03.Mahabharata Volume 3 — पृष्ठ 431–440

महाभारत — खण्ड ३ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 431–440

पृष्ठ 431

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बाहुबलमें जिनकी समानता करनेवाला इस भूमण्डलमें दूसरा कोई नहीं है, जिन्होंने केवल धनुष धारण करके युद्धमें काशी, अंग, मगध और कलिंग आदि देशोंके समस्त भूपालोंको जीतकर अपने वशमें कर लिया था, उन भीमसेनके बलसे पाण्डवोंने आपलोगोंपर आक्रमण करनेका उद्योग आरम्भ किया है ॥ १ ९ ३ ॥ यस्य वीर्येण सहसा चत्वारो भुवि पाण्डवाः ॥ २० ॥

निःसृत्य जतुगेहाद् वै हिडिम्बात् पुरुषादकात् ।

यश्चैषामभवद् द्वीपः कुन्तीपुत्रो वृकोदरः ॥ २१ ॥

याज्ञसेनीमथो यत्र सिन्धुराजोऽपकृष्टवान् ।

तत्रैषामभवद् द्वीपः कुन्तीपुत्रो वृकोदरः ॥ २२ ॥

यश्च तान् संगतान् सर्वान् पाण्डवान् वारणावते ।

दह्यतो मोचयामास तेन वस्तेऽभ्ययुञ्जत ॥ २३ ॥

जिनके बल और पराक्रमसे चारों पाण्डव सहसा लाक्षाभवनसे निकलकर इस पृथ्वीपर जीवित बच गये, जिन्होंने मनुष्यभक्षी राक्षस हिडिम्बसे अपने भाइयोंकी रक्षा की, उस संकटके समय जो कुन्तीकुमार भीम इन पाण्डवोंके लिये द्वीपके समान आश्रयदाता हो गये, जब सिन्धुराज जयद्रथने द्रौपदीका अपहरण किया था, उस समय भी जिन कुन्तीकुमार वृकोदरने उन सबको द्वीपकी भाँति आश्रय दिया था तथा जिन्होंने वारणावत नगरमें एकत्र हुए समस्त पाण्डवोंको लाक्षागृहकी आगमें जलनेसे बचा लिया था, उन्हीं भीमसेनके बलसे पाण्डवोंने आपलोगोंके साथ युद्धकी तैयारी की है ॥

कृष्णायां चरता प्रीतिं येन क्रोधवशा हताः ।

प्रविश्य विषमं घोरं पर्वतं गन्धमादनम् ॥ २४ ॥

यस्य नागायुतैर्वीर्यं भुजयोः सारमर्पितम् ।

तेन वो भीमसेनेन पाण्डवा अभ्ययुञ्जत ॥ २५ ॥

जिन्होंने द्रौपदीपर अपना प्रेम जताते हुए अत्यन्त दुर्गम एवं भयंकर गन्धमादन पर्वतकी भूमिमें प्रवेश करके क्रोधवश नामवाले राक्षसोंको मार डाला, जिनकी दोनों भुजाओंमें दस हजार हाथियोंके समान बल है, उन्हीं भीमसेनके बलसे पाण्डवोंने आपलोगोंपर आक्रमणका उद्योग किया है ॥ २४-२५ ॥

कृष्णद्वितीयो विक्रम्य तुष्ट्यर्थं जातवेदसः ।

अजयद् यः पुरा वीरो युध्यमानं पुरंदरम् ॥ २६ ॥

यः स साक्षान्महादेवं गिरिशं शूलपाणिनम् ।

तोषयामास युद्धेन देवदेवमुमापतिम् ॥ २७ ॥

यश्च सर्वान् वशे चक्रे लोकपालान् धनुर्धरः ।

तेन वो विजयेनाजौ पाण्डवा अभ्ययुञ्जत ॥ २८ ॥

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जिन वीरशिरोमणिने पहले केवल भगवान् श्रीकृष्णके साथ जाकर अग्निदेवकी तृप्तिके लिये पराक्रम करके अपने साथ युद्ध करनेवाले देवराज इन्द्रको भी पराजित कर दिया, जिन्होंने युद्धके द्वारा पर्वतपर शयन करनेवाले तथा हाथोंमें त्रिशूल लिये रहनेवाले साक्षात् देवाधिदेव महादेव उमापतिको भी संतुष्ट किया था तथा जिन धनुर्धर वीरने समस्त लोकपालोंको भी हराकर अपने वशमें कर लिया, उन्हीं अर्जुनके बलपर पाण्डवलोग युद्धमें आपलोगोंसे भिड़नेको तैयार हैं ॥ २६–२८ ॥

यः प्रतीचीं दिशं चक्रे वशे म्लेच्छगणायुताम् ।

स तत्र नकुलो योद्धा चित्रयोधी व्यवस्थितः ॥ २ ९ ॥

तेन वो दर्शनीयेन वीरेणातिधनुर्भृता ।

माद्रीपुत्रेण कौरव्य पाण्डवा अभ्ययुञ्जत ॥ ३० ॥

कुरुनन्दन! जिन्होंने सहस्रों म्लेच्छोंसे भरी हुई पश्चिम दिशाको जीतकर अपने अधीन कर लिया था, वे विचित्र रीति से युद्ध करनेमें कुशल योद्धा नकुल उधरसे युद्धके लिये तैयार खड़े हैं। माद्रीकुमार नकुल महान् धनुर्धर और अत्यन्त दर्शनीय वीर हैं । उनके बलसे पाण्डवोंने आपलोगोंपर आक्रमणकी तैयारी की है ॥ २ ९ -३० ॥

यः काशीनङ्गमगन् कलिङ्गांश्च युधाजयत् ।

तेन वः सहदेवेन पाण्डवा अभ्ययुञ्जत ॥ ३१ ॥

जिन्होंने युद्धमें काशी, अंग, मगध तथा कलिंग देशके राजाओंको पराजित किया है, उन वीरवर सहदेवके बलसे पाण्डव आपलोगोंसे भिड़नेके लिये तैयार हुए हैं ॥ ३१ ॥

यस्य वीर्येण सदृशाश्चत्वारो भुवि मानवाः ।

अश्वत्थामा धृष्टकेतू रुक्मी प्रद्युम्न एव च ॥ ३२ ॥

तेन वः सहदेवेन युद्धं राजन् महात्ययम् ।

यवीयसा नृवीरेण माद्रीनन्दिकरेण च ॥ ३३ ॥

राजन्! इस भूमण्डलमें अश्वत्थामा, धृष्टकेतु, रुक्मी तथा प्रद्युम्न– ये चार पुरुष ही बल और पराक्रममें जिनकी समानता कर सकते हैं, जो माद्रीको आनन्द प्रदान करनेवाले तथा पाण्डवोंमें सबसे छोटे हैं, उन नरश्रेष्ठ वीर सहदेवके साथ आपलोगोंका महान् विनाशकारी युद्ध होनेवाला है ॥ ३२-३३ ॥

तपश्चचार या घोरं काशिकन्या पुरा सती ।

भीष्मस्य वधमिच्छन्ती प्रेत्यापि भरतर्षभ ॥ ३४ ॥

पाञ्चालस्य सुता जज्ञे दैवाच्च स पुनः पुमान् ।

स्त्रीपुंसोः पुरुषव्याघ्र यः स वेद गुणागुणान् ॥ ३५ ॥

भरतश्रेष्ठ! पूर्वकालमें काशिराजकी जिस सती-साध्वी कन्या अम्बाने भीष्मजीके वधकी इच्छासे घोर तपस्या की थी, वही मृत्युके पश्चात् पांचालराज द्रुपदकी पुत्री होकर

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उत्पन्न हुई, परंतु दैववश वह फिर पुरुष हो गयी । वह वीर पांचालकुमार स्त्री और पुरुष दोनों शरीरोंके गुण और अवगुणको जानता है ॥ ३४-३५ ॥

यः कलिङ्गान् समापेदे पाञ्चाल्यो युद्धदुर्मदः ।

शिखण्डिना वः कुरवः कृतास्त्रेणाभ्ययुञ्जत ॥ ३६ ॥

कौरवो! वह द्रुपदकुमार युद्धमें उन्मत्त होकर लड़नेवाला है । उसीने कलिंगदेशीय क्षत्रियोंको पराजित किया था । उस अस्त्रवेत्ता वीरका नाम शिखण्डी है, जिसके बलपर पाण्डवोंने आपलोगोंसे युद्धकी तैयारी की है ॥ ३६ ॥

यं यक्षः पुरुषं चक्रे भीष्मस्य निधनेच्छया ।

महेष्वासेन रौद्रेण पाण्डवा अभ्ययुञ्जत ॥ ३७ ॥

जिसे स्थूणाकर्ण यक्षने पुरुष बना दिया था, भीष्मके वधकी इच्छा रखनेवाले उस भयंकर एवं महाधनुर्धर शिखण्डीके बलपर पाण्डव आपसे युद्ध करनेको तैयार हैं ॥

महेष्वासा राजपुत्रा भ्रातरः पञ्च केकयाः ।

आमुक्तकवचाः शूरास्तैश्च वस्तेऽभ्ययुञ्जत ॥ ३८ ॥

केकयदेशके पाँच राजकुमार जो परस्पर भाई हैं, सदा कवच बाँधे युद्धके लिये उद्यत रहते हैं । वे महान् धनुर्धर शूरवीर हैं । उनके बलपर पाण्डवोंने आपलोगोंसे युद्धकी तैयारी की है ॥ ३८ ॥

यो दीर्घबाहुः क्षिप्रास्त्रो धृतिमान् सत्यविक्रमः ।

तेन वो वृष्णिवीरेण युयुधानेन संगरः ॥ ३ ९ ॥

जिनकी बड़ी - बड़ी भुजाएँ हैं, जो बड़ी शीघ्रता से अस्त्र - संचालन करते हैं तथा जो धीर एवं सत्यपराक्रमी हैं, उन वृष्णिवीर सात्यकिके साथ आपलोगोंका संग्राम होनेवाला है ॥ ३ ९ ॥

य आसीच्छरणं काले पाण्डवानां महात्मनाम् ।

रणे तेन विराटेन भविता वः समागमः ॥ ४० ॥

जो अज्ञातवासके समय महात्मा पाण्डवोंके आश्रयदाता थे, उन राजा विराटके साथ भी आपलोगोंका युद्ध होगा ॥ ४० ॥

यः स काशिपती राजा वाराणस्यां महारथः ।

स तेषामभवद् योद्धा तेन वस्तेऽभ्ययुञ्जत ॥ ४१ ॥

काशिदेशके अधिपति महारथी नरेश जो वाराणसीपुरीमें रहते हैं, पाण्डवोंकी ओरसे युद्ध करनेको तैयार हैं । उनको साथ लेकर पाण्डव आपलोगोंपर आक्रमण करनेके लिये तैयार हैं ॥ ४१ ॥

शिशुभिर्दुर्जयैः संख्ये द्रौपदेयैर्महात्मभिः ।

आशीविषसमस्पर्शैः पाण्डवा अभ्ययुञ्जत ॥ ४२ ॥

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द्रौपदीके महामना पुत्र देखनेमें बालक होनेपर भी समरभूमिमें दुर्जय हैं । उन्हें छेड़ना विषधर सर्पोंको छू लेनेके समान है । उनके बलपर भी पाण्डव आपलोगोंसे भिड़नेकी तैयारी कर रहे हैं ॥ ४२ ॥

यः कृष्णसदृशो वीर्य युधिष्ठिरसमो दमे ।

तेनाभिमन्युना संख्ये पाण्डवा अभ्ययुञ्जत ॥ ४३ ॥

जो पराक्रममें भगवान् श्रीकृष्णके समान और इन्द्रियसंयममें युधिष्ठिरके तुल्य हैं, उन अभिमन्युको साथ लेकर पाण्डवोंने आपलोगोंसे युद्धकी तैयारी की है ॥

यश्चैवाप्रतिमो वीर्ये धृष्टकेतुर्महायशाः ।

दुःसहः समरे क्रुद्धः शैशुपालिर्महारथः ॥ ४४ ॥

तेन वश्चेदिराजेन पाण्डवा अभ्ययुञ्जत ।

अक्षौहिण्या परिवृतः पाण्डवान् योऽभिसंश्रितः ॥ ४५ ॥

जिसके पराक्रमकी कहीं तुलना नहीं है, शिशुपालका वह महारथी पुत्र महायशस्वी धृष्टकेतु समरभूमिमें कुपित होनेपर शत्रुओंके लिये दुःसह हो उठता है । उस चेदिराजके साथ पाण्डवलोग आपपर आक्रमण करनेकी तैयारी कर रहे हैं । उसने एक अक्षौहिणी सेनाके साथ आकर पाण्डवोंका पक्ष ग्रहण किया है ॥ ४४-४५ ॥

यः संश्रयः पाण्डवानां देवानामिव वासवः ।

तेन वो वासुदेवेन पाण्डवा अभ्ययुञ्जत ॥ ४६ ॥

जैसे इन्द्र देवताओंके आश्रयदाता हैं, उसी प्रकार जो पाण्डवोंको शरण देनेवाले उन भगवान् वासुदेवके साथ पाण्डवोंने आपपर आक्रमण करनेकी तैयारी की है ॥ ४६ ॥

तथा चेदिपतेर्भ्राता शरभो भरतर्षभ ।

करकर्षेण सहितस्ताभ्यां वस्तेऽभ्ययुञ्जत ॥ ४७ ॥

भरतश्रेष्ठ! चेदिराजके भाई शरभ ( अपने अनुज) करकर्षके साथ पाण्डवोंकी सहायताके लिये आये हैं । उन दोनोंको साथ लेकर उन्होंने आपसे युद्ध करनेका उद्योग किया है ॥ ४७ ॥

जारासंधिः सहदेवो जयत्सेनश्च तावुभौ ।

युद्धेऽप्रतिरथौ वीरौ पाण्डवार्थे व्यवस्थितौ ॥ ४८ ॥

जरासंधपुत्र सहदेव और जयत्सेन दोनों युद्धमें अपना सानी नहीं रखते हैं । वे दोनों मागध वीर पाण्डवोंकी सहायताके लिये आकर डटे हुए हैं ॥ ४८ ॥

द्रुपदश्च महातेजा बलेन महता वृतः ।

त्यक्तात्मा पाण्डवार्थाय योत्स्यमानो व्यवस्थितः ॥ ४ ९ ॥

महातेजस्वी राजा द्रुपद विशाल सेनाके साथ आये हैं और पाण्डवोंके लिये अपने शरीर और प्राणोंकी परवा न करके युद्ध करनेके लिये उद्यत हैं ॥ ४ ९ ॥ एते चान्ये च बहवः प्राच्योदीच्या महीक्षितः ।

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शतशो यानुपाश्रित्य धर्मराजो व्यवस्थितः ॥ ५० ॥

ये तथा और भी बहुत - से पूर्व तथा उत्तर-दिशाओंमें रहनेवाले नरेश सैकड़ोंकी संख्यामें आकर वहाँ डटे हुए हैं, जिनका आश्रय लेकर महाराज युधिष्ठिर युद्धके लिये तैयार ॥ ५० ॥

इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि यानसंधिपर्वणि संजयवाक्ये पञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५० ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत यानसंधिपर्वमें संजयवाक्यविषयक पचासवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ५० ॥

Fard

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एकपञ्चाशत्तमोऽध्यायः भीमसेनके पराक्रमसे डरे हुए धृतराष्ट्रका विलाप धृतराष्ट्रउवाच

सर्व एते महोत्साहा ये त्वया परिकीर्तिताः ।

एकतस्त्वेव ते सर्वे समेता भीम एकतः ॥ १ ॥

धृतराष्ट्र बोले- संजय! तुमने जिन लोगोंके नाम बताये हैं, ये सभी बड़े उत्साही वीर हैं । इनमें भी जितने लोग वहाँ एकत्र हुए हैं, वे सब एक ओर और भीमसेन एक ओर ॥ १ ॥

भीमसेनाद्धि मे भूयो भयं संजायते महत् ।

क्रुद्धादमर्षणात् तात व्याघ्रादिव महारुरोः ॥ २ ॥

तात! मुझे क्रोधमें भरे हुए अमर्षशील भीमसेनसे बड़ा डर लगता है; ठीक उसी तरह, जैसे महान् मृगको किसी व्याघ्रसे सदा भय बना रहता है ॥ २ ॥

जागर्मि रात्रयः सर्वा दीर्घमुष्णं च निःश्वसन् ।

भीतो वृकोदरात् तात सिंहात् पशुरिवापरः ॥ ३ ॥

वत्स! सिंहसे डरे हुए दूसरे पशुकी भाँति मैं भीमसेनसे भयभीत हो रातभर गर्म - गर्म लंबी साँसें खींचता हुआ जागता रहता हूँ ॥ ३ ॥

न हि तस्य महाबाहोः शक्रप्रतिमतेजसः ।

सैन्येऽस्मिन् प्रतिपश्यामि य एनं विषहेद् युधि ॥ ४ ॥

महाबाहु भीम इन्द्रके समान तेजस्वी है । मैं अपनी सेनामें किसीको भी ऐसा नहीं देखता, जो भीमका सामना कर सके— युद्धमें इसके वेगको सह सके ॥ ४ ॥

अमर्षणश्च कौन्तेयो दृढवैरश्च पाण्डवः ।

अनर्महासी सोन्मादस्तिर्यक्प्रेक्षी महास्वनः ॥ ५ ॥

कुन्तीकुमार पाण्डुपुत्र भीम असहनशील तथा वैरको दृढ़तापूर्वक पकड़े रखनेवाला है । उसकी की हुई हँसी भी हँसीके लिये नहीं होती, वह उसे सत्य कर दिखाता है । उसका स्वभाव उद्धत है । वह टेढ़ी निगाहसे देखता और बड़े जोरसे गर्जना करता है ॥ ५ ॥

महावेगो महोत्साहो महाबाहुर्महाबलः ।

मन्दानां मम पुत्राणां युद्धेनान्तं करिष्यति ॥ ६ ॥

वह महान् वेगशाली, अत्यन्त उत्साही, विशाल- बाहु और महाबली है । वह युद्ध करके मेरे मन्दबुद्धि पुत्रोंको अवश्य मार डालेगा ॥ ६ ॥

ऊरुग्राहगृहीतानां गदां बिभ्रद् वृकोदरः ।

कुरूणामृषभो युद्धे दण्डपाणिरिवान्तकः ॥ ७ ॥

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मेरे पुत्र भी बड़े दुराग्रही हैं, अतः हाथमें गदा लिये कुरुश्रेष्ठ वृकोदर भीम दण्डपाणि यमराजकी भाँति युद्धमें इनका निश्चय ही वध कर डालेगा ॥ ७ ॥

अष्टात्रिमायसीं घोरां गदां काञ्चनभूषणाम् ।

मनसाहं प्रपश्यामि ब्रह्मदण्डमिवोद्यतम् ॥ ८ ॥

मैं मनकी आँखोंसे देख रहा हूँ, भीमसेनकी स्वर्णभूषित भयंकर गदा, जो लोहेकी बनी हुई और आठ कोनोंसे युक्त है, ब्रह्मदण्डके समान उठी हुई है ॥ ८ ॥

यथा मृगाणां यूथेषु सिंहो जातबलश्चरेत् ।

मामकेषु तथा भीमो बलेषु विचरिष्यति ॥ ९ ॥

जैसे बलवान् सिंह मृगोंके यूथोंमें निःशंक विचरण करता है, उसी प्रकार भीमसेन मेरी विशाल वाहिनियोंमें बेखटके विचरेगा ॥ ९ ॥

सर्वेषां मम पुत्राणां स एकः क्रूरविक्रमः ।

बह्वाशी विप्रतीपश्च बाल्येऽपि रभसः सदा ॥ १० ॥

बाल्यकालमें भी मेरे सब पुत्रोंमें एकमात्र वह भीमसेन ही क्रूर पराक्रमी, बहुत अधिक खानेवाला, सबके प्रतिकूल चलनेवाला तथा सदा अत्यन्त वेगशाली था ॥ १० ॥

उद्वेपते मे हृदयं ये मे दुर्योधनादयः ।

बाल्येऽपि तेन युध्यन्तो वारणेनेव मर्दिताः ॥ ११ ॥

उसकी याद आते ही मेरा हृदय काँपने लगता है । मेरे दुर्योधन आदि पुत्र बचपनमें भी जब उसके साथ खेल - कूदमें लड़ते थे, तब वह गजराजकी भाँति इन सबको मसल देता था ॥ ११ ॥

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तस्य वीर्येण संक्लिष्टा नित्यमेव सुता मम ।

स एव हेतुर्भेदस्य भीमो भीमपराक्रमः ॥ १२ ॥

मेरे पुत्र उसके बल - पराक्रमसे सदा ही कष्टमें पड़े रहते थे । भयंकर पराक्रमी भीमसेन ही इस फूटकी जड़ है ॥ १२ ॥

ग्रसमानमनीकानि नरवारणवाजिनाम् ।

पश्यामीवाग्रतो भीमं क्रोधमूर्च्छितमाहवे ॥ १३ ॥

मुझे अपने सामने दीख- सा रहा है कि भीमसेन युद्धमें क्रोधसे मूर्च्छित हो मनुष्य, हाथी और घोड़ोंकी ( समस्त ) सेनाओंको कालका ग्रास बनाता जा रहा है ॥ १३ ॥

अस्त्रे द्रोणार्जुनसमं वायुवेगसमं जवे ।

महेश्वरसमं क्रोधे को हन्याद् भीममाहवे ॥ १४ ॥

वह अस्त्रविद्यामें द्रोणाचार्य तथा अर्जुनके समान है, वेगमें वायुकी समानता करता है

एवं क्रोधमें महेश्वरके तुल्य है । ऐसे भीमको युद्धमें कौन मार सकता है? ॥ १४ ॥

संजयाचक्ष्व मे शूरं भीमसेनममर्षणम् ।

अतिलाभं तु मन्येऽहं यत् तेन रिपुघातिना ॥ १५ ॥

तदैव न हताः सर्वे पुत्रा मम मनस्विना ।

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संजय! मुझे अमर्षमें भरे हुए शूरवीर भीमसेनका समाचार सुनाओ । मैं तो यही सबसे बड़ा लाभ मानता हूँ कि उस शत्रुघाती मनस्वी वीरने (जब द्यूतक्रीड़ा हो रही थी ) उसी समय मेरे सब पुत्रोंको नहीं मार डाला ॥ १५ ॥

येन भीमबला यक्षा राक्षसाश्च पुरा हताः ॥ १६ ॥

कथं तस्य रणे वेगं मानुषः प्रसहिष्यति । जिसने पूर्वकालमें भयंकर बलशाली यक्षों तथा राक्षसोंका वध किया है, युद्धमें उसका वेग कोई मनुष्य कैसे सह सकेगा? ॥ १६३ ॥

न स जातु वशे तस्थौ मम बाल्येऽपि संजय ॥ १७ ॥

किं पुनर्मम दुष्पुत्रैः क्लिष्टः सम्प्रति पाण्डवः । संजय! पाण्डुकुमार भीमसेन बचपनमें भी कभी मेरे वशमें नहीं रहा; फिर जब मेरे दुष्ट पुत्रोंने उसे बार- बार कष्ट दिया है, तब वह इस समय मेरे वशमें कैसे हो सकता है? ॥ १७३ ||

निष्ठुरो रोषणोऽत्यर्थं भज्येतापि न संनमेत् ।

तिर्यक्प्रेक्षी संहतभ्रूः कथं शाम्येद् वृकोदरः ॥ १८ ॥

वह क्रूर और क्रोधी है । टूट भले ही जाय, पर झुक नहीं सकेगा । सदा टेढ़ी निगाहसे ही देखता है । उसकी भौंहें क्रोधके कारण परस्पर गुँथी रहती हैं । ऐसा भीमसेन कैसे शान्त हो सकेगा? ॥ १८ ॥

शूरस्तथाप्रतिबलो गौरस्ताल इवोन्नतः ।

प्रमाणतो भीमसेनः प्रादेशेनाधिकोऽर्जुनात् ॥ १ ९ ॥

गोरे रंगका वह शूरवीर भीमसेन ताड़के समान ऊँचा है । ऊँचाईमें वह अर्जुनसे एक बित्ता अधिक है, बलमें उसकी समता करनेवाला दूसरा कोई नहीं है ॥ १ ९ ॥

जवेन वाजिनोऽत्येति बलेनात्येति कुञ्जरान् ।

अव्यक्तजल्पी मध्वक्षो मध्यमः पाण्डवो बली ॥ २० ।

वह स्पष्ट नहीं बोलता । उसकी आँखें सदा मधुके समान पिंगलवर्णकी दिखायी देती हैं । वह महाबली मध्यम पाण्डव अपने वेगसे घोड़ोंको भी लाँघ सकता है और बलसे हाथियोंको भी पराजित कर सकता है ॥ २० ॥

इति बाल्ये श्रुतः पूर्वं मया व्यासमुखात् पुरा ।

रूपतो वीर्यतश्चैव याथातथ्येन पाण्डवः ॥ २१ ॥

मैंने बाल्यकालमें ही व्यासजीके मुखसे पहले इस पाण्डुपुत्रके अद्भुत रूप और पराक्रमका यथार्थ वर्णन सुना था ॥ २१ ॥

आयसेन स दण्डेन रथान् नागान् नरान् हयान् ।

हनिष्यति रणे क्रुद्धो रौद्रः क्रूरपराक्रमः ॥ २२ ॥

पृष्ठ 440

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निष्ठुर पराक्रम प्रकट करनेवाला यह भयंकर भीमसेन समरभूमिमें कुपित होकर लौहदंडसे मेरे रथों, हाथियों, पैदल मनुष्यों और घोड़ोंका भी संहार कर डालेगा ॥ २२ ॥

अमर्षी नित्यसंरब्धो भीमः प्रहरतां वरः ।

मया तात प्रतीपानि कुर्वन् पूर्वं विमानितः ॥ २३ ॥

तात संजय! सदा क्रोधमें भरा रहनेवाला अमर्षशील भीमसेन प्रहार करनेवाले योद्धाओंमें सबसे श्रेष्ठ है । मेरे पुत्रोंके प्रतिकूल आचरण करते समय मैंने पहले कई बार उसका अपमान किया है ॥ २३ ॥

निष्कर्णामायसीं स्थूलां सुपार्श्वा काञ्चनीं गदाम् ।

शतघ्नीं शतनिर्ह्रादां कथं शक्ष्यन्ति मे सुताः ॥ २४ ॥

उसकी लोहेकी गदा सीधी, मोटी, सुन्दर पार्श्वभागवाली और सुवर्णसे विभूषित है, वह शत - शत वज्रपातके समान बड़े जोरसे आवाज करती और एक ही चोटमें सैकड़ोंको मार डालती है । मेरे बेटे उसका आघात कैसे सह सकेंगे? ॥ २४ ॥

अपारमप्लवागाधं समुद्रं शरवेगिनम् ।

भीमसेनमयं दुर्गं तात मन्दास्तितीर्षवः ॥ २५ ॥

तात! भीमसेन एक दुर्गम अपार समुद्र है, इसे पार करनेके लिये न तो कोई नौका है और न इसकी कहीं थाह ही है; बाण ही इसका वेग है, तो भी मेरे मूर्ख पुत्र इस भीमसेनमय दुर्गम समुद्रको पार करना चाहते हैं ॥ २५ ॥

क्रोशतो मे न शृण्वन्ति बालाः पण्डितमानिनः ।

विषमं न हि मन्यन्ते प्रपातं मधुदर्शिनः ॥ २६ ॥

मैं चीखता- चिल्लाता रह जाता हूँ, परंतु अपनेको पण्डित समझनेवाले ये मूर्ख पुत्र मेरी बात नहीं सुनते हैं । ये केवल वृक्षकी ऊँची शाखामें लगे हुए शहदको देखते हैं, वहाँसे गिरनेका जो भयानक खटका है, उसकी ओर इनका ध्यान नहीं है ॥ २६ ॥

संयुगं ये गमिष्यन्ति नररूपेण मृत्युना ।

नियतं चोदिता धात्रा सिंहेनेव महामृगाः ॥ २७ ॥

जैसे महान् मृग सिंहसे भिड़ जायँ, उसी प्रकार जो लोग उस मनुष्यरूपी यमराजके साथ लड़नेके लिये युद्धभूमिमें उतरेंगे, उन्हें विधाताने ही मृत्युके लिये प्रेरित करके भेजा है, ऐसा मानना चाहिये ॥ २७ ॥

शैक्यां तात चतुष्किष्कुं षडस्रिममितौजसम् ।

प्रहितां दुःखसंस्पर्शां कथं शक्ष्यन्ति मे सुताः ॥ २८ ॥

तात संजय! भीमसेनकी गदा छींकेपर रखनेयोग्य, चार हाथ लंबी और छः कोणोंसे विभूषित है । उस अत्यन्त तेजस्विनी गदाका स्पर्श भी दुःखदायक है । जब भीम उसे मेरे पुत्रोंपर चलायेगा, तब वे उसका आघात कैसे सह सकेंगे? ॥ २८ ॥

गदां भ्रामयतस्तस्य भिन्दतो हस्तिमस्तकान् ।