्राणि गात्रे न च ते क्रमेर- न्नित्येव कृष्णश्च ततः कृतार्थः । एवंरूपे वासुदेवेऽप्रमेये महाबले गुणसम्पत् सदैव ॥ ८७ ॥

' युद्धमें भगवान् श्रीकृष्णका वह भयंकर पराक्रम देखकर देवताओंने वहाँ इन्हें इस प्रकार वर दिये — ‘ केशव! युद्ध करते समय आपको कभी थकावट न हो, आकाश और जलमें भी आप अप्रतिहत गतिसे विचरें और आपके अंगोंमें कोई भी अस्त्र- शस्त्र चोट न पहुँचा सके। ' इस प्रकार वर पाकर श्रीकृष्ण पूर्णतः कृतकार्य हो गये हैं । इन असीम शक्तिशाली महाबली वासुदेवमें समस्त गुण- सम्पत्ति सदैव विद्यमान है ॥ ८६-८७ ॥ तमसह्यं विष्णुमनन्तवीर्य- माशंसते धार्तराष्ट्रो विजेतुम् । सदा ह्येनं तर्कयते दुरात्मा तच्चाप्ययं सहतेऽस्मान् समीक्ष्य ॥ ८८ ॥

‘ ऐसे अनन्त पराक्रमी और अजेय श्रीकृष्णको धृतराष्ट्रपुत्र दुर्योधन जीत लेनेकी आशा करता है । वह दुरात्मा सदैव इनका अनिष्ट करनेके विषयमें सोचता रहता है, परंतु हमलोगोंकी ओर देखकर उसके इस अपराधको भी ये भगवान् सहते चले जा रहे हैं ॥ ८८ ॥

पर्यागतं मम कृष्णस्य चैव यो मन्यते कलहं सम्प्रसह्य । शक्यं हर्तुं पाण्डवानां ममत्वं तद्वेदिता संयुगं तत्र गत्वा ॥ ८ ९ ॥ ' दुर्योधन मानता है कि मुझमें और श्रीकृष्णमें हठात् कलह करा दिया जा सकता है । पाण्डवोंका श्रीकृष्णके प्रति जो ममत्व ( अपनापन ) है, उसे मिटा दिया जा सकता है; परंतु

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कुरुक्षेत्रकी युद्धभूमिमें पहुँचनेपर उसे इन सब बातोंका ठीक- ठीक पता चल जायगा ॥ ८ ९ ॥ नमस्कृत्वा शान्तनवाय राज्ञे द्रोणायाथो सहपुत्राय चैव । शारद्वतायाप्रतिद्वन्द्विने च योत्स्याम्यहं राज्यमभीप्समानः ॥ ९० ॥

' मैं शान्तनुनन्दन महाराज भीष्मको, आचार्य द्रोणको, गुरुभाई अश्वत्थामाको और जिनका सामना कोई नहीं कर सकता, उन वीरवर कृपाचार्यको भी प्रणाम करके राज्य पानेकी इच्छा लेकर अवश्य युद्ध करूँगा ॥ ९ ० ॥ धर्मेणाप्तं निधनं तस्य मन्ये यो योत्स्यते पाण्डवैः पापबुद्धिः । मिथ्या ग्लहे निर्जिता वै नृशंसैः संवत्सरान् वै द्वादश राजपुत्राः ॥ ९ १ ॥ ‘जो पापबुद्धि मानव पाण्डवोंके साथ युद्ध करेगा, धर्मकी दृष्टिसे उसकी मृत्यु निकट आ गयी है, ऐसा मेरा विश्वास है । कारण कि इन क्रूर स्वभाववाले कौरवोंने हम सब लोगोंको कपटद्यूतमें जीतकर बारह वर्षोंके लिये वनमें निर्वासित कर दिया था; यद्यपि हम भी राजाके ही पुत्र थे ॥ ९ १ ॥ वासः कृच्छ्रो विहितश्चाप्यरण्ये दीर्घं कालं चैकमज्ञातवर्षम् । ते हि कस्माज्जीवतां पाण्डवानां नन्दिष्यन्ते धार्तराष्ट्राः पदस्थाः ॥ ९ २ ॥ ' हम वनमें दीर्घकालतक बड़े कष्ट सहकर रहे हैं और एक वर्षतक हमें अज्ञातवास करना पड़ा है । ऐसी दशामें पाण्डवोंके जीते- जी वे कौरव अपने पदोंपर प्रतिष्ठित रहकर कैसे आनन्द भोगते रहेंगे? ॥ ९ २ ॥

ते चेदस्मान् युध्यमानाञ्जयेयु- देवैर्महेन्द्रप्रमुखैः सहायैः ।

धर्मादधर्मश्चरितो गरीयां- ततो ध्रुवं नास्ति कृतं च साधु ॥ ९ ३ ॥

‘ यदि इन्द्र आदि देवताओंकी सहायता पाकर भी धृतराष्ट्रपुत्र हमें युद्धमें जीत लेंगे तो यह मानना पड़ेगा कि धर्मकी अपेक्षा पापाचारका ही महत्त्व अधिक है और संसारसे पुण्यकर्मका अस्तित्व निश्चय ही उठ गया ॥ ९ ३ ॥ न चेदिमं पुरुषं कर्मबद्धं न चेदस्मान् मन्यतेऽसौ विशिष्टान् ।

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आशंसेऽहं वासुदेवद्वितीयो दुर्योधनं सानुबन्धं निहन्तुम् ॥ ९ ४ ॥ ' यदि दुर्योधन मनुष्यको कर्मोंके बन्धनसे बँधा हुआ नहीं मानता है अथवा यदि वह हमलोगोंको अपनेसे श्रेष्ठ तथा प्रबल नहीं समझता है, तो भी मैं यह आशा करता हूँ कि भगवान् श्रीकृष्णको अपना सहायक बनाकर मैं दुर्योधनको उसके सगे -सम्बन्धियों - सहित मार डालूँगा ॥ ९ ४ ॥ न चेदिदं कर्म नरेन्द्र वन्ध्यं न चेद् भवेत् सुकृतं निष्फलं वा । इदं च तच्चाभिसमीक्ष्य नूनं पराजयो धार्तराष्ट्रस्य साधुः ॥ ९ ५ ॥ ' राजन्! यदि मनुष्यका किया हुआ यह पापकर्म निष्फल नहीं होता अथवा पुण्यकर्मोंका फल मिले बिना नहीं रहता तो मैं दुर्योधनके वर्तमान और पहलेके किये हुए पापकर्मका विचार करके निश्चयपूर्वक कह सकता हूँ कि धृतराष्ट्रपुत्रकी पराजय अनिवार्य है और इसीमें जगत्की भलाई है ॥ ९ ५ ॥ प्रत्यक्षं वः कुरवो यद् ब्रवीमि

युध्यमाना धार्तराष्ट्रा न सन्ति ।

अन्यत्र युद्धात् कुरवो यदि स्यु- र्न युद्धे वै शेष इहास्ति कश्चित् ॥ ९ ६ ॥

‘ कौरवो! मैं तुमलोगोंके समक्ष यह स्पष्टरूपसे बता देना चाहता हूँ कि धृतराष्ट्रके पुत्र यदि युद्धभूमिमें उतरे तो जीवित नहीं बचेंगे । कौरवोंके जीवनकी रक्षा तभी हो सकती है, जब वे युद्धसे दूर रहें । युद्ध छिड़ जानेपर तो उनमेंसे कोई भी यहाँ शेष नहीं रहेगा ॥ ९ ६ ॥ हत्वा त्वहं धार्तराष्ट्रान् सकर्णान्

राज्यं कुरूणामवजेता समग्रम् ।

यद् वः कार्यं तत् कुरुध्वं यथास्व- मिष्टान् दारानात्मभोगान् भजध्वम् ॥ ९ ७ ॥

‘ मैं कर्णसहित धृतराष्ट्रपुत्रोंका वध करके कुरुदेशका सम्पूर्ण राज्य जीत लूँगा, अतः तुम्हारा जो -जो कर्तव्य शेष हो, उसे पूरा कर लो। अपने वैभवके अनुसार प्रियतमा पत्नियोंके साथ सुख भोग लो और अपने शरीरके लिये भी जो अभीष्ट भोग हों, उनका उपभोग कर लो ॥ ९ ७ ॥ अप्येवं नो ब्राह्मणाः सन्ति वृद्धा बहुश्रुताः शीलवन्तः कुलीनाः । सांवत्सरा ज्योतिषि चाभियुक्ता नक्षत्रयोगेषु च निश्चयज्ञाः ॥ ९ ८ ॥

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‘ हमारे पास कितने ही ऐसे वृद्ध ब्राह्मण विद्यमान हैं, जो अनेक शास्त्रोंके विद्वान्, सुशील, उत्तम कुलमें उत्पन्न, वर्षके शुभाशुभ फलोंको जाननेवाले, ज्योतिष- शास्त्रके मर्मज्ञ तथा ग्रह- नक्षत्रोंके योगफलका निश्चित-रूपसे ज्ञान रखनेवाले हैं ॥ ९ ८ ॥ उच्चावचं दैवयुक्तं रहस्यं दिव्याः प्रश्ना मृगचक्रा मुहूर्ताः । क्षयं महान्तं कुरुसृजयानां निवेदयन्ते पाण्डवानां जयं च ॥ ९९ ॥

‘ वे दैवसम्बन्धी उन्नति एवं अवनतिके फलदायक रहस्य बता सकते हैं । प्रश्नोंके अलौकिक ढंगसे उत्तर देते हैं, जिससे भविष्य घटनाओंका ज्ञान हो जाता है । वे शुभाशुभ फलोंका वर्णन करनेके लिये सर्वतोभद्र आदि चक्रोंका भी अनुसंधान करते हैं और मुहूर्तशास्त्रके तो वे पण्डित ही हैं । वे सब लोग निश्चितरूपसे यह निवेदन करते हैं कि कौरवों और संजयवंशके लोगोंका बड़ा भारी संहार होनेवाला है और इस महायुद्धमें पाण्डवोंकी विजय होगी ॥ ९९ ॥

यथा हि नो मन्यतेऽजातशत्रुः संसिद्धार्थो द्विषतां निग्रहाय । जनार्दनश्चाप्यपरोक्षविद्यो न संशयं पश्यति वृष्णिसिंहः ॥ १०० ॥

‘ अजातशत्रु महाराज युधिष्ठिर मानते हैं, मैं अपने शत्रुओंका दमन करनेमें निश्चय सफल होऊँगा । वृष्णिवंशके पराक्रमी वीर भगवान् श्रीकृष्णको भी सारी विद्याओंका अपरोक्ष ज्ञान है । वे भी हमारे इस मनोरथके सिद्ध होनेमें कोई संदेह नहीं देखते हैं ॥ १०० ॥

अहं तथैवं खलु भाविरूपं पश्यामि बुद्धया स्वयमप्रमत्तः । दृष्टिश्च मे न व्यथते पुराणी संयुध्यमाना धार्तराष्ट्रा न सन्ति ॥ १०१ ॥

' मैं भी स्वयं प्रमादशून्य होकर अपनी बुद्धिसे भावीका ऐसा ही स्वरूप देखता हूँ । मेरी चिरंतन दृष्टि कभी तिरोहित नहीं होती । उसके अनुसार मैं यह निश्चितरूपसे कह सकता हूँ कि युद्धभूमिमें उतरनेपर धृतराष्ट्रके पुत्र जीवित नहीं रह सकते ॥ १०१ ॥

अनालब्धं जृम्भति गाण्डिवं धनु- राहता कम्पति मे धनुर्ज्या । बाणाश्च मे तूणमुखाद् विसृत्य मुहुर्मुहुर्गन्तुमुशन्ति चैव ॥ १०२ ॥

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' गाण्डीव धनुष बिना स्पर्श किये ही तना जा रहा है, मेरे धनुषकी डोरी बिना खींचे ही हिलने लगी है और मेरे बाण बार- बार तरकससे निकलकर शत्रुओंकी ओर जानेके लिये उतावले हो रहे हैं ॥ १०२ ॥

खड्गः कोशान्निःसरति प्रसन्नो हित्वेव जीर्णामुरगस्त्वचं स्वाम् । ध्वजे वाचो रौद्ररूपा भवन्ति कदा रथो योक्ष्यते ते किरीटिन् ॥ १०३ ॥

' चमचमाती हुई तलवार म्यानसे इस प्रकार निकल रही है, मानो सर्प अपनी पुरानी केंचुल छोड़कर चमकने लगा हो तथा मेरी ध्वजापर यह भयंकर वाणी गूँजती रहती है कि अर्जुन! तुम्हारा रथ युद्धके लिये कब जोता जायगा ॥ १०३ ॥

गोमायुसंघाश्च नदन्ति रात्रौ रक्षांस्यथो निष्पतन्त्यन्तरिक्षात् । मृगाः शृगालाः शितिकण्ठाश्च काका गृध्रा बकाश्चैव तरक्षवश्च ॥ १०४ ॥

' रातमें गीदड़ोंके दल कोलाहल मचाते हैं, राक्षस आकाशसे पृथिवीपर टूटे पड़ते हैं तथा हिरण, सियार, मोर, कौआ, गीध, बगुला और चीते मेरे रथके समीप दौड़े आते ॥ १०४ ॥

सुवर्णपत्राश्च पतन्ति पश्चाद् दृष्ट्वा रथं श्वेतहयप्रयुक्तम् । अहं ह्येकः पार्थिवान् सर्वयोधान् शरान् वर्षन् मृत्युलोकं नयेयम् ॥ १०५ ॥

'श्वेत घोड़ोंसे जुते हुए मेरे रथको देखकर सुवर्ण- पत्र नामक पक्षी पीछेसे टूटे पड़ते हैं । इससे जान पड़ता है, मैं अकेला बाणोंकी वर्षा करके समस्त राजाओं और योद्धाओंको यमलोक पहुँचा दूँगा ॥ १०५ ॥

समाददानः पृथगस्त्रमार्गान् यथाग्निरिद्धो गहनं निदाघे । स्थूणाकर्ण पाशुपतं महास्त्रं ब्राह्मं चास्त्रं यच्च शक्रोऽप्यदान्मे ॥ १०६ ॥

वधे धृतो वेगवतः प्रमुञ्चन् नाहं प्रजाः किंचिदिहावशिष्ये । शान्तिं लप्स्ये परमो ह्येष भावः स्थिरो मम ब्रूहि गावल्गणे तान् ॥ १०७ ॥

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‘ जैसे गर्मीमें प्रज्वलित हुई आग जब वनको जलाने लगती है, तब किसी भी वृक्षको बाकी नहीं छोड़ती, उसी प्रकार मैं शत्रुओंके वधके लिये सुसज्जित हो अस्त्रसंचालनकी विभिन्न रीतियोंका आश्रय ले स्थूणाकर्ण, महान् पाशुपतास्त्र, ब्रह्मास्त्र तथा जिसे इन्द्रने मुझे दिया था, उस इन्द्रास्त्रका भी प्रयोग करूँगा और वेगशाली बाणोंकी वर्षा करके इस युद्धमें किसीको भी जीवित नहीं छोडूंगा । ऐसा करनेपर ही मुझे शान्ति मिलेगी । संजय! तुम उनसे स्पष्ट कह देना कि मेरा यह दृढ़ और उत्तम निश्चय है ॥ १०६-१०७ ॥ ये वैजय्याः समरे सूत लब्ध्वा देवानपीन्द्रप्रमुखान् समेतान् । तैर्मन्यते कलहं सम्प्रसह्य स धार्तराष्ट्रः पश्यत मोहमस्य ॥ १०८ ॥

'सूत! जो पाण्डव समरभूमिमें इन्द्र आदि समस्त देवताओंको भी पाकर उन्हें पराजित किये बिना नहीं रहेंगे, उन्हीं हम पाण्डवोंके साथ यह दुर्योधन हठपूर्वक युद्ध करना चाहता है, इसका मोह तो देखो ॥ १०८ ॥

वृद्धो भीष्मः शान्तनवः कृपश्च द्रोणः सपुत्रो विदुरश्च धीमान् । एते सर्वे यद् वदन्ते तदस्तु आयुष्मन्तः कुरवः सन्तु सर्वे ॥ १० ९ ॥ ‘फिर भी मैं चाहता हूँ कि बूढ़े पितामह शान्तनु-नन्दन भीष्म, कृपाचार्य, द्रोणाचार्य, अश्वत्थामा और बुद्धिमान् विदुर– ये सब लोग मिलकर जैसा कहें, वही हो । समस्त कौरव दीर्घायु बने रहें ॥ १० ९ ॥ इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि यानसंधिपर्वणि अर्जुनवाक्यनिवेदने अष्टचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४८ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत यानसंधिपर्वमें अर्जुनवाक्यनिवेदनविषयक अड़तालीसवाँ अध्याय पूराहुआ ॥ ४८ ॥

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एकोनपञ्चाशत्तमोऽध्यायः भीष्मका दुर्योधनको संधिके लिये समझाते हुए श्रीकृष्ण और अर्जुनकी महिमा बताना एवं कर्णपर आक्षेप करना, कर्णकी आत्मप्रशंसा, भीष्मके द्वारा उसका पुनः उपहास एवं द्रोणाचार्यद्वारा भीष्मजीके कथनका अनुमोदन वैशम्पायन उवाच

समवेतेषु सर्वेषु तेषु राजसु भारत ।

दुर्योधनमिदं वाक्यं भीष्मः शान्तनवोऽब्रवीत् ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं - भारत! वहाँ एकत्र हुए उन समस्त राजाओंकी मण्डलीमें शान्तनुनन्दन भीष्मने दुर्योधनसे यह बात कही- ॥ १ ॥

बृहस्पतिश्चोशना च ब्रह्माणं पर्युपस्थितौ ।

मरुतश्च सहेन्द्रेण वसवश्चाग्निना सह ॥ २ ॥

आदित्याश्चैव साध्याश्च ये च सप्तर्षयो दिवि ।

विश्वावसुश्च गन्धर्वः शुभाश्चाप्सरसां गणाः ॥ ३ ॥

एक समयकी बात है, बृहस्पति और शुक्राचार्य ब्रह्माजीकी सेवामें उपस्थित हुए । उनके साथ इन्द्रसहित मरुद्गण, अग्नि, वसुगण, आदित्य, साध्य, सप्तर्षि, विश्वावसु गन्धर्व और श्रेष्ठ अप्सराएँ भी वहाँ मौजूद थीं ॥ २-३ ॥

नमस्कृत्योपजग्मुस्ते लोकवृद्धं पितामहम् ।

परिवार्य च विश्वेशं पर्यासत दिवौकसः ॥ ४ ॥

ये सब देवता संसारके बड़े - बूढ़े पितामह ब्रह्माजीके पास गये और उन्हें प्रणाम करनेके पश्चात् उन लोकेश्वरको सब ओरसे घेरकर बैठ गये ॥ ४ ॥

तेषां मनश्च तेजश्चाप्याददानाविवौजसा ।

पूर्वदेवौ व्यतिक्रान्तौ नरनारायणावृषी ॥ ५ ॥

इसी समय पुरातन देवता नर - नारायण ऋषि उधर आ निकले और अपनी कान्ति तथा ओजसे उन सबके चित्त और तेजका अपहरण-सा करते हुए उस स्थानको लाँघकर चले गये ॥ ५ ॥

पृष्ठ 420

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बृहस्पतिस्तु पप्रच्छ ब्रह्माणं काविमाविति ।

भवन्तं नोपतिष्ठेते तौ नः शंस पितामह ॥ ६ ॥

यह देख बृहस्पतिजीने ब्रह्माजीसे पूछा — ' पितामह! ये दोनों कौन हैं, जिन्होंने आपका

अभिनन्दन भी नहीं किया । हमें इनका परिचय दीजिये ' ॥ ६ ॥

ब्रह्मोवाच

यावेतौ पृथिवीं द्यां च भासयन्तौ तपस्विनौ ।

ज्वलन्तौ रोचमानौ च व्याप्यातीतौ महाबलौ ॥ ७ ॥

नरनारायणावेतौ लोकाल्लोकं समास्थितौ ।

ऊर्जितौ स्वेन तपसा महासत्त्वपराक्रमौ ॥ ८ ॥

ब्रह्माजी बोले – बृहस्पते! ये जो दोनों महान् शक्तिशाली तपस्वी पृथ्वी और आकाशको प्रकाशित करते हुए हमलोगोंका अतिक्रमण करके आगे बढ़ गये हैं, नर और नारायण हैं । ये अपने तेजसे प्रज्वलित और कान्तिसे प्रकाशित हो रहे हैं । इनका धैर्य और पराक्रम महान् है । ये अपनी तपस्यासे अत्यन्त प्रभावशाली होनेके कारण भूलोकसे ब्रह्मलोकमें आये हैं ॥ ७-८ ॥ एतौ हि कर्मणा लोकं नन्दयामासतुर्ध्रुवम् ।